मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

कहानी


         रामवृक्ष मौर्य की कहानी  'घरवाली' मध्यमवर्गीय स्त्री के संघर्ष और अधिकारों की कहानी है।एक घरेलू स्त्री जो सुबह से देर रात तक पूरे घर की जिम्मेदारी उठाती है,फिर भी उसके त्याग और समर्पण को महत्व नहीं दिया जाता है।बल्कि जब-तब तानों से उसकी आत्मा पर चोट पहुँचाई जाती है।इसके बावजूद भी स्त्री धैर्यपूर्वक अपना कर्म करती है।यह कहानी ऐसी ही मध्यमवर्गीय स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाती हुई समाज को बड़ा सदेश देती है।
               रामवृक्ष मौर्य की कहानी  'घरवाली' मध्यमवर्गीय स्त्री के संघर्ष और अधिकारों की कहानी है।एक घरेलू स्त्री जो सुबह से देर रात तक पूरे घर की जिम्मेदारी उठाती है,फिर भी उसके त्याग और समर्पण को महत्व नहीं दिया जाता है,बल्कि जब-तब तानों से उसकी आत्मा पर चोट पहुँचाई जाती है।इसके बावजूद भी स्त्री धैर्यपूर्वक अपना कर्म करती है।घरवाली कहानी ऐसी ही मध्यमवर्गीय स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाती हुई समाज को बड़ा सदेश देती है।
                        प्रतिभा सिंह


