मंगलवार, 17 जनवरी 2017

समीर कुमार पाण्डेय की कविताऐं

बागी बलिया की क्रांतिधर्मा धरती के समीर स्वभाव से ठेठ गवईं व्यक्ति हैं ,उनकी निगाह गाँव से होकर शहर जाती है और दोनों के आन्तरिक द्वन्द को बखुबी जानती -पहचानती है। समकालीन कविता में समीर तेजी से उभरता युवा नाम हैं।आईए आज गाथांतर पर समीर की रचनाधर्मिता का स्वागत करें.....

1------

पुरबिया कामगार औरतें

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दिल्ली भागी औरतें 

उच्छृंखल पहाड़ी नदी होती हैं 

जो भूख और गरीबी के तटों से होकर

यहाँ पहुँच कर गुम हो गयी हैं

ईमारतों और भींड भरी सड़कों में  

जिनके विरुद्ध गढ़े जाते हैं 

श्लील-अश्लील मुहावरे 

तब महानगर का वक्त मुठ्ठियों में कश जाता है...

ये आजन्म जीती है अशिक्षित 

सड़क की जिंदगी संसद के पिछवाड़े में

वह रोज सुबह निकलती है 

मुसल्सल दौड़ती, भागती, रेंगती

पूरे दिन फिरकी सी घरों में घूमती है 

उनके लिए एक पल ही काफी होता है

उन मुखौटों की हकीकत उजागर करने में 

जिस वासनागत समाज ने कभी स्नेह नही दिया 

सहलाया नही प्रेम में उन गठे जिस्मों को....।

जनवरी की ठिठुरती शाम में 

मेट्रो का दरवाजा खुलते ही 

घुस जाती है वही औरतें 

विजेता की तरह कुचलती जाती है उजले चेहरों को

ध्वस्त होते देखती है अभिजात्य ओढ़े ओहदों को

ये औरतें आदतन क्रांतिधर्मी नही होती

ये तो उदास, धूसर गली-मोहल्लों से निकल

जैसे-तैसे चली आयी हैं इस महानगर में

जहाँ आदमी कम मशीनें ज्यादे होने से 

वह भी मारना सीख गयी हैं भावनाओं को 

इस प्रदूषित हवा में 

लेती हैं साँस ईर्ष्या,अपमान की गर्म हवाओं में 

उनके फैसले से 

बंद हो जाते हैं घर के सभी दरवाजे 

केंचुल बदलते गाँव में 

उसके लिए ऐसे घृणा पसर जाती है

जैसे मेट्रो के नीचे यमुना मैली-कुचैली उदास सी...।

वे डरती नही 

चुपचाप अपनों में बतियाते

भीड़ को चीरती घुसती है मेट्रो के भीतर 

लम्बी गहन उदासी को 

झटके में उड़ा 

खिलखिलाती हैं जोर से

उनकी आँखों में तैरती है सोन मछलियाँ 

उनके शरीर में केवल

मरे पसीने की गंध नही

हाथों में मोबाईल 

और होठों पर लाल लिप्सटिक भी पुती होती है 

मॉल और मल्टीप्लेक्स की दुनिया के बीच 

वे औरतें गद्गद भावुकता 

प्रवंचित बौद्धिकता के बीच खड़े लोगों को छू कर 

बिना प्रेम किये निकल जाती है

इन औरतों का हँसना नही सुहाता दिल्ली को

कुछ छिल सी जाती है चकमक हाँफती दिल्ली

भीड़ के चेहरे की चमक झरकर

चिपक सी जाती है एक अनजान चुप्पी

पर इन्हीं पुरबिया कामगार औरतों से ही 

यह आधी-अधूरी दिल्ली पूरी दिल्ली हो पाती है....।

(2).

मजाक

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गाँव का मजाक 

क्यों नही बना सकते शहर

जब शहर मजाक करते हैं 

तो पता नही चलता वे मजाक कर रहे हैं

जब गाँव मजाक करते हैं 

तो तमाम अँधेरे के बावजूद

गेहूं, उडद और अजवायन उजाले में उगते हैं

वे दुनिया के आदिम कारीगर हैं

जिनके सिरहाने है हँसिया, हल और कुदाल

जिन विजेताओं के इतिहास में 

वास्तविकता कम मजाक ज्यादे होते है

गाँव ऐसे शहरी मजाक को नही समझ पाते

वे विहँसते हैं 

गाँव की भाषा और पहनावे पर

झुग्गी-झोपड़ियों और पगडंडियों पर

यह दुनिया जिन मिट्टी सने हाथों 

बना एक खिलौना है 

जमीन से उछला आकाश है 

इनकी मिट्टी से निकला पत्थरों का जंगल है

उनसे ऐसा रिश्ता 

कोई उचित रास्ता नही होता मजाक का....।

(3).

जमीन से उगे लोग

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मैंने देखा है 

मिट्टी में गड़े पैरों की दरारें

कुहरे संग अडिग खेतों में खड़ी परछाइयाँ

कर्ज में दबे हृदय के चेहरे पर मुस्कान

कच्ची दीवार से भुर-भुराती पक्की संवेदनाएं

चूल्हे की आंच के आसरे सोये जांत 

आभाव में भाव धारण किये झुके कंधे

छान्ही के तले पुआल पर पड़ा सिकुड़ा जीवन...।

मैंने देखा है 

झोपड़ियाँ उजड़ते 

चूसे खून के गारे से बनी 

राख के ढेर पर बनी भव्य इमारतें 

चिमनियों के धुँए में मरते खेत और पेड़

हरे पेड़ों के बेहतरीन ताबूत पर अगराये शहर

खेतों की हरियाली को कंकरीट में बदलना      

धरती को बचाने के लिए नही

नायकत्व धारण कर इसे नष्ट करने को आतुर लोग...।

मैंने देखा है 

सत्ता के बदलते रूप के बीच

लोकतंत्र के चूहों द्वारा अन्न की बोरियाँ कुतरते  

धरती की कोख से पैदा भाग्य विधाताओं के 

पंजे में दबे भूखे, कुपोषित और बेघर जन

सत्य से अनजान पालतू सुग्गों की उम्मीद 

कि मंच और मंच से बाहर का नाटक सही चल रहा 

साज़िश में लिप्त महलों को पता नही

कि नही उखड़ते लाख कोशिशों के बावजूद 

नदी-नाले, खेत-बघार और जमीन से उगे लोग...।

(4).

हस्तक्षेप जरुरी है

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एक टटका फूल रोज खिलता है

ओस से भीगा निर्दोष लाल फूल

रोज सुबह उम्मीद की पेट से 

सुनहली गुनगुनी धूप निकल आती है 

बच्चों के मुँह में दाना डालकर 

रोज चिड़िया पंख खुजा रही होती है 

रोज खुली धूप में आलोचक 

खरगोश की आँखों के चटक रंगों को नकार

बकरियों को घास चरते देख खूब खुश होता है....।

सब कुछ ठीक है

तो यह क्या है जो मन में गड़ता है

क्या है जो रोज कील सा चुभता है 

यहाँ सब कुछ ठीक करने का शोर बहुत है

पर वह सच्चाई से कतराकर गुजर जाता है

दुःख के दुःख की पीठ में कील ठोकने वाले 

लोगों में श्रेष्ठ लोगों मुझे माफ़ करना 

इस महादेश में 

सत्ता के सामने नतमस्तक

तुम्हारा डरा मन रोज बजाता है आयातित बाजा

चट्टी-चौराहों, शराबखानों और सम्मेलनों में...।

हस्तक्षेप जरूरी है

मेरे मन में है भूख और हाथ में कलम 

धार का मुकाबला कलम की नोक से है

मेरे कविता के सहमे पैर 

उस वंचित कुनबे की ओर अनायास बढ़ जाते हैं

जहाँ ऐसे ख़ुशामद मौसम में भी 

पेड़ पर टंगे हैं कर्ज में डूबे लोग

जिनकी मुठभेड़ हर वक्त होती है ताकत से

जहाँ तन के खड़े होने मात्र से बढ़ जाती है

अकड़, अश्लीलता, मठों और तंत्र की मार....।

(5).

गाँव नही मरते

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घोषणा हो चुकी है

कि अब कोई गरीब नही रहा 

विकास के बड़े-बड़े दावे के बीच

कुछ कहना-सुनना ठीक नही समझा जाता...

जब फटी छाती वाली धरती चीखती है

तब मुहावरेदार अर्थ निकलते हैं

कि झोपड़-पट्टियाँ खतरनाक हो चली हैं

और कुछ बंद रास्ते 

वक्त आने पर ही स्वयं ही खुल सकते हैं...। 

इस शोर में

आओ तलाशते हैं

कुहरे से घिरे इलाके में राह

जहाँ कुहरा जल रहा है आग की तरह...

