शनिवार, 15 जनवरी 2022

समकाल : कविता का स्त्रीकाल -7



रोहिणी अग्रवाल को हम मूलतः आलोचक के तौर पर जानते रहें हैं किन्तु आप "गद्य में पद्य में समाभ्यस्त " यदि कहूँ तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।यह बात अलग है कि कविता लेखन आपने अब शुरू किया है और जीवनानुभव के बारीक तन्तुओं को कविता के ताने -बाने में इन दिनों आप बड़ी खूबसूरती से बुन रही हैं। दरअसल कविता वह विधा है जहाँ संसार के दर्द से उपजे संत्रास को कवि अपनी कविता में उकेरता है।संवेदनशील मन अपनी मानवीय करुणा की चीखों को कविता भाषा में दर्ज करता है।रोहिणी जी इन दिनों कैंसर जैसी तकलीफ़देह बीमारी से उबरने के प्रयास के बीच कविता लिख रही हैं।आपकी कविताओं का हम गाथांतर पर स्वागत करते हैं-


            (1)

मेरे साथ नसीहतें नहीं, सपने चलते हैं.


गंगा में बहा आई हूं

राख की अनगिन पोटलियाँ 

सदियों से सीने में दाब कर जिन्हें 

वानरी-मोह के साथ

मेरी दादी-नानी-मां

बनती रही हैं त्रिजटा 

अपनी ही कैद की पहरेदार.


राख की पोटलियों में रहती हैं पुरखिनें मेरी

बर्तन घिसते-घिसते घिसा डालती हैं नाखून

चमकता नहीं लेकिन कुछ भी 

न आँख, न त्वचा, 

न नाक, न कान

लेप लेती हैं देह पर चंदन की तरह 

बन जाती है अवधूत.

(जानती हैं, ‘बन जाना’ जब

अ-पूर्तियों की वर्चुअल पूर्ति करे

तब जीने की आस में जीने के ख़्याल को जुटाना

कतई नहीं है बुरा)


मैं धड़कन हूं पुरखिन नहीं,

प्रयोग की झिलमिल ज्वाला.

करती हूं इंकार

चबाए गए पान को मुँह में ठूँस कर

अबीरी मुस्कान से इतराना


उलटती हूँ राख का ढेर 

नंगी उँगलियों के स्पर्श से

बटोरती हूं अधबुझे अग्निस्फुलिंग

और फूंक कर अस्वीकार की गहरी लंबी फुंकनी

धधकती लपट के आलोक में रचती हूं 

आकांक्षाओं के अनलिखे महाग्रंथ.


मेरे साथ नसीहतें नहीं, सपने चलते हैं.



       (2)


लिखती हूं मन


तुम तिरस्कारपूर्वक 

करते रहो वक्र अपने होंठ

फ़तवे देखकर करते रहो जलील

या चुप्पी की ठंडी सिल्लियों तले दाब कर प्राण

कर दो मुझे अदृश्य 

मैं फिर भी 

ताल ठोक कर कहती रहूंगी 

हाँ, स्त्री हूँ मैं

 लेखक स्त्री 

लिखूंगी अपना मनचीता

चलूंगी डगर निराली 

खुदे होंगे जिस पर 

मेरे अ-कंपित मजबूत कदमों के गहरे निशान.


 हाँ, ठीक कहते हो तुम 

स्त्री के लिखे में पराक्रम नहीं होता 

बाहों की मछलियाँ फड़फड़ा दे जो, 

पर उसके पास 

डींग हांकती अश्लील शौर्य-कथाएं भी तो नहीं  

न विजय-अभियानों के दंभ पर सवार बर्बर शोर

न भोग और घृणा की कुत्सित दलदलें.


 मैं, लेखक स्त्री 

लिखती हूँ अपना मन

क़ब्ज़ा ली गई ज़मीन की तरह 

नींव की अतल गहराइयों में 

पड़ा है किसी की मिल्कियत के संदूक में.

तुम देखते हो ज़मीन पर चिने

ठाठदार महल, 

कंगूरों पर जिनके

लटके रहते हैं सूरज चाँद तारे

फिर आरती का थाल सजा कर

बना देते हो उन्हें कुरुक्षेत्र बनारस हरिद्वार 


मैं नींव के नीम अंधेरों की आदी

खोलकर वह संदूक

बाहर फेंकने लगती हूं चीज़ें एक-एक कर

अहा!

धूप और हवा का स्पर्श! 

ज़िंदा हो जाती हैं सारी कराहें क्रंदन 

फैल जाती हैं देह को घेरते मेरे जीवन-चक्र में फिर धरती की परिधि पर 

काल को आवेष्टित करते हुए 

बींध देती हैं सभ्यताओं के सजीले मुखौटे

संस्कृतियों के मादक तरल सोमरस.


ज़ख़्म पुरते नहीं

निशानदेही करते हैं अ-दीखती यंत्रणाओं के

शूरवीरों की जयजयकार के तुमुल उद्घोष

शर्म से संकुचित हो

मुंह छुपाने और मुंह दिखाने के द्वंद्व में

गरजते शोर की लरजती अंतहीन सांकल में तब्दील हो जाते हैं

बाहुबलियों के चेहरों पर पुतने लगती है कालिख 

तांडव के लास्य के बहाने

राख का सिंगार करने की अभिनव मुद्रा गढ़ लेते हैं वे.


मैं लिखती हूँ मन

कि तुम भी देख सको 

दूसरों की आँख में बसी अपनी तस्वीर 

वरना तो आज तक तुम ही दर्ज करते आए हो

हड़प ली गई ज़मीन पर

भोग का माल

और गढ़ गढ़ने का मायावी कमाल.


मैं लिखती हूँ मन

कि गुमशुदगी की दलदल से निकाल बाहर

लफ़्ज़ों को दे सकूँ शफ्फाक सीधे मायने

कि जब वे कहना चाहें “शोषण” 

तो बाहुबलियों के पराक्रम भरे अश्लील किस्से

रेशमी थानों की तरह सड़कों-गलियों में सरसरने लगें.


हाँ जनाब

स्त्री हूं मैं

लेखक स्त्री! 

मेरे शब्दों में 

चुप करा दी गई घुड़कियों के 

नकाब पलटने की ताक़त है.

फिर चाहो तो, कांप कर 

जान ले सकते हो मेरी!




    (3)


जब कहती हूं


जब कहती हूं

तुम पूरक हो मेरी अपूर्णताओं के

मैं फैल कर अछोर आसमान की तरह

पूर रही होती हूं तुम्हारे अभाव

और पढ़ लेती हूं

अकिंचनता की निस्सीम परिधि में घूमते

विराट का दार्शनिक सार.


समर्पित हो जब कहती हूं

तुम में पाया है मैंने अंतिम शरण्य स्थल,

तुम्हारी प्रकंपित कातरताओं

भीत विलासिताओं

और खोखली क्षुद्रताओं के

नुकीले शर से बिंधे मृतप्राय स्वत्व को

अपनी उत्तप्त सांसों से फूंक कर

जीवन-दान दे रही होती हूं.


पोर-पोर सर्वस्व देकर जब कहती हूं

तुम हो उर्वर उद्धारक मेरी वंध्या ज़मीन के

तुम मुकुट में सजाने लगते हो

लंबे सलोने ताड़ के गाछ,

मैं लेती हूं तुम से बूंद भर तुम

और गूंथ कर तमाम सपने-अरमान

अनदेखे लोकों के अनंत सफर

हौसलों के भीषण तूफान

लौटा देती हूं तुम्हें

अपना धड़कता संसार विशाल.


मेरे सहयात्री! 

हर घाट से लेकिन तुम

क्यों चले आते हो प्यासे भला?


  (4)


हृदय-नाल


देखती हूं 

चरम तृषा की कोख से उपजा

परम तृप्ति का वह अनंतिम पल

रुंध गया जाने कब

कंठ में सिसकारी बन

स्वर देकर अपरिमित आनंद का 

मुक्त सलिला की तरह बहा दिया तुमने

तुम्हारे मैं और मेरे मैं के 

दो अभिन्न प्रशस्त कूलों के बीच.


देने के पल में छकने का कैसा अनूठा उजास!

न दी जाने वाली वस्तुएं गिनने का लोभ

न पावतियों को संभालने का होश.


जानती हूं बांध लिया है तुमने

हृदय-नाल से मुझे

आरक्षित करती हूं अजन्मे शिशु के लिए

अपनी नाभि-नाल

----------------------------------

परिचय


जन्म : 9 दिसंबर 1959, मानसा (पंजाब)

विधाएँ : कहानी, आलोचना, संस्मरण,कविता

मुख्य कृतियाँ-

कहानी संग्रह : घने बरगद तले, आओ माँ हम परी हो जाएँ

आलोचना : स्त्री लेखन : स्वप्न और संकल्प, हिंदी उपन्यास में कामकाजी महिला, एक नजर कृष्णा सोबती पर, इतिवृत्त की सरंचना और संरूप (पंद्रह वर्ष के प्रतिमानक उपन्यास), समकालीन कथा साहित्य : सरहदें और सरोकार

संपादन : - प्रतिनिधि कहानियाँ (मुक्तिबोध)

सम्मान

हरियाणा साहित्‍य अकादमी द्वारा कहानी एवं आलोचना पुरस्‍कार, स्पंदन आलोचना पुरस्का

फोन-

09416053847

ई-मेल-

rohini1959@gamil.com

रचनाएँ-

कहानियाँ

--------------

1)-आओ माँ! हम परी हो जाएँ

2)-आत्मजा

3)-कंजकें

4)-चिट्ठियाँ

5)-बेटी पराई नहीं होती, पापा

आलोचना 

----------------

1)-कबीर का वैचारिक दर्शन

2)-जान्हवी, जैनेंद्र और प्रेम

3)-‘बरजी मैं काही की नाहिं रहूँ’

4)-समकालीन हिंदी उपन्यास और दिकू समाज का आदिवासी चिंतन

5)-समकालीन हिंदी उपन्यास और पारिस्थितिकीय संकट

विमर्श

1)-देह के द्वार पर अनादृत स्त्रियाँ और हिंदी कथा साहित्य

2)-प्रेमचंद के संग : पहली बार उर्फ रसोई और स्टडी के बीच हरसिंगार के फूलों की बरसात


