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गुरुवार, 14 सितंबर 2023

गोलेन्द्र पटेल की कविताएँ

युवा किसान कवि गोलेन्द्र पटेल की 8 कविताएँ :-

1).

जोंक
•••••••••••••••••

रोपनी जब करते हैं कर्षित किसान ;
तब रक्त चूसते हैं जोंक!
चूहे फसल नहीं चरते
फसल चरते हैं
साँड और नीलगाय.....
चूहे तो बस संग्रह करते हैं
गहरे गोदामीय बिल में!
टिड्डे पत्तियों के साथ
पुरुषार्थ को चाट जाते हैं
आपस में युद्ध कर
काले कौए मक्का बाजरा बांट खाते हैं!
प्यासी धूप
पसीना पीती है खेत में
जोंक की भाँति!
अंत में अक्सर ही
कर्ज के कच्चे खट्टे कायफल दिख जाते हैं
सिवान के हरे पेड़ पर लटके हुए!
इसे ही कभी कभी ढोता है एक किसान
सड़क से संसद तक की अपनी उड़ान में!

शनिवार, 24 दिसंबर 2022

कविताएँ

                                              रवि शंकर सिंह की कविताएँ





       (1)
किस्सा बच्चों का
------
तेज धार -सी
हड्डियों को छेदती
इन सर्द हवाओं से बचने के लिए
आओ घेर लो
इस अलाव को

बचपन की बहुत सारी कहानियाँ
जुड़ी हैं इस आग से
कहा था एक बार
एक किस्सागो में
हमारा ईश्वर कैद है
किसी अजाने मुल्क में
जिसे आज तक 
छुड़ा नहीं पाया किसी ने
उनकी शर्तों के मुताबिक

कितना फर्क है आज
जब हम समझते हैं झूठ -सच को
तब कोई किस्सागो
मनगढ़त कहानियाँ नहीं सुनाता
यह कहकर
साफ मना कर देता है
कि तुम एक देशद्रोही हो

छोड़ों बच्चों
बताओ 
क्या सुनाऊँ तुम्हें
उस जंगल की कहानी
जहाँ से विस्थापित हो गये जानवर
पेड़ काट दिये गये
जला दिये गये पत्ते
मोड़ दी गयीं
नदियों की राहें
पहाड़ का सीना चीरकर

कहना भी नहीं
सुनाने को उस राजा की कहानी
जिसने कर के रूप में
लाया था ऐसा कानून
खून देने की घोषणा की गयी थी
जनता को खून से
देश की लचर आर्थिक व्यवस्था को
मजबूत बनाने की
शपत ली गयी थी
उनसे माँगा गया था
प्रत्येक घर से थोड़ा -थोड़ा राष्ट्रवाद
और इंकार करने पर
दुश्मनों के लश्करों में 
जाने का दिया गया तथा आदेश

क्या देख रहे हो बच्चो
बिल्कुल आसमान साफ है
चाँद -सितारे छुपे हैं बादलों में
दादी की कहानियों के देवी -देवता
अब नहीं आते धरती पर
हर एक हत्या का 
गवाह होते हैं देवी-देवता
जो ऊपर से देखते हुए
नहीं उतरते जमीं पर
अदालत में गवाही देने
आखिर किससे डरते हैं
आखिर वह कौन है
जो खत्म कर देगा उनका अस्तित्व

क्या सुनाऊँ
उस जादूगर की कहानी
जो रहता है
एक बड़े से सोने के महल में
महल की सुरक्षा में
बड़े-बड़े आदमखोर हैवान खड़े हैं
खेल दिखता है दिन में
और रात में
गायब कर देता है उनके
गाँव -शहर को

मैं कोई कहानियाँ नहीं सुनाऊँगा
जिसमें राजा-रानी ,जादूगर और कोई जंगल हो
मिटा दो उन कहानियों को
खुद बनो कहानी का हिस्सा
और बन जाओ नायक
खुदमुख्तारी ही बचा सकती है
तुम्हारा बजूद !

(2)

उड़ान
-----
कोशिश करता हूँ समझने की
क्या है
मेरे अंदर जो हलचल पैदा कर रहा

उसके चले रास्ते पर
उगे पावों के निशान को
क्यों तलाश कर
रंग भरता हूँ उनमें
लाल,हरे ,गुलाबी
नापता हूँ अपने पैरों से
उनके रंग -बिरंगे पैरों के आकार

कक्षा में व्यख्यान देते हुए
भूल जाता हूँ विषय-वस्तु 
और ढूंढ़ने लगता हूँ
किताबों में रखी 
फूल की सूखी पंखुड़ियों में
उसकी देह की महक

किसी दिन
पंछी बनकर
उतर जाऊँगा धीरे -धीरे 
उसकी आत्मा के वृक्ष पर
वहीं मैं छोड़ दूँगा
 थोड़ा -सा पंख !
(3)
 शिकार
-----
सांसों को रोकना
कुछ देर जरूरी लगता है
इससे अंदाजा लग सकता है
कितनी देर
अगर नदी में डूबने लगे 
तो जिंदा रह सकते हैं

जटिल समय में
प्रयोग जारी रखना
समय के साथ चलना माना जाता है
इसके कई प्रमाण
विशेषज्ञों की फाइलों से
आजकल झाँक रहे हैं

जो कभी पानी मे उतरे नहीं
उनका विश्वास है
साथ मजबूरी भी
इससे तो कम-से -कम 
नदी में बहते हुए जीवों
के बारे में समझ लेंगे
हुनर सीख लेगे
पानी में हाथ-पैर चलाने की
पत्ते पर तैर रही चींटियों से
बतिया लेंगे कुछ पल
कि उसने कैसे बनाई है पत्ते की नाव

सीखने के दरमियाँ भूल गया
कि मैंने देखा था
नदी को पैरों से नापने वाले का 
अचानक एक पैर
मगरमच्छ का निवाला बनते

हमें बताया गया
ज्ञान फर्जी था
मुझे पता तब चला
जब नदी के तट से
इस वारदात को देखा

गरीबों की चमड़ियों से बनी नाव में
बैठा मलाह
ही कातिल था
ना जाने कितने लोगों को
डूबा दिया बीच में

नदी को पार करने के लिए
भाड़े की बोली लग रही थी वहाँ
उनके दिमाग में उपजा गलत सवाल
मेरे सामने सपना बनकर उभर रहा था
और मैं गलत सपने का शिकार बन बैठा !






(4)

लौट आओ
-----
लौट आओ
सम्हालों अपने साम्राज्य को
जब से तुम गये हो
वे तुमसे धीरे-धीरे रूठ रहे हैं
जिन्हें तुमने बसाया था अपनी हाथों

देखता हूँ
उस नन्हें से पौधे को
जब भी उसके करीब जाता हूँ
मुझे निहारता है टकटकी लगाकर
मेरे आँखों में ढूंढता है
तुम्हारे आने की खबर
मेरी पलके छुपा लेती हैं
सच्चाई जिसे मैं कह नहीं पाता
क्या जवाब दूँ
उस नन्हें से पौधे को

जिसका इंतजार करते थे तुम
देखते थे रोज उसकी राह
वह डाकिया आया था कल
लेकर तुम्हारे लिए चिट्टी
वह चिट्टी तुम्हारे बिछड़े हुए दोस्त की है
जिसका जिक्र रोज करते थे तुम
चाय की चुस्की लेते हुए
कागज के टुकड़े में लिखे शब्द
जवाब माँगते हैं तुमसे
बोलो क्या लिखूँ ?

आकर देखो
खाली लगता है घर का कोना -कोना
अब तो दीवारों पर
दीमक लगने लगी हैं
कमजोर कर रहीं दीवारें

हवा में उड़ रहे धुल के कण
जमीन के फर्श पर
धीरे-धीरे उतर रहे हैं
और उससे बनी डरावनी आकृति
मुझे डरा रही

कैसे रोकूँ
इस फूहड़ अहसास को
जो मेरे हृदय में
रफ्ता-रफ्ता टिसटीसा रहा हैं

इस कंपकपाती ठंड में
मुठ्टी में क़ैद किये 
सीने से लगाये
सबकी राहत के लिए
लौट आओ ,लौट आओ मेरे दोस्त
थोड़ी -सी गर्मी लेकर

(5)

भटकाव
------
आजकल रात भी
जी चुराती मुझे देखकर

आधी रात को 
जब मेरी नींद टूटी 
सूरज सो चुका होता

बलरेज पर आकर देखता हूँ
आसमान की ओर
कि कहीं दिख जायें चांद-तारे

लेकिन आसमान ने
बादलों को चादर बनाकर
ओढ़ लिया है

ऐसी रात को नाम देता हूँ
शांत रात
गली में
आवाज भी नहीं आ रही कुत्तों के भौंकने की
सड़कों पर गुजरने वाली गाड़ियाँ
अपनी मंजिल पर पहुँच गईं जल्दी

अरे !पगली कहाँ गई
जो गंदी मोटरियों के साथ
सोया करती थी सड़क के किनारे
क्या हो गया है मुझे 
जो इन सबों को ढूंढ रहा हूँ मैं

अब जुगनू की चमक फीकी पड़ने लगी
लौटना चाहिए मुझे
काँटों भरे बिस्तर पर
वहीं सुनूंगा
मुर्गों के बोलने की आवाज !