वहाँ तंत्र की गरमी से 

नही जल जाते हैं अपने गाँव

पर सत्ता के इंद्रजाल से भींग जाते हैं 

तब जरूर जब मुखौटेधारी 

सत्ता का खून पसीना बन जाता है 

और वही पानी चुल्लू भर पानी में डूब मरता है....।

यह निर्विवाद है

कि रास्ते हर जगह होते हैं 

दीवार के भीतर कठोरता में

नदी के बहाव के बीच में 

खेतों की कट चुकी डँड़ारों पर

अँधेरी रातों और अनिश्चय के जखाड़ में...

रास्ते कभी नष्ट नही होते 

वे अपनी जीवन्त भूमिका में 

खो जरूर जाते हैं 

मगर जमीन पर आश्रित गाँव मरते नही है....।

      समीर कुमार पाण्डेय

        बलिया


रविवार, 15 जनवरी 2017

हेमन्त सिंह राणा की कविताऐं


जब तक कविता है ,जीवन में सहजता ,तरलता और उम्मीद बची रहेगी। कविता गहन निराशा में कुछ बूंद आशा है ,ऐसे ही आशा और निराशा के बीच उलझते/सुलझते कवि हैं हेमन्त सिंह राणा। स्वभाव से संकोची राणा का सम्बन्ध आज़मगढ़ से भी उतना ही है जितना बनारस से। हिन्दी ,उर्दू,बांग्ला ,मैथिली भाषाओं का ज्ञान और विभिन्न प्रांतों की यायवरी ने अनुभव का दायरा बढ़ाया तो कविता की पृष्ठभूमि पर संवेदना के सहज बिम्ब कविता में फूट पड़े। हेमन्त सिंह राणा की कविताओं में जीवन के सहज बिम्ब ऐसे आते हैं जैसे सबकुछ सामने घट रहा हो। आईए आज पढ़ते हैं गाथांतर ब्लाग पर राणा की कविताऐं......






1----

वह लिखता रहा......

उसने पानी लिखा
मैं भींग गई
उसने प्यास लिखा
मेरा हलक सूख गया 
उसने आग लिखा
फफोले मुझ पर उगे
और भी लिखा उसने
बहुत कुछ
वह लिखता गया
मैं यथार्थ जीती गई....

एक दिन उसने प्रेम लिखा
मैं चहक उठी
उसने विरह लिखा
मैं तड़पी
और अन्तत:
उसने विदा लिखा
मैं पत्थर हो गयी.....

_____________

2...
तुम्हारी जीत...

मेरी घुटी चीखो पर
तुम्हारा चीखता अहल्लाद
मेरे निचले होठों  को कचोटते 
तुम्हारे ऊपरी दांत 
भिंची मुठिओ में
कैद मेरा स्त्रीत्व
तुम्हे तृप्त करती रहा.
सोचती रही
तुम्हारा दंभी पुरुषार्थ
कितना सुखद है न ?
कितना सुखद लगा होगा तुम्हे 
जब 
तुम अपने साँसो की मदमयी गन्ध
जबरन मेरे नथुनो में उड़ेल गये होगे 
वो क्षण 
कितना सुखद होगा तुम्हारे लिए
जब मैं एक रक्त रंजित वसुंधरा सी
अपने ही लहू में सनी 
वही पड़ी हूँ 
और तुम 
एक थके विजेता की तरह
अपने मष्तिष्क पर
विजय का स्वनिर्मित ताज पहने 
चले जा रहे हो..

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3.

कल्पनाऐं  बेहद उन्मादी होती हैं....

कल्पनायें बेहद उन्मादी होती है
उन्मुक्त और स्वच्छन्द
जरा सी शह पर
तोड़ देती है सारे तटबन्ध
किसी पहाड़ी नदीं की तरह
अपने उन्माद में बहा ले जाती है
यथार्थ के क्रूर और बीभत्स मलबे
मैं खुद ही इस नदी को बुनता हूँ
किसी जाल की तरह
खुद उसमें कूद पड़ता हूँ
और डूबने तैरने का अभिनय करता हूँ 
जब जीवन में सबकुछ जड़ हो जाये
बहना भाता है मुझे 
इस नदी में 
मैं तुम्हे उस अत्यंत खूबसूरत स्त्री की तरह पाता हूँ
जो मेरी प्रेमिका है 
जो नित्य इस नदी में घण्टो नहाती है
मैं तट पर बैठा मौन
रोज उसे घण्टो देखता हूँ 
मगर
जिसके सामीप्य का सुख 
मुझे नही 

________________

4.

और अब मैं मौन रहना चाहता हूँ.....

तुम्हारा कुछ सामान पड़ा है
बेतरतीब सा फैला पसरा
मेरे छोटे से कमरे में
आ के इन्हें
तुम क्यूँ ले नहीं जाते ?
कुछ खाने की मेज से चिपकी
कुछ दीवारो पर औंधी लटकी
कुछ बिस्तर, कुछ फर्श पे बिखरी
इक मुद्दत इक उम्र से ठहरी 
कमरे से किचन तक
इनकी जैसे
एक गर्त जमी है 
साफ करू तो 
और फ़ैल जाती है
इनमें चिकनाई सी नमी है 
जैसे चिकनी चुपड़ी बातें
आ के इन्हें
तुम क्यूँ ले नहीं जाते?
अब क्या रक्खा है इन बातो में 
खत में 
फूल में 
सौगातों में 
सायं -सायं बजते रहते हैं
उम्र से लम्बी इन रातो में 
ये वज़ा हैं
पर क्यूँ है ?
इसकी कोई वजह नहीं है
कसक है इनमे
तड़प है इनमे 
चीजे तुम बिन सहज नहीं है 
कभी आ जाओ तुम आते -आते 
आके इन्हें
ले जाओ
कि ये सब मेरे जीने के सामान हैं
और मैं अब मौन रहना चाहता हूँ......

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5.

लौटना कितना सुखद है

लौटना बसन्त का 
लौटना मधुमास का
लौटना उम्मीद का
लौटना उल्लास का
लौटना कितना सुखद है
थका दिन फिर तृप्त रात का
तपती जेठ फिर बरसात का
किसी विरहन के मीत का 
भूले अनायास किसी गीत का
लौटना कितना सुखद है
मगर सब कुछ कहाँ लौटता है
मिट गए पदचिन्ह जो
धूल गए कुछ बिम्ब जो
जो काल साथ ले गया
बस खाली हाथ दे गया 
मगर सब कुछ कहाँ लौटता है
जो गुजर गया सो गुजर गया
कहाँ गया किधर गया 
वक़्त था चला गया
बुरा गया भला गया 
लौटना कितना सुखद है
मगर सबकुछ कहाँ लौटता है

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6.

यहाँ देवता भी अमरत्व लेकर नहीं आते....

एक दिन
माएँ पुत्रो का मोह त्याग देती है
सिरो पर हाथ फेरना छोड़ देती है
पिता अंगुलियां थमाना भूल जाते है
भाई , भाई के हिस्से की रोटियां छीनने की कला सीख लेता है
पत्नियां छल के भाव समझने लगती है
पति दमन का अर्थ समझ लेता है 
सम्बन्धो के मायने
जीवन के निमित्त अर्थ
बदल जाते है
तुम कहती हो
तुम्हारा प्रेम अमर है
मैं बरबस मुस्कुरा पड़ती हूँ 
यह धरा है प्रिये
यहाँ देवता भी अमरत्व लेकर नहीं आते 

__________

हेमन्त सिंह राणा

Rana

41 years 

M.com , st.vinova bhave University , Hazaribagh , Jharkhand

From,.... varanasi 

रेखा चित्र
अनुप्रिया

शनिवार, 14 जनवरी 2017

सोनी पाण्डेय की कहानी

                                                     बदचलन कौन




नीम के चौतरे पर बैठी मिडवाईफ चम्पा मौसी बारी -बारी से बच्चोंं के हाथ पर चेचक के प्रतिरोधक टीके लगाये जा रही थींं। औरतेंं समवेत स्वर मेँ देवी गीत गा रही थींं- 

"  निमिया की डरिया मईsया डाले ली झुलनsवा हो कि झूली-झूली नाss"

 मतहारी नीम की पत्तियोंं से टीके लगने के उपरान्त झाड़ती और पाँच रुपये का चढावा लेकर कटोरे मेंं डाल कर कुछ बुदबुदाती। वातावरण भक्तिमय हो उठा था। औरतेंं  कतार मेंं अपने नन्हेंं -मुन्नोंं को ले कर खड़ी अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही थींं। दिवाकर पाण्डे अपने दुवार पर बैठे इस दृश्य को देख कर कुढ़ रहे थे। क्रोध से काँपते हुए बोले - "इस छिनाल के हाथोंं से देवी न दवा लेगी न दुवा ,देखना !कह देता हूँ नन्हेंं यादव, सब मारे जाएँगे देवी के कोप से। "