                                                                        रोहिणी अग्रवाल

बुधवार, 12 जनवरी 2022

समकाल :कविता का स्त्रीकाल - 6


पूनम अरोड़ा की कविताओं में प्रेम के अति सूक्ष्म से लेकर विराट तक के तन्तु अपने उद्दाम रूप में मिलते हैं।वह सम्पूर्ण नारी जीवन में प्रेम में मिली छलनाओं और चालाकियों को गुनती हैं,प्रेम में इस समस्त सृष्टि के सौन्दर्य को तलाशतीं हैं और उसे अपनी कविताओं में पिरोती हैं।कथ्य और शिल्प का सौन्दर्य भी यहाँ अनूठा है।आपकी काव्य भाषा गहरे अनुभूतियों के धरातल पर   कविता का संसार रचती है।

मैं तुम्हारे प्रेम में 
अपनी सब कोमल कवितायें 
वो विनम्र पत्ते बना दूँगी जो अपने पतन को पूर्व से जानते हैं

उपरोक्त कविता की पंक्तियों में प्रेम में किए गये समर्पण की व्यथा,कथा को देखा और महसूसा जा सकता है। प्रेम सृष्टि की सबसे सुन्दर अनुभूति होते हुए जब स्त्री के पक्ष में आती है तो पाप-पुण्य की परिभाषाओं में जकड़ जाती है।पूनम इस खेल पर सूक्ष्म दृष्टि रखते हुए बिना किसी शोरोगुल के अपनी कविता में इस खेल से पर्दा उठाती हैं। 

पूनम अरोड़ा की कविताओं में प्रेम के अति सूक्ष्म से लेकर विराट तक के तन्तु अपने उद्दाम रूप में मिलते हैं।वह सम्पूर्ण नारी जीवन में प्रेम में मिली छलनाओं और चालाकियों को गुनती हैं,प्रेम में इस समस्त सृष्टि के सौन्दर्य को तलाशतीं हैं और उसे अपनी कविताओं में पिरोती हैं।कथ्य और शिल्प का सौन्दर्य भी यहाँ अनूठा है।आपकी काव्य भाषा गहरे अनुभूतियों के धरातल पर   कविता का संसार रचती है।

मैं तुम्हारे प्रेम में 
अपनी सब कोमल कवितायें 
वो विनम्र पत्ते बना दूँगी जो अपने पतन को पूर्व से जानते हैं

उपरोक्त कविता की पंक्तियों में प्रेम में किए गये समर्पण की व्यथा,कथा को देखा और महसूसा जा सकता है। प्रेम सृष्टि की सबसे सुन्दर अनुभूति होते हुए जब स्त्री के पक्ष में आती है तो पाप-पुण्य की परिभाषाओं में जकड़ जाती है।पूनम इस खेल पर सूक्ष्म दृष्टि रखते हुए बिना किसी शोरोगुल के अपनी कविता में इस खेल से पर्दा उठाती हैं। 



1. 

पूरा शहर भर गया है
यासमीन की अबोध ख़ुशबू से 

लड़की के पाँव शुभेच्छा की ठिठुरती आंच को धीरे से 
एक कोने में रख आते हैं
यही कोना संसार के बिखराव का हाथ भी है

जहाँ से सहमति ली जा सकती है 
ख़ुद को समेटने की

लड़की अपनी किसी एक इच्छा को 
उस कोने में रखे पानी पर उगा आती है
सबसे पहले मृतात्मायें आकर 
अपनी उदास आँखों की परछाई
उस पानी पर छोड़ जाती हैं
फिर उल्लू उन पर देर तक निगरानी रखते हैं

प्रार्थनायें एक स्वर में 
असंख्य भवरों की तरह गुनगुनाते हुए 
इतनी विराट हो रही हैं कि उनका स्रोत खो रहा है

रिसती हुई प्रार्थनाओं में 
कामना का एक शिशु जन्म लेगा अब शायद

दिन के गुज़र जाने के बाद
रात अपनी योजना के सफ़ेद शब्दों से 
लड़की की पीठ पर लहरें बनाती है

वह सोते हुए यासमीन के फूलों का स्वप्न देखती है
करवट बदलती है

यह उसकी सांस की हरकत है
दृश्य कोई नहीं

                                
                                                                चित्र -  सोनी पाण्डेय

2.


वे संवाद नहीं माँगती
भिक्षा भी नहीं
न किसी जोड़-भाग में खुद को शामिल ही करती हैं

यह ठीक वही समय है
जब पीड़ाओं से उतर आता है श्वेत सीमाहीन एक द्वार मस्तक पर

यही वह समय भी है
जब रबिन्द्र संगीत एक लिफाफे में प्रेम-पत्र समान मुझे भेजा था तुमने

अपशकुनी कौएं विस्मय नहीं करते
न गहराती और आवेग की अग्नि में तपी कोयलें ही शोक करती हैं

देखो, सब कितना शीतल है
द्वेष नहीं न शाप
जल के विकार अपनी सतह पर जमे हैं
मिट्टी सर्द मौसम में ख़ामोशी से उदास प्रेमियों को ढके हुए है
तीतर उसी समय जंगल से घर को लौटते हैं
कोई पगडंडी ठीक इसी समय ठहर जाती है पुतलियों में
सूर्यबिम्ब ओझल हो जाने को आतुर
तितली मस्तक पर नृत्य-निद्रा करती है

सब आखेट है

कौन किसको कितनी हिंसा से प्रेम करता है
यह जानना हो तो एक मछली बनना होगा धैर्ये की
धरना होगा अपने केशों में एक निश्चय 
यह प्रेमियों की बात नहीं केवल
बुखार और रोशनी की बात है
जिस पर चलते हुए लोग देख लेते हैं मूर्छा में प्रार्थनारत पूर्वज 

वे सोईं हैं
आक्षेप और मर्यादा के मध्य
उन्होंने त्याग दिया है अपना भार 
प्रश्नों के किनारे
हरे मौन में
                                   
                               

3.


कवि ने कविताएँ लिखीं
उन पर चील-कौवे मंडराने लगे
उनकी चोंचें लाल थीं
उन्होंने कविता को निर्वस्त्र किया
उसकी कोमलता को चाटा 
रेशा-रेशा छुआ

जिव्हा स्वाद कलिकाओं के कोमल आह्लाद में दंतपंक्तियो के मध्य कुटिल सांस भर रही थी

फिर खेल ख़त्म हुआ
कविता भी
और कवि भी

अब शोक बचा था
 
शोक 



4.  


तुम इतने बोधगम्य हो 
जैसे समाधिस्थ बुद्ध के पास पड़ा एक कामनाहीन पत्ता

मैं तुम्हारे प्रेम में 
अपनी सब कोमल कवितायें 
वो विनम्र पत्ते बना दूँगी जो अपने पतन को पूर्व से जानते हैं

मैं ख़ुद को क्षमा कर दूँगी

                    
                                                                 चित्र - सोनी पाण्डेय

5.



एक नदी थी
जो नृत्य करना चाहती थी

वह हर रात मेरी माँ से निकलती थी
जब भी वह खिड़की से चाँद देखती थी

माँ कभी बूढ़ी नहीं हुई
क्यूँकि सूर्य का ताप 
उसकी अलसायी उम्र को लगातार प्रेम करता रहा

वह जादू सिखाता रहा 
और माँ सीखती रही

6-

भ्रम टूटते रहे और मैं बार-बार जन्मती रही


एक रात के अलाव से 
जो लावा निकला था
उसने अबोध स्त्री के माथे पर शिशु उगा दिया

शिशु जब-जब रोया
अकेला रोया

अबोध स्त्री के हाथ अपरिपक्व थे और स्तन सूखे
किसी बहरूपिये ने एक रात एक लम्बी नींद स्त्री के हाथ पर रख एक गीत गाया

शिशु किलकारी मारने लगा
देवताओं ने चुपचाप सृष्टि में तारों वाली रात बना दी

गीत गूँजता रहा सदियों तक
अबोध स्त्रियाँ जनती रहीं कल्पनाओं के शिशु और बहरूपिये पिता सुनाते रहे 
समुद्री लोरियाँँ



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परिचय

पूनम अरोड़ा ने इतिहास, मास कम्युनिकेशन और हिंदी में स्नातकोत्तर उपाधियाँ हासिल की हैं। दो कहानियों ‘आदि संगीत’ और ‘एक नूर से सब जग उपजे’ को हरियाणा साहित्य अकादमी का युवा लेखन पुरस्कार मिल चुका है। कहानी, कविता की रेडियो पर संगीतमय प्रस्तुती। कविताओं, कहानियों और आलेखों का देश की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में प्रकाशन। ‘कामनाहीन पत्ता’ नाम से कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुका है।

shreekaya@gmail.com





समकाल : कविता का स्त्रीकाल -5

प्रतिभा कटियार स्त्री कविता का वह चेहरा हैं जहाँ औरतों के घर-बाहर का संघर्ष प्रमुखता से दर्ज होता है।इन कविताओं से गुजरते हुए हम कामकाजी औरतों के जीवन की मुश्किलों को सहज ही देख सकते हैं।ऐसा नहीं है कि इन मुश्किलों से हम -आप अवगत नहीं हैं , हम नहीं जानते कि औरतें कितना कुछ सहती ,सुनती हैं।अपने स्व को भुलाकर कैैैसे वह हँस- मुस्कुरा लेेेती हैैंं।इसे सम्भव कर पाने की  जद्दोजहद और घर, नौकरी में संतुलन साधने की लड़ाई के यथार्थ को औरतों के त्याग के जिस तमगे के साथ किनारे कर दिया जाता रहा है,वहाँ अब औरतें अपना सच बयां करने लगी हैं।

 स्त्री- पुरुष सहजीवन के लिए एक -दूसरे को मनुष्य मान ,स्त्री को एक पूरी व्यक्ति इकाई का दर्जा मिलना आज के समय की सबसे बड़ी माँग है।वह केवल एक मादा देह नहीं, पूरी एक व्यक्ति इकाई है जिसे उन तमाम अनचाहे बन्धनों से मुक्ति चाहिए जिसे जबरन उनपर थोपा गया है।


औरतें सपने देख रही हैं

खेतों की कटाई में, धान की रुपाई में
रिश्तों की तुरपाई में लगी औरतें सपने देख रही हैं

बच्चों को सुलाते हुए, उनका होमवर्क कराते हुए
गोल-गोल रोटी फुलाते हुए
औरतें सपने देख रही हैं

ऑफिस की भागमभाग में, प्रोजेक्ट बनाते हुए
बच्चों को पढ़ाते हुए, मीटिंगें निपटाते हुए
औरतें सपने देख रही हैं

घर के काम निपटाते हुए, पड़ोसन से बतियाते हुए
टिफिन पैक करते हुए
आटा लगे हाथ से आंचल को कमर में कोंचते हुए
औरतें सपने देख रही हैं

बेमेल ब्याह को निभाते हुए
शादी, मुंडन जनेऊ में शामिल होते
हैपी फैमिली की सेल्फी खिंचवाते हुए
आँखें मूंदकर सम्भोग के दर्द को सहते हुए
सुखी होने का नाटक करते हुए
औरतें गीली आँखों के भीतर सपने देख रही हैं

कि एक दिन वो अपने हिस्से के सपनों को जी लेंगी
एक दिन वो अपने लिए चाय बनाएंगी
अपने साथ बतियायेंगी
खुद के साथ निकल जायेंगी बहुत दूर
जहाँ उनके आंसू और मुस्कान दोनों पर
नहीं होगी कोई जवाबदेही
बहुत आहिस्ता से जाना उनके करीब
चुपचाप बैठ जाना वहीं, बिना कुछ कहे
या ले लेना उनके हाथ का काम ताकि
औरतें सपने देखती रह सकें
और उनके सपनों की खुशबू से महक उठे यह संसार.


