शनिवार, 19 फ़रवरी 2022

समकाल : कविता का स्तीकाल 21

स्त्री कविता में इन दिनों अहिन्दी भाषी क्षेत्र से निरन्तर हिन्दी कविता की अनुगूंज सुनाई दे रही है,मराठी से सुनीता डागा,बांग्ला से मीता दास,ज्योत्सना बेनर्जी आडवाणी, ज्योति शोभा,केरल से अनामिका अनु,पूर्वोत्तर से जमुना बीनी आदि कवयित्रियों ने अपनी कविताओं से हिन्दी कविता को समृद्ध किया है।मेरी पहुँच की एक सीमा है और यह मेरे स्त्री कविता के अध्ययन का मात्र एक पड़ाव है जिसमें निरन्तर मेरी कोशिश है कि अधिक से अधिक दूरी तय कर सकूँ।
मूलतः राजस्थान की अनुपमा तिवाड़ी की कविताओं में समय,समाज और परिस्थितियों को महसूसने की पीड़ा साफ दिखाई देती है।वह अपनी कविताओं में स्त्री जीवन की विडम्बनाओं, समाज में व्याप्त असमानता तथा मानवीय करुणा का पक्ष बड़ी मार्मिकता से उकेरती हैं।


अनुपमा तिवाड़ी की कविताएँ

1
सुरक्षित – असुरक्षित

सुरक्षित - असुरक्षित शब्दों की सियासत के बीच

जब नन्हीं लड़कियों से ले कर बुढ़ियाओं तक नहीं पहुँच पाते उनके पैने नाखून और खूनी दांत

तो वे माँ - बहन की गालियों से चलाते हैं काम.

उनकी आँखें करती रहती हैं बलात्कार

और मौका पाते ही नोच डालती हैं

किसी फूल से खिली लड़की को.

हर दिन रंगे होते हैं खून से अखबार

और पहुंचा रहे होते हैं चैनल हम तक,

किसी मसली देह की चीत्कार को.

फिर भी देखो,  

सियासत में, बेशर्मी से ‘सुरक्षित’ शब्द अपनी जगह बनाने की जद्दोजहद कर रहा है

जबकि हकीकत में, ‘असुरक्षित’ शब्द अपनी जगह बना चुका है.


 2

सबके मौसम एक से नहीं होते

वो, बारिश में यज्ञ कर रहे थे

इन्द्रदेव को बुलाने का,

नाप रहे थे पानी मावठे का.

सूखा अच्छा नहीं लगता

सूखे में,

सूख जाते हैं, आँसू भी !

और वो इन्द्र की मेहरबानी पर सो नहीं पाए रात भर

घर की टीन के छेदों से टपकते पानी ने भर दिए थे

बोतल, डिब्बे, गिलास और परात.

ओ, मौसम तुम आना

झूम कर आना

पर, थोड़ा रहम के साथ आना.

सबके लिए सर्दी, गर्मी और बारिश अच्छी नहीं होती.


साल और साल

वर्ष के अंत में
मैं देखती हूँ पीछे मुड़कर
अपनी पीठ थोड़ी थपथपाती हूँ
थोड़े गँवाए समय पर भुनभुनाती हूँ.
बेहद डर जाती हूँ
जब मार्च तक नहीं लिख पाती
कोई कविता,
कोई कहानी,
कोई लेख,
नहीं कर पाती कोई साहित्यिक मंच साझा
नहीं कर पाती किसी ज़रुरतमंद की मदद
बीते महीनों को फूँक मारकर उड़ा देती हूँ
और फिर साल को मुट्ठी में कस कर कभी चलती हूँ बुदबुदाती
तो कभी दौड़ती हूँ महीनों को पकड़ती.
दौड़ते – दौड़ते फिसल ही जाता हैसाल मुट्ठी से.
फिर अगले साल के स्वागत में खड़ी हो जाती हूँ
कहते हुए कि
साल,
मुझे अपने साथ – साथ रखना
मेरे पास वक्त बहुत कम है.



दिसंबर में कोट

पिछले कुछ वर्षों से

दिसम्बर की खरीददारी की सूची में मेरा कोट भी होता है.

लेकिन सूची में कोट लिखे जाने से खरीदने तक की यात्रा में आते हैं,

अनगिनत पड़ाव.

और मैं याद करने लगती हूँ उन दृश्यों को जो इस यात्रा को और लम्बा बनाते हैं.

मैं कुछ स्कूलों में कड़कती ठण्ड में

बच्चों से पूछती हूँ गलत सवाल कि

“तुम्हें ठण्ड नहीं लग रही...” ?

मुझे अपने सवाल का उत्तर पहले से पता होता है कि

वे सिर झुकाकर उत्तर देंगेनहीं !

मैं उनके इस जवाब से डरती हूँ कि,

वे ये न कह दें कि उनके पास स्वेटर नहीं है !

इसलिए मैं उनसे गलत सवाल करती हूँ.

मैं गाँव में देखती हूँ कि जवानी में बुढ़ाते किसान,

एक चादर को बिछा भी लेते हैं और उसे ओढ़कर खेत में फसल से घुल भी रहे होते हैं.

वो देर रात तक सर्दी को अलाव से डराते रहते हैं.

परसर्दी कहाँ डरती है ?

मैं देखती हूँ

फुटपाथ पर

कि खिलौने बेचती औरत,

फटे पुराने एक कपड़े में बच्चे समेत खुद को लपेटे है.

तो मैं फिर गिनने लगती हूँ अपने स्वेटरशॉल.

अरे ! मेरे पास तो बहुत हैंऔर फिर सर्दी होती ही कितने दिन की है ?

मैं बुदबुदाने लगती हूँ अपने उस पैंतीस साल पुराने स्वेटर के गुण 

जिसकी एक बार सीवन उधड़ने पर मैंने मिलते – जुलते रंग की ऊन से उसमें खोपे भर लिए थे.

इतने पड़ाव और इतनी समझाइश के बाद

मैं डिपोजिट कर देती हूँ

अपने कोट खरीदने का विचार अगले दिसम्बर तक.


.

भूख 

बिना हथियार के भी

मर सकता है

गरीब और मजबूर आदमी.

उसका रोज़गार छीन लो,

धकिया दो उसे,

छोड़ दो सड़कों पर बेसहारा उसे,

आखिर,

कहाँ जाएगा ?

कैसे जीएगा ?

खुद ही आत्महत्या कर लेगा.

साफ़ – सुथरी तमाम तफ्तीशें और 

पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहेंगी

कुछ नहीं निकला.

चलो,

हम सब मुक्त हुए !

आखिर,

बहुत काम का भी क्या ?



                                                   अनुपमा तिवाड़ी

        परिचय                                     

जन्म :  30 जुलाई 1966, राजस्थान के दौसा जिले के बाँदीकुई कस्बे में.                               

आत्मजा : श्री विजय कुमार तिवाड़ी एवं श्रीमती मायारानी तिवाड़ी. 

शिक्षा : एम. ए ( हिंदी व समाजशास्त्र ) 

पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर.

राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर की 75 से अधिक पत्र – पत्रिकाओं में कहानियाँ, कविताएँ व लघुकथाएँ               प्रकाशित.

कविताओं का मराठी और नेपाली भाषाओँ में अनुवाद.

पहला कविता संग्रह ‘आईना भीगता है’ 2011 में बोधि प्रकाशन  जयपुर द्वारा प्रकाशित.

दूसरा कविता संग्रह ‘भरोसा अभी बचा है’ 2018 में ‘राजस्थान साहित्य अकादमी’ के सहयोग से बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित. 

पहला कहानी संग्रह ‘भूरी आँखें घुंघराले बाल’ 2020 शिवना प्रकाशन सीहोर, भोपाल से प्रकाशित.

साझा संग्रह ‘आधी आबादी की यात्रा’ में कविताएँ ( धाद प्रकाशन 2015 ).

साझा संग्रह ‘अँधेरे में उजास’ में कहानी ( वनिका प्रकाशन 2019 ).

शिक्षा, पर्यावरण व सामाजिक मुद्दों पर 60 से अधिक लेख प्रकाशित.

वर्षों से विभिन्न मंचों, आकाशवाणी और दूरदर्शन पर कविता, कहानी पठन, वार्ताओं में भागीदारी. 

विभिन्न विश्वविद्यालयों में शिक्षा के क्षेत्र में आयोजित सेमिनारों में शैक्षिक परिप्रेक्ष्य, विज्ञान, गणित और हिंदी विषय पर चार पेपर प्रस्तुत. 

वर्ष 2016 में ‘पर्यावरण पुरूस्कार’.

वर्ष 2017 में ‘बेटी सृष्टि रत्न एवार्ड’.. 

वर्ष 2018 में ‘वुमन ऑफ़ द फ्यूचर एवार्ड’.

वर्ष 2018 में ‘प्रतिलिपि कथा सम्मान’.

पिछले 32 वर्षों से शिक्षा और सामाजिक मुद्दों पर काम करने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं में सक्रिय. वर्तमान में अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन जयपुर में बतौर सन्दर्भ व्यक्ति के रूप में कार्यरत तथा राजस्थान में ट्री – वुमन नाम से विख्यात.

दो काव्य संग्रहों के बाद यह पहला कहानी संग्रह ‘भूरी आँखें, घुंघराले बाल’.