                                                            घरवाली


घरवाली और बाहरवाली में हमेशा लोगों ने बाहर वाली को अधिक चाहा है, उसके एक इशारे पर जमीन-आसमान एक करने को तैयार। कितने सत्तासीनों के बाहरवाली के चक्कर में राजपाट तक चले गये, बड़ी-बड़ी लड़ाइयां हुई, देश और परिवार तबाह हुए, पर बाहरवाली का आकर्षण पुराने जमाने से लेकर आज तक बरकरार है। खुदा न खास्ता कभी बाहर वाली घरवाली हो गयी, तो पुरुष का फिर कुछ दिनों बाद बाहरवाली का चक्कर प्रारम्भ। घरवाली हमेशा उपेक्षित रही, चाहे वह पूर्व प्रेमिका ही क्यों न रही। हमेशा और बार-बार घरवाली ही क्यों उपेक्षित? जिसने पति के लिए अपने माँ-बाप का घर छोड़ा, परिवार छोड़ा, गाव पुर और सखी-सहेली छोड़ी। पति को परमेश्वर माना, उसके परिवार को अपना परिवार माना, पति के माँ-बाप, भाई-बहन से सास-ससुर और देवर-ननद का नाता जोड़ा। वह पति की नींद सोती है और पति के लिए जागती है। पति शाम को समय से घर नहीं आया, तो उसे चिन्ता सताने लगती है और मन ही मन ईश्वर से पति के सही सलामत घर आने की दुआ मागने लगती है। पर देर से आये पति से उलाहना देते हुए पूछ लिया कि कहाँ रह गये इतनी देर, मैं खाने के लिए तुम्हारा इन्तजार कर रही थी, तो पति पत्नी की भावनाओं का बिना ख्याल किये आसानी से कह देता है, किसने तुमसे कहा था इन्तजार करने को। मेरे लिए खाना रखकर, तुम खाकर सो क्यों नहीं गई? गुस्से में आधा-तीहा खाया और सोने चले गये और पत्नी बिना खाये जाकर पैर दबाती हुई पति को मनाती रही और पुरुष बार-बार उसे रौदकर अपना गुस्सा उतारता रहा। यही पुरुष जब प्रेमी बनकर प्रेमिका के पास देर से पहुँचता है, तो रूठी प्रेमिका को मनाने के तमाम मिन्नते करता है, कान पकड़ता है कि दुबारा देर से नहीं आऊँगा। और वही पुरुष घरवाली की देर आने पर प्रेमभरी शिकायत पर चढ़ बैठता है, लगता है कि वह प्रेम की भाषा हीं नहीं समझता। ऐसा क्यों होता अधिकांश घरवालियों के साथ? इस समस्या पर गहन चिन्तन की विचार तन्द्रा रतिनाथ वर्मा की तब टूटी, जब पत्नी ने हाथ पकड़कर झकझोरते हुए कह, ‘‘लेटे-लेटे सो गये क्या? मैं कब से खाने के लिए आप का इन्तजार कर रही हूँ। कई बार बुलाया भी, लेकिन आप सो जो रहे हैं, सुने कैसे? आज भोजन नहीं करना है क्या? रोज भोजन नहीं बन पाता था कि आप कई बार पूछ चुके होते थे कि अभी भोजन नहीं बन पाया है क्या? आज भूख नहीं लगी है क्या? या कही किसी ने कुछ खिला पिया दिया है, जो निश्चिन्त पड़े है। अपना नहीं तो हमारा ही थोड़ा ख्याल कर लिया होता कि घर पर रहने पर बिना आप के खाना खाये मैं खाती नहीं हूँ।’’
अपनी गलती का एहसास होने पर भावनाजन्य अपराध बोध को मिटाने के लिए रतिनाथ जी पत्नी को बगल में खींचकर प्यार जताने लगे तो पत्नी ने कहा-
‘‘ये क्या कर रहे हैं? बच्चे अभी पढ़ रहे हैं, चलिए उठिए और भोजन कर लीजिए।’’
वर्मा जी उठे और पत्नी राधा के साथ भोजन के लिए चल दिये। भोजन करते समय वर्मा जी देखते क्या है कि उनकी थाली में कटोरा भर सब्जी और भरी गिलास दूध की है और राधा अपनी थाली में काछी-कूछी गयी, वह भी आधी कटोरी सब्जी और आधा गिलास दूध परोस कर लाई है। यह देख वर्मा जी पूछा- क्यों आज सब्जी और दूध कम था क्या? जो तूने बहुत कम लिया है।’’
‘‘नहीं, दोनों पर्याप्त मात्रा में थे, लेकिन सब्जी अच्छी बनी थी, इसलिए बच्चे माँग कर ज्यादा खा गये और दूध की दिन में एकाधबार ज्यादा चाय बन जाने से कमी हो गयी।’’
‘‘अपने हिस्से में ही तूने क्यों कम किया? हम दोनों बराबर कर लेते तो क्या हो जाता? चलो दोनों बराबर करो।’’
‘‘नहीं, आप खाइए, मेरा इतने से ही काम चल जायेगा।’’ ‘‘चलने को तो काम चल जायेगा, लेकिन केवल तुम ही काम क्यों चलाओ? मैं उसमें भागीदार क्यों नही।’’ 
‘‘क्योंकि आप मर्द है और कमाते हैं।’’
‘‘मर्द है तो क्या हुआ? क्या मर्द होते हुए ही सारे अधिकार और सुख-सुविधा के हकदार हो गये और तुम औरत होने के कारण अधिकार हीन और सुख-सुविधा से वंचित। कमाने का भी अर्थ यह नहीं कि हम भरपेट खाय और परिवार का कोई आधा पेट खाकर सोये। और तुम जो दिन भर कोल्हू के बैल की तरह घर-गृहस्थी के काम में लगी रहती हो। सुबह चार बजे जगती हो और रात 10 बजे सोती हो बीच में 10 मिनट कमर भी सीधी नहीं करती और खाने के नाम बचा खुचा आधा- अधूरा भोजन, कैसे जिन्दा रह पाओगी? मजाक करने की गरज से आगे कहे, ‘‘यदि हमसे पहले बुढ़ा गयी तो हमें ताक-झाँक करने को विवश कर क्या तुझे अच्छा लगेगा?’’ ‘‘बुढ़ायेगी हमारी सौतन, चलिए भोजन शुरू कीजिए। मुझे भूख लगी है। यह आपका मसखरापन अच्छा नहीं लगता है। राधा ने झल्लाकर कहा।
वर्मा जी माने नहीं और अपनी कटोरी की थोड़ी सी सब्जी पत्नी की कटोरी में डालकर दोनों गिलास का दूध बराबर कर दिया। जबकि राधा उन्हें बराबर रोकती रही, पर उसकी एक न चली। दोनों खाना खाये और सोने चले गये। राधा को पति का यह प्यार और विचार अन्दर तक छू गया। ऐसा नहीं कि वर्मा जी पहले पत्नी को प्यार नहीं करते थे, पर आज प्यार का अंदाज ही अनोखा था। यह केवल उसी से नहीं, अपितु पूरी औरत जाति से था। जिसको अधिकांश औरते मर्द से मांग भले न करे, पर उसके अन्तस में सम्मान और इस प्रकार के प्यार की भूख सदियों से सोई थी, जिसको वर्मा जी हक्की सी मधुर भाव ने जगाने का काम किया। राधा पति के इस व्यवहार से ऐसे अनोखे भाव से लबालब भर गयी। उसके जीवन में बहुत से सुख और सम्मान के अवसर आये थे, लकिन यह सुख और सम्मान सबसे भिन्न क्यों? खुद नहीं समझ पा रही है। वर्मा जी विस्तर पर जाते ही लेट गये और पत्नी घुटनों पर सिर टिकाये विचार की किस दुनिया में खोई है, वर्मा जी को तब पता चला, जब वह करवट बदलकर उसकी तरफ हुए। पत्नी को ऐसा सुध-बुध खोया देखकर वर्मा जी पूछा-
‘‘राधा क्या बात है? बैठी क्यों हो?’’
‘‘बस वैसे ही।’’
‘‘रोज तो विस्तर पर आई नहीं कि सो जाती थी, जब आज रोज से अधिक थकी हो। सोने को कौन कहे, सोचने में लगी हो। कुछ बात तो जरूर है, बताओ न, क्या बात है?
‘‘नहीं कोई बात नहीं है।’’
‘‘बात तो कोई जरूर है, इधर आओ सोओ।’’ कहकर वर्मा जी ने पत्नी को पास खीचकर सोने पर मजबूर कर दिया और चुचला मुचलाकर बहुत पूछने की कोशिश की, पर पत्नी हर बार मना करती रही। उसे भी समझ में नहीं आ रहा है कि क्या बताये और इस अनोखे सुख का कैसे वर्णन करे, वह इस अनोखे सुखानुभूति का न संयोजन कर पा रही है और न उसके लिए उपयुक्त शब्दों का चयन ही। इसी संकोच में वह वर्मा जी के कई बार पूछने पर चाहते हुए भी कुछ न कह सकी। कई बार पूछने के बाद राधा कुछ नहीं बताई तो वर्मा जी ने कहा, ‘‘नहीं बताना चाहती हो तो मत बताओ, मुझे नींद आ रही है और मैं सोने जा रहा हूँ।
राधा उठी पैर की तरफ सरककर वर्मा जी के पैर दबाने लगी। वर्मा जी अभी नींद की गोद में पहुँचे नहीं थे कि राधा का यह व्यवहार देखकर उनकी समझ में नहीं आ रहा था, उसे हो क्या गया है। उन्होंने जबरदस्ती बगल में खींचकर बाहों में भर लिया और कब सो गये पता ही नहीं चला।
राधा प्योर हाउस वाइफ तो है, लेकिन वेल क्वालीफाइड। पतिदेव के ऑफिस और बच्चों के स्कूल जाने के बाद घर के काम-धाम से छुटकारा पाने के बाद फोन से आठ-दस अपनी परिचित महिलाओं को फोन करके अपने घर बुला लिया। कई महिलाओं ने फोन पर ही पूछा, कोई विशेष आयोजन तो नहीं है, तो राधा उन सबसे कही, ‘‘ऐसी कोई बात नहीं है बस आप चली आइए।’’
सभी महिलाएं नियत समय से आ गई और आते ही पूछा, ‘‘ऐसी क्या इमरजेन्सी है, जो सबको आनन-फानन में बुला लिया।’’
‘‘कोई इमरजेन्सी नहीं है, बैठिए पानी-चाय कीजिए, फिर कुछ बातंे करते हैं।’’
‘‘बातें तो हमलोग करती ही रहते हैं। हमारी इन्हीं बातों को लेकर मर्दों द्वारा कहा जाता है कि दो औरतें एक साथ हो और चुप रहे तो वह विश्व का आठवां आश्चर्य होगा। इसके लिए तुमको सबको फोन करके आनन-फानन में बुलाने की क्या जरूरत पड़ी?’’ निर्मला जी ने थोड़ा उत्तेजित होकर कहा।
‘‘निर्मला दीदी का गुस्सा जायज है। हम औरते जहाँ भी इकट्ठा होती हैं, तो चौके चूल्हे, सामान की खरीदारी और इनकी-उनकी शिकायत के अलावा कुछ नहीं करती और खास करके महिलाओं के चरित्र की समीक्षा अधिक करती है। यदि ऐसी बातों के लिए मैं आप लोगों को बुलाई होती तो गलती करती। आज तो मैंने आपलोगों को एक विशेष प्रकार के विचार-विमर्श के लिए बुलाया है। जो हमारी पूरी औरत जाति की भलाई के लिए है, उसके हक और हुकूक के लिए है और पूरी औरत जाति को अज्ञान और मोह की निद्रा से जगाने के लिए हैं। राधा ने सब को बुलाने के मंतव्य का थोड़ा सा खुलासा करने और निर्मला जी के गुस्से को शांत करने की गरज से कहा। राधा की बात सुन सभी महिलाएं आश्चर्यचकित हो सकते मे आ गई और एक दूसरे का मुँह ताकने लगी। कुछ देर के लिए स्तब्धता छा गयी। स्तब्धता तोड़ते हुए निर्मला जी ने पुनः कहा।
राधा! आज तुझे अचानक हो क्या गया है? कैसी बहकी-बहकी बाते कर रही हो? मियां से कुछ खटपट तो नहीं हो गयी। यदि हो भी गई है तो कोई बात नहीं मियां बीबी में ऐसा होता रहता है। इसमें दूसरों को घुसेड़ना दामपत्य जीवन के लिए अच्छा भी नहीं होता। दूसरे रात में मियां-बीबी एक हो जाओगे और बुरे बनेंगे हम लोग। इसलिए अच्छा इसे रात के लिए छोड़ दो। मर्द मुएं जायेंगे कहाँ, उन्हें घूमफिर के हमारे पास ही आना है।’’
‘‘नहीं, दीदी न मुझे कुछ हुआ है, न मैं बहकी-बहकी बाते कर रही हूँ और न मियां से मेरी कुछ अनबन हैं। आज तक हम सभी लोग बहके है, क्योंकि अनेक बन्धनों से बाधकर हमारे स्वतंत्र अस्तित्व को नकारा जा रहा है और हम सब उसी में खुश है। हम सब कुछ होते हुए वास्तविकता में सामाजिक दृष्टि से हम कुछ नहीं है। टेलीविजन में एक विज्ञापन में एक ग्रामीण महिला से उसका नाम पूछा जाता है, तो वह अपना एक निश्चित नाम नहीं बताती है। कहती है कि बचपन में उसे लली कहकर पुकारा जाता था। विवाह होने पर ‘बहुरिया’ और बच्चा होने पर उसकी माई के नाम से पुकारा जाता है। कभी उसे अपने नाम से पुकारा ही नहीं गया तोवह अपना क्या नाम बताये। यही हालत हम सबकी है, लेकिन उसे देखकर हम पढ़ी-लिखी अधिकांश महिलाएं हँसकर टाल जाती है, पर इस पर थोड़ा सचेत होकर विचार करें, तो यह पूरी औरत जाति के गाल पर जोर का तमाचा है। इससे औरत जाति के अहित के साथ-साथ समानता का भी कितना अहित हुआ है? इस पर हमलोगों ने कभी फुरसत में विचार हीनहीं किया। रही मियां से कुछ होने की बात तो मुझे यह कहते हुए गर्व हो रहा है कि ये जो बातें जो आप लोगों को बहकी-बहकी सी लग रही है, वह उन्हीं के द्वारा मेरे मन में जगाई गई है और दुनिया के सारे मर्द मेरे मियां जैसे हो जाय, तो औरतों का बहुत सारा दुख-दर्द ही मिट जाय। राधा ने रात की सारी घटना को विस्तार से सबको बताया। एक बार फिर सन्नाटा छा गया। राधा की सब बातें तो धीरे-धीरे सभी महिलाओं के दिलो दिमाग में घुसती तो जा रही थी, लेकिन राधा ने जो अपने पति की प्रशंसा की तो प्रियंवदा जी को अच्छा नहीं लगा, क्योंकि उनको भ्रम हो गया है कि जितना अच्छा और प्रेम करने वाले उनके मियंा है उतना और किसी का मियां नहीं। इसी कारण अपनी खींझ़ को निकालते हुए उन्होंने कहा- ‘‘राधा, तुम्हारा मियां कब से इतना बढ़िया हो गया, उसे तो कई बार मैंने अन्य महिलाओं से हँस-हँसकर बात करते देखा है, अधिकांश मर्दुएं तो बेर जैसे होते हैं और ऊपर से मीठे-मुलायम और अन्दर से कठोर। झांसे में मत आना, नहीं तो कभी बहुत बड़ा धोखा खाओंगी, हाँ कहे देती हूँ। ‘‘प्रियंवदादीदी अपने मियां की तो आप बड़ी तारीफ करती है, क्या यह टिप्पणी उनके विषय में भी है? प्रियंवदा को आड़े हाथों लेते हुए कामिनी ने कहा।
अपने मियां के विषय में कहने का अवसर पाकर प्रियंवदा ने कहा, ‘‘वे तो सबसे अनोखे देवता सरीखे है। वह तो दूसरे सभी मर्दाें से भिन्न भौंरे की तरह मेरे ही इर्द-गिर्द घूमते रहते है। यदि सभी मर्द उनके जैसे हो जाय तो औरतो को रोना ही न रहे।’’
‘‘तो बड़ी दीदी आप भी मुगालते में रहती है, उनके विषय में मैंने ऐसा सुना है कि वे ऐसा पानी पीते हैं कि खुदा भी न जाने।’’ कामिनी ने कहा।
‘‘यदि खुदा नहीं जानता, तो तुम्हें कैसे पता चल गया। क्या तू खुदा से भी बड़ी है?’’
‘‘नहीं, दीदी मेरे खुदा से बड़ा होने का तो सवाल ही नहीं है। मैं तो आपसे भी बहुत छोटी हूँ। तालाब में डुबकी लगा कर पानी पीने वाले को भ्रम रहता है कि उसके पानी पीने को खुदा भी नहीं जानता है, लेकिन जब गले में मछली फँसती तो खुदा को कौन कहे सभी लोग जान जाते हैं। वे डुबकी लगाकर खूब पानी पीते है। उनके विषय में भी कुछ रोचक तथ्य तीसरी आँख से छन कर आये है, आदेश हो तो कहूँ।’’
बात आगे और बढ़ती देख उसे यही समाप्त करने की गरज से निर्मला जी ने दोनों को रोकते हुए कहा,‘‘आप दोनों लोग ईश्वर के लिए शांत हो जाइए। हम क्या करने आये थे और क्या करने लगे। इसी लिए तो औरतों को बदनाम किया जाता है। आप भी प्रियंवदा दीदी किसी दूसरे के मियां की तनिक भी प्रशंसा नहीं सुन सकती। वैसे राधा ने अपने मियां की प्रशंसा करने की गरज से तो प्रशंसा की नहीं, वह तो बात के प्रसंग में आ गया तो कह दिया। उसकी बात सुनी नहीं गयी और बहस को कहाँ से कहाँ ले गई। दूसरे किसी औरत से मर्द हंसकर बात कर लें और किसी औरत ने किसी मर्द से हँसकर बात कर लिया तो इसका अर्थ यह तो नहीं होता कि वह मर्द और औरत दोनों चरित्रहीन है। चरित्रहीनता कोई छूत की बीमारी तो है नहीं जो हंसकर बात करने और एक साथ आने-जाने से हो जाती है। किसी मर्द और औरत के विषय में इस प्रकार के गलत निष्कर्ष निकलना अच्छी बात नहीं है। दोनों सच्चे दोस्त भी हो सकते हैं, जैसे दो औरत और दो मर्द आपस में होते हैं।
राधा ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘यहाँ चार-छः लोग इकट्ठा होते हैं, तो इस तरह की कुछ ऐसी बाते हो जाती है, पर हमलोगों को अपना मुख्य उद्देश्य याद रखना चाहिए। मैंने आप लोगों को इसलिए यहां बुलायाहै कि परिवार और समाज निर्माण में महिलाओं की एक आधारभूत और मुख्य भूमिका होती है। उसे हम महिलाएं भी भूली रहती है और पुरुष प्रधान समाज तो उसे महत्व देता ही नहीं। वह हमारा कार्य है सन्तानोत्पत्ति और परिवार की सेवा। हम महिलाओं की ये दो भूमिकाएं ऐसी है, जो हटा ली जाय तो समाज में बहुत बड़ी अराजकता उत्पन्न हो जायेगी। कल्पना कीजिए यदि महिलाएं सन्तानोत्पत्ति के कार्य से विमुख हो जाय और बच्चों का पालन पोषण करना छोड़ दे, तो क्या होगा? सृष्टि का विकास क्रम ही रुक जायेगा। पश्चिमी जगत में कुछ उग्र नारीवादी आन्दोलनों के चलते कुछ महिलाएं सन्तानोत्पत्ति से विरत हो गयी है और अन्य कार्यों में महिलाओं की व्यस्तता के कारण बच्चे नर्सों द्वारा या बोर्डिंग स्कूलों में पल रहे हैं, जिसका दुष्परिणाम बच्चों में एकाकीपन, मानसिक विक्षिप्तता आदि के रूप में उभरकर पश्चिमी समाज के लिए अभिशाप बनता जा रहा है।
सभी उपस्थित महिलाएं राधा की मुंह की तरफ देखती जा रही है। उन सबों के समझ में नहीं आ रहा कि रोज इतनी शांत दिखने वाली राधा में इतनी प्रखरता कहां से आ गयी। वैसे सबको पता है वह अच्छे परिवार की और अधिक पढ़ी-लिखी है, पर उसके इस रूप से अभी कोई परिचित नहीं था। उसकी सारी बातें सामान्य स्तर से ऊँचा तो हैं, पर सबकी समझ में आ रही है। कुछ को तो इस बात की जलन हो रही है कि ये बातें उनके दिमाग में क्यों नही उपजी, हम सब भी तो उसी के बराबर पढ़ी-लिखी है, पर बाजी आज राधा के हाथ है।
......सन्तानोंत्पत्ति में मर्द केवल निमित्त मात्र होता है। इसे यदि दार्शनिक शब्दावली में कहे तो पुरुष निमित्त कारण में भी गौड़ भूमिका में होता है। औरत की निमित्त कारण में भी मुख्य भूमिका के साथ-साथ उपादाकारण भी है। औरत की कोख में उसी की मज्जा और रुधिर से संतान वजूद में आता है और औरत के हाव-भाव तथा आचरण सबका प्रभाव संतान पर पड़ता है। सेहद और सौन्दर्य दोनों को मातृत्व के लिए अर्पित कर नौ महीने अपनी कोख में बच्चे को धारण करती है। और औरत अंत में असह्य प्रसव पीड़ा को सहन कर बच्चे को जनम देती है, जिससे संतति शृृंखला आगे बढ़ती है।आप सबने बच्चे पाले हैं, कितने कष्ट और तकलीफ सह करके। रहती कही थी, लेकिन ध्यान बच्चे पर रहता। बच्चा रात में बिस्तर पर पेशाब कर देता, तो भींगे स्थान पर स्वयं सो जाती और सूख पर बच्चे को सुला देती थी और पूरा विस्तार भीग गया, तो बच्चे को अपनी छाती पर सुला देती थी। क्या यह सेवा और समर्पण और किसी तरह से संभव है? नहीं ना। बच्चे की देखभाल की वजह से पुरुष पर हम उतना ध्यान नहीं दे पाते जितना पहले देते थे, तो ऊपर से किसी मर्द से चक्कर चलने का लांक्षन पति और लगा देता है।
आपकी इस महत्वपूर्ण भूमिका को पुरुष प्रधान समाज ने सदैव उपेक्षित किया। पुरुष जब गुस्से में होता है, तो औरत के इस कार्य को हेय दिखाने के लिए औरत से कहता है कि तूने जिन्दगी में बच्चा पैदा करने के सिवा और किया ही क्या है? चार पैसे बाहर से कमाकर लाती तो पता चलता कि पैसा कैसे पैदा किया जाता है? हमेशा पुरुष ने हमारे इस महत्वपूर्ण कार्य की अपेक्षा बाहर पैसा कमाने के अपने कार्य को श्रेष्ठ साबित किया। पुरुष औरत को पहले भोगता है और खुदा न खास्ता पुरुष के कारण से ही बच्चा नहीं होता है, तो भी उसके औरत को ही दोषी बनाया जाता है। पुरुष घरवाली को अपने पैर की जूती समझती है और बाहरवाली पर जान छिड़कता है।’’
राधा की बात अभी जारी ही थी कि इतने में निर्मला जी के घर से फोन आया उनके बेटे का कि मम्मी जल्दी घर चली आओ, कुछ मेहमान आ गये हैं, उनके लिए नाश्ता तैयार करना है। फोन से निपटते ही निर्मला जी ने कहा, ‘मुझे घर जल्दी बुलाया है, क्यों कि कुछ मेहमान आ गये हैख् उनके लिए नाश्ता तैयार करना। नाश्ता तैयार नहीं करना होता, तो मुझे नही बुलाया जाता। मुझे घर जाना पड़ेगा, लेकिन तुमने राधा हमलोगों को मोहनिद्रा से जगा दिया है। हम जगत रचने के महान कार्य करने के बाद भी अज्ञानतावश अपने को हेय समझती रही। मैं कल अपने घर पर और लोगों को भी बुलाती हूँ। आपलोग भी आएगा वहाँ आगे और विचार करेंगे।’’
‘‘दीदी रुक जाइए मैं चाय बनाकर लाती हूँ, पीकर जाइएगा इतने दिनों बाद आप लोग आई है और मैं कुछ अच्छी तरह से सेवा सत्कार भी न कर पाई। एक कप चाय पिला के लगा दिया इस मगजमारू काम में।’’ राधा ने शिष्टाचार में कहा।
कृतार्थ होते कामिनी ने कहा, ‘‘दीदी आज तो आपने हमलोगों के अन्दर की औरत को जगा दिया, औरत होने के मायने और महत्व को समझा दिया। चाय नाश्ता की औपचारिकता तो हर जगह निभती रहती है।’’ इस वायदे के साथ कि कल हम सभी लोग निर्मला जी के यहाँ मिलते है, सभी महिलाएं चली गयी।
रतिनाथ जी के ऑफिस में उनके वॉस डॉ0 रजनीकान्त श्रीवास्तव महिला लिपिक को को इसलिए फटकार रहे थे कि ऑफिस बन्द होेने से एक घण्टा पूर्व चली गयी थी जिसके कारण उनका कुछ कार्य अधूरा रह गया था। महिला लिपिक बार-बार सफाई देते हुए कह रही थी-
‘‘सर मेरे बेटे की अचानक हालत खराब हो गयी, घर से फोन आया, उस समय आप किसी से बात कर रहे थे। मुझे तुरन्त निकलना था, इसलिए बड़े बाबू से कहकर चली गयी।’’
‘‘आप लोगों को कुछ न कुछ रोज बहाना मिल जाता है, ऑफिस से जल्दी घर जाने का। ऑफिस को खाला का घर समझ रखा क्या? जब चाहा आ गये और जब चाहा चले गये।’’
‘‘रीयली सर, मेरे बेटे की तबियत खराब थी। मैं झूठ नहीं बोल रही हूँ।’’
‘‘कोई अपने से कहता है कि झूठ बोल रहा हूँ। परिवार और निजी परेशानियों का बहाना बनाकर आप लोग ऑफिस से जाती रहती है और छुट्टी न दो आंसू बहाना शुरू कर देती हैं। सरकार साली कितनी बेवकूफ है, ये ऑफिस में काम भी नहीं करती है और ऊपर से तीन-चार महीने की मैटरनीटी लीव भी देती है।’’
पास बैठे रतिनाथ जी को सम्बोधित करते हुए बॉस ने कहा, ’’आप ही बताइए रतिनाथ जी इस प्रकार आफिस कैसे चल पायेगा। ऑफिस की चार-पाँच महिलाएँ ऑफिस का भट्ठा बैठाकर ही दम लेगी।’’
महिला लिपिक किंकर्त्तव्यविमूढ़ खड़ी है और बॉस महिलाओं को तो कभी सरकार को, तो कभी लौटकर पास खड़ी उस महिला पर टिप्पणी किये जा रहे है। रतिनाथ जी को बॉस की इस प्रकार की हरकत बहुत नामवार गुजर रही है, लेकिन अपने को संयमित करते हुए कहा, ‘‘सर, ये अन्य दिनों को जैसी रही हो, मैं नहीं जानता, लेकिन कल रीयली इनका बेटा बीमार था, मुझे ऑफिस से जाते हुए ये डॉक्टर के पास से दिखाकर लौटती हुई मिली थी। इसलिए इन्हें आज जाने दिया जाये।’’ ‘‘ठीक है आप जाइए, लेकिन ऑफिस के कामांे को भी करने में मन लगाया कीजिए, क्योंकि इसी से आपकी रोजी-रोटी चलती है।’’
लिपिक महिला जब चली गयी, तो रतिनाथ जी कहा, ‘‘सर, महिलाओं और खासकर नौकरी पेशा महिलाओं पर हमलोग सहानुभूतिपूर्वक कभी विचार नहीं करते और तनिक भी अवसर मिलने पर उल्टी-सीधा चार्ज लगाने से भी नही चूकते।......
बात को बीच में टोकते हुए बॉस ने कहा, ‘‘आपके कहने का मतलब क्या है? ये जो भी उल्टा-सीधा करे वह सही है, पुरुषों को उस पर कुछ नहीं कहना चाहिए।’’
‘‘नहीं सर, मेरा ऐसा कोई अभिप्राय नहीं है। मैं तो ये कहना हूँ कि इनको कुछ कहने से पूर्व इनकी परिस्थितियों पर विचार कर ले, तो इनको समझने में हम सबको सहूलियत होगी और इनके साथ न्याय हो सकेगा। जैसे सर, मैं आप की मैडम सरिता जी को लेता हूँ। वह भी एक नौकरी पेशा महिला हैं। आपसे पहले घर में सुबह जागती होगी, प्रातः क्रिया से निवृत्त होने के बाद आपके लिए बेट टी बनाती होगी। आप फ्रेस हुए और सुबह की सैर पर निकल जाते होंगे। और वह बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करती होगी, सास, ससुर और आपके लिए नाश्ते का इन्तजाम करने के बाद आप सबको ले जाकर नाश्ता देती होगी। देती है कि नहीं देती है।’’
‘‘स्वयं नाश्ता नहीं करती होगी, लग जाती होगी लंच की तैयारी के लिए और आप अखबार से छुटकारा पाकर ऑफिस के तैयार होने लगते होंगे। इसी बीच सरिता जी लंच को तैयार कर स्वयं नहा धोकर आपके साथ लंच करती होगी और आपके साथ ऑफिस के लिए निकल जाती होगी। शाम को ऑफिस से लौटने पर फिर चाय बनाकर पूरे परिवार को पिलाती होगी और शाम के भोजन के लिए सब्जी खरीदने से लेकर सब काम वही करती होगी और आप सन्ध्या भ्रमण के पश्चात् टीवी से चिपक जाते होंगे और डिनर के बाद आप सोने चले जाते होंगे। वह डिनर के बाद चौका-चूहा संभालने के बाद आप के पास आती होगी तो आप भूखे भेड़िये की भाँति टूट पड़ते होंगे।’’
‘‘आपको हमारे घर का ये सब कैसे मालूम हुआ। क्या कभी सरिता ने आपसे शिकायत के तौर पर बताया हैै।’’ ‘‘नहीं सर, ये आपके ही घर की बात नहीं है, यह पूरे भारतीय समाज की स्थिति है। सरिता जी को इतनी फुर्सत कहॉ जो आपकी शिकायत कर सके। आफिस का बॉस खण्डूस होगा तो उनको ऊपर से टेन्शन।’’
बच्चा बीमार हो जाय, तो सरिता जी ही दिखाने जाय डॉक्टर के पास, कोई खरीदारी करनी हो तो सरिता जी जाय। अब आप ही बताइए इतना सब अन्दर से बाहर का तनाव झेलने के बाद औरत की क्या मानसिक स्थिति होगी। कभी आपने इस पर गौर किया।’’
‘‘नहीं भाई रतिनाथ जी, मैंने तो इस प्रकार कभी सोचा ही नहीं और ऊपर से सरिता को उल्टी-सीधा और सुनाता हूँ। आज तो आपने घरवाली के प्रति एक नई दृष्टि दी। अभी कुछ देरे पहले मैं उस महिला लिपिक को क्या-क्या सुनाता रहा, कभी उसकी स्थिति को समझने की कोशिश ही नहीं की। सच बताओं ऐसी दृष्टि तुझे कहाँ से मिली, जबकि मैं तुमसे अधिक क्लाइफाइड एम0ए0, पी-एच0डी0 हूँ। मैं तुम्हारे जैसा क्यों नहीं सोच पाया।’’
‘‘सर, पढ़ना-लिखना और बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ मायने नहीं रखती है। ये बस नौकरियों के लिए ही अनिवार्य होती है। सोचने के लिए ये अनिवार्य नहीं है, अनिवार्य है एक दृष्टि, जो कम पढ़े-लिखे में भी हो सकती है और अधिक पढ़े-लिखे में नहीं भी हो सकती है। कबीर कौन से पढ़े थे, लेकिन धार्मिक अन्ध विश्वास और सामाजिक कुरीतियां पर अपनी सोच का ऐसा प्रहार किया वैसा बड़े-बड़े किताबी ज्ञान और डिग्री वालों ने नहीं सोचा होगा। और आजकल सर, लोग शिक्षित नहीं साक्षर मात्र होते हैं। समझ का विकास संगत और चिन्तन से होता है।’’ ‘‘तुमको कैसे हुआ?’’
‘‘एक दिन मैं गौर से अपनी पत्नी की दिनचर्या पर विचार किया। तो बात परत-दर-परत सामने आती गयी और तब लगने लगा कि पत्नी के बिना तो परिवार एक क्षण भी न ही चल पायेगा और ये घरवालिया ही परिवार की धुरी है। सर, इसी से कहा गया कि ‘बिन घरनी धरभूत के डेरा’ और हमलोग है कि घरवालियों को बिना वेतन की जीवन भर की नौकरानी समझते हैं। हर तरह से उनका शोषण करते हैं और अपमानित करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते हैं और घरवालियां है कि पति को परमेश्वर मानकर जन्म जन्मान्तर तक के साथ की ईश्वर से मन्नते मानती रहती है। करवाचौथ से लेकर क्या-क्या पति-पूजा का व्रत रहती है। हममें से अधिकांश घरवालियों के श्रद्धा और पति परमेश्वर की शक्ति को धता बताकर बाहरवालियों के चक्कर में करवाचौथ के दिन भी देर से पहुँचते या पहुँचते ही नहीं। अब आप ही बताइए सर, हम लोग घरवालियों के साथ ज्यादती नहीं करते। गलती परिवार का कोई करे, चाहे बच्चे, बूढ़े पर दोष हम घरवाली पर लगाते हैं कि तुम्हें देखना चाहिए।’’
अधिक समय हो जाने पर झेपते हुए रतिनाथ जी ने कहा, ‘‘अरे सर, आज तो हमने आपका बड़ा समय ले लिया। बहुत सारी फाइलें आपके मेज पर निपटाने के लिए पड़ी है और मेरे टेबुल पर भी बहुत सारा काम पड़ा है। आज की धृष्टता के लिए क्षमा करेंगे। मैं चला।’’ ‘‘अरे भाई रतिनाथ जी, आपने समय लिया नहीं,समय दिया है। फाइलें तो आज यहाँ नहीं, तो घर पर या कल निपट जायेंगे, लेकिन जीवन को समझने के सूत्र जो तुमने बताये, वे कहाँ मिलते हैं। आज तक तो मैं गधे की तरह तमाम डिग्रियों के भार ढोते रहा हूँ। असली शिक्षा और जीवन दृष्टि तो आज मिली। तुमने आज मुझे सोते से जगा दिया। पुरुषीय अहंकार का मेरी दृष्टि पर एक आवरण जो पड़ा था, उसे हटा दिया। एक प्रकार से मेरे वैचारिक जीवन के जन्मदाता हो। मैं इसके लिए तुम्हारा बहुत बहुत आभारी हँू।’’
‘‘सर, मैं इस लायक कहाँ। यह सब आपकी अपनी वैचारिक सम्पन्नता है, जो मेरे जैसे अदने आदमी के निमित्त से प्रखर हो गयी।नहीं तो मेरी ऐसी बातें सुन बहुत से लोग मुझे मेहरवस्सा, जोरू का गुलाम न जाने क्या कहते। अच्छा सर, अब मैं अपने केबिन में चल रहा हूँ। नमस्कार।’’
रतिनाथ जी के चले जाने के बाद भी डॉ0 रजनीकांत श्रीवास्तव जी इसी विषय पर सोचते रहे और पूर्व में की गयी बेवकूफियों पर उनको ग्लानि हो रही है। इसी सन्दर्भ में उनको अपने स्वर्गीय ताऊ गिरधारी लाल की याद आई, जो महिलाओंके प्रति किसी प्रकार की सहूलियत के शख्त विरोधी थे और बात-बात पर कहा करते थे कि- ‘‘महावृष्टि चल फूट कियारी। जिनि स्वतंत्र होइ विगरे नारी।’’ और ढोल गवार शूद्र पशु नारी। ये सब ताड़ने के अधिकारी।’’ वे मानते थे औरत को किसी प्रकार की छूट दिया नहीं कि वह बिगड़ी। औरत को जितना लात घूंसे से अपने वश में रखोगे, तो अच्छी तरह से काम करेगी। इसीलिये वे ताई जी को हर बात पर डांटते-डपटते रहने के साथ कभी-कभार मारने से भी नहीं चूकते। वह भी बेचारी बेबस होकर सब सहती रहती थी। इसी प्रताड़ना का यह परिणाम हुआ कि उनके लड़के बाद में थोड़ा सयाने होने पर इतना स्वतंत्र हो गये कि सब ताऊ जी की सोच के विरुद्ध चले गये और वे कुढ़ते-कुढ़ते दुनिया से चले गये। इसी वैचारिक सोच में ही थे कि चपरासी ने आकर कहा- ‘‘साहब जी, चार बजे हैं, ये फाइल आलमारी में रख दूँ या मेज पर ही रहने दूँ।’’
‘‘नहीं, इसे आलमारी में रखो और आफिस बन्द करो, अब घर चलेंगे।’’
घर आये, तो पत्नी रोज की भांति चाय बनाकर लायी और रखकर जाने लगी, तो श्रीवास्तवजी ने कहा- ‘‘तुमने चाय पिया।’’
‘‘अभी कहाँ।’’
‘‘तो यही लाओ और मेरे साथ पिओ।’’
’’अभी तो मैं सब्जी लेने जा रही हूँ, आकर पी लूँगी। तब तक बाबूजी और अम्मा जी भी चाय पी लेंगे।’’
‘‘जाओ अपनी चाय लाओ और मेरे साथ पीओ। सब्जी मैं ला दूँगा। बाबूजी और अम्मा को भी चाय भेजवा दो।’’
‘‘मैं जाकर देती हूँ, कौन यहां है जिससे भेजवाऊँगी, बच्चे तो खेलने या ट्यूशन गये हैं।’’
‘‘चाय दो मैं दे आता हूँ।’’
पत्नी तीन कप चाय लायी और एक कप चाय मेज पर रखकर दो कप चाय स्वयं ले जाने लगी, तो उन्होंने ट्रे अपने हाथ में पत्नी से लेकर कहे, ‘‘तुम यहां बैठो, मैं उनको लॉन में चाय देकर आता हूँ।’’
पत्नी तब तक चाय पीने का इंतजार करती रही, जब तक वह आ नहीं गये और सोचती रही आज इनके व्यवहार में इस प्रकार का परिवर्तन कैसे? बहुत विचार किया, लेकिन कुछ भी सूत्र हाथ नहीं लगा। श्रीवास्तवजी के आने पर दोनों चाय पीना आरम्भ करते हैं। पत्नी चाय पीते जा रही है और श्रीवास्तव जी को देखती जा रही है। पत्नी द्वारा इस प्रकार देखे जाने पर श्रीवास्तव जी पूछते हैं- ‘‘इस प्रकार क्या देख रही हो? इससे पहले कभी देखा नहीं था क्या?’’
‘‘देखती तो रोज हूँ, लेकिन इस रूप में आज पहली बार देख रही हूँ।’’
‘‘रूप में मेरे क्या हो गया है। रोज जैसा तो हूँ। किस एंगिल से तुझे परिवर्तित नजर आ रहा हूूँ।’’
‘‘रोज तो एक मीठे बोल के लिए तरस जाती थी और आज है कि मक्खन पर मक्खन लगाये जा रहे हैं, इससे बड़ा परिवर्तन और क्या होगा।’’
‘‘ये मक्खन लगाना नहीं है। मेरा जो कर्तव्य है जिसे आज तक भूला था, उसका निर्वाह कर रहा हूँ और तुम्हारा जो अधिकार है, उसे दे रहा हूँ।’’
‘‘लेकिन इतना बड़ा परिवर्तन हुआ कैसे? कोई साधू महात्मा मिल गये थे क्या? या कहीं चोट खाये हैं, किसी बाहरवाली से जिसकी प्रतिक्रिया में घरवाली पर प्रेम प्रदर्शित कर रहे हैं।’’
’’तुमने जितने भी कारण गिनाए उनमें से कोई नहीं है। हुआ यह कि आज मैं एक महिला टाइपिस्ट को कल आफिस से बच्चे की बीमारी का कारण बताकर चले जाने की वजह से डांट-फटकार रहा था, वही बैठे थे रतिनाथ जी जिनको मेरी बात बुरी लग रही थी, तो उन्होंने ही बताया कि वास्तव में इनके बच्चे की तबियत खराब थी, मैं इन्हें डॉक्टर के यहां से बच्चे को दिखाकर आते हुए देखा था। इस पर मैंने उस महिला को शख्त हिदायत देकर जाने को कहा। महिला के जाने के बाद रतिनाथ जी ने घरवालियों की समाज निर्माण की आधारभूत भूमिका का ऐसा पक्ष प्रस्तुत किया कि मुझे अपने आप पर शर्म आने लगी। अब तो मुझे केवल अपनी ही नहीं, सभी घरवालियों के प्रति सहानुभूति जगी है, जिसको तुम मेरा परिवर्तित रूप बता रही हो। अच्छा अब थैला लाओ, सब्जी ला दूँ।’’
श्रीवास्तव जी थैला लिये और सब्जी के लिए चल दिये। उनको जाने के बाद सरिता ने रतिनाथ जी को फोन लगाया। फोन पहले राधा ने उठाया।
‘‘हैलो! राधा मैं सरिता बोल रही हूँ। भाई साहब हैं, जरा उनको फोन देना तो।’’
‘‘दीदी हमसे नहीं, सीधी उन्हीं से बात करेंगी। हमसे कोई गलती हो गयी क्या?’’
‘‘तुमसे बाद में निपटूँगी, पहले भाई साहब को फोन दें।’’
‘‘दीदी उनसे कुछ गलती हो गयी है क्या?’’
‘‘ये बाद में बताऊँगी, पहले उनको फोन दो।’’
वहीं पास में बैठे रतिनाथ जी ने कहा- ‘‘किसका फोन है राधा’’। 
‘‘सरिता दीदी का फोन है। आपको बुला रही है, जल्दी कीजिए। गुस्से में लग रही है।’’
फोन लेकर रतिनाथ जी ने कहा- ‘‘हैलो! भाभी नमस्कार।’’
‘‘नमस्कार भाई साहब, आज आपने इनको क्या पिला दिया है कि आपके मुरीद हो गये हैं और इनका तेवर ही बदल गया है। उनके लाइफ स्टाइल में टोटली चेंज आ गया है। मेरे ऊपर ऐसा जान छिड़क रहे हैं, जैसे मैं उनकी घरवाली न होकर बाहरवाली हूँ। मेरी तबियत खराब रहने पर भी जो सब्जी लेने नहीं जाते थे, आज मुझे रोककर स्वयं सब्जी लेने गये है। इस सबके लिए मैं आपकी बहुत आभारी हूूँ।
‘‘भाभी जी अभी तो दिन है, रात आने दीजिए और आभारी रहेंगी।’’
‘‘आप भी भाई साहब, मजाक पर उतर आये।’’
‘‘मेरी इतनी मजाल कहां जो बॉस की बीवी से मजाक करूँ, मियां से कह करके भूंस भरवा देगी। मैं वास्तविकता बता रहा हूँ।’’
‘‘अच्छा ठीक है, अब फोन राधा को दीजिए।’’
’’लो भाभी तुमसे बात करना चाह रही हैं।’’
’’हाँ दीदी, बड़े जल्दी गुस्सा उतार दिया। उनसे कुछ भूलचूक हो गयी हो, तो माफ करियेगा।’’
’’अरे पगली!वह तो मैं बनावटी गुस्से से तुझे सस्पेंस में डाल रही थी। आज तुम्हारे मियां ने मेरे मियां का हृदय परिवर्तन कर दिया है कि अब वे मेरे पति के साथ-साथ दोस्त भी हो गये हैं। इसके लिए मैं तुम दोनों की जीवन भर कृतज्ञ रहूँगी। कभी फुर्सत लगे, तो उन्हें लेकर घर आओ।’’
‘‘जरूर आऊँगी दीदी।’’
‘‘अपने मियां का ख्याल रखना, हीरा है हीरा। अच्छा अब फोन रखती हूँ।’’
पति की तरफ मुखातिब होकर राधा ने कहा- ‘‘आपने तो घरवालियों को देवी बनाने का मिशन बना लिया है।’’
’’देवी नहीं, दोस्त।’’
’’हाँ-हाँ वही।’’
’’नहीं, दोनों में बहुत अंतर है। देवी बनाने की ‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।’’ की मनुस्मृति आदर्श तो सुना ही है, पर तुम्हारी जानकारी के लिए यह और बता दूँ कि मनुस्मृति ने औरत के ऊपर जितने प्रतिबन्ध लगाये हैं उतना और किसी ने नहीं। एक में पूजा की भावना है जो मात्र दिखावा बनकर रह गई है और दूसरे में समान अधिकार देने की बात है, जो आज के समाज के लिए अति आवश्यक है।’’
‘‘तभी तो सरिता दीदी, आपका बखान करते थकती नहीं थी और अंत में कहा कि तुम्हारा मियां हीरा है, उसे संभाल के रखना। अच्छा अब मैं चलती हूँ भोजन बनाने। बच्चे खेल के आयेंगे, तो उन्हें अधिक देर तक भूखा नहीं रखा जा सकता।’’
निर्मला जी के यहाँ बहुत सारी महिलाएं एकत्रित हैं, चूँकि निर्मला जी एक महिला डिग्री कॉलेज में मनोविज्ञान की प्राध्यापिका है। जब राधा के यहां आई थी, तो उस दिन भी उनका कॉलेज बन्द था। आज तो रविवार है, इस कारण उनके कॉलेज की बहुत सारी महिलाएं यहां आई हुई है। राधा थोड़ा विलम्ब से पहुँच रही है, तो प्राध्यापिकाओं को एक शुद्ध हाउस वाइफ का इंतजार अच्छा नहीं लग रहा है, लेकिन जब आयोजिका महोदय ही इंतजार कर रही हैं, तो अन्य की मजबूरी है। कुछ देर बाद राधा आई तो सबसे पहले उसने निर्मला जी से देरी के लिए क्षमा मांगी। सभी लोग विचार विमर्श के लिए बैठे, तो निर्मला जी ने भूमिका के तौर पर कहा- ‘‘आज मेरा सौभाग्य है कि मेरी शार्ट नोटिस पर आप सब लोग मेरे घर पर पधारे। मैं इसके लिए आप सबकी आभारी हूँ। मैं आप सबको इकट्ठा इसलिए की हूँ कि कल राधा की शार्ट नोटिस पर हम सब करीब आए। दस महिलाएं इनके घर इकट्ठा हुई थी। वहां राधा के प्रस्ताव पर महिलाओं के सन्तानोत्पत्ति और उनके द्वारा घर में किये जाने वाले श्रम पर कुछ हल्का फुल्का विचार हुआ। खास करके इस सम्बन्ध में राधा के जो विचार हैं, उसकी जो सोच है, उसका खुलासा हुआ। इनके विचारों को सुनकर हम सभी लोग आश्चर्यचकित और गद्गद थे। कुछ निजी व्यस्तताओं के चलते विचार विमर्श को यहां इकट्ठा होने के संकल्प के साथ जल्दी खत्म किया गया। कल की अपेक्षा आज अधिक संख्या में हम लोग इकट्ठा हैं, तो मैं बात को आगे बढ़ाने के लिए सबसे पहले राधा से कहूँगी कि वह कल के अपने विचार को आज पुनः खुलासा करे, जिससे कल के विचार विमर्श को आज के विचार-विमर्श से जोड़ा जा सके।’’
राधा उठी और सबका अभिवादन करते हुए कहा- ‘‘यहां पर एक से एक कॉलेज की विद्वान प्राध्यापिकाएं बैठी है। निर्मला जी ने विषय का खुलासाकर दिया है। मुझे शुद्ध हाउस वाइफ की इतनी औकात कहां कि आप लोगों के सामने कुछ बोल सकूँ।’’
राधा के ऐसा कहने पर कुछ प्राध्यापिकाओं का अहं थोड़ा बहुत संतुष्ट हुआ, जिससे वे सहज सी हुई। निर्मला जी ने कहा- ‘‘यह विचार की गंगा जो तुमसे बही है, उसे यहां भी दिखना चाहिए। हम लोग तो अपनी बात कहेंगे ही, पहले तुम अपनी बात शुरू करो।’’
राधा ने निर्मला जी का आदेश पाकर कल के अपने विचार आज भी यहां रखे। सुनकर नयी महिलाएं भी आश्चर्यचकित। तब उनके समझ में आया कि निर्मलाजी इसको इतना भाव क्यों दे रही थी। कुछ महिलाओं को तो उसकी वैचारिक सम्पन्नता से स्पर्धा हो रही है और कुछ जल-भुन भी गयी। जलने-भुनने वालियों में से एक थी कादम्बिनी जी, जो खड़े होते हुए कही, ‘‘राधा जी घरवालियों के इन दोनों कार्यों को जो महिमामण्डित किया है और सारा दोष पुरुषों के मत्थे मढ़ते हुए दिखाया है कि पुरुष नारियों का शोषण करते हैं, परिवार की सेवा में किये गये श्रम को महत्व नहीं देते हैं और नारियों को अपने बराबर अधिकार नहीं देते हैं। मैं राधाजी से और इनकी बातों पर तालियां बजाने वालों से पूछना चाहती हूँ कि हमारे बीच की राधाएं जब पुरुष पर डोरे डालती है। सँज-धज कर अपने हाव-भाव और अंग-प्रदर्शनों द्वारा पुरुषों को काम का खुला निमंत्रण देती है। पुरुष को अपने रूप के मद में पागल बनाकर ठगती रहती है और अंत में दूध में पड़ी मक्खी भांति निकाल बाहर फेंकती है और दूसरा मुल्ला ढूंढ़ने में लग जाती है। पुरुष का घर बर्बाद करने वाली भी ये अधिकांश घरवालियांे ही होती है। इनके विषय में राधा जी क्या कहेंगी?’’
राधा पुनः खड़ी होकर कहती है, मैं कादम्बिनी जी की बात से सहमत हूँ कि समाज में कुछ ऐसा होता है, लेकिन यहां के प्रस्तावित विषय का इससे घालमेल करना उचित नहीं। मेरे कहने मात्र का अर्थ यह है कि घरवालियों के इन दोनों कामों को समाज नकारता है, जबकि ये दोनों कार्य समाज निर्माण की मुख्य आधारशिला है। इन दोनों के बिना परिवार और समाज की कल्पना कितनी विकृत होगी, इसका सहज अनुमान आप लगा सकती है। घरवालियों का कार्य अपनी जगह है और बाहरवालियों का काम अपनी जगह है, जैसे सूर्पणखा के कार्य या चरित्र से सीता के कार्य या चरित्र की महत्ता कम नहीं होती है। उसी प्रकार बाहरवालियों के चरित्र से घरवालियों के चरित्र पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता है। दूसरी तरफ बाहरवालियों को जो देखने में लगता है कि वह पुरुष को ठगती है, उनका शोषण करती है, पर थोड़ा गहराई में जाकर देखिए तो आप को पता चलेगा कि यहां भी औरत ही ठगी जाती है। स्वभाव से कई स्त्रियों से प्रेम करने वाला पुरुष अपने पैसे के बल पर औरत को अपनी भोग की वस्तु बनाता है। दारू और दारा की बात तो आप लोगों ने सुनी होगी, औरत की गणना वस्तु के रूप में करके भोगता है पुरुष आपको बाहरवालियों के रूप में और आप को भ्रम होता है कि बाहरवालियां उसे भोग रही है। इन्हीं पुरुषों द्वारा बाहरवालियों को उपाधि मिलती है, रण्डी-वेश्या, विषकन्या और काल गर्ल जो अपने आप में घृणास्पद और गाली है। आप ही निर्णय कीजिए शिकारी कौन है और शिकार कौन, रही राधा की बात तो राधा उस प्रेम की पराकाष्ठा है, जिसमें शारीरिक कामजनित सम्बन्ध कुछ मायने नहीं रखता। वह अपने प्रेमी के लिए अपना सबकुछ न्यौछावर कर देती है। राधा तो कृष्ण की सर्वभवन्-सामर्थ्यरूपा शक्ति का नाम है। राधा मीरा है जो अपने प्रेमी कृष्ण के लिए सबकुछ छोड़ देती है। राधा तो सांसारिकता की धारा को आध्यात्मिकता की तरफ प्रवृत्त होना है। अब आप ही बताइए राधा गलत, मीरा गलत, घरवालियां गलत या और कोई? मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि औरत का विकसित रूप मां का है और सारे रूप उसके जीवनयात्रा के पड़ाव है। घरवाली उसी माँ का रूप है।’’
राधा की बात सुन कादम्बिनी जी का सिर नीचे झुका, तो ऊपर उठने का नाम ही नहीं ले रहा है और उपस्थित सभी महिलाएं बड़ी देर तक तालियां बजाती रही। उन महिलाओं में एक महिला खड़ी होती है और पूछती है कि- ‘‘राधा जी ने आपने घरवालियों को मां का रूप बताया है, लेकिन कुछ घरवालियां अपने पति और बच्चों पर ऐसा हॉवी रहती है कि उनके साथ नौकरों जैसा व्यवहार करती है। जबकि माँ ऐसा कभी व्यवहार नहीं करेगी। ऐसी महिलाओं के विषय में आपका क्या कहना है?’’
‘‘देखिए महोदया, ऐसी महिलाएं पुरुषीय स्वभाव की शिकार हो गयी है, जिसके चलते उनका व्यक्तित्व विकृत हो गया है। ऐसी महिलाएं महिला तो रहती नहीं, पुरुष भी नहीं बन पाती है। किसी भी वस्तु का विकृत रूप कितना भयानक होता है, वह तो आप सब लोग जानती है। पर ऐसा इक्का दुक्का उदाहरणों से घरवालियों की मातृत्व भावना कलंकित नहीं होती है। मुझ सामान्य सी महिला को आप लोग जैसी विद्वान महिलाओं ने झेला, इसके लिए मैं आप सबकी आभारी हूँ। अब निर्मला दीदी आप लोग से कुछ कहेंगी।’’ अपनी बात समाप्त कर राधा अपने स्थान पर बैठ जाती है।
निर्मला जी उठती उसके पूर्व सरिता जी जो कुछ देर से आई थी। उठकर राधा को बहुत सारा साधुवाद देते हुए कही- इसके मियां ने तो मेरे अक्खड़ मियां को ऐसा परिवर्तित कर दिया है कि वह मुझे घरवाली कम बाहरवाली अधिक मानने लगे है। बराबर का सम्मान और अधिकार देते हैं। सबसे मजे की बात यह है कि इससे पूछो तो यह कहती है कि यह सब मैं अपने मियां से पाया है और इसके मियां से पूछो तो कहता है यह दृष्टि मैंने अपनी पत्नी से पाई है। इन दोनों में कौन किसके वजह से ऐसा सोच पाया है, यह तो यह दोनों जाने, लेकिन जो भी सोचा है, सबके भले की सोचा है।’’
अंत में निर्मला जी कहती है कि- ‘‘राधा के इतना कहने के बाद अब कुछ कहने को शेष नहीं रह गया है। अब हम सबकी जिम्मेदारी बनती है कि हम सब अपने कर्तव्य के साथ-साथ अधिकार के लिए सचेत रहे।’’ सभी लोग उठती हैं और एक चेतना के साथ-साथ अपने-अपने घर को चल देती है।