नन्हेंं यादव अपनी लाठी का टेक ले चिंंतित होते हुए बोले - "का करींं ऐ बाबा , आप कह तो सहीये रहे हैंं , कौनोंं चारा भी तो नहींं, इहाँ तीन-चार कोस मेंं कोई दूसरी मिडवाईफ नहींं है, जाऐंं तो कहाँ जाऐंं। शहर से बडका बेटा चिट्ठी पठाये है, बडी बेदर्दी से लिखा है कि जो लडकोंं को टीका न लगवाया तो शहर उठ ले जाऐंंगे। आपे कहे, इस बुढवती मेंं नात -नतगुर बिन कैसे रहेंंगे? घर काटने लगेगा, मलकिनिया नहींं रही। सब उजर जाऐगा।"

 नन्हेँ यादव कोंंछी से सूरती निकाल कर ठोंंकने लगे। दिवाकर पांडे ने चुटकी भर खैनी होठोंं के नीचे दबाते हुए कहा-

 " हूँहsss नन्हेंं! इस छिनार ने गाँव भर की औरतोंं को बिगाड़ने का बीड़ां उठाया है, हमारी तीसरी आँख देख रही है। अब तो अहिराने मेंं भी लाली-इसनोंं खूब बिका रहा है, मियाईन की दौरी खलिया जाती है।सब साले डूबेगें, फिर न कहना, चेताया न था। "

दिवाकर पांडे चम्पा मौसी के वज्र दुश्मन थे, लेकिन चम्पा मौसी भी कम न थी। वो डाल - डाल, ये पात - पात। चम्पा की दवाईयोंं के आगे उनकी ओझयिती की दुकान बिलबिलाने लगी थी। अतः इस ताक मेँ रहते कि कैसे इसे गाँव से खदेड़ भगाऊँ। लेकिन ये काम इतना आसान नहींं था। दिन बीतते रहेंं, दिवाकर पांडे कहानियाँ गढ - गढ के लोगोंं को सुनाते रहे । जबकि सच यह था कि चम्पा मौसी को पति ने छोड़ के दूसरा ब्याह कर लिया और मार -पीट कर घर से निकाल दिया ,दोनों बेटियोंं को ले वह जान बचाकर मायके पहुँची। भाईयोंं ने ठेक न लेने दिया। बेटियोंं वाली जवान औरत कहाँ जाएँ ? आठवींं पास चम्पा को सहेली का आसरा मिला। सहेली का पति स्वास्थ्य विभाग मेंं था। तीन -पाँच करके किसी तरह मिडवाईफ की नौकरी मिली। जिन्दगी की गाड़ी चल निकली, पैसा हो तो जीवन सम्भव है, चम्पा को समझ आने लगा। चम्पा की पहली समस्या दूर हुई तो दूसरी पहाड़ की तरह आ कर खडी हो गयी। सुन्दर अकेली औरत के लिए स्वास्थ विभाग की नौकरी किसी नर्क से कम न थीँ , कभी किसी डॉक्टर के साथ नाम जुड़ता कभी कम्पांउडर से । बेटियोंं का मुँह देख दुनिया के ताने सहते, रोते - धोते चम्पा मौसी जीवन समर मेँ आगे बढ रही थींं। चारोंं गाँव की औरतोंं की दीदी चम्पा देखते - देखते सबके बच्चोंं की मौसी बन गयींं। इस तरह वह जगत मौसी और सबकी साली बनती गयीं।सबसे हँसने - बोलने, रिगाने - चिढाने के कारण चम्पा मौसी चट्टी - चौपाल तक चर्चित रहने वाली छिछोरी औरत कही जातींं। 

                                                इसी बीच एक घटना घटी। किसी ने चम्पा मौसी के घर मेँ घुस कर चोरी की। बच्चियोंं और उनसे मार -पीट भी की। बेचारी की मेहनत की सारी कमाई लूट गयी। अकेली औरत, इसमेंं भी लोगोंं को खोट नजर आने लगा । दस यार पाल रखा है ससुरी ने। कौनोंं ने बजा दिया, आदि- आदि कहते फिरते दिवाकर पांडे। दिवाकर पांडे हाथ धो कर चम्पा मौसी के पीछे पड़ गये। दाव भुनाने मेंं कोई कोर कसर नहींं छोडना चाहते थे । अफवाह उड़ा दिया, नौकरी दिलाने वाला राय फसाऐ बैठा है। काना - फूसी का दौर शुरु हुआ । खबर चम्पा मौसी की सहेली तक पहुँची। कोहराम मच गया, दोनोंं सहेलियोंं मेंं झोंंटा - झोंंटी सब हुआ, राय बेचारे बिना कुछ किए बदनाम हो गये। दिवाकर पांडे विजयी। किन्तु जो आगे हुआ वह अप्रत्याशित था। किसी ने सपने मेंं भी कल्पना नहीँ की होगी। एक शाम अचानक राय चम्पा मौसी के घर आये और जो आये तो यहींं के हो कर रह गये। दिवाकर पांडे ने पंचायत बुलाया। गाँव क्षेत्र से दोनोंं की बेदखली की घोषणा हुई। चम्पा मौसी तमतमाती हुई महापंचायत के बीच बैठे दिवाकर पांडे के पास पहुँची। कालर पकड़ कर जोर का तमाचा गाल पार जड़ते हुऐ पूरे पंचायत को ललकारते हुए कहा - "अरे पंचो ! हूँ मैँ छिनाल। रक्खे हूँ राय को। राय मर्द है मर्द। इस पांडे की तरह मेहरिया नहीँ। जो किया डंके की चोट पर किया। नाम जुडते हाथ थाम लिया । "

पंच प्रमुख के निकट पहुँच कर चुटकी बजाते हुऐ कहा - "हे मुन्शी जी सूप हँसे तो हँसे चालन कैसे हँस जी। कहो तो बताऊँ तुम्हारे कुल की कथा सबको ,कब किसने ,कितने पेट कछाऐ - पोछाय। "

मुन्शी जी मुँह छिपाऐ चलते बने। बाकी चार पंचोंं की ओर पलटते ही चम्पा मौसी रौद्र रुप धारण कर चुकी थी। गाँव बहरियाओगे विजयी सिंंह। तनी ये तो बताते जाओ गाँव सभा को कि तू क्या करने रोज खड़हरे जाता है?

 तब तक पूरी पंचायत मौन तमाशा देख रही थी। बचे तीन पंच नजर चुरा कर भाग निकले । सभी स्तब्ध थे। मुन्ना यादव लाठी का टेक ले खड़े हुए ,मुस्कुराते हुए कहा - "चलो भाई लोग, देख लिया न सबने कि आखिर बदचलन कौन ,कहाँ ,कैसे है, और छिनाल कौन है?यहाँ साले सब बदचलन और सब छिनाल हैंं।

 सम्पर्क- 

सोनी पाण्डेय

 कृष्णा नगर, सिधारी 

आजमगढ।

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

अभिशप्त स्त्रियों की मुक्तिगाथा


इन दिनों कुछ ज्यादा ही मेरे घर का सांकल खटखटाने लगीं हैं वे औरतें,..विचित्र स्थिति है,सुनाई केवल मुझे ही देता है। वे आती हैं और विक्रम के बैताल की तरह कन्धे पर झूल जातीं हैं जबरन ,लगती हैं सुनाने अपनी कथा और अन्त में कहती हैं ....न्याय करो!, नहीं तो हमें मुक्ति नहीं मिलेगी। अजब -गजब हालत है,...कोर्ट जाऊं की कचहरी मियाँ,या लगवाऊं थानेदार से हथकडियाँ पिया ,...वाला नुस्खा भी नहीं चल सकता । सब मर - मरा गये हैं मेरे सिवा ज़ालिम ज़माने में। एक है बड़की दी,...खुदा ऐसी दोज़ख सी जिन्दगी किसी दुश्मन की भी बेटी को न मिले,दूसरी झुलनिया वाली भउजी,....बेचारी महेसर के मोह में कलक्ते से मऊ चली आई और ऐसी बिलाई की बिलाने जैसी ,वह भी मुँह बाए रोज खड़ी हो जाती है सिराहने। एक ठो पन्नडब्बे में मिसरी रख चबाने वाली मिसराइन चाची हैं जो मिसिर चाचा को बता के रहेंगीं कि हर जुल्म का अन्त हो कर रहेगा ।एक साधना सिंह हैं जिनका इन्कलाब शेष है।अम्मा भी है,बड़की माई और गोड़उल वाली आजी भी हैं,.... मैं भागती हूँ सरपट,रास्ता बदलती हूँ और ठहरते सब सामने हांफती खड़ी मिलती हैं और कन्धे पर लद जाती हैं ,जैसे विक्रम का बैताल।इनकी मुक्ति बस इसमें है कि कथा लिखूँ इनकी ...सब पढ़े और दो आँसू बहाए इनके नाम पर कि किसी ने इनकी मौत पर मातम नहीं मनाया था।
                   दिन बीत रहे हैं ,मौसम उमंगों के  ढ़लान की ओर हैं। अक्सर लगता है पेट के दाहिनी ओर जो गेंद अॉटो में चढ़ते समय फेफड़े में अड़स जाता है ,एक धमाके में फटेगा और मौत गले लगा लेगी ।कभी लगता है गर्भाशय का फुलता पचकता गुब्बारा किसी दिन इलहाबादी अमरुद की तरह ट्यूमर मे बदल जाएगा और एक झटके में पूर्ण विराम ,या जननांगों के नीचे करौंदे के बतिये सा लटकता लाल मांस पिंड कछुए सा बढ़ कर पंजो में जकड़ लेगा। कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह है कि मेरे पास समय कम है और इन औरतों की मुक्ति कथा शेष...इस लिए आज फैसला ले ही लिया कि दर्ज करो कही भी इन्हें ,वरना मौत आ गई तो इनकी मुक्ति रह जाएगी और ये मुझे कई जन्मों तक जकड़े रहेंगी।......

