सोमवार, 24 जनवरी 2022

समकाल : कविता का स्त्रीकाल-13

अनीता भारती

अनीता भारती एक्टिविस्ट लेखिका हैं ,ज़मीन पर स्त्री और दलितों के हक में आवाज बुलंद करनेवाली अनीता भारती की कविताओं में हाशिये की स्त्री का शोषण,संघर्ष और मुश्किलें ,यथार्थ के उसी रंग-रूप में सामने आते हैं जैसा घट रहा है।यह भोगा और निकट से देखा हुआ सच है जो अन्तिम स्त्री की सामाजिक ,राजनैतिक और पारिवारिक स्थिति को जस का तस हमारे सामने रखता है।यह कविताएँ आलोचकों के लिए बयान हो सकते हैं,हो सकता है कलावादी इन्हें कविता ही न माने किन्तु मानव जीवन का कटु यथार्थ जहाँ पूरी सजगता और अपने नग्न यथार्थ के साथ आता है यह वह कविताएँ हैं।

इन कविताओं में अस्तित्वबोध से उपजा आक्रोश और व्यवस्था पर तीखा तंज मुखर शब्दों में व्यक्त होता है।स्त्रियों की राजनैतिक समझ पर प्रश्नचिह्न लगानेवालों को इन कविताओं को जरूर पढ़ना चाहिए ।यह स्त्री कविता की सबसे बुलंद आवाजों में एक हैं-


मुजफ्फनगर से लौटने के बाद...

रुखसाना का घर..



1.

सोचती हूँ मैं

क्या तुम्हें कभी भूल पाउंगी रुखसाना

तुम्हारी आँखों की गहराई में झांकते सवाल

तुम्हारे निर्दोष गाल पर आकर ठहरा

आंसू का एक टुकड़ा

बात करते-करते अचानक

कुछ याद कर भय से काँपता तुम्हारा शरीर

तुम्हारे बच्चें जिनसे स्कूल 

अब उतनी ही दूर है 

जितना पृथ्वी से मंगल ग्रह

किताबें जो बस्ते में सहेजते थे बच्चे

अब दुनिया भर की गर्द खा रही है

या यूं कहूं रुखसाना किताबें

अपने पढ़े जाने की सज़ा खा रही है

तुम्हारी बेटी के नन्हें हाथों से

उत्तर कापियों पर लिखे 

एक छोटे से सवाल 

धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की विशेषताएं पर

अपना अर्थ तलाश रहे है




2.

रुखसाना 

सामने कपड़े सिलने की 

मशीन पड़ी है

ना जाने कितनी

जोड़ी सलवार कमीज 

ब्लाऊज पेटीकोट

फ्राक बुशर्ट झबले

सिले है तुमने

तुम्हारे दरवाजे ना जाने कितनी बार 

आई होगीं गांव भर की औरतें

यहां तक की चौधरी की बहु भी

तुम्हारे सिले कपड़े पहन

इतरा कर तारीफ करते हुए

किसी आशिक की तरह

तुम्हारे हाथ चुमकर डॉयलोग मारते हुए

मेरी जान क्या कपडें सिलती हो

पर अब धुआं-धुआं पलों को बटोर

कहती है निराश रुखसाना 

शरणार्थी कैम्प के टैंट में पडी- पडी 

मैं भी इस सिलाई मशीन की तरह ही हूँ

जंग खाई निर्जीव

मेरे जीवन का धागा टूट गया है

बाबीन है कि अपनी जगह फंस गई है

रुखसाना याद आती है मुझे रहीम की पंक्तियां

पर तुमसे कैसे कहूँ

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाएं




3

रुखसाना

तेज आवाज के साथ

रात भर बरसा पानी

शरणार्थी कैंप के टैंट में सोते 

बच्चों की कमर उस 

निर्लज्ज पानी में डूब गई

सब रात में ही अचकचा कर उठ बैठे

बच्चों के पास अब कल के लिए सूखे कपड़े नही है

रुखसाना

तुम्हारी आँखों के बहते पानी ने

कई आंखों के पानी मरने की कलई खोल दी है.



4


पिछले पंद्रह दिन दिन से

हमारे पास खाने के लिए कुछ नही है

कहती है रुखसाना 

दिल-दिमाग में चल रहे झंझावात से 

लड़कर निष्कर्ष निकालती है रुखसाना

दंगे होते नही करवाएं जाते है

हम जैसों का वजूद रौंदने के लिए

जो रात-दिन पेट की आग में खटते हुए

अपने होने के अहसास की लड़ाई लड़ रहे है




5

ओ मुजफ्फर नगर की 

लोहारिन वधु

जब तुम आग तपा रही थी भट्टी में

उस भट्टी में गढ़ रही थी औजार

हंसिया, दाव और बल्लम

तब क्या तुम जानती थी

कि ये सब एक दिन

तुम्हारे वजूद को खत्म करने के काम आयेगे

कुछ दिन पहले तुम खुश थी चहक रही थी 

अम्मी आजकल हमारा काम धंधा जोरो पर है

भट्टी रात दिन जलती है

इस ईदी पर हम दोनों जरुर आयेगे

तुमसे मिलने और ईदी लेने

पर क्या तुम उस समय जानती थी

यह औजार किसानों के लिए नही

ये हथियार दंगों की फसल

काटने के लिए बनवाएं जा रहे है

कितनी भोली थी तुम्हारी 

ये ईदी लेने की छोटी सी इच्छा 



6

दंगे सिर्फ घर-बार ही नही उजाड़ते

दंगे सिर्फ काम-धंधा ही नही उजाड़ते

दंगे सिर्फ प्यार-स्नेह ही नही तोड़ते

दंगे सिर्फ जान-असबाब ही नही छीनते

दंगों की धार पर चढ़ती है औरतों-बच्चियों की अस्मिताएं

अगर ऐसा ना होता तो

बताओं क्यों

वे निरीह असहाय मादा के सामने 

पूरे नंगे हो इशारे से दिखाते है अपना ऐठा हुआ लिंग



7

रोती हुई रुखसाना कहती है

अब हमारा कौन है

जब हमारे अपने बड़ो ने 

ही हमें गांव-घर से खदेड दिया

चार पीढी से पहले से रहते आए है हम यहां

इन सारी पीढियों के विश्वासघात की कीमत क्या होगी

क्या उसको चुकाना मुमकिन है

कितनी कीमत लगाओगे बताओ

प्यार से खाए गए एक नमक के कण का कर्ज 

चुकाने में चुक जाते है युग

तब कैसे चुकाओगे तुम

चार-चार पीढियों के भरोसे विश्वास के कत्ल का कर्ज



8

रखसाना कहती है 

नहीं जानती साईबेरिया  कहां है

नही जानती साईबेरिया में कितनी ठंड पड़ती है

नहीं जानती साईबेरिया के बच्चे क्या पहनते है

नही जानती साईबेरिया की  औरतें कैसे रहती है

नहीं जानती साईबेरिया के लोग क्या खाते-पीते है

नहीं जानती कि वहां बीमार बच्चों को देखने डॉक्टर आता है नहीं

नहीं जानती कि वहां मरे बच्चों का हिसाब कैसे चुकाया जाता है

पर रुखसाना जानती है 

साईबेरिया की ठंड में कोई खुले आसमान के नीचे नही सोता




9

रुखसाना 

गहरे अवसाद में है

जान बचाकर भागते वक्त

घर में छूट गई

नन्ही बछिया चुनमुन

लड़ाकू मुर्गा रज्जू

घर के बच्चों की लाड़ली 

सुनहरे बाल वाली सोनी बकरी

सब  गायब है

रुखसाना को पता चला है

कटने से पहले 

रज्जू ने बहुत हाथ पैर मारे थे

बाकी चुनमुन और सोनी 

कहां है कौन ले गया

कोई नही बताता





10.


रुखसाना

सोचती है

कौन हूं मैं 

क्या हूं मैं

औरत मर्द या इंसान

मेरे नाम के साथ या पीछे

क्या जोड़ा जाना चाहिए

चुन्नु की अम्मा

मेहताब की जनाना 

सलामुद्दीन की बेटी या

सरफराज की बाजी

जब मैं भाग रही थी

तब मैं कौन थी

चुन्नु की अम्मा

मेहताब की जनाना 

सलामुद्दीन की बेटी या

सरफराज की बाजी

रुखसाना सोचती है

इन सब से परे


वह बेजान माँस की बनी एक जनाना है बस



                                                                       अनीता भारती

परिचय-

सुप्रसिद्ध दलित लेखिका, एक्टिविस्ट, दलित लेखक संघ की राष्ट्रीय अध्यक्ष।कविता, कहानी,लेख,संपादन के क्षेत्र में निरन्तर सक्रिय अनीता भारती दिल्ली में एक विद्यालय में प्रधानाचार्य के पद पर कार्यरत हैं।




शनिवार, 22 जनवरी 2022

समकाल : कविता का स्त्रीकाल -12

उपासना झा की कविताएँ में वह भारतीय स्त्री है जिसके जीवन की त्रासदी को आजादी के पचहत्तर सालों में सरकारें खत्म नहीं कर पाई हैं,तमाम सरकारी दावों के बाद भी हमारे ग्रामांचलों में स्त्रियों की जो सच्चाई है उसे उपासना अपनी कविताओं के माध्यम से दर्ज करती हैं।गीदड़ के दाँत शीर्षक कविता हाशिये के समाज की औरतों का सच बयां करने के साथ -साथ सरकारी तन्त्र के खेल को भी दर्शाता है -

कार्तिक की ठंडी भोर में मिला उसका शव

परदेसी पति लौट आया शरीर पर बने घावों का दाम लेने

गाँव के चुनाव का खेल ही उलट गया 


अगड़े-पिछड़े, झूठ-सच, दुष्कर्म-अकाल मृत्यु, पुलिस-अस्पताल

, अग्नि-आकाश, राजनीति- जाति, खुदबुद-खुदबुद 


सरकारी अस्पताल में चुपचाप बैठा वह जूनियर डॉक्टर हतप्रभ होकर सोचता है 

आदमी और गीदड़ के दांतों का अंतर


उपासना की आवाजाही गाँव से शहर की बनी रहती है,उच्च शिक्षा प्राप्त उपासना कुछ दिनों पत्रकारिता से जुड़ी रहीं और इन दिनों बिहार में शिक्षण कार्य करते हुए शोध कार्य को पूरा करने में व्यस्त हैं।महामाया शीर्षक कविता में उपासना के तेवर साफ देखे जा सकते हैं।वह पितासत्ता के साथ -साथ धर्म सत्ता से भी सवाल पूछने से गुरेज नहीं करती हैं-

सोचती हूँ तुम अगर बचपन में चोरियाँ करती तो क्या वैसा दुलार मिलता! 

तुम भी गाँव के सभी पुरुषों संग रास रचाती तो क्या भगवती कहलाती

गौ-चारण के बहाने तुम कालिंदी-तट पर प्रेयस से मिलती तो गाँव आह्लादित हो भावमग्न रहता! 

युवा कवि उपासना की कविता में तीव्र आक्रोश,प्रतिरोधी चेतना,राजनैतिक समझ एवं स्त्री मुक्ति के मूल बिन्दुओं पर सवाल उठाने की प्रवृति मुखरता से दृष्टिगत होती हैं।यह आवाजें उस मिट्टी की उपज हैं जहाँ स्त्री मुक्ति के तन्तु व्यवस्था तन्त्र पर हल्ला बोल ताने -बाने के साथ हिन्दी कविता में प्रवेश कर रहे हैं।



गीदड़ के दाँत

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आठ महीने की गर्भवती वह स्त्री 

रुग्ण काया और शिथिल कदमों से कछुए की तरह

पैरों को घसीटती हुई दवा की दुकान गयी थी


इस देश की असंख्य स्त्रियों की तरह न वह पति को प्यारी थी

न ससुराल को

मायका भी कन्यादान को तिलांजलि मान संतुष्ट बैठा था


उसकी खोज-ख़बर कोई नहीं लेता 

वह कितने दिनों की भूखी थी या रक्त कितना कम था यह कौन पूछता ?