परिचय 

डॉ० श्यामवृक्ष मौर्य का जन्म 12 अगस्त 1957 को टहरकिशुन देवपुर. आजमगढ़ (उ० प्र०) के एक साधारण कृषक परिवार में हुआ।

शिक्षा: एम० ए० (दर्शनशास्त्र), पी-एच० डी०, बी० जे०, डिप्लोमा इन योग, काशी हिन्दु विश्वविद्यालय, वाराणसी, उ० प्र० से।

लेखन विधा: कहानी, कविता, उपन्यास एवं निबंध।

प्रतियोगी परीक्षा सम्बन्धी लेख और पुस्तकें प्रतियोगी परीक्षाओं से सम्बन्धित लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। उपकार प्रकाशन, आगरा से आई० ए० एस० मुख्य परीक्षा (दर्शनशास्त्र), प्रारम्भिक परीक्षा (उ० प्र०, मौर्य राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़) बौद्धिक एवं तार्किक युक्त परीक्षा आदि

डॉ. श्यामवृक्ष

पुस्तकें प्रकाशित।

कविता संग्रह: समय की शिला पर (दोहा संकलन, कई कवियों के साथ), जले सुधि के दीप (क्षणिका संकलन, कई कवियों के साथ)।

कहानी संग्रह: एक और द्रौपदी, एहसास के नए दायरे।

उपन्यास : मुझे चाँद छूना है, हैलो.... मैं कृष्ण बोल रहा हूँ, मैं बुद्ध हूँ।

निबंध संग्रह: समाज दर्शन और राजनीति, चिन्तन प्रवाह।

दर्शनिक ग्रन्थ : अद्वैत वेदान्त (सिद्धान्त बिन्दु के आलोक में), बौद्ध धर्म एवं दलित चेतना, नारीवाद : एक दार्शनिक अध्ययन, दर्शनशास्त्र परिभाषा कोश (वैज्ञानिक तकनीकि शब्दावली आयोग, नई दिल्ली सदस्य विशेषज्ञ समिति)।

संपादित ग्रन्थ: पर्यावरण प्रदूषण के विविध आयाम एवं समाधान, स्मृतियों के आईने में शिक्षा मनीषी स्व० रमाशंकर सिंह, यादों के उजाले में डॉ० उमाशंकर सिंह (व्यक्तित्व एवं कृतित्व)।

शीघ्र प्रकाशनाधीन ग्रन्थ समाजवादी चिन्तक डॉ० राम मनोहर लोहिया।

अध्यापनः बी० एच० यू० दर्शनशास्त्र विभाग, ए० के० कॉलेज, शिकोहाबाद, जी० एस० एस० पी० जी० कॉलेज, कोयलसा, आजमगढ़।

सम्प्रति : पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर (दर्शनशास्त्र), ग्रा० टहर किशुनदेवपुर, पो० टहर वाजिदपुर, आजमगढ़ (उ० प्र०)।

मोबाईल : +91-9411411684

ई-मेल: dr.s.b.maurya@gmail.com





शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

ममता बरनवाल की कविताएँ

मिर्जापुर की मिट्टी में जन्मीममता संवेदनाओं की उस धारा का नाम हैं जो सुनने, महसूस करने और शब्दों में जीवन को संजोने की कला जानती है।डबल एम.ए. (इतिहास, हिंदी) और बी.एड. शिक्षा प्राप्त ममता जी ने 2001 बैच में पी.सी.एस. के माध्यम से प्रशासनिक सेवा में कदम रखा और आज लेखा परीक्षा अधिकारी के रूप में अपनी जिम्मेदारियाँ निभा रही हैं।
इन सब के बावजूद ममता के व्यक्तित्व की असली पहचान उनके भीतर बसती उस लेखिका में है, जो जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों को गहराई से जीती है। पढ़ना, सुनना और सृजन करना उनके लिए केवल रुचियाँ नहीं, बल्कि आत्मा का विस्तार हैं। यात्रा उन्हें नए रंग देती है, तो ध्यान उन्हें भीतर की शांति से जोड़ता है। ममता के लिए जीवन एक सतत यात्रा है—बाहर की दुनिया को देखने और भीतर की दुनिया को समझने की।आइए आज रू-ब-रू होते हैं गाथांतर पर ममता की कविताओं से-



सुनो स्त्री!

(1)

कई बार जरा,मृत्यु और अवसाद देख,
संसार के कोलाहल से परेशान होकर,
तुमने भी विचार किया होगा 
कि जीवन दु:ख ही दु:ख है,
इसका कहीं न ओर है,न छोर है,
हर तरफ़ बस मन का शोर है,
कई बार पूछा होगा तुमने स्वयं से कौन हूं मैं,क्यों जिंदा हूं...
भागना चाहा होगा,किसी जंगल में,डूबना चाहा होगा कभी न कभी निर्मल गंगा के जल में,
और शांत हो स्वयं को "अप दीपो भव" के भाव में भी महसूस किया होगा और बनना चाहा होगा बुद्ध!
मगर हे स्त्री!
तुम बुद्ध नहीं,यशोधरा बनना,
किसी सोते राहुल को यूं ही असहाय छोड़कर मत जाना,
वृद्ध माता-पिता के उत्तरदायित्व से मुंह मत मोड़ लेना...
हजारों जन-मानस के विश्वास को मत तोड़ देना,
किसी ध्यान से करूणा और शांति तुम्हें 
न मिलने वाली है,
वह तो तुम्हारी आत्मा में बसा, तुम्हारी ही थाती हैं,
इसलिए हे स्त्री!
हो सके तो यशोधरा बनना,
संसार का सृजन करना,समृद्ध करना और और सैकड़ों बुद्ध गढ़ना।


(2)

सुनो स्त्री!
जब जरा की झुर्रियाँ
और मृत्यु की परछाइयाँ
मन की दीवारों पर
धीरे-धीरे उतरती हों,

जब संसार का अनंत कोलाहल
तुम्हारे भीतर
एक असह्य शोर बन जाए,

और जीवन
एक लंबी, अंतहीन पीड़ा सा लगे—
न जिसका कोई आदि दिखे,
न कोई अंतिम तट।

तब शायद
तुमने भी कभी
अपने ही हृदय से पूछा होगा—
कौन हूँ मैं?
क्यों हूँ इस पृथ्वी पर?

कभी चाहा होगा
सब कुछ छोड़कर
किसी वन की निस्तब्धता में खो जाना,

कभी सोचा होगा
निर्मल गंगा की गोद में
अपने समस्त प्रश्न
जल की तरह बहा देना।

कभी तुम्हारे भीतर भी
जगा होगा
वैराग्य का वह दीप—
जिसे ऋषियों ने कहा
“अप्प दीपो भव”।

और क्षण भर को
तुमने भी सोचा होगा—
क्यों न मैं भी
बुद्ध हो जाऊँ?

पर सुनो स्त्री!