परिचय
------
रवि शंकर सिंह
जन्म-04/01/1992
शिक्षा -स्नातकोत्तर (समाजशास्त्र),यू.जी.सी.नेट,पी-एच.डी.
प्रकाशन- एक कविता संग्रह 'बाकी सवाल'
जनपथ,वागर्थ ,समहुत, छपते -छपते,अमरावती मंडल,अहा! जिन्दगी ,नवलेखन अंक वागर्थ ,परिकथा ,कथा,करुणावती, इरावती ,रेवांत और हिमतरु पत्रिका में कविताएँ प्रकाशित।विभिन्न पत्रिकाओं में रेखाचित्र,रिपोर्ट्स ,लेख और समीक्षाएँ प्रकाशित।

सम्प्रति -  साहित्यिक पत्रिका जनपथ के सम्पादकीय विभाग से सम्बद्ध।

सम्पर्क- द्वारा -नरेन्द्र कुमार सिंह
रुद्रापुरी, मझौआं बाँध         
 आरा-802301(बिहार)
मो.न.-09931495545
8709829351


शनिवार, 20 अगस्त 2022

चित्रा पंवार की कविताएँ




संवेदनशील मन अक्सर कुछ रचता है,वह चित्र हो या गीत,कविता हो या कहानी ,कभी भी ,कहीं भी किसी नई सृष्टि सा उग आता है मन के ताखे पर और रचनाकार अपनी समस्त ऊर्जा का तेल भर संभावनाओं की बाती डाल रचना का दीया जलाता है।कविता मनुष्य की रचनात्मकता का वह चरम बिन्दु है जहाँ वह मन की सारी दीवारें गिरा अपनी अनुभूतियों को व्यक्त करता है।

वर्तमान समय स्त्री कविता का सबसे समृद्ध समय है,आज एक साथ चार जीवित पीढियां रचनाशील हैं।अनामिका, सविता सिंह, कात्यायनी, निर्मला पुतुल से लेकर शैलजा पाठक ,बाबुषा कोहली आदि कवयित्रियों ने कविता की दुनिया को आलोकित कर यह भरोसा दिलाया है कि स्त्री की अभिव्यक्ति अब किसी आश्रय की मुहताज नहीं रही। 

चित्रा पंवार स्त्री कविता में प्रवेश कर रहा वह स्वर हैं जो उम्मीद जगाती है कि अभी बहुत कुछ लिखा जाना शेष है।




                                                                     

                                                                    चित्रा पंवार



परिचय

नाम – चित्रा पंवार
जन्मस्थान – मेरठ, उत्तर प्रदेश
संप्रति – शिक्षण
साहित्यिक यात्रा – वागर्थ, दैनिक जागरण, सोच विचार, प्रेरणा अंशु, गाथांतर, रचना उत्सव, अरण्यवाणी आदि अनेक पत्र पत्रिकाओं में आलेख, कविता, कहानी प्रकाशित तथा कई साझा काव्य संग्रहों में कविताएं प्रकाशित ।


 स्त्री पृथ्वी है

1.

आसान कहा
किसी सूरज के प्रेम में
पृथ्वी हो जाना
ना चुम्बन, ना आलिंगन
ना धड़कनों पर कान धर
सांसों का प्रेम गीत सुन पाना
बस दूर से निहारना
और घूमते रहना
निरंतर
उसी दुखो भरे
विरह पथ पर
मिलन की प्रतीक्षा लिए

2

यकीनन पृथ्वी स्त्री ही है
जो घूमती है उम्रभर
किसी के प्रेम में पड़कर
उसके घर, परिवार
बच्चों को संभालती
चकरघिन्नी बनी
बस उस एक के इर्दगिर्द
समेट लेती है अपनी दुनिया
अपना सारा वजूद

3

स्त्री अगर किसी से प्रेम करती है
तो कभी
उसका साथ नहीं छोड़ती
फिर भले ही उसे
लाख तपिश क्यों न सहनी पड़े
वह झुलस ही क्यों ना जाए
सूरज के प्रेम में पड़ी
पृथ्वी की तरह...

4

पृथ्वी गोल है
बिलकुल सपाट
बहुत कठोर!!
यह भ्रम है
कोरा भ्रम
कभी ध्यान से देखना उसकी गहरी आंखों में
मिल जाएंगी तुम्हें
उसके पलकों के नीचे जमी नमकीन झीलें
प्रेम से छूना उसकी सपाट काया
अनगिनत खरोंचों से भरी उसकी देह
तुम्हारा अंगुली के पोरों को
लहूलुहान कर देगी
धीरे से खोलना उसके मन की गिरहों को
बहुत रीती और पिघली हुई मिलेगी भीतर से
बिलकुल एक स्त्री की तरह

5

जब दोनों हाथों से
लूटी खसौटी जाओ
दबा दी जाओ
अनगिनत जिम्मेदारियों के तले
तुम्हारे किए को उपकार
नहीं अधिकार समझा जाने लगे
तब हे स्त्री
डौल जाया करो ना !
तुम भी
अपनी धुरी से
पृथ्वी की तरह ।।

6

कोरी कल्पना
और किस्से कहानी
से अधिक कुछ भी नहीं
ये सारी बातें
की पृथ्वी
टिकी है
गाय के सींग पर
शेषनाग के फन,
सूर्य की शक्ति
या फिर
लटकी है अंतरिक्ष के बीचों बीच
गुरुत्वाकर्षण के बल पर
सच तो यह है
की अपनी करुणा, प्रेम
सृजन और जुनून
के बल पर
स्त्रियां लादे
घूम रही हैं
पृथ्वी का बोझा
अपनी पीठ पर
युगों युगों से

8.

   स्त्री देखती है
  नींद में ख्वाब
  ख्वाब में घर के काम
  दूध वाले, सब्जी वाले का हिसाब
  बच्चों का होमवर्क
  खोजती हैं पति का रूमाल, मोजा, टाई
  दोहराती है सास ससुर के रूटीन हेल्थ चेकअप की डेट
  इसी बीच
  झांक आती है पल भर को
  मायके का आंगन
  निरंतर घूमती रहती है एक औरत
  अपने कर्तव्य पथ पर
  क्योंकि जानती हैं वो
  पृथ्वी के रुक जाने का अर्थ
  सम्पूर्ण सृष्टि का रुक जाना है।








दो औरतें

1.

दो औरतें जब निकलती हैं अकेले
निकाल फेंकती हैं अपने भीतर बसी दुनिया
उछाल देती हैं हवा में उम्र का गुब्बारा
जिम्मेदारियों में दबे कंधे उचकने लगते हैं
वैसे ही जैसे उछलता है बालमन
बेफिक्र अल्हड़ कदम नापना चाहते हैं
दहलीज से आगे बढ़ कर अपने हिस्से की जमीन
पंख लगाए उड़ती हैं खुले आसमान में
बंद पिंजड़ों से मुक्त चिड़ियों सी
हवा में हाथ पसार गहरी सांस भर
मुस्कुरा उठतीं हैं स्वप्न भरी आँखें
शीशी में वर्षों बंद पड़ी केवड़े सी हँसी
खुलते ही फ़ैल जाती है क्षितिज तक
चिल्लाते हुए बच्चे दौड़ पड़ते हैं उसी ओर
‘देखो इंद्रधनुष निकल आया’
घूरती नजरों से बेपरवाह
अपने आप में रमी
बस अपने साथ होतीं हैं
उस वक्त
दो औरतें..

2.

जब मिलती हैं दो औरतें
बस, रिक्शे, सब्जी मंडी, अस्पताल, हाट बाजार में
जी खोल करती हैं बातें
घुलने लगती है गहरी दबी वर्षों पुरानी गांठ
धधकता,उबलता लावा बाहर निकाल
मन को ठंडाती हैं वैसे ही
जैसे पानी के छींटों से शांत हो आता है
दूध का उफान
फल, सब्जी खरीदते अक्सर बता जाती हैं
अपनों की जीभ का स्वाद
बजाजे में ललचाती हुई इच्छाओं को दबा
खरीद लेती हैं साड़ी, कुर्ता– सलवार
सजा लेती हैं खुद का बदन
बाप, भाई, पति और बेटों के अनुसार
एक मुलाकात में ही जान जाती हैं वो
एक दूसरे के भीतर बसा उनका पूरा परिवार
और उसकी पसन्द ना पसन्द
जुदा होते समय
एक जैसी हो कर लौटती हैं
वो बिना नाम वाली
दो औरतें….

3.

ईर्ष्या नहीं करती
एक– दूसरे से
दो औरतें
वह तो बस मोहरें होती हैं
बिछाई गई बिसात की
जिसे बिछाता है खेलने वाला
अपनी चिरविजयी मानसिकता के साथ
शतरंज के खिलाड़ी की कुटिल शह पर नाचती हुई
बादशाह के बचाव में तैनात सेना सी
बस अनजाने में
एक दूसरे के सामने आ खड़ी होती हैं
दो औरतें…

4.

बातचीत के शुरुआती दौर में वह होती हैं
माँ– बेटी, हम उम्र बहनें
सखी– सहेली, ननद–भौजाई
सास– बहू, देवरानी– जेठानी
दादी– पोती, बुआ– भतीजी
गुरु–शिष्या
या रिश्तों में बंधा कोई और नाम
मगर धीरे– धीरे
हृदय की खुलती हुई गिरहों के
झरते भावों में डूबी हुई
अंततः बचती हैं शेष
दो औरतें…

5.

तुम कुछ भी न थे
सही सुना
कुछ भी न थे तुम
नंगी आँखों से कोई देख भी न सकता था तुम्हें
मगर महसूस कर सकती थी वह, तुम्हारा होना
जब दुनिया झुठलाती तब वह जोर देकर कहती
की तुम हो!
गर्भ में पालती रही ममता नौ माह तक
एक स्त्री के यकीन का मूर्त रूप हो तुम
इसके सिवा और कुछ भी नहीं
यह फौलादी शरीर, रौबदार आवाज , रुपया, पैसा,नाम
कुछ भी न था तुम्हारे पास
बिलांद भर की बेजान देह और सुबकती आवाज
दया के पात्र, लजलजाती हड्डियों का ढांचा मात्र थे तुम
माँ के लहू, अस्थि रस,दुलार और श्रम
का परिणाम है यह तुम्हारा अस्तित्व
तुम्हारे वामांग में बैठी हुई ये स्त्री
अग्नि की परिक्रमा से पूर्व
भला कितना जानती थी तुम्हें?
मगर भलीभांति जानती थी वह
तुम्हारे ख़्वाब और खुशियां
सजाना जानती थी
तुम्हारा घर, मन, बिस्तर और परिवार
बन जाना चाहती थी वह
तुम्हारी लक्ष्मी, रति, अन्नपूर्णा और सावित्री
होने को तो क्या नहीं हो सकती थी वह
मगर उसने स्वीकारा बस तुम्हारी होना
यूँ तो इतिहास भी रच सकती थी वह
किन्तु उसने तुम्हारी संतान को रचा
जीवन साथी से न जाने कब बन गई जीवन सारथी

हे पुरुष!
तुम्हारे इस कंगूरों, बेल–बूटों, ऊंची मीनारों, शिखर कलश से
सुसज्जित जीवन भवन की शिल्पी हैं ये
दो औरतें….

6.