थककर खरगोश की तरह लौटती बेर एक पेड़ के नीचे सो गई


कार्तिक की ठंडी भोर में मिला उसका शव

परदेसी पति लौट आया शरीर पर बने घावों का दाम लेने

गाँव के चुनाव का खेल ही उलट गया 


अगड़े-पिछड़े, झूठ-सच, दुष्कर्म-अकाल मृत्यु, पुलिस-अस्पताल

, अग्नि-आकाश, राजनीति- जाति, खुदबुद-खुदबुद 


सरकारी अस्पताल में चुपचाप बैठा वह जूनियर डॉक्टर हतप्रभ होकर सोचता है 

आदमी और गीदड़ के दांतों का अंतर







महामाया

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ओ मेरी कुलदेवी!

कृष्ण की भगिनी 

तुम्हारा नाम महामाया किसने रखा! 

किशोरवय में 'माया महाठगिनी' सुनकर मैं विस्मित होती थी

सोचती थी तुमने किसका क्या ठगा! 

बाद में बताया गया कि ' ब्रह्म सत्यम् जगन्मिथ्या' 

सत्य तो तुम्हारा भाई था और तुम मिथ्या! 


भाद्रपद के कृष्ण-पक्ष की मध्यरात्रि में 

तुम भी तो जन्मी थी 

लेकिन तुम्हारे प्राण का मोल कम था जोगमाया

भाई के अनमोल जीवन में अनगिनत बहनों का

चुपचाप मार दिया जाना पुरानी परंपरा रही देवि! 


सोचती हूँ तुम अगर बचपन में चोरियाँ करती तो क्या वैसा दुलार मिलता! 

तुम भी गाँव के सभी पुरुषों संग रास रचाती तो क्या भगवती कहलाती

गौ-चारण के बहाने तुम कालिंदी-तट पर प्रेयस से मिलती तो गाँव आह्लादित हो भावमग्न रहता! 


पांचजन्य फूंकती, चक्र चलाती, गीता का ज्ञान देती हुई 

तुम्हारी ओजस्विनी काया की कल्पना करती हूँ

धर्म के नाम पर अपने बांधवों का रक्त बहाने पर संसार तुम्हें पूजता!  

मुझे भय है कि तुम्हें हर कदम पर लांछित और अपमानित किया जाता...






इसी दुनिया की बातें

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स्त्री सुन्दर हुई तो तुमने उसके सौंदर्य पर कालिख मली

कमनीय हुई तो कहा काया का जाल पसारती है

लंबी हुई तो तुमने उसे असम्भव कहा

कद में छोटी हुई तो छाँट दिया 

काली हुई रंग में तो तुम उसे बचपन से दिखाते रहे आईना

चमड़ी हुई उजली तो तुम उस पर तेजाब से कलाकृति बना देते रहे

वजन बढ़ गया तो भैंस हो गयी 

दुबली रही तो कंगलो के घर से आई कहलाई

कभी तुमने उसे विषवृक्ष कहा कभी मायाविनी 

तुम उसे रिझा न सके तो मानिनी हो गयी 

दबा न सके तो दुष्टा, पा ना सके तो कुलटा

कलंक का जल सदैव उसपर छिड़कने को आतुर रहे तुम

हँसती मिली स्त्री तो चरित्रहीन हो गयी

गम्भीर हो गयी तो घमंडी 

डिग्रियाँ न बटोर सकी तो मूर्खा हो गयी 

पढ़ कर कुछ बन गयी तो फूहड़ कह दिया उसे 

बच्चा नहीं जन्मा तो बाँझ हो गयी

बेटियों की माँ बनी तो बोझ हो गयी 

औरतों ने तुम्हारे घरों को स्वर्ग बनाया और वे खुद नर्क का द्वार हो गईं 

तुमने उसे जब भी देखा संदेह और संशय से देखा 

काश तुम स्त्री को प्रेम से देखना सीखते





फाँस गड़ी है करेजवा में

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चूल्हे में लकड़ियाँ और अपना जीवन झोंकती किसी भी औरत को बेर-कुबेर घर-दालान के बाहर 

ओसारे के पीछे

हवा-बयार में कौन सी डाकिन इन्हें कब कैसे ग्रस लेती है

कोई नहीं जानता 

बंसबाड़ियों से न जाने कितनी कथाएँ हवा में तेज टिटकारी मारती चीलों सी उठती हैं

तेज तीख़ी आवाज़ में अट्टाहास करती ये औरतें गाँव भर की चटखारेदार गप्पों का केंद्र बनी रहती हैं

कैसे फलना-बहु देह उघाड़ कर ठाकुरबाड़ी पर लोट गयी

कैसे फलना की पुतोहु अपनी कोठड़ी बन्द कर टिहुक पार रोती रही 

गाँव की कुलदेवी, ब्रह्म देवता और ओझा-भगतों की महिमा  कुछ और बढ़ जाती है 

ये बेसुध पीले मुखों वाली औरतें, ये बिखरे केशों धूल सनी औरतें 

ये कभी बड़बड़ाती कभी सोती कभी रोती औरतें 

ये कलही-कुटनी कही जाने वाली औरतें 

ये गुम पड़ी गूँगी हुई औरतें

ये शून्य में निहारती औरतें 

करूण आवाज़ में बटगमनी गाती ये औरतें 

ये सदियों से मार खाती औरतें 

ये तरुणाई में ब्याही गयी औरतें

ये साल दर साल बच्चे जनती औरतें

ये भूत-प्रेत-पिचाश ग्रस्त, रक्तहीन, वयसक्षीण औरतें

इन्हें ओझा-वैदाई, पूजा-बलि, मंत्र-तंत्र नहीं

माथे पर रखा ममत्व सना एक हाथ चाहिए और सुनने वाला गहरा हृदय

ये बिलख-बिलख कह जायेंगी कि कौन सी

फाँस गड़ी है करेजवा में





मेरे गाँव की लड़कियाँ

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गाँव की छाती पर पैर रखकर सरपट दौड़ती जा रही हैं 

मेरे गाँव की लड़कियाँ 

हाँफती-काँपती, सिर पर पैर रखकर भागती जा रही हैं ये नन्हीं किशोरियाँ

घर लीपतीं, चूल्हा-जोड़तीं, बासन माँजती, घर का सौदा-सुलुफ लातीं, गाली खातीं 

कब बन गईं ये अदद जीवित मनुष्य! 


बभनटोले से लेकर जुलहाटोल तक टुनटुना रहा है नए समय का औजार! 

गालियों के स्वस्तिवाचन से आकाश कट कर गिर रहा 

सूर्य की तरफ मुँह करके दैव को अरोगती ये मातायें

उनके पैदा होते ही मर जाने का अरण्य श्राप जाप रहीं

दबी फुसफुसाहटों में इन अभागिनों के उरहर जाने की कथाएँ

प्रागैतिहासिक काल से सुन रहा है स्तब्ध गाँव


एक तरफ बेमेल विवाह का गड्ढा है दूजी तरफ कमउम्र का मातृत्व

निशीथ-रात्रि या सुनसान दुपहरों में कौन दैत्य इन बालिकाओं को गायब कर रहा 

कौन बरगला रहा है इन सिया-सुकुमारियों को

हर छमाहे, साल बीतते कोई न कोई लड़की भाग जाती है

इस विकट दुष्चक्र को तोड़ना क्या संविधान में लिखना भूल गए थे मेरे पूर्वज 

और उनके माताओं-पिताओं ने उन्हें बस समझा जाँघ पर बिठाकर पुण्य अर्जने का सामान 



                                                          उपासना झा

परिचय

कवयित्री उपासना झा ,बिहार के हथुआ (जिला-गोपालगंज) में जन्म। हॉस्पिटैलिटी मैनेजमेंट और ह्यूमन रिसोर्स में स्नातक और परास्नातक। 6 वर्षों तक का मीडिया और कॉरपोरेट अनुभव
बाद में हिंदी से स्नातक, परास्नातक और नेट। शमशेर की कविताओं पर पीएचडी जारी। समस्तीपुर कॉलेज में हिंदी की अतिथि शिक्षक।
फोटोग्राफी, साहित्य और लोक-कलाओं में गहरी रुचि। कई महत्वपूर्ण पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। कविताएँ , अनुवाद, कहानियाँ और आलेख पत्र-पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में प्रकाशित
सम्पर्क: upasana999@gmail.com


नोट- पोस्ट में प्रयुक्त सभी रेखाचित्र अनुप्रिया के हैं।

गुरुवार, 20 जनवरी 2022

समकाल : कविता का स्त्रीकाल -11

नताशा की कविताओं का संसार समूची धरती है,दृष्टि का गहन आलोक उन्हें प्रकृति के उपादानों से मिलाता है तो कविता में नदी, बादल,पहाड़ उग आते हैं।वह रिश्तों के उलझे सूत सुलाझाते -सुलाझते स्त्री जीवन के बारीक तहों में जब  पहुँचती हैं, उनकी राजनैतिक चेतना उभर कर हमारे सामने आती है  ,जिसे यहाँ प्रस्तुत ईश्वर शीर्षक कविता में देखा जा सकता है-

ईश्वर जितना इन दिनों कमजोर हुआ

पहले कभी नहीं 

जितना बदनाम हुआ

पहले कभी नहीं 

ईश्वर की इतनी खरीद -बिक्री 

पहले कभी नहीं हुई 

ईश्वर न्याय से न्यायालय पहुंचा 

अभी भी 

ईश्वर पर फैसला आना बाकी है !

अक्सर हम प्रेम में उन कविताओं को पढ़ते रहे हैं जो हमसे समय के साथ  दूर होते जाते हैं,नताशा दाम्पत्य प्रेम की कविताओं में उन तमाम बातों का जिक्र करती हैं जो अब तक स्त्री कविता के पन्नों पर पूरी तरह मुखरित होना शेष हैं।वह लिखती हैं-

नहीं लिखती स्त्रियाँ पतियों पर कविताएँ 

इस बात को याद रखकर भी मैं लिख रही

कि उनके नायक सदैव प्रेमी ही रहे 

 

प्रेम - कहानियों से गुमशुदा होते ये पात्र

ताउम्र ख़लनायक होते रहे दर्ज़ 

फिर भी  ...

मूलत: बिहार के कस्बाई शहर मनेर में शिक्षिका नताशा लेखन,शिक्षण के साथ-साथ विभिन्न आन्दोलनों में सक्रिय चेतना सम्पन्न स्त्री कविता की सजग नागरिक हैं।इनकी कविताएँ चिखता हुआ विद्रोह न होकर बड़ी सुघड़ता से वाह्य जगत से स्त्रियों की सामाजिक सनरचना पर सवाल पूछती हैं।प्रस्तुत हैं आज नताशा की कविताएँ-


   

                  1.

 ईश्वर -

(1)


 सबके अपने-अपने ईश्वर थे

 अपने तर्क अपने पक्ष थे

सभी गुनहगार ईश्वर की निगरानी में थे ।



                (  2)

उन्हीं गुनहगारों में एक मैं 

अपने लिये ईश्वर तलाशती रही

जिसे अपने एकांत में पूज सकूँ 

मेरी गलतियों का साक्षी वह

मुझे माफ़ करता रहे


           ( 3)

ईश्वर जितना इन दिनों कमजोर हुआ

पहले कभी नहीं 

जितना बदनाम हुआ

पहले कभी नहीं 

ईश्वर की इतनी खरीद -बिक्री 

पहले कभी नहीं हुई 

ईश्वर न्याय से न्यायालय पहुंचा 

अभी भी 

ईश्वर पर फैसला आना बाकी है !


          (5.)

तुम्हारे मृत होने की घोषणा भी

उतनी पीड़ादायक नहीं  थी

जितनी तुम्हारे जीवित होने के प्रमाण हैं!