चेहरा

काम पर जाती हुई औरतें 

घर पर रहकर काम करने वाली औरतों से 

अलग नहीं होतीं

दोनों ही संभालती हैं घर और बाहर की दुनिया
दोनों ही जूझती हैं भीतर बाहर की लड़ाइयों से
दोनों के ही जीवन में है काम का भंडार
और उस पर से मिलने वाले ताने अपार

दोनों को निपटाने होते हैं समय रहते सारे काम
बुलट ट्रेन की स्पीड फिट होती है उनके हाथों में
दोनों के पास नहीं होता अपने लिए वक़्त

काम पर जाती औरतें ऑफिस में निपटाती हैं फाइलें
घर पर रहते हुए काम करती औरतें कसती हैं 

गृहस्थी के नट बोल्ट
काम पर जाती औरतें कुछ रोज ब्रेक लेकर

 घर पर रहना चाहती हैं
घर पर काम करती औरतें कुछ दिन बाहर जाकर
काम करने का सपना आँखों में पालती हैं

दोनों एक-दूसरे को हसरत से देखती हैं
दोनों को ही नहीं देखता कोई
दोनों से कोई खुश नहीं रहता

काम पर जाती औरतें ही घर पर काम करती औरतें हैं
घर पर रहकर काम करती औरतें ही काम पर जाती औरतें हैं
दोनों के चेहरे आपस में गड्डमगड्ड हैं

ये एक-दूसरे के साथ बैठकर चाय पीने के इंतज़ार में
रसोई से लेकर ट्राम तक ये भागती जा रही हैं

ऑफिस में फ़ाइल निपटानी हो, घर की रसोई समेटनी हो
या करना हो मेम साब के घर का झाड़ू, बर्तन, पोछा या मजदूरी
ये सारी औरतें एक ही हैं

फेसबुक विमर्श से दूर अपनी ही डबडबाई आँखों में
उतराते अपने कच्चे सपनों को देखती हैं

एक रोज निकालकर तनिक सी फुरसत
छोड़कर कुछ जरूरी काम
जब ये एक-दूसरे के गले लगकर हिलगकर रो लेंगी
तब सूख जायेंगे इन्हें बांटने के इरादे से बोये जाने वाले तमाम बीज

जब तक ये निपटा रही हैं अपने काम
तब तक ही चल पायेगा इन्हें बांटने का कारोबार.


                                                             चित्र- अनुष्का पाण्डेय


कामकाजी औरतें

कामकाजी औरतें हड़बड़ी में निकलती हैं रोज सुबह घर से
आधे रास्ते में याद आता है सिलेंडर नीचे से बंद किया ही नहीं
उलझन में पड़ जाता है दिमाग
कहीं गीजर खुला तो नहीं रह गया
जल्दी में आधा सैंडविच छूटा रह जाता है टेबल पर

कितनी ही जल्दी उठें और तेजी से निपटायें काम
ऑफिस पहुँचने में देर हो ही जाती है
खिसियाई हंसी के साथ बैठती हैं अपनी सीट पर
बॉस के बुलावे पर सिहर जाती हैं
सिहरन को मुस्कुराहट में छुपाकर
नाखूनों में फंसे आटे को निकालते हुए
अटेंड करती हैं मीटिंग
काम करती हैं पूरी लगन से

पूछना नहीं भूलतीं बच्चों का हाल
सास की दवाई के बारे में
उनके पास नहीं होता वक्त पान, सिगरेट या चाय के लिए
बाहर जाने का
उस वक्त में वे जल्दी-जल्दी निपटाती हैं काम
ताकि समय से काम खत्म करके घर के लिए निकल सकें.
दिमाग में चल रही होती सामान की लिस्ट
जो लेते हुए जाना है घर
दवाइयां, दूध, फल, राशन

ऑफिस से निकलने को होती ही हैं कि
तय हो जाती है कोई मीटिंग
जैसे देह से निचुड़ जाती है ऊर्जा
बच्चे की मनुहार जल्दी आने की
रुलाई बन फूटती है वाशरूम में
मुंह धोकर, लेकर गहरी सांस
शामिल होती है मीटिंग में
नजर लगातार होती है घड़ी पर
और ज़ेहन में होती है बच्चे की गुस्से वाली सूरत
साइलेंट मोड में पड़े फोन पर आती रहती हैं ढेर सारी कॉल्स
दिल कड़ा करके वो ध्यान लगाती हैं मीटिंग में

घर पहुंचती सामान से लदी-फंदी
देर होने के संकोच और अपराधबोध के साथ
शिकायतों का अम्बार खड़ा मिलता है घर पर
जल्दी-जल्दी फैले हुए घर को समेटते हुए
सबकी जरूरत का सामान देते हुए
करती हैं डैमेज कंट्रोल

मन घबराया हुआ होता है कि कैसे बतायेंगी घर पर
टूर पर जाने की बात
कैसे मनाएगी सबको
कैसे मैनेज होगा उनके बिना घर

ऑफिस में सोचती हैं कैसे मना करेगी कि नहीं जा सकेंगी इस बार
कितनी बार कहेंगी घर की समस्या की बात

कामकाजी औरतें सुबह ढेर सा काम करके जाती हैं घर से
कि शाम को आराम मिलेगा
रात को ढेर सारा काम करती हैं सोने से पहले
कि सुबह हड़बड़ी न हो

ऑफिस में तेजी से काम करती हैं कि घर समय पर पहुंचें
घर पर तेजी से काम करती हैं कि ऑफिस समय से पहुंचें

हर जगह सिर्फ काम को जल्दी से निपटाने की हड़बड़ी में
एक रोज मुस्कुरा देती हैं आईने में झांकते सफ़ेद बालों को देख

किसी मशीन में तब्दील हो चुकी कामकाजी औरतों से
कहीं कोई खुश नहीं न घर में, न दफ्तर में न मोहल्ले में
वो खुद भी खुश नहीं होतीं खुद से

'मुझसे कुछ ठीक से नहीं होता के अपराध बोध से भरी कामकाजी औरतें
भरभराकर गिर पड़ती हैं किसी रोज़
और तब उनके साथी कहते हैं
'ऐसा भी क्या खास करती हो जो इतना ड्रामा कर रही हो.'

मशीन में बदल चुकी कामकाजी औरतें
एक रोज तमाम तोहमतों से बेज़ार होकर
जीना शुरूकर देती हैं
थोड़ा सा अपने लिए भी
और तब लड़खड़ाने लगते हैं तमाम
सामाजिक समीकरण.

***********

ओ ईश्वर

ओ ईश्वर,
मन है तुमसे बातें करने का
जानने का तुम्हारे मन का हाल

कैसे हो तुम
कैसा लगता है तुम्हें
जब तुम्हारे नाम पर
होती हैं हत्याएं
मचती है मार काट

क्या बीतती है तुम पर
जब मंदिरों के भीतर
और मस्जिदों के साये में
अंजाम लेते हैं अपराध

कैसे रोकते हो तुम अपने आंसू
जब नन्ही बच्चियां तुम्हारा नाम पुकारते हुए
रौंद दी जाती हैं
किसके काँधे पर सर टिकाकर
तुम फफक ही पड़ते हो
जयकारों के साथ गालियाँ सुनते हुए

अच्छी सी चाय बनाना चाहती हूँ
तुम्हारे लिए
जानती हूँ भूखे हो सदियों से
कुन्टलों चढ़ते भोग से निर्विकार हो तुम
क्योंकि मुठ्ठी भर अनाज के इंतजार में
दम तोड़ देते लोगों की भूख ही तुम्हारी भूख है

कितने बच्चे, स्त्रियाँ, बूढ़े, जवान
कभी न खत्म होने वाले सफर पर
चलते ही जा रहे हैं
लाठियां और गालियाँ खाते हुए
तुम्हारे पाँव खूब दुःख रहे होंगे न?

सोये नहीं हो न तुम अरसे से
कैसे सो सकता है कोई इन हालात में
कि कर्मकाण्ड की होड़ में
इंसानियत से ही दूर चा चुके भक्त
भला कहाँ सोने देते हैं पल भर भी

कितने अकेले पड़ गए हो
अज़ान, घंटे, घडियालों की आवाज के बीच
बहुत उदास हो न तुम?
ओ ईश्वर मैं समझती हूँ तुम्हारा दुःख
आओ बैठो यहाँ मेरे पास
यह उदास मौसम है...

*************







उगना बसंत का 


एक कवि को उसकी कविता के लिए
भेज दिया जाना सीखचों के पीछे
खुलना है उम्मीदों की पांखे
कि बची है कविता में कविता
और भागते-दौड़ते जिस्मों में
बची ही ज़िन्दगी 


नज़रबंद किया जाना लिखते-पढ़ते लोगों को
ऐलान है इस बात का कि
नज़राना हैं ऐसे खूबसूरत लोग दुनिया के लिए
कि उनमें बचा है हौसला
सच लिखने का

गुम हुए युवा बेटे को ढूंढती माँ की धुंधलाती नज़र
उसे मिलने वाली धमकियां
सड़कों पर मिलते धक्के
बताते हैं कि कितना डरा हुआ है
सत्ता का चेहरा
और उतना ही है बेनक़ाब भी

परोसी गयी हर बात पर भरोसा करती
बिना सोचे समझे व्यक्ति से भीड़ बनती
और क्रूर खेल में शामिल होती जनता
गवाही है इस बात की
कि शिकार वही है सबसे ज्यादा
(7(7(उसी सत्ता की जिसके वो साथ है

अपना ही मजाक उड़ाते चुटकुलों को फॉरवर्ड करती
उड़ाती अपना ही परिहास
कैद करती खुद को खुद की मर्जी से
त्याग, समर्पण और देवी जैसे शब्दों के 

कैदखानों में कैद स्त्रियाँ
सदियों पुरानी पितृसत्ता की साजिश का आईना हैं

इन सबके बीच
लेना पंछियों का बेख़ौफ़ ऊंची उड़ान

बच्चों की आँखों से छलकना उम्मीद
उनका यक़ीन करना प्रेम पर
मनाना बसंत का उत्सव
उगना है बंजर ज़मीन पर 

उम्मीद की नन्ही कोपलों का. 