कथा ....1

जियते पियवा बात न पूछे,मुवले पिपरे पानी...

ये स्मृतियों के किवाड़ खोलने की ऋतु है, एक सुनहरी चादर ताने दिन जब चढ़ता है पीले सरसों के गन्ध में नहाई हवा हौले से माँ के कुछ मधुर गीत रस आत्म में घोल कहती है कि "...आओ स्वागत करें बसन्त का कि पतझड़ लौट गया है नंगे पाँव। मैं अँचरा भर बथुआ,चना खोंट कर लाल फीता बाँधे खेतों की मेंढ़ पर गाँव की अल्हढ़ लड़कियों संग गाती फुदकती घर लौटना चाहती हूँ कि ....मोरी कुसुमी रे चुनरिया इतर गमके।" ये मेरी देहरी से प्रेम की पराकाष्ठा है कि कुछ और सोचे बगैर फिर- फिर लौटती हूँ कोयल के कूंकते उस देस, जहाँ सोलहवां साल आम की फुनगी पर सतरंगी पतंग सा टंगा है।
                     बेटियाँ ब्याह दी जाती हैं उस देश ,जहाँ खून का कोई सम्बन्ध दूर दूर तक दिखाई नहीं देता। मैं भी उम्र के बाईसवें पड़ाव पर उखाड़ दी गयी जड़ समेत ,पर हाय कि उठती है हूक और जड़ें स्मृतियों के पोषण में पोषित हो तंय कर लेती हैं लम्बी यात्रा और सुदूर उस चौखट पर जाकर वन बेला सी फूट पड़ती हैं। मह -मह महकती बेटियों की सोंधी खुशबू आँचल के कोर में बाँधे अम्मा निहार आती है रोज उस ओर दुवार पर ,जिधर से बेटियाँ विदा हुई थीं। पर पिता......?......एक विराट सन्नाटे को चीरता उनका अथाह धैर्य,उफ्फ! कैसे सहते रहे होंगे बाबूजी चार बेटियों के विवाह के लिए दर -दर अपमान की पीड़ा?...एक अपराजेय योद्धा कैसे जीवन के उस आत्मिक अपमान और उपेक्षा के दंश पर मौन धरे देस देस यात्रा कर लौटता रहा होगा घर के उस ऊँचे फाटक से घर में,जहाँ उनके सम्मान की कई गाथाऐं तमगे की तरह टंगी ईठलाती थीं?  सोचती हूँ....सोचते -सोचते रात घिरने लगती है।बिस्तर पर करवट फेर कर सोती हूँ उससे,जो शायद आज करवट फेरने से खासा नाराज है।तकिया भींगने लगता है और खुलती है पहली खिड़की.....सामने बड़ी बहन को लोग चारपाई पर लाद कर फातिमा अस्पताल ले जा रहे हैं,मुझसे बारह साल बड़ी बहन,ये चित्र बहुत धुधला है....रह रह कर गायब हो जाता है। अम्मा रो रही है....मियादी बुखार उतरता ही नहीं। लोगों का मेला चला जा रहा है।चित्र उतर रहा है आँखों के सामने से ,जैसे उतर जाता है चौराहे पर लगा विशाल पोस्टर। वह लौट आई थी, बस इतना याद है।बाबूजी जेब में रुपया भरके ले जाते थे...अम्मा बक्से में धरे कपड़ों का तह तह खंघालती और रुपये बटोरती थी।घर पर बड़की बुआ गोद में कुछ माह के इकलौते भाई को लिए बैठी रहती और मनातीं कि सब कुशल हो।
बड़ी दी के ब्याह का चित्र भी कुछ साफ नहीं,इतना याद है छोटी का हाथ थामें हम मोंछू अचारजी के स्कूल जाते थे।गोल - मटोल प्यारी दुलारी छोटी साथ रहती,साये की तरह।बारत वाला दिन कुछ -कुछ याद है,रेलिंग पर सजी -धजी औरतें खड़ी कोरस में गा रही थीं,शायद अम्मा गा रही थी ....आपन खोरिया बहोरा हो तिवारी जी,आई गइलें दुलरु दमादsss....
ये गीत अम्मा चारों बेटियों के द्वारपूजे पर गाती रही...अड़ोसियों- पड़ोसियो,रिश्तेदारों की बेटियों के ब्याह तक में।सुनते - सुनते कण्ठस्थ हो गया ,जैसे पिता से मानस की तमाम चौपाइयाँ कण्ठस्थ हुईं।

क्रमश:...

संजय कुमार अविनाश की दो कविताऐं

1-----

पगली

पगली, मैँ कैसी पगली
गोबर उठाती हूँ
सड़े-गले खाती हूँ
बिन पगार काम करती हूँ

कपड़े के बिना
अपनत्व का अभाव
अधनंगे तन की
नुमाईश करती हूँ
पगली, कैसी पगली ?

आँखेँ फार-फार कर
देखा करते हो
हँसी ठिठोली मेँ
मानव कहलाते हो
मेरा तन तुम्हेँ हँसाया
बच्चोँ को भी ललचाया
ततक्षण मौका पाकर
हमबिस्तर भी बनाया
पगली, कैसी पगली ?

अपने को श्रमसाध्य मानी
सेवा की भावना मेँ भागी
अंधेरी रात
प्रकाशमान दिवा
धूप-बरसात
मान ली निष्प्राण
लगी रही औरोँ की काम
पगली, कैसी पगली ?

दवा के बिना
अन्न के बिना
अपनोँ के बिना
स्वतंत्रता की चाह मेँ
स्वाधीनता के अभाव मेँ
कहलाती हूँ
पगली, पगली, पगली !

तन से
मन से
कपड़ोँ से
सगा-संबंध से
अपनत्व से
इसलिए कि मैँ तुम्हेँ न मानी !

प्रकृत को मानी
कर्त्तव्य को समझी
अधिकार पहचानी
सड़क-चौराहे
गली-मुहल्ले
रात अंधेरी
चलती रही
भागती रही
आखिर कर
पगली कहलाई !

सोच ! समझ !
पुरुषार्थ को
नारीत्व को
भावना को
निर्मात्री को
जननी को !

हर तन मेँ ,
मन मेँ ,
कण-कण मेँ ,
मैँ ही हूँ
पगली , पगली ,
हाँ पगली !!

संजय कुमार अविनाश

2-----टूटी चप्पल

कचड़ा बीनती, नन्हेँ हाथ
गली-मुहल्ले , कब्र-श्मशान
पीठ पर लदे गंदे , बदवूदार
निःसहाय गरीबी की पहचान
टूटी चप्पल, फटी ब्लॉऊज, चिथड़े मन
अस्मत का कवच !

दिन, माह, वर्ष यूँ ही बीता
बदवू से स्नेह
मायावी से द्वेष
पश्चिमी झुकाव
सबसे अलगाव
टूटी चप्पल !

अचानक चमचमाती गाड़ी
नजरोँ मेँ चमचमाई
कालू के पापा
डगमग-डगमग
चप्पल छोड़
आहिस्ता-आहिस्ता
पास खड़े
बड़बड़ाया-
साहव ! साहव !
स----ब ---स--ब
हाँ -- स-ब
गाड़ी , बंगला , रुपया !

मैँ भी भरमाई
कहाँ ? क्योँ ?
आखिर कहाँ ?
बताओ क्योँ ?

मैँ पास खड़ी , खड़ी रही !
नाक, भौँहे दबाये
चमचमाती गाड़ी
ओझल हो चली ,
टूटी चप्पल , फटी ब्लॉऊज
निहारती रही ---
देखी , समझी ,
संभाली !

चमचमाती ब्लॉऊज
रंगीन चप्पल
छीटदार साड़ी
एक दिन आँखेँ खुली
अस्पताल मेँ !
लड़खराती आवाज,
बेहोशी ,
खून से लथपथ
आस-पास
कई टूटी चप्पल
फटी ब्लॉऊज
बदवूदार भीड़
निहार-निहार
कोसे जा रहा
सजा मिली
कचड़े बीनने की
रंगीन चप्पल की
चमचमाती ब्लॉऊज की
बदवू से नाता तोड़ने की
चारोँ तरफ
रेप , ब्लात्कार
कचड़े के साथ
कचड़े का साथ !!