तुम्हारी जगह हर घर में है

पर रहते तुम कहीं नहीं हो ।

 

             2. 

दाम्पत्य के एक दशक 

  

अनमने दिन की पीठ पर चलते हुए 

लौटते हो थककर छाँव की तलाश लिए

तब भी कागज पर घिसा हुआ सा मेरा कुछ 

तुम्हारी कान की ओर अपलक निहारता है

-"देखना तो,कैसा लिखा है ?"

 

घडी की सूई भी जब हो रही एकमेक

तब भी अपने वितान में उलझा मेरा मन

गर्दन के स्पर्श को झटक देता है

कमरे के उनींदे उजास  में 

बेआवाज़ बिखर जाते तरंगित स्पर्श 

सर्द से जड़ हो जाते कामनाओं के दूत

 

मेरे व्यस्ततम क्षणों में उबासी के लिए जगह है 

थकान और नींद के लिए भी

अपराध -बोध का यह बोझ

दिन - ब - दिन मेरे कंधे के दर्द को बढ़ाता है

जब तुम याद दिलाते हो

कि मैं भूल गई हूँ प्रेम करना शायद !

 

मैंने कई रोज़ से झाँका नहीं 

उन आँखो को जो कभी आइना हुआ करती थीं

भरा नहीं हथेलियों में तुम्हारा चेहरा

पता नहीं कब से


इतनी बार में 

तो प्रेमी भी चुन लेते विकल्पों  की राह

प्रेमिका की चौखट से लौटकर 

हृदय के सांकल में उलझी ऊँगलियां

देर तक रहतीं

प्रतीक्षारत उधेड़बुन में ...

 

इसलिए ,

कि देह की उपस्थिति 

हाथ बढ़़ाने की दूरी भर है

और प्यास के बहुत करीब है सोते का मीठा जल

 कोई जल्दी नहीं रहती प्रेमालापों की 

इस आश्वस्ति में महीनों बीत जाते हैं

 

नहीं लिखती स्त्रियाँ पतियों पर कविताएँ 

इस बात को याद रखकर भी मैं लिख रही

कि उनके नायक सदैव प्रेमी ही रहे 

 

प्रेम - कहानियों से गुमशुदा होते ये पात्र

ताउम्र ख़लनायक होते रहे दर्ज़ 

फिर भी  ...

   


 3. 

छूटी हुई चीजें 

 

प्रसव वेदना में जननी का सुख दीप्त है

रुदन में आदि मनुष्य का हास्य

एक स्वर 

जो क्षितिज के पार हो मद्धम स्वर में 

गाने लगते जीवन के गीत

साँझ की नर्तकियां 

दिया - बाती का मेल कराती ओठों से बुदबुदाती हैं मंत्र 

मन के सूने प्रकोष्ठों में 

अपरिचित - सी आहट से कांपती  है देह

खोल देती है वर्षो से बंधी गाँठ को


प्रेमी विदा हुए छोड़ 

राग -विराग के अनचीन्हे चिन्ह

छत की उस मुंडेर पर 

 

 स्मृतियों की स्मारक इस देह में 

 प्रेम की आवाजाही प्राण फूंकती है

 

यदि तुम प्रेम की पीठ पर स्पष्टीकरण लिख रहे 

तो बंद कर देना पिछला दरवाज़ा 

चुंबन धरते आँखे नहीं मुंदी बेपरवाह 

तो कलपने दो होठों के उतप्त गुप्तचरों को

 

क्षितिज के छोर पर नृत्य करती चाहनाएं

संभाले रखती हैं सिर पर 

अतृप्त इच्छाओं के कलश ताउम्र


आओ प्रेयस! 

कि गुलाल का कोई मौसम लाने से आता है

कि दीप जलाने से ही दीवाली आती है ।


           4.

साथ-असाथ 


मैं लेटी थी पीठ की ओट किए 

एक प्रेम कविता पढ़ने के बाद 

मन किया सहलाऊं तुम्हारे बाल 

रख दूं गालों पर गर्म चुंबन 

यह जानते हुए कि तुम मेरे नायक नहीं हो 

तुम भी ऊबकर मोबाइल की क्रियाकलापों से 

मेरी पीठ पर कोई चित्र उकेर रहे थे 

यह जानते हुए कि उस चित्र में मेरा चेहरा नहीं था 

आपसदारी का साझा ठीया 

जहाँ फलीभूत होती रहे हमारी अव्यक्त कामनाएँ 

हमने निजी स्वप्न साकार किये

अब देह से मिलती नहीं देह अक्सरहां 

तब भी उपस्थित हैं एक दूसरे की अनुपस्थिति में 

वाशिंग मशीन में मिलते हैं दोनों के कपड़े 

सिंक में बतियाते हैं झूठे बर्तन 

दोनों की चप्पलें दरवाजे पर पहरे देते साथ 

तिथियों की आवृत्ति में 

गठबंधन के विलुप्त सिराओं ने बाँधे रखा है एक पूरा संसार 

हम एक दूसरे के साथ हैं 

असाथ हैं नदी के दो किनारे ।




      5. 

चीज़ों से गुज़रते हुए


फूलों का कोई वज़न नहीं होता

यह सोचते वक्त 

मालिनों के पीठ के छाले मत भूलना


मत भूलना

यह सोचते वक्त

कि रात निद्रा में है 

श्वास के आरोह-अवरोह में लिप्त 

यह महुए की टप -टप में जागी रहती है।


चिहुंकता है खग-शावक रह -रह क्यों 

मत भूलना 

कि नीद में उसने गति नहीं भूली।


घड़ा टूटने का दर्द  

चाक जानता है 

और उससे अधिक कुम्हार के हाथ!


पहाड़ तपस्या में लीन है

या पृथ्वी की छाती देख ठिठक-सा गया है 

यह सिर्फ पानी जानता है

कि पहाड़ का गलना 

नदी हो जाना है।




      6. 

छोड़ना



हम छोड़ देते हैं रोज़ ज़रूरी बात

वे छोड़ देते हैं अपनी सूची में मेरा नाम शामिल करना

मैं जिरह नहीं करती इस आश्वस्ति मेें 

कि छूटे हुए लोगों की भी एक सूची होती है 

मेरे 39वें वसंत में भी वह अधूरी इच्छा शामिल है 

कि छोड़ जाते कागज़ का कोई टुकड़ा मेज़ पर 

तुम्हारे देर लौटने से पहले मैं जान जाती 

कि तुम देर से लौटोगे 


मुझे रोज़ घर छोड़ते - छोड़ते 

तुमने छोड़ दिया यह रस्ता 

मैंने भी छोड़ दिया आखिर

 तुम्हारी राह तकना


कितनी तो स्मृतियां हैं 

स्त्रियों के जीवन में छोड़े जाने को लेकर 

कहां तक गिनाऊं

लड़कपन छोड़ा 

पीहर छोड़ा 

छोड़ी न जाने कितनी शाम विदाई की कोख में 


गौतम ने छोड़ा उस स्त्री को 

जो बुद्धत्व का रहस्य जान सकती थी

राम ने छोड़ा जानकी को

जिसने छोड़ दिया था वैभव प्रेम के पीछे 


तुम कहते हो बार-बार 

कि छोड़ो ना 

जाने दो 

पानी में रहकर मगर से बैर कौन करे

 तो याद रखना 

पानी में रहकर मगर से बैर नहीं करोगे 

तब भी नहीं बचोगे

जब तक पानी बचाने की ज़िद नहीं होगी तुममें 

इस ज़िद को मत छोड़ना 


एक कापुरुष छोड़ देता है बलात्

स्त्री की देह पर अनगिन घाव 

एक प्रेमी घाव पर रख चुंबन 

छोड़ देता है महीनों ना भूली जाने वाली स्मृति 


पृथ्वी छोड़ रही है अक्ष

पक्षी छोड़ रहे हैं वृक्ष 

नदिया छोड़ रही है रेत

हम छोड़ते जा रहे कर्तव्य

अधिकार की लिप्सा में 


इससे पहले कि पिघल जाए ग्लेशियर 

पकड़ ले छूटते लम्हों के पंख 

फिसल भी जाए हाथों से

तो रह जाए उंगलियों पर इंद्रधनुष चिन्ह !





          7.

दक्षिण दिशा 



जिस दिशा में गमन करती हैं आत्माएँ 

श्वास के आरोह-अवरोह से 

खलल पड़ती उनकी निद्रा में

तीनों दिशाओं ने मंत्रणा कर

जात बाहर कर दिया इस दिशा को 

हमारी पुरखिनें

जो झेलती रही ताउम्र लांछन, उपेक्षा 

उन्हें भी दया नहीं आई

दक्षिण दिशा पर 

कभी नहीं दिया अर्घ्य उस ओर

नहीं उठे प्रार्थना के कोई हाथ !

आजी अपनी कहानियों में 

डरी रहतीं सदैव उन स्त्रियों से

 आँचल में छिपा , देती हिदायतें अक्सर

-"उस दिशा की ओर मुख कर खाने वाली

डायनें हुआ करती हैं ।"

मैंने ताउम्र अंधेरे का सूत्र पकड़

उस स्त्री को तलाशा

जिसकी छाती भी कभी दूध से भींगी होगी !

मैं सबसे छिपकर सोऊंगी कोई रात इस दिशा की ओर

मरकर नहीं, जीते जी !

शायद एक इंच भी खिसके सवाल का वह पत्थर

जो सदियों का बोझ बना है मेरे हृदय पर 

इस दिशा की तमाम गलियां 

 मृतकों की देह से भर गई है

कोई सांस भर फूंक दें

कि जी उठे दक्षिण दिशा!




परिचय-

नाम- नताशा

जन्म -  22 जुलाई 1982 बिहार 

शिक्षा – एम. ए .हिन्दी साहित्य, (पटना वि.वि.)

             बी.एड. (राँची कॉलेज, राँची), पत्रकारिता,         (एन.ओ.यू), संगीत शिक्षण।

पुस्तक- 'बचा रहे सब' (कविता संग्रह)

मुन्नी का है आज जन्मदिन - सर्व शिक्षा अभियान मध्य प्रदेश के तहत बालगीत संग्रह प्रकाशित 

कविताएं प्रकाशन - प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं तथा ब्लॉग पर में कविताएं, आलेख,समीक्षा एवं कहानियाँ प्रकाशित । कई पत्रिका विशेषांकों में कविताएँ संकलित । 

दूरदर्शन तथा आकाशवाणी से निरंतर रचनाएं प्रसारित ।

शिरकत -नीलाम्बर कोलकाता , भारत भवन , रज़ा फाउण्डेशन , साहित्य अकादेमी इत्यादि महत्वपूर्ण मंचों से कविताएँ वाचन ।

अनुभव- पटना से निकलने वाली लघु पत्रिका  'चेतांशी' तथा 'वातायन प्रभात' में क्रमशः रिपोर्टर और समन्वय संपादक के कार्य का अनुभव । पटना दूरदर्शन में  'साहित्यिकी' कार्यक्रम का निरंतर संचालन ।

संप्रति- बिहार सरकार के अन्तर्गत  उच्च माध्यमिक विद्यालय में अध्यापन एवं स्वतंत्र लेखन ।        

पुरस्कार एवं सम्मान - भारतीय भाषा परिषद् युवा कविता पुरस्कार (कोलकाता) फणीश्वर नाथ रेणु पुरस्कार (पटना विवि) वुमन एचीवर्स अवार्ड्स 2018 साहित्य के लिए । पाखी देश विशेषांक कविता पुरस्कार


संपर्क-     

              नताशा 

           C/O-डी.एन.बैठा 

           आजाद नगर ,

           पोस्ट- मनेर 

          जिला -पटना ,पिन-801108

मोबाइल-9955140065/9708707504

ईमेल- vatsasnehal@gmail.com 

बुधवार, 19 जनवरी 2022

समकाल : कविता का स्त्रीकाल -10

अनुप्रिया हिन्दी कविता की वह आवाज़ हैं जो मूलत: अपने शब्द चित्रों की वजह से पहचानी जाती हैं, यह पहचान एक कलाकार की वह पहचान है जो अपने भावपूर्ण चित्रों से स्त्री विमर्श के कुछ नये मानक स्थापित करते हैं।आपके चित्र स्त्री जीवन के महाकाव्य लिखते हैं,श्वेत -श्याम इन चित्रों की मूल ध्वनि स्त्री चेतना है।गोद में बच्चा लिए एक औरत किताब पढ़ रही है,सीढ़ियों के सहारे चाँद की खूँटी पर अपने सपने टाँग आती है तो कभी वहीँ किताब ले बैठ जाती है पढ़ने ।

मुक्तिबोध ने शायरों के चाँद के मुँह को टेढ़ा कहा तो यथार्थवादी कवियों ने चाँद को रोटी की उपमा दी,अनुप्रिया के लिए चाँद कभी खूँटी है तो कभी स्त्री के बैठकर पढ़ने का एकान्त। अनुप्रिया मन से कवि हैं,उनकी रोज़ी श्रृंखला कविता में एक स्त्री के चेतना के स्तर,संघर्ष और संत्रास को बख़ूबी देखा जा सकता है।चूंकी बात कविता की हो रही है तो चित्रों पर आगे बात करेंगे।मन से कवि और हाथ से शिल्पी अनुप्रिया की कविताओं में स्त्री जीवन के विविध पक्ष खुलकर आते हैं।



1.