परिचय-

लखनऊ में पली-बढ़ी प्रतिभा कटियार ने राजनीति शास्त्र में एमए किया, एलएलबी के बाद पत्रकारिता में डिप्लोमा किया. 14 वर्ष तक मुख्यधारा की पत्रकारिता करने के बाद वे इन दिनों अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन के साथ जुड़कर शिक्षा के क्षेत्र में देहरादून में रहते हुए काम कर रही हैं. हाल ही में रूसी कवयित्री मारीना त्स्वेतायेवा पर लिखी इनकी जीवनी ‘मारीना’ काफ़ी चर्चित है. वे हिंदी की लगभग सारी महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लगातार लिखती रही हैं. अंडमान यात्रा पर लिखा संस्मरण और एक कविता ‘ओ अच्छी लड़कियों’ कर्नाटक की रानी चेनम्मा विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल हैं.

                                                                 प्रतिभा कटियार

सोमवार, 10 जनवरी 2022

समकाल : कविता का स्त्रीकाल -4

स्त्री की देह उसके विकास यात्रा की सबसे बड़ी बाधा है,हमारे समाज व्यवस्था में देह भर स्त्री अब तक स्वतंत्र इकाई नहीं बन पाई है।खुदमुख्तार हुई औरतों पर लांछनों की बौछार करता हमारा समाज उसे इस कदर प्रत्याड़ित करता है कि उसका हौसला टूटे न टूटे,दूसरी सुननेवाली औरतें अवश्य दहलजाती हैं और अपने पैर पीछे खींच लेती हैं। 
यह भय का संसार खुद में समेटे औरतों ने धीरे-धीरे ही सही ,अपनी बात कविता में कहना शुरू कर दिया है,यह आवाज आधुनिक कविता में महादेवी वर्मा से आरम्भ हो आज की पीढ़ी में कहीं मध्यम तो कहीं तीव्र आक्रोश के साथ व्यक्त हो रही है।सीमा आजाद स्वतंत्र चेता एक्टिविस्ट लेखिका हैं। सामाजिक मुद्दों पर डट कर लड़नेवाली सीमा की कविताओं में तीव्र आक्रोश और राजनैतिक चेतना के स्वर मुखर हैं।


सीमा आजाद की कविताएँ

1
अगर तुम औरत हो

अगर तुम 
कश्मीरी औरत हो
तो राष्ट्रभक्ति के लिए हो सकता है
तुम्हारा बलात्कार,
बलात्कारियों के समर्थन में
फहराये जा सकते हैं तिरंगे।

अगर तुम
मणिपुरी या सात बहनों के देश की बेटी हो
तो भी रौंदी जा सकती हो तुम,
राष्ट्रभक्ति के लिए
तुम्हारी योनि में
मारी जा सकती है गोली।

अगर तुम
आदिवासी औरत हो
तो तुम्हारी योनि में
भरे जा सकते हैं पत्थर
और कभी भी
काटा या निचोड़ा जा सकता है
तुम्हारा स्तन
राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए।

अगर तुम
मुस्लिम औरत हो
तब तो
कब्र में भी सुरक्षित नहीं हो तुम,
हिन्दू राष्ट्र के लिए
कभी भी निकाला जा सकता है तुम्हें
बलात्कार के लिए।
फाड़ी जा सकती है तुम्हारी कोख
मादा शरीर की खोज में।

अगर तुम
दलित औरत हो
तो सिर्फ पढ़-लिख कर
वर्णव्यवस्था में सेंध लगाने के लिए
लोहे की रॉड डाली जा सकती है
तुम्हारी योनि में
खैरलांजी की तरह।
तोड़ी जा सकती है गर्दन, हाथ पांव
हाथरस की तरह।

अगर तुम
सवर्ण औरत हो
तब भी सुरक्षित नहीं हो तुम।
गैंग रेप की बात ज़ुबान से निकालने भर से
मनुस्मृति की अवहेलना हो जाती है,
इसके लिए
हत्या की जा सकती है
तुम्हारी, या तुम्हारे पिता/भाई की।

अगर तुम
पुरूष सत्ता को
चुनौती देने वाली औरत हो
तब तो धमकियां बलात्कार की ही मिलेंगी
हो भी सकती हो बलत्कृत
किसी पुलिस थाने या हवेली में।

तुम कुछ भी हो
अगर औरत हो
तो हो निजाम के निशाने पर

इसलिए
अगर तुम औरत हो
तो बहुत ज़रूरी है
घरों से बाहर निकलना
सड़कों पर उतरना
और भिड़ना उस फासिस्ट निजाम से
जिनके लिए
हम औरतें
केवल शरीर हैं,
जिनका बलात्कार किया जा सकता है
अनेक वजहों से
कहीं भी, कभी भी


2
"आई कांट ब्रीथ"

मुझे घुटन हो रही है

सदियां बीत गईं
मेरे फेफड़े नहीं भर सके ताज़ी हवा से,
जॉर्ज फ्लोयड
केवल तुम नहीं
हम भी सांस नहीं लेे पा रहे हैं।

गांवों के बजबजाते दक्खिन टोले में,
महानगरों के विषैले  सीवर होल में,
मनुवाद के घुटनों तले
घुट रहे हैं हम 
सदियों से।
जॉर्ज फ्लोयड
हम भी सांस नहीं लेे पा रहे हैं।

घरों के सामंती बाड़े में,
रसोईघर के धुएं में,
धर्मग्रंथों के पन्नों तले
पितृसत्ता के क़दमों तले,
घुट रहे हैं हम
सदियों से।
जॉर्ज फ्लोयड
केवल तुम नहीं
हम भी सांस नहीं लेे पा रहे हैं।

हम भी सदियों से सांस नहीं लेे पा रहे हैं
अहिल्या और सीता के रामराज्य से -
उना के लोकतंत्रिक राज्य तक,
हममें से कुछ घुटन से मरे
तो कुछ का दम घोंट दिया गया
तुम्हारी तरह।
रोहित वेमुला, प्रियंका भोटमांगे, सुरेखा भोटमांगे
पायल तडवी, मनीषा
और कई अनाम नामों की
लंबी श्रृंखला है
जो इस घुटन से मारे गए।

जॉर्ज फ्लोयड,
तुम्हें यूं मरते देख
हमारी घुटन बढ़ रही है, 
पूरी दुनिया में घुटन बढ़ गई है,
अचानक हम सबने एक साथ महसूस किया-
"वी कांट ब्रीथ"
हमें ताज़ी हवा चाहिए।

तुम्हारे देश में
लोग मुट्ठी तानें सड़कों पर उतर गए हैं 
घुटन से निकलने के लिए,
ताज़ी हवा के लिए,

जॉर्ज फ्लोयड, 
यह हवा आंधी बन सकती है।
इसे इधर भी आने दो।
-सीमा आज़ाद
1 जून 2020

3
वरवर राव के लिए 

वो कविताओं में उतर कर
 क्रांति के बीज बोता है,
वो कविता लिखता भर नहीं
उसे जीता भी है,
कविता के स्वप्न को 
जमीन पर बोता भी है।
वो सिर्फ कवि नहीं
क्रांतिकारी कवि है।

कहते हैं
कवि कैद हो सकता है
कविता आज़ाद होती है,
कवि मर जाता है
कविता ज़िंदा रहती है
और समय के दिल में धड़कती रहती है।
लेकिन वह सिर्फ कवि नहीं है
कविता बन चुका है।
कविता बन समय के दिल में धड़क रहा है।

गौर से देखो
सत्ता के निशाने पर
सिर्फ कवि नहीं
कविता भी है।
जेल के भीतर ही
कविता की हत्या की सुपारी दी जा चुकी है 
समय का दिल खतरे में है।

ऐसे समय से निकलने की राह
उसने ही बताई है -
'कविता सिर्फ लिखो मत
उसे जिअो भी,
कविता के स्वप्न को 
जमीन पर बोओ भी,
कविता में उतर 
क्रांति के बीज को बोओ भी।'
 



4
महायात्रा

जंगल से
महानगर तक की यात्रा में
रचते और गढ़ते आगे बढ़े थे हम,
बिना यह सोचे
कि किसका होगा यह।
हम तो यही सोचते रहे कि
इस यात्रा में रचते - गढ़ते
जब - जब लौटेंगे अपने घरों की ओर
तो भूख भर खाएंगे,
नींद भर सोएंगे।

सोचते - गढ़ते - रचते
काफी आगे अा गए हम,
लोगों ने बताया
21 वीं सदी है यह।
विकास यात्रा की वह सदी,
जहां
न भूख भर भोजन है
न आंख भर नींद 
हमारे लिए।

आदिम से 21वीं सदी तक
गढ़ा था हमने जो स्वर्ग,
उस स्वर्ग से विदाई थी अब।

हां, गोरख ने इस विदाई की बात बताई थी,
लेकिन ये विदाई होगी इस तरह,
ये नहीं बताया था।
अपनी और अपनों की लाशें उठाए
लहूलुहान पांव
बिखरे ख्वाब के साथ
लौट रहे हैं हम।

यह लौटना हमारा
नहीं है पीछे लौटना,
उस स्वर्ग से विदाई भर है,
जिसमें अपने हिस्से का 
भ्रम था हमें।
इस भ्रम का टूटना
हमारी अनंत यात्रा का हिस्सा भर है।
हम लौट रहे हैं गांवों की ओर
और बढ़ रहे हैं आगे की ओर।