संपर्क : 

 ए - 108, रामनगरिया जे डी ए स्कीम, 

एस के आई टी कॉलेज के पास, जगतपुरा, जयपुर 302017

फोन : 7742191212, 9413337759 Mail – anupamatiwari91@gmail.com


नोट- पोस्ट में प्रयुक्त रेखाचित्र चित्रकार अनुप्रिया के हैं।

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2022

समकाल : कविता का स्त्रीकाल -20

स्त्री कविता में जिस राजनैतिक चेतना का अभाव आलोचक बयां करते रहे हैं ,यदि उसे तलाशना हो तो वर्तमान पीढ़ी में अनुराधा सिंह,सुजाता तेवटिया,ज्योति चावला,नताशा,मोनिका कुमार,जसिन्ता केरकेट्टा, आरती,अनुपम सिंह,रूपम मिश्र,सीमा आजाद, आदि कवयित्रियों की कविताओं को पढ़ा जा सकता है।
दृष्टि सम्पन्न यह स्त्रियाँ शासन सत्ता से हर मोर्चे पर मुटभेड़ को तत्पर हैं और अपनी कविताओं में सत्ता की चालाकियों, बर्बरताओं को दर्ज कर रही हैं।वन्दना चौबे इसी क्रम में जुड़ती हैं और अपनी कविता में लिखती हैं -

"सत्ताशाह वे ही नहीं थे
जिन्होंने जला दिए पुस्तकालय
किताबों के वरक़ जिन्हें 
अपनी मौत के फ़रमान लगा करते थे।
किताबों की जिल्द के कोने जिनकी छातियों में धँसते थे
किताबों को जलाने वाले
इतिहास के मूर्ख हत्यारे थे जिन्होंने
ग़ैर-किताबी दुनिया के नक़्शे खींचे।

फिर धरती घूम गई
जंगलों की खेती की गई
जवान पेड़ों को निर्बाध काट दिया गया सरेआम
नदियों के गले मरोड़ दिए गए
और उनकी लुगदी बनाकर किताबों की खेप तैयार की गई"

 तनी हुई मुट्ठियोंवाली यह कवयित्रियाँ स्त्री कविता का वह मुखर स्वर हैं जो न केवल पितृसत्तात्मक समाज से मुटभेड़ करती हैं बल्कि अपनी कविताओं से उस नई भारतीय स्त्री को गढ़तीं हैं जो अपने स्व को पहचानती है और औरत को देह के परिकल्पना से मुक्त कर व्यक्ति की स्थापना में सहयोगी हैं।

(टिप्पणी- सोनी पाण्डेय)



वन्दना चौबे की कविताएँ


1.
राष्ट्र औज़ारों से भरा एक अनादि कारख़ाना है

वर्दी और बूट पहनाकर 
हत्या को शहादत में बदला जाता है।
और इबादतगाहों में सिद्ध किया जाता है उस मृत्यु को अध्यात्मिक!
चूंकि धर्म है कि संस्कृति से लासा लगाए चलता है
इसलिए अबके उत्तर-मनुज  इस लोकोत्तर-सुकून के
आईलैंड पर छुट्टी मना रहा है।
'यत्र नार्यस्तु पूज्यते' वहाँ देवता काफ़ी रमते हैं।

वीरता के गीतों में ज़मीन का एक टुकड़ा पूजनीय है
इसीलिए भव्य होता जाता है एक मंदिर
शौर्य के नाम छाती ठोंककर 
कितनी ठसकदार होती जाती है हथियारबंदी!
भीतरख़ानों में खरर-खरर पैने किए जा रहे  हैं पुराने प्रक्षेप-अस्त्र
राष्ट्र औज़ारों से भरा एक अनादि कारख़ाना है
जिसका आदि विद्रोही बोल-बम की यात्रा पर है
और रास्ते भर मोबाइल में व्यस्त है

उधर शांति के सहदूत 
पर्यावरण और मानवीयता पर चिंता कर रहे हैं
इधर उनकी चिंता से धरती की कोख में रहने वाले जीवों के
रंध्र गनगना जाते हैं।
बूटों की एक धमकी से 
निर्वासित हो जाती है ज़मीन में रहने वाले जीवों की पूरी नस्ल 
गिलहरियों की बस्ती मिट जाती है।

हिरणों की कुलांचे फॉरेस्ट सेंचुरी में दौड़ लगा रही हैं
कोई कहता है कि हिरण का मांस सबसे स्वादिष्ट होता है
कोई ये कि हिरण की आंखें सजल और कातर-सुंदर
कातर सुंदरता के कारण ही हिरणी की महिमा है 
वेटनरी डॉक्टर सिद्ध करता है कि 
हिरण और ख़रगोश का कलेजा जन्मजात नरम होता है
प्रभुओं का भोज्य

इधर बींसवीं सदी का एक लेखक कह गया कि
अब तक हिरणों का इतिहास शिकारियों की शौर्यगाथाएं हैं।
शाख़ पर लटके हुए चमगादड़ बिसूरती हँसी हंस रहे हैं
काले बियाबान में चमकती उनकी काली खंडहरी आंखों में 
इतिहास धारावाहिक की तरह बह रहा है।

जंगी बाड़े में बदलती हुई धरती से कभी सूरज की ओर देखो!
सूरज एक सुलगती अंगीठी है
जंगल जिसके अनुभव से पककर जवान हुआ है
और राष्ट्र कंटीले तारों से घिरा एक बाड़ा 
जंगल जिसकी जड़ खोद देगा एक दिन
और यही नदियाँ सरहदों की सेंधमारी करेंगी।
●●

2.

वैचारिक उर्फ़ वैवाहिक संगोष्ठी
----------------------------------------
जैसे होता है मुहूर्त शुभ-लग्न का
वैसे ही गोष्ठियों का भी एक मुहूर्त हुआ करता है 
बचपन के गाँव-जवार के बड़े परिवारों की तरह आयोजन
विश्वविद्यालय-परिवार/महाविद्यालय परिवार का

कहने वाले कहते हैं कि इतना पढ़-लिखकर भी
इन लोगों को हर जगह घर-परिवार ही दिखाई पड़ता है
ख़ुद इनके भीतर का सामंती मन टूटा नहीं अब तक
बहुत तर्क कीजिए तो निहलिस्ट कहकर नॉस्टालजिक हुए 
इस मन पर पानी फेर दिया जाता है।

इस तरह एक ज़माना एक ज़माने के सिर पर लात रखकर आगे बढ़ जाता है
तब होती है अहमियतों की तकरार 
छपते हैं कार्ड....
संयोजक, सचिव, संरक्षक
प्रेषक, स्वागताकांक्षी, दर्शनाभिलाषी
तय होते हैं मेहमानखाने सभागार
किराये के वाहन
तनते हैं कनात तम्बू-तोरण 
जैसे तय होते हैं मांगलिक-लॉन
हलवाई-राशन.....
होती हैं तैयारियाँ...ख़रीददारियाँ
लड़कियां लिखती हैं पेपर..
और जाती हैं पार्लर 
आमंत्रित होते हैं विचाराधीश-सुधिजन
होता है उबटन-बासन और उनका तेल-तासन 

अंखुवाएं मसों वाले लड़के सीखते हैं गुरु-ज्ञान
सपाट छातियों वाली गुनी लडकियाँ बनाती हैं रंगोली

सयाने छात्र लाते हैं रेलवे-स्टेशनों से वक्ताओं की खेप
जैसे लड़के लाते हैं बारातियों की गाड़ी, परिजनों का सामान
छात्राएँ रखतीं हैं प्रतिभागियों की सूचनाएँ तमाम
ज्यों लडकियाँ लगाती रहती हैं लग्न के दिन के लिए 
सेट कपड़ों-गहनों का..घर भर की औरतों के लिए 

खिचड़ी बाल..बढ़ी तोंदो वाले परिवारी मरद है आयोजक
जो रखता है अपने पास अटैंची की चाभी 
महँगे तगादों की चिकचिक और दुनिया भर के बिल और रसीद, गोप-भरे कमरों की कुंजी

मंच पर आसीन होते हैं नाम-गाम-साम के साथ 
बुद्धिजीवी-बद्धजीवी 
साथ के संगत के लिए 
लहराते आँचल और अदा के साथ 
मंचासीन 
नवेली-अधेड़ भाभियाँ सलहजें और सालियाँ 

कुलगीत-स्वागत गीत गाती
रोली-टीका लगाती हैं सजी-धजी लडकियाँ 
जैसे मंगलगीत गाती हैं प्यार भरी छोरियाँ 

उधर दूर का चश्मा चढ़ाये 
क़ैद अपनी साड़ियों में वरिष्ठ शिक्षिकाएं 
जैसे चाचियाँ मामियाँ मौसियाँ 
कुलगीत-मंगलगीत गाती लड़कियों के करती हैं दुपट्टे ठीक
लगाती हैं पिन
सिखाती हैं बात-बात पर संस्कार
बताती हैं गुर कम ख़र्च में कैसे किया जाता है आयोजन
अतिथि वक्ताओं से ज़्यादा तर्क नहीं किया जाता

कुछ सेवानिवृत्त विचारक भी मौजूद किए जाते हैं हैं
घर के बाबा-दादा की तरह
मोतियाबिंद-चश्मा पहने हुए 
पुराने अनुभवी 

गोतिनें छानती हैं पूरियाँ
छात्राएँ गाती हैं मधुर कुलगीत
छात्र रात-रात जागकर लाते हैं अतिथियों की खेप 
आयोजक सीने से लगाये रखता है छोटा-सा चमड़े का काला बैग 
इसी बहाने सालों बाद सब एक दूसरे से मिलते हैं
नई-पुरानी यादों की गप्प और ठहाके चलते हैं देर रात
हँसी मज़ाक फ़ब्ती-मस्ती

होता है एक मांगलिक अनुष्ठान पूरा 
हफ़्ते भर बिखरा रहता है सामान 
भहरा गए तम्बुओं में इधर-उधर कटी-फटी प्लास्टिक-प्लेटें
निचुड़े हुए गिलास 
बचे-खुचे खाने की बासी नॉस्टेलिजिक गंध
माएँ बांटती हैं साड़ी-उपहार 
जैसे संयोजक बाँटता है पत्र-प्रमाण
●●

                            चित्र- सोनी पाण्डेय
3.

ख़ानदान
----------------
उस औरत की नसें तार की तरह थीं
और उसके सपनों में सुकरात आया करता था
वह उससे कहती कि
दर्शन किताब में बघारना बहुत शौक़ीनी है
गली-चौराहे पर दर्शन आज़माओ तो जाने

एक और पुरानी औरत की नस भी तार की तरह थी
जिसे पागल भगजोगनी कहकर सब भगा देते थे
 गाँव के बहरियार
इसी तरह एक और और पुरानी औरत 
जो नौ में ही ब्याह दी गई थी पैंतीस बरस के आदमी के साथ
जाड़े की सहवासी रातों में निठुर जाती थी सख़त 
तख़त के नीचे छिप जाती थी बच्ची

एक औरत अलापती बीत रही थी
एक औरत सरापती बीत रही थी

उन सब की नसें तार की तरह उलझी हुई थीं गुत्थमगुत्थ।
लाल-नीली चटख चिंगारी दौड़ती थी उनमें
नमालूम किसमें कौन सी रग आवाजाही करती रही

ये सारे तार 
टाइम मशीन की गलियाँ हो गए एक दिन
उन गलियों के ख़ून से जो लड़का हुआ
उससे उस स्त्री को प्रेम हुआ
जिस बहुत पुरनिया औरत की नसें तार की तरह थीं
और जिनमें इलेक्ट्रॉनिक टकराहटों की आवाजाही थी
बेचैन 
लाल-नीली चिंगारियों सी चिटखती
भौतिक
●●

4.