रोजी सपने देखती है..


रोज़ी सपने देखती है

सपने में भी देखती है खुद को सपने देखते

और मुस्कुराती है नींद भर

उघड़ी हुई दीवार देखकर

गिनती है ईंट 

चौंतीस,पैंतीस,छत्तीस....

फिर अपनी ऊँगली पर गिनती है

अपनी उम्र

अड़तीस...

नींद खुलती है

पाँच बजकर उनचालीस पर

और उम्र आकर रुक जाती है 

चालीस पर।




2.

रोजी पहचानती है सबको..


रोज़ी के चेहरे पर कोई चेहरा नहीं है

वह मेरा चेहरा हो सकती है

तुम्हारा भी

या हम सबके चेहरे को संभाल लेती है

एक अकेली रोज़ी।







3.

रोजी के किस्से...



रोज़ी के किस्सों में हम सबके किस्से हैं

रोज़ी के माथे पर उग आया

 नीला निशान

हम सबके हिस्से का है

उसकी पीठ पर चिपके अश्लील इशारे

हम सबके हिस्से के हैं

रोज़ी नम आंखों से 

फिर भी मुस्कुराती हुई देखती है सपने

उसे देखने हैं हम सबके हिस्से के सपने

रोज़ी के भीतर हम सब जीते हैं

थोड़ा -थोड़ा।



4.

रोजी को पता है..


रोज़ी को अलाउड नहीं है सपने देखना 

रोज़ी सबकी नजरें बचाकर छिप जाती है

अपने ही भीतर

उसे खूब पता है 

छुपन -छुपाई खेलना

अपने आप से ही।



5

रोजी हर घर में है..


.रोज़ी हर घर में है

हर खिड़की पर

हर दरवाजे पर

बस हम देखना नहीं चाहते

कि हर आँख में गुलाब से सपने महक उठते हैं

रोज़ी को उसके हिस्से के सपने देखने दो

देखने दो रोज़ी कोई

उसके हिस्से के महकते गुलाब!



                                    गोद में अपने नन्हें बच्चे को दुलारती अनुप्रिया


परिचय-

अनुप्रिया आज हिन्दी में अपने शब्दचित्रों की भाषा से पहचानी जानेवाली चित्रकार हैं,देश के तमाम लेखकों की किताबों के साथ-साथ हिन्दी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं के आवरण पर आपके चित्र प्रकाशित हैं।आप कविता लेखन के साथ -साथ बाल साहित्य से भी जुड़ी हैं।कुछ पुस्तकें प्रकाशित ।


नोट- पोस्ट में प्रयुक्त सभी चित्र अनुप्रिया के हैं।

मंगलवार, 18 जनवरी 2022

समकाल : कविता का स्त्रीकाल - 9

ममता सिंह


जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि सोशल मीडिया ने गढ़ों और मठो की सत्ता को ध्वस्त किया है और सबके लिए समान मंच उपलब्ध कराया है।यह व्यवस्था इतनी लोकतांत्रिक है कि हर कोई अपने " मन की बात" के तर्ज पर यहाँ बातें लिख रहा है,कोई सुने न सुने,कोई पढ़े न पढ़े,मन है लिख रहे हैं।यहाँ बहुत कुछ निर्थक है तो बहुत कुछ सार्थक भी है।

ममता सिंह अमेठी के छोटे से गाँव अग्रेसर में रहती हैं और प्राथमिक विद्यालय में शिक्षिका हैं,स्वभाव से संकोची और पढ़ाकू इतनी कि किताबों के मोह में अपने गाँव के बच्चों में पढ़ने की संस्कृति के विकास के लिए सावित्री बाई फुले जन पुस्तकालय की स्थापना की है।इनकी फेसबुक पोस्ट बातें बेवजह की  हम सभी का ध्यान खींचती हैं और ख़ूब लोकप्रिय है। ममता कविता लिखती जरूर हैं पर प्रकाशित कराने को लेकर इतनी संकोची हैं कि गाथांतर को ही कविताएँ बहुत निहोरा करने पर मिली हैं।

ममता की आवाजाही गाँव से शहर की बनी रहती है,वह इस दोनों दुनिया को खुली दृष्टि से देखती हैं और अपनी कविताओं में उन्हें बड़ी मार्मिकता से उकेरती हैं।इनकी कविताओं में राजनैतिक चेतना के बिम्ब मुखर हैं तथा ग्राम संवेदना के चित्र बड़े सजीव ढ़ंग से उभरते हैं।ममता की कविताओं पर यहाँ बात करते हुए एक बात स्पष्ट करना चाहूँगी कि यह आवाज जीवन की आवाजें हैं जो सीधे जन से जुड़ते हुए स्त्री कविता में चुपचाप दाखिल होती हैं।



                  1.

"शापिंग माल में एक औरत"

*********************


शहर के सबसे चमचमाते मॉल के

गेट पर सजी धजी खड़ी वो

लेती है तलाशी अंदर जाने 

वालियों की

खंगालती है पर्स,टटोलती है

पोशीदा जगहों को कि

कुछ अवांछित मॉल में 

न जा सके

कुछ पुरुष टटोलते हैं उसे

निगाहों से

बेशर्मी से घूरते

दांत चियारते

उन्हें देख

सिमट जाती है खुद में ही वो

उसके आई लाइनर और गाढ़े

काजल से सजी आंखों

में चुपचाप ठहरा है एक

सियाह अंधेरा

जिसमें छुपा है वो चेहरा

जो पिछले तीन महीनों से

सरकारी अस्पताल के जनरल

वार्ड के बेड नम्बर आठ पर

पड़ा खांस रहा


उसके सुर्ख होंठो के पीछे

छुपी है एक गूंगी चीख

जो मकान मालिक के 

सीढ़ियों पर दबोचने से

फूटी थी


उसके इकहरे बदन पर

करीने से चिपकी चमचमाती

यूनिफार्म के नीचे है

जतन से छुपाई ब्रा की 

वो टूटी स्ट्रैप

जिसे कई महीनों से

सिल-सिलकर पहन

रही वो ।


खड़े खड़े टांगें दुखती हैं

वह अब बैठना नहीं

लेट जाना चाहती है

उस वातानुकूलित मॉल के

चमकते फर्श पर क्योंकि

रात भर एक ही चारपाई पर अगल बगल लेटे बच्चों को

थपकते, सहलाते नहीं

बदल नहीं पाती करवट


उसने देखा है अमीर औरतों 

की निगाह में खुद

 के लिए हिकारत

और अपने अडोस-पड़ोस

की औरतों की नजर

 में ईर्ष्या

पर

पुरुषों में अमीर-गरीब सभी

के लिए है मात्र

 वह  देह

शून्य में ठिठकी सी वह

अजनबी चेहरों की भीड़

में तलाशती है कोई

नर्म निगाह कि तभी ...


गेट से निकलते,खिलखिलाते लोगों के हाथों में थमे

मंहगे सामानों से भरे

दर्जनों पैकेट देख,याद आ जाता है उसे कि  राशन लगभग खत्म है

चीनी-पत्ती तो कल से ही नहीं

बच्चों की कॉपी,सास की दवाई

अस्पताल के खर्चे,मकान का किराया,दूध का हिसाब

हड़बड़ाती सी सीधी खड़ी हो

पोछती है एहतियात से 

नन्हें आंसू को

कि कहीं खराब न हो जाये

करीने से लगा काजल




           2.

"पहलू बदलती औरत"

*********************

कब उगता है और जाने कब 

ढल जाता है यह निबहुरा दिन  

पता ही नहीं चलता सर्दियों में 


बँगले वाली मेम साहब के घर 

दोपहर से चल रही काव्य गोष्ठी 

खिंचती गई शाम... और अब रात तक 


वक्त के साथ-साथ 

खिंचती जा रहीं सुरसतिया के माथे की लकीरें 

कविता...क़हक़हे... बहसें 

तैरती ड्राइंग रूम से बाहर तक 

सुनती हुई बदलाव की , औरतों के हक़ की बातें 

बार-बार पानी देती, चाय बनाती, प्लेटें हटाती 

रह-रह कर झाँकती है खिड़की से 

जूठे कप धोती सुरसतिया 


बाहर नियॉन लाइट के घेरों में नहीं 

बेचैनी भरा वह अंधेरा 

धीरे-धीरे उतर रहा था 

ठीक सुरसतिया के कलेजे के बीचोबीच 

पसर रहा था 

घर पर छूटे तीन बच्चों 

दो बकरियों 

और आधा दर्जन मुर्गियों के वज़ूद पर 


भूख ,बेचैनी और डर के अंधेरे में 

पिछले बरस कच्ची की भेंट चढ़ा पति, 

तो झोपड़ी का अस्तित्व लील गया 

मुंसीपाल्टी का बुलडोजर  


शहर के बाहरी इलाके में 

भभका मारते , शहर ही की ग़लाज़त ढोते 

नाले के किनारे बसी  

पन्नियों ,टायरों , पतरों और बाँस से बनी 

उन झोपड़ियों में से एक के लिए भी , 

कि जिनमें साहबों के कुत्ते भी 

फ़ारिग होने से करते थे इन्कार ,

कितने जतन, चिरौरी , विनती के साथ 

कुर्बान करनी पड़ी थी उसे 

माई की आख़िरी निशानी 

वह पाज़ेब - चाँदी की 


औरतों के मुँह से 

औरतों के पक्ष में बदलाव की बातें ! 

सुनने में कितनी सुंदर , मनभावन कितनी ! 

पर हक़ीक़त में कुछ नहीं बदलता 

छोटी और बड़ी 

मर्दों से अलग मिट्टी से थोड़े न बनी हैं औरतें 

सोचती है

अभी ज़रा ही देर पहले 

घर जाने की इल्तिज़ा पर 

कस के डाँट खा चुकी सुरसतिया 


रुपहले सपनों पर हमेशा भारी होती है 

हिसाब की धमकी !


चाय और बहस की गर्मी पर 

हावी थी दिसंबर की सर्दी 

मीठी आँच परोस रहे थे 

भव्य कक्ष में जल चुके हीटर 

ख़ूबसूरत उन्हीं हाथों में  कप की जगह 

आ गए थे बेशकीमती शीशे के गिलास 

बातें अब भी थीं वही 

पर सुर में सुरूर तारी था 

छोटी और बड़ी औरत के 

क़दों में अंतर बहुत भारी था 

बाहर बदल रहे थे जाम 

भीतर एक औरत 

कुछ न बदलते हुए भी 

बदल रही थी 

पहलू

 







              3.