तुम्हें बुद्ध नहीं बनना,
तुम्हें यशोधरा होना है।

क्योंकि
किसी शांत रात्रि में
सोते हुए राहुल को
असहाय छोड़कर
चले जाना
तुम्हारी करुणा की प्रकृति नहीं।

वृद्ध माता-पिता की
धीमी होती सांसों के बीच
अपना कर्तव्य भूल जाना
तुम्हारी संस्कृति नहीं।

हजारों आँखों में बसे
विश्वास के दीपक
तुम्हारी प्रतीक्षा करते हैं—
उन्हें बुझने मत देना।

स्मरण रखो—
ध्यान की किसी गुफा में
करुणा नहीं मिलती,
वह तो तुम्हारी आत्मा की
स्वाभाविक ध्वनि है।

शांति भी
किसी निर्वाण का पुरस्कार नहीं,
वह तो तुम्हारे भीतर
जन्म से ही बसी हुई
अनंत विरासत है।

इसलिए हे सखी,

यदि कभी
वैराग्य का पथ तुम्हें पुकारे,
तो पल भर ठहर कर
अपने भीतर देखना—

तुम्हारी कोख में
संसार की निरंतरता धड़कती है,
तुम्हारे स्पर्श से
सभ्यताएँ जन्म लेती हैं।

इसलिए
यदि बनना ही हो—

तो यशोधरा बनना।

जो संसार को त्यागती नहीं,
उसे रचती है,
सींचती है,
समृद्ध करती है—

और अपनी मौन तपस्या से
एक नहीं,
सैकड़ों बुद्ध गढ़ती है।

(3)

अन्तर्मन का सेतु-

न शब्द थे, न संज्ञा थी,
बस एक मूक पुकार थी,
नन्हीं सी उन आँखों में,
जीवन की ही दरकार थी
महादेवी की लेखनी ने,जो गिल्लू में प्राण भरे,
संवेदना के वे ही अंकुर,आज हमारे हृदय से झरे।
जाति-पाँति और देह-भेद से,ऊपर प्रेम की सत्ता है,
संस्कार वही जो समझ सके,
क्यों काँप रहा हर पत्ता है?
जैसे गिल्लू के पंजों ने,थामी महादेवी की उँगली थी,
वैसे ही हर जीव की पीड़ा,
मानवता की ही देहरी थी।
पशु हो या पाषाण हृदय,
स्पंदन सबमें गहरा है,
ऊपरी आवरण के पीछे,
संवेदना का पहरा है।
जब पर दु:ख देख आँख छलके,तब संस्कार जागते हैं,
स्वार्थ के सारे तुच्छ अंधेरे,
उस लौ से भागते हैं।
प्रेम न बँधता सीमाओं में,न व्याकरण उसे पढ़ पाता है,
हृदय से हृदय तक का रिश्ता,
मौन ही सदा निभाता है।
गिल्लू जैसा स्नेह मिले तो,
पत्थर भी पिघल सकता है,
सच्ची संवेदना से ही,
ये संसार बदल सकता है।


परिचय

नाम : ममता बरनवाल, अवस्थी 
जन्म स्थान : मिर्जापुर,उत्तर प्रदेश। शिक्षा : एम.ए.( इतिहास, हिंदी), बीएड।
तत्पश्चात २००१ में उत्तर प्रदेश पी. सी. एस. में चयन।,वर्तमान में लेखा परीक्षा अधिकारी।
रुचियांँ :सुनना,महसूस करना,पढ़ना, और सृजन करना। पर्यटन में रुचि, घूमना और ध्यान में अपना खाली समय व्यतीत करना।



रविवार, 28 दिसंबर 2025

भोजपुरी कविता

   
लोकभाषा के आपन रस- गंध होला, लाल बहादुर चौरसिया 'लाल' के भोजपुरी कविता जीवन के एतना निकट के कविता है कि पाठक अपना के उनके साथ जोड़ि लेला।गाँव गिरावं में प्रबल अंध विश्वास होखे ,चाहे पेड़ ,पौधा, चिरई,चुढूंग होंखे,सब अपना रूप रंग संग इहां बसल बा।आज गाथांतर आप की कविता संगे पाठकन के समक्ष उपस्थित बा,पढ़ीं सभे-





1- "चुभे लागल बरगद के छांव"

पसरल बबूल गांव- गांव। 
चुभे लागल बरगद के छांव।।

भोर कै किरिनिया हेराय गईल कहियै ,
कुश्ती अ दंगल भुलाय गयल रहियै ,
             मिटि गइलै होरहा कै नाँव।
             चुभे लागल बरगद के छाँव।।

बुरुस अऊर मंजन कै आयल जमाना,
दतुइन कै सिस्टम त भइलें पुराना,
             लाज लागे छुवला में पाँव।
             चुभे लागल बरगद के छाँव।।

चइता अ कजरी ना होली गवाले,
डीजे प डांस बदे लइका कोहाले,
              हियरा में लागे "लाल" घाव।
              चुभे लागल बरगद के छाँव ।।


 2- "अबहिन रेंगति उहै चालि हौ"

उहै ओझती उहै सोखइती,अबहिन रेंगति उहै चालि हौ।
तोहरे खातिन भले नई बा,हमारे खातिन उहै सालि हौ।।
उहै बा जोड़ा उहै बा जामा, उहै चमड़िया उहै खालि हौ,
तोहरे खातिन भले नई बा, हमारे खातिन उहै सालि हौ।।

उहै चनरमा, उहैबा सूरज, ऊहै रैन, अंजोरिया बा,
ऊहै बल्टी, उहैबा लोटा, उहै भदेली - थरिया बा,
उहै सँधतिया उहै सँसतिया, रोज-रोज कै उहै हालि हौ।
तोहरे खातिन भले नई बा,हमारे खातिन उहै सालि हौ।।

उहैबा ओढ़ना उहै बिछौना, उहै टुटहिया खटिया बा,
उहैबा कोलिया उहै खड़ंजा, उहै मड़इया -टटिया बा,
उहै खोखाइन उहै पनउती, उहै गड़हिया उहै झालि हौ।
तोहरे खातिन भले नई बा,हमारे खातिन उहै सालि हौ।।

उहैबा खूँटा, उहैबा हउदी, उहै भँइसिया-पँड़िया बा,
अरगन, ताखा उहै , 'लाल' बा, उहवै मूँसर-कँड़िया बा,
उहैबा आँटा, उहैबा चाउर, उहै बा बोरन उहै दालि हौ।
तोहरे खातिन भले नई बा,हमारे खातिन उहै सालि हौ।।

             
3- "ई बात तोहै समझावल जायी"

तूंँ डाल डाल हम पात पात,
ई बात तोहै समझावल जायी।
      तूंँ जीति के गईला का कईला,
      ई मुद्दा आज उठावल जायी।।

तूंँ ज्ञानी खुद के माने ला,
हमरा के अनपढ़ जाने ला,
जब इहै बात हम पूछ दीहल,
तूंँ टेढ़ भौहिंया ताने ला,

ऊ समय रहल जो बीत गयल,
अब वइसै नांँय बितावल जायी।
      तूंँ जीति के गईला का कईला,
      ई मुद्दा आज उठावल जायी।।

तूंँ लीक छोड़ि के बढ़ि जाला,
पाल्हा से आगे चढ़ी जाला,
ई सगरो मूड़ फोरउव्वल कै,
खिस्सा नयका तूं गढ़ि जाला,

तूंँ बुझनी बहुत बुझा भइला,
अब बुझनी यहर बुझावल जायी।
     तूं जीति के गईला का कईला,
     ई मुद्दा आज उठावल जायी।।

तूंँ थइली धयि सरकार चला,
लइके सगरो उजियार चला,
हम टूटहा चप्पल पे दउरीं,
तूं साजि के मोटरकार चला,

ई ऊंँच-नीच कै भींटा बाबू,
हलियै काट गिरावल जायी।
      तूंँ जीति के गईला का कईला,
      ई मुद्दा आज उठावल जायी।।

तूंँ उछल कूदि के तरि जाला,
छातिया पे मुगंवा दरि जाला,
रात गुलाबी कयि आपन,
तूँ खिलल चांदनी हरि जाला,

अबकी दाल गलै ना पायी,
अइसन आँच देखावल जायी।
      तूंँ जीति के गईला का कईला,
      ई मुद्दा आज उठावल जायी।।

तूंँ खायि के मेवा गावेला,
बस हमके ज्ञान सुनावे ला,
हम चकती जोरत रहि गइलीं,
तूंँ सूट रोज लहरावे ला,

ई कहांँ से एतना धन पवला,
अब एकर थाह लगावल जायी।
      तूंँ जीति के गईला का कईला,
      ई मुद्दा आज उठावल जायी।।

तूंँ वादा "लाल" भुला गईला,
तूंँ आपन रूप देखा गईला,
हम देखि के सपना पेट भरीं,
तूंँ नोट पे नाच,नचा गईला,

तूंँ खोलि के पखना उड़ि भइला,
अब पखना काटि उड़ावल जायी,
      तूंँ जीति के गईला का कईला,
      ई मुद्दा आज उठावल जायी।।

4- "चूर कवन बइठावत हउवा"

चूर कवन बइठावत हउवा।
जै-जै ओकर गावत हउवा।।

कइसन तोंहके जानत रहलीं,
कइसन रुप देखावत हउवा।

जउने पेड़ के छांहें रहला,
पेड़ उहै छिनगावत हउवा।

भूख पे लेक्चर झारै खातिर,
काजू चाभि के आवत हउवा।

तूंँ ओकर गोड़धरिया कइला,
वही के तूंँ गरियावत हउवा।

हाथ में भांटा लेइके बाबू,
मुरई यस निकियावत हउवा।

अपने साथे साथे मरदे,
मोके लात खियावत हउवा।

काव मिलीअब ई कुल कइले,
अबहिनआंख लड़ावत हउवा।

'लाल' बुझाला मतलब गंठबा,
जाल बहुत फइलावत हउवा।।



5- "याद आवेले बचपन के बाली उमर"

याद आवेले बचपन के बाली उमर।
काहें टूटल खिलौना ऊ माटी के घर।।

धूर हीरा रहल, राख मोती रहल,
राह में हर परग सुख के ज्योति रहल, 
भूली बनवाँ कै कइसे सुहानी डगर।
याद आवेले बचपन के बाली उमर।।

बाबू माई के गोदिया कै सुखवा चयन,
आजु चाची के नेंहिया के तरसे नयन,
जाने कहवाँ हेराइल ऊ सगरी लहर।
याद आवेले बचपन के बाली उमर।।

एक राजा रहल, एक रानी रहल,
बूढ़ी नानी कै इहवै कहानी रहल,
ना हियरा से निकसल भकउवाँ के डर।
याद आवेले बचपन के बाली उमर।।

लागल सुखवा कै बाबू रिमझिम झड़ी,
"लाल" कइसे के टूटल ऊ पावन लड़ी,
उम्र बाढल जवानी कै पी के जहर।
याद आवेले बचपन के बाली उमर।।

जाने पल भर में कइसे घेरा गइलीं हम,
नाँद अनहद कै सुनि के डेरा गइलीं हम,
कउना खबरी लिआयल अइसन खबर।
याद आवेले बचपन के बाली उमर।।


रचनाकार




नाम - लालबहादुर चौरसिया 'लाल'
शैक्षिक योग्यता - स्नातक
जन्म तिथि - 5 अक्टूबर सन् 1976
जन्म स्थान व पता - ग्राम टहर किशुनदेवपुर, पोस्ट- टहर वाजिदपुर, गोपालगंज बाजार, जिला आजमगढ़, उत्तर प्रदेश, पिनकोड- 276141,
 मो.9452088890

लेखन - कविता, हिन्दी गजल, गीत, कहानी, भोजपुरी काव्य व भोजपुरी गीत, 

प्रकाशित पुस्तकें - "आँसू से मुस्कान लिखेंगे" (काव्य संग्रह) प्रथम संस्करण सन् 2021, द्वितीय संस्करण सन् 2023, "मैं मधुमास ढूंँढ़ने आया" काव्य संग्रह (प्रकाशित वर्ष 2024)

आईसीएसई व सीबीएसई बोर्ड की हिंदी पाठ्य-पुस्तक मैथिली सीरीज में पांच बाल कविताएं शामिल-
प्रवेशिका में - कविता "रंग बिरंगी तितली"
कक्षा 1 में - कविता "चिड़िया" व "सपने में परी"
कक्षा 4 में - कविता "सब्जी सम्मेलन"
कक्षा 7 में - कविता "मैं बेटी हूँ" 
पाठ्य पुस्तक बांसुरी सीरीज में दो कविता व एक जीवनी शामिल -
प्रवेशिका में - चंपक सियार 
कक्षा 6 - नौशेरा का शेर- ब्रिगेडियर उस्मान (जीवनी)
कक्षा 8 - सद्भावों के पुष्प 

लोकप्रिय रचनाएँ: 
1. "केहू नइखे बोलत बा" (भोजपुरी गीत)
2. "मौनी जी की पावन कथा" भाग 1, भाग 2 (यूट्यूब पर) 



    


शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

कहानी

गाथांतर पर आज सुधा गोयल जी की कहानी




                                                     नैनं दहति पावकः

         अभी कुछ देर पहले ही मेरी मृत्यु हुई है।मैं अपना शरीर छोड़कर धूम्ररेखा की तरह ऊपर उठ रहा हूं।हवा के झोंकों से कभी इधर कभी उधर झूम जाता हूं। मुझे भय भी लगता है,पर तभी ध्यान आता है कि भय कैसा?अब तो मैं मुक्त हूं। आजाद हूं।नैनं छिदंन्ति शास्त्राणी,नैनं दहति पावकः।मैं खुश हूं। अपनी इस आजादी का जश्न मनाना चाहता हूं,पर कैसे?अपनी खुशी मैं किसी के साथ व्यक्त नहीं कर सकता।किसी के साथ मिलकर नहीं मना सकता,केवल महसूस कर सकता हूं।यह महसूस करना भी कितना सुकून भरा है।शरीरधारी व्यक्ति इस सुकून को समझ नहीं सकता।
         चिंता मुक्त होना भी एक सुकून है।अब न मुझे समाज की चिंता है ,न परिवार की न अब मुझे कोई बीमारी है ,न डाक्टर के पास जाना है,न दवाइयां खानी है न इंजेक्शन लगवाने हैं।जब देह ही नहीं है तब उससे सम्बन्धित दुःख कैसा।
        अब न घर की जरूरतों के लिए थैला लटकाए बाहर जाना है और न पेंशन लेने आफिस।अब तो कोई काम ही नहीं है।सारे काम शरीर के थे।सारे सुख दुःख भी शरीर के थे।शरीर भी पुराने कपड़े जैसा जर्जर हो गया था।उसे ठीक रखने के लिए समय समय पर पैच लगाने पड़ते थे। कितनी बार चीरफाड़ करानी पड़ी।देह दुखती तो मुंह से आह निकल ही जाती।
         खैर, मैंने सोचा कि आज जश्न मनाऊंगा तो मनाऊंगा ही। लेकिन अकेले अकेले बात कुछ जमती नहीं,पर जमानी तो पड़ेगी ही। मैंने निश्चय किया है कि मैं अपनी देह के ऊपर आंगन में स्थित हो सारे क्रियाकलाप देखूं। मुझे कौन कितना चाहता था तथा कौन कितनी घृणा करता था,सब पता चल जाएगा।सबके मुखौटे उतर जाएंगे।पर यह क्या?पत्नी के पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं है, क्रिया कर्म कैसे करेगी।मैंने भी कितनी बड़ी ग़लती की।कुछ पैसे उसके खाते में डाल देता या घर ही लाकर रख देता।दस लाख पी.पी.एफ.में ही हैं। मैंने तो किसी को अपना उत्तराधिकारी भी नहीं बनाया है।उन पैसों के विषय में कोई जानता भी नहीं है।वह तो बैंक में ही रह जाएंगे।क्या मैं पुनः शरीर में प्रवेश कर कुछ पैसे पत्नी को दे सकता हूं।चलो कोशिश करता हूं।
         पर यह क्या? प्रवेश कहां से करूं? प्रवेश के सभी रास्ते अवरुद्ध हो चुके हैं।सभी जगह रुई ठूंस दी गई है। मुंह में तुलसी दल भरे है। गुप्तांगों में आटे के पिंड हैं।वायु आने जाने का कोई भी मार्ग खुला नहीं है।खैर,चलो अब तो तमाशा और भी रोचक होगा।देखता हूं सारी व्यवस्था कैसे होती है।अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे।पत्नी माथे की बिंदी और मांग का सिंदूर पहले ही पोंछ चुकी है।विलाप करते हुए उसने कांच की चूड़ियां भी तोड़ डाली हैं।सिर ढ़के मुख नीचा किए निरीह सी बैठी है।कैसी कुम्हला गई है।उसके चेहरे का सारा तेज झुलस गया है। कितनी दयनीय लग रही है। बीच-बीच में हिचकी लेती है।सारी देह हिल जाती है। रोते-रोते कह रही है -
      "मैंने लाख कोशिश की,अपनी सामर्थ्य भर इलाज कराया, लेकिन बचा न सकी।मेरे भाग्य में वैधव्य ही लिखा था।"
         मुझे पत्नी पर तरस आता है पहले ही कौन सधवा थी। माथे पर बिंदी लगाने या मांग में चुटकी भर सिंदूर लगाने से कोई सधवा नहीं हो जाता पर समाज का मानना यही है। मैं इसमें क्या कर सकता हूं ?जब भी कोई रिश्तेदार औरत आती है पत्नी से गले मिलकर रोती है। यह रोना थोड़ी-थोड़ी देर रुक -रुक कर चल रहा है मेरी मृत देह जमीन पर एक चादर बिछाकर उस पर लिटाई गई है। एक चादर ऊपर से ढकी है।





         पत्नी गले का मंगलसूत्र और हाथों की सोने की चूड़ियां उतार कर दामाद को दे रही है -"लल्ला , अपने ससुर की अंतिम यात्रा की तैयारी करो।"
        "मम्मीजी ये सब अभी अपने पास रखो।मैं व्यवस्था कर रहा हूं।"वह लेने से इंकार करता है।
      "अभी रखो। वैसे भी ये सब मेरे किस काम के हैं। दामाद का पैसा ससुर के अंतिम संस्कार में लगे ये अनुचित है।"
         " मैं बाद में ले लूंगा।अब इसी काम के लिए बाजार जाना उचित नहीं लगता।मैं साले साहब से बात करता हूं।"
          पत्नी चुप कर जाती है।उसे दामाद की बात जमी है।मैं भी देख रहा हूं कि कौन क्या-क्या करता है। लड़का पांच सौ की गड्डी निकाल कर दामाद को थमाता है। मुझे ताज्जुब हुआ। जीते जी जिसने कभी मुड़ कर मेरी तरफ नहीं देखा वह नोटों की गड्डी निकाल रहा है।मैं सब समझता हूं। मेरे जाने के बाद मेरा सारा पैसा निकाल लेगा।मेरे आफिस वालों से इसीलिए सम्पर्क बनाए रखता है।मैं इसकी नस-नस से वाकिफ हूं। मां की ओर हमदर्दी के चार जुमले उछाल कर मकान भी हथिया लेगा।
       तभी मेरी सोच दूसरी ओर मुड़ती है।अब सोचता हूं कि मैने ही इसके लिए क्या किया।इसे पैदा करने के बाद इससे कभी सीधे मुंह बात ही नहीं की।कभी प्यार से सिर पर हाथ नहीं रखा।कभी सुख दुःख नहीं बांटा।यदि उसने भी दूरियां बना लीं तो इसमें इसका क्या कसूर?वह अपने पुत्र होने का फर्ज तो निभा रहा है।मैं अपने पिता होने का फर्ज नहीं निभा पाया।
        पास पड़ोसी और रिश्तेदारों का आना जारी है। स्थानीय लोग सूचना मिलते ही आ पहुंचे। हां बाहर से आने वालों में वक्त लगेगा।लोग आपस में खुसर-पुसर कर रहे हैं। मैं उनके ऊपर वायुमंडल में स्थित हूं ।यह विनोद ऐसे भाग दौड़ कर रहा है जैसे इसी का बाप मरा हो। मेरा लाखों रुपया तो इसी के पास है जिसकी कानों कान किसी को भनक भी नहीं है। साला सब डकार जाएगा ।मेरे रुपए से ही उसने अपना मकान खड़ा कर लिया है।
         यह मेरे पड़ोसी हैं जिनसे रोज आते जाते दुआ सलाम होती रहती थी ।कभी सुख-दुख में हाल-चाल पूछ लेते थे। वर्ना अपने काम से काम। हां सुबह-सुबह पार्क में टहलते समय खूब ठहाके लगते थे। राजनीति धर्म या देश के वर्तमान हालात पर खूब चर्चा होती ।खूब जिंदा दिल थे मसूर साहब ।उनकी कमी खलती रहेगी।
         यह दूसरी तरफ चार-पांच व्यक्ति एक ग्रुप में खड़े हैं। यह मेरे ऑफिस के सहयोगी हैं। यह गुप्ता का बच्चा ऐसे कामों में सबसे आगे रहता है ।आज भी सारे कार्यक्रम का सूत्रधार वही है। कैसी अकड़ से कह रहा है कि मैं अपने दस साथियों को तो श्मशान तक पहुंच चुका हूं मेरे कंधे कितने मजबूत है।
       "ठीक कहते हो गुप्ता। क्या पता कल तुम्हें श्मशान पहुंचाने को कोई कंधा ही ना मिले "-राजेश ने चुटकी ली।
        आगे बढ़ता हूं यह मेरे भाई बांधव हैं मुझे मन ही मन गालियां दे रहे हैं और मेरी बखिया उधेड़ने में लगे हैं जिसमें मेरा पुत्र और दामाद भी शामिल है। पुत्र कह रहा है हद दर्जे के कंजूस थे। मां को कभी दो पैसे नहीं दिए। मां हमेशा खाली हाथ पैसे पैसे को तरसती रही ।अभी भी खाली हाथ बैठी है ।पता नहीं वक्त कैसे गुजरेगा।
        "जब तक जीवित रहा कभी पल भर चैन नहीं लेने दिया। सुख नाम की चीज उसके जीवन में कभी नहीं आई। केवल दुखी उढ़ाता- बिछाता रहा। बेचारी ने कभी न ढंग से खाया न पहना। केवल रात दिन प्रतीक्षा करती रही। आधी आधी रात को जुआ खेल कर खा पी कर घर लड़खड़ाता लौटता। लौट कर उसे गालियां बकता ।वह बेचारी बकरी सी मिनमिनाती  रहती। हमने तो इसीलिए इससे अपने ताल्लुकात कम कर दिए।" यह मेरा बड़ा भाई है।
        "मैं भी अपने बच्चों के साथ अलग रहने लगा रोज की चिक चिक से तो जान छूटी"- यह मेरा सपूत था।
      " शादी के प्रारंभिक दिनों में हम झूठ बोलते ।किसी काम का बहाना बनाते। ढूंढ कर लाने का ढोंग करते। आखिर झूठ को एक दिन बेपर्दा होना ही था ।एक दिन भौजी ने कहा-" भैया अपने भाई की कमियां कब तक छुपाओगे? अब बहाने बनाने बंद भी करो। मैं सब जान गई हूं।"  इसने तो हमारी गर्दन कभी ऊपर उठने नहीं दी। शर्म से झुकी ही रही। भौजी के प्रति हम भी कम अपराधी नहीं है। ऐसे व्यक्ति को शादी नहीं करनी चाहिए थी। लेकिन मां भविष्य देख रही थी कि शायद संभल जाए लेकिन जीवन पूरा हुआ पर वह नहीं संभला"। यह मेरा अनुज था।
        "अब मम्मी का शेष जीवन चैन से कटेगा"-ये मेरे बेटी और दामाद हैं।यानि मैं सबकी आंखों में खटकता रहा।बस मेरे सामने ही किसी को कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी।आज मैं नहीं हूं तो सब बातें बना रहे हैं।जब इस औरत को रोटी खिलाएंगे तब जानूंगा।इन सबके बूते पर ही अकड़ दिखाती थी।
         वायुमंडल में स्थित होते हुए भी मैं क्रोधावेश में कांपने लगता हूं और रुई के गोले की तरह इधर उधर घूमने लगता हूं।यह मुझे क्या हो रहा है।मैं तो सुख दुःख से ऊपर हूं।शान्त हूं।फिर ऐसे विकार क्यों आ रहे हैं।
       मैं वहां से हटकर उधर चल देता हूं जहां मेरी प्रियतमा नतमुख किए बैठी है।सबकी निगाह में वह मेरी धर्म बहन है। इससे राखी बंधवाता हूं।यह सिर्फ समाज की आंखों में धूल झोंकने के लिए था।वह भी बैठी सोच रही है -"चलो अच्छा हुआ जो माथुर का बच्चा मर गया।पीछा तो छूटा। कंजूस तो इतना कि कुछ मत पूछो।बस फोकट में देह चाहिए।देने के नाम पर सब कुछ पत्नी के नाम पर छोड़ गया होगा।यह नहीं हुआ कि दस पांच लाख मेरे नाम कर देता। ऐसे आदमी का क्या दुःख मनाऊं।पता नहीं क्यों इसकी मीठी मीठी बातों में आ गई।"
       दृश्य बदलता है।मेरी बहन आ गई है।कपड़ा हटाकर मेरा चेहरा देखती है। फिर अपनी भाभी के गले मिलकर रोती है।पत्नी खूब बिलख बिलख कर रो रही है।मेरी समझ में नहीं आ रहा। मैंने प्रताड़ना के अलावा कोई ऐसा सुख इसे नहीं दिया था जिसे याद करके रोती। बहिनों को भी कोई खास मान सम्मान नहीं दिया।बस खून का रिश्ता मात्र निभाता रहा।हां वे जरूर उसके हिमायती और मेरे विरोधी रहीं। इसीलिए मैं उन्हें पसंद नहीं करता था।शायद रोना भी एक परम्परा है जिसे निभाना जरुरी है।
        पत्नी जिसे मैंने पत्नी कम फालतू का सामान अधिक समझा।कभी उसके मान सम्मान की चिंता नहीं हुई।किसी के सामने भी डांट या पीट देता जिसमें मैं अपनी मर्दानगी समझता।उसका मुझसे अधिक पढ़ा लिखा होना ही सबसे बड़ा दोष था।वह जितनी पढ़ी है उतनी ही धीर गम्भीर है ।मैं उतना ही कृतघ्न,उच्शृंखल और कमीना।वह रात रात भर जागकर मेरी सेवा करती।फल ,दवाई, डाक्टर सब उपलब्ध कराती। अपने आप नहलाती, कपड़े धोती, अपने हाथ से खाना खिलाती। फिर भी मैं उसे शब्द शरों से घायल किए बिना न रहता।