हमारा बच्चा स्टेशन पर है,
वह मरी मां के चादर को नहीं
21वीं सदी के पर्दे को उघाड़ कर देख रहा है।
यात्रा का ख्वाब
अब भी सुरक्षित है उसकी आंखों में
वह आगे बढ़ेगा,
समय उसके ही साथ चलेगा,
वह फिर से स्वर्ग गढ़ेगा,
सबमें ख्वाब रचेगा,
इस बार स्वर्ग पर कब्ज़ा भी गहेगा।


5
जेल*

ब्रह्माण्ड की तरह फैलते
मेरे वजूद को
तुमने समेट दिया
तीन फीट चौड़ी आठ फीट लंबी
कब्र जैसी सीमेंटेड सीट में।

मैंने इसके एक कोने में
सजा लिया 
अमलतास के लहलहाते फूलों का गुच्छा
बेला के फूलों की खुशबू से तर कर डाला
सलाखों को।

दीवार पर सजा दिया
नदी, पहाड़, जंगल, पशु पक्षी
और तारीखों जड़ा रंगीन कैलेंडर
होसे मारिया सिसों की की कविता का पोस्टर
चिपका दिया है ठीक आंख के सामने।
इन सबके ऊपर सजी है
भगत सिंह और चे ग्वेरा की तस्वीरें
प्रेरणा और हौसले के लिए।

इस तरह मैंने
तुम्हारी दी हुई
तीन फीट चौड़ी और आठ फीट लंबी सीमेंटेड कब्र को
एक भरी पूरी दुनिया में बदल डाला।

(यह कविता मैंने 2010 से 2012 के ढाई साल के जेल बंदी के समय लिखी थी।)

परिचय

सीमा आज़ाद
राजनैतिक सामाजिक पत्रिका दस्तक की "संपादक"
स्वतंत्र पत्रकार
मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल से जुड़ाव
कहानियां और कविताएं  हंस, पाखी, ज्ञानोदय, वागर्थ, लमही, बया, कथन, पल - प्रतिपल, अहा ज़िन्दगी, नवनीत, शुक्रवार, रेवांत, गांव के लोग आदि में प्रकाशित।
कविता के लिए 2012 का "लक्ष्मण प्रसाद मंडलोई" पुरस्कार।
प्रकाशित पुस्तकें - जिंदांनामा, चांद तारों के बगैर एक दुनिया ( जेल डायरी)
सरोगेट कंट्री (कहानी संग्रह)


रविवार, 9 जनवरी 2022

समकाल : कविता का स्त्रीकाल -3

यह स्त्री कविता का वह समय है जब चारों दिशाओं से स्त्री स्वर समवेत स्वर में अपनी बात भौगोलिक दूरियों और भाषाई सीमा का अतिक्रमण कर ,कर रहा हैं।अभी तक आदिवासी समाज के उन कोने कंदराओं का जीवन यथार्थ उन लोगों की बयानी रहा जो सैलानी या खोजी बन उन क्षेत्रों में गये या पढ़ सुन कर उनके जीवन को जाना था। यह आवाजें जितनी प्रमाणिक हैं इनकी बयानी उतनी ही मौलिक है। अरूणाचल से लेकर आसाम के पहाड़ी जनजीवन और जनजातीय समाज के जीवन अनुभव और आधुनिकता की बयार से प्रभावित अपने समाज की बातों को लेकर हिन्दी कविता में जमुना बीनी जिस तरह इन दिनों सक्रिय  हैंं वह बेेेहद आस्वस्ति कारक है।


1-


युवा अरूणाचली

युवा अरुणाचली

अब नहीं बोलते 

अपनी बोली

अंग्रेजी और हिंदी

में ही बतियाते

औरों की बोली 

अधिक सहज 

और

सम्मानजनक लगता । 


आबोतानी1, आनअ दोञी2

आबो पोलो3 की कथाएँ

अब नहीं भातीं

टी.वी. पर 

परोसा जाने वाला

दॉरेमोन , पोकेमोन

उसे अपना सा लगता । 


वह गा नहीं सकता

कोई लोकगीत

बॉलीवुड के 

गीतों के बोल

ज्यादा मधुर लगता । 


अब नहीं खाता

हिकु - हुयुप4, होञोर5

और

उबला हुआ ओयिक6

फ़िज्जा और नुडल्स

बहुत जायकेदार लगता ।


उनमें संयम की

जबरदस्त कमी है

 जल्द 

गलत राह 

पकड़ लेतें 

दिन-ब-दिन 

निगल रही उसे

उपभोक्तावादी संस्कृति ।




  1. आबोतानी – एक मिथकीय पुरुष और अरुणाचल के तानी समुदाय के आदिम पूर्वज

  2. आनअ दोञी – सूर्य माता और मिथकीय पुरुष आबोतानी की पत्नी

  3. आबो पोलो – चंद्र पिता

  4. हिकु-हुयुप – सूखा बाँस जो भोजन में मसाले के रूप में होता है । 

  5. होञोर – एक काँटेदार सब्जी

  6. ओयिक – एक छोटी पत्तियों वाली सब्जी ।




2-

नदी के दो पाट


तुम्हारी अधिकांश बातें 

मुझे समझ 

नहीं आता 

बिल्कुल दूसरी बोली

बोलने लगे हो तुम

तुम्हारा पहनावा विचित्र

तुम्हारी आदतें अजीब

तुम वह हो

पर 

वह नहीं 

जिसे मैं जानता था । 


आज 

सालों बाद 

हम मिलें 

तुम तो 

जैसे कोई 

खोजी पर्यटक 

साहस 

और 

रोमांच के 

खोज में 

मेरी दुनिया को 

देखने आये । 


अचरज का 

विषय हूँ 

मैं तुम्हारे लिए 

हाँ !! 

आदिम संस्कृति के साथ 

जीता एक आदिवासी 

अजायबघर का 

आदर्श नमूना । 


सुविधा 

भोगने की ललक 

ले गया दूर 

तुम्हें हमारे गाँव से 

उन लोगों से दूर

जो तुम्हें 

जानता था 

समझता था

अपना मानता था । 


तुमने अपना लिया

ञीपाक1 के 

तौर-तरीके

तुम्हारे 

और 

मेरे बीच 

दूरी इतनी

बढ़ गई 

जैसे 

नदी के दो पाट । 



  1. ञीपाक – गैर आदिवासी या मैदानी वासी 


 








3-
देहात की याद

यामा

शहर आई

चाचा-चाची के 

साथ रहने ।


यहाँ उसे

कुछ अच्छा 

नहीं लगता 

उसकी उदास आँखें 

मीलों दूर 

कोई पेड़ खोजती 

इमारतों की 

लम्बी-लम्बी 

कतारों में 

पेड़ 

कहीं नहीं दिखाई देता । 


जब मन 

बहुत भारी होता उसका

ऊपर 

आकाश को ताकती 

आकाश तो 

नीला होता है 

मगर 

यहाँ तो आकाश 

मटमैला है 

कितना भद्दा रंग ! 


चाची उसकी

बहुत प्यारी है 

उससे कहती-

‘ यूँ अकेली 

और

गुमसुम

मत रहा करो

बच्चों के साथ 

घुलो‌-मिलो

हेलमेल रखो

मन बहलेगा ’ ।


पर बात क्या करती

जब वे दोनों 

टी.वी. पर 

पुतला देख रहे थें 

क्या कहते है उसे 

कार्टून !!

हाँ ! कार्टून 

सकुचाती हुई 

 पूछा उसने-

‘ क्या मैं भी साथ देखूँ ? ’ 

वे बोले-

‘ तुम्हारी देहाती बोली

हमें समझ नहीं आतीं

अंग्रेजी तो 

आयेगी नहीं तुझे

हिंदी में बात करो ’

तब से तीनों में 

बातचीत बंद । 


क्या उमस था

उस दिन

थोड़ी झिझक के बाद 

पूछ ही लिया

चाची से‌-

‘ यहाँ नदी कहाँ है ?

ठंडे पानी में 

डुबकी लगाने की 

चाह हो रही है ’ ।


चाची हँसी 

जोर से 

एक खनकदार हँसी

‘ यहाँ तो नदियाँ 

डम्पिंग ग्राउंड  बन चुकी है 

इधर नदियों में 

कूड़ा-कचरा 

बहाया जाता है 

खुजली हो जायेगी

नहाओगी तो ’ । 


बाजार में 

कितनी भीड़ थी

वह चली कहाँ ‍!

चाची का हाथ थाम

भीड़ के साथ 

बस बही जा रही थी । 

घर लौटी 

तो नथुनों में 

कुछ कुलबुलाहट हुआ

छोटी उँगली डाल 

साफ किया

अरे ! उँगली एकदम काली हो गई

यामा बहुत डरी

चाची ने ढाढ़स दी-

‘ हवा दूषित है 

अगली बार 

मास्क जरुर

लगाकर निकलना ’ । 


हरा पेड़ नहीं

साफ पानी नहीं

स्वच्छ हवा नहीं

अपनी बोली नहीं

आह! 

रह-रह कर उसे 

देहात याद आती । 


वह सहेलियों संग

छायादार पेड़ के नीचे

लेटकर सीने में 

खूब साँस भरकर

नीले आकाश की ओर फूँकना

पर दूर

ऊपर 

आकाश में छिटका 

इक्का-दुक्का 

सफेद बादल 

उन साँसों से 

नहीं छितराता । 


दोपहरी की

चिलचिलाती धूप में 

बेफिक्री से तैराकी करना

यापी की माँ

 चिल्लाकर डाँटती-

‘ बावली लड़कियों

तेज धूप में 

मत नहा

रंगत काला पड़ जायेगा ’ 

यापी और वह हँसती 

बंदरियों की तरह

‘ खीं खीं खीं ’ !!