तुम्हारी देह की मैंने खेती की है!


सख़्त बंजर मिट्टी को नम किया 
नन्हें केंचुओं ने ज़र्रा ज़र्रा भुरभुराया है
सुंदर 
तो चींटियों ने मिट्टी में मीठा मिलाया है।
कुम्हारी हाथों ने मेढ़ गढ़े और
मेढ़ से रिसते पानी को सींचने का रस्ता भी बनाया

बढियाई नदी के खर-पतवार छानकर अलग किए हैं
लहरों पर उतराए झाग-फेन किए हैं साफ़
और गहरी सांझ डाल ली है वहीं पर मचान एक।

नाख़ूनों के हल और हथेली के हेंगे से
तुम्हारी देह की मैंने खेती की है
अपने चुम्बनों के रोपे हैं बीज
सीना खोदकर पेड़ लगाया है एक
रानों पर बनाई हैं क्यारियाँ।

तुम्हारी आँखें तितलियों जैसी 
अपने होंठों के फूलों से उन्हें मिलने दिया है।
●●

5.

तुमने बनाए ढाँचे और खाँचे
और उन्हें क़ायदन अलगाये रखने के लिए
निर्मित कीं खपच्चियां और दरांतियाँ
एक खाँचे में किताबें रखीं
एक मे दुनिया
एक खाँचे में परिवार रखा  दूसरे में प्रेम
एक खांचे में दिन रखा और दूसरे में रात
एक में गीत रखे और एक मे दाग़
एक में भूख रखी एक में राग
एक में चतुर-स्पष्टता और दूसरे में लपेट-लाग
एक में बुद्धि जमाई तो दूसरे में हृदय चपोत कर ही रख दिया
जितने ही खण्ड किए तुमने जीवन के
उतना ही विखण्डित होता गया तुम्हारा चेहरा
पिकासो की पेंटिंग की तरह
आँख कहीं छितराई पड़ी है
और होंठ क्षत-विक्षत फटकर फेंका गए हैं 
टांगे कहीं बिखरी हैं तो बाँह उखड़कर उधर निर्जीव पड़ा है
बटोर सको तो बटोर लो अब भी आत्मा की नसें
और उनका ऊन का गोला बनाकर 
दे दो उन्हें 
जो जीवन की सलाई पर बुनाई का गीत गाते हैं।
●●


                           चित्र- सोनी पाण्डेय
6.

जे.एन.यू की लडकियाँ


उनके कमरों में ज़रुरत के ज़रूरी सामान के साथ 
कभी नियत नहीं होता किसी मंदिर का स्थान
वे उत्सव की तरह कभी नहीं मनाती उपवास
उन्हें याद तक नहीं रहते तीज-त्यौहार तक

आदत में शामिल है उनका मुँह पोछ लेना
आस्तीन से..
कुर्ते के कोर से.
उनके झोले में नहीं मिलता
कढ़ाईदार तहाया हुआ रुमाल

अक्सर तो वे बाल भी ठीक से नहीं बनातीं 
जाने क्या तो सुख मिलता है उन्हें उड़ते रहने देने में
और कौन सा सुकून इस बेतरतीबी में!
उनके बटुए में नहीं मिलती कोई कंघी
किताबों में मिलता नहीं कोई सूखा गुलाब

सलवार-दुपट्टे के रंगों की समरूपता का सौन्दर्य
पल्ले नहीं पड़ता उनके
वे विरूप-समरूप के करती रहती हैं कई प्रयोग 
उनके दुपट्टे शायद ही कभी मेल खाते हों 
उनके कुर्तों से

अजीब है कि
झुकती हुई वे कभी नहीं छापती हथेलियाँ
अपनी छातियों पर
अलार्म-घड़ियों के खौफ़ से दूर
वे समय-कुसमय खूब सोती है निश्चिन्त
इस शर्त पर भी कि-
मेस से छूट जाये तो जाये उनका खाना

घुटने और कुहनियाँ समेट, दम साधे, एक बराबर
वे नहीं संभाल पातीं हैंडल
चलाते हुए बाईक
वे मुख़ातिब होती हैं सीधे हवा से

दीवारों पर इनके टाइम-टेबलों की 
नहीं होती क़तार
अपने स्वयं के समय पर वे बिखराए रहती है
अनगिनत क़िताबें, चित्र और पन्ने
पाँव फैलाये पूरी जगह लेकर
धूल पर बैठी पढ़ती हैं वे इतिहास
इसलिए गुमटी में बैठ 
ख़ूब निठल्ली रहती हैं वे भरे बाज़ार

तयशुदा वक़्त और जगह पर
नहीं मिलेंगी वे 
ना ही सुई की नोंक के हिसाब से
चलती ही मिलेंगी आपको
उनमे और आपमें यही जैविक फ़र्क है।
●●

7.

1】
मेरी कोख में पला वह मेरा पहला प्रेमी है
धूप में लेटा तेल में चुपड़ा 
बिल्कुल वस्त्रहीन नन्हा-सा मर्द
जिसकी देह से पुराने सरसों की गंध आती है
चिहुंक चिहुंक कर देखता है हर चीज़
गति और लय पर एकाग्र
नारीवाद की किताबों के बीच नन्हें क़दम रखता
उनके बीच धीरे धीरे
लोग-बाग, जंगल-जीव, कीड़े-मकोड़े, पेड़-पत्ते, 
छोटे-छोटे इतिहास और अर्थशास्त्र की
आहिस्ता-आहिस्ता अपनी किताबें खोंसता है।

【2】
स्कूल जाने के पहले
बिस्तरे पर खड़ा जब वह बनियान पहनता
दोनों की किताबों की तरह
दोनों के क़द बराबर हुए जाते हैं
हमउम्र और साथी सा!
रस्तों की आवारा भटकन में
वह कितने ही सवाल पूछता जाता
ढाबों और सड़क-पट्टी दुकानों पर जो लोग इतना 
खाना बनाते हैं
वही खाना वे ख़ुद क्यों नहीं खा लेते!
इतने सारे तो बैंक हैं रास्ते भर
तो सभी लोग बैंक से पैसा क्यों नहीं ले लेते!
घर के बिल्कुल अदृश्य रह गए कोनों में बैठकर खेलता
मना करने पर कहता
कि इन जगहों पर कोई नहीं बैठता
इसलिए यहाँ बैठता हूँ
और आपको पता है !
इस छूट गए कोने से देखने पर हमारा घर
एकदम दूसरे एंगल से दिखता है।

【3】
अक्सर वह छोटे-छोटे पौधों के बीच
चटाई डालकर पढ़ने बैठ जाता
पढ़ते पढ़ते जाने कब ज़मीन से पेट के बल चिपककर 
पौधों के पेड़ होने की कल्पना करता
उसने बताया कि कुछ चीज़ों को देखने के लिए
ज़मीन से लिपट जाना होता है
इतना छोटा हो जाना होता है कि पौधों के इर्द गिर्द
चींटी बनकर आज़ाद घूमना होता है
मिट्टी में बिल बनाकर रास्ता खोज लेना होता है
जंगली ख़रगोशों की तरह तहख़ानों के भीतर से
हवा की गंध को सूंघ लेना होता है
उसने बताया कि दुनिया का एक जीव समुद्री घोड़ा
नर अपने बच्चों को अपने पेट से पैदा करता है
और यह कि
माँ-पेंग्विन अण्डा देने के बाद समुद्र में चली जाती है
सारे पिता-पेंग्विन ही बच्चों को बड़ा करते हैं
शेर कुछ नहीं करता
थोड़ा बहुत बच्चों की देखभाल भर करता है
और बच्चे शैतानी करें तो मार तक देता है उन्हें
सारा काम शेरनियां करती हैं
वे बहुत मेहनत से शिकार करती हैं
लेकिन शिकार में पहला हिस्सा शेर का
दूसरा बच्चों का और भोजन का तीसरा हिस्सा उन्हें मिलता है
उसने बताया कि 'लॉयन किंग' नाम ग़लत है
और इस फ़िल्म का यह डायलॉग सबसे ख़तरनाक है
कि 'लकड़बग्घों का पेट अंधा कुंआ है'
लकड़बग्घे काले हैं और इतने भूखे हैं कि
शिकार की मजबूत हड्डियां तक चबा जाते हैं
फिर भी भूखे रह जाते हैं
और जाने कितनी ही बातें
इस दुनिया के समानांतर उसने बना ली एक दूसरी दुनिया बिल्कुल जीवित जंगल 
जहां जानवरों के बीच 
उसके खिलौनों में शामिल थे घर के टूटे फूटे समान
फटे हुए दफ़्ते और फ़ोम
टूटी हुई कलमें, कटी फटी पेंसिलें
फेंकी हुईं रस्सियां, टूटे हुए तार
फेंक दिए गए छोटे छोटे धागों के सिरे
घर का कबाड़ जीवित रहता था उसके पास
एक तो छोटी-सी सन्दूकची भी थी
जिसमे गैंडे की टूटी हुई नाक
हाथी की कटी हुई सूंड या एक कान
बाघ की कोई पूंछ
किसी चिड़िया की नन्ही चोंच
डायनासोर की उखड़ी हुई टांग
सहेजी हुई उस संदूकची को कभी-कभार वह खोलता
इस इंतज़ार में कि एक दिन
इन सब को गोंद से जोड़ दूंगा।
●●

                         चित्र- सोनी पाण्डेय
8.