दूर तक फैला दुःख का अथाह सागर
एक दूसरे की छोटी–बड़ी खुशियाँ
बेरंग जीवन के स्याह– सफेद धब्बे
मन की व्यथा
तन की पीड़ा
रसोई के पकवान
निंदा रस का स्वाद
अपनों के ख्वाब
मन्नत और उपवास
जेवर, साड़ी, श्रृंगार
पति, बेटों का प्यार
आँखों से बहता पीहर
कम खर्च में घर चलाने का हुनर
कल्पनाओं का सुखद संसार
घर परिवार में अपना स्थान
होंठों की मुस्कान
सब कुछ साँझा कर लेती हैं
जब मिल बैठती हैं
दो औरतें….

बुधवार, 16 मार्च 2022

समकाल : कविता का स्त्रीकाल - 32


असीमा भट्ट की कविताएँ



दीदारगंज की यक्षिणी 

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 1. 

दीदारगंज की यक्षिणी की तरह तुम्हारा वक्ष

उन्नत और सुन्दर 

मेरे लिये वह स्थान जहांं सर रख कर सुस्ताने भर से 

मिलती है जीवन संग्राम के लिए नयी ऊर्जा 

हर समस्या का समाधान ....

तुम्हारे वक्ष पर जब-जब सर रख कर सोया 

ऐसा महसूस हुआ लेटा हो मासूम बच्चा जैसे मां की गोद में 

तुम ऐसे ही तान देती हो अपने श्वेत आंचल सी  पतवार

जैसे कि मुझे बचा लोगी जीवन के हर समुन्द्री  तूफ़ान से...

तुम्हारे आंचल की पतवार के सहारे फिर से झेल लूंगा हर ज्वारभाटा 

अनगिन रातें जब जब थका हूं...

हारा हूं ...

पराजित और असहाय महसूस किया है .....

तुम्हारे ही वक्ष से लगकर   

रोना चाहा 

 ज़ार-ज़ार 

हालांकि तुमने रोने नहीं दिया कभी  

पता नहीं 

हर बार कैसे भांप लेती हो 

मेरी चिंता 

और सोख लेती हो मेरे आंसू का एक एक बूंद 

अपने होठों से  

तुम्हारे वक्ष से ऐसे खेलता हूं, जैसे खेलता है बच्चा  

अपने सबसे प्यारे खिलौने से ....

 तुम्हारा उन्नत वक्ष 

उत्थान और विजय का ऐसा समागम जैसे 

फहरा रहा हो विजय ध्वज कोई पर्वतारोही हिमालय की सबसे ऊंची चोटी पर  


जब भी  लौटा हूं उदास या फिर कुछ खोकर 

तुमने वक्ष से लगाकर कहा   

कोई बात नहीं, "आओ मेरे बच्चे! मैं हूं ना'

एक पल में तुम कैसे बन जाती हो प्रेमिका से मां

कभी कभी तो बहन सरीखी भी 

एक साथ की पली बढ़ी 

हमजोली ... सहेली ....

'Ohh My love ! you are the most lovable lady on this earth" 

सचमुच तुम्हारा नाम महान प्रेमिकायों की सूचि में 

सबसे पहले लिखा जाना चाहिए 

ख़ुद को तुम्हारे पास कितना छोटा पाता हूं, जब जब तुम्हारे पास आता हूं

कहां दे पाता हूं, बदले में तुम्हे कुछ भी 

कितना कितना कुछ पाया है तुमसे 

कि अब तो तुमसे जन्म लेना चाहता हूँ 

तुममें, तुमसे सृष्टि की समस्त यात्रा करके निकलूं 

तभी तुम्हारा कर्ज़ चुका सकता हूं 

मेरी प्रेमिका ...."


2.


आईने में कबसे ख़ुद को निहारती 

शून्य में खड़ी हूं 

दीदारगंज की यक्षिणी सी मूर्तिवत 

तुम्हारे शब्द गूंज रहे हैं, मेरे कानों में प्रेमसंगीत की तरह   

कहां गए वो सारे शब्द ?

मेरे एक फ़ोन ने कि -

डॉक्टर कहता है - मुझे वक्ष कैंसर है, हो सकता है, वक्ष काटना पड़े. 

तुम्हारी तरफ़ से कोई आवाज़ न सुनकर लगा जैसे फ़ोन के तार कट गए हों  

स्तब्ध खड़ी हूं

कि आज तुम मुझे अपने वक्ष से लगाकर कहोगे 

-"कुछ नहीं होगा तुम्हें! "

चीख़ती हुई सी पूछती हूं

तुम सुन रहे हो ना ?

तुम हो ना वहां ?

क्या मेरी आवाज़ पहुंच रही है तुम तक ....

हां, ना कुछ तो बोलो!"


लम्बी चुप्पी के बाद बोले

-"हां, ठीक है, ठीक है 

तुम इलाज़ कराओ

समय मिला तो, आऊंगा...." 

3.  


समय मिला तो  ? ? ?

समझ गई थी सब कुछ 

अब कुछ भी जो नहीं बचा था मेरे पास 

तुम अब कैसे कह सकोगे 

 सौन्दर्य की देवी ....

प्रेम की देवी.....


सबकुछ तभी तक था

जब तक मैं सुन्दर थी 

मेरे  वक्ष थे  

एक पल में लगा जैसे 

खुदाई में मेरा विध्वंस हो गया है  

खंड-खंड होकर बिखर चुकी हूं, "दीदारगंज की यक्षिणी' की तरह  

क्षत-विक्षत खड़ी हूँ, 

अंग-भंग ...

खंडित प्रतिमा ...

जिसकी पूजा नहीं होती 


सौन्दर्य की देवी अब अपना वजूद खो चुकी है....


4. 


लेकिन मैं अपना वजूद कभी नहीं खो सकती 

मैं सिर्फ़ प्रेमिका नहीं! 


सृष्टि हूं 

आदि शक्ति हूं


और जब तक शिव भी शक्ति में समाहित नहीं होते 

शिव नहीं होते ....

मैं वैसे ही सदा सदा  रहूंगी 

सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति बनकर खड़ी,  

शिव, सत्य और सुन्दर की तरह .... 


(*दीदारगंज की यक्षिणी को सौन्दर्य की देवी कहा जाता हैं)







-------------



किसी से उधार मांग कर लायी थी ज़िन्दगी

वो भी किसी के पास

गिरवी रख दी....


असीमा भट्ट


------------------



बहुत ख़ाली ख़ाली है मन


माथे पर एक बिंदी सजा लूं ...



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 स्त्री 


1.

रक्त सा लाल पैरों के निशान छोड़ती

वह प्रवेश करती है घर में 

जैसे इतिहास के पत्थर पर 

उकेर रही हो दुर्लभ आकृति 


2.

कहा नहीं किसी ने सीखो प्यार करना 

फिर भी स्त्री सीख ही जाती है प्रेम करना 

जैसे आम का पेड़ सीख जाता है बड़ा होना और मंजर देना 


3.

उसके पास होते हैं अनोखे जादुई पिटारे 

जिसमें भर कर रखती है 

सपने और उम्मीदें 

अगहन में कटे धान की तरह 

उसके पास रहती है 

अथाह आस्था 

जिससे रचती है 

विस्मय भरी दुनिया 

अपने घर के भीतर 

जिसे मानती है 

वह अपना संसार 


4.


मांगती कभी कुछ नहीं 

चाहती है मुठ्ठी भर 

प्यार

थोड़ी गुनगुनी धूप की तरह नर्म 

थोड़ा गर्म 

आग की तरह 

जिससे सेंक सके जीवन और रिश्ते  

आग को दुनिया में उसी ने उपजाया होगा 

जब पहली बार जलाया होगा किसी स्त्री ने अपना चूल्हा 


5.

एक दिन वह चली जायेगी कहीं 

नहीं रहेगी वह घर के किसी हिस्से में 

बस बची रहेगी उसकी स्मृति 

उसके पंजों की छाप दिवारों पर 

भित्ति चित्रों के समान 

प्राचीन सभ्यता की आदिम कला की तरह



                                                       असीमा भट्ट


समकाल :, कविता का स्त्रीकाल -33



पँखुरी सिन्हा की कविताएँ


खड़े होने की बराबर जगह
 
वह खड़ा हुआ तो मुझे लगा 
उसका कद कितना ऊँचा था 
मुझसे तो ऊँचा था ही 
काफी ऊँचा था 
वह पुरुष था 
और मेरी औरतना दृष्टि 
पुरुषों को बक्श कर 
अतिरिक्त ऊँचाई 
तृप्त होती तो थी 
पर तभी
जब व्यवहार पुरुषोचित हो 
अगर वो बक्शें 
औरत को भी कुछ ज़्यादा कद 
कंधे से कन्धा मिलाकर 
खड़े होने की बराबर जगह..................
 
 
 
 
विद्या पीठ

न बताना भी एक अदा है 
न कहने की तरह 
यानी मना करना 
पर एकदम साफ़ मना करना नहीं 
कर पाना नहीं 
सवाल भी साफ़ नहीं 
जवाब की भरसक गुंजाइश नहीं 
कुछ भी दो टूक सच नहीं 
पांच टूक पोशाक नहीं 
जूता, छाता, टोपी, गमछा 
जनेऊ, लोटा 
संस्कारों की मर्दानी ठसक गयी
विद्यापीठों में स्त्री मुक्ति 
अब भी एक लड़ाई है 
पर न बताना 
वहां भी उम्र 
फॉर्म से बाहर
स्त्रियों के साथ भी
बिल्कुल स्त्री अस्मिता का पहला कदम
मन की बातें 
कुछ मन में रख लेना भी एक अदा है 
और जैसे उम्र भी हो 
मन ही की बात
फॉर्म की लिखाई से बाहर
इसलिए वह इतालवी लड़की 
पूछती रह गयी 
पर मैंने केवल अपनी 
वह उम्र बताई 
जब ब्याही गयी थी 
वह भी दो साल घटा कर 
उनसे ताल मिलाने को 
जिनकी मैं जानती थी 
दो से ज़्यादा साल 
घटाई होती थी उम्र..................


मुद्रा 

उल्टे लटके होते हैं चमगादड़ घंटो 
यही होती है उनकी निद्रा की मुद्रा 
और दिखाई नहीं देती 
गुफाओं के अँधेरे में 
लेकिन इस कारण नहीं खुदवाये 
राजाओं ने गुफाओं में 
तंत्र सिद्धि के चित्र 
न मंत्र लिखे गए
सूर्य प्रकाश के स्वागत में 
वो समूचा चँदोवा 
जिसे आज भी हम 
सभ्यता कह 
सिंहासन पर बिठाते हैं 
हाथी की पीठ पर 
आहिस्ता चलता 
दर्शन का 
एक के बाद दूसरा 
सिद्धांत नहीं 
जिस की ज़मीन 
दरअसल फतह कर रहे थे 
घोड़े पर आये 
मुसलमान योद्धा..............