याद है उसे 

पिताजी की 

बूढ़ी-बेबस 

आँखों का वह कहना- 

‘ चाचा-चाची के साथ रहकर

मन लगाकर पढ़ना

कुछ बनना 

और 

अपने भाई-बहनों का भी 

कुछ करना ’  

उसके फूल-सा  

नाजुक कंधों पर 

यह बोझ नहीं लादा होता 

तो यामा 

कब की 

देहात लौट चुकी होती

*********************


4-

डर



मन के अंदर

एक डर 

पैठ गया 

कल कहीं 

किसी हादसे का शिकार 

हो जाऊँ मैं ।


लोग अपनी-अपनी 

जेब से , बैग से 

तुरंत निकालेंगे 

मोबाइल अपना

फिर फोटो

और 

वीडियो लेने की 

आपस में 

होड़ाहोड़ी मच जायेगी । 


शाम तक 

सारे सोशल मीडिया में 

छा जाएगा 

मेरा क्षत-विक्षत शरीर

नंग-धड़ंग बदन । 


निश्चय ही 

हमारी संवेदनाएँ 

जंग खाती जा रही हैं 

वीभत्स रस में 

लोग अब 

रसास्वादन लेने लगे । 


तकनीक के 

इस अंधी दौड़ में 

सब सोशल हो गया 

निज कुछ भी न रहा 

न जन्म न मृत्यु ।




5-


वे और हम



वे कहते हैं 

सदा से हम 

ऐसे ही हैं 

बहुत जिद्दी

बहुत ढीठ 

समय के 

आरंभ बिंदु से । 


बदलाव से डर 

बदलाव से अंजान 

हम बदल नहीं सकते 

पर जरूर 

बदलना होगा । 


वे कहते हैं 

सभ्य 

और 

प्रबुद्ध समाज में 

पिछड़ा कोई न रहे 

विकास सब तक पहुँचे

चलो शहर बसाए 

इनके गंदे 

गाँव उजाड़कर 

पढ़-लिख जाए 

और 

बने ये 

आला अफसर । 


वे पूछते हैं 

इनकी पहचान 

क्या है 

घुमंतू

और 

शिकारी 

अनगढ़ धातु के

औजारों से लैस ।  


तीर-धनुष में 

डूबा रहने वाला

कंद-मूल खा 

जिंदा रहने वाला 

हिंस्र पशुओं के संग

सोने वाला 

चलो इनके 

घने जंगलों को 

साफ करें 

आदमखोर जानवरों से 

छुटकारा पाने । 


इन्हें सिखाया 

जाना चाहिए 

पेड़ , जंगल 

और 

पहाड़ अनमोल हैं 

परंतु 

इनको चीरना , उखाड़ना 

और 

काटना चाहिए 

अधिक से अधिक 

संसाधन , विकास 

और 

सभ्यता के लिए 

आदिवासियों को 

बदलते हैं वे 

अपने फायदे के लिए । 


जंगली , वहशी 

कहकर विभूषित 

हमें करते 

क्योंकि हम 

आदिवासी हैं 

और 

हम पता नहीं क्यों 

बदलना नहीं चाहतें 

या उनके अनुचित 

माँगों के आगे 

झुकना नहीं चाहतें । 


परिचय

                               

     डॉ. जमुना बीनी

जन्म : 20 अक्टूबर 1984

शिक्षा : एम. ए. हिंदी ( स्वर्ण पदक ), पी. एच. डी. ( राजीव गाँधी विश्वविद्यालय, अरुणाचल प्रदेश ) ।

प्रकाशित रचनाएँ : दो रंगपुरुष-मोहन राकेश और गिरीश कर्नाड ( आलोचना ); जब आदिवासी गाता है ( कविता संग्रह ); उईमोक ( न्यीशी लोककथा संग्रह ) । 

कविताओं एवं कहानियों का संताली, असमिया, मलयालम, पंजाबी, राजस्थानी, अंग्रेजी , तुर्की आदि भाषाओं में अनूदित ।

 इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एम. ए. पाठ्यक्रम में कविताएँ शामिल ।

 वर्तमान में अरुणाचल प्रदेश स्थित राजीव गांधी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर कार्यरत ।

संपर्क : हिंदी विभाग, राजीव गाँधी विश्वविद्यालय, रोनो हिल्स, दोईमुख, अरुणाचल प्रदेश, पिन 791112

ईमेल : jamunabini@gmail.com







शनिवार, 8 जनवरी 2022

समकाल : कविता का स्त्री काल - 2

                           समकाल : कविता का स्त्रीकाल - 2

पूनम वासम

समकालीन कविता में जैसे - जैसे स्त्रियों का हस्तक्षेप बढ़ रहा है , कविता का कैनवास उसके इतिहास और भूगोल के साथ उभर कर सामाने आ रहा है। यह जुड़ाव मिट्टी -पानी की सोंधी गंध लिए इतना सहज और सरल है कि हम सीधे उस दुनिया में पहुँच जाते हैं जहाँ की बात कवि अपनी कविता में कर रहा होता है।

यह सुखद है कि आज औरतों की बातें किसी और की बयानी नहीं हैं, वह अपनी दुनिया की बात अपनी ही भाषा में कर रही हैं।यह अभिव्यक्ति उस शिशु की तोतली बानी की तरह निर्दोष है जो जोई सोई कछु गा रहा होता है।यह भाषा स्त्रियों द्वारा रचित लोकगीतों की भाषा है जिसे मैं स्त्रियों द्वारा रचित आदिकविता मानती हूँ।पूनम वासम आदिवासी लोक की कवयित्री हैं ,जल,जंगल,ज़मीन उनके हमजोली हैं।पूनम ने इस आदिवासी संसार को हमारे सामने इतनी सहजता और सुघड़ता से रखा है कि हम इस लोक से  वैसेही जुड़ते जाते हैं जैसे पूनम और उनका संसार जुड़ा है। मछलियाँ गाएँगी एक दिन पंडुलम गीत 
पूनम का वाणी प्रकाशन से प्रकाशित और चर्चित काव्य संग्रह है।आज गाथांतर  पर  समकाल : कविता का स्त्रीकाल कालम में प्रस्त्तु्त है पूनम की कविताएँ- 

( १)

नमक हमेशा नमकीन नहीं होता
----------------------------------------

नमक तुम्हारे लिए स्वादिष्ट खाना बनाने वाला 
पदार्थ मात्र है 
तुम्हारे रसोई घर में इसकी भरमार होती है
मेरी देह के पसीने की गंध में भी तुम्हें
नमक का खारापन लगता है 
मुझे चूमकर भी तुम बता सकते हो नमक का स्वाद

नमक तुम्हारे लिए उतना ही जरूरी होता है 
जितना दाल चावल

ठीक इसके विपरीत हमारे लिए नमक उतना ही ज़रूरी है
जितना जल, जंगल, जमीन

नमक हमारे लिए स्वाद बढ़ाने वाली चीज़ नहीं 
बल्कि एक बहाना है तुम तक पहुँच पाने का

हमारे यहाँ नमक की खेती नहीं होती वरन उगा लेते 
बोरा भर नमक धान की तरह

नमक की लत ने हमें भी व्यापार करना सीखा दिया 
झोला भर टोरा,  महुआ, अमचूर और चिरौंजी के बदले तुम्हारा एक सोली नमक 
स्वाद बदल कर रख देता है मुँह का

तुम्हें नमक की कीमत का अंदाजा नहीं
चूँकि तुम्हारी दुनिया में नमक ही नमक है
सस्ता और सुलभ पर
हमारी पहुँच से आज भी हजारों किलोमीटर दूर है नमक

कि सोली भर नमक कमाने के लिए हमारे कंधे उठाते हैं
कावड़ भर सपने
खोदते हैं पताल भर गोदी अंधेरी पगडंडियों को
पाटने के लिए

लगाते हैं मील का पत्थर अपनी आदिम सभ्यता
छुपाने के लिए 
ताकि खिसक सके दो- चार किलोमीटर और 
सूरज की सीध में

बावजूद
नमक का स्वाद हमेशा नमकीन नहीं होता 
कि नमक  का स्वाद कभी-कभी पाँव के छालों की टीस जितना कीमती और
कभी-कभी बंदूक की गोली से निकलने वाली
बारूद की गंध जैसा तीखा  
तो कभी-कभी आँखों की पुतलियों पर दम तोड़ चुके
कुछ सफेद ख़्वाब से भी फीका होता है

नमक की आजादी के लिए लड़ी गई थी एक लड़ाई 
सोचती हूँ  चुपके  से इनके कानों में  किसी  ऐसी ही
लड़ाई के प्रारम्भ का बिगुल फूँक दूँ क्या ?

ताकि जान सकें ये भी नमक का असली स्वाद ।


       (२)


【हिड़मे का बेटा】

हिड़मे का बेटा इतिहास पढ़कर लौटा है 
अभी-अभी स्कूल से    

सारे पन्ने पलटने के बाद भी उसे वह कहानी नहीं मिली 
जिसे उसके बाप ने ऐतिहासिक घटनाओं में
दर्ज करते हुए उसे सुनाई थी.

हिड़मे के बेटे को नहीं पता 
देश की आजादी-गुलामी वाले किस्से 
उसने कभी नहीं सुनी हड़प्पा संस्कृति की वैभव-गाथा 
जनरल डायर की गोलियों की धधक 
शहीद भगतसिंह की अमर कहानी 
महात्मा गांधी का सत्याग्रह व नमक का आंदोलन.

नहीं सुनाया कभी उसके बाप ने 
चन्द्र शेखर की बंदूक से निकली बागी गोलियों की दास्तां

हिड़मे का बेटा बचपन से सुनता आया है 
गुण्डाधुर, डेबरीधुर की वीरता  

 उसे वह कहानी याद है  
कैसे इंद्रावती नदी में गेयर ने मोटर गाड़ी का पेट्रोल डालकर आग लगा कर ललकारा था 
हिड़मे के बाप-दादाओं को

तीर से शिकार करने वाले योद्धाओं को 
बंदूक की नोंक पर जलती इन्द्रावती की आग दिखा कर बताया था 
अंग्रेजों के देवता 
आदिवासियों के देवताओं से ज्यादा ताकतवर है.
 
हिड़मे का बेटा सुनता आया है
'रुपया का दो पैली चावल होना ही चाहिए'
जैसी मांग को लेकर बस्तर की महिलाओं के द्वारा लड़ी गई अद्भुत मौन क्रांति के किस्से

भाले, फरसे, तीर-कमान लिए हजारों हाथ कारतूस की दिशा जाने बिना टूट पड़े उनकी ओर

जिन्होंने छुआ था 
उनके जंगल की मिट्टी में पकने वाली फसल को 
बस्तर का आदिवासी चीखता आ रहा है- 'एक पेड़ के बदले एक सिर होगा' का नारा
कहीं पहाड़ों से टकराकर पंडुम गीत की तरह कानों में बजती हैं उसकी ध्वनियां.

बस्तर में आजादी की लड़ाई से बहुत पहले ही शुरू हो चुकी थी स्वाभिमान की लड़ाई.

हिड़मे का बेटा 
हल की नोंक से टकराकर पैदा हुआ है उसी मिट्टी में
जहाँ हिड़मे के बाप-दादा की इच्छाओं का अंतिम संस्कार होना बाकी है.