जद्दनबाई ज़िद्दी-धुनी कलाकार
एक साथ न जाने कितने काम कर रही थीं
वे गीत लिख रही थीं, गा रही थीं-बजा रही थीं
नाच रही थीं घूम-घूमकर
अभिनय, निर्देशन सब एक साथ करना पड़ रहा था उन्हें
और न जाने कब कितने ही वाद्य-धुन-मुद्रा-संवाद इन्हीं प्रयोगों में ईजाद होते गए
रजवाड़े संगीत से उपजे इस लोकप्रिय शून्य को कुछ सांस लेने भर की तैयारी में
नाच-गाने की इस दुनिया को कला के जोखिम तक ले आने रुपहले पर्दे पर कौन नाचता-गाता उन दिनों

तब शमशाद हिन्दी फ़िल्म की सचेत पार्श्व गायिका हुईं
नूरजहाँ और सुरैया को गायिका कहें कि नायिका!
वे दोनों ओर आवाजाही करती रहीं

एक लोकप्रिय कला को जिन्होंने मुसलसल किया
हिन्दी-हिन्दू के भयावह साए में चलने वाले लोग
उनके इतिहासों से मुसलमान छान रहे हैं

हिन्दी ही नहीं 
हिन्दू फिल्मों की नायिका भी वे ही रहीं हैं
पहले पहल धरम-पुराण को चाँदी के पर्दे पर उतारते हुए
वे एक बनते-बिगड़ते देश के निर्णायक मुहाने तक पहुँची अपने किरदारों में
माहजबीं बानो और मुमताज़ ज़ेहन बेग़म
हाँ!वही!
मीना कुमारी और मधुबाला!
उनकी घुंघराली लट ही मत देखिए फ़िलहाल
छोड़ दीजिए आँचल निचोड़ती उनकी मुस्कान को दम भर

नसीम बानो हिन्दी सिनेमा की पहली सुपरस्टार हैं
'ब्यूटी क्वीन' ही नहीं हैं वे
तीस के दशक में जब
फिल्मों में रामलीला की तरह 
औरत के क़िरदार के लिए मर्द को चिकना-चिकनाकर
फिट किया जा रहा था
तब नसीम बानो तलाक़ पर सिनेमा कर रही थीं!

याद हैं मुग़ल ए आज़म की निग़ार सुल्ताना का दमकता ग़ुरूर?
'किसी दिन मुस्कुराकर ये तमाशा हम भी देखेंगे'!
बस!उसी ग़ुरूर के कारण
वे खलनायिका दिखाई पड़ती थीं
कुछ ऐसी ही रहीं मीनू मुमताज़ भी
'साकिया आज मुझे नींद नहीं आएगी'
घरतोड़ू औरत!

और शक़ीला के तो कहने ही क्या
'सी.आई.डी' में मोटर चला रहीं हैं
एक ज़ुबैदा बेग़म भी रहीं उन दिनों
जिल्लो बानो, अमीर बाई, रशीद अशरफ़, मुनव्वर सुल्ताना।
जिस 'आलमआरा' को हम इतिहास बनाये बैठे हैं
पहली बोलती फ़िल्म!
उसकी बुनियाद में रही हैं ये सब स्त्रियां
रुपहले पर्दे पर जिनकी अदाएं सभ्य-सुख देती थीं
लेकिन सभ्य-सुख के सभ्य-बाज़ार को बेधकर
भारतीय सिनेमा की पहली स्त्री-निर्देशक फ़ातिमा बेग़म हैं

निम्मी यानी नवाब बानो के चरित्र तो अक्सर ही सिनेमा के नायक को  सहेजने-संभालने के लिए बनते थे
दूसरी औरत
सेवादार औरत
कामगार औरत
मुख्य नायिका की पूरक क़िरदार बनकर
जो मुख्य और हाशिए का भेद बहुत धीमे से बता देती थीं

'प्यासा' में दो ही तो थामे रहीं कवि गुरुदत्त को
वहीदा रहमान और कुमकुम उर्फ़ ज़ैबुन्निसा
दो नाचने गाने वालियों ने
कवि की मौत पर महाभोज करने वालों के बीच
कविता को वहीदा रहमान ने ग़रीब नाचने वाली के क़िरदार में क्या ख़ूब बचाया

और श्यामा!!
वे ख़ुर्शीद अख़्तर रही हैं
उनके बिना पर्दा कभी पूरा नहीं पड़ता था
अगर ताजमहल याद पड़ती हो तो
ज़हीन-सी वीना यानी तजौर सुल्ताना
और ज़बीन जालिल का
प्रशांत चेहरा भी याद हुआ जाता है

सुसंस्कृति में यह सब नाच गाना से 
ज़्यादा नहीं था
तो भला अच्छे घर की स्त्री पर्दे पर इस तरह कैसे नाचती!

देविका रानी, कानन देवी और दुर्गा खोटे
जैसी कला-सुघड़ता बनने के पीछे 
हिन्दी सिनेमा के उस आड़े-गाढ़े वक़्त में 
वे ही थीं जो न जाने क्या तो कर रहीं थीं
कि जिनके कारण आपको अंततः 
नाच-गाने को कला का नाम देना पड़ा

चूंकि इधर नाम बदलने का चलन ख़ूब ज़ोरों पर है तो
कह दूँ कि
नर्गिस भी भारतमाता का एक चेहरा हैं
दृश्य से अलोप हो गए मर्द की परवाह छोड़
कंधे पर हल थामे
ग़रीब, ख़ुद्दार और मेहनतकश
जिनका नाम फ़ातिमा रशीद है।
●●

9.

तख़्तापलट

सत्ताशाह वे ही नहीं थे
जिन्होंने जला दिए पुस्तकालय
किताबों के वरक़ जिन्हें 
अपनी मौत के फ़रमान लगा करते थे।
किताबों की जिल्द के कोने जिनकी छातियों में धँसते थे
किताबों को जलाने वाले
इतिहास के मूर्ख हत्यारे थे जिन्होंने
ग़ैर-किताबी दुनिया के नक़्शे खींचे।

फिर धरती घूम गई
जंगलों की खेती की गई
जवान पेड़ों को निर्बाध काट दिया गया सरेआम
नदियों के गले मरोड़ दिए गए
और उनकी लुगदी बनाकर किताबों की खेप तैयार की गई

किताबों की ताजपोशी हुई
किताबों के महोत्सव हुए
किताबों के युवराज चुने गए
युवराजों ने तलवार उठाई पुराने सत्ताधारी के ख़िलाफ़
और ख़ुद सत्तानशीन हो गए।
●●

10.

घरिनी का घर भूत का डेरा


उसकी रसोई में एक ही कढ़ाई है
बड़ी बार वाली
दो हत्थों वाली 
राख से ख़ूब रगड़ रगड़ कर माँजी गई
गोल खुरदरी चित्तीदार चमकती हुई

उसमे वह सब्ज़ी पकाती है
दाने, फलियाँ बीज पत्तीदार सब
भून भूनकर
तरीदार
फिर धो पोछकर उसी में 
देर तक पकाती है धीमी आँच पर कभी कढ़ी
उड़ेलकर उसी कढ़ाई से फिर
वह उसमे कभी छान लेती है पूरियाँ पकौड़े 
बच्चो के लिए पापड़ बड़ी और जाने क्या क्या

फिर खौलते तेल को पलट देती है किसी दूसरे बासन मे
झट ठण्डा पानी डालकर तुरत 
इतनी गुनी कि
माँजकर दुबारा इस्तेमाल लायक बना लेती है
रात के खाने के लिए तैयार कर लेती वही बर्तन बार-बार
गहमा गहमी के घर में
कई बार तो दूध भी उबाल लेती है उसी में

अब उसे क्या पता कि
एक महान कवि प्रतीक-उपमा रच गया है
महान उक्ति
'कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है'

घर जब सो जाता है 
राख-अंधेरे में
उसकी रसोई में खरोंचदार कढ़ाई के दो हत्थे
दो आँखों की तरह निर्निमेष चमकते हैं 
रातभर
●●

                                वन्दना चौबे

परिचय

 वन्दना चौबे
कवि और आलोचक
नया ज्ञानोदय, वागर्थ, आलोचना, प्रगतिशील वसुधा, बनास जन, हिन्दी समय, संबोधन और अपूर्वा पत्रिकाओं में समय समय पर लेख/साक्षात्कार आदि प्रकाशित।
 कविता-संग्रह की योजना।
बनारस के दो सौ वर्षों के रचनात्मक इतिहास पर बेहद पठनीय उपन्यास 'बहती गंगा' पर आधारित शिल्पायन प्रकाशन से संदर्भ-पुस्तक 'बहती गंगा में काशी' 2009 में प्रकाशित।

 संप्रति बनारस के आर्य महिला पी.जी. कॉलेज (BHU) सहायक प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत।
 [9532773542]
jnuvandana@gmail.com

समकाल : कविता का स्त्रीकाल -19

बिहार की मिट्टी से इन दिनों कविता में स्त्री स्वर तेजी से मुखर है,गाथांतर पर उपासना झा,नताशा के बाद सीमा संगसार तीसरा नाम हैं कविता की इस कड़ी में जो बिहार की युवा स्त्री कविता का प्रतिनिधित्व कर रही हैं।विचार सम्पन्न एक्टिविस्ट कवयित्री सीमा की कविताओं में स्त्री मुक्ति और चेतना के स्वर तीव्रता से मुखर हैं।वह पितासत्ता से सीधे मुटभेड़ करती हैं और सवाल दर सवाल पूछते लिखती है-

मैने तो चाहा था
बस प्रेम !
जो तुम योद्धाओं के शब्दकोश में
था ही नहीं 
मैं प्रेम को खंगालती रही आजीवन
तुम्हारे सपाट वक्षों में
लेकिन मुझे मिला भी क्या 
वही नीति वचन
और /कोरे आदर्श
कुंती के बनाए कठोर नियमों पर चलने वाले
पंच तपस्वियों का संग ....

इन दिनों तेजी से स्त्रियों की आदर्श नायिकाओं के चेहरे बदल रहे हैं,वह पौराणिक स्त्री पात्रों से शिक्षा ग्रहण करने की जगह अपनी नायिका सावित्रीबाई जैसे जीवन्त और प्रमाणिक व्यक्तियों को मानती हैं।वह इतिहास और पुराण के झाले साफ कर उन पौराणिक नायिकाओं पर फिरसे कलम चला रही हैं जिन्हें केवल पितासत्ता के उपभोग हेतु प्रस्तुत किया गया,आज की कवयित्रियाँ इन नायिकाओं का पुनर्पाठ कर नवीन पाठ प्रस्तुत कर रही हैं।सीमा अपने समृद्ध सांस्कृतिक, साहित्यिक कस्बाई शहर बेगुसराय के लोक जीवन के विविध पक्षों को उकेरनेवाली स्त्री कविता का संवेदनशील स्वर हैं।


(1)
 पांचाली का प्रेम ....
....................................
मैने कब चाहा था कि
तुम मेरा पाणि ग्रहण करो
एक फल की भांति
और /  बांट लो मुझे
अपने भाइयों के बीच ....