     वह छाया सी मेरे साथ लगी रहती।जब केंसर के कारण मेरे गले में खाना जाना बंद हो गया तब वह फलों का जूस निकालती,शेक बनाती, सब्जियां उबाल कर पीसती।उसी में रोटी पनीर सब मिला देती।मैं कमजोर न पड़ जाऊं इसीलिए पूरी खुराक देती।दूध दही की कोई कमी न करती।सारा दिन फोन पर डाक्टरों से बात करती। मुझे दिखाने ले जाती।एक कंधे पर बैग ,हाथ में फाइल और दूसरे हाथ से मुझे पकड़े रहती।बेटा फोन पर मां को घुड़कता-"ये क्या मां?आप अकेली पापा को लिए घूमती है।वह उत्तर देती-"तो क्या हुआ।जब तक सांस तब तक आस।मेरे मन में यह तो अफसोस नहीं रहेगा कि मैंने ढंग से इलाज नहीं कराया।मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही हूं,बाकी ऊपर वाला जाने।"
        बेटी पूछती-"मम्मी,आप पापा को कैसे सह पाती हैं?
       ......."यानि मैं सांप हूं।विष उगलता रहता हूं। क्यों रहती है सांप के साथ?कभी मेरा विष तुझे चढ़ा नहीं?"
        मैं उसकी चोटी पकड़ कर खींच देता और कमर में एक लात जमा देता।बेटी मां की दुर्दशा देखकर रोने लगती।
      "तू क्यों रोती है लाड़ो जब मैं ही नहीं रो रही।ऊपर वाला सब देखता है।"
        ठीक कहती थी वह कि ऊपर वाला सब देख रहा है। उसने ऐसा देखा कि मैं बोलने के काबिल ही न रहा।कुछ सटकने लायक नहीं रहा।पल पल अपनी मृत्यु का इंतजार करने लगा। लेकिन उसने मेरे इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी। सारे रिश्तेदार और पड़ोसी जानते हैं।उसका मान सबकी निगाहों में बढ़ गया है।उस जैसी पतिव्रता स्त्री हो ही नहीं सकती। फिर मेरे जाने पर बिलख बिलख कर रो रही है।बेटे ने भी कंधे से लगाकर चुप नहीं कराया है और न यह कहा कि तुम चिंता मत करो।मैं हूं न। पुत्र ने कुछ आदतें मेरी भी पायी हैं।कहता भी कैसे?मरी बिल्ली कोन गले में बांधे?
        फिर भी मैं यह जानने को आतुर हूं कि उसके रोने का क्या कारण है।उसकी गरीबी..... नहीं स्वाभिमानी व्यक्ति कभी गरीब नहीं होता। उसने मुझसे कभी एक पैसा नहीं मांगा।वह स्वाभिमानी है।भूखी रह लेगी ,मेहनत कर लेगी , लेकिन किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएगी।वह कहती हैं -जिसने पेट दिया है वह रोटी भी देगा।वह अपने बच्चों को भूखा नहीं सुलाता।मैं जानता हूं कि मैंने उसके लिए कुछ नहीं छोड़ा।यह उसके रोने की वजह नहीं हो सकती।मैं उसे भिखारिन के रुप में देखना चाहता था।यह इच्छा तब भी पूरी नहीं हुई।अब भी नहीं होगी लेकिन रोने का कारण....?
       मैं उसके मन में गहरे तक उतर जाता हूं।वह चाहती थी कि पहले मैं मरती और मैं पत्नी के बिना अभावों में तड़पता पल पल जीता। इसीलिए उसने इतनी सेवा कर बचाना चाहा।यह उसकी हार का रोना था। इसीलिए वह मेरे जाने से दुखी थी।
        मुझे मरे चार घंटे ही गए हैं।लगभग सभी नाते -रिश्तेदार आ गए हैं।अब मुझे नहलाया जा रहा है। पंडित आ चुका है।नाई पुत्र का सिर मूंड रहा है।सफेद वस्त्रों में वह मेरे पास खड़ा है। तिलक लगाकर मुझे फूलों से ढंक दिया गया है। सफ़ेद कफ़न से मुझे ओढ़ा दिया है।मेरा चेहरा अभी खुला है। रिश्तेदार चादर ओढ़ाकर प्रणाम कर रहे है। पौत्र व बहुएं पैर छू रही है।पत्नी ने अपने सभी सुहाग चिह्न उतारकर मेरी छाती पर रख दिए हैं। जैसे कह रही हो कि आज से मेरा तुम्हारा नाता खत्म।जिन सुहाग चिन्हों के नाम पर तुम मुझे बांधे रहे,मैं आज तुम्हें उनसे मुक्त कर स्वयं भी मुक्त हो रही हूं।प्रभु अगले जन्म में तुम्हें सद्बुद्धि दे और मेरा तुम्हारा यही सातवां जन्म  हो।
       एक बार फिर रोने के स्वर तेज होते हैं।काठी बांधी जा चुकी है। घंटे घड़ियाल बज रहे हैं।कुछ हाथ काठी उठाकर कंधे पर रख लेते हैं। पुत्र सबसे आगे हैं।सब राम नाम सत्य है कहकर आगे बढ़ रहे हैं।
  मैं उनके साथ -साथ हवा के झोंकों पर सवार श्मशान की ओर जा रहा हूं। चिता तैयार है।भंगी मेरे ऊपर पड़ी चादरें उतार लेता है। मुझे चिता पर लिटा दिया जाता है। श्मशान का पंडित कुछ मंत्र पढ़ता है और जल छिड़कता है।मेरे ऊपर लकड़ियां रख दी जाती हैं। पंडित एक लकड़ी का सिरा घी में डुबोकर जलाता है। मुझे भय सताने लगता है।मैं अब नष्ट हो जाऊंगा लेकिन तभी आत्मा आभास कराती है -तुम जीवन मरण से दूर हो।नैनं दहती पावकः।और चिता धू -धूकर जलने लगती है।
     एक धूम्र रेखा तेजी से उठकर ब्रह्मांड में विलीन हो जाती है।

लेखिका
सुधा गोयल
२९०-ए, कृष्णानगर, डा दत्ता लेन, बुलंद शहर -२०३००१

   
       


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गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

बलमा जी का स्टूडियो

                                                   बलमा जी का स्टूडियो



जिन्दगी जब रात के अन्धेरे बियावान में  स्मृतियों के तलछट में कुछ कुरेदती है ,अक्सर सुख -दुख ,राग -द्वेष की घटनाऐं घण्टा घर की घण्टी की तरह टन -टन-टन बज उठती हैं । ननिहाल का प्राकृतिक परिवेश बड़ा मनोरम था ,कल-कल बहती टौंस नदी में लड़कियों के झुण्ड के साथ नहाना ,कभी मठिया बाबा के दर्शन के लिए ऊँचे सिमेंन्टेड़ पानी की नालियों पर चढ़ कर जाना तो कभी नाना से ढ़ेर सारी पौराणिक कहानियाँ सुनना याद है ,पर आत्मा के किसी भी कोने में उस ज़मीन के प्रति लगाव महसूस नहीं करती ,कारण मामा के गाँव चार बेटियों वाली माँ की घोर उपेक्षा रही । समय के साथ हम परिपक्व हुए और नाते के सारे डोर ननिहाल से टूटते गये ,आखिर सहने की भी एक सीमा होती है ।माँ नाना के मरने तक में नहीं गयी । पर मेरा गाँव सराय मुबारक कुछ ऐसे बसा स्मृतियों में कि आत्मा आज भी वहाँ नित टहल आती है ।मेरे पुरखे सिकन्दर पुर बलिया से यहाँ धरमपुरा के उपधियों द्वारा धियनिया बसाए गये पर समय ने ऐसी करवट ली की बावन गाँव पचोतर में हरिप्रसाद तिवारी ,विन्धेश्वरी तिवारी की तूती बोलने लगी ।इसी प्रभाव में अम्मा के बाबा जो मेरे गाँव के प्राईमरी स्कूल के हेडमास्टर थे प्रभावित हो पहले हमारे कुल में अपनी बेटी ब्याही पीछे बड़ी चालाकी से आजी से बाबूजी की नज़र उतार छ:माह की अम्मा के ब्याह का कौल (वचन) ले गये ।बात आई -गयी और समय चिड़िया के पंख पर बैठा फर्र फर्र उड़ता रहा।

 दरोगाइन गंगोत्री देवी को जान कर काटो तो खून नहीं ,बभनपुरा के लठैत बाभनों में बेटी जाए ,सुन कर सलाके में , आँगन में विलाप करने लगीं ,सास का पैर धर रोतीं -

"काट कर टौंस में फेंक देना जो बेटी को वर न मिले , पर बभनपुरा न ब्याहना अम्मा जी "। 

अम्मा जब बाबूजी से लड़तींं,  रो -रो बतातींं ,कनवा  ले आकर बोर गया। कनवा यानी अम्मा के बड़े चाचा,अम्मा जीती तो सपनों में यहाँ ब्याह न होता ,कहती मेरी बेटी लन्दन जाएगी पढ़ने ,पर ये सारे ख्वाब ,ख्वाब ही रहे ।चार साल की अम्मा को छोड़ नानी स्वर्गसिधार गयीं, दरोगा जी तीनों बेटों को लेकर नौकरी पर बिहार चले गये ।अम्मा रह गयींं चचेरे भाई -बहनों संग गाँव में ।यहाँ अभाव था, संघर्ष था , उपेक्षा थी ।इधर सात साल के बाबूजी भी मातृ स्नेह से वंचित हुए ।कर्कशा भावज की मानसिक यातनाओं के बीच बारह साल के बाबूजी का ब्याह अम्मा से हो गया और सोलहवें में गवना हुआ । दुबले -पतले बाबूजी , भरी- पूरी अम्मा , पूरे कुल की बुढ़ियों में हाय -हाय मच गयी । बाबूजी की चन्द्रकाली फुआ ने ड़ोली से  बहू उतारते ही भाई को उलाहना दिया-

 "गाय संगे बछरु बियह गइलें "। 


अम्मा के गाँव शिक्षा थी ,हमारे घर सात हर की खेती , अम्मा ने पति को मन्त्र दिया -

"पढ़ोगे नहीं तो मेरे भाईयों संग बैठोगे कैसे ", जो तरे -ऊपर पतलो रख फूंक भी दी जाऊं घर में ,पढ़ना न छोड़ना तिवारी जी ।" 

और इस तरह बाबूजी हमारे कुल के पहले पोस्ट ग्रजुएट हुए । आगे परम्परा बन गयी , जिस जमींदार परिवार के लड़के गाँव के प्राथमिक पाठशाला से आगे नहीं पढ़ते थे वहाँ बाबूजी ने इतिहास रचा और रचते चले गये। 
                        परगना पचोतर ,जिला गाजीपुर का छोटा सा गाँव सराय मुबारक देश के तमाम छोटे गाँवों जैसा ही है । लहलहाती खेती , हरे -भरे बाग - बगिचे ,ताल- तलैया ,सगड़ा ,कोली , कोली में साइकिल के पुराने टायर को सिटकुन से मार -मार भगाते नंग- धड़ंग बच्चे ।इनार की जगत पर गोट्टी खेलती खबर- खबर झोंटा खजुआती लड़कियाँ । कुछ कांख में भाई -भतिजे को जांती खड़े हो तमाशा देखतीं तो कुछ डाली में अनजा ले बनिए की दुकान से तेल ,मसाले की खरीद को जातीं । औरतें सुबह शाम नियम से खेतों की ओर निकलती निबटने और ड़हर में रुक कर टोह टक्कड़ इनकी -उनकी लेते चलतीं ।मर्द किसानी से निजात पा रात को चौबे जी के बरामदे में बैठ गायकी करते , कभी फगुवा ,कभी चैता ,कभी भजन -किर्तन ।नवयुवकों का भी अपना मंगल दल था जो समय- समय पर नौटंकी खेलता ।जब बरखा नहीं होती शिव जी की पिंड़ी इनार में रस्सी से लटका रात भर किर्तन होता इस आस में कि अकबका के डूबे रहने पर शिव जी जागेंगे और इन्द्र को ले खेदिया बरखा कराएंगे । इस इलाके में शिव जी का बड़ा महात्यम है , महाहर शिव इलाके के क्षेत्र देवता । सुना है पूरे उत्तर भारत में एक मात्र पंचमुखी शिव लिंग यहीं है ।यही वह जगह है जहाँ दशरथ ने श्रवण को मारा था । अब आप समझ सकते हैं कितना महत्व है यहाँ अड़भंगी भोले का ।मेरे गाँव से कोई एक किलो मीटर की दूरी पर महारे की छोटी सी चट्टी थी उन दिनों ।कुल मिलाकर चार पाँच दुकानें रही होंगीं ।एक किराने की ,एक बिसाते की ,कोने में चाय -पकौड़ी की ,हाँ एक झोला छाप डॉक्टर की भी जो अपनी मोपेड से गाँव -गाँव घूमते ,इलाज करते थे ।उन्ही के बगल में थी कथा नायक बलमा जी का स्टूडियो ।पहली बार जब देखा था बलमा को उम्र कोई चौदह की रही होगी ।शरीर में तमाम तरह के उफान का दौर ।खुद को उम्र से ज्यादा सयाना समझने की जिद में ऐंठी मैं अम्मा का हाथ थामें दुकान के बाहर रखी चौकी पर बैठ गयी ।मरदह से जीप में बोरियों की तरह ठूस कर लाई गयी मैं बैठ कर अभी खुल कर ठीक से साँस भी नहीं ले पाई थी कि अन्दर से दाँत निपोरते ,हाथ में लोटा- गिलास लिए बलमा निकला ।उसे देख मुझे हँसी आ गयी , दूबला -पतला लच- लच बलमा लाल रंग की टी शर्ट और सटकहवा नीला जिंस पहने माथे तक लटकतीं जुल्फें, खैनी सूर्ती के कोप से झौंसी करियाई दंत पंक्तिया।गले में धारीदार ललका गमछा लपेटे आकर सामने खड़ा हो गया ।अम्मा का सोहर कर पैर छू ,गिलास रख , लोटा लिए सामने नल से पानी लेने चला गया । पानी गिलास में ढ़ार कर अम्मा को भेली पानी दिया और मेरी तरफ लोटा बढ़ा कहा -

"बहिनी तुम लोटवे से पी लो।"

भयंकर उमस में ठण्डा पानी पी कर जान में जान आई ।हाल चाल पूछने के बाद बलमा ने पूछा - "गावें कइसे जाऐंगी मलकिन ?"

अम्मा ने कहा- " पैदले ।"

गाँव अभी भी एक किलो मीटर था ,मेरी जान सूख गयी । 
बलमा ने मेरी तरफ देखा और अम्मा से कहा -"चलिए हम छोड़ देंगे।ओनिए जाना है।"


अम्मा तैयार हो गयींं ।हम उसकी फटफटिया राजदूत से जो पूरे रास्ते फटे बाँस के कर्कश भोंपू की तरह बजता रहा ,गाँव के बाहर अपने बाग तक पहुँचे ही थे कि अम्मा ने रोक दिया - 

"राहे द बाबू , अब हम चले जाएगें ।"

अम्मा ने दाँत दिखा उसे आभार व्यक्त किया ।बलमा कभी मुझको देखता ,कभी अम्मा को ,शायद कुछ कहना चाहता था पर कह नहीं पाया ।हम घर आ गये ।अम्मा ने ताला खोला ।हाथ मुँह धो कर मैंने चाय बनाया ।हमें देखते ही बगल के चाचा के यहाँ से दूध आ गया ।बड़की अम्मा आकर बैठ गयीं ,ललइ चाचा की माई भी आकर पीढ़ा  ले बैठ गयीं, अम्मा की बैठकी लग गयी । सबने चाय पी ,धीरे -धीरे लड़कियों को खबर लगी । रुना ,गीता,सीता ,सुधा आदि आ धमकीं ।शाम के खाने की चिन्ता नहीं थी । हम हमेशा की तरह मऊ से चलते वक्त पूड़ी- सब्जी लेकर चले थे । लड़कियों ने इशारा किया तो मैं अम्मा से पूछ धीरे से बाहर निकली ,काले -काले मेघ सरपट हमारे गाँव की ओर भागे चले आ रहे थे ।देखते -देखते अन्धेरा छा गया ।बस बुन्नी छूटने ही वाली थी ।मुझे देख बगल की बड़की माई ने कहा -

"बाह बेटी !अईलू त अईलू ,बरखा लेहले अईलू । जीय मोर रानी ।"

आशीष दे वह अपने जानवर खोल पलानी में बांधने लगींं । हम कुँवर बाबा के चौतरे पर बैठ गये,आज बगल में गोड़िन ने भरसांय नहीं झोंकी थी ।बरसात में लवना का अभाव रहता था ।घर की रोटी बनाए की सबका दाना भूजें।मैं सोचती रही,गीता ने टोका तो मेरी तन्द्रा टूटी - "तुमको बलमा छोड़ गया ?"

- "हाँ " कह मैं उसका मुँह ताकने लगी

- "तुमसे किसने कहा दीदी ?" मैंने पूछा,
- "पिंटुवा बता रहा था ।"

उसने मुँह लटका कर कहा ,मुझे ध्यान आया ,पिंटू कैंची साईकिल चलाते हुए गुजरा था।लड़कियाँ आज अप्रत्याशित ढ़ंग से चुप थीं ,मैं सोच में थी ,माज़रा क्या है ?
सुधा- "बेचारा गाँव तर आया था तो चाची को पानी -दाना तो पूछ लेना चाहिए था । "

वह खासी नाराज लग रही थी।
रुना और नाराज - "इ चाची के पास न तनिको व्यवहार नहीं है ।क्या सोचेगा बेचारा ।"

उसका मुँह और लटक गया।
सीता ने तो हद ही कर दी --"तुम तो बहुते सट के बैठी थी ।"

आँख नचा कर कहा।सब मुझे चील की तरह घूरे जा रही थीं ,जैसे मिनट में घोंट जाऐं।मेरा माथा घूम गया,हो गया धमाका,मैं तन के खड़ी हो गयी, कमर पर हाथ रख युद्ध की मुद्रा में , भौंह गुस्से में तान कर कहा -मतलब क्या है तुम्हारा सुधा दी ? मेरा पारा सातवें आसमान पर - "तुम लोग बहुत गन्दी हो।"

कह मैं पैर पटकते घर लौट आई ।मन अपमान से जला जा रहा था ।पहली बार चरित्र पर उंगली उठी थी ।मेरी रुलाई फूट पड़ी। हद है ,शकल से उस लुच्चे लफंगे के साथ ,छी : ,मेरा मन गुस्से से कसैला हुआ जा रहा था । गुस्सा  निकलना ही था ,अम्मा बाहर बरामदे में बैठी बेना हांक रही थी ,साथ -साथ बादल को घिरते देख मुक्त कंठ से कजरी गा रही थी 

"कैसे खेलन जाईं सावन में कजरिया ssss

बदरिया घिर आई ननदी ssss"


मैं धम से आ चौकी पर बैठ गयी - "क्या जरुरत थी आपको बलमा के साथ आने की ? "

मैं गुस्से में चिल्ला रही थी ।अम्मा ने बेना हांकना और गाना दोनों साथ में बन्द कर दिया । चेहरा खींच गया ,मेरी तरफ चिन्ता से देख पूछा - "हुआ क्या ? "

मैंने सब कह सुनाया ,अम्मा ने केवल इतना कहा - मौगड़ा है ,गलती हुई ,नहीं आना चाहिए था । "

हम खा -पी कर सो गये ।अगली सुबह उजाला छिटकते गीता मेरे सिराहने आकर खड़ी हुई ,आहट पा मैं जग गयी । अंगूठे से जमीन की मिट्टी कुरेदते हुए कहा - "चलो बाहर घूम आते हैं ।"

मेरी तरफ देख कर -"अजोर हो रहा है । "

मैं चप्पल पैर में ड़ाल चल पड़ी ,अम्मा लौट आई थी ,आकर नहा रही थी आँगन में ।हम रास्ते भर चुप रहे,आज वो मुझसे हाथ भर की दूरी पर बैठी थी ,बार -बार मेरी तरफ देखती और कुछ कहते -कहते रुक जाती ।हम लौट कर पानी छू ,हाथ धो ,दातून ले बाहर नीम के पेड़ के चौतरे पर बैठ दातून करने लगे ।सामने वाले ढ़ेला भइया गाय लगा रहे थे ,दूध छर्र sss-छर्र ssकी आवाज के साथ बाल्टी में  गिर रहा था । सीता झांडू ले घर बुहार रही थी ,बीच- बीच में कनखिया से हमें देख लेती । टोले के छोटे लड़के -लड़कियों का खेल पराते से शुरु हो गया  था  ,रात भर बरखा हुई थी ,आस-- पास गड्ढ़ों में पानी भर गया था ,बच्चे नंग धड़ंग छप्पक छप पानी में खेल रहे थे। हम दातून कर बहरी अँगना मुँह धो घर में लौटे ।अम्मा चाय बना खाना चढ़ा चुकी थींं ।लोटा से दो गिलासों में चाय ढ़ार हम छत पर चले गये ।मौसम अब भी सुहावना था ,बादल आसमान में जमें हुए थे ।मेरा प्रिय मौसम ,मैं दुवार की ओर मुँह करके बैठी चाय पीने लगी । गीता सुड़- सुड़ करती चाय पी रही थी ,मुझे उसके आवाज करके चाय पीने पर बहुत गुस्सा आता ,घूरते देख वह आवाज धीमें कर पीती रही ।गीता मुझे देख कर मुस्कीयाती और लजा जाती ।उसकी इस हरकत पर मेरी हँसी छूट गयी ,मैं अभी हँस ही रही थी कि उसने कमर के पास से सलवार में से मुड़े -तुड़े कागज निकाल मेरी हथेलियों पर रख दिया -"बेबी तुमको विद्या माई की किरिया ,केहू से कहना मत।"
मैंने भौंहों के इशारे से पूछा - "है क्या यह?
वह लजा कर लाल हो गयी ,धीरे से कहा -चिट्ठी"

मैं ने तपाक से पूछा- " किसकी ?"