जल में स्थिर है मछली

घंटों बे टेक स्थिर होती है 
मछली जल में 
बुलबुले छोड़ती 
तलाशती नहीं थककर 
पानी की ज़मीन पर पाँव
एकदम कल खिलेगी 
कह देती है
फूल की कली 
पर असह्य लगता है इंतज़ार 
और सबकुछ 
जब वो कहता है 
झूठा है 
मेरा आलिंगन 
मुझे दरअसल प्यार नहीं उससे 
वह आश्वासन है 
सारी आरामदेह बातों का 
और प्रबंधकर्ता भी...............

(रेडियो पर प्रसारित, आकाशवाणी दिल्ली, इंद्रप्रस्थ चैनल, २०१४)


हज़ार सूर्योदय वाली आवाज़
हज़ार सूर्योदय थे उसकी आवाज़ में 
आसमान के सब तारों की चमक 
दुनिया के सब चन्द्रमाओं की ठंढक थी उसमें 
दिक्कत ये थी कि इतनी कम करता था बातें वो मुझसे 
उन सब लोगों की बनिस्पत 
जिनसे प्यार नहीं करता था 
या कि कहता था कि प्यार नहीं करता था 
करता था केवल मुझसे प्यार 
या कि कहता था 
समुद्र लरजता था उसकी इस बात में
या साथ साथ कई समुद्र लरजते थे 
जैसे एक साथ 
उसकी मेरी आँखों में 
ये जलकुम्भी से भरे तालाब कैसे बन गए 
उसके मेरे समुद्र 
कहाँ गयीं वो नदियाँ 
जो ताज़ा कर जाती थीं हमें 
लिए जीवन का सहज प्रवाह 
सतत प्रवाह?
कहाँ गयीं नदिओं सी हमारी भी बातें?
जबकि उसकी बातों में थे हज़ार सूर्योदय.......

                             पंखुरी सिन्हा





 
 
 
 
 
 
 
 
 

समकाल : कविता का स्त्रीकाल -34





आरती की कविताएँ


[


(1)

में फिर से भेड़ बकरी बनाओ


नहीं सीखना हमें दो और दो का जोड़ घटाना
नहीं पढ़ना विज्ञान भूगोल की पोथियां 
इतिहास की मक्कारियां समझकर क्या कर लेंगे 
और राजनीति तुम्हारी तुम्हें ही मुबारक

हम वहीं धान कूटेगे 
चक्की पीसेगे 
 घूंघट काढकर मुंह अंधेरे दिशा फराक हो आएंगे
और पीटे जाने पर बुक्का फाड़कर रो लेंगे


हम हाथ जोड़कर सत्यनारायण की कथा सुनेंगे 

और लीला कलावती लीलावती की तरह परदेस कमाने 

या ऐश करने गए सेठ का 

जीवन भर इंतजार करेंगे


हम एनीमिक होंगे तब भी करेंगे निर्जला उपवास 

करवा चौथ तीजा की कथा सुनकर हर साल डरेंगे 

अपनी थाली की दाल सब्जी पति पुत्रों को मनुहार कर कर खिलाएंगे 

मरते दम तक पैदा करेंगे मनु के साम्राज्य को बढ़ाने वाली जमातो को 

और अगले जन्म फिर से वही घर वर पाने की कामना करेंगे


इहलोक उहलोक के हिसाब से सब मैनेज कर लेंगे 

किटी पार्टी वीसी फेसबुक व्हाट्सएप संभाल लेंगे 


हम अपने मन के भीतर खुलने वाला दरवाजा

बंद कर उस पर ताला जड़ देंगे 

कोई दस्तक नहीं सुनेंगे 

कान बंद कर लेंगे 

होंठ सिल लेंगे 


आओ तालीबुडिया बॉलीवुडिया भोजपुरिया फिल्में आओ 

एकता कपूर की मामी मौसियो भाभियों सासों ननदो आओ 

पुराने को नए तहजीब में रंगकर लाओ 

हमें एक बार फिर से भेड़  बनाओ।
[03/03, 10:50] सोनी पाण्डेय: मैसेंजर मां और बेटा
--------------

मैं लिखना चाहती थी
कि तुम्हारी याद आती है 
और लिखा- क्या कर रहे हो अभी जाग गए?
या सो रहे हो?
अच्छा... जाग गए
कॉफी बना पी लो ताकि नींद अच्छी तरह खुल जाए

आज मैं तुम्हें बहुत मिस कर रही हूं ..लिखना चाहती थी
और लिखा
वही रोज रूटीन का
जैसे हर माह भेजी जाने वाली  राशि 
चेतावनी और डांट फटकार

आज फिर सुबह से ही हिम्मत की और
लिखना चाहा-
जल्दी आ जाओ...  
और 
लिख दिया
यहां बारिश शुरू हो गई है 
वहां का मौसम कैसा है?


हमें फिर से भेड़ बकरी बनाओ
-----------------

नहीं सीखना हमें दो और दो का जोड़ घटाना
नहीं पढ़ना विज्ञान भूगोल की पोथियां 
इतिहास की मक्कारियां समझकर क्या कर लेंगे 
और राजनीति तुम्हारी तुम्हें ही मुबारक

हम वहीं धान कूटेगे 
चक्की पीसेगे 
घूंघट काढकर मुंह अंधेरे दिशा फराक हो आएंगे
और पीटे जाने पर बुक्का फाड़कर रो लेंगे

हम हाथ जोड़कर सत्यनारायण की कथा सुनेंगे 
और लीला कलावती लीलावती की तरह परदेस कमाने 
या ऐश करने गए सेठ का 
जीवन भर इंतजार करेंगे

हम एनीमिक होंगे तब भी करेंगे निर्जला उपवास 
करवा चौथ तीजा की कथा सुनकर हर साल डरेंगे 
अपनी थाली की दाल सब्जी पति पुत्रों को मनुहार कर कर खिलाएंगे 
मरते दम तक पैदा करेंगे मनु के साम्राज्य को बढ़ाने वाली जमातो को 
और अगले जन्म फिर से वही घर वर पाने की कामना करेंगे

इहलोक उहलोक के हिसाब से सब मैनेज कर लेंगे 
किटी पार्टी वीसी फेसबुक व्हाट्सएप संभाल लेंगे 

हम अपने मन के भीतर खुलने वाला दरवाजा
बंद कर उस पर ताला जड़ देंगे 
कोई दस्तक नहीं सुनेंगे 
कान बंद कर लेंगे 
होंठ सिल लेंगे 


आओ तालीबुडिया बॉलीवुडिया भोजपुरिया फिल्में आओ 
एकता कपूर की मामी मौसियो भाभियों सासों ननदो आओ 
पुराने को नए तहजीब में रंगकर लाओ 
हमें एक बार फिर से भेड़  बनाओ।
[03/03, 10:50] सोनी पाण्डेय: एक देह को खाक में बदलता देख कर लौटी हूं
-----------

पहली बार, एक जलती चिता को देखकर लौट रही हूं वह एक औरत की चिता थी 
उसकी देह को खाक में बदलता देखकर लौट रही हूं 

शून्य से अनंत भार में बदल चुके पैरों को घसीटती 
घर की सीढ़ियां चढ़े जा रही 
आंखों की पुतलियां एक बड़ी स्क्रीन में तब्दील होकर दृश्य को रंग, गंध,ध्वनि के साथ बार-बार दोहराए जा रही 

सुनहरे बॉर्डर की हरे साउथ कॉटन साड़ी में लिपटी देह लकड़ियों के बीच दबा दी गई 
जब पहली लौ ने उठकर अंगड़ाई ली 
मैं चीख मारकर रोना चाहती थी लेकिन कसकर दबा दिया अपनी रुलाई का गला 
कि अभी सब चिल्ला उठेंगे - इसलिए औरतों को मनाही है 

हां औरतों को मनाही होती है बहुत सी चीजों की 
और यदा-कदा मिली हुई आजादियों को जीने का शऊर भी नहीं होता उनके पास 
जैसे उनके पास समय हो तो भी वे अपने मन का कुछ भी नहीं करना चाहती 
उन्हें हर दिन ऑफिस से जल्दी पहुंचना होता है घर छुट्टी का दिन तो और भी व्यस्त होता है
एक दिन वे थोड़ा सा समय निकालकर दिल में दबा हुआ नासूर कहने अजीज दोस्त के पास जाती हैं और चाय के घूंट घूंट के साथ होंठों के कोर तक आया हुआ अनकहा फिर से पी जाती है

वह औरत जब तक जिंदा रही फुर्सत के कुछ घंटे कभी नहीं निकले उसके बटुए से 
कि उसके और मेरे पास व्यस्तता के हजार बहाने थे
हम कहते रहे कि हम जल्द मिलेंगे... जल्द मिलेंगे 
और एक दिन सुबह एक मैसेज आता है.... तब मुझे कोई काम याद नहीं आता 
मैं सीधे दौड़कर उस जगह पहुंच चुकी होती हूं 
जहां वह औरत नहीं होती बाकी सब कुछ होता है 
घर होता है, लोग होते हैं और होती है उसकी देह

यह कैसी विडंबना है
वह औरत मेरी इतनी घनिष्ठ तो ना थी कि महीनों बाद भी मेरी रात उसकी स्मृतियों का घरौंदा बन जाए

हां मैं हर रात उस औरत की देह में कायांतरित हो जाती हूं 
मेरी छाती, मेरी जंघायें, मेरी पिंडलियां, तलवे लकड़ियों के ढेर के नीचे दबे जा रहे 
वह देखो! कोई मेरी ओर जलती लुकाठी फेंकने ही वाला है।



स्त्रियां किस देश के नागरिक हैं
---------------------

वे जिन्हें एक घर से दूसरे घर की ओर हांक दिया गया था 
वे जिनके नाम किसी घर के बाहर वाली नेमप्लेट में दर्ज नहीं है 
वे जिनके मालिकाना हक में नहीं आते खेत मकान बाग चौगान 
वे जो अपने गहनों कपड़ों के गुम हो जाने पर अपराधी की तरह 
घर की अदालत में खड़ी कर दी जाती हैं 
वे स्त्रियां किस देश के नागरिक हैं? 