संजय कुमार अविनाश
9570544102

बुधवार, 9 नवंबर 2016

सोनी पाण्डेय की कहानी

कहानी


सुरमा भोपाली...
                                  सोनी पाण्डेय






.. चुनमुनिया धीरे-धीरे खोद कर छोटी बहन को जगा रही थी......रे मुनिया ! .....हूं......सोने दे कह मुनिया ने करवट फेर ली । चुनमुनिया ... बुचिया ssssमोर बुचिया....सुन न ।मुनिया बाँह टेरते हुए गुस्से में उठ बैठी ,तू पगला गयी है, जीजा को देखने के लिए । हट नहीं तो ,हम जा रहे हैं माई के लग्गे सोने ....।मुनिया बाहर मड़ ई में पहुँची ,माँ खाट से गायब । सोचने लगी अक्सर माई रात को कहाँ गायब हो जाती है ? बगल की खटिया पर बूढ़ी आजी की नाक धूम- धढ़ाम बम फोड़ रही थी, जिसके खौफ से वह यहाँ नहीं सोती थी । जाकर एक दम से आजी को झकझोर कर जगा दिया ......ए आजी ! .....आजी रे sssss बुढ़िया अकबका कर उठ बैठी ......अरे मोर लठिया कहाँ बा ? कमर पर हाथ धरे मुनिया सामने तनी खड़ी नाक फूला -पचका रही थी । अरे मुअनी ....तोके डाहे के मोही मिलेलीं रात- बिरात। अपनी महतारी के काहें न झिकोरे ली । बूढ़ी के क्रोध की सीमा न थी । यही तो हम भी पूछ रहे हैं कि माई है कहाँ ?मुनिया गुस्से में बोली । आजी -----अपने भतार के यहाँ। कह करवट फेर सो गयी । सोई की आँख मूनते रेल गाड़ी की तरह नाक की छूक छूक धांय ,छूक छूक धांय शुरु । मुनिया माँ की खटिया पर जा कर लेट गयी ।उम्र कोई दस साल ।सोचने लगी .....दिदिया का भतार जीजा ,वह उससे मेले में मिलने को मरी जा रही है ।माई के भतार बाऊ .....वह रात को अक्सर गायब रहती उसके साथ ।करवट बदल कर चद्दर तान लिया ,बरखा के दिन  ,रात सिहरने लगी थी । भतार पुराण है क्या बला ,सोचती रही ।सोचते -सोचते नींद में तितलियाँ नाचनें लगीं ....लाल, नीली, पीली ,हरी, बैंगनी ....फर -फर फर्र ...पंख फैलाए उड़ती जातीं ...उड़तीं जातीं दूर देस ।एक सिवान में रंग- बिरंगे फूल ,तितलियाँ फूलों पर नाचने लगीं ।इतने में एक परी आ ग ई ....थोड़ी देर में कुमार भी । दोनों एक दूसरे संग खेलने और तितलियाँ पकड़ने लगे । भोर हुई तो चेतना आई....अरे ये तो परी का भतार है और नींद का जय सिया राम ।उठ कर बैठ गयी । 
                    मड ई के सूराखों में से भोर का उजाला झांकने लगा तो बुढ़िया जय सिया राम, जय सिया राम ....सिव -सिव- सिव रटती ...लाठी फटकारती, जोर लगा कर खेत की ओर भागी ..देर से रोके थी ,उजास की बाट जोह रही थी ।जब सहा न गया । पड़ोसी के घूरे के पास बैठ गयी । मन जब हल्का हुआ वापस लौटी । रास्ते में चुपचाप चोरों की तरह लौटते देख पड़ोसी फुल्लन की माई को शंका हुई । अपने दुवार की जांच -पड़ताल करते घूरा तर पहुँची और झनझना उठीं ......रण उ- पूत उ करती मुनिया के दुवार पर पहुँचीं । मुनिया के पिता दुवार खरहरा से झाड़ रहे थे .....ठहर कर खड़े हो गये ।का भया भौजी ! .तर्जनी तान कर चेतावनी देने लगी ...हे भौजी -भौजा से काम नहीं चलेगा ,मिनट में साफ करिए ना त माथ गिरेगा भिनहिए ,कह देते हैं । मुनिया के पिता को समझते देर नहीं लगी थी।ये उसकी माँ का आए दिन का काम था ।फरुआ ले घूरा पर पहुँचे और उठा -उठा पास के सगड़ा में पच -पच थुकते फेंकने लगे ।इधर आँगन में माँ चूल्ह पोतते सास पर पिल पड़ीं.......इ बुढ़़िया की चिठिये हेरा ग ई है बरम्हा किहा । रोज -रोज कुकुर झौं कराती है । जवानी भर कपार पर चढ़ी रही अब छाती पर मूंग दर रही है । पोतनहर आँगन में धप्प से पटकी ही थी कि हांड़ी फूट कर पानी छितरा गया । मारे क्रोध के कपार पीट -पीट रोने लगी । चुनमुनिया नहीं चाहती थी घर में आज राढ़ मचे सो माँ को पुचकार कर नहाने भेज पानी काछ खाना बनाने बैठ गयी । बुढ़िया अभयस्त हो चुकी थी पतोह की .....नहा धो कर एक लोटा जल सूरुज नरायन ,एक लोटा तुलसी जी में रखे सिव जी की पिंड़ी पर चढ़ा आँगन में चुल्हानी पीढ़ा रख कर बैठ गयी । चुनमुन ने आजी को खाना परोस दिया ......खा कर बुढ़िया गाँव में निकल ग ई ......ये उसका रोज का काम रहता ।घर में आग लगे बजर गिरे .....वह दुवारी- दुवारी घूमती तफरी करती । शाम को अन्धेरा होने से पहले लौटती तो बहू से रोज तोर चिकस मोर लोढ़ना होता ।
                मुनिया की माई ,बड़ी बहन चुनमुन सज धज ग ईं धराऊँ कपड़े पहन । टोले भर की लड़कियाँ ,औरतों उसके दुवार पर आ जमीं । इन्तजार था तो झुल्लन पाठक के ट्रैक्टर का । आते ही लड़़कियाँ ठेल- ठाल के चढ़ने लगीं .....एक का फीता दूसरी से नोचा कर खुल गया ,वह लपक कर उसकी भी नोंच कर खोल दी ।देखते -देखते झोंटा -झोंटी कुत्ती- बुजरी चालू । झुल्लन ने दोनों लड़कियों को खींच कर अलग किया । चेतावनी दी ..कल से रहा लोगन ,ना त केहू के ना ले जाईब । औरतों ने बचाव किया ।झुल्लन खुद कूद कर ट्राली पर चढ़ गये और बारी- बारी से सबको चढ़ाने लगे । चुनमुन कुछ ज्यादा ही सजी धजी थी । झुल्लन रिश्ते में तो चाचा लगता था लेकिन देख कर मुस्कुराहट रोक न सका । बीस साल का हट्टा कट्टा गबरु जवान .....ना जाने कितनी लड़कियों के प्रेम पत्र चुनमुन पहुँचा चुकी थी झुल्लन चाचा को ।ज्यादतर आज वही लड़कियाँ ट्रैक्टर पर लदी थीं जिनके प्रेम पत्र का जवाब अभी शेष था । ट्रेक्टर गाँव के उबड़- खाबड़ खडंजे पर हिचकोले खाता चल पड़ा ।जो चला तो लड़कियों के ख्वाब लहराने लगे ।झुल्लन ने आवाज दी .......अरे कुछ गाना बजाना भी होगा की सुन्ने सपाटे चलना है ।बड़ी औरतों ने पहले देवी गीत आरम्भ किया पीछे लड़कियाँ और जवान बहुऐं कजरी ,झूमर गा गा कर लहालोट । जैसे मैराथन की दौड़ हो, रेस लग ग ई कि कौन झुल्लन के मन का गीत सुनाए और वह मुड़़ कर देख तनिक मुस्कुरा दे । रास्ते भर औरतों का झुण्ड का झुण्ड मेले की ओर रेले चला जा रहा था .....औरतों का सावन मेला, गौरी धाम का पूरे इलाके में सरनाम था ।ज्यादातर औरतें हरी साड़ियों और हरी चूड़ियों में सजी धरती की हरियाली का उत्सव मना रहीं थीं ।आज सतमी को लगने वाला गौरी पूजन मेला था । औरतें कोरस में गा रही थीं ......सड़क पर खम्हा गाड़ के पिया चल ग ईलें बिदेसवा ........सड़क पे खम्हा ........ssssssss ।
                  ट्रैक्टर झटके से रुका ....झुल्लन गमछे की पगड़ी बाँधते उतरा तो मुन्ना बो ने हँस के कहा ....म उरी कहिया बन्हायेंगे ए बबुआ जी । झुल्लन लजा गया ....कौनों मिलती ही नहीं भौजी का करें । लड़कियों का झुण्ड़ ठण्डी आहें भरने लगा । सबसे पहले सब की सब मन्दिर की ओर चलीं ....चुनमुन बार- बार पीछे पलट कर देखती ....मुनिया छोटी लड़कियों के साथ मगन .....रह -रह कर रुमाल में गठियाए रुपये की थाह ले लेती । आजी ने आते वक्त बीस रुपये मेले के लिए दिया था । बाऊ ने दस ....माई ने पाँच .....पहले के धरे दस रुपये को मिलाकर कुल पैंतालिस रुपये । रास्ते भर किसिम -किसिम के खिलौनों और मिठाईयों की कल्पना करते आई थी । आजी से मन रखने के लिए पूछ लिया था .....का लोगी आजी ? बुढ़िया की आँखें भर आईं ,आँख मलते हुए पोती से दुलार से कहा.....मिले तो बुचिया भोपाली का सुरमा भोपाली ले लेना । पाँच का मिलता है ।आज कल अन्हार होते दिखता नहीं । झुल्लन की माई कहती है सवा महीने लगाने से आँख का मैल कट जाता है, आँख से गिरते लोर को आँचल से पोंछ पोती को कलेजे से लगा लिया । किसी ने तो बुढ़िया की सुध ली ,वरना सब रोज मौत मांगते थे आज कल । लड़की का गला भर आया ......आजी के झुलझुल कपोलों को चूमते हुए आश्वस्त किया .......चिन्ता न करो आजी ,खोज के लाऐंगे।
                   मन्दिर के पास पहुँच औरतें दो -दो रुपये का धार ,बताशा, फूल ले लाईन में लग ग ईं ।अन्दर गर्भ गृह में देह पर देह छिलाता ....शिव जी का लिंग पूजने की औरतों में होड़ लगी थी। कुछ ऊपर से ही झूकी औरतों पर लोटा का जल चढ़ा चल देतीं .....हो ग ई पूजा ।औरतें अन्हरी ,निपूती करतीं रहतीं । अज़ीब दृश्य था ,चढ़ावे का हलुआ पूड़ी पानी में सना कर लुगदी ......आदमी तो दूर कुत्ते न पूछें । केला, अमरुद दो पूजारी औरतों को टेर- टेर खोजते ,प्लास्टिक की बोरी में भर -भर पीछे के बरामदे में फेंकते जाते और वह फिरसे ठेलों पर पहुँच जाता । एक पूजारी बही खाते पर बोरियों की संख्या दर्ज करता और कुजड़ों से हुज्जत करता कि जल्दी दाम लाओ ।इधर दूध, गंगा जल ,और अभिषेक का जल पूरे परिशर में लात -लात फैल कर अस बिछलहर फैलाए हुआ था कि दो चार के पैर का कल्याण हो चुका था ।आस्था का महासैलाब ......अन्धभक्त औरतें और हर औरत से चढ़ावे का पाँच रुपया वसूलता पंड़ा हर -हर महादेव का बीच -बीच में ललकार लगाता रहता । 