मेरी हथेलियों पर उसने चिट्ठियों की गठरी रख दी और शर्मा कर कहा पढ़ लो। मारे कौतुहल के मेरे पेट में गुड़- गुड़ मच गयी ,दिमाग में सिंटी बजने लगी ,कहीं दूर हवा में ज्यों लहराया हो प्रेम में माता दुपट्टा और मैं दुवार पर नीम पर पड़े दो पलिया झूला पर बैठी हवा से बातें कर रही होऊं । मेरे हाथों में पहली बार किसी का प्रेम पत्र था ,झट खोल मैं पढ़ने बैठ गयी और ये क्या ,सब के सब खून से लिखे ?


"लिखता हूँ खत खून से स्याही न समझना
मरता हूँ तेरी याद में जिन्दा न समझना"

अगले खत में एक और शायरी....

"काली काली साड़ी पे कढ़ाई नहीं फबती
गोरी तेरी याद में जवानी नहीं कटती"

खत की भाषा पूरी सी ग्रेड सिनेमा की ,मेरा मन खराब हो गया । चौदहवीं के उम्र में प्रेम पत्र का सुकोमल आकर्षण तार- तार हो गया । लिखने वाला खासा चालाक था ,अपना नाम नहीं लिखा था ।मैं अन्दर ही अन्दर भून कर राख हुए जा रही थी ,पर कुछ राज उगलवाने थे अभी इस लिए चुप रही । मैंने धैर्य पूर्वक पूछा - "किसने लिखी ?"


उसने घुटनों में सिर छिपा लिया ,मैंने कुहनी से ठेल कर दुबारा पूछा - "बताओ भी किसने लिखा?"

 और यह क्या ,थोड़ी देर में ही उसका लाज छू मंतर ,ही ही ही हँसते हुए मेरे गले में हाथ डाल कर कान में कहा -"बलमा !"

सुनते मुझे लगा कि  मैं बेहोश हो जाऊंगी ,मारे सदमें के,यह दूध सी उजली, चिकनी लड़की और वह लोफर मजनु बलमा ,मैं मुँह बिचकाए उसका मुँह ताकती रही कि नीचे से अम्मा की आवाज आई-

 "अरे तनी खेत में से नेनुवा लेते आती बेबी ! बाबूजी आने वाले हैं ।"

मैं बेमन से डाली ले गीता दी संग दुवार के खेत में पहुँची ,गीता खुल चुकी थी ,चहक -चहक बता रही थी कि पिछले मेले में बलमा ने गुलाब की महक वाला सेण्ट दिया था ,एक कलम स्कूल के डहर में मिला तो ,एक दिल छपा रुमाल कुसुम की शादी में जब फोटे खींचने आया था ,तब दिया ।वह रेलती रही और मैं खोज -खोज भर ड़ाली नेनुआ तोड़ती रही ,हल्की फुहार पड़ने लगी तो हम सिर ओढ़नी से ढ़क घर की तरफ भागे ।वह अपने घर में घुस गयी मैं भागी अपने घर में । दस बजे बाबूजी भी आ गये । अम्मा बता रही थी - "रात भर गोड़ तोर कर बरखा हुई है तिवारी जी ,आना सुफल हुआ ।कुल खेत रोपा जाएगा ।"

देखते- देखते रोपनी करने वाली मजूरनों से दुवार भर गया ।जवान लड़कियाँ और औरतें ,अम्मा ने रोपनी का अंगुवा निकाल कर सबको बताशे बाटेंं ,सब की सब पानी में भींगी  ,शरीर पर कपड़े चिपके ,माथे पर से सिन्दूर की रेख बह कर पूरे चेहरे को रंगे हुए, जोगिया रंग में रंगाया चेहरा ,हँसती ,गाती ,माती पवन सी ये श्रमशील औरतें मेरे दुवार को रजगज किये उमंग से भरी मौसमी गीत कोरस में गा रही थीं ।अम्मा की विशेष मांग और चाय के आश्वासन पर झुल्लनबो ने कहरवा गाया - 


  "   के मोर जइयें ssरे उरबी पुरबीया रे sssजान
       आये के मोर जनिये कलकतवा रे sssजान
       देवर मोर जइयें उरबी पुरबीया रे ssजान
       सइया मोर जइयें कलकतवा रे sssजान
       केsइ रे लेअइsहें लाल चोटी बनवा रे ssजान
        केइ रे लेअइsहें फुलगेनवा रेss जान
        देवर मोर लेअइsहें लाल चोटी बनवा रेss जान
         सइया मोर लेअइssहें फुलगेनवा रे ssजान
         केइ के लगइsहें लाल चोटी बनवा रेss जान
         केइ रे लगइsहें फुलगेनवा रेss जान
          देवर लगइsहें लाल चोटी बनवा रेेेsss जान
           हम पिया खेलिब फुलगेनवा रेेेsss जान "

इन गीतों को सुन मन उल्लास से भर गया ,सबने चाय पी भरुके में ,मैंने डायरी में दर्ज कर लिया उन गीतों को ,नहीं जानती थी उन दिनों मैं अपने अंचल की सबसे अनमोल थाती सहेज रही हूँ । औरतों का आधा समूह बाबूजी के साथ कुटी वाले खेत की ओर चला गया ,आधा अम्मा के साथ दुवार पर ।घर खाली ,सुधा और रुमा भींजते मेरे घर में घुसीं ,मैं खुश हो गयी ,अकेले बोर हो रही थी । दसवीं पास कर लिया था ।ग्यारहवीं की किताबें लेकर आयी थी पर मन था कि गीता और बलमा जी के लव स्टोरी में अटका था ।रुमा ,सीता ,गीता ,सुधा सब पिरथी पुर साइकिल से पढ़ने जाती थीं ,जून का महींना होने से स्कूल सबके बन्द चल रहे थे । वह आयीं तो राहत मिली ,चलो कुछ गीत इनसे पूछ लिख लेतीं हूँ सोच डायरी और पेन ले बैठ गयी ।काले रंग की सुनहरे किनारी वाली मोटी डायरी देख दोनों मुँह बाए ,आँख फाड़े मुझे आश्चर्य से देखने लगी -

"इ तो बहुत महंगा होगा बेबी ! "

रुमा ने कहा तो मैं हँस पड़ी -

"अरे नहीं दीदी!  किताबों के प्रकाशक  हर साल बाबूजी को स्कूल में बहुत सारी डायरी दे जाते हैं । उन्हीं में से कभी कभार हमें भी मिल जाती है। " 

मैंने दोनों से वादा किया ,अगली बार आप दोनो के लिए डायरी ले कर आऊंगी । लड़कियाँ खुश हो गयीं ,मैंने गाना पूछा तो दोनों अपनी गाने की कॉपी देने की बात कह टाल गयीं ।मैं समझ गयी आने का उद्देश्य कुछ और है। 
                        अभी वह खुलतीं कि रुमा का भतीजा आकर बुला ले गया कि माई बुला रही है।रह गयी सुधा,सुधा का सांवला चेहरा लम्बी मुस्कान से खिल उठा था - 

"क्या बात है दिदिया "?

मैंने पूछा तो गीता की मुद्रा में वह भी लजा गयी ।सर घुटनों में ,मेरा माथा ठनका ,आगे उसकी कमर से भी सलवार में गाठें चिट्ठियों की पोटली ,वही खून से रक्तरंजित प्रेम पत्र । मरने जीने रात भर करवटें बदलने की बेचैनी । मैंने मुँह बिचका लिया ,वह रो रही थी ।

"हम उससे बहुत पियार करतें हैं बेबी ।जब कल तुम उसके साथ आई ,मेरा कलेजा जल गया ।" 

झर -झर आँसू ।इन लड़कियों के लिए गले में कैमरा टांगे ,जुल्फें लहराते, पान चबाते चलने वाला बलमा हीरो था ,मेरी नज़र में शहर का सड़क छाप मज़नू ।मेरी हँसी ऐसी छूटी की लोट पोट ।मन में आया कह दूं ,उस बन्दर के साथ आप सोच भी कैसे सकतीं हैं ,पर बुद्धि ने काम किया ,सम्हल गयी - 

"अरे नहीं दीदी ,वह तो मुझे बहिनी कह रहा था । "

वह गहरी साँस छोड़ राहत भरी मुस्कान संग टपाक से बोली -

"सही में?"

मैंने उसी अदा से उत्तर दिया -"सही में।"

                                                                   (2)


दोपहर होने को आया था ,बादल थे कि गाँव में आकर जम गये थे ,चारों तरफ बिछलहर ,कीरा -बिच्छी भी प्रकट होने लगे ।अम्मा छाता ताने भनभनाती आ रही थी -

"कबसे कह रही हूँ पैखाना बनवा दीजिए, सुनते ही नहीं ।लड़कियाँ इस मौसम में ना जाने कहाँ जाऐंगी । "

ठण्डी हवा का झोंका खिड़की से आ रहा था ,मैं खटिया खींच कर खिड़की के पास आकर बैठ गयी । बाहर छोटे -छोटे गड्ढों में भरे पानी में गौरैयों का झुण्ड डूबक -डूबक कर नहा रहा था ।सामने वाले ढ़ेला भइया का पाँच साल का बेटा चुन्नू नंग धड़ंग पानी में कूद -कूद खेल रहा था ,कमर में काले धागे की करधन में लाल -काली मोतियों के साथ छोटा सा पीतल का घुंघरु रुनझून बजता और उसकी झुन्नी दाऐं बाऐं साथ में नाचती ।इधर चिड़ियों की चहक उधर चुन्नू का पानी कूद नाच चल ही रहा था कि भीतर से चिल्लाती आजी बाहर निकलीं और चटाक -चटाक चार थपरा मार बाँह घसीटते  बहू को गरियाते उसे अन्दर लेकर चली गयीं । पानी तेज हो गया और बौछार अन्दर आने लगा तो अम्मा बाबूजी का गुस्सा मुझ पर उतारने लगीं  ,खटिया समेत मुझे खींच भड़ाक -भड़ाक खिड़की लगा दिया । मैं चुप लगाए बैठी रही ,इसी में कुशल था । अम्मा बरामदे में बोरशी में अहरा सुलगा खाने की तैयारी में लग गयी ।बाहर मुसलाधार बारिश हो रही थी ,रह -रह कर बिजली कड़कती और भड़ाम से कहीं जा कर गिरती ,अन्धेरा छा गया ।मैंने लालटेन जलाकर बाहर बरामदे के ताखे पर रख दिया ।आँगन के ताखे पर ढिबरी जला आई । अम्मा बाहर कोली (पतली गली)की तरफ बार- बार झांक आती ,बाबूजी की चिन्ता साफ झलक रही थी । मैनें आंटा गूंथ कर रख दिया ।अम्मा आग पर आलू ,टमाटर भूनने लगी । चूल्हा खुले आँगन में होने से आज भौरी ,चोखा अहरे पर लग रहा था । चिन्ता मुझे भी हो रही थी ,घड़ी में देखा ,अभी शाम के चार ही बजे थे और सबके खपरैल ,आँगन से धूंआ उठने लगा था ।बरसात में जीव जन्तु के डर से लोग सकेरे बना खा कर पटा जाते थे ।अब मैं भी रह- रह कर कोली की ओर झांक आती ,अचानक बाबूजी आते दिखे तो माँ ,बेटी ने चैन की साँस ली ।बाबूजी भींग कर लथपथ ,कपड़ा उतार , हाथ मुँह धो आकर बरामदे में खटिया पर रेडियो ले बैठ गये ,अम्मा ने चाय बना कर दिया ,मैं कमरे में लौट आई ,रेडियो पर बी .बी .सी .से समाचार लगा बाबूजी न्यूज सुनने लगे ।रेडियो घरघराता तो चारों तरफ घूमा कर सिगनल मिलाने का प्रयास करते और अन्त में हार कर बन्द कर रख दिया । दोनों बोरशी में मिलकर भौरी सेंकने लगे । कमरे में लैम्प जला मैं किताब ले पढ़ने बैठ गयी । रुमा अपने गीत की कॉपी लिए आयी ।हम गीत लिखने लगे ,अचानक कॉपी से सरक कर मुड़ा हुआ  कागज मेरे सामने गिरा ।रुमा मेरी तरफ पीठ किये चम्पक पढ़ने में मगन थी । मैं कागज खोल कर पढ़ने लगी ,हद है महराज ,सामने छलिया बलमा का आज तीसरा रक्त रंजित प्रेम -पत्र । अम्मा ने आवाज दी तो मैं झट कागज को कॉपी में छिपा चारपाई से उठ खड़ी हो गयी ,एक दम सावधान की मुद्रा में। अम्मा हाथ में टार्च लिए खड़ी थी -

"उसने पूछा -बाहर जाओगी  ? "

मैंने ना में गर्दन नचाया ।वह चली गयी तो मैंने राहत की साँस ली । कागज निकाल रुमा को दिखा कर पूछा -"ये क्या है?"

और बदले में वही पुराना गीता और रुना का उत्तर ।सुनकर मेरा दिमाग चकराने लगा । मन में उथल- पुथल मच गयी ,बड़ा धूर्त है बलमा ,एक साथ मेरे टोले की तीन लड़कियों को प्रेम जाल में फांसे है । रुमा उसके उपहारों के किस्से सुनाती रही ,वही पेन ,सेण्ट ,रुमाल इधर भी उधर भी ।रुमा चली गयी ,सुबह से तीन प्रेम -पत्र और एक प्रेमी की कहानी सुन दिमाग का दही हुआ जा रहा  था ।कभी मन होता सबके घर जाकर कह दूं और बलमा की जम कर धुनाई करवादूँ, फिर खयाल आता कि लड़कियों की तोड़ाई पहले होगी ,बदनामी अलग से , मैं सोचती रही ।अम्मा ने सोचा मैं पढ़ रही हूँ ,खाना लाकर खटिया पर रख दिया ।रुमा सुनियोजित ढंग से आयी थी ,मुझे विचार मग्न देख न जाने कब उठ कर चली गयी मुझे ध्यान ही नहीं रहा । मेरी आँखें वैचारिक तनाव से भारी हो चुकी थीं ,भूख ना जाने कहाँ बिला गयी ,मुझे भूख नहीं अम्मा ! कह मैं आँख बन्द कर सोने की कोशिश करती रही । अम्मा के निहोरा पर बड़ी मुश्किल से एक भौरी खा पायी उस रात ।

                     बरसात की रात ,बाहर नीम पर झिंगुरों की झनझनाहट और जीव जन्तु की तरह -तरह की आवाजें माहौल को डरवना बनाए हुई थीं ।रात आठ बजे बिजली आई तो राहत मिली ,घड़ी में आठ बज रहे थे ।एक ही कमरे में पंखा होने से हम तीनों की खटिया साथ लगी ,किनारे -किनारे अम्मा -बाबूजी ,बीच में मैं । दिन भर के थके दोनों बिस्तर पर जाते सो गये । मेरी बेचैनी का आलम यह था कि मिले बलमा तो मुँह कूच दूँ ।बच गयी थी सीता ,नहीं sssनहीं ,वह तो गाय है । सामने दीवार पर टंगे कैलेण्डर में कृष्ण, राधा संग रास रचा रहे थे ,बीच में राधा -कृष्ण किनारे -किनारे गोपी- कृष्ण। सवाल जो उछल -कूद दिमाग में कर रहा था ,वह था कि बलमा की राधा कौन ? अभी कितनी उसके मोह -पाश में हैं ,आदि -आदि। सोचते -विचारते कब नींद लगी पता ही नहीं चला ,सुबह नींद तब खुली जब अम्मा-बाबूजी के चिल्लम -चिल्ली की आवाज कान में पड़ी। अम्मा  फटे भोंपू की तरह चिल्ला रही थी -

 " कहते -कहते मुँह छिला गया ,पर इनके कान में रुई पड़ी है ।"

उधर से तेरी माँ-बहन ,लकड़ाजी ,अठराजी का पलटवार था। मैं बिस्तर पर आधी सोई -जागी कुहराम सुन मारे डर के उठ बैठी,दीवार पर टंगी घड़ी पर नज़र गयी तो आश्चर्य हुआ ,आठ बज रहे थे और कोठरी में उजाले का नामो निशान नहीं । मैं आँख मलते खिड़की के पास पहुँची ,और ये क्या ! इतनी मूसलाधार बारिश कि दुवार गड़ही में तबदील ,सामने वाली आजी गाल पर हाथ धरे चिन्तामग्न ,पशु घुटने तक पानी में खड़े रम्भा रहे थे ,दिन है कि रात कहना मुश्किल ,आकाश से प्रलय बरस रहा था ..।भीतरी बरामदे में आई, सामने आँगन का हाले आलम यह था कि चूल्हा डूब कर पानी में अपना अस्तित्व खो चुका था। ये तो गनीमत था कि आँगन कमर तक नीचे था वरना अब तक वैतरणी घर में हेल -ठेल चुकी होती ।तुलसी मईया अपने ऊचे आशन पर बारिश के  गिरते धार से दब कर, ओलरकर पसर गयीं थीं । हाँ लौकी -कोहड़े की बेल जरुर मगन थी ,आँगन से छत तक फैली बेलों को मैं देखने लगी, अचानकअम्मा चिल्लाई -

"अरे तिवारी जी कीरा हो ssss"

 और मैं लपक के बरामदे की चौकी पर। बाबूजी चौकी पर से कूद कर लप से कोने खड़ियाये गोजी पर झपटे ..कीरा नाली के रास्ते तैरता आँगन में घूसा चला आ रहा था कि दरवाजे से हाथ में दूध का लोटा लिए चले आ रहे ललइ चाचा हो हो हो हँसते बरामदे में दाखिल हुए ,लोटा झट चौकी पर धर पट बाबू जी से गोंजी छीन साँप को जिधर से आया था उधर ठेल दिया ।अम्मा की तरफ देख कर हँसते हुए -"तू हूँ न भौजी ! 

"ड़ोढ़हा देख के एतना चेकर रही हैंं ,करइत देख के त बेहोशे हो जाएगीं महराज! "


लोटा का दूध ले चुल्हानी पीढ़ा खींच कर बैठ गये ।अम्मा ने मौसम देख बरामदे में उठवना चूल्हा डाल लिया था ,गोइंठी की आंच पा अब तक कोरा चूल्हा आधा सूख भी चुका था ,ललई चाचा अम्मा की इस कला की तारीफ करते -करते चुल्हानी पहुँच गये-

"ए भौजी तनी चा पियावा जल्दी ,साला बुन्नी अस पड़ल की जाड़ा लागे लागल । "

वह अम्मा से कहते कम मुस्कियाते ज्यादा । बाबूजी गुस्से से कुढ़ रहे थे ,मऊ होता और कोई अम्मा से ऐसे बतियाता ,अब तक तो लात मार भगा गया होतो, पर यह गाँव था ,अपने लोग ,घर का मुख्य द्वार सुबह खुलता तो रात को ही बन्द होता ,आदमी तो आदमी मन चाहे तो कुत्ते भी किसी को न पाऐं तो आँगन में टहल आऐं । ऐसा गाँव ,अब बाबू जी की घोर मजबूरी का आलम यह था कि चौकी पर हाथ में इण्डिया टूडे लिए बैठे चाचा को दस मिनट से घूर रहे थे ।मैं ताखे से ब्रश, मंजन ले दाँत बरामदे की सीढ़ियों पर बैठ कर साफ करने लगी ।अन्तत: बाबूजी का धैर्य टूट गया -"अरे क्या मउगाइ करते हो यार ,चौकी की ओर इशारा करके -

"यहाँ बैठो ,चाय आ जाएगी ।"






चाचा गमछा झटकते चौकी पर आकर बैठ गये ,मैं माँ के पास पहुँची ,तब तक वह चार गिलासों में चाय छान चुकी थी ,चाचा ,बाबूजी को चाय दे मैं बाहरी बरामदे में आकर लकड़ी की हत्थेवाली कुर्सी पर पैर रख चाय पीने लगी । पानी से नहाए हुए नीम पर चीड़ियों के कई घोंसले थे, सबसे नीचे गौरैयों का घोंसला ,तीन छोटे -छोटे बच्चे चोंच खोले चांव, चांव, चांव कर रहे थे ,गौरैया पंख का पानी बार- बार झटकती बच्चों की रखवाली करती घोंसले के चारों ओर फुदक रही थी ,नीड़ की चिंता ,बच्चों की फीक्र उस नन्ही चिड़िया के हाव -भाव से साफ झलक रहा था ।मैं टकटकी लगाए मगन देख रही थी कि भहरा कर किसी के पीछे से  मकान के गिरने की आवाज आई, चीख -पुकार,रोना -चिल्लाना और कोहराम ।लोग घरों से निकल कर छपकते हुए भागे जिधर से आवाज आई थी उधर,अन्दर से बाबूजी और चाचा भी निकल कर भागे ।बच्चे जाने के लिए मचलने लगे ,औरतें बाँह मरोड़ कर खींच- खींच भीतर करतीं ।अम्मा भी बाहर निकल आई ,मैंने पूछा-

" क्या हुआ?"