हिड़मे का बेटा 
पहाड़ को जी भर देखता है और गुनगुनाता है - डोंगरी के गागतो चो अधिकार नी हाय.

स्कूल में इतिहास का पाठ पढ़ाने के बाद गुरुजी पूछते हैं कई सारे सवाल 
हिड़मे का बेटा मात्राओं की हिज्जा करके
पढ़ने लगा है वह सब कुछ
जिसे दर्ज किया गया है देश की ऐतिहासिक घटनाओं में एक दस्तावेज की तरह

हिड़मे का बेटा अभी
पढ रहा है हिज्जा कर कर के इतिहास की सारी किताबें!

                              


     (३)

महुआ का पेड़ जानता है ]]

महुआ का पेड़ जानता है
महुआ की उम्र कच्ची है

कच्ची उम्र में टपकते हुये महुये को रोकना संभव नहीं.

गुरुत्वाकर्षण बल नहीं बल्कि  
धरती का संगीत खींचता है उसे अपनी ओर!

बाँस की टोकनी से लिपटने का मोह 
महुये को छोटी उम्र में किसी जिम्मेदार मुखिया की तरह काम करने को उकसाता है.

महुये को प्रेम है पांडु की छोटी लेकी से 
उसकी खुली देह के लिए किसी कवच की तरह टप से टपकता है महुआ.

महुआ इसलिए भी टपकता है 
ताकि इस बार साप्ताहिक बाजार में आयती के लिए जुगाड़  कर सके लुगा का.
 
आयती  के दिहाड़ी वाले काम के बारे में 
महुआ को सब पता है.

बड़े छाप वाले फूल और गहरे रंग वाली सूती लुगा भी 
कहाँ रोक पाती है उन आँखों की रेटिना को 
आयती की देह का पारदर्शी चित्र उकेरने से.

शैतानी आँखे ताड़ जाती हैं 
गदराई देह पर अंकित गहरे रंग की छाप कहाँ और कैसे फीकी पड़ जाती है.

चिमनियों से टकराकर आने वाली दूषित हवा  
किसी फुलपैंट वाले के नथुनों से होकर घुल न जाये तालाब के पानी में.

महुआ का टपकना जरूरी हो जाता है उस वक्त 
कि महुआ की मादकता बचाएं रखती है जलपरियों को खतरनाक संक्रमित बीमारियों से.

महुआ टपकता है 
अपनी मिट्टी पर/अपनी बाड़ी में/अपने गाँव-घर के बीच.

थकी देह के लिए महुआ पंडुम 
इंद्र देव के दरबार में रचाई गई रासलीला की तरह है.

महुआ के फूल से खेत-खलियान अटे रहें  
मन्नत के साथ गायता देता है बलि सफेद मुर्गे की.

दोना भर मन्द पीते ही, पत्तल भर भात खाते ही 
पांडु की इंद्रिया लंकापल्ली जलप्रपात के कुंड में डुबकी लगा आती हैं.
फुसफुसा आती है चिंतावागू नदी के कान में 
अपनी मुक्ति का कोई संदेश गोदावरी के नाम!
        
काली शुष्क हड्डियों से चिपका हुआ.
उसका मांस सब कुछ भुला कर पंडुम गीत गुनगुनाने लगता है.

किसी मुटियारी का धरती से अचानक रूठकर
आसमान पर चमकने की जिद्द पूरी करने के लिए 
महुआ को टपकना ही पड़ता है.

महुआ का टपकना 
मिट्टी के भीतर संभावित बीज के पनपने का संकेत मात्र नहीं है.

कि महुआ का टपकना,
गाँव के सबसे बुजुर्ग हाथ की नसों में स्नेह की गर्माहट का बचा रहना भी है.


        (४)

         【सही अंत】

तुम्हारे शरीर से महुए की गंध आती है
तुम्हारा चेहरा किसी बर्फ़ीली नदी सा सफेद हुआ जाता है
टोरा बीज फोड़ते हुए कठोर हुए जाते हैं तुम्हारे हाथ

तुम लूगा घुटनों तक बाँधती हो
तुम्हारे पैरों के नीचे फूटने वाला कोयला
तुम्हारी देह की गर्मी से आग हुआ जाता है
तुम्हारी फटी हुई एड़ियाँ सोख लेती हैं 
धरती का कसैलापन

तुम्हारा मन पुड़गा के जले हुए पत्ते पर
झर कर बिखर जाता है यहीं कहीं खेत की मिट्टी में

विदा से पहले तुम भर लेती हो आँचल में
मौसमी फलों के बीज

जीवन का सही अंत सिर्फ तुम्हें पता है 
मरने के बाद तुम्हारी आत्मा सरई का पेड़ होना चाहती है 
ताकि किसी मोटियारी के गुदना में 
तुम देख सको संसार का सुख

                         



       (५)

【फुलगुना】

तुम्हारी फुलगुना का आकार
तय करता है 
तुम कितनी सुखी हो 
तुम्हारी
नाक पर दमकता फुलगुना
तुम्हारे भीतर का ताप मापने का 
पैमाना भर नहीं 
बल्कि
तुम्हारे अस्तित्व का वह स्तम्भ है
जिस पर खड़ी होकर तुम
देख  सकती हो  
धरती के
वंचित समुदाय को नेपथ्य में 
धकेलने का सच

नाक पर उठा हुआ यह फुलगुना
तुम्हारी साँसों में क्रांति गीत की ऊष्मा 
बनाये रखती है

तुम जानती हो फुलगुना का इतिहास 
श्रृंगार से कहीं ज्यादा यह 
तुम्हारे आत्मभिमान का प्रतीक है

     (६)


 【मैं  धरती से  क्षमा मांगना चाहती हूँ 】

मैं धरती को अपने दोनों हाथ उधार देती हूँ
बड़ी जोर से धक्का मारकर चाहे तो धरती खुद को धकेल सकती है सालों साल पीछे

जहाँ मेरे  पूर्वज दरवाज़े पर पानी का कसेला लिए इंतजार कर रहे हैं पाँव पखारने का 
जहाँ जंगल के प्रेम में बौराई  प्रेमिका
अपने जुड़े में पके फलों की महक लिए लौटती है
जहाँ हल की नोंक से धरती तोड़ती है अपनी अंगड़ाइयाँ

मैं  धरती से  क्षमा मांगना चाहती हूँ 
टूटे हुए घरों  की कसम खा कर
बोनसाई के पौधों से 
एक्वेरियम में साँस लेती मछलियों से 
पिंजरे में कैद मेरी मैना से
उन तमाम पेड़ों की छालों से जंगली फूलों से 
मधुमक्खी के छत्तों से 
पहाड़ों की घटती हुई उम्र से 

मैं धरती को अपने दोनों हाथ उधार देती  हूँ 
धरती चाहे तो उगा सकती है मेरी हथेलियों पर एक पेड़ 

पेड़  धरती के लिए काला टीका है जिसके होने से उतारी जा सकती है धरती की बुरी से बुरी नज़र


     (७)


【शहर की छत से】

एक उजड़े हुए शहर की छत से उड़ते हुए 
मैंने स्वीकार किया मेरा जंगली होना कितना हरा भरा रखता है मुझको

एक रेस्टोरेंट में खाने का ऑर्डर देते हुए
मेरी जीभ बेस्वाद हुई जा रही थी.

मैंने  चावल के साथ एक ही तरह की दाल खाई है 
सब्जियों के स्वाद में जरूर अंतर रहा 
कोचई ,खट्टा भाजी, पोपट बीजा, सुक्सी हमेशा से पसन्द है.
पुड़गा खाते हुए मैंने जाना मेरा देहाती होना मुझे स्वाद के आनंद से भर देता है

एक बड़े पुल से गुज़रते हुए मैंने पानी में एक रुपये का सिक्का उछाला.

पत्थर की पीठ से टकराकर लौटते हुए सिक्के ने  
मेरी प्राथर्नाओं को मछलियों तक पहुँचा आने में अपनी असमर्थता जताई.

मेरे गाँव में ऐसी नदी नहीं है 
जिस पर पुल बनने की कोई गुंजाइश हो.

एक पुराना कछुआ
गाँव के तालाब में अब भी दरबार लगा कर लेता है सबकी
अर्जियां.
मेरा पिछड़ा होना गायता की पूजा थाली को फूलों से भर देता है.

दुनिया की भीड़ से गुजरते हुए 
मैंने बस इतना जाना 
कि हम सिमटते जा रहें हैं फस्ट क्लास , सेकेण्ड क्लास की बोगियों में.

मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं हो रहा है 
कि मैं जंगली हूँ  

दुनिया बहुत आगे की चीज बनती जा रही है 
जिसे पकड़ पाना मेरे वश की बात नहीं.

                      



     (८)


【 प्रतीक】

सब भूलते हैं अपना धर्म
पेड़ नहीं भूलते 

उनके रोमछिद्र खुले होते हैं 
प्रार्थनारत ध्वनियों के लिए
इसलिए
दुनिया के तमाम पेड़ों को
ईश्वर का प्रतीक मान लिया
जाना चाहिए .
 

(९)


【तुम्हें चूमकर
--------------------
चूमकर तुम्हारे माथे को
एक दिन पृथ्वी को
चूमना चाहती हूँ 

ताकि तुम्हारे माथे की 
उर्वर भूमि का स्वाद
चख सकें धरती के  वो तमाम बच्चे 
जिनकी जीभ को नहीं पता
स्वाद और स्वाद में अंतर

तुम्हारे माथे से टपकता पसीना
हल की नुकीली चोंच और 
धरती की मुलायम मिट्टी के बीच 
किसी सुरक्षा कवच की तरह है  

तुम्हारे माथे को चूमना  
मेरे लिए धरती पर प्रेम पुष्पों की 
पहली फसल का लहलहाना है ।

       (१०)

सागौन

सागौन के वृक्ष बस्तर भूमि पर उग आए
दो मजबूत हाथ हैं
जिनकी हथेलियों पर 
लिखा भूमकाल का विद्रोह 
धीरे-धीरे दम तोड़ रहा है 

सागौन की चौड़ी पत्तियाँ समेटना चाहती हैं 
जल,जंगल,जमीन की दुनिया
अपनी रेशों में 
टहनियों में बांध कर लाल मिर्च 
बनाना चाहती हैं
डारामिरी सा कोई प्रतिक चिन्ह
चूस कर छोड़ दी गई हरियल  छाती के लिए

सागौन की मोटी जड़ें भीतर ही भीतर 
जमा कर रही हैं दर्द का मवाद 
गीली मिट्टी की नमी में 
आँसू छुपाती सुबक रही जड़ें
अब लिखना चाहती हैं
उपेक्षा का एक पूरा का पूरा इतिहास

सागौन के दोनों हाथ चाहते हैं एक बार फिर
शोषण के खिलाफ़ लामबंद होना
एक बार फिर चाहते हैं 
अपनी इस धरती पर 
गुण्डाधुर जैसा 
कोई नन्हा बीज बोना।



नाम  - पूनम  वासम
शिक्षा - एम. ए .(समाजशास्त्र एवं अर्थशास्त्र ) वर्तमान में बस्तर विश्वविद्यालय से शोध कार्य जारी है।
सम्प्रति - शासकीय शिक्षिका  बीजापुर
निवास - ब्लॉक कॉलोनी बीजापुर, जिला बीजापुर   बस्तर (छत्तीसगढ़) पिन 494444

साहित्यिक परिचय-  मूलतः आदिवासी विमर्श की कविताओं का  लेखन,विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित,युवा कवि संगम 2017 बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रतिभागी,लिटरेरिया कोलकाता 2017 के कार्यक्रम में शामिल,भारत भवन भोपाल में कविता पाठ, रज़ा फाउंडेशन के कार्यक्रम युवा 2018 में शामिल, बिटिया उत्सव ग्वालियर में कविता पाठ,साहित्य  अकादमी दिल्ली में कविता पाठ, साहित्य अकादमी भोपाल में कविता पाठ.