वे जिनके घर किसी अंधड़ ने नहीं उजाड़ी
किसी नदी ने नहीं डुबोया उनका गांव 
ऐसा होता तो दर्ज होते उनके नाम किसी ना किसी सरकारी रजिस्टर में 
वे सब बिना घर गांव वाली स्त्रियां बताओ किस देश के नागरिक हैं ?

वे जिन्हें अपने जन्मदिन का "ज" भी नहीं पता 
वे जब जन्मी तो नहीं बने पकवान 
सोहर नहीं गए, ना ही सामूहिक नाच हुए 
उन्होंने एक दिन जिद की और पूछा कि वह कब पैदा हुई थी 
तो वही जवाब मिला कि शाम के बाद जब रात गहरा रही थी 
और उन उल्लूओ ने बोलना शुरू किया था 
लड़कियां तभी पैदा होती हैं 
बताओ तो भला यह स्त्रियां किस देश के नागरिक हैं? 

जैसे वे नरकासुर के घर रही वैसे ही कृष्ण तुम्हारे घर भी रही 
जैसे चंद्रगुप्त के वैसे अशोक के 
जैसे बाबर के वैसे अकबर के 
किसी झोपड़ी किसी महल किसी मंदिर 
किसी मस्जिद के बाहर नहीं खुदे उनके नाम के अक्षर 
बेटों के नाम के साथ भी दर्ज नहीं हुए माओं के नाम  स्कूल के रजिस्टर में बताओ आदि से लेकर आधुनिक तक यह सभी स्त्रियां 
किस देश के नागरिक हैं ?

यह स्त्रियां पेड़ हैं खेत हैं खजाने हैं जहां कब्ज़ा किया गया 
यह सत्ता और सिंहासन हैं जिनके लिए युद्ध लड़े गए 
समय ने करवट बदली और दुनिया राजसत्ता की कैद से मुक्त हो 
लोकसत्ता के नियमों से चलने लगी और 
यह अभी भी खाना बनाने वाली, झाड़ू पोछा लगाने वाली 
और बिस्तर पर खुद बिक जाने वाली हैं

वह जो दो चार या पचास या सैकड़ा भर नहीं 
हजार लाख और कई करोड़ हैं 
कई सौ करोड़ हैं 
वह पूरी दुनिया पर एक बटे दो फैली हुई हैं
फिर भी उनके पास किसी देश की नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं है 

बताओ आज इस बीसवीं 21वीं सदी में खड़े होकर 
यह सभी स्त्रियां किस देश के नागरिक हैं?

रामराज की तैयारी का पूर्व रंग 
------- -------------------

प्रश्न पूछने वालों को बेंच के ऊपर हाथ उठाकर खड़ा कर दिया जाएगा 
मुंडी हिलाने वालों को मुर्गा बनाया जाएगा और
बात-बात पर तर्क करने वालों को क्लास से बाहर धकेल दिया जाएगा

प्रहसन की तैयारी से पहले मास्टर जी ने 
यह बात तीन बार बताई 
रामराज आने वाला है और यह सब 
उसी की तैयारी का पूर्वरंग है 

अभी राम को अयोध्या के राजा ने अर्थात उनके पिता ने वनवास दिया है और स्वामी की आज्ञा के आगे कोई भी न्याय वगैरे की बात नहीं करेगा 
राम ने भी नहीं की थी ना ही किसी देशवासी ने 
राजा प्रजा का स्वामी होता है 
यह बात भी मास्टर जी ने तीन बार  बताई

दूसरे हिस्से में युद्धाभ्यास चल रहा है 
अस्त्र शस्त्रों के नाम से लेकर तकनीकी की भी जानकारी दी जा रही है 
और यह भी कि राम के साथ धनुष बाण हमेशा होना जरूरी है 
जैसा की फोटो में होता है 

अब राम राजा नहीं है फिर भी सेना बनाने में जुटे हैं 
राम राज्य लाने की प्रक्रिया में में युद्ध बहुत जरूरी है 
इसीलिए जंगल में राम ने पहले भीलो किरातों से 
फिर वानर भालूओ से दोस्ती बनाई 
सुग्रीम की जरूरत पहचान कर उसे राजा बनाने में मदद की 
और इस तरह दोस्ती के भीतर दाससत्व के नए रिश्ते का इजाद किया 
रामराज लाने से संबंधित तमाम प्रोपेगंडा संभालने का काम 
हनुमान के मत्थे सौंपा गया 

हां एक बात याद आई युद्ध में औरतों का क्या काम 
इसलिए सारी लड़कियां क्लास से बाहर चली जाए और 
वीरों की आरती उतारने का अभ्यास करें 
यह बात भी मास्टर जी ने तीन बार बताई 

आगे मास्टर जी ने सोने के हिरण वाली बात बताई 
राम ने शबरी के जूठे बेर को कितने प्रेम से खाया, यह भी बताया 
उन्होंने मारीच से लेकर बाली कुंभकरण और 
रावण वध की कथा सविस्तार बताई और तीन तीन बार बताई 

उन्होंने यह भी बताया कि रावण बड़ा विद्वान था और 
राम विद्वता का बड़ा सम्मान करते थे 
अतः उन्होंने लक्ष्मण को रावण के पास राजनीति सीखने भेजा 
मास्टर जी ने यह नहीं बताया कि जब लक्ष्मण को राजा बनना ही नहीं था 
तो कायदे से राजनीति सीखने राम को जाना चाहिए था 

नहीं बताया मास्टर जी ने राम के दुखों और छोटे-छोटे सुखों के बारे में 
कि रात के किस पहर अचानक सीता की याद में घंटों रोए थे 
कि उन्हें मां की याद कब-कब आई
कि पिता की मृत्यु की खबर राम ने कैसे सहन की
उन्होंने यह सब एक बार भी नहीं बताया की अग्नि परीक्षा लेते हुए 
राम कितने आदर्श बचे थे? 
कि गर्भवती पत्नी को बनवास देते हुए राम को अपने होने वाले बच्चे का बिल्कुल भी ख्याल नहीं आया?

सच तो यह है कि राम को राजा ही बनना था 
चौदह साल बाद ही सही 
रावण हमेशा राम की छवि चमकाने के काम आया 

सच तो यह है कि राजा किसी का सगा नहीं होता 
ना पिता का ना पत्नी का ना पुत्र का 
यहां तक कि उस ईश्वर का भी नहीं 
जिसकी ढाल वह हमेशा अपने साथ रखता है





- एक ऋचा का पुनर्पाठ -1
--------------

चिता से उठती चीखों की आवाज़ें  सुन सुनकर 
आखिर एक दिन उनके कान संवेदना से पसीज उठे 
और उन्होंने देवभाषा में कहा-

 ओ स्त्री उठ! 
जिसकी बगल में तू लेटी है वह कब का मर चुका         
उठ जीवितो के संसार में वापस चल 
   

वह अहसान से दोहरी तिहरी हो वापस आई 
वह वापस आई देवर के लिए 
वह वापस आई पुरोहित के लिए 
वह वापस आई किसी ना किसी पुरुष के लिए 

उन्होंने जब-जब कहा वह हंसी, रोई 
और गीत गाने लगी 
उन्होंने इशारे किए जब, वह मर गई 
जहर खा, फांसी लगा, बच्चे जनकर और 
आग में कूद कर भी 

इस तरह वह जीवितों कि दुनिया में जिंदा रही 
इस तरह वह फिर फिर मरी जीवितों की दुनिया में...

2-एक और ऋचा का पुनर्पाठ -2
----------------

सबने अक्षत और फूल लेकर हाथ जोड़े 
सबने यानी स्त्रियों ने भी 

उन्होंने दूसरी ऋचा का पाठ शुरू किया -
'ओ स्त्री तुम पर भरोसा नहीं किया जा सकता 
तुम्हारा मन भेड़िए का मन है' 

सामने बैठी स्त्रियों की देह जड़ हो गई और 
उनके चेहरे पर भेड़िए सरीखे पैने दांत उग आए

पिताओं ने उनकी ओर हिकारत भरी नजरों से देखा 
और उनकी पकाई रोटियां कुछ भुनभुनाते हुए खाते रहे

बच्चे आए, वे उनके दांतों को छूकर, हिलाकर  
ठोंक बजाकर देखते और ठहाके लगाते रहे 

आखिर में रात के दूसरे पहर पुरुष आए 
सबसे पहले उन्होंने उनके नुकीले दांत तोड़े 
फिर शरीर का मांस तोला तोला कर पकाया-खाया 
वे डकार आने तक खाते रहे 

इस तरह एक भेड़िए के मनवाली का यह संस्कार 
सुबह के पहर तक चलता रहा.


अच्छी लड़की के लिए जरूरी निबंध
-------------

एक अच्छी लड़की सवाल नहीं करती
एक अच्छी लड़की सवालों के जवाब सही-सही देती है
एक अच्छी लड़की ऐसा कुछ भी नहीं करती कि सवाल पैदा हों

मेरे नन्ना कहते थे- लड़कियां खुद एक सवाल हैं जिन्हें जल्दी से जल्दी हल कर देना चाहिए
दादी कहती- पटर पटर सवाल मत किया करो

तो यह तो हुई प्रस्तावना अब आगे हम जानेंगे
कि कौन सी लड़कियां अच्छी लड़कियां नहीं होती

एक लड़की किसी दिन देर से घर लौटती है
वह अच्छी लड़की नहीं रहती
एक लड़की अक्सर पड़ोसियों को बालकनी पर नजर आने लगती है….. वह अच्छी लड़की नहीं रहती
एक लड़की का अपहरण हो जाता है एक दिन
एक लड़की का बलात्कार हो जाता है और उसकी लाश किसी नदी नाले या जंगल में पाई जाती है
एक लड़की के चेहरे पर तेजाब डाल दिया जाता है
और एक लड़की तो खुदकुशी कर लेती है…

क्यों -कैसे?
जानने की क्या जरूरत
यह सब अच्छी लड़कियां नहीं होती

मैं दादी से पूछती -अच्छे लड़के कैसे होते हैं
वह कहती – चुप ! लड़के सिर्फ लड़के होते हैं

और वह शुरू हो जाती अच्छी लड़कियों के
गुण बखान करने
दादी की नजरों में प्रेम में घर छोड़कर भागी हुई लड़कियां केवल बुरी लड़कियां ही नहीं
नकटी कलंकिनी कुलबोरन होती
शराब और सिगरेट पीने वाली लड़कियां दादी के देश की सीमा के बाहर की फिरंगनें कहलाती थीं
और वे कभी भी अच्छी लड़कियां नहीं हो सकतीं