 "कौनों तेलियों का घर गिरा है, लगता है ।"  

अम्मा के चेहरे पर घबराहट थी । सीता ,सुधा ,रुमा, सलवार उठाए मेरे घर की ओर भागी चली आ रही थीं ,आते भींजते छत पर ,मैं भी पीछे हो ली । हम छत पर पूरब के कोने में खड़े थे ,सामने ह्रदयविदारक दृश्य। कच्चा मकान ध्वस्त हो चुका था ,पूरा गाँव देखते -देखते उमड़ पड़ा था ,चन्नर साहू के दुवार पर ,अन्दर फसे लोगों को लड़के हड़बड़ -तड़बड़ डांड, मुंडेर की लकड़ी ,खपड़ा हटा कर निकाल रहे थे ।घर की बूढ़ी औरत आगे की कोठरी में सोई रही होगी उस वक्त ,माथा फूट चुका था। खून से लथपथ ,पहली लाश बाहर निकली ।मैं देख नहीं पाई ,घबड़ाकर नीचे उतर आई ।लड़कियाँ ड़टीं रहीं। विनाशलीला के बाद बरखा के तेवर नरम पड़ने लगे ,दोपहर होते -होते बारिश बन्द हो गयी ।घर आँगन में ठहरा पानी उतरने लगा । सगड़ा तलाब लबालब भर गये। खेतों में रोपी फसल गर्दन तक जलमग्न ।मेंढ़क टर्र - टर्र का राग अलाप रहे थे । चारों तरफ बिछलहर ,चमरौटी ,भरौटी ,अहीरौटी  से भी कच्चे मकान गिरने की खबर आ रही थी । चन्नर साहू की माँ और बेटी के दो अबोध बच्चे मलवे में दब कर मर गये ,बाकियों को मंगल दल के लड़कों ने जान पर खेल कर बचा लिया ।आनन- फानन में चंदा लगा कर ट्रैक्टर पर लाद घायलों को मरदह ले जाया गया ,वहाँ से जिला अस्पताल गाजीपुर ।बाबूजी थैली का रुपया झार आए थे ,आते ही मऊ जाने को तैयार ।अम्मा ने पूछा -

"बाकी का खेत कैसे रोपाएगा ? "

पैसा खतम हो गया ,नज़रें चुरा कर कहते बाबूजी अन्दर चले गये । बाबूजी दो दिन बाद रुपया लेकर आने को कह चले गये ।गाँव में मातमी सन्नाटा । पीछे से डेक- डेक रोने की आवाजें रह- रह कर किसी रिश्तेदार के आने पर आतींं ।मन विचलित हो जाता ।दिन में किसी ने खाना नहीं खाया ।बाबूजी भी चले गये थे।अम्मा ने लालटेन जलाते हुए कहा -

"मेरा मन नहीं है खाने का ,थोड़ा बहुत मन करे तो खालो बेबी!"

मैं अम्मा का मुँह देखती रही। मृत्यु का पहला दृश्य था मेरे सामने ,विभत्स ,खून ,चीख चीत्कार के साथ अपनों को खोने की पीड़ा ।दुखों ,अभाव के बीच खुद को बचाए रखने की जद्दोजहद देखा था ,घर क्या गिरा चन्दर साहू के जीवन से पर्दा उठ गया ।सेर पाव अनाज के बदले नून ,तेल, हरदी बेच कर पुरखों की मर्यादा पर पैबन्द साटे रखने की कोशिश आज बरखा ने धो पोंछ कर बहा दिया । जो भीतर का निकल कर सामने आया ,बस एक नंगा ,भूखा सच ,कुछ भी शेष नहीं ।गाँव न होता ,अपने लोग न होते तो आज शायद पूरा कुनबा उजड़ चुका होता । साहू जी बेहोश थे ,औरत का कमर टूटा था ,दोनों बेटे बगल के चाचा के दालान में सोने से बच गये थे ।दोनो चौदह और सोलह साल के ,बहन भी घायल थी ।गल्ला झाड़ झूड़ कर बमुश्किल एक हजार निकला ,कुछ माँ के गहने ,कुछ गाँव और अपने लोग ।जीवन की जंग जारी थी । पूरे दिन गाँव में चर्चा चलती रही।अन्धेरा घिर आया ।ललई चाचा की माई पैना लिए टूघुर-टूघुर चली आ रही थीं, हाँफते हुए बरामदे की सीढ़ियाँ चढ़तीं अम्मा को आवाज दी - 

"आ बबुआ बो ,कहाँss हो ?"

 आवाज सुन अम्मा बाहर निकल आई ,कुर्सी खींच कर बिठा दिया ,खुद भी बैठ गयीं ।देख कर गोद में पोते को जांते ढ़ेला भइया की माई भी आ गयीं, तनी देर में बड़की माई भी ।औरतें आज शोकाकुल साहू परिवार की विपदा पर चर्चा करने लगीं। आजी सिर पर हाथ धरे बैठीं कह रही थीं -

"अतवार मंगर की पूरदिनिया बरखा जीव खा के ही पटाती है बबुआ बो ! अतवार ,मंगर बड़ा खर दिन होता है ,अभी पाँच जीव लेगी।"

ढ़ेला भइया की माई कपार पर हाथ धरे कह रही थीं ,लड़कियाँ भी धीरे -धीरे जुट गयीं ,हम अन्दर की कोठरी में आकर चौकी पर बैठ गये, गीता दीदी चिन्तीत थी -"कल पूनम की बारात आएगी उपधियाने में ,का जानी कल का होगा ?"

 पूनम उसकी सहेली थी । 

"भदराही होंगीं तो बरसेगा ही ।"

रुना तुनक कर बोली ।

 सीता दीदी -"हे शुभ -शुभ बोलो भाई ,गाँव की इज्जत है ।"

कहते हुए जोर से डपटी । सब सटक गयीं ,सुधा ने धीरे से कहा - "बरखा बुन्नी में दिने नहीं धरना चाहिए बियाह का ।"

सीता दीदी फिर डपटी - "अब जब दिन पंडित बताऐगा तभी न रखेंगे।"

सब चुप हो गयीं । उस रात सब खा पी कर मेरे घर ही सोईं ,एक भयानक रात का अन्धेरा उतरा तो सुबह का स्वागत नीम की शाखाओं पर फूदकती गौरैया ने सपरिवार चहचहा कर किया।



             

                                                               (3)


भोर होते लड़कियाँ अपने घर लौट गयीं,छः बजे थे और सूरज दनदनाते हुए चमकिला हुआ जा रहा था ।मैं ब्रश कर लैट्रीन सीता दीदी के घर जाने के लिए अम्मा से पूछ निकल गयी । सीता दीदी का परिवार हमारे कुनबे का सुविधा सम्पन्न परिवार था ।चाचा प्राईमरी में हेडमास्टर और चाची गाँव की प्रधान ,मैं पहुँची तो आशय ताड़ चाची अन्दर लेकर आयीं ।छोटी चुन्नी से पानी छत पर पहुँचवा दिया, इस घर में हमारा बहुत मान था ।चुन्नी ने हाथ धुलवाया और खींच कर सीता दी के कमरे में ले गयी ,सामने रसोईं में भाभियाँ खाना बना रही थीं। सीता दीदी बिस्तर पर औंधे लेटी कुछ देख रही थी ,आहट पा झट तकिए के नीचे रख दिया ।मैं आकर उनके पास बैठ गयी ।शैतान छोटी चुन्नी उनके उठ कर बैठते ही तकिए के नीचे का रहस्य उद्घाटित कर मेरी हथेलियों पर रख कर हँसने लगी - "इ देखो जीजा की फोटो।"

 सीता लजा गयी ,चोरी पकड़ी गयी थी ।चुन्नी सामने की खुली आलमारी से लोहे का छोटा सा बक्सा उतार लाई ,खोल कर लिफाफे से सीता की तस्वीरें दिखाने लगी ,लड़केवालों को दिखाने के लिए सीता की ढ़ेर सारी तस्वीरें ,कोई साड़ी में ,कोई सलवार कुर्ते में ,एक में चेहरा गुलाब के फूल के बीच ,कोई दिल से झांकता ,मैं एक -एक कर तस्वीरें देख रही थी ,चुन्नी मेरी गोद में झूंकी मचल -मचल कर दिखा रही थी । दीदी ने पूछा -"कैसी लगी ?"

मैंने मुस्कुराकर कहा -"बहुत अच्छी हैं ,जीजा झट पसन्द कर लेंगें। "

उसके गोरे गाल लाल हो गये -" वो तो है बेबी! बलमा की खींची फोटो तो कमाल की होती हैं ,लंगड़ी, लूली से भी लोग धोखा खा जाऐं । ऐसा फोटो बैठाता है कि पूछो मत ,खड़ी रहो स्टूडियो में बाग में पहुँचा देगा ।"

सीता दी खुली हुई जाड़े की धूप की तरह दमक रही थी ,आँखें उसके नाम से मयूर बन नाच रहे थे । मेरा खून उबल रहा था पर खुद पर नियन्त्रण किए हुए थी , बलमा नाम का जीव अब बर्दाश्त से बाहर जा रहा था-" दीदी इसमें क्या कमाल है ,ये सब तो कम्प्यूटर से होता है।"

मेरी बात सुनते वह चीढ़ गयी ,अन्दर से चुन्नी को भाभी ने आवाज दी - "छोटकी बन्नी ,चाय ले जाइए । "

वह चली गयी । सीता ने पिनक कर कहा -"उसके अइसन फोटो बनारस में नहीं उतरती ,बड़की भाभी कह रही थीं । "

बड़ी भाभी बनारस की थीं - "फोटो अच्छी खींचता है कि वह अच्छा है ?"

मैंने आँख नचा कर कुहनियाया । वह शर्म से लाल, मैं आँख मटका रही थी - "भक्क ! तू भी "

कह वह थोड़ी देर ठहरी और फट उठ आलमारी के कोने से किताबों के बीच से एक कागज निकाल लाई -"ये देख उसने मुझे खून से खत लिखा था ।"

मैंने खोल के देखा ,वही पुराना राग ,लिखता हूँ खत खून से । मैं हँस पड़ीं ,बहुत शातिर है ये बलमा ,मुर्गी के खून से चिट्ठी लिख कर लड़कियों को मूर्ख बनाता है ।वह नाराज हो गयी -"अच्छा तुम्हारी नाक सूंघनी मशीन है जो जान गयी खून किसका है ?

मैं हँसे जा रही थी ,तभी चुन्नी बाहर सबको चाय दे हमें लेकर अन्दर आई ।मैं चाय पी ही रही थी कि गीता बुलाने आ गयी -" चलो! चाची बुला रही हैं । "

मैं बेमन से उठ कर चल दी ,इधर घण्टें भर में ललई चाचा ,अम्मा के वीर हनुमान मजदूरा -मिस्त्री पकड़ लाए ।ईंटा पहले सेे हाते में एक टाली पड़ा हुआ था ,गिट्टी -बालू ट्यूबल का लिंटर लगने के लिए आया था जो काम भर वहाँ से मिल गया । मोटर साइकिल पर लाद कर महारे से दो बोरी सिमेण्ट आ गया । ज़मीन नम थी ,आधे घण्टे में हाते में पखाने की नींव खुद गयी । अम्मा महान  बाबूजी की जेब से पाँच -पाँच सौ की चार नोट भांज चुकी थी ,कुछ चौरौंधा पहले का ,जिद की पक्की माता जी ने देखते -देखते एक दिन में ही पखाने की दीवार उठवा दी ।शाम तक मरदह से नीले रंग का कंम्बोड़ भी  आ गया, अगले दिन शाम तक लिंटर की तैयारी ,तीसरे दिन लिंटर लग कर तैयार । बड़की माई देख कर जल भून गयीं, बाबूजी को खबर गयी ,मलकिनिया कुल काम अपने मन का करती है । चौथे दिन बाबूजी प्रकट हुए ,देखते ही ललई चाचा गोड़ छू सरक लिए ,जानते थे अगला दृश्य क्या होगा। मैं पानी दे किताब ले बैठ गयी,मारे डर के मेरी हालत खराब ,ना जाने अगला दृश्य क्या हो ?हो सकता है बाबूजी मार फरुआ देवलिए ढ़ाह दें,वाकयुद्ध की सम्भावना प्रबल थी ,मल्लयुद्ध भी हो सकता था ।अम्मा पखाने की छत पर पानी ड़लवा रही थी तरी के लिए। बाबूजी हाते में पहुँचे ,घूम कर निरीक्षण किया - "तनिको धीरज नहीं है तुममें ,थोड़ा इन्तजार कर लेती इ साला ललईया घटिया क्वालिटी का कंम्बोड़ ले आकर बिठवा दिया । देखना साले भर में टूट -फूट जाएगा ।"

बाबूजी का भनभनाना जारी था ,पर आवाज की नरमी बता रही थी काम अच्छा है ।उनका पुरुष  इगो कैसे अम्मा के इस मर्दाने काम को सहजता से स्वीकारता सो थोड़ी बहुत ड़ांट- डपट लाज़मी था। अम्मा ने धीरे से कहा -"आप का नौ मन गेंहूँ होगा न राधा उठ कर नाचेगी ,लड़कियाँ इनके उनके घर छिछियाती फिरें ,ठीक है ।"

बाबूजी निरुत्तर, गाँव हमारे लिए किसानी के दिनों के लिए सराय मात्र रह गया था ,सुविधाओं का संसार शहर में बसा बाबू जी गाँव को लेकर उदासीन थे,अम्मा सजग ।यहाँ जो भी था अम्मा के प्रयास का प्रतिफल था ,एक अध्याय और जुड़ा ।
एक दिन सबेरे किरन फूटते सीता दीदी की अम्मा घर में आकर खड़ी हुईं -"ए बहिन जी ! आठ बजे ले झट तैयार हो जाइब  ।"

अम्मा झाड़ू लगाना छोड़ आकर उनके सामने खड़ी हुईं -"कहाँ जाए के है जी भिनहिए ।"

कह ध्यान से उनके चिन्तित चेहरे को देखने लगीं।
-"सीतवा के देखे ओकर सास लेहड़ लेके आवतहीय  जी ,महारे । आपक देवर  आपके आ भाई जी के साथे चले के कहलं हैं । जनते हयीं  जनता के ,केहू जाने न।"

 कह बाबूजी को दरवाजे की ओट से कहने चलीं गयी । अम्मा झट -पट खाना बना तैयार होने लगी ,लाल कोटा की साड़ी जिसका किनारा काले और सुनहरे रंग का था अम्मा पहन ,बीच माथे पर लाल रंग का इंगूर का टीका लगा जब कमरे से बाहर निकली पहले से सिल्क का कुर्ता ,खादी की चौड़े पाटे वाली धोती ,सदरी 'बंगाली गमछा ले बैठे बाबूजी ने ऊपर से नीचे तक देख कर मुस्कुराकर कहा -"चलिए मेम साहब ! "
अम्मा लजा गयी ।बस इतना भर देखा था उनके बीच का नेह ,कभी माँ -बाप को एक बिस्तर पर बैठे नहीं देखा । अम्मा का व्यक्तित्व बेहद भव्य ,बाबूजी जब खुश होते ,मेम साहब कह कर  बुलाते ।
जीप में बैठ सभी बड़ी गोपनियता से निकले ,उनके जाते गीता दीदी टोह लेने मेरे घर आई,पीछे रुमा और सुधा भी ,मुझे सख्त मनाही थी ,बड़ी सफाई से मैं टाल गयी। 



                         उधर महारे पहुँच कर सबसे पहले ये तय हुआ कि लड़की किस मन्दिर में दिखाई जाएगी ,बाबूजी ने राय दी,-"अहिरों के राधा -कृष्ण मन्दिर का बरामदा काफी बड़ा है ,लड़की तैयार करने के लिए पुजारी की कोठरी भी मिल जाएगी ,वहाँ ठीक रहेगा ।"

सभी मान गये ,भाभियाँ सीता को ले कोठरी में चली गयीं ,ऊपर बरामदे में दरी बीछ गयी ।दरी के ऊपर नयी चादरें डालीं गयीं । चाय -ठण्डा ,मिठाई -समोसा की व्यवस्था कर ली गयी ।अम्मा और सीता दी की माँ चुपचाप एक कोने में बैठींं, सहमी लड़केवालों की बाट जोह रही थीं । दस बजे एक जीप और अम्बेस्डर कार आकर मन्दिर के सामने रुकी ,मर्द लपकर गाड़ी के पास पहुँच हाथ जोड़ कर खड़े हो गये,जीप में से दस मर्द ,छ: छोटे बड़े लड़के उतरे ,कार में से सबसे पहले लगभग पचपन साल की लम्बी चौड़ी महिला निकलींं ,औरत का रौबदार चेहरा देख कर मर्द सहम गये । आगे की सीट पर औरत की गोद में लगभग तेरह चौदह साल की लड़की बैठी हुई थी ,वह भी निकली ,हाथ -पैर झटक कर सीधा करने लगी ।यह लड़के की छोटी बहन थी।औरत ने पीछे बैठी औरतों को बाहर निकलने का इशारा किया ।तीन की सीट पर पाँच कोंच कर बिठाई गयी थीं ।बेचारी घूँघट सम्हालते बाहर निकल औरत के पीछे खड़ी हों गयीं । सीता के बड़े भाई ने झूक कर औरत के पैर छुए और बड़ी नम्रता से झूक कर कहा -"चलिए आप लोग ऊपर ।"

औरत अपने समूह के साथ पीछे हो ली ।मर्द उनके पीछे ,देख कर स्थिति स्पष्ट थी कि घर में मातृ सत्ता का प्रभाव था । चाची और अम्मा ने एक तरफ औरतों को हाथ जोड़ बिठाया ,दूसरी तरफ गोलाई में मर्द बैठ गये ,भाई भाग -भाग कर चाय -पानी करा रहे थे ,पहले मिठाई, पानी फिर ठण्डा, समोसा चला ।लड़के के पिता ने डकार लेकर आदेश दिया - "हे तिवारी जी ! जिस कारज के लिए आए हैं पहले शुरु किया जाए । "

सबकी साँसे जहाँ की तहाँ अटक गयीं ,बड़के भईया नीचे गये ।थोड़ी देर में दोनों भाभीयों संग पीले रंग की साड़ी में सिर झुकाए सीता पहुँची ,अब तक मौन बैठी बाकि औरतों में हरकत हुई ।एक ने घूँघट उठा कर कहा -"इहाँ बैठाइए ।"

सामने सास थीं ,कहने वाली घर की बड़ी बहू थीं ,इस कदर घूर रही थीं जैसे कौवा शिकार को घूरता है।  दुबली -पतली सीता बीच में सास के सामने बिठा दी गयी ,थोड़ी देर लड़की को घूरने के बाद नाक फुलाते हुए लड़के की माँ ने कहा -"रोगियाह है का जी ,बड़ी पातर है। "

सबकी साँस गले में अटक गयी ।अम्मा ने सुना की झट उत्तर -"हम भी ऐसे ही थे बहिन जी जब ब्याह हुआ । "

लड़के की छोटी बहन को देख कर एक तार और जोड़ा -"आपकी बबुनी भी तो ऐसी ही हैं।"

 सास की भौंहें तन गयीं -"तनी बताओ तो साग में रस्सा कैसे लगेगा ? "

पूछ सीता का मुँह एक टक देखने लगी ,अम्मा ने हँस कर कहा -"बता दो बच्ची!"

सीता ज़मीन में नज़रें गड़ाए धीरे से बोली -"साग में रस्सा नहीं लगता । "

बाबूजी का पारा चढ़ गया -"आप के यहाँ ए मिसिर जी ,करैलियो का रस्सेदार बनता होगा ?"

सभी सुनते समवेत हँस पड़े। सास पिनक गयी ,कोने में पति को ले जा कर कुछ समझाया -बुझाया ,वह आते ही मर्दों से बोले -"चलिए हम लोग तनी नीचे चल कर जरुरी बात कर लेतें हैं ।"

.बाबूजी की तरफ देख कर- "इहाँ मेहरारुओं में हम क्या बैठें। "

मर्द उठ कर चले गये ,लड़के की माँ सीता के पास आकर निंगाझोरी करने लगी ,सिर का पल्ला हटा कर पीठ से लेकर गर्दन तक देखा ,साड़ी उठा कर पैर,घूमा -फिरा कर चेहरा और हाथ,मुँह में उंगली डाल कर दाँत गिने ।अम्मा और चाची अन्दर ही अन्दर फूंफकार रही थीं -"अभी कुछ बाकी है की हो गया?"