मैने तो चाहा था
बस प्रेम !
जो तुम योद्धाओं के शब्दकोश में
था ही नहीं 
मैं प्रेम को खंगालती रही आजीवन
तुम्हारे सपाट वक्षों में
लेकिन मुझे मिला भी क्या 
वही नीति वचन
और /कोरे आदर्श
कुंती के बनाए कठोर नियमों पर चलने वाले
पंच तपस्वियों का संग ....

प्रेम की अग्नि से 
उत्पन्न हुई
मैं पांचाली
वेदों और ऋचाओं में
ढूंढ़ती रही
प्रेम की परिभाषा
लेकिन मुझे तो मिला 
एक अभिशप्त जीवन
प्रतिवर्ष शयनकक्ष बदलने का 
ताकि तुम बारी - बारी से
करते रहो भरपूर उपभोग मेरा ?
लेकिन ये मत भूलो
कि मैं केशमुक्तिनी
प्रतिशोध की ज्वाला में
दहकती हुई एक असीम अग्नि पूंज भी हूँ....

मैने अपनी नियति को 
गर सहर्ष स्वीकारा है तो
काल के उल्टे पहिए को 
परे धकेला भी है ...

मैं तुम्हारे द्वारा बनाई गई 
तय प्रतिमानों में ढलने वाली
कोई पंचकन्या नहीं 
ना ही मैं 
किसी और की लक्ष्मण रेखा लांघने वाली सीता हूँ ...

मैने अपनी सीमाओं को 
खुद गढ़ा है / खुदके परिप्रेक्ष्य में
अपनी सीमा में
किसी और का अतिक्रमण 
मेरे लिए अस्वीकार्य है ....

मेरे लिए प्रेम 
किसी जाति - कुल की मर्यादा का प्रश्न नहीं 
एक ताप था
जिसे मैने देखा था
कर्ण की दहकती आँखों में ...

सुनो पांडव
तुमने कोई स्वांग नहीं रचा
मेरे लिए
छल तो मैने किया 
तुम्हारे साथ
आजीवन कर्ण को अंगीकार करके ...

युधिष्ठिर
तुम्हें क्या लगा था 
कि तुमने मुझे
दांव पर लगा दिया था
अपनी संपत्ति समझ कर 
तो शायद तुम भूल रहे हो 
पासा तो उस दिन मेरे हाथ में था 
और तुम सब के सब मोहरे बने
मेरे ही बिछाए चौसर के ....

शिव ने तो
समेट लिया था
गंगा को अपनी जटा में
लेकिन मैने तो खोल दिया था उसे 
क्योंकि तांडव करने की बारी
अब मेरी थी ....

मैने ललकारा 
अपने स्त्रीत्व को 
अपनी काल की सीमाओं से परे जाकर 
ताकि स्मरण रहे 
किसी स्त्री ने भी भरा था 
हुंकार
महाभारतकालीन युग में ....

                                          चित्र-आरती वर्मा

(2)
कैफेटेरिया...
..........................
खुले बालों को समेटती हुई
टैब पर फिसलती अंगुलियों से
शहर भर का ट्रैफिक कंट्रोल करती हुई
फूल वाल्यूम म्यूजिक को
हेड फोन से मिनिमाइज करती हुई
जिन्दगी जीने का हुनर सीखती हैं
ये आज की वुमनिया ....

लव - ब्रेकअप के डिप्रेशन को
कोकाकोला के साथ गटकते हुए
चबाती हैं धीमे - धीमे उन इमोशंस को
पित्जा के स्वीट कार्न की तरह ...

सोशल मीडिया पर सर्वाइव करने वाली 
ढूंढ ही लेती हैं अपने लिए
साइबर कैफे का एक कोना 
चिल्ड होकर करती हैं दुनिया जहान की बातें
बॉस की किटकिट को भून लेती हैं
कुरकुरे स्नैक्स की तरह ...

कहानियों व कविताओं की पूरी डिक्शनरी को
कोहनियों में समेट कर रचती है अपना संसार
फैमिली और वर्कआउट्स के साथ जंपिंग करती हुई
वीकेंड का करती हैं इंतजार साथ गुजारने के लिए ..

छोटे से आंगन को समेट कर 
पृथ्वी के नक्शे पर थिरकती हुई 
यह वुमनिया खुद.एक कैफेटेरिया बन चुकी हैं
सुकून के दो पल और चेहरे पर चौड़ी सी मुस्कान
उनके उमगते सपनों के लिए काफी है ....


                                         चित्र- आरती वर्मा

(3)
बदनुमा दाग ...
........................

जब आप किसी स्त्री के 
बदन पर
गर्म चाय की प्यालियां
उङ़ेलते हो
तो वह चाय नहीं
अपनी कुंठा , क्षोभ और अपने पौरुष को
उङ़ेलते हो ...

इससे पहले कि आप
उङ़ेल दो 
उसके चेहरे पर 
दहकता हुआ चाय
वह बदनुमा धब्बे के साथ
अपनी सत्ता को स्थापित कर चुकी होगी ..

कि स्त्रियां चेहरे की नहीं 
अपनी पहचान के लिए आतुर है ...



(4)
उल्टे पाँव

----------
कहते हैं 
उल्टे होते हैं 
भूतनी के पाँव
क्यों न हो
उल्टे पाँव वापस जो आती हैं 
स्त्रियाँ 
सीधे शमशान घाट से---


सौ व्रत व पुण्य भी
जो कमाया उसने जिन्दगी भर
आरक्षित न करा सकी 
स्वर्ग में 
अपनी जगह
अधजली लाश
फंदे पर झूलती औरतें 
कहां छोड़ कर जा पाती है ?
अपनी यह दुनिया 


प्रसव पीड़ा से कराहती
ये औरतें भी
वापस आ जाती हैं 
उलटे पाँव
अपने दुधमूंहे बच्चों के पास
घर की चारदिवारी 
जो कभी लांघ न सकी
सीधे पाँव
अपनी जिन्दगी में
बरबस खिंची चली आती है
स्वर्ग लोक से
उल्टे पाँव---

लोग जो डरते नहीं जीते जी
औरतों से
डरावनी हो जाती हैं 
ये औरतें 
मरने के बाद
चूड़ैल बनकर करती हैं 
अट्ठाहास
शमशान घाट से
उल्टे पाँव भागी हुई औरतें ----

                                              चित्र-आरती वर्मा

(5)
ऐ स्त्री तुम्हारा नाम क्या है ?

तुमने मुझे 
बोलने से रोका
मैं मौन हो गई
बुद्ध की तरह...

तुमने मुझे 
पढ़ने से रोका
मैं बना ली दूरी किताबों से
पढ़ने लगी कोई धार्मिक ग्रंथ
जिसे तुम ले आए थे मेरे लिए
शादी की पहली ही वर्षगांठ पर 
मेरी नास्तिकता को समझते हुए ....

तुमने मुझे
लिखने से रोका
मैने प्रवाहित कर दिया नदी में
अपनी कविताओं को
उतारने लगी अपनी डायरी के पन्नों पर
मसालेदार रेसिपीज ...

तुमने मुझे
सभा सम्मेलनों में जाने से रोका
मैने बाहर निकलना छोङ़ दिया
मेरे कदम खुद - ब - खुद 
मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ने लगे ...

तुमने मुझे
हँसने पर रोका
मैने हँसना छोङ़ दिया
मैं सीखने लगी 
मुस्कुराने की तहजीब ....

तुमने मुझे
मर्यादाओं के बंधन में बाँधा
मैं ढूँढने लगी
अपने हिस्से की नियमचर्या..

तुमने मुझे 
प्रेम करने से रोका
मैने जीना छोङ़ दिया
मैं अब वह कठपुतली भी न रही 
जिसे जैसे चाहो
तुम नचा सकते थे
मैं तो बस अब एक
गंध मारती लाश हो गई हूँ
जिसे तुम जितनी जल्दी हो सके दफना दो 
यह तुम्हारे हित में है ....

मैं इस एक जन्म में
न जाने कितनी बार 
शमशान घाट गई / जलाई गई...

तुमने मुझे 
जितनी बार अलग - अलग तरीके से मारा
मैं उतनी ही बार 
वापस लौट आई
इसी शहर में
फिर से तुम्हारी पत्नी / माँ / बहन / प्रेमिका और बेटी बनकर .....

                                                 चित्र-आरती वर्मा

(6)
 एक स्त्री का काम पर लौटना ...


एक स्त्री
जब काम पर लौटती है 
भूल जाती है 
भगोने पर रखे
खौलते दूध को
उसे याद रहती है तो बस
अपनी उफनती हुई दिनचर्या ....

एक स्त्री 
जब काम पर लौटती है
वह कङ़क होने लगती है 
धीरे - धीरे
कलफ लगी सूती साङ़ी की तरह 
जिसके क्रीच पर 
टिका होता है 
उसका अस्तित्व ....

एक स्त्री 
जब काम फर लौटती है 
भूल जाती है 
घर का वह कोना 
जहाँ वह एकांतिक क्षण पाती है 
उसे तलाशनी होती है
लोगों और भीङ़ के बीच
अपनी स्वतंत्र अस्मिता ....

एक स्त्री 
जब काम पर लौटती है
वह दबा देती है
अपनी देह की गंध को
डियो के चंद स्प्रे से ....

एक स्त्री 
जब काम पर लौटती है
तो वह अपने स्त्रीत्व.का 
बना डालती है
एक नया क्लोन ...

एक स्त्री काम पर जाती हैं घर लौट आने के लिए .....



                                                   चित्र-आरती वर्मा
(7)
बंद  दरवाजे  और  खुली  खिड़कियां


कुंडियां लगा दी जाती हैं
बंद दरवाजों में
उसके बाहर निकलने के
सारे रास्ते 
बं हो जाते हैं
फिर आहिस्ते से वह 
खोलती है
अपने दिमाग की खिड़कियां
जब वह भोग रही होती है
अपने एकांत को ...
विचारों की कई लड़ियां
मछलियों की तरह 
फिसलती जाती है
और वह
लगा रही होती है 
गोता उनके साथ 
बहते पानी में...