                              मुनिया ने नन्दी पर चढ़ाया केला उठाया ही था कि माई ने चट से मार छीन कर वापस धर दिया ......केतनी बार समझाए हैं कि सिव जी का परसाद नहीं खाते,...लड़की ने गुस्से में झनक कर कहा ....इ तो नंदी बाबा का परसाद था । माँ हाथ पकड़ खींचते बाहर निकली ...सामने पूड़ी -हलुवे के लुगदी का पहाड़ देख लड़की का मन मचल गया ।कितने दिन हुए हलुआ- पूड़ी खाए .....आजी भी एक दिन कह रही थी । मन में सोचती ,यहाँ इतना घूरा पर फेंका है और हम खाने को तरशते है .....बक्क महादेव जी आप अच्छे नहीं जो आपका चढ़ाया परसाद नहीं खाते । इ तो गलत बात है । लड़की अपने विचारों में मस्त -मगन फ्राक की झालर पकड़ चल रही थी कि रुकने को कहा गया । एक जगह खड़े हो पूरे समूह ने तय किया सभी लोग बारह बजे तक मेला घूम टेक्टर के पास मिलेंगे । सब छितर गयीं ।लड़कियाँ इसी मौके की तलाश में थीं । मुनिया की माई बेटियों को ले काली जी तर चली .....उसकी माँ ने कहलवाया था मिलने को । पास ही मायका था । यहाँ का हाले आलम और गजब ,जैसे रोअना महोत्सव चल रहा हो । दो औरतें एक दूसरे से मिलते पहले भेंट- भेंट रोती फिर हाल चाल कुशल क्षेम होता । एक पेड़ के नीचे नानी को बड़की मामी संग बैठी देख मुनिया खिल गयी ....उ देख माई ,नानी । माँ बेटी लपक कर पास पहुँचीं ।मिलना- मिलाना होने के बाद नानी ने झोले में से निकाल सबको हलुआ पूड़ी खाने को दिया । मुनिया खुश हो गयी । चलते समय नानी ने माँ को पचास चुनमुन को दस ,मुनिया के हाथ पर एक- एक के पाँच सिक्के रखे तो खुशी का ठिकाना नहीं ।खिल उठी कि मन भर मेला करेगी ।अब मेला की बारी थी ,लाईन से पटेहरों की दुकान, लाली ,पाऊडर, इसनो,ं चूड़ी ,झूमका ,झाला और रंग- बिरंगी फीतों की लड़ियों से सजी थीं । कुछ दुकानों पर ब्रा ऐसे टंगा था जैसे अरगनी पर कपड़ा । माई एक दुकान पर बैठ मोल भाव करने लगी .......चुनमुन भी माँ के साथ बैठ ग ई .....खूब मोल भाव कर सोलह साल की ब्याहता चुनमुन के लिए फोम वाले दो ब्रा खरीद लिये गये। मुनिया देख -देख कुढ़ रही थी ..कमर पर हाथ धरे खड़ी माँ को गुस्से से घूर रही थी .....दुकान वाली ने माँ से कहा "एहू बहिनी के कुछ कीन दा" .।.देखा मुँह बनवले ठाढ़ हयी।माँ पिनक ग ई...का लेगी ?..,.. लेती काहें नहीं ?.......रुमाल की गठरी दिखाते हुए बोली .....धरी तो है एतना । दुकान वाली हँसने लगी ......मुनिया का गुस्सा और चढ़ गया ......बहन की ओर हाथ नचा कर कहा ......अउर इ नहीं धरीं का ? माँ ने एक घमका खड़े होकर पीठ पर धर दिया ....तू हूं भतार को दिखाएगी का । मामला बढ़ता उससे पहले सामने से दामाद को आते देख मुनिया की माई सम्हल ग ई ।हे हे हे .......ले ले बुचिया ......ले ले फीता जितना चाहे । मुनिया खुश हो गयी ....दो रुपये मीटर का तीन जोड़ी फीता ले लिया । लाल, हरा ,नीला .......छ: मीटर का बारह रुपया । लेने के बाद माँ से कहा .....ले लिया ......माँ दामाद से बतियाने में मगन थी .....उसे ठेल कर कहा ...पैसा दे दे । तू नहीं देगी .....मुनिया तमक उठी । माँ ने कस कर घूरा ,जानती थी माई जीजा के सामने ही थूर देगी । रुमाल से निकाल बारह रुपये दिया और भेद- भाव देख उदास हो गयी । बड़ी बहन जीजा को देख -देख मुस्कियाती ,दोनों में कुछ इशारेबाजी चल रही थी ।माँ ने दूसरे दुकान से दामाद को रुमाल खरीद कर दिया और जेब में कड़कती सौ की नोट मेला दिखाई दे मुस्कुराने लगी । ।चूड़ीहारे के यहाँ चुनमुन को भर- भर हाथ चमकीली लाल -हरी चूड़ियाँ पहनाई ।हरे रंग की सस्ती चूड़ी खुद भी पहनी । बढ़ ई की दुकान से चौकी बेलना लिया ....बिसादे से चालन ,डोम से इस्सर दलिद्दर गीन कर सूप लिया । दामाद ने लजाते हुए सास से कहा ..... इसे उधर नाच दिखा दूँ ? सास ने हँस कर कहा .....ले जाईं ।दोनों हवा में कटीें पतंग की तरह लहराते आँखों से ओझल हो गये। इसी साल जेठ में ब्याह हुआ था ।दो साल का गवना .......पति बी.ए.में झुल्लन के साथ कालेज में पढ़ता था। उसी की साठ गाँठ से भेंट तय हुआ था । 
                 मुनिया का मन कभी गरम गरम जलेबी पर मचलता कभी पकौड़ी पर । माँ थी की नाम ही नहीं लेती । अपना सामान खरीद कर माँ एक चबूतरे पर बैठ गयी ....सामने कठघोड़वा का नाच चल रहा था .....बायीं तरफ एक छोटी लड़की बाँस का बड़ा सा लट्ठ लिए रस्सी पर चल रही थी ....बीच -बीच में पब्लिक ताली बजाती .....दायीं तरफ मदारी रुठी बंन्दरिया को बन्दर से मनवा रहा था ।लोग बन्दरिया की अदा देख हो हो हँसते ।यहाँ बच्चों की संख्या अधिक थी ।मुनिया की बगल में एक लड़की रबड़ की गुड़िया ,चूल्हा, चाकी कंगन, बाली लिए अपनी आजी को दिखा रही थी ....मुनिया का मन मचल उठा ।बूढ़ी औरत को देख आजी के सूरमें का भी खयाल आया ,जानती थी माँ खिलौने नहीं खरीदेगी सो लड़की से पूछने लगी .....कहाँ से लिया .....लड़की ने सामने कोहारों की दुकान की ओर इशारा किया । बूढ़ी ने अपनी पोती को साथ लगा दिया ....जा दिला दे ....माँ ने हामी भरी तो वह तीर की तरह लड़की का हाथ पकड़ चल पड़ी ।दस रुपये की सुनहरे बालों वाली गोरी मेम गुड़िया ली ग ई .....गुड़िया की गृहस्थी बसे सो प्लास्टिक का दस रुपये में कप प्लेट ...थाली कटोरी बाल्टी का सेट ।कुल पचास में से बत्तीस रुपये खर्च हो चुके थे ।अचानक मुनिया के कान में सूरमा भोपाली की लाउडस्पिकर से आवाज गूँजी .....वह ठीक मैदान के उसी छोर पर खड़ा था अपनी साईकिल लिए जिधर उनका ट्रैक्टर खड़ा था ..लड़की की बांछे खील गयीं .....पाँच रुपया रुमाल के दूसरे कोने में गठिया लिया ताकि भूल से भी खर्च न हो ,माँ की तरफ देखा, वह औरतों से बतकुच्चन में मस्त थी । एक तरफ लाईन से हलवाईयों की दुकान सजी थी ......रंग- बिरंगीं मिठाईयाँ .......कढ़ाई में गरम पकौड़ी तेल में नाच कर सुनहरी हुई जा रही थी .......जब मुँह पानी से भरने लगा लड़की का धैर्य टूट गया । दो रुपये की जलेबी और दो की पकौड़ी सफाचट करने के बाद दोनों लड़कियों ने अठ्ठन्नी का बर्फ खरीद कर चूस लिया .....एक रुपये की बरफी खाई ,अठ्ठन्नी का चिनिया बदाम ले झोले में डाल कर आगे बढ़ी ।सामने किसिम -किसिम के गुब्बारे -फिरकी और बाँसुरी वाले बच्चों को रिझाने के लिए तरह- तरह के आवाज निकाल रहे थे । थोड़ी देर खड़ी होकर मुनिया देखती रही और यह सोच कर आगे बढ़ी कि एक दिन में फूट- फाट जाएगा । एक जगह बैठ कर मुनिया ने रुमाल में गठियाए रुपये खोल कर गिना ,पाँच निकाल कर अब तक कुल साढ़े सैंतीस खर्च हो चुका था ।अब अढ़ाई रुपया बचा था ......लौटने लगी तो एक कोने मिट्टी का चूल्ला- चाकी देख पुन पुन भागी ........चूल्हा ,चाकी ,कलछूल, थरिया तसली ,बटूली ले झोले में रख वह हँसती- गाती माँ के पास पहुँची । माँ ने झोले का वजन देख आँख नचा कर उलाहना दिया ........फूंकी आई रुपया ......लड़की ने अनसुना कर दिया । बारह की शर्त थी, दोपहर के दो बज चुके थे ......धीरे धीरे औरतों का समूह टैक्टर तर जुटने लगा ।मुनिया भी माँ संग आ गयी ।बाकि छोटी लड़कियाँ एक दूसरे को अपना झूमका ,झाला खिलौना दिखाने में मगन, औरतों का मंहगाई का रोना चल ही रहा था कि झुल्लन भी अपनी माँ संग आ गया । नहीं पहुँची तो चुनमुन ......माँ को भीतर- भीतर क्रोध आ रहा था लेकिन कहे तो क्या कहे कि बेटी बिना गवने के भतार संग घूम रही है मेला- ठेला । वह बेचैन हो इधर -उधर देखने लगी ।औरते देर होने का उलाहना दिए जा रही थीं ।मुनिया खुश हो रही थी कि अब दिदिया की कुटाई तय। इतने में झुल्लन लप से ड्राइबर की सीट से कूद कर सरसराते हुए निकल गया । 
                  