  "क्या फ़र्क पड़ता है?"

  ***************


बूँद बूँद

झर रहा कुहासा 

लीलता जा रहा

सारी दृश्यता

जकड़ रहा चेतना को

सुन्न हो रहीं शिराएँ

कहीं रौशनी की कोई किरण नहीं 

कोई आहट नहीं , ताप नहीं

बुझे अलाव से सटकर 

गुड़ी - मुड़ी सोये कुत्ते चुप हैं 

हुआँ - हुआँ की भेदक आवाज़ भी 

खो चुकी  है किसी माँद में 

मौत सी निष्क्रिय निस्तब्धता 

हर जगह तारी है 

मगर ज़िन्दगी है कि अब भी

मौत से नहीं हारी है 

टूटती साँसों को बचाने के लिए 

 अब  भी जद्दोज़हद जारी है

जारी हैं पेट भरने के उपक्रम

न जाने किसकी पारी है

कौन है जो इस सर्द रात में

फावड़ा लिए , आया है सींचने गेहूँ 

रात में ही आती है बिजली

सेंवार के इस सन्नाटे में

कौन बोल रहा यह ?

कोई भी हो सकता है   

 होरी,धनिया ,अलगू ,झबरा - कोई  !

कोई भी हो 

क्या फर्क पड़ता है नाम से ?

हैं तो  मुंशी जी के किसान ही! 

अब भी जी रहे वे 

कमोबेश वही जिंदगी

क्या फर्क पड़ता है 

कि पूस की इस रात

भारत की जी डी पी कितनी है

या कि कितना गेंहू इस बरस 

होगा आयात या निर्यात 

क्या फर्क पड़ता है कि 

लू से मरे कोई या शीत लहर से

ए टी एम की लाइन में खड़े होकर मर जायें 

या अच्छी चिकित्सा के अभाव में दम तोड़ें   

या फिर लटकी देहों का बोझ सहें सभी दरख़्त 

तय नहीं हुए हैं अभी भी 

उलटे खड़े  सवालों के जवाब 

मसलन , यह कि   

किसानों - ग़रीबों की मसीहा हैं सरकारें 

या ग़रीब - किसान ही 

हमेशा से  मसीहा हैं सरकारों के 

सच तो अब तक  इतना ही है 

कि इस बेरहम रात भी 

चार हाथ जुटे हैं

ट्यूबवेल से खेत तक 

निर्बाध पानी पहुँचाने में

मौत को 

मुर्दा बनाने में  !!







   - 4

*रौशनी*

**************

लालटेन ने फीकी कर दी थी

रौशनी चाँद और जुगनुओं की

फिर आया बल्ब जिसने

मंद किया लालटेन का तेज

विकास के क्रम में

विकसित होने के भ्रम में

हम रचते और गढ़ते रहे

रौशनी के नित नए प्रतिमान और

दूर होती गई प्रकृति रोज ब रोज हमसे

आज चारों ओर चमकते ये

एल इ डी बल्ब और 

नियोन साइन बोर्ड

जिनकी भव्यता में बिला गए

जाने कितने चाँद,जुगनू,लालटेन 

और बल्ब

आँखों में चौंध भरते ये नए सूर्य

नहीं जगा पाते स्वप्न और संवेदना

जो कभी खिलखिलाती थी यूँ ही

आँखों में,होंठों पर,सांसों में

आँगन से चाँद की छाँव में लेट

रातभर बतकही का सुख

रौशनी का नसों में पिघलकर बहना

और निहारना मौन पीपल से झरते

जुगनुओं की झालर को

अब हजारों बल्ब मिलकर भी नहीं 

रच पायेंगे रौशनी का वो

ऐन्द्रजालिक वितान

और संवेदना की तरलता

********"*********"********** 


परिचय
***********

ममता सिंह
गाँव-अग्रेसर (अमेठी)
उत्तर प्रदेश




                                                             ममता सिंह

सोमवार, 17 जनवरी 2022

समकाल :कविता का स्त्रीकाल-8


विपिन चौधरी


स्त्री कविता ने आज मठों की सीमाओं को तोड़, पहाड़ से लेकर रेगिस्तान तक,महानगर से होते हुए नगरों ,कस्बों की सीमाओं का अतिक्रमण कर मुख्य धारा में तेजी से  जगह बनाई है। इस निर्माण में सबसे अहम भूमिका सोशल मीडिया की रही है।ऐसे बहुत से नाम हैं जिन्हें हम इन्हीं माध्यमों से जान पाए और उनकी कविताओं से परिचित हुए। मूलतः हरियाणा की विपिन चौधरी की कविताओं में स्त्री जीवन के विविध आयाम देखने को मिलते हैं।
विपिन चौधरी की कविताओं में इक्कीसवीं सदी की स्त्री अपने मन के किवाड़ की साँकले खोलती हैं। वह इस बदलती हुई स्त्री के बदलाव को देखते हुए लिखती हैं-

"एक स्त्री,

अपने पति से अलग होकर 

आजकल पुस्तकालय की शरण में है 

 

अब पुस्तकालय में किताबें पढ़ने के अलावा 

मेरे पास एक और काम भी है 

मेज़ पर झुकी हुई उस स्त्री को पृष्ठ-दर-पृष्ठ पढ़ती हूँ

गोया वह मेरे सामने खुली हुयी एक किताब हो 

बिलकुल नयी 

जिसका एक भी पन्ना 

मुझ से पहले किसी ने पढ़ा ही नहीं  

बिना पढ़े ही उसे ठहरा दिया गया 

बिलकुल कोरा "


कविता में यह पड़ताल आज की बदलती दुनिया का वह चेहरा है जहाँ बहुत कुछ बन रहा है तो बहुत कुछ टूट भी रहा है ,इस बनने -बिगड़ने से लेकर टूटने-बिखरने की क्रिया को आज की स्त्री कविता में  आज की कवयित्रियों ने बड़ी सुघढ़ता से परिभाषित किया है और अपना प्रतिरोध अपनी भाषा में पितासत्ता के सम्मुख दर्ज कर रही है। 

                                                                                     (टिप्पणी- सोनी पाण्डेय)

 
1.   चोर दरवाज़े

मन के भीतर मन

उसके भी भीतर एक और मन

मन का एक दरवाज़ा खुलता है

दूसरा बंद होता है
सबसे भीतरी मन की गहन गुफा की चौकसी पर तैनात  है 

मन के  कई बाहरी  मज़बूत और 
मुस्तैद  दरवाज़े 

मन की एक सुरंग में डेरा है
सहेली के उस  निष्ठावान प्रेमी का 
जिसने जीवन-भर किसी दूसरी लड़की की तरफ  आँख उठा कर भी नहीं देखा था 


दूर रिश्तेदारी के रोशन चाचा 

देव आनंद सा रूप-रंग लेकर जन्में थे जो  


पड़ोस की वह कुबड़ी दादी
लगती थी लगा करती थी 

अपनी दादी से भी प्यारी 
ढेर साड़ी गुड़ियां और उनकी गृहस्थी का छोटा-मोटा साजों-सामान
पड़ोसी  दीनू जो परीक्षा के दिन उसकी  साईकल का पंचर लगवा कर आया था 

और आज तक साईकल में पंचर  लगवाता हुआ ही दिखता है

सबने थाम रखा है मन का एक आँगन 

मन  के  एक  कोने में  सिमटा हुआ है अधूरा प्रेम

जो दुनिया का ज़हर पी-पी कर
कालिया नाग बन गया था


बाहर ज़रा सी आहट हुई और
दरवाज़ा  मूँद कर वह
मुस्कुराते हुए अपने शौहर का  ब्रीफकेस हाथ में थाम  
कह उठती है
'आप मुँह -हाथ धो आईये
 मैं अभी चाय बना कर लाती हूँ '

और   नज़र बचा कर 

अपने माथे पर चू आये पसीने को पोंछती है

आखिर मन के  इतने सारे  खुले दरवाज़ों का
मुँह झटके से  बंद करना इतना आसन  भी तो नहीं 

 


2. पुस्तकालय में जन्म लेती नयी स्त्री 


'कृपया शांत रहें' इस अनुशासन की हवा में कितने ही विचारों ने बदले हैं अपने वस्त्र    

ज्ञान का यह  प्रसूति-गृह

पृथ्वी के दुष्ट शोर से है कोसो दूर 

याद है किसी ने बतलाया था 

'किताब पुस्तकालय की ईंट होती हैं' 

यह भी कह गया कोई 

'हम ही नहीं किताबें भी हमें पढ़ती हैं' 


तानाशाहों के ढेरों दफ़न किस्सों के बीच 

अनेक शांति-दूतों को सुकून भरी नींद लेते 

देखा यहीं पर मैंने 

 

सोचती हूँ अक्सर

सबसे ज्यादा पढ़ी गयी किताब


खुद को कितना ख़ुशनसीब पाती होगी  

 अकेले नहीं 

बरसों से किताबों की सीली खुशबू के संग  

अपने घर में प्रवेश किया है मैंने    

 

एक स्त्री,

अपने पति से अलग होकर 

आजकल पुस्तकालय की शरण में है 

 

अब पुस्तकालय में किताबें पढ़ने के अलावा 

मेरे पास एक और काम भी है 

मेज़ पर झुकी हुई उस स्त्री को पृष्ठ-दर-पृष्ठ पढ़ती हूँ

गोया वह मेरे सामने खुली हुयी एक किताब हो 

बिलकुल नयी 

जिसका एक भी पन्ना 

मुझ से पहले किसी ने पढ़ा ही नहीं  

बिना पढ़े ही उसे ठहरा दिया गया 

बिलकुल कोरा 


 


3. जनपद- कल्याणी- आम्रपाली

 भंते,
स्मृतियाँ
मुझे अकेला छोड़
अपनी छलकती हुयी गगरियाँ कमर पर उठा
पगडण्डी-पगडण्डी हो लिया करती हैं


स्मृतियों के मुहं मोड़ते ही
अजनबी झुरियां,
झुण्ड बनाकर
मुझसे दोस्ती करने के लिये आगे
बढ़ने लगती हैं


अठखेलियाँ करने को आतुर
रहने लगी हैं
बालों की ये सफ़ेद लटें
उफ्फ
अब और नहीं
भंते औररररर नहीं


मेरा दमकता
नख-शिख
घडी- दर- घडी दरक रहा है


क्या हर चमकती चीज़
एक दिन इसी गति को जाती हैं  ?
राष्ट्र को बनाने, बिगाड़ने वाला
मेरा सौन्दर्य  इतना कातर
क्योंकर  हुआ, भंते


जिस जिद्दी दुख,
का रास्ता सिर्फ नील थोथे को मालूम हुआ करता था
अब वही दुःख
मेरे  मदमदाते शरीर में
अपना  रास्ता ढूंढने लगा है

मुक्ति की
कोई राह है भंते
सीधी न सही
आड़ी-टेढ़ी ही


वैशाली की नगरवधू जनपद कल्याणी
बौद्ध भिक्षुणी के बाने
भीतर  भी
आसक्ति के कतरों को
अपने से अलग नहीं कर पा रही
इस अबूझ विवशता को क्या कोई नामकरण दिया है तुमने भंते


बिम्बिसार की मौन मरीचिका के आस-पास
एक वक़्त को मेरा प्रेम जरूर
टूटी चूड़ी सा कांच-कांच हो गया था
किन्तु  बुद्धम- शरणम् के बाद  भी
अनुराग, प्रीति, मुग्धता के अनगिनत कतरे मेरे तलुओं पर रड़क रहे हैं


सौंदर्य क्या इतनी मारक चीज़ है
तथागत
कि  मेरे प्रश्नों पर तुमने यूँ
एकाएक मौन साध
ध्यान की मुद्रा में खुद को स्थिर कर लिया  है