दरवाजे बंद हो तो क्या 
खुली खिड़कियों से 
ताजी हवा के झोंके
अंदर आ ही जाती हैं ...
5 तुम्हें होना था नागफनी ...
...................
तुमने आकाश की
लंबाई - चौङ़ाई को
मापना चाहा 
अपनी कोमल बेल -लताओं से 
काट दिए गए 
निर्ममता से 
तुम्हारे जङ़ 
खुले बालों की तरह 
कैंची से 
खपचते हुए ....

तुमीने धरातल की
गहराइयों में
उतरना चाहा
अपने वजूद को 
दृढ़ता प्रदान करते हुए
उखाङ़ दिए गए
तुम्हारे सारे अरमान
समूल / सहअस्त्तिव के साथ ...

तुमने प्रेम किया
धरती के सुंदर लोगों से
उन्ह़ोंने रौंद डाला तुम्हें
अपने ही कदमों तले
कि तुमने जन्म लिया
एक मायावी लोक में 
जहाँ दिखने वाले 
सभी सुंदर चेहरे
एक दिन बदल जाते हैं 
दानवता में ....

सुनो लङ़की
तुम्हें होना था नागफनी
जिसे छूते ही
लहूलुहान हो जाएं
इंसान
तुम्हें धरती पर नहीं
उगना था किसी पत्थर पर
और / सारे थपेङ़ों को
झेलना था 
हँस - हँस कर 
कि तुम इस अंधकारमय सृष्टि की 
एक सुंदर रचना हो ....

                                                      सीमा संगसार

आत्म परिचय ... नाम - सीमा संगसार 
 पता -फुलवड़िया १ , बरौनी , बेगुसराय , (बिहार) 
शहर का जिन्दा होना (कविता संग्रह)- लोकोदय नवलेखन सम्मान (लोकोदय प्रकाशन)
कहवाघर - कविता संग्रह ( अभिधा प्रकाशन)
अब तक प्रकाशित : अंतरंग, नया ज्ञानोदय , नया पथ , लहक , लोक विमर्श , दुनिया इन दिनों इन्द्रप्रस्थ भारती (हिंदी अकादमी ) ,लहक , मंतव्य सहित हिन्दुस्तान समाचार पत्र व कई अन्य पत्रिकाओं और शब्द सक्रिय हैं , स्त्री काल पहली बार आदि ब्लॉगों में रचनाएं प्रमुखता से प्रकाशित ... संपर्क – 9304268005
 ई मेल – sangsar.seema777@gmail.com


नोट- पोस्ट में प्रयुक्त सभी चित्र युवा चित्रकार आरती वर्मा के हैं।

बुधवार, 2 फ़रवरी 2022

समकाल :कविता का स्त्रीकाल -18

कवि /चित्रकार वाज़दा खान समकालीन कविता में उस समुदाय का प्रतिनिधित्व करती हैं जहाँ औरतों की आज़ादी एक मुश्किल सवाल है।मुस्लिम समाज में आज भी पर्दा प्रथा से लेकर तमाम ऐसी रूढ़ियाँ हैं जिसके तहत औरतों का मुख्य धारा में शामिल होना कठिनाइयों और चुनौतियों से भरा हुआ है।
वाज़दा खान की कविताओं का मूल स्वर प्रेम है,प्रेम के विविध बिम्ब बड़ी सजीवता से जीवन के कैनवास पर बिखेरनेवाली वाज़दा की कविताओं में प्रेम कहीं ऐन्द्रिक है तो कहीं विराट से टकराकर अपने वजूद को खोजने की अकुलाहट।                                                               


* जो सच नहीं*

तुम्हारे तलघर में सिमटा प्रेम
थोड़े समय में थोड़ा सा जीवित था
कितना पारदर्शी था 
दूर तक फैले समन्दर की तरह अथाह

बहुत सारी चांदनी रातों में
हरसिंगार के फूलों सा झरता
राग राग में बजता
फैल गया एक दिन 
काग़ज पर गिरी रोशनाई सा

छलछला आई नमी जड़ों में
शाखें पत्तियां टहनियां बेसुध होती गईं
कितने सवाल दस्तक देते रहे समय को
समय न पिघला
पिघलती रहीं शामें

पीती रही आंसुओं सा हर रात
बहती रही तुम्हारी संवेदना
जो सच नहीं कि किसी डोंगी में सवार
लाल सागर से लेकर काला सागर तक।


                                                                   
* मिथ्याभासित जगत*

एक साथ पड़ती 
पगडंडियों की कितनी मधुर 
थापें हैं मेरे भीतर 
कोई गणित नहीं कुछ भी प्रतिशत में नहीं
बस सितार की प्रतिध्वनियां 
प्रेम राग की मजलिस नज्में 
और गहन संवेदनाओं से लिपटीं 
चकित सी मासूमियत 

कैसा अनाधिकृत प्रवेश हो गया था 
बिलबिलाते दुख में माया का
कि जब तुम जल बिन छटपटातीं मछली हो गईं 
रख दो तुम अपना दुख मेरी हथेली पर 
काल की अग्नि में स्वाहा करने को 
छोड़ आऊंगी तुम्हे वापस जल में 
कुछ तो निशान बनेंगे
तुम्हारे छोटे-छोटे पंखों में 

गुजरोगी जब तुम नई-नई गाथाओं से 
हो सकता है कि तब 
शायद तुम खुद को पहचान लो कि 
ये जगत तो मिथ्याभासित है।



*इतिहास गवाह होगा*

अविश्वास की किताब पर दर्ज
तमाम तारीखें
तुमने अपने हाथों से लिखी 
फिर तुम्हीं ने उस पर टीका लिखी
जो दर्ज है हर पेड़ पौधे पर
पत्तियों की उभरी नसों पर

जन्मों तक चलेंगी टीका क्योंकि
इन्हें दर्ज होना है इतिहास में 
आने वाली सदी के लिए

इतिहास गवाह होगा





* रेगिस्तान *

आसमानी हवाओं का रुख 
मोड़ना ही होगा
दुआएं
यही एक मात्र रास्ता है
जैसे-जैसे लतर बढ़ती गई
वैसे-वैसे आसमान पीछे हटता गया

गिरी थी औंधे मुंह
मुरझा गई थी लतर सारी
मासूम पत्तियां
इतरा रही थी कल तक
चांद की शोख अदाओं पर

सच स्वीकार कर लेना था मुझे वहीं
जहां से शुरू हुई थी नदी
रेतीले जज्बातों के संग

तय है थार के
मरुस्थल से भी बड़ा
एक रेगिस्तान है भीतर
जो फैल जाएगा जो तुम्हारी आंखों की
नमी तक।।  

    
***********************


                                                                                                                             
 -*दौड़ मत लगाना *-

पागलों की तरह
अब दौड़कर मत आना
बादलों से ढके हो तो उन्हीं के साथ
बातें करना
सूरज तुम्हारे आगे हो तो अपने समय का
इन्तजार करना
मगर दौड़ मत लगाना

झील में तमाम सीपियां इकट्ठी हो जाएं
इन्तजार करें तुम्हारा युगों तक
तुम आराम से सितारों के संग आना
पर दौड़ मत लगाना

धरती अंगड़ाई ले और खिल आएं
उसमें हरसिंगार के फूल
सुगन्धित हो जाएं एक-एक नक्षत्र
फूलों का रंग जब तक नारंगी न हो जाए
तुम दौड़ मत लगाना

टहनी-टहनी, शाख-शाख पर
खिलती रहें तितलियां, धरती रहें अपने पंख
बादल-बादल पर
तुम देखते रहना वहीं से सारा
नजारा पर दौड़ मत लगाना 
जब तक कि इन्द्रधनुष आकाश में न छा जाये

रात अंधेरी हो
जुगुनूओं से काम न चले
पांवों से लेकर हृदय तक में हो जाए
जख्मों के निशान
पर तुम उगना नियत समय पर
मगर मेरे लिए तो तुम
बिल्कुल भी दौड़ मत लगाना

संचालित हैं तुमसे
न जाने कितनी जमीनें, 
मैं किसी गोल पृथ्वी का 
केवल एक छोटा सा कण
 
बस तुम्हारे सूक्ष्म रूप की परिकल्पना ही
सुरक्षित है 
किसी बयां के घोसले में

नजदीक आओगे जो 
चमत्कृत हो जाएंगी प्रतीक्षारत आंखें
सुनहरा हो जाएगा आकाश
नन्हें से घोसले में

मगर कहां समा पाओगे तुम
अपने विराटतम रूप में 
इसलिए अपनी इच्छा के विरुद्ध
कदापि दौड़कर मत आना।

                                        






      **वास्तविक समय में अवास्तविकता**



  मशाल की असंख्य गूंज थी
मछली की आंख में
और कुलांचे मारती कोई प्रतिध्वनि
खुले आकाश में

क्रमश: रोशनी के विलीन हो जाने के क्रम में
जरूरतों का कोई जिस्म नहीं था वहां
न रूह कैद थी
हद सरहद से परे 
अनियन्त्रित

कई बार सफल होती
चक्रवात और नमी के बीच
असंख्य बार असफल भी
पूरी दुनिया के चांद के
बढ़ने घटने और छुप जाने के क्रम में

अपने वास्तविक समय में अवास्तविकता से उलझी
क्या सचमुच साजिश थी?
या किसी अन्धकार युग की दास्तान
न चाहते हुये भी निराशा के अदृश्य संजाल में
फंसे रहने को विवश
छोड़ देती जन्नत और दोजख के बीच
किसी रास्ते की उम्मीद।




*******************************


अन्तर्कथाएँ


                            
 हृदय की अन्तर्कथाओं में पसरे
अन्धकार से निकलकर
कल देखा था
चांद को
सुर्ख अंधेरी रात पर
भरपूर उजाला फेंकते 
अपने संपूर्ण वजूद (गोल चांद) से