आवाज सख्त थी अम्मा की।उधर से जवाब भी तनाके से आया-"सुनिए मस्टराइन ! हाथ नचाते हुए ,एग्गो थरिया लेने जाते हैं तो चार बार बजा के लेते हैं हम ,आवाजे बता देती है कि कितना ठोस है। "

अम्मा को घूरते हुए ,सीता की तरफ आँख दिखा कर -"इ तो हमारे लाख टके के बेटे का मामला है।बोरा से रुपया उझिलें हैं पढ़ाने में । "

अम्मा रुँआसी हो गयी 'लड़की पक्ष की औरतों का कलेजा बैठ गया। उधर की औरतें आपस में खुसुर -फुसुर कर रही थीं .अब तक मौन तमाशा देख रही लड़के की छोटी बहन ने सीता से कहा -ए भाभी !एक ठो गाना सुनाइए ।"

चाची की बांछे खिल गयीं ,हँसते हुए कहा-" बबुनी को भाभी पसन्द आ गयी लगता है। "

लड़की बिल्कुल माँ पर गयी थी ,तुनक कर कहा -"पसन्द नहीं होती तो अम्मा एतना देर देखबे नहीं करती ।"

सभी हँस पड़े ,सीता ने लम्बी साँस ली ।भाभियों की बाछें खिल गयीं ,चाची चहकने लगीं  । अम्मा ने मन ही मन शिव जी को माथा नवाया ।  लड़की ने फीर कहा -"गितिया गाइए भाभी ।"

सबने हाँ में हाँ मिलाया । अम्मा ने आरम्भ किया -


"शिव शंकर चले कैलाश 
बुंदिया पड़ने लगी ssss


सीता के साथ भाभियाँ भी गाने लगीं ,ये हर्ष नाद मर्दों के कान में पड़ा ।चाचा -बाबूजी मगन हो गये । इधर भी लेन- देन तय हो चुका था ।पंडित से लगन दिखाना शेष रह गया , सभी ऊपर आ गये ,लड़के के पिता ने औरत से कहा -"अपना मायाजाल बटोरिए ,देखिए बरखा बुन्नी का दिन है ।"

सीता की सास ने लड़कों को कह गाड़ी में से फल, मिठाई, कपड़ा निकालने का आदेश दिया। सीता के सर पर लाल बनारसी साड़ी धर सास ने खोइंछा भरा ,अँगुठी पहनाया ।एक हजार एक सगुन का दे सबको सगुन देने को कहा।हजार पाँच सौ की नोट से आँचल भर गया । 

"अरे भाई ! इहां फोटो नहीं खींचाता है का जी बजार में ? "

एक सज्जन ने ललकार दी ।

"खींचाता है ,खींचाता है जी"

 सीताके पिता चिंहुक कर कहेंं और बड़े बेटे को भगा कर बलमा को बुलाया । दस मिनट में बलमा गले में कैमरा लटकाए हाजिर ।फोटो खींचाने लगा ,फिरसे साड़ी ओढ़ाई गयी ,अँगुठी पकड़ कर दिखाई गयी ,सबने अपना -अपना रुपया उठा कर फिरसे रखा।सीता उठक- बैठक करते सबके पैर छूती ।बलमा स्माइल प्लीज कहता और खचाक की आवाज से फोटो कैमरे में कैद हो जाता ।बलमा सीता को कनखियों से देख थैंक्यू जरुर कहता ,उसके खत की दिवानी लड़कियों में एक सीता भी आज पराई हो रही थी ।यही बलमा की नियति बन चुकी थी । अपने जिन हाथों से वह लहू से प्रेम भरी पातियां लिखता ,उसी हाथ से उनके सगुन के रस्म अदायगी के फोटो खींच एक सौ एक का नेग और मिठाईयाँ ले बुझे मन से सर झुकाए चला जाता।
                             सीता का ब्याह तय हो गया ,दिन जाड़ों में पड़ा ।हम शहर लौट आए ।स्कूल शुरु हुआ और गाँव की दुनिया के कपाट स्मृति पटल पर बन्द हो गये हाल फिलहाल ।यहाँ भी वो दौर लड़कियों के गुलाबी प्रेम -पत्रों के इन्द्रधनुषी वितान तान नित नये करवटें लेता । मैं अति साधारण सांवली लड़की ,प्रेम -पत्रों से वंचित ,अक्सर मनगढ़ंत कहानियाँ बना कर लड़कियों को सुना ,उनके दिलचस्प किस्से सुनती और सोचती कि ये पहले वाले प्यार का एहसास कैसा होता होगा ? चल रही थी मैं दुनिया के मायावी रंगों की रंगोली बनाते बिगाड़ते और दिन समय के घोड़े पर बैठा सरपट तड़बक- तड़बक दौड़े जा रहा था । हथेलियों पर ओस की बूंदे सुबह दूब से झाड़ मैं ओंठों पर रख लेती ,आत्मा ऐसी तृप्त होती जैसे पी लिया हो अमृत ,अन्दर तक भींग जाती ।सामने खिड़की से कोइ झांकता सा महसूस होता और मैं धीरे से अन्दर भाग जाती ।एक लुका -छिपी का खेल जारी था ,न वो परदा उठाता न मैं आगे बढ़ती ।वो भ्रम था कि सपना मैं सोचती रही और बिहाने मन की ड़ाली पर एक लाल कली प्रेम की लटक जाती ,पुष्पित ,पल्वित होने के मौसम की आस में मैं अक्सर भोरे हाते में जाती पर ना जाने कौन सा भय था कि खिड़की पर आहट पाते सीधे घर में ।खेला था,चलता रहा। इधर नवम्बर में सीता दीदी का ब्याह हो गया, मैं सजी -धजी दुलहे की बड़ी साली की भूमिका में,बलमा भर माड़ों कैमरा ले मंडराता जैसे पूरे जगत को कैमरे में घेर लेगा।उसका नागिन नाच तो कमाल का था ।थोड़ी बहुत दारु का आलम यह था कि दाँत में रुमाल जांते साथ नाचने वाले के ऊपर पसर जाता ,बेहद अश्लील नाच ,जिसे औरतें आँचल से मुँह छिपाए उचक -उचक देख रही थीं ।बलमा छाया हुआ था विवाह समारोह में ,अम्मा के आदेश पर मेरी भी कुछ फोटो उसने बिना मुझे स्माइल प्लीज कहे खींचा।हास- परिहास,गीत, ढ़ोलक की थाप ,मन्त्रों का घोष और सात फेरों के साथ रोती -धोती सीता चली गयी साजन के देश ।एक- एक कर टोले की सारी लड़कियाँ ब्याह कर चली गयीं ,छोटी सयानी हो गयीं । मैं बची रही ,ललई चाचा की माई अम्मा से इस साल मुँह खोल कर कह ही दीं - "केकर बेटी एमें. बीए ,करताड़ी स ए बबुआ बो ,लइकी उरठ होत जात हिया ,निक लागे चाहे बाउर ,बियाहे क एग्गो उमर होले। "
अम्मा चुप ही रही ,जानती थी मेरा रुदन ब्याह के फतवे को सुनते अस होगा कि कोठी अटारी बह -दह जाए। एम.ए .अन्तिम वर्ष और पिता की देहरी से जड़ समेत मुझे उखाड़ने की तैयारी युद्धस्तर पर जारी हो गयी ।खिड़की वाला मामला भी जमा नहीं ,कालेज में न किसी ने हसरत भरी निगाह से मुझे देखा और न मुझे कोई जमा ,मेरी दुनिया अलग,सोच और विचार अलग ।इस तरह उम्र के बाईस साल बिना प्रेम -पत्र लिखे निकल गये। आज जब छोटे -छोटे बच्चों को पढ़ाते क्लास में बगल वाली लड़की की कॉपी के पीछे ऑय लव यू लिखा देखती हूँ मन के कपाट हिलने -डुलने लगते हैं और मैं लौटतीं हूँ बाईस साल पहले की दुनिया में ।वह मेरी दुनिया जिसे कलेजे से साटे स्त्रियों की सैकड़ों पीढ़ियाँ मर जाती हैं नैहर की अन्तिम चुनरी -पियरी की आस में ,आज भी अम्मा गा रही है आम के नीचे बैठ कर - 

"हे गंगा मइया तोंहें चुनरी चढ़इबेंssss 

संइयाँ से कइद मिलनवा sss...हाय राम "


हाय राम गाते उसका चेहरा गुलाबी हो जाता है ...जैसे गीता ,सीता और उन तमाम लड़कियों का हुआ था ,जिनके पास गुलाबी प्रेम- पत्रों का इतिहास था और मैं हतभागी इससे वंचित रही ।
                            

                                                                          (4)

परीक्षा निकट आते- आते मैं भी विदा कर दी गयी ,छूट गया गली,मुहल्ला ,सखी,सहेली छूट गयीं ,जिस घर में जन्म लिया वह पराया हो गया।नितान्त अपरिचितों के बीच पहले परिचय बढ़ाने जैसा कुछ भी नहीं था ,सभी अधिकारी और मैं जी जी जी रटती तोता । एक सुनहरा पिंजड़ा ,जहाँ सबसे पहले शरीर कैद हुआ फिर सपने। मायके जब भी जाती मऊ से ही लौट आती ।गाँव जाने का कोई नाम ही नहीं लेता ,देखते-देखते   शादी के बारह साल गुजर गये। अबकी गर्मियों में भाई तैयार हुआ गाँव ले चलने को तो मन की मुराद पूरी हुई ।हम सुबह तड़के उठ कर तैयार होकर घर से निकले ,कार में आगे अम्मा और ड्राईब करता भाई ।पीछे मैं अपने बच्चों और भावज के साथ।चालीस मिनट में हम महारे चट्टी पर पहुँच चुके थे ,सबसे पहले भाई का आदेश था शिव जी के दर्शन फिर कुछ यहीं नाश्ता तब गाँव चलना है । हम मन्दिर के रास्ते पर अभी चार कदम ही बढ़े थे कि पीछे से जोरदार आवाज आई -

 "पंडी जी पाव लागीं ।"

आवाज कुछ जानी -पहचानी थी ।मैं झट पीछे मुड़ी ,सामने से चेकदार नीली लूँगी ,गले में मैली गमछी ,शरीर पर पीले से सफेद हो चुकी टी-शर्ट पहने बलमा भागा चला आ रहा था ।आते ही अम्मा का पैर छू बोला -

"चाची पाव लागीं,घीउवा खरा देले हयीं लेले जाइब।"

अम्मा मलकिन से चाची हो चुकी थी।  मैं ध्यान से उसे देख रही थी ,भाई से कहा -"दर्शन करके आइए ,गरम- गरम पकौड़ी निकल रही है डॉक्टर साहब ।"

मैं हतप्रभ खड़ी कभी उसे देखती ,कभी चट्टी से बाजार में बदल चुके महारे को।सड़क के दोनों तरफ लाईन से दुकाने .स्कूल ,अस्पताल ,कतार में खड़े यात्रियों की बाट जोहते ऑटो ।ब्यूटी पार्लर ,सैलून से लेकर आधुनिक साजो सामान की अनगिन दुकानें ।नहीं दिखी तो केवल बलमा की दुकान ।भाई ने डांट लगाई -"अब खड़े ही रहिएगा कि दर्शन भी करिएगा।"

 मेरी पाषाण प्रतिमाओं के प्रति आस्था इधर कम होती जा रही थी,बेमन से मैं पीछे होली।मन्दिर के गर्भ गृह में शिव सपरिवार विराजे थे।यहाँ शिवलिंग की उपासना नहीं होती,शिव के बगल में शिवा ।हिन्दू देवी देवताओं में शिव मेरे प्रिय रहे।सृष्टि के पहले साम्यवादी महापुरुष । भाई शिव स्तुति में लीन,आधे घण्टे उसका मन्त्रोचार चलता रहा ।अन्त में हर हर महादेव के घोष के साथ पूजा सम्पन्न हुई।
                         हम चौराहे पर पहुँचे,भाई ने माँ से कहा -"यहीं चाय नाश्ता कर लेते हैं ,गाँव पर सबेरे -सबेरे कौन चूल्हा फूंकेगा?"

 अम्मा इशारा समझ गयी ,सब कोने की चाय की दुकान पर पहुँचे ,मैं दुकान का बोर्ड देख कर चिंहुक गयी । "बलमा जी मिठाईवाले "। बलमा टेबल अपनी गमछी से साफ कर सबको बिना कहे चाय पकौड़ी दे गया ,गरम प्याज ,मिर्च की पकौड़ी बाजार की बहुत दिनों बाद खायी थी ,एक अजीब स्वाद होता हैं इन पकौड़ियों का ,घर में लाख जतन कर लो ऐसी नहीं बनती। सामने चूल्हे पर कढ़ाई में एक औरत लगातार पकौड़ियाँ तले जा रही थी।शीशे की छोटी सी आलमारी में लड्डू और चिंनियहवा बर्फी सजी थी ।मर्तबान में बताशे और लाल,नीली,पीली टाफियाँ।हम चलने लगे तो बलमा ने मेरे बच्चों के हाथ पर टाफियाँ रख खिलखिलाकर कहा-"स्माईल प्लीज ! "

बच्चे साथ- साथ हँस पड़े। माँ ने दूध का डिब्बा घी के लिए पकौड़ी तल रही औरत  को पकड़ा कर हिदायत दी -"साफ से रखना दुल्हिन।"

उसने मुस्कुराकर स्वागत किया । हम गाड़ी में बैठ गाँव के रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे ,मन में आज फिर उथल -पुथल मची थी, मैंने माँ से पूछा -"बलमा तो फोटो खींचता था ?

भाई हँस पड़ा -"बेचारे का किसी ने कैमरा चुरा लिया ,दूसरा खरीद नहीं पाया। "

वह कहते हुए  हँसे जा रहा था,सुना है ,साला एक नम्बर का लोफर था । अहिरों ने किसी लड़की की फोटो इसके साथ देख कर बहुत कूटा था । "

आँख के इशारे से -"ये जो औरत थी दुकान पर ,उसे भी कहीं से भगा कर लाया है। "

अम्मा ने मौन तोड़ा ,घर -घर कैमरा हो गया है,कौन यहाँ तक आने की जहमत उठाए ।"

भाभी की प्रतिक्रिया भी आ गयी -"अब तो मोबाईल में भी कैमरा होता है।"

कुल मिलाकर निष्कर्ष यह था कि अब किसी को यहाँ तक केवल फोटो खींचाने के लिए आने की फुर्सत नहीं थी।गाँव की कच्ची सड़क उबड़ -खाबड़ तारकोल की सड़क में बदल गयी थी।गाँव के बाहर तीन चार दुकाने लाईन से दिखाई दे रहीं थींं।बाग की तरफ कन्या उच्च विद्यालय का बोर्ड दिखाई दे रहा था।कच्चे मकान लुप्तप्राय हो चुके थे, टोले के लगभग सारे घर पक्के बन चुके थे।उफ्फ! दरवाजे पर आते मेरी जान सूख गयी ,विशाल नीम जिसकी शाखाओं पर झूला ड़ाल गाँव भर की लड़कियाँ झूलती थीं , लापता ,चारों तरफ ईंट की दीवारें ,सामने ढ़ेला भइया के घर की कुछ लड़कियाँ खटिया पर बैठी लैपटाप चला रही थीं ,देखते अन्दर चली गयीं।मैं उन्हें अन्दर जाते देखती रही ,कभी हमें देखते उधर से लड़कियाँ भागते हुए आती थीं ।दिन भर खुले रहने वाले दरवाजे भिड़के हुए ,जानवर के नाम पर घरों में बमुश्किल एकाध गाय टीनशेड़ में दिखाई दे रही थीं।अम्मा फाटक खोल अन्दर बहू को लेकर जा चुकी थींं ,मैं स्तब्ध अतित और वर्तमान की संधिरेखा पर खड़ी कसबे में बदल चुके अपने गाँव सराय मुबारक को देख रही थी।नेपथ्य में अम्मा गीत बज रहा था .......
निमिया क पेड़ जनि काटा ए बाबा
निमिया चिरइया लेली बास .......



एक अस्तित्वहीन गाँव की दहलीज पर खड़ी मैं तलाशने लगी अपना गाँव सराय मुबारक जो अब कभी नहीं मिलेगा उन लड़कियों के स्वच्छन्द प्रेम पत्रों सा। 
शाम को हम लौटते वक्त एक बार फिर रुके बलमा जी स्वीट हाऊस पर । क्वार का महीना,शाम सिहरने लगी थी ,लोग अपने अपने घरों को लौट चुके थे। इक्के-दुक्के लोग दुकानों पर दिख रहे थे।अन्धेरे की हल्की चादर पसरने लगी थी।अम्मा बलमा बो से घी ,बताशे की खरीद-परोख्त कर रही थी,भाई सब्जी वालों से ताजी सब्जियाँ खरीदने निकल गया।मैं बलमा की दुकान के आगे टीनशेड़ में रखे ब्रेंच पर बैठी चुपचाप शिवाले के सूने रास्ते को देखती अतित की परछाईंयों में उलझी ,मेले-ठेले,सखियों के कलरव तलाशती विचारों में खोई ,रह -रह कर नम आँखों से बर्तन धोते बलमा को देख लेती,वह भी मुझे देख रहा था और तेजी से हाथ चला रहा था,शायद जल्दी काम निबटाना चाहता था। बर्तन धो कर चौकी पर रख वो फुर्ती से मेरे सामने चाय की केतली थामें आकर बैठ गया।दो भरुकों में चाय ढ़ार पीने का आग्रह कर एक टक मुझे निहारता रहा।मैंने मुस्कुराकर कहा-"गाँव शहर हो गया।"
वह नम आँखों और भारी गले से मेरी बात दुहरा गर्दन झुका चाय पीने लगा। 


"आपने स्टूडियो बन्द क्यों कर दिया?"मैंने पूछा।


बलमा दर्द से भर उठा, गमछे से आँख की नमी पोंछते हुए बिफर पड़ा -"अब जरुरत किसे है बहिनी परजा -पसारी की। हम तो गाँव -गिरांव के रियाया की परजा थे।नेग -जोग पर खुश हो जाने वाले।अब तो लोगों को सब कुछ मोल लेने की तलब है।इ ससुरी मोबाईल तो अउर जुलमी है।" मन्दिर की ओर इशारा करके- "अब लड़की देखाई पर मोबाईल से लोग फोटू खींच बीडियो भी बना लेते हैं।कौन मंहगा फोटो खींचवाएगा अब?"


मैंने उसका मन रखने के लिए कहा- "लेकिन उसकी फोटो वैसी नहीं आती जैसी कैमरे की।"


वह खुश हो गया-"हाँ ,इ तो है,फैटोग्राफी तो कला है,एक दम कोहार के चाक जैसी।बड़े सधे हाथ से फोटो का ऐंगल ठीक बैठता है। इ ज़माना क्या जाने की कैमरा का फोटो जो चित्र निकालता है उ इ मोबाईल और हउ डीजिटल कैमरा का निकालेगा। "

सामने के आधुनिक फोटो स्टूडियों को दिखाते हुए बलमा कह रहा था।मैं हूं -हाँ कह कर हामी भरती उसके दर्द के उमड़ते सैलाब को देख रही थी।
लम्बी साँस छोड़ते बलमा ने मेरे चेहरे की ओर देख कर कहा-"इस इलाके की हजारों लड़कियों के ब्याह कराए हैं हमने बहिनी।आपकी भी खींची थी।"

अम्मा की तरफ देख कर-"चाची ने बहुत शानदार पैंट,बुसर्ट दिया था आपके ब्याह में।"

मैं मुस्कुरा कर रह गयी। भाई हाट बजार कर आकर हमारे पास बैठ गया-"बलमा भाई! चाय पिलाइए तो निकला जाए।"

वह केतली उठा कर भट्ठी की तरफ चल दिया।भाई ने भौंहें नचा कर व्यंग्य से पूछा-"क्या बतिया रहा था इतनी देर से ?"

मैं उसके पुरुषत्व से भरे चेहरे को देख कर क्रोध दबाते हुए इतना ही कह सकी-"अपना दर्द।"

वह उठ गया ,चाय पी गाड़ी में सामान रख मुझे आवाज दी-"चलिएsssss ,कहाँ अटकी हैं? यहीं रहने का इरादा है क्या?"

वह हँस रहा था।सभी गाड़ी में बैठ चल पड़े,गाँव पीछे छूटने लगा।आज अपने समय का हर दिल अज़ीज बलमा जिसके मजनू मियाँ वाली फितरत से मुझे नाराजगी थी वह एक दम से मेरी सहानुभूति का पात्र बन चुका था।.नहीं पता कब लौटूंगी फिर उस देस जहाँ बलमा के रक्तरंजित असंख्य प्रेम -पत्र बिखरे पड़ें हैं मेरे गाँव की लड़कियों के मासूम प्रेम में पगे।मैं डूबती गयी ,जैसे डूबती है शाम भोर के आगोश में ,गाँव छूटता गया ,पीछे, बहुत पीछे।

                  और हाँ ,अन्त में एक बात बताना जरुरी है ,आप बलमा जी के सत्य को तलाशने मेरे गाँव का टिकट मत कटा लीजिएगा। बलमा का नाम बलमा कैसे पड़ा यह भी एक रहस्य है जिसे केवल उस दौर की औरतें जानती हैं । यहाँ इस रहस्य से पर्दा नहीं उठेगा ,इस मामले में ये औरतें युद्धिष्ठिर के शाप से मुक्त हैं।आप जितना चाहें ज्ञान बघारें ,उपदेश दे लें ,वह एक ही राग अलापेंगी।उधव मन न भये दस बीस।यदि बाबूजी से पूछेंगें, वह अपनी गहरी धसी आँखों को सिकोड़ कर गंजे सिर पर हाथ फेरते अम्मा की तरफ प्रश्न उछालेंगे -"इ बलमा कौन है जी?"

फिर मुस्कुराकर गहरा तंज कसेंगे-"मोटरसइकिलिया पर तो आप ही बैठी थीं ।"

अम्मा भी कम नहीं ,उसी अदा से मानस में गर्दन झुकाए उत्तर देंगीं-"इ बेबिया भी आज कल कुछ भी लिखती है।"

थोड़ा क्रोध भी आएगा ,धम्म से मानस की पोथी बन्द कर कहेंगी-"जब लंका काण्ड आता है बवाल होता है। "

जी हाँ ,बवाल की पूरी सम्भावना है ,इस लिए तलाशना हो बलमा को तो रोकिए हमारे गाँवों को कंकरिट के जंगलों में बदलने से ।देखिएगा बलमा मिल जाएगा किसी गाँव की चट्टी पर गर्दन में कैमरा लटकाए ,खचाक से आपकी फोटो खींचते हुए कहेगा-"स्माइल प्लीज !"और फिर उसी नफासत से गर्दन झूका कर कहेगा ,थैंक्यू!

सोनी पाण्डेय 
कृष्णा नगर
मऊ रोड
सिधारी,आज़मगढ़
उत्तर प्रदेश