4. ज्यादातर मैं सत्तर के दशक में रहा करती हूँ

सत्तर की फिल्मों का दिया भरोसा कुछ ऐसा है कि मैं
अपने कंधे पर पड़े अकस्मात
धौल-धप्पे से चौंकती नहीं हूँ मैं


भीड़ भरे बाजार में
बरसों बिछड़ी सहेलियां  मिल जाया करती हैं
खोयी मोहब्बत दबे पाँव आ धमकती है
पीले पड़ चुके पुराने प्रेम-पत्रों में
उस दौर की फिल्मों ने अपने पास बैठा कर यही समझाया


भरे-पूरे दिन के बीचो- बीच
बदन पर चर्बी की कई तहें ओढे
एक स्त्री मुझे देख कर तेज़ी से करीब आती है
और टूट कर मिलती है
मुड़ कर थोडी दूर खड़े अपने शर्मीले पति से कहती है
" सुनो  जी मिलो मेरी बचपन की अज़ीज़ सहेली से'
 और मैं हूँ कि
अपने पुराने दिनों में लौटने की बजाये
बासु दा की फिल्म के उस टुकड़े में गुम  हो जाती हूँ
जहाँ दो पुरानीं सहेलियां गलबहियां डाले  भावुक हो रही हैं


बस स्टॉप पर 623 की बस का इंतज़ार करते  वक़्त
अमोल पालेकर तो कभी  विजेंदर घटगे नुमा युवक  अपने पुराने मॉडल का
लम्ब्रेटा स्कूटर
मेरी तरफ मोड़ते हुए लगा है


फिल्म 'मिली' के  भोंदू अमिताभ का
मिली  "कहाँ मिली थी" वाला वाक्या आज भी साथ चलता  है
ताज्जुब नहीं कि
डिज़ाइनर साड़ियों के शो रूम में
(विद्या -सिन्हा की ट्रेड मार्क) बड़ी-बड़ी फूलों वाली साड़ियाँ  तलाशने लगती हूँ
'मूछ -मुंडा' शब्द पर बरबस ही उत्पल- दत्त सामने मुस्तैद हो जाते हैं
भीड़ में  सिगरेट फूंकता
दुबला -पतला दाढ़ीधारी आदमी दिनेश ठाकुर का आभास  देने लगता है


हर साल सावन का महीना
 "घुंघरुओं सी बजती बूंदे" की सरगम छेड़ देता है
और मैं  1970  को रोज़ थोडा-थोडा जी लेती हूँ


श्याम बेनेगल की नमकीन काजू  भुनी हुई फिल्में
देर रात देखा करती हूँ
मेरी हर ख़ुशी का रास्ता उन्नीस सौ सत्तर से हो कर आता है
अपने हर दुःख की केंचुली को
उस पोस्टर के नीचें छोड़ आती हूँ
जहाँ  'रोटी कपडा और मकान' के पोस्टर में मनोज कुमार मंद-मंद मुस्कुराते
हुए खड़े हैं
और नीचे लहरदार शब्दों में लिखा है
'मैं ना भूलूंगा इन रस्मों इन कसमों को'
गायक, मुकेश


4. स्त्रियों के नाम सावधानी के कई परतें 

 

कुछ धनी प्रक्रियाओं में शामिल आवाजों से  

उनका आवाजों का घनत्व और भी बढ़ जाता है 

 

घनत्व के इसी भार के भीतर नहाती हैं 

हमारी ग्रामीण औरते

खाट, चादर की ओट में 

तो कभी दुपट्टे की छत्र-छाया तले   

 

नहाने का साबुन ना होने पर  

बिना किसी हो हल्ले के  

कपडे धोने की टिकिया से भी उनका काम चल जाता है

 

नाहन पटरी पर कमर को धनुष बना 

वे व्यस्त हो जाती है केवल अपने लिए  

 

पत्थर की रगड से जब उनकी एडियाँ उजली हो रही होती हैं 

तो उस पल  

समूचा सोंदर्य-शास्त्र उनके नाजुक क़दमों

तले पनाह मांगता दिखाई देता है 

 

काम काज से निपट कार 

पुरुष नाम का प्राणी  के घर से प्रस्थान करने के बाद 

वे रसोई के एक शांत कोने को नाहनघर में तब्दील कर देती हैं   


पूरी तरह निवस्त्र औरत

नहाते हुए भी चौकनी रहती है  

कि सुई की नोक बराबर भी देह का कोना 

उजागर ना हो जाये 

 

खेल-खेल में उसके करीब आई गेंद को

अपने छः साल के गोनू की तरफ फेंक कर कहती है 

बेटा इधर ना देख्यो 


नहाते समय संसार की हर स्त्री उतनी सुन्दर होती है

जितना सुंदर एक स्त्री को होना चाहिये  

 

केलि क्रीडाएं करती रीतिकालीन नायिकाएं  

खंडर महलों के बड़े-बड़े कुंड में रानियों की जीवित याद को सुरक्षित रखने के  बाद 

गांव की वे स्त्रियों याद आती हैं 

जो एक बाल्टी पानी में नहाने का सोंधा काम करती है  

अधजली लकडियों की गंधशुदा पानी 

उनके देह से मिल कर अपनी पुरानी गंध खो बैठता है 

 

कोई स्त्री नहाते-नहाते स्त्री सोचने लगती है 

कहीं इस वक्त खुदा की आँख तो खुली ना रह गयी हो 

यह सोच 

पानी का डब्बा उसके सिर से कुछ ऊपर थम सा जाता है

फिर कुछ सोच औरत खुद ही शर्माती है

‘धत’


भोर होते ही 

गुडुप गुडुप और छन-छन की आवाजें  

बांध लेती है कुएं की मुंडेर का गोल दायरा  

गांव की पुरानी बहुओं चुपचाप नहा कर 

आ जाती है अपनी चौखट पर 

 

नई बहुए सुबह कुए पर नहीं नहाती  

कुछ वर्षों के बाद ही वे अपनी सास और ददिया सास 

का अनुकरण कर कुएं पर स्नान का लुत्फ़ उठाएंगी

तब तक वे सावधानी की कई परतों को अपने 

पल्लू से बाँध चुकी होंगी 



5. दस्यु सुंदरी 

 

किसी रोज़  हम एक दस्यु सुन्दरी से मिलने गए थे 

सदी यही थी 

तारीख और साल दिमाग की तंत्रिकाओ से जम  गए लगते  हैं अब  

उस रोज़ उस दस्यु सुंदरी से बाकायदा हमने गर्मजोशी से हाथ भी मिलाया 

मुलाकात से पहले जहाँ जहन मे फिअरलेस नाडिया सी चंचल युवती का अक्स था   

मिलने पर पुराने फ्रेम मे तस्वीर बदल दी गयी हुई दिखाई दी 

वीरान, बेरोनक, अथाह ग़मगीनता मे लिपटी 


हमें अपने आस पास बीहड जंगल का भान होने लगा

हम डरते नहीं थे पर

मामला  दस्यु सुन्दरी का था 

एकबारगी यह भी लगा अचानक इस सुन्दरी ने हम पर हमला कर  दिया  तो

हम निहत्थों की लाश  भी अपने ठिकाने  नहीं पहुंचेगी  

पर  उस खामख्याली की उम्र  कुछ पलों की  थी 


सींखचों को थामे दस्यु-सुन्दरी भूतकाल का खोया सिरा तलाशती तो  

हर बार गिनती गड़बड़ा जाती 

बार-बार फिर से उसे अंधेरी कोठरी मे गहरे उतरना पड़ता   

ठाकुर, कुआ, चंबल, बंदूक, आंसू, चीख 

उसके स्लेटी जीवन का पहाडा इन्ही चीजों ने मिलकर लिखा था 


'यह ताबीज दादी ने बचपन मे पहनाई थी' 

पूछने पर उसने बताया 

सब कुछ लुटने के बाद यह ताबीज़ उम्मीद की तरह उसके सीने से लगी हुई थी  


अपने आकालग्रस्त बचपन की देहरी लांघ कर

वह जवानी के उस  बेड़े मे शामिल हुई  

जहाँ  शामियाने मे छुपी हुई  कीले 

उसके जिस्म पर एक साथ चुभी 


जब उस जवान जहान संसार ने 

उसका वह  निवस्त्र पागलपन 

देखा जो पुरुष की छाया के आभास से ही अपना  सब  कुछ उघाड़ कर रख  देता  था 


सुन्दरी के निशाने पर 

पहला भी पुरूष

दुसरा भी पुरूष

और आखिरी भी पुरूष ही था

धरती पर मौजूद इस प्रजाति के प्रति वाजिब घृणा के बाचजुद

दस्यु सुंदरी अब भी

इक पुरूष के वरण की आस को पाल कर 

नारीवादीयों की तिरछी नज़र की शिकार बन गयी थी  


इधर हमे भी अपने पुरुष-अवतार पर संदेह रहा होगा 

या फिर हमारी चमकीली खानदानी विरासत के चलते 

हमारी स्मृतियों ने दासु सुन्दरी की भयावह कहानी को भूलने पर मजबूर किया  

याद रही तो केवल वह विश्व सुन्दरी 

जो प्लाज़्मा टीवी के भीतर हिलती डुलती थी और 

जिसकी विस्तृत नीली आँखों मे कई नक्षत्र गोते लगाने का जोखिम उठाते रहे थे.   


परिचय

नाम : विपिन चौधरी
जन्म : 2 अप्रैल, 1976, गाँव : खरकड़ी माखवान, जिला भिवानी( हरियाणा)  

शिक्षा: बी.एस.सी. ( प्राणी विज्ञान)
एम्.ए. (लोक प्रकाशन)
एम्.ए. (राष्ट्रीय मानवाधिकार)

प्रकाशित कृतियाँ :-
1. कविता संग्रह
      अँधेरे के मध्य से (2008)-ममता प्रकाशन
      एक बार फिर  (2008)-ममता प्रकाशन
           नीली आंखों में नक्षत्र ( 2017)-बोधि प्रकाशन

2. कथेतर साहित्य
 ' मैं रोज़ उदित होती हूँ'
 अश्वेत लेखिका माया एंजेलो की जीवनी (2013)-दखल प्रकाशन


3. अनुवाद
        रस्किन बांड, (कहानी- संग्रह)- सस्ता साहित्य मंडल 
        सरदार अजीत सिंह   (आत्मकथा)-संवाद प्रकाशन 
        ऐमिली ब्रोंटे,   (आत्मकथा)- संवाद प्रकाशन (प्रकाशनाधीन)
        मैरीवूलेनस्टोनक्राफ्ट  (आत्मकथा)-संवाद प्रकाशन (प्रकाशनाधीन)
       
4. कहानी संग्रह : ज़ेब्रा क्रासिंग,  जगरनॉट  (प्रकाशनाधीन)

    संप्रति : स्वतंत्र लेखन
 



                                                                     विपिन चौधरी

रविवार, 16 जनवरी 2022

बातें हमारी - तुम्हारी : कवि आलोक धन्वा और पंकज चतुर्वेदी के आत्मीय संवाद

साहित्य की दुनिया में हम जिन बने बनाये मानकों के बीच घूमते रहते हैं उनमें कविता, कहानी के अतिरिक्त आज अन्य विधाओं की सामग्री ना के बराबर पढ़ने को मिलती हैं। फेसबुक ने कविता को उत्पाद बना दिया तो हर कोई चार पंक्ति लिख कर कवि होने का दावा करने लगा और सार्थक चीजों को हर किसी की पहुँच से दूर किया।पंकज जी के शब्दों में-"फेसबुक एक जंगल है और यहाँ उपयोगी पोस्टों तक पहुँचना थोड़ा मुश्किल है।"
पंकज जी के कहे से शायद ही कोई गम्भीर पाठक असहमत हो,बावजूद इसके यहाँ वाद-विवाद-संवाद की भरपूर गुँजाइश रहती है और बहुत सी साहित्यिक चर्चाओं, पुस्तकों और ख़बरों तक हम इस माध्यम से सहजतापूर्वक पहुँच जाते हैं।
इन दिनों डीजिटल दौर में फोनिक संवाद किस तरह साहित्य का हिस्सा हो सकता है का ख़ूबसूरत उदाहरण कवि/आलोचक पंकज चतुर्वेदी जी के वॉल पर देखने को मिला ।कवि आलोक धन्वा और पंकज जी का संवाद एक वरिष्ठ की जीवन और साहित्यिक दृष्टि को बेहद सुघढ़ ढ़ंग से व्यक्त करता है और हमें कभी साहित्य तो कभी उनके जीवन की गलियों में ले जाता है।