              अचानक बादल उमड़ने लगे .....अफरा -तफरी सी ज़मीन पर दुकान सजाए दुकानदारों में मच ग ई । बरसात का दिन होने से सब तैयारी के साथ थे प्लास्टिक का छाजन तनने लगा । बड़ी दुकाने पहले से तैयारी के साथ लैस थे । लोग घर की ओर लौटने लगे तो औरतों की भनभनाहट बढ़ी ।माँ का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँचने लगा ......हल्की बूंदा -बांदी भी शुरु हो गयी ..झुल्लन की माई ने सबको ऊपर चढ़ कर बैठने का आदेश दिया ताकि उसके आते ट्रैक्टर चल दे । औरतें लड़कियाँ भरभरा कर चढ़ने लगीं ।इतने में मुनिया के कान में आवाज पड़ी .....ले लो ,ले लो भोपाल का सुरमा लगाते ही रौशनी लौट आए जो लगाए इसके गुन गाए ले लो ले लो sssssss........ मुनिया भागी ......माँ चिल्लाने लगी ...अरे मुअनी अब तू कहाँ भागी ......। बस इ हे से आई माई ....कह मुनिया लपकी चली जा रही थी कि सूरमा भोपाली खुद साईकिल समेत आ धमके ।लड़की ने झट रुमाल में गठिआया रुपया निकाल सूरमें वाले के हाथ पर धर गिड़गिड़ाई ......जल्दी दो चाचा। सुरमावाले ने सिक्के गिन कहा .......पाँच और लाओ । मुनिया को गुस्सा आया ..... काहें? आजी तो बोली थी पाँच का है । सुरमावाला पैसे लौटा साईकिल आगे बढ़ाने लगा । साथ -साथ बड़बड़ाते भी जा रहा था एतना महंगाई है और आज ले पाँचे रुपया रहेगा ।पाँच का तो खाली डिबिया नहीं मिलती। ..मुनिया रुआंसी हो गयी । रुको- रुको चाचा .....बस तनी सी कह बिजली की गति से माँ का रुख किया ।माँ का आँचल पकड़ हाँफते हुए कहा .....माई जल्दी पाँच रुपया दे ......काहें रे ? कौन सौदा पसारी अब तेरा रह गया ..माँ चिल्ला रही थी । गुस्से की लाली उसके आँख में पहले ही उतर कर तांडव कर रहा था ,अब और बढ़ गया । लड़की भी उसी आवेश में चिल्लाई .....आजी का सुरमा लेना है । इतना सुनते ही माँ ने झोंटा पकड़ कर घमाघम मुक्के घमकाना शुरु कर दिया ।बड़ी का गुस्सा छोटी पर निकलने लगा ....लोग खड़े होकर तमाशा देखने लगे तो टोले की औरतों ने बीच- बचाव कर माँ बेटी को अलग किया ।माँ राग कढ़ा कर चेकरने लगी .....हमार तो करमे फूट गया रे विधाता ....बुढ़िया ना जाने कौन जादू टोना ठेल है कि बेटी उसकी सुनती ही नहीं .......इधर मुनिया का हाल बेहाल ....लड़की सुबक -सुबक रो रही थी ....बाल बिखर कर चिड़िया का खतौना हो चुका था ।काजल भर मुँह फैल गया था ।उधर सूरमा वाला चिल्ला रहा था ..... ये आखिरी डिबिया है भाई लोग .....आईए ले जाईए .....माताओं बहनों को लगाईए ....बच्चे बूढ़ों को लगाईए । लड़की छटपटा उठी ....कुछ सूझ नहीं रहा था .....सामने से बहन झुल्लन के साथ आती दिखी तो बेचैनी और बढ़ने लगी, जानती थी , उसके आते ट्रैक्टर चल देगा। .....कभी सूरमा वाले को देखती कभी ट्रैक्टर की ओर .....तभी सामने से गुड़िया वाला अपना खोमचा लिए आता दिखाई दिया....लड़की भागी .....माँ गालियों की वर्षा करते पीछे भागी । झोले से गुड़िया निकाल गुड़िया वाले को लौटाने लगी तो उसकी ना नुकुर सुन बौखला उठी ....एक बच्चा बाँसुरी खरीद दस की नोट बढ़ाया ही था कि वह गुड़िया फेंक दस की नोट लपक सुरमें वाले की ओर भागी ...आखिरी ड़िबिया झट खरीद वापस मुड़ी ही थी कि सूरसा की तरह मुँह बाए माई को देख सहम ग ई ......माँ चोटी पकड़ घसीटते हुए लेकर चली ....लड़की के पास अब अपार धैर्य का पहाड़ ना जाने कहाँ से आ गया था ....वह लगभग माँ के साथ दौड़ते हुए चली जा रही थी । रास्ते भर लोग रोकते- टोकते रहे ......ट्रैक्टर के पास बड़ी बहन पहले से खड़ी थी । हाथ में झोला भर सामान देख मन ही मन माँ खुश हुई कि चलो दामाद मनजोग मिला । वह छोटी को छोड़ बड़ी को प्यार से झिड़कने लगी ....एतना टाईम लगा दी .......।
             