खैर अब दादी परलोक सिधार गई और नन्ना भी नहीं रहे
फिर भी अच्छी लड़कियां बनाने वाली फैक्ट्रियां
बराबर काम कर रही हैं
और लड़कियों में अब भी अच्छी लड़की वाला ठप्पा अपने माथे पर लगाने की होड़ लगी है

तो लड़कियों! अच्छी लड़की बनने के फायदे तो पता ही है तुम्हें 
चारों शांति और शांति…..
घर से लेकर मोहल्ले तक
स्कूल कॉलेज शहर और देशभर में
ये तख्तियां लेकर नारे लगाना जुलूस निकालना
अच्छी लड़कियों के काम नहीं है
धरना प्रदर्शन कभी भी अच्छी लड़कियां नहीं करतीं

मेरे देश की लड़कियों सुनो!
अच्छी लड़कियां सवाल नहीं करती और
बहस तो बिल्कुल भी नहीं करती
तुम सवाल नहीं करोगी तो हमारे विश्वविद्यालय तुम्हें गोल्ड मेडल देंगे
जैसा कि तुमने सुना जाना होगा इस विषय पर डिग्री और डिप्लोमा भी शुरू हो गया है
इन उच्च शिक्षित लड़कियों को देश-विदेश की कंपनियां अच्छे पैकेज वाली नौकरियां भी देती हैं

देखो दादी और नन्ना अब दो व्यक्ति नहीं रहे
संस्थान बन गए हैं

खैर आखरी पैराग्राफ से पहले एक राज की बात बताती हूं
कुछ साल पहले तक मैं भी अच्छी लड़की थी.







आरती

 24 अक्तूबर 1977 ।

रीवा, म प्र के एक कस्बे गोविन्दगढ में जन्म। 

हिंदी- साहित्य से एम. ए. और पी एच. डी.। 


मीडिया में दसों साल सक्रिय कार्य के बाद अब स्वतंत्र लेखन और सामाजिक कार्य। " समय के साखी"  साहित्य पत्रिका का  सम्पादन।

प्रकाशन- "मायालोक से बाहर" ( कविता संग्रह)

"नरेश सक्सेना का व्यक्तित्व और कृतित्व" पुस्तक का सम्पादन

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की " मीडिया मीमांसा" और "मीडिया नव चिंतन" पत्रिकाओ के कई अंको का सम्पादन। 

रबिन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय भोपाल के बृहत् कथा कोश कथादेश का संपादन।

सम्पर्क- 912 अन्नपूर्णा परिसर, पी एन टी चौराहा, भोपाल( म प्र)

मो न- 9713035330
[

समकाल : कविता का स्त्रीकाल-35


रीता दास राम   की कविताएँ




1. 
युगीन स्त्री-पुरुष 

व्यवस्था के साथ 
परपराओं की आड़ में 
रीति-रिवाजों पर चलते 
संस्कृति की छांव में 
संस्कारों की जुगाली करते 
पुरुष बसाना चाहते है घर ... 
सपनों की कल्पना में 
प्रेम की डाल पर 
तितलियों से प्रकाश में 
धानी चूड़ियों की आवाज में 
रेशम की नमी और कोमलता थामें 
धमनियों में बहते रक्त की लाली संग 
स्त्री बसाना चाहती है घर ... 
घर बसता है 
व्यवस्था, परंपरा, रीति-रिवाज़, संस्कृति, संस्कारों को 
बदलते हुए 
स्वप्नों, कल्पना, प्रेम, प्रकाश, आवाज, नमी, कोमलता और रक्त को 
रखते हुए ताक पर 
ये हर युग का बदलाव 
वक्त के हस्ताक्षर पर 
यंत्र चालित सा उभरता सत्य है 
बस पृथ्वी को घूमते चले जाना होता है 
होते हुए सूर्य से प्रकाशित 
परिवर्तन की नियति को स्वीकारते हुए 
बसते हुए देखना जीव की नैसर्गिक पराकाष्ठा 
समाज़ पर लगा वेदना का पैबंद  
संतुष्टि की घोषणा का अघोषित सत्य।  
 
2. 
इंसान 

गीला मन 
भीगी भीगी औरतें 
भरी-भरी आँखें 
पसीने से तर-बतर 
संस्कृति की जुगाली पर 
खींच रही जिंदगी 
खोलते हुए बंधन 
एक एक इंच गांठ 
गर्भाशय को मशीन 
शब्द से करते हुए आज़ाद 
इंसानी दर्जा दिलाते हुए खुद को 
विकलांग समाज़ की 
सदियों से करते हुए सेवा 
सहूलियत, सफाई, भूख, जरूरत मुहैया कराती हिस्से की आस 
इंसानी पैदावार के लिए की जाती है इस्तेमाल 
पाठ, उपवास, मान, सम्मान, ऊंच, नीच, सही, गलत, सबमें हिस्सेदारी 
निठल्ले घूमते पुरुषों की बनती जूठन  
संस्कार, बच्चे, रिवाज़, परंपरा सब है इसके जिम्मे 
शरीर, वासना, इच्छा, बहकना बेगानी मिल्कियत  
स्वेच्छा से किया एक संभोग जिंदगी का कलंक 
बलात भोगे दस पुरुष वह भी इसका दोष 
सारे कुकर्मों से रिश्ते इसके 
बेटियाँ बनाई जाती है पराई 
बहू को अपनाता एहसान जताता सामाज  
पुरुष के बाद पाती दुय्यम स्थान 
स्त्री अब बोलने लगी खुलेआम  
बीती जिंदगी के राज़ खोल रही है 
घर से बाहर निकल रही है या निकाली जा रही है  
रीति-रिवाज को मनमाना निभा रही है 
परिवार को किचन का रास्ता दिखा रही है 
अपनी मर्जी जीने को है उत्सुक 
पुरुषों के आदेश करने लगी है ख़ारिज  
लिव-इन में रहना चुनाव कर रही है 
शरीर को समझने लगी है अपना 
क़लक़ मान सम्मान मानती है सब अज्ञानी बातें 
औरत खुद को औरत ही नहीं, अब इंसान कहलाने लगी है।  
3. जरूरतों की ख़ातिर प्यार 
हथेलियाँ भर थी खुशियाँ 
पत्थर तोड़ना चाहती थी
जब जब रीति-रिवाज बदले 
भरना चाहती थी संस्कृति के छेद 
बोल के बता दिए गए नहीं बोलने के कारण 
बड़बड़ाती रही खामोशी में बदहवास 
उपेक्षित छोड़े झड़ते सपने 
उलीचती रही हकीकत की स्याही  
जबकि सपनों को मुट्ठी में बंद कर दिया गया 
नहीं पहचानी दर्द और खुशी की अलग परिभाषा 
फूल को फूल कहा और चाँद को चाँद 
रोशनी वाले अंधेरे भर-भर के दिखाई पड़ते रहे 
बंधन-मुक्त होना चाहा जब 
विशेषण जकड़ते रहे, हड़बड़ाते 
दृश्यों में चाहती थी तैरना 
ख़्वाहिशों में डुबोते रहे तुम 
 
पूरे पंख फैलाकर उड़ने से पहले देखा 
चमगादड़ की तरह अंजान शिकायती मूक दृष्टि तुम्हारी  
खत्म कर दी थी आजादी गृहप्रवेश के बाद 
पूरे घर की चाहत के लिए 
उसने तलाश ली मुट्ठी भर श्वास 
आज गठरी सी जिंदगी आदत है 
निहारते हुए अपलक कहा जाता है प्यार 
प्यार की खोज में बीती जिंदगी ढोती देखती रही 
जरूरतों की खातिर प्यार होता रहा। 
 
4. पटरी 
कैसे कैसे लम्हों से मिलती हुई 
पटरी सी पड़ी पड़ी छिलती हुई 
मैं देखती गाड़ी धड़धड़ाती गुजरती हुई 
और आवाज़ आवाज़ में धुल जाती 
जब जब आँखें मुँदें मैं खुद से गुजरती 
जाने कितने डिब्बे चले जाते 
शब्दों के विस्फोट से कांप जाती 
छाती पर पटरियों की चिंगारी बसती 
घुटती साँसे पत्थरों-सी मार सहती 
जब जब आँखें मुँदें मैं खुद से गुजरती 
देह पटरी-सी गर्द, धक्कड़, धूप में भी 
वितृष्णा दबाए पड़ी पड़ी तड़कती 
उजाले में भी रोशनी का इंतजार करती 
हर बार नई ठेस रोशनी की ओर तोड़ा और सरका जाती 
जब जब आँखें मुँदें मैं खुद से गुजरती 
गोल पहियों से वक्त घूमते जाते 
छूते पास आकर दूर चले जाते 
घूमते पहियों के छेदों को घूरती 
गिनने की असंख्य कोशिश करती 
जब जब आँखें मुँदें मैं खुद से गुजरती 
अक्सर पटरी की ये कल्पना मेरी 
मेरे और कल्पना के बीच होती 
और वह चिकनी, सपाट समानांतर पटरी 
मुझे हमेशा जिंदगी के रूबरू लगती 
जब जब आँखें मुँदें मैं खुद से गुजरती। 
 



5. 
पुरुष (आजकल में छपी) 


फैल जाती है 
भीतर इक नदी 
जब जब तुम 
सिंदूर लगाती हो 
तितर-बितर हो जाता है चाँद  
जब माथे पर 
बिंदी सजाती हो 
बौखला हो जाती है चाह 
चूड़ियों सी मिल जाती है 
दिशाएँ जब छोरों पर 
मैं पूरा औंधा लेटा होता हूँ तुम पर 
जब-जब सूर्य चमकता है 
तेज़ देता पृथ्वी को 
तुम हौले से उतरती हो देह में 
बन तरल चाँदनी 
तुमसे तुम्हारे सारे राज़ 
जान लेने को उत्सुक मैं 
पल-पल हारता हूँ 
तुम्हारी आगोश में 
कोशिश पर की गई अनन्य कोशिश 
मुझे नुक्कड़ पर 
खड़े होने का आभास कराती है 
जब भी तुम 
बंद हो जाती हो खुद में 
मैं मौन तोड़ना चाहता हूँ 
एक आल्हाद भरी चीख़ 
में तब्दील देखना चाहता हूँ 
तुम तृप्ति बनती हो जब 
तेज़ बिखरा जाती हो मुझे 
मुझसे मेरा सत्य जान लेने के बाद 
मेरी ही नज़रों में 
करते हुए मुझे ख़ारिज़ ... ए स्त्री 
जागती हो मेरे भीतर 
अपूर्ण अनंत तक 
हर कदम
जीता हूँ यह सत्य 
जब जब निहारता हूँ तुम्हें।  