आलोक धन्वा की कविताओं में हम जिस मानवीय करुणा एवं जन चेतना का फलक देखते हैं वह ज़मीन से गहरे धसाव का प्रमाण है।वह अपने पुरखों के गाँव को याद करते मुझसे अतिशय भावुक हो जाते हैं।यह संयोग ही है कि जिला गाजीपुर, परगना पचोतर का उनका पैत्रिक गाँव लउवाडीह , राही मासूम रज़ा का गाँव गंगौली और मेरा गाँव सराय मुबारक एक ही बेल्ट में पड़ता है।ख़ूब उर्वर ज़मीन का क्षेत्र जहाँ रवि और खरीफ की दोनों फसलें गोड़ तोड़कर होती हैं,जहाँ जीवन का ठाट अपने लोक के आलोक में जगमगाता और गाता गुनगुनाता है वहाँ से आलोक जी का गहरा नाता है।
आलोक जी कभी अपने ननिहाल सेरपुर को याद करते हैं तो कभी मंगला राय पहलवान जिन्हें सितारे हिन्द की उपाधि मिली थी को याद करते हैं।इनके पुरखे रोजी -रोटी के फेर में यहाँ से बिहार गये तो वहीं के होकर रह गये।
आलोक जी ने फोनिक संवाद के दौरान जब जाना कि मैं गाजीपुर की हूँ तबसे लेकर आज तक जब भी बात हुई वह पूरी तरह भोजपुरी में होती है।गलती से भी वह एक वाक्य खड़ी का प्रयोग नहीं करते हैं।युवाओं में यह ख़ूबी युवा कवि उपासना झा में है।ख़ूब पढ़ी-लिखी उपासना का मुझसे संवाद भोजपुरी में होता है।यह सब कहने का आशय मात्र इतना है कि यह सब किसी भी व्यक्ति के ज़मीन से जुड़ाव का प्रमाण है ।
पंकज ,आलोक धन्वा संवाद केवल एक संवाद नहीं है,यह एक विमर्श खड़ा करता है और ढ़ेर सारे वाद-विवाद-संवाद के द्वार खोलता है।
पंकज जी को आभार कि उन्होंने गाथांतर पर इन संवादों के कुछ अंश प्रकाशित करने की अनुमति दी।प्रस्तुत हैं कुछ अंश-
                                                                                                                         (सोनी पाण्डेय)

                                                                     (1)


आज संवाद की शुरुआत ही आलोक धन्वा ने मिर्ज़ा ग़ालिब से की : "कोई हो सकता है कि मुझे मनुष्य ही न मानता हो, लेकिन वह ग़ालिब ने कहा है न : 

'ग़ालिब बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे 
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे !'

ग़ालिब एक बड़े प्रवक्ता थे ऐसे लोगों के, जिनके वजूद को सत्ता कुचलती थी, 'इग्नोर' करती थी। इसीलिए वह कहते हैं कि हम तो आम रस्ते पर बैठे हैं, अब यहाँ से उठाकर कहाँ ले जाओगे हमें :
 
'दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं
बैठे हैं रहगुज़र पे हम ग़ैर हमें उठाए क्यूँ'

मीर और ग़ालिब बड़े कवि हैं, भारत के सौभाग्य हैं, गौरव हैं। असल में इश्क़ की, मुहब्बत की मुलाक़ातें हमें पनाह देती हैं। जितने बड़े कवि होते हैं किसी भी ज़बान के, उनका नज़रिया मुहब्बतों की महफ़िलों से आबाद होता है। ग़ालिब ने ऐसी बातें कही हैं, जो हम सोचते हैं तो आत्मा निर्मल हो जाती है। 'आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना'--यह तो कोई लिख सकता था, लेकिन 

'दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ 
 रोएँगे   हम   हज़ार   बार   कोई   हमें   सताए   क्यूँ'

यह ऐसी चीज़ है कि इसे हर कोई नहीं लिख पाता। कितने 'सेंसुअस पोएट' हैं ग़ालिब : 'फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया !' या फिर : 

'ज़िंदगी यूँ भी गुज़र ही जाती 
 क्यूँ तिरा रहगुज़र याद आया' 

ऐसे कवि निराला हैं, रवीन्द्रनाथ हैं। रवीन्द्रनाथ जहाँ जाते हैं, दुर्लभ है वह जगह। लोग उसे रहस्यवाद कहते हैं, पर रहस्य नहीं है वह, एक तरह की पुकार है। जैसे मुक्तिबोध कहते हैं : 'मुझे पुकारती हुई पुकार खो गयी कहीं।'

1857 की लड़ाई को कुछ लोग ग़दर कहते हैं, मगर मैं उसे भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम मानता हूँ। उसे ग़ालिब ने अपनी आँखों से देखा और ऐसे घर में थे वह, जहाँ पनाह ली जा सकती थी। बंद किवाड़ों की दरारों से उन्होंने दिल्ली में क़त्लेआम देखा। जो अंग्रेज़ थे, वे कुचल रहे थे अवाम को। तभी उन्होंने लिखा :

'जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
 कुरेदते  हो  जो  अब  राख  जुस्तुजू  क्या  है'

उर्दू शाइरी का पूरा उन्वान उन्होंने बदल दिया। सचमुच की जो ज़मीन है, ज़मीनी लड़ाइयाँ हैं, क़ुरबानियाँ हैं, उनसे उसे जोड़ा। इश्क़ तो ऐसा है कि समय का बोध ही बदल देता है। इश्क़ जो नहीं करता, उसके लिए समय बिलकुल अलहदा है। जो करता है, उसके यहाँ आके देखिए कि उसका समय कैसे बीतता है ! यह हमें ग़ालिब की शाइरी से मालूम होता है कि कैसा बुरा समय है : 

'आशिक़ हूँ प माशूक़-फ़रेबी है मिरा काम 
 मजनूँ को बुरा कहती है  लैला मिरे आगे'


                                                                     (2)

 एक दिन आलोक धन्वा सहसा कहने लगे : कवियों को जानवरों के बारे में भी जानना चाहिए, आप कितना रहे हैं उनके सान्निध्य में ? फिर वह बचपन की स्मृतियों में खो गये : "गाँव में जब हाथी आता, तो हमारे घर में जो ब्राह्मण रसोइया था, उनसे माँ कहती कि दस-बीस रोटी ले आओ इसके लिए। तभी बाबू जी आ जाते, कहते : दस-बीस रोटी से क्या होगा, पाँच किलो आटे की मोटी-मोटी रोटियाँ पकाकर लाओ और उनमें अचार का तेल मिलाकर खिलाओ इसे। कम पानी में गुड़ का घोल बनाओ और पिलाओ इसे। क्या उसे गुड़ का 'टेस्ट' नहीं होगा, गन्ना खाता है वह। गन्ना जब पेरा जाता है, तो हाथी दूर से ही सूँघ लेता है कि हवा में मिठास है। गन्ने का मौसम हो, तो उसे पाँच-छह बाल्टी रस पिलाइए ! केले खिलाइए ! पीपल के पत्ते उसे बहुत प्रिय हैं। हाथी मस्त हो जायेगा, तो बैठेगा। बैठेगा, तो समझ लीजिए, सोयेगा भी। 

हाथी से सोहबत हो जाए, तो वह आपके घर रह जायेगा। जंगल जायेगा, तो हथिनी को पकड़कर आपके पास लायेगा, हथिनी होगी, तो हाथी को लेकर आयेगी। दक्षिण भारत, ख़ास तौर पर केरल में तो आप हाथियों के बिना पोंगल या नवान्न की कल्पना नहीं कर सकते। ऐसे त्योहारों पर उनका शृंगार किया जाता है। 

दुनिया में जो भी प्राणी है, वह आदमी के साथ रहना चाहता है, क्योंकि उसे यह 'इंट्यूशन' है कि 'आदमी हमसे बेहतर है।' कुत्ता तो मनुष्य का सबसे पुराना साथी है। इसी तरह हाथी, घोड़े, गाय-बैल, बंदर और बिल्लियाँ वग़ैरह हैं। बकरी को अगर ज़मीन पर जाड़ा लगेगा, तो आपके ऊपर सो जायेगी। पहले के रईस लोग नेवला पालते थे, ताकि साँप से निश्चिंत रहें। हाथी पर बैठकर शेर का शिकार करने जाते थे, क्योंकि शेर में यह हिम्मत नहीं थी कि हाथी पर बैठे हुए आदमी पर हमला करे।

शेर भी जन्म से पालिएगा, तो आपके साथ रहेगा। ज़्यादातर जानवर आपके साथ रह जायेंगे, लेकिन साँप नहीं रहेगा। चला जायेगा। आप उसे दूध पिलाइए या उसके सामने बीन बजाइए, तो भी वह काट लेगा आपको। मदारी अगर उसके विष के दाँत न तोड़े, तो मर जायेगा। प्रो. यशपाल ने एक लेक्चर में कहा था कि साँप चक्षुश्रवा है। रास्ते में किसी के जाने से जो तरंगें उठती हैं, उनसे वह पहचानता है अपने आहार को और उसका पीछा करता है। चूहे और बेंग (मेढक) उसे पसंद हैं।"

मैंने पूछा : 'जब अधिकांश जानवर रह जाते हैं या रहना चाहते हैं आदमी के पास, तो साँप क्यों नहीं रहता ?'

आलोक जी बोले : "क्योंकि उसका स्वभाव अच्छा नहीं है। दूसरे, उसे डर लगता है कि आदमी हमें मार देगा।"

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                                                                       (3)

 आज मैंने आलोक धन्वा से पूछा : 'निराला की जीवनी के आधार पर डॉ. विनय कुमार का निष्कर्ष है कि एक दौर में वह 'साइकोटिक' {Psychotic} हो गये थे। आप क्या कहना चाहेंगे ?'

बोले : "मशहूर डॉक्टर हैं वह और अच्छे रचनाकार भी हैं। लेकिन डॉक्टरों का नज़रिया अलग है और हमारा अलग। हम तो रात-दिन दिमाग़ों को समझने का ही काम नहीं करते, बल्कि उन्हें बनाते-बिगाड़ते हैं। रामविलास जी ने मुक्तिबोध के लिए लिखा कि वह 'स्किट्ज़ोफ़्रेनिक' थे। लेकिन यह अकेलापन है इन कवियों का, जो ख़ास तरह के 'परसेप्शन', विचारों और 'स्टैंड' के चलते होता है। 

मुक्तिबोध की दुनिया किसी के भी काव्य-संसार से बिलकुल भिन्न थी। यह कहते हुए भी दर्द होता है कि वह हमारे बीच के आदमी नहीं थे। जो बात वह कहना चाहते थे, उसमें 'परसेप्शन' ही 'डॉमिनेट' करता था। केवल विचार से तो 'सिंथेटिक' क़िस्म की कविता लिखी जाती है। 

विचार को आप कहीं से उधार ले सकते हैं, लेकिन बड़ी कविता 'परसेप्शन' से लिखी जाती है, जिसके लिए दुनिया में जाना होता है। दुनिया बड़ी है, वह सिर्फ़ कविता नहीं है, पर उसमें कविता है। 

47 साल की उम्र में मुक्तिबोध कभी चैन से नहीं बैठे। जिस भाषा में उन्होंने लिखा, उसमें हिंदी में कविता लिखी नहीं जाती थी। उन्हें तरह-तरह के शक होते थे, जैसे : खाने में ज़हर मिला है या घर से लगी बावड़ियों में कोई रहस्य है। जो चीज़ें जीवन में उनके पक्ष में या ख़िलाफ़ होतीं, वे और उनसे जुड़े लोग उनके मन में बहुत गहरे पैठ जाते थे। 

यह 'साइकोटिक' या 'स्किट्ज़ोफ़्रेनिक' होना नहीं है, बल्कि कविता को जो कवि असाधारण ऊँचाइयों पर ले जाते हैं, वे मृत्यु को जानते हैं। जो ज्ञानी होता है, वह मृत्यु को पहचानता है। सार्त्र, काम्यू और काफ़्का को मालूम था कि मृत्यु क्या है !