                   बड़ी ज़मीन में नज़रें जमाए मुस्कुराती रही । मुन्ना बो ट्रैक्टर की टाली पर खड़ी तमाशा देर से देख रही थी .....बाह -बाह बबुनी ,मनसेधु मन जोग मिला कह ताली पीट हँसने लगी ।बड़ी लजा के गड़ी जा रही थी ।झुल्लन ने नारा लगाया ......अरे अब चलबो करेगी जनता की डरामे चलेगा ।बैठते हैं बबुआ जी कह मुनिया कि माई टाली पर चढ़ गयी ।ऊपर औरतों प्लास्टिक का तिरपाल गोवर्धन पर्वत की तरह धारण किए हुए थीं ।माँ बेटी भी ओढ़ कर बैठ ग ईं । हल्की रिमझिम फुहारों ने मौसम को सुहाना बना दिया था । बगल की छोटकी ,पुनिया अपनी गुड़िया निकाल एक दूसरे को दिखा रही थीं ........मुनिया ने मुट्ठी खोल सूरमा की डिबिया को देखा ....आँसू आँख से निकल कर गले तक भर आया .....वह मुँह फेर कर सुबकने लगी । बड़ी अपनी सहेलियों से घुटनों में मुँह छुपाए खुसुर-फुसुर में मस्त थी । झुल्लन की माई ने बहुओं को ललकारा .........हे !कंठ रुन्हा गया का जी की रास्ता सुने कटेगा । मुन्ना बो ने मुँह चमका कर कहा ......अब का गाऐं चाची जी ?सावन है कजरी गाओ अउर का गाओ गी ।...झुल्लन की माई भी उसी अन्दाज में बोलीं । बहुऐं सोच बिचार करने लगीं ......मुन्ना बो ने राग कढ़ाया ........ पिया कहत त सारनाथ जाइत पिया मेला देख आइत पिया ना ..... आई सावन की बहार पड़ता पानी का फुहार मजेदार यार छतवा लगा के पिया मेला देख आइत पिया ना ....... रास्ता गाते बजाते कट गया ।मुनिया की रोते- रोते सिसकी बंध गयी थी । रह- रह कर गुड़िया याद आती । ट्रैक्टर झटके से उसके दुवार पर रुका । सबसे बाद में वह उतरी ।माँ बहन घर में उतरते चली गयीं । वह उतर कर घर के बरामदे में बूझे मन से आकर आजी की खटिया के पास खड़ी हो ग ई । बुढ़िया ने हँस कर पूछा .....का -का मोल लाई मोरी बुचिया ? लड़की की मुट्ठी में अब भी सुरमें की डिबिया जस की तस पड़ी थी ....हथेली फैला दिया ...अरे बाह ,ले आई रे मुनिया ,मेरा काजल । रो पड़ी भावातिरेक से ....लड़की के चेहरे को अपनी बूढ़ी निर्बल हथेलियों में धर चूमने लगी । इस बुढ़िया की सुध किसी को तो घर में है सोच लहालोट थी ।लड़की आजी की खुशी देख गुड़िया का गम भूलने लगी । 

               झोले में से खोज कर चिनियाबदाम निकाल आजी की हथेलियों पर धर दिया .....जानती थी आजी को बहुत पसन्द है ।बुढ़िया आँचल में रख फफक कर रो पड़ी । लड़की आजी के पोपले गालों को चूम गले से लिपट गयी और जोर -जोर से रोने लगी । बूढ़ी औरत ने पोती के बालों का हाल देख जान लिया था कि मामला क्या हो सकता है । आजी- पोती का मधुर रुदन प्रकृति को भी रास आया .....उस रोज मौसम की सबसे अच्छी बरखा हुई ।जीव जन्तु से ले धरती का रोम रोम तर हो गया । 
 

सोनी पाण्डेय
 कृष्णा नगर ,म ऊ रोड सिधारी ,
आज़मगढ़ 
उत्तर प्रदेश 276001▶ 

बुधवार, 2 नवंबर 2016

अमन त्रिपाठी की कविताऐं

१. लड़की मुसलमान है ___

किसी को नहीं पता था
कि वो मुसलमान है
शक्लोसूरत हिंदू जैसी
चलना ढलना हिंदू जैसा
बोलना बतियाना वैसे ही
जैसे वहाँ हिंदू बोलते थे

वो सब तो ठीक था!

हाथ भी जोड़ती थी
पूजा तक में आती थी
लड़की थी
अचानक किसी रोज़
लोगों को पता चला-
वो मुसलमान है
अजी वो,
हाँ वही वही
हाँ वही लड़की
वो मुसलमान है
लड़की - मुसलमान है !

***
हिंदू दिखना ज़्यादा ज़रूरी था
इंसान होने की बजाय हाथ जोड़ना
ज़्यादा ज़रूरी था
सर झुकाने इज़्ज़त देने की बजाय
हमारी सभ्यता में दिखना ज़्यादा ज़रूरी था
होने की बजाय

***
जब तक लोगों की नज़र में वो हिंदू थी
वो आम लड़की थी
जब उसके मुसलमान होने का पता चला
वो खास लड़की थी
जैसे वहाँ कोई और लड़की थी ही नहीं
लड़की ! वो भी मुसलमान !

______________

२. आत्महत्या और चांद ___ ...

और चांद लौटता रहा
देर-देर तक उसके दरवाज़े पर
थपकियाँ देकर चांद चिंतित था
उसने धरती से हवाओं, फूलों,
चिड़ियों और पौधों की एक सभा बुलायी
और उसने जानना चाहा कि क्या धरती पर जीवन की मात्रा कम हो रही है
चांद फुटपाथों पर भटका
और उसने फुटपाथ पर सोने वाले हर आदमी के चेहरे के अंदर झांककर देखा
चांद नदियों से होकर गुजरा और उसने नदियों के बहने की आवाज सुननी चाही
चांद सोते हुए बच्चों के खिलौनों के पास गया चांद झगड़ते हुए भाई बहनों के पास गया
चांद, अपने प्रेमी की याद में रोती प्रेमिका के पास भी गया
वह हर जगह गया
लेकिन वह नहीं जा पाया उस दरवाजे के पार ! कई-कई दिनों तक चांद लौटता रहा देर-देर तक उसके दरवाजे पर थपकियाँ देकर-

***

दरवाजे के तिलिस्म से बाहर ले चलूँ
उससे पहले एक बात - मैं कल्पना करता हूँ कि   एक लड़की,
जो अरसे से आत्महत्या के बारे में सोच रही है बल्कि इस समय भी वो किसी से वैसी ही बातें कर रही है,
से वो पूछे - क्या तुम्हारी बालकनी से चांद दिखता है ?
मैं कल्पना करता हूँ कि लड़की जो आत्महत्या करना चाहती है
वह इस बेमौके पूछे गए सवाल पर झुंझलाए और धीमे से कहे - क्या वाहियात सवाल है.

***
चांद जो कि दरवाजे पर थपकियाँ दिये जा रहा है
और अंदर वह लड़की झुँझलाकर कहती है-
क्या वाहियात सवाल है...
चांद आज भी चला जाता है
मैं भी चाहता हूँ वह चला जाय झुँझलाने के बाद शायद वह लड़की बढ़े जीवन की तरफ और दरवाज़ा खोलकर बालकनी में आने पर उसे चांद अपनी जगह पर ही दिखना चाहिये - ______________

३. दीवाली में ___

पता चला है
दीये लाने की कवायद में-
श्रीराम कोंहार ने
अब दीये बनाना बंद कर दिया है
सुरेन्दर चपरासी के घर भी दीवाली आएगी
और सबेरे से चार बार रिरिया चुका है पैसे को पैसे मिलें तो उसके घर कुछ सामान आ जाए पांचवीं बार रिरियाने के लिये
फिर काम में लगा है
अखबार में खबर है -
इतने जवानों की मौत और त्योहारी माहौल खराब होने का एक भद्दा सा अभिनय
बाहर के सामान उपयोग में नहीं लाएँगे
दीये जलाएँगे और गरीबी दूर करेंगें
इस तरह सुन रहे हैं ताकते हुए कोंहार, चपरासी...
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अमन त्रिपाठी
शिक्षा - बी.टेक तृतीय वर्ष
लखनऊ
मो. नं. - 9918260176