परिचय – डॉ. रीता दास राम
नाम :-  डॉ. रीता दास राम  
संप्रति : कवयित्री / लेखिका 
शिक्षा : एम ए., एम फिल, पी.एच.डी.(हिन्दी) 
      मुंबई विश्वविद्यालय, मुंबई.  
जन्म :- 1968 नागपूर. 
वर्तमान आवास : मुंबई                                                  
पता :- 34/603, एच॰ पी॰ नगर पूर्व, वासीनाका, चेंबूर, मुंबई – 400074.  
मो॰ न॰ – 09619209272. 
ई मेल :- reeta.r.ram@gmail.com
कविता संग्रह :- 
    1. “तृष्णा” प्रथम कविता संग्रह 2012.
    2. “गीली मिट्टी के रूपाकार” दूसरा काव्यसंग्रह 2016 में प्रकाशित। 
कहानी :- ‘लमही’(2015), ‘गंभीर समाचार’ (2018) , ‘मनस्वी’ 2018 एवं ‘आजकल’-मार्च 2019, ‘छतीसगढ़ मित्र’ (2020) पत्रिका और प्रतिलिपि (ब्लॉग) में कहानी प्रकाशित। 
यात्रा संस्मरण : ‘इजिप्ट’ पर ‘नया ज्ञानोदय’ एवं ‘भवन्स नवनीत’ में संस्मरण प्रकाशित। 
स्तंभ लेखन :- मुंबई के अखबार “दबंग दुनिया” 2015 में और “दैनिक दक्षिण मुंबई” 2016 में स्तंभ लेखन।  
साक्षात्कार : 
1. ‘हस्तीमल हस्ती जी’ का साक्षात्कार मुंबई की ‘अनभै’ पत्रिका में प्रकाशित। 
2. कवि, आलोचक प्रोफेसर (मुंबई विश्वविद्यालय) ‘डॉ. हूबनाथ पाण्डेय’ का साक्षात्कार ‘बिजूका’ ब्लॉग में।  
3. साहित्यकार डॉ. असग़र वजाहत से फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती पर संवाद वीडियो यूट्यूब पर।              
सम्मान :- 
   1. ‘शब्द प्रवाह साहित्य सम्मान’ 2013, तृतीय स्थान ‘तृष्णा’ को उज्जैन।  
   2. ‘अभिव्यक्ति गौरव सम्मान’ – 2016 नागदा में ‘अभिव्यक्ति विचार मंच’ नागदा की ओर से 2015-16 का। 
   3. ‘हेमंत स्मृति सम्मान’ गुजरात विश्वविद्यालय अहमदाबाद 7 फरवरी 2017 में ‘गीली मिट्टी के रूपाकार’ को ‘हेमंत फाउंडेशन’ की ओर से। 
   4. ‘शब्द मधुकर सम्मान-2018’ मधुकर शोध संस्थान दतिया, मध्यप्रदेश, द्वारा ‘गीली मिट्टी के रूपाकार’ को राष्ट्र स्तरीय सम्मान। 
   5. ‘आचार्य लक्ष्मीकांत मिश्र राष्ट्रीय सम्मान’ 2019 की घोषणा, मुंगेर, बिहार से। 
कवियों की संग्रहीत कविता संकलन में मेरी कविताओं को स्थान : 
1. गौरैया (मध्यप्रदेश) 
2. शब्द प्रवाह, वार्षिक काव्य विशेषांक (मध्यप्रदेश) 
2. समकालीन हिन्दी कविता भाग 1 (आरा, बिहार)  
3. साहित्यायन (मध्यप्रदेश) 
4. मुंबई की कवयित्रियाँ (मुंबई) 
5. चिंगारियाँ (मध्यप्रदेश)                                   
विभिन्न पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित :- 
‘मृदंग’ (2020), ‘नवनीत’ (2019) ‘चिंतन दिशा’ (2019), ‘आजकल’ जनवरी 2018 (दिल्ली), ‘वागर्थ’ जुलाई 2016, ‘पाखी’ मार्च 2016 (दिल्ली), ‘दुनिया इन दिनों’ (दिल्ली), ‘शुक्रवार’ (लखनऊ), ‘निकट’ (आबूधाबी), ‘लमही’ (लखनऊ), ‘सृजनलोक’ (बिहार), ‘उत्तर प्रदेश’ (लखनऊ), ‘कथा’ (दिल्ली), ‘व्यंजना’ 2019 (कानपुर), ‘आचार्य पथ’ 2018 (रायबरेली), ‘जीवन प्रभात’ 2018 (मुंबई), ‘युग गरीमा’ मार्च 2018 (लखनऊ), ‘अनभै’ (मुंबई), ‘शब्द प्रवाह’ (उज्जैन), ‘आगमन’ (हापुड़), ‘कथाबिंब’ (मुंबई), ‘दूसरी परंपरा’ (लखनऊ), ‘अनवरत’ (झारखंड), ‘विश्वगाथा’ (गुजरात), ‘समीचीन’ (मुंबई), ‘शब्द सरिता’ (अलीगढ़), ‘उत्कर्ष’ (लखनऊ) आदि पत्रिकाओं। 
वेब-पत्रिका/ई-मैगज़ीन/ब्लॉग/पोर्टल :- ‘मृदंग’ अगस्त 2020 ई पत्रिका, ‘मिडियावाला’ पोर्टल ‘बिजूका’ ब्लॉग व वाट्सप, ‘शब्दांकन’ ई मैगजीन, ‘रचनाकार’ व ‘साहित्य रागिनी’ वेब पत्रिका, ‘नव प्रभात टाइम्स.कॉम’ एवं ‘स्टोरी मिरर’ पोर्टल, समूह आदि में कविताएँ प्रकाशित।  
रेडिओ :- वेब रेडिओ ‘रेडिओ सिटी (Radio City)’ के कार्यक्रम ‘ओपेन माइक’ में कई बार काव्यपाठ एवं अमृतलाल नागरजी की व्यंग्य रचना का पाठ।  
प्रपत्र प्रस्तुति : एस.आर.एम. यूनिवर्सिटी चेन्नई, बनारस यूनिवर्सिटी, मुंबई यूनिवर्सिटी एवं कॉलेज में इंटेरनेशनल एवं नेशनल सेमिनार में प्रपत्र प्रस्तुति एवं कई पत्र-पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित। 

समकाल : कविता का स्त्रीकाल-36


चन्द्रकला त्रिपाठी की कविताएँ

1)-



 राजा को अभिनेता पसंद आता गया

उसका प्रजा पर असर ज़ोरदार दिखा

प्रजा वैसे तो कोई मुश्किल न थी

मगर ऐसे तो थी कभी और बहुत ज्यादा थी


राजा ने शिक्षा ली अभिनेता से मगर कहा इसे

गुप्त रखना

अभिनेता को भी दुनिया से यह रिश्ता छिपाना था

उसे प्रजा के हिए में अपनी जगह नहीं घटाना था


राजा ने कहा उसे प्रजा पर प्रभाव के मौके पर आंसू चाहिए

अभिनेता अचकचाया और अपना भेद बता गया

आंसू के मौके पर वह असली आंसू रोता है

अभिनय उसका इतना भी छल नहीं है कि वह रोने का

दिखावा करे

इन दिनों तो उससे हंसना हो ही नहीं पाता है

दिल में उसके मां के शव से चिपका एक बच्चा बिलखता है

इन दिनों कारोबार मंद है सबका

कोई भी कैसे भी प्रदर्शन में नहीं हिलगता


सुन रहा था सुकवि

उसने अपने भीतर बसे मुसाहिब को संभाला

राजा से कहा प्रभु

रोना बहुत आसान है

और प्रजा भी 

आंसू कौन देखता है

मुद्राएं संभाल लें


देखिए ऐसे

नहीं तो ऐसे 

सुकवि का चेहरा सिकुड़ता फैलता रहा

राजा अचरज से

चेहरे का बिगड़ना 

लटकना देखता रहा


आंसू पर चली बात तमाशा हुई जा रही थी

अभिनेता शर्मिंदा था

वह एक्ज़िट के बारे में सोच रहा था


ख़ैर

चंद्रकला त्रिपाठी

------

2)-

 राजा ने कहा  ,



 मेरी प्रशंसा में लिखो

कवि को बहुत कम शब्दों की जरुरत पड़ी 

चिकने चपटे शब्दों से काम चल गया 

व्यंग्य की

वैदग्ध्य की

करुणा की 

गुंजाइश ही नहीं थी

जो ललित कलित चाहिए था उसे

यहां वहां

इसके उसके गद्य पद्य से उठा लिया


फिर भी निचुड़ उठा कवि

असली मुश्किल पेश आई व्यंग्य का गला घोटने में

आंखों में कील जड़ने में

करुणा को दरबदर करने में

निचुड़ उठा


राजाओं को कवियों की कहां कमी पड़ी कभी

कवि था कि गुम हो गया


कलेजे में गड्ढा लिए कवियों के पीछे 

अर्थियां  घूमती हैं


कुछ हैं जो राजाओं से ज्यादा

राजकवियों से डरते हैं


ख़ैर .....