यह 'साइकोटिक' होने के बजाय बोध का घनत्व है, 'इंटेंसिटी ऑफ़ सफ़रिंग' {यातना की तीक्ष्णता} है--ये जिसमें होंगी, उसका व्यवहार भिन्न हो जायेगा, भाषा भिन्न हो जायेगी। यह शमशेर में भी है, जिन्होंने लिखा : 

'तरु गिरा जो
झुक गया था
गहन छायाएँ लिये'

कौन बतायेगा, उस पेड़ की छायाएँ किस गहनता में गयी थीं, जिसे आपने काट दिया ? इस तरह की कविता लिखनेवाले कौन हैं हिंदी में ? कोई नहीं है।

मुक्तिबोध एक ऐसा 'हॉरर' दिखाते थे, जिसका सारा कारोबार तलघर में चलता है। वह हमारे समय के तलघरों में चल रहे क्रांतिकारियों के 'एनकाउंटर्स' देखते थे--उनकी कविता में उसके चित्र आते हैं। एक ऐसी व्याकुल पुकार वहाँ है, जैसी हमें नेरुदा के यहाँ सुनने को मिलती है : 

'मुझे वे कालकोठरियाँ दिखाओ, जिनमें तुम्हें रखा गया
वे कोड़े, जिनसे तुम्हारी खाल उधेड़ी गयी
वह तख़्त, जिस पर तुम्हें फाँसी दी गयी
मैं आ रहा हूँ, तुम्हारे मृत मुख से बोलने।'

मुक्तिबोध के यहाँ आशा और निराशा के परे हमेशा एक संघर्ष है, जो आत्म-संघर्ष की भाषा में व्यक्त हो रहा है। 'टु बी ऑर नॉट टु बी' या जीवन और मृत्यु के द्वंद्व में जीवन कभी मृत्यु के सामने धराशायी नहीं हुआ, क्योंकि जब आप जानते हैं कि आपका रास्ता सही है, तो उस पर चलते हुए थकते नहीं हैं। मुक्तिबोध जब कहते हैं : 'एक पैर रखता हूँ कि सौ राहें फूटतीं'--तो उसका मतलब यही है कि निर्विकल्पता नहीं है। हम चल सकते हैं और रास्ता है चलने के लिए--सैकड़ों राहें हैं, जो सैकड़ों जगहों पर ले जायेंगी और सैकड़ों तरह के लोगों से मिलवायेंगी।"

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                                                               (4)

 आलोक धन्वा कहते हैं : 'प्यार ही कला को सबसे ज़्यादा महानता देनेवाली चीज़ है।'

और फिर इसके समर्थन में यह वाक़या सुनाते हैं : "मैक्सिम गोर्की जो थे, समाजवादी थे और बहुत संघर्ष किया उन्होंने। मालगाड़ी के डिब्बों में बैठकर घूमे--पूरे रूस के जीवन को अपनी आँखों से देखा। मालगाड़ी के गार्ड उनसे कहते थे--हमारे जानवरों को खाना खिलाओ, डिब्बे साफ़ करो, तो हम तुम्हें घूमने देंगे। उन्होंने बेकरी में भी काम किया--दो मन आटा गूँधते थे और उसे पकाते थे तंदूर में। 

टॉल्सटॉय उस तरह थे वहाँ, जैसे हमारे यहाँ तथागत बुद्ध थे। गोर्की से उनकी असहमति रही। पूरी दुनिया के लोग उनसे मिलने आते थे। गांधी से भी उनका पत्र-व्यवहार रहा। मगर अंत समय में उन्होंने सिर्फ़ एक आदमी, गोर्की को तार दिया और लिखा : 'जैसे-जैसे मैं मृत्यु के निकट जा रहा हूँ, वैसे-वैसे मुझे लगता है कि तुम प्यार में मुझसे बड़े हो और त्याग में भी बड़े हो। अपनी रोटी तुमने ख़ुद कमाई और ख़ुद पकाई भी।' "

टॉल्सटॉय मृत्यु को क़रीब जानकर अपना घर छोड़कर दूर एक छोटे-से रेलवे स्टेशन पर चले गये थे। वह एक अज्ञात जगह पर जीवन से विदा लेना चाहते थे, जहाँ उन्हें कोई न जानता हो। आलोक जी के अनुसार : "टॉल्सटॉय उसी ऊँचाई के लेखक हैं, जिस ऊँचाई के हमारे यहाँ निराला हैं....और मृत्यु की आशंका से उनके घर छोड़कर चले जाने से निराला के ही शब्द याद आते हैं : 

'मैं रहूँगा न गृह के भीतर
जीवन में रे मृत्यु के विवर।' "

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                                                                      (5)

आज आलोक धन्वा ने कहा : 'पटना में भी ओमिक्रोन फैल गया है मेरे चारों ओर, लेकिन मुझे अभी नहीं है।...हम मरेंगे, तो किसी और ही बीमारी से मरेंगे, जिसका बीमारियों की सूची में नाम नहीं होगा। बीमारी क्या, आंदोलन के दिनों में मैं तो गोलियों से बचा हूँ।'

फिर कुछ रुककर बोले : '...हम संताप से ही मरेंगे। भारत में सच का जो विनाश किया जा रहा है, बच्चों के भविष्य का, स्त्रियों की और ज्ञान की गरिमा का विनाश, इसके संताप से।'

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                                                                 (6)

आलोक धन्वा जब अपने बचपन में जाते हैं, तो उनका बयान इतना कोमल, संवेदनशील और सुंदर होता है कि गोया आप भी उस दौर को जीने लगते हैं : "आज ठंड काफ़ी है। धूप खिली है, पर उसका कोई असर नहीं होता है। बच्चे--कितनी भी ठंड हो, बदली छाई हो, माँ कितना भी रोके--ऐसा रास्ता तैयार कर लेते हैं कि माँ की हिदायतों के पार चले जाएँ। मैं भी ऐसा करता था, लेकिन मेरी माँ इतनी सहृदय थी कि डाँटती नहीं थी। वह इतना ही कहती : 'अरे, ठीक से कपड़े पहन लेते !' गुनगुने पानी से बदन पोंछती और मुँह धो देती। किसी को बोलती : 'इसके बाल सँवार दो !' वह मुझे काजल नहीं लगाती, कहती थी : 'लड़कियाँ काजल लगायेंगी, लड़का क्या काजल लगायेगा !' 

माँ मेरे बाल नहीं काटने देती थी। इसी वजह से लम्बे बाल रखने का मुझे शौक़ पड़ा। देवघर में मेरा मुंडन हुआ था। माँ ने कहा : 'यह हमारा सबसे दुलारा बच्चा है। ये सिर हिला देगा, तो इसको ख़ून आ जायेगा। इसलिए उस्तरा नहीं चलेगा। यह धर्म-वर्म अपने पास रखो ! थोड़े-से बाल काट लो, जहाँ चढ़ाना हो, चढ़ा दो !' वह मुझे बारह साल की उम्र तक एक बड़ी चारपाई पर अपने साथ सुलाती थी। बाबूजी नाराज़ होते : 'यह क्या बाल बढ़ाए रहता है ? यह बेकार हो जायेगा, पढ़ता कम है, तुम्हारे प्रेम में ज़्यादा घूमता है।' माँ जवाब देती : 'पढ़ता नहीं है, तो क्या हुआ ? किसी का नुक़सान तो नहीं कर रहा है।'

मुंगेर ज़िले में मेरे गाँव बेलबिहमा के चारों ओर नदियाँ थीं। आसपास के पहाड़ों की चट्टानें हलकी लाली लिये हुए थीं। बारिश होती, तो बालू के चलते नदियों में लाल पानी आ जाता। स्कूल के लिए नदी पार करके जाना पड़ता। माँ कहती : 'यह नदी में पैठकर स्कूल नहीं जायेगा।' बाबूजी बोलते : 'सब जाते हैं। क्या सिर्फ़ इसी के लिए बाढ़ आयेगी ?' माँ अपनी बात पर क़ायम रहती : 'ये यहीं पढ़ेगा। नहीं पढ़ेगा, तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा !' 

बाद में बाबूजी ने नदी पर छोटा पुल बनवा दिया, तो मैं स्कूल जाने लगा। पुल पर जब जाते, तो साथ में लड़कियाँ पढ़ने जातीं, जो मुझसे बड़ी थीं। बरसात में कीचड़ और काँटों से बचाने के लिए बड़ी लड़की मुझे गोद में उठा लेती। लड़के और लड़कियों का मेल असाधारण था, नैसर्गिक था। 'को-एड्यूकेशन' से हमने एक-दूसरे के सुख-दुख में हिस्सा लेना सीखा। मेरा जो बचपन था, उसमें किसी भी मामले में अवरोध या मनाही जैसी कोई चीज़ नहीं थी। हम कहीं भी खाने के लिए जाएँ, तो माँ बिलकुल चिंतित नहीं होती। हाईस्कूल में जब मैं आया, तो अपने मुस्लिम दोस्तों के गाँव चला जाता। बाबूजी के चलते मुझे प्रेम और सम्मान मिलता था। आज भी उन गाँवों में जाऊँ, तो लोग कहेंगे : बेनी बाबू का लड़का है।

मेरे बाबूजी का नाम बेनीमाधव सिंह था। वह 2003 में नहीं रहे। बहुत सुदर्शन थे, गोरे और लम्बे। उजली टोपी और खादी के कपड़े पहनते। उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया, कांग्रेस में थे। उन्हें स्वाधीनता संग्राम सेनानी की पेंशन मिलती थी। वह चुनाव कभी नहीं लड़े। हमारे गाँव के पन्द्रह साल निर्विरोध सरपंच रहे। मुखिया थे जमुना पासवान, जो हमारे घर में बहुत प्रतिष्ठित थे। जब मैं स्कूल से लौटकर बाबूजी के पैर छूने के लिए बढ़ता, तो वह कहते : पहले मुखिया जी के पैर छुओ ! मेरे माँ-बाबूजी, दोनों कोई जाति या छुआछूत नहीं मानते थे। हमारे प्रथम गुरु--जिन्होंने मुझे अक्षर-बोध कराया--आरती प्रसाद सिंह मेरे बाबूजी के मित्र थे। वह भी छुआछूत नहीं मानते थे। इस बात ने मुझमें बहुत रौशनी दी, मेरे मन को बहुत प्रकाशित किया।

उस ज़माने में अस्पताल नहीं था--ठेठ गाँव में मैं पैदा हुआ, मेरी माँ को देर से दूध आया। मेरी नाल जिसने काटी, वह मेहतर स्त्री थी। कुछ दिनों पहले उसके भी बच्चे का जन्म हुआ था। वह मेरी माँ की सहेली थी। उसने पूछा : 'हे मलकिनी ! ये बच्चा रो रहा है आपका। इसको दूध पिला दें ?'

माँ बोली : 'तू आपन दूध पिया द ! माई के भल कौनो जात होला का ?' {यानी : तुम अपना दूध पिला दो ! माँ की भला कोई जाति होती है ?}"



                          आलोक धन्वा, पंकज चतुर्वेदी संवाद करते हुए,साथ में युवा लेखक गीतेश


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