तुम उसी रूप में पहली बार आए थे
ब्रह्मण्ड की पहली रात के पास

आते ही रहे फिर

तुम रूप अरूप धरकर
दर्ज होते गए तुम अपनी
तमाम सरगोशियों 
फुसफुसाहटों की मजबूत
अदृश्य उपस्थिति के संग
उन तमाम काली रातों में
जो धरती की दरारों में
शिद्दत से समाई थी।

*******************



*ये सच है*

बवन्डर के इस दौर में
चांद मेरे दोस्त
तुम सांस न ले रहे होते मुझमें मैं बनकर
तो उड़ा ले गया होता मुझे बवन्डर

मुझे डुबो दिया होता किसी बर्फीली
झील की अतल गहराइयों में
जम जाते मेरे सपने हमेशा के लिए

दोस्त जो मुझमें तुम
आकांक्षा बनकर न बह रहे होते
तो थम जाती ये हवा 
उड़ जाते रंग सारी दुनिया के फूलों के 

चिड़ियों के डैने
हौसला होते हुए भी
उड़ान भरने से इनकार कर देते
चांद मेरे दोस्त

और हां
मुझे ये भी याद है 
ईश्वर मिला था सचमुच तुम्हारे भीतर
एक पोटली थमाई थी उसने
कहा था संभाल कर रखना
तुम्हारे जीवन का पर्याय रूप है ये

संभाल कर रखा है उसे आज तक
क्या थी ये पोटली
कभी खोला नहीं
न खोलने का वादा जो था तुमसे
चांद मेरे दोस्त

फिर भी उससे
दु:ख छन छन कर
मेरी आंखों में गिरता रहा
निकलती रही अंतर्ध्वनि
न मांग और मन्नतें
न कर और ख्वाहिशें
न बुन और ख़्वाब
कि सब दफ्न है
तुम्हारे जलते सीने में।


************


*चलती रहो निरन्तर*

मेरे भीतर उगी हुई आसमानी रातों में
उतरा चांद
निरन्तर ह्रास के क्रम में ही समाहित
कब अपनी परिपूर्णता पर उतरेगा
हर सुबह से
हर रात से पूछती हूं मैं
किन्तु वे मौन हैं

मगर मेरे भीतर रिस रहा है धीरे-धीरे
ख़ून का क़तरा बनकर
तुम्हारे भीतर तो ढेर सी
चांदनी थी
या यूं कहूं
परम शिवम् सुन्दरम् सृजित करने का
दौर तुम्हीं ने शुरू किया था

तुम्हीं ने तो कहा था
बहुत उजाला है सूखी पगडंडियों पर
चलती रहो
मैंने मुड़कर देखा तुम्हारी ओर
तो वहां रात थी
घबराकर मुंह फेरा
रात सामने आ खड़ी हुई
उजाले को रौंदती हुई
शायद अधूरापन बहुत बढ़ गया था चांद का।


परिचय


    
 जन्म-15 जून 1969

 जन्म स्थान-सिद्धार्थनगर, उत्तरप्रदेश, भारत।
 कुछ प्रमुख कृतियाँ

                                               जिस तरह घुलती है काया (कविता-संग्रह)।
 विविध
                                                 पेशे से चित्रकार 
                                                  अनेक प्रदर्शनियाँ
                                                  त्रिवेणी कला महोत्सव द्वारा सम्मानित
                                                   हेमंत स्मृति कविता सम्मान


नोट- कविताओं के साथ संलग्न सभी चित्र वाज़दा खान द्वारा बनाए गये हैं।

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

समकाल : कविता का स्त्रीकाल 17

अनुपम सिंह समकालीन कविता की दृष्टि सम्पन्न ,चेतनाशील कवि हैं। आपकी कविताओं में युवा मन की छटपटाहट, दुनिया बदलने की तीव्र इच्छा शक्ति और औरतों के मन- मिजाज़ को समझने की समझ साफ देखी जा सकती है।गाँव,कस्बों से होते हुए महानगर तक की यात्रा में अर्जित किए गये अनुभवों से कविता का कोलाज गढ़ती अनुपम की राजनैतिक दृष्टि कविताओं में प्रतिरोधी चेतना को आक्रोश के साथ दर्ज करती हैं।

अनुपम केवल कविता नहीं लिख रही हैं,बलकि उस धर्म सत्ता, पितासत्ता और समाज सत्ता से सवाल पूछती हैं कि आखिर क्यों औरतों के हिस्से इतना दोहरापन है ,क्यों उन्हें देह भर स्त्री की परिधि में घेरकर बार -बार घर की ढ्योढ़ी तक सीमित रखने की साजिशें होती हैं।अनुपम ,सीमा आजाद,आरती,सविता पाठक,उपासना झा,नताशा,सीमा संगसार, रूपम मिश्र आदि समकालीन कविता में जिस प्रतिरोधी चेतना को तीव्र आक्रोश के साथ दर्ज करती हैं वह पीछले पन्नों में कात्यायनी, सविता सिंह,निर्मला पुतुल आदि वरिष्ठों की परम्परा का वाहक हैं।

***************


1-आसान है हमें मनोरोगी कहना 


सपने रात के कालाजार हैं 

परजीवियों की तरह कचर-कचर कर खा रहें हैं  

मेरे माथे में खोद रहे हैं गहरा कुआं  

वे मारकर रटाए गये पाठ की तरह    

मन वितृष्णा से भर देते हैं 

 

उनकी सिरायें भले उलझी हों 

उनकी आदिम जड़ें उस पेड़ में हैं 

जिसने दूसरे पेड़ों को कमतर बनाया 


पूछ रही हूँ तुमसे 

और सबसे  

आखिर! क्या मतलब है

पश्चिम दिशा में उगे साँप का

जो फन फैलाये हर वक्त डसने को 

लपलपाता है अपनी जीभ


सपने जो गाँव की पगडंडी धर आते थे 

शहर की अनिद्रा में दुहराते हैं खुद को 

इससे मेरी नहीं 

उनकी जीवटता पता चलती है 

फलवती नहीं हुईं मान्यताएँ 

सात ब्रह्मण ,सात फ़कीर को जिमाना

उस गुसाईं की सेवा 

जो रात की पीठ पर 

चाकुओं से स्वास्तिक बनाता था  

अँधेरे में डूबी बेदियों पर

देर तक अभुआना 

पत्तो को कांटे से बींधकर 

सिवान के कुंए में फेंक आना 

औरत की देह पर सवार देवता कहते हैं 

तू उनकी सवारी है 

तेरे मुड़ते ही लौट आए थे वे


एक आदमकाय, सींगवाला 

आधा जानवर ,आधा मानुस 

जाड़े की धुंधभरी रातों में दौड़ाता है 

मेरे पैरों में बड़े-बड़े पत्थर बांध देता है कोई 

पैरों को घसीटते घुस गयी हूँ 

अडूस और ढाख के जंगलों में 


वह जंगल अब जंगल नहीं

एक सूनी सड़क है 

जिसके दोनों ओर हड्डियों का ढेर लगा है

तराजुओं पर धरे हैं बड़े-बड़े बटखरे

मैंने चिल्लाकर कहना चाहा

फिर से लौट आये हैं डायनासोर

मेरे जबड़ों को जकड़ लिए उनके हाथ

उनकी बदबू घोंटने लगी गला मेरा 

सांसे उफनने लगीं मेरी आँखों में 

 

मैं साँय-साँय करती सड़क पर भागने लगी 


रात सोने से पहले धुल लेती हूँ पाँव 

फिर भी दिन चक्र की तरह घूम जाता है 


आज फिर दूर वाले फूफा जी आए हुये हैं 

चमकीली पन्नियों से झांकती हैं टाफियां 

बच्चे टाफियों पर आँखे गड़ाये घोंट रहे है 

मुंह में तैर आयीं इच्छाएं  

बच्चे टाफियों को तारे या फिर 

जादू की पुड़िया समझते हैं 


आँगन में खड़ी तारों को निहारती हूँ मैं  

वेस्वाद टाफियां घुलती जाती हैं मुंह में  

भुनभुनाती हूँ 

उनकी पुड़िया का जादू  

उनकी इच्छाओं का विसखोपड़ा है 

उनकी शुभेक्षा एक शातिर अभिनय 

पाँव छूती बहनों के पीठ पर 

ताउम्र धरा रह गया है उनका हाथ  

 

वह डॉक्टरनुमा व्यक्ति फिर आया हुआ है

जो मेरे गाँव की सभी औरतों का इलाज करता है 

पूछता है-पेशाब में जलन तो नहीं होती 

एक प्रश्न उन सभी की तरफ उछालकर

जाड़े की रात में भी ग्लूकोज चढ़ाता है 

और रात भर उन औरतों का हाथ 

रखे रहता है अपने शिश्न पर 


फिर सपने में आते हैं मुंहनोचवे 

वे स्कूल जाती लड़कियों को अपनी बसों में लादते हैं 

चारपाई के पावे से बधी हुई हूँ मैं 

छटपटाहट में खुल जाती है नींद 

मेरा चिपचिपाया हुआ बिस्तर!

घिन्न आती है मुझे 


रात  गिड़गिड़ाती हूँ देवताओं से 

तुम्हारे सपने गड़ते हैं मेरी पीठ में 

कोई और सपना मत दों मेरी नींद में 


उस रात पता नहीं

कब !कहाँ ! कैसे! 

निर्वस्त्र ही चली गयी हूँ 

सर्चलाइटों से चुधिआयी मेरी आँखें  


टेबल पर पड़ी मेरी देह पर वे 

धारदार हथियारों से वार करते हैं 

मुझे सबसे गहरी खाई में फेक देते हैं वे 

मेरी सांस फूल रही है 

मेरे सांसों की डोर पकड़े चल रही हैं लाल चीटियाँ 

चालते हुए मेरे फेफड़े 

डर से रेघती है मेरी आवाज़ 

मैं अपने कपड़े खोजती हूँ 


करवट बदलने से बदलता नहीं  दृश्य 

मद में झूमते 

और खुंखार हो लौटे हैं वे 

बगल में सोयी माँ पूछ रही है -

फिर कोई सपना देखा तुमने 

मैं कहती – नहीं अम्मा ! 