शुक्रवार, 7 जनवरी 2022

समकाल : कविता का स्त्रीकाल -1

       समकाल : कविता का स्त्रीकाल

(1)- उषा दशोरा


हिन्दी साहित्य का वर्तमान स्त्री रचनाधर्मिता की दृष्टि से सबसे उर्वर समय है । स्त्री कविता में लगभग तीन पीढ़ियाँ जहाँ सक्रिय हैं वहींं एक चौथी पीढ़ी के कदमों की मजबूत धमक सुनाई दे रही है। स्त्री कविता की प्रमुख प्रवृत्ति पर यदि बात करें तो सामने जो दृश्य उभर कर आता है सबसे पहले वह पितृसत्ता के विरुद्ध स्त्रियों की मुखरता है। स्त्रियों का सार्वाधिक शोषण पितासत्ता ने किया और उसे दोयम दर्जे की समाज के प्रत्येक क्षेत्र में नागरिकता दी इस लिए यह उसका पितृसत्ता के प्रतिरोध में नागरिक विद्रोह ही है कि वह निरन्तर अपनी कलम से उन बन्धनों से मुक्ति की घोषणा कर रही हैं जिनके बन्धन में कैद स्त्रियों की प्रतिभा रसोईं से लेकर सउरी तक में होम होती रही।

गाथांतर पर हम कोशिश कर रहें हैं एक स्त्री कविता की श्रृंखला प्रकाशित करने की,आज इस क्रम में राजस्थान की कवयित्री उषा दशोरा की कविताओं को प्रकाशित कर रहे हैं।उषा की कविताओं में स्त्री जीवन के संघर्ष और समाज के दोमुँहेपन की परतों को खोलने की बेचैनी साफ दिखाई देती है। पिछले साल आपका कविता संग्रह भाषा के सरनेम नहीं होते बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ और चर्चित रहा।



उषा दशोरा
जन्मदिनांक- 5 फरवरी
जन्मस्थान -  उदयपुर, राजस्थान
वर्तमान निवास - जयपुर
सम्प्रति- अध्यापन
काव्य संग्रह - भाषा के सरनेम नहीं होते
बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित
कविता लेखन के अतिरिक्त  थियेटर के लिए स्क्रीप्ट राईटिंग , स्क्रीन प्ले एवं निर्देशन में सक्रीय।
मेल drushadashora@gmail.com




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1.हस्तिनापुर की रिक्त हथेलियाँ
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कहाँ दर्ज हो अमानवीय पाठ्यपुस्तक के धर्मशास्त्री दाँत
कहाँ दर्ज हो  चालाकियों के दोगले धारावाहिक
कहाँ दर्ज हो धोखे की आँख में बैठे यकीन के इस्तीफे
कहाँ दर्ज हो  डिब्बाबंद इश्क के  उपभोक्तावादी डॉयलॉग

इस वक्त हम किसी दूसरे के नहीं स्वयं की आंख के पानी के हत्यारे हैं

ऐसे ही ध्वस्त नहीं हुए कबूतर के मकान
ऐसे ही  नहीं फूटे प्रार्थनाओं के भाग्य
ऐसे ही नहीं  हाँफा नदी का अस्थमा
ऐसे ही नहीं उजड़ा धरती का मेरूदंड़

इन धांधलियों में एक ग्राम ही सही
धावा हमारी ओर से भी बोला गया है

भूतकाल की बाँहों कैद हम हस्तिनापुर की रिक्त हथेलियां हैं।

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2. मेरी नस्ल की ढेर औरतें
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उपले थापती औरतें
जो पीतल की परात में आटा गूँधने के बाद
चूल्हे पर दाल उबालते
टूटी फूँकनी  के कपाल पर धप्प मारते
रोज धुँए से झगड़ा करती हैं

आकाश में फाइटर प्लेन
उड़ाती वे औरतें
जिनके जन्म पर कभी
लड्डु नहीं बँटे थे
जो दधिची की हड्डियाँ पहनकर
खुद ही  लोहा हो जाती हैं

वो औरतें जो खोपरे का तेल
रगड़कर बाल काढती है
लहसुन छीलते मेरीकॉम की बॉक्सिंग देखती हैं
बुरे वक्त के लिए कभी -कभी
सब्जीवाली से दो-पाँच सिक्के
बचाकर झट दाल के कनस्तर में
छिपा देती हैं

वे औरतें जो नहीं जानती
क्षेत्रफल का सूत्र,
प्रकाश संशलेषण का नियम
पर वो बच्चों के होमवर्क
की चिंता में डूब कर
पूरा गूगल का पेट छान लेती हैं

वे जींस वाली औरतें भी
जो हेयर स्पा के बाद
सनग्लास लगाकर टिक-टॉक चलती है
माँ -बहन की हजार किलो वाली गालियाँ
नुक्कड़,बस और सड़कों पर
रोज सुनती हैं

सुनो कलफ लगी साड़ियों वाली
वे ढेर सारी  औरतें
जॊ मार के निशान को
मिसमेच पेटिकोट के साथ बाँध लेती है
शाम को नीले पड़े
होठ के निशान को
लाल लिपिस्टक में छुपाती हैं
ब्यूटी फेक्ट्री में बने गहरे काले काजल से
आँसू की रात  दबाती हैं
फिर  सुबह ऑफिस में ज्यादा
मुस्काती हैं

पुरुषों को जन्म देने वाली
मेरी नस्ल की ये ढेर औरतें
खारिज़ करती हैं मंगल पांडे  तुम्हारी
अट्ठारह सौ सत्तावन की प्रथम आजाद क्रांति को
जायसी तुम्हारी पद्मावत के नख-शिख व्याख्या को
अपने सर्वस्वदान की हज़ारों किस्तों के आगे
जयप्रकाश नारायण के भूदान आन्दोलन को

मेरी नस्ल की ये ढेर और औरतें
खारिज़ करती हैं
शेर पर बैठी  खुद के देवी पोस्टर को
ये औरतें खारिज़ करती हैं
चंद्र बरदाई के पृथ्वीराज रासो और चौहानवंश के
पौरुष पराक्रम को
ये औरतें खारिज़ करती है विश्व की
तमाम शांति वार्ताओं की फूटी आंखों को ।

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                      चित्र - सोनी पाण्डेय




3.मुख्तारनामा


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मेरा झगड़ा रोशनी के लिए था
दुर्भाग्य!
दुनिया में आज तक रोशनी की पूरी स्क्रीप्ट दरवाजों ने लिखी
टूटी झिर्री के खिलाफ़ फतवे गाड़े
जो धूप की उधारी जूतों पर
आउट ऑफ द बॉक्स पर पहला संवाद बोल रही थी

नुक्कड़ नाटक के सारे किरदार झूठ हां में हां मिलाते गए
इनको माफीनामा दिया जा सकता है

पर जिन आँखों ने सच की ध्वजा की कसमें खाई-खिलाई
फिर आधीरात को मुख्तारनामा झूठ के घर ट्रांसफर किए
उनको  मिले मृत्युदंड

हम प्रवंचना की कमीज़ सिलने वाले धूर्त टेलर हैं
मनुष्यता के भूगोल पर ढेले मारने वालों में सबसे आगे
हम ही मुँह पलटने वाले
हम ही बेशर्मों की तरह चिल्लाने वाले
भाई! अब ये दुनिया भरोसे लायक नहीं रही

जबकि हमारी पीठ अब चींटी के बोझ से भी दुखती है


4. इंकलाब के जश्न
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सारे मुहासों में
एक भगतसिंह बैठा है
हमारे अपराधिक हाथ उसकी हत्या के इश्क में हैं

बिना नाम की स्त्री ने
बहुत सालों से  इंकलाब के जश्न नहीं गटके

आओ न्युजएंकर
हरे पेड़ों को फांसी रात तीन बजे होगी
तैयार रहें
हमें देशभक्ति के छ्दम के मुखड़े गाने है

गलत  की  मृत्यु होगी।

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                          चित्र- सोनी पाण्डेय

        




5.हाँ फिर लिखूँगी कविता
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हाँ मैं लिखूँगी मनुष्यता
जब हिरोशिमा और नागासाकी का दर्द
माइनस डिग्री के पंख लेगा
जब मार्टिन लूथर की त्वचा का होगा
माल्यार्पण सामाजिक गोष्ठियों में

हाँ मैं लिखूँगी प्रेम
जब  चमकी बुखार का इल्जाम
पॉलिटक्स के सोड़े पानी से बच पाएगा
जब सिरिया के बच्चों का आकाश
किताब -पेंसिल का जादुई बॉक्स होगा

हाँ मैं लिखूँगी फक्कड़ता
जब कबीर के इश्क में डूबकर
केसरिया हरा से छिन लूंगी *खास छात्रवृत्तियाँ
जब सुकरात का ज़हर एथेंस से भागकर
दुनिया के सस्ते बाजारों का अधिपति हो जाएगा

हाँ मैं  फिर लिखूँगी एक नई कविता
जब कवि के अड्डे पर सूर्य मुज़रा बजाने आएगा।

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