चंद्रकला त्रिपाठी


-----



3)-



सड़कें चाहने लगीं हैं कि वे इन दिनों मखमल हो जाएं


मौसम नम होना चाहते हैं


आग भस्म कर देना चाहती है प्रेम के सारे प्रदर्शन


पृथ्वी हिल रही है कि सही करवट जीना चाहती है


पत्थर शोक में हैं कि वे इतने पत्थर तो नहीं थे


 मसखरे क़समें उठा रहे हैं कि उनके जुमले झूठे नहीं होते

बस नकाब खींचते रहे हैं


जानवर चाहते हैं कि वे भी कोई किताब लिखें इंसानों के बारे में

लिखें कि उनके लिए बेरहम होने का अर्थ इंसान होना हुआ जा रहा है


 चीलें गिद्ध सियार सभी मरघटों पर इतनी बरक़त नहीं चाहते थे

इतना बड़ा नहीं है उनका पेट


माएं अब बांझ होना चाहती हैं


बद्दुआएं हैं कि हैरान हैं 

वे सही जगह लगती ही नहीं


चंद्रकला त्रिपाठी

--------


4)-


बहुत दिन बीत जाने पर

 वह परछाइयों में घुल जाता है


हंसने के ढंग में

चुप्पी होकर धड़कता है 


संगसाथ में दोस्त की तरह बरतता है


ऐसा तो कोई नहीं होता इतना टिक कर रहने वाला

दुःख की तरह का


इस दुनिया में कौन है ऐसा जिसे

कहीं जाने की कोई हड़बड़ी नहीं


5)-


धीमें बहुत धीमें चलती दिखती हैं चींटियां 

बेसब्री दिखाने भर काया नहीं उनके पास 


 बहुत झुक कर नहीं उड़ते पक्षी 

हवा छितराने के लिए भी नहीं 


बहुत दिनों से सन्नाटा है इधर

उन्हे तो इधर का ही पता है


सूख चुका है बगल की बस्ती का हैंडपंप

अगल की कॉलोनी में पानी अभी बाक़ी है


बांध कर ले जाया जा रहा है भगेलू

उसका असली नाम भी अब यही हो गया है

पांच बजे बंद कर देनी थी अंडे की दुकान

वह आठ बजे अपने ठेले के साथ पकड़ा गया 

पीछे पीछे दौड़ती जा रही है नसीमा

चिल्ला नहीं रही है

सिर्फ़ बिलख रही है 


उसके पीछे कोई खोल ले जाएगा उसकी बकरी

आसपास बहुत दिनों से उपवास चल रहा है


नीरज को अब से आधी तनख्वाह भी नहीं मिलेगी 

सुधा को नहीं मिल रहा है साड़ियों में फाल टांकने का काम भी

पढ़े-लिखे दोनों भीख मांगने में हिचकते हैं

छ: महीने के छोटे बच्चे के लिए भी जीना नहीं चाहते


किसी की कुंडी खटकी तो पृथ्वी तक कांप गई

क्या है ? कोई कुरस हो कर चिल्लाया 

स्त्री ने फोंफर से देखा उस दूसरी स्त्री को

उसकी उम्र कम थी और वह कांप रही थी

 उसके हाथ में गीली हुई पर्ची कांपती इस हांथ में चली आई और वह स्त्री अदृश्य हो गई

फोन नंबर था उस पर एक

पानी से पसर गए थे नंबर मगर बाक़ी थे


क्या है क्या है ?

वाली आवाज़ सख़्त थी 

दूसरों के झमेले में कोई नहीं पड़ता आजकल


बहुत दिनों से उस घर में स्त्री के नहीं होने की आवाज़ है

बाक़ी आवाज़ें अब ज़्यादा हैं , जैसे घिसटती हुई रुकतीं है बड़ी गाड़ियां और

सन्नाटे में किसी के नहीं होने को बार बार सुना जाता है


स्त्री ने हिम्मत करके उस नंबर पर फोन कर दिया मगर तब नहीं किया जब 

ख़त्म होने से पहले कुछ बचा लिया जाता है


बचा तो वह भी नहीं

वह छ: महीने का बच्चा भी


चंद्रकला त्रिपाठी



--------


परिचय

चन्द्रकला त्रिपाठी

नाटकों का निर्देशन और अभिनय भी। अकादमिक क्षेत्र की महत्त्वपूर्ण समितियों की सदस्य

शुकदेव सिंह स्मृति सम्मान गाथांतर सम्मान सुचरिता गुप्ता अकादमी सम्मान



किताबें : कविता संग्रह - वसंत के चुपचाप गुजर जाने पर , नेशनल पब्लिशिंग हाउस नई दिल्ली

शायद किसी दिन , नमन प्रकाशन नई दिल्ली

कथा डायरी ,इस उस मोड़ पर अंतिका प्रकाशन

आलोचना , अज्ञेय और नई कविता 

आलेख कविताएं कहानियां , हंस कथा देश पूर्वग्रह,वागर्थ , रचना समय आलोचना, वसुधा, पल प्रतिपल वगैरह में

दूरदर्शन, आकाशवाणी के दिल्ली लखनऊ गोरखपुर वाराणसी इलाहाबाद केंद्रों से वार्ताएं साक्षात्कार वगैरह प्रसारित

यूजीसी कैरियर अवार्ड प्राप्त

42 वर्ष बीएचयू में अध्यापन और महिला महाविद्यालय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राचार्या पद से रिटाय-

समकाल: कविता का स्त्रीकाल-30

आसिया नकवी की कविताएँ

1

 दो  कलाकार 

पहला नाम से फिदा 
दूसरे पर  कुछ लोग फिदा 

पहले ने दुनिया रंगों से भर दी 
दूसरे ने नज़रयाती जंगों  से भर दी 

पहला सैकड़ों अल्फाज़ एक तस्वीर में भर देता 
दूसरा सैकड़ों जुमले  एक तकरीर  में भर देता 

पहले ने इज़हार को फरोग दिया 
दूसरे ने इज़हार को रोक दिया 

था पहला भी कलाकार 
है दूसरा भी कलाकार


2

रंग 

(एक )

बदल दिए जाते हैं रोज कविताओं के कपडे, 
कभी लाल, कभी भगवा और कभी सफ़ेद.
हरा माना जाने  लगा है ज़हरीला रंग. 

रोज़ खाने में परोसे जाते हैं 
अलग अलग रंग रूप के शब्द
और हद तो यह है, कि खाने में हरा हरा ना हो 
तो सब लाल हो जाता है

(दो)

लोग चाहते हैं 
कविताएँ भी बदलें कपड़ों की तरह 
बासी खाना और बासी कविताएँ 
अक्सर लोगों को रुला देती हैं. 
लगता है कल ही स्टॉक आउट हुआ है 
थ्रिल का बाज़ार 

(तीन )

हत्या हत्या होती है 
ब्रेकिंग न्यूज़ की हत्या तक
सब कुछ कितना रेपेटिटिव है. 
लोग चाहते हैं 
रोज़ बदलना चाहिए 
ख़ून का रंग. धर्म का रंग. 
खाने का रंग. रंगों का रंग
.......

इंसानों से जब मन जायेगा भर
ढूंढ लूंगी कोई  ऐसा  घर

बस्ती होगी  जहां ख़ामोशी  सूखी  घास 
और  संवेदनाओ की बेहोशी

वहाँ न  होगा  आदमी  जैसा  कुछ 
सब सम्बन्धों के परिमाण होगें 
शुन्य  एवं तुच्छ  



3
आइनों से डरने वाला आदमी.

उसकी उंगलियाँ उससे पहले उठती हैं
छोड़ कर पीछे उसकी मुट्ठी
पूर्णता एक ऐसी चीज़ जो वो खोजता है दूसरों में
और परछाईं से डरता है.
दिन शुरू करता है पोतते हुए आइनों पर कालिख,
दांत चमकाते हुए और
दुनिया का मखौल उड़ाते हुए.
अपने अन्दर की उपेक्षा कर देता है वो.

२.
उसकी कमाई हैं आँसू और अपशब्द.
जो सोख लिए जाते हैं उसकी अंतरात्मा के साथ.

३.
लेकिन आँसू कैसे काले करता वो?
उन्होंने हमेशा वही किया जिनसे वो डरता था.

दबी हुई अंतरात्मा....वापस मुखर...
आईने में उसकी परछाई.,,

४.
कोई मखौल नहीं
कोई चमकाना नहीं दांतों का.
बस दर्द पैदा होता है उसके अन्दर,
दर्द
 जिससे कवि पैदा होता है.

4
 कुछ  कैदी   हैं  जो  रिहा  किए जा   रहे  हैं 
कुछ  रिहायी  है  जो  कैद  की  जा  रही है 

नसलों  को  भी  मस्लों  को  समझना  होगा  
फसलों  को  भी  खेतों  को  समझना  होगा 

औरत  हूँ  तो  आवाज़  तो  हो  सकती  नही
सच्ची  हूँ  तो  बेगुनाह  तो  हो  सकती  नहीं 

इस  दौर  ए  जाहालत  का  है  अंदाज  यही 
जो  तख्ता  ए  हाकीम  है  ऐजाज़  वही 

की  हामला  भी  हमलावार  हो  गयी  आज 
की  खामोशियां  भी  जुमला  वर  बन  गयी आज 

उठो  की  शोर  थम   गया  अब  तो 
उठो  की  नब्ज़  जम  गयी  अब  तो 
उठो  की  उड  ना  जाए  रंग  ए  बाहार 
उठो  की  मिट  ना  जाए  दौर  ए ज़रग

.......
5
 एक कमरे के आगे 

वर्जिन्या वुल्फ़ कहती हैं कि हर स्त्री के पास लिखने के लिए अपना एक कमरा होना चाहिए. भारत में सिर्फ़ यही दबाव नहीं है जो स्त्री पर काम करता है. शायद एक कमरा देकर क़ैद करने की कोशिश के ख़िलाफ़ लड़ते हुए लिखना बहुत पीछे रह जाता है. कई कई दिन बाद लिखना और फिर रोज़ दुनिया के और कविता के चलते पैदा हुए डिसिलूज़न से जूझना थका देता है . 

मैने बरसों बाद 
अकेले ख़ामोश बेदम  बक्से को खोला 
उसके ऊपर  जमी धूल  के कण झूम उठे -
अपने जी   उठने के  जश्न  में इस बात से बेख़बर 
कि  इतने  लम्बे अरसे से  अपने  अंदर क्या दबा  रखा था . 

सबसे ऊपर पड़ी जज़्बात  की पोशाक बोसिदा हो चुकी है 
एहसासात भी कुछ बेहतर नहीं हैं - उनके    चिथडों  पर  खिलखिलाते दीमक रेंग  रहे हैं. 
हक़ीक़त के रंग फींके हो  गए हैं . 
ख़ुदपसंदी का क़द छोटा हो गया है, 
नज़र तो  मजमे में नज़रअन्दाज़ हो जाएगी 

कोई तो है जो चमक रहा है 
शायद बिरादरी स्टोर  से  ख़रीदा दिखावा  है . 


आसिय


परिचय : 
आसिया नकवी  
कवि एवं ऐक्टिविस्ट. विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित. अंग्रेज़ी,हिंदी में समान रूप से लेखन. 
संप्रति : अध्यापन. जन्म : 30.06.1988. 
मोब: 7543028451 ईमेल: aaasiya.naqvi@gmail.com