सो जाओ तुम 

मैं सोच रही हूँ    

कितना आसान है कहना 

कि यह मनोरोगी है



                                                                          चित्र- आरती वर्मा




2-रंग जहां अपराधी होते हैं 


आइने के सामने खड़े होते ही 

झगड़ालू स्मृतियाँ परावर्तित होकर

फैलाती हैं गहन अंधकार 

असभ्य स्मृतियाँ याद करातीं हैं 

पहली अज़ान-सी दादी की अस्फुट ध्वनि 

गहरी रेखाओं से भरा पिता का पहला दर्शन 

बेसन के घोल-सा गाढ़ा अम्मा का मौन 


दादी रंगों को लेकर मुखर थीं 

कितनों की बेटियों को मार चुकीं थीं ताना 

बिन ब्याही मर जाने का 

जैसे मैं उन्हीं में से एक हूँ 

जो मर गईं थीं हिस्टीरिया में 

लौट आयी हूँ सब कुछ वापस करने 


पिता का ही रंग मिला था विरासत में 

मेरी नज़र में पिता ही अपराधी थे 

लोंगों के बीच अपना बचाव करती

हाँ पिता पर ही गयी हूँ मैं

 

याद आती है वह लड़की 

जो दिन-दिन मेरे साथ खेलती 

खेल-खेल में बस जाता एक घर  

दुनियावी सम्बंधों की सहज ही 

अदला-बदली हो जाती   

उन दिनों जूठा खाकर 

सखी बनने का विश्वास था    

उसके पास मुझे पराजित करने का 

अचूक हथियार था मेरा कालापन 

काला रंग नहीं गाली की तरह लगता 

खिसिआहट में काली बिल्ली बन 

मैं गिरा देती वह घरौना 

उन दिनों हर खेल का अंत

और अंजाम यही होता था   


वे औरतें जिनके पास बैठते ही 

मेरे सांस की तकलीफ़ बढ़ जाती 

जिनकी बात अक्सर बदल जाती 

फूहड़ फुसफुसाहटों में 

उनके लिए काली सौंदर्य की नहीं 

संहार की देवी थीं 

जिसकी शक्ल मुझसे मिलती  

जबकि संहार वे मेरा करती थीं 


मेरे मस्तिष्क में ख़ून बड़ी मुश्किल से चढ़ता

और उतरता किसी तूफ़ान की शक्ल में   

वे औरतें नहीं पढ़ पातीं थीं 

मेरे चेहरे की बेचैनी  

जब मैं उन्हीं के बीच बैठकर मुस्कुराती

वे हर समय व्यस्त दिखतीं

जैसे किसी ख़रीद-फ़रोख्त में 

वे गोरी लड़कियों के रिश्ते जोड़तीं 

भाई- भतीजे या किसी रिश्तेदार से 

वे भद्दा मजाक़ करतीं और बनावटी हँसी हँसतीं  

सुंदरता की व्यापारी वे औरतें 

ठीक मेरे पीछे खड़ी दिखाई दे रहीं हैं आइने में

 

आइने के सामने उड़ रहीं हैं

नयी पुरानी कई तस्वीरें 

मानों तस्वीरों में चिढ़ाते हैं दोस्त 

मैं कितनी ईर्ष्यालू हो रही हूँ 

मेरा अपना प्रेमी चिढ़ाता है 

मैं कितनी हिंसक हो रही हूँ 

मेरी उपस्थिति के बाहर भी

तस्वीरें गवाही देंगी कालेपन की 

इसलिए मैं कुतर रही हूँ 

सभी तस्वीरों से अपना चेहरा 


कम उम्र में अधिक पराजय दर्ज़ है मेरे नाम

जाने कब से भर रहा है मुझमें 

पराजय का यह भाव 


एक दूसरा चेहरा उभरता है 

बहुत पास से कहता है- 

लंबी सांस लो 

ये लो पानी पिओ 

क्या देखती रहती हो आइने  में 

मैंने कहा-

शुक्रिया दीदी ।



                                                               चित्र-आरती वर्मा


3-हमारा इतिहास 


एक औरत की पीठ पर नील पड़ा है 

वह अभी-अभी सूरज को अर्घ्य देकर लौटी है  

देवताओं और राजाओं के कपड़े धोते-पछीटते 

एक दूसरी औरत की झुकी हुई पीठ 

एक पीठ की विसात पर फेंकी गयीं पासे की गोटियाँ 

एक शापित शिलाखंड 

जिसके लिए औरतें 

अनादिकाल से एड़ियाँ रगड़ रही हैं 


इतिहास का एक पन्ना 

जिसके कोने में दर्ज़ हैं विषकन्याएँ

हाँ ,वही विषकन्याएँ 

जिनके नाम दर्ज़ हैं राजकुमारों 

की हत्याओं के षड्यंत्र 


वे चीख रही हैं भरी अदालतों में 

झूठ...झूठ ...झूठ 

स र ss स s र  झूठ 

जन्मना विषकन्याएँ नहीं थीं हम  

विष को धीरे-धीरे उतारा गया 

धमनियों,नसों और सिराओं में 


एक सच ,कि झूठे स्वाभिमान और 

स्वार्थों के लिए औरतें 

युद्ध में कभी शामिल नहीं रहीं 

न तो औरतों के लिए कोई युद्ध

लड़ा गया इतिहास में 

वे एक स्वर में कहती हैं 

झूठ के ताले में बंद है हमारा इतिहास 


हम औरतें  

चुड़ैल बन भटक रही हैं इधर-उधर 

पीपल के पुराने पेड़ों 

वीरान खंडहरों में हमारा ही निवास है 

हाँ, हमीं थीं 

जो जंगलों से निकलकर 

उनके ख़ूनी बावड़ी का पानी पीतीं 

और अपनी काली छाया से डरा करतीं 

अपनी आँख पर गीली रेत की ठंढई लेपतीं

बावड़ी के किनारे या ऐन चूल्हे के नीचे 

जहाँ धधकती है आग 

चुड़ैलों के ही अवशेष मिले हैं

खुदाइयों में 


हम खड़ी दोपहर की आँधियों सी-चलतीं 

मातम मनाते हुए

जो एक साथ कूद गईं थीं चिताओं में 

जौहर करने

खौलते तेल में जो छान दी गयीं थी 

ताजी मछलियां कहकर 

जो अहरे की तरह सुलगायी गयीं थीं  

दाल का आदिम स्वाद चखने के लिए 


ज़जीरों की मज़बूत कड़ी-दर-कड़ी  

जिनपर पांव रख वे 

चहलकदमी करते 

टहल आते युगों-युगों में

 

लेकिन हम तो सबसे कमज़ोर निर्मितियाँ थीं 

इसलिए सबसे अधिक रूठा करतीं 

कूद जातीं कुंओं में 

औ फूल बन उगतीं थीं 

कुंओं से लौटती प्रतिध्वनि 

हमारा ही अधूरा गान है 


शिल्पकारों नें देह की विभिन्न आकृतियाँ बना 

कील दिया स्थापत्यों में 

पहले उन्होंने नंगी औरतें बनायी 

जब उनकी ही कुदृष्टि चक्कर काटने लगी 

और दिखने लगे हरे कटे घाव 

तब उधड़ी हुई पीठ पर सुइयां चला 

एक मोटा तम्बू तान दिया देह के गिर्द 


जब हमारी ढकी हुयी देह 

अंधेरों का रहस्य लगी उन्हें 

लगभग पगलाए हुओं की तरह 

छेनियों से मनमाना वार किया 

वे हर बार देह की नाप लेते 

और रंदा चलाते आत्मा पर 

वे हर बार नुमाइश में लगाकर 

जीत लेते नुमाइश  

तब से लेकर आजतक 

उस राह का हर राहगीर  

हमारी टेढ़ी कमर पर हाथ फेर लेता है 


धर्मग्रंथों और इतिहास की

स्याह पाण्डुलिपियों को 

अपनी पीठ पर लादे 

औरतें फिर रही हैं प्राचीनकाल से 

हमारी पीठ पर जो कूबड़ दिखाई दे रहा है 

वह उसी का बचा हुआ अवशेष है


हम यक्षणियों को क़ैद हुये 

लंबा अरसा गुजरा है    

धनकुबेर के तहख़ानों 

इतिहास के पन्नों 

और तुम्हारी कलाओं में 

अब छटपटा रही हैं हमारी आत्माएं  ।



                                                                  चित्र-आरती वर्मा

4-पिता से 

दरवाज़े पर एक सूखी नल है पिता 

जैसे धरती के सोते से 

टूट गया हो संबंध ही उसका 

या सिर्फ  बहने लगी हो रेत

घाम से थके राहगीर लौट रहे हैं

गला तर किये बिना अपना 

मेरे हलक तक में वह रेत फैल गयी है 

पानी के बदले इतनी रेत कहाँ से आयी पिता 


जब मैं छोटी थी 

झूल जाती नल के हत्थे से

तब चोटों और जिद्दी इच्छाओं के बीच

अंतर नहीं कर पाती थी

फिर, नल भी इतना गाढ़ कहाँ चलता  

उछलकर कूदती 

लोटा भर जाता पानी से

अब तो बरसात में भी नल पानी छोड़ देता है

बरसात भी पहले जैसे 

कहाँ होती है पिता

 

अब अम्मा सूरजमुखी मिर्च नहीं लगातीं 

खेत की धूल आँगन तक आ जाती है

होली के  सूखे रंग बिखरे हैं बालों में 

भैसें अब भी आदत बस तालाब में जातीं हैं 

वे वहां घास की नहीं

पानी की जड़ें खोजती हैं 

लड़के पिताओं की चोरी से

तालाब पार करने की बाज़ी नहीं हारते

न तालाब ही ताजी मछलियाँ देने 

दरवाजे तक आता है 

अब आसमान से

मछलियाँ गिरतीं ही नहीं 

आसमान भी पहले जैसा पारदर्शी कहाँ रहा पिता


याद है !

जब पहले किसी साल बरसात नहीं होती

बच्चे इन्द्र से पानी मांगने जाते  

द्वार-द्वार पानी गिरा उसमे लोटते

इस तरह अपना प्रतिरोध दर्ज़  करते थे बच्चे

औरतें  नंगी होकर

आधी रात में हल चलातीं

यह उनके प्रतिरोध की अपनी भाषा थी

कहते हैं, इन्द्र गौरैया भेजते थे  

अपना दूत बनाकर

वे आतीं, धूल में नहाकर

पानी का आगम दे जातीं

अब तो बच्चों का भी भ्रम टूट गया

इन्द्र पानी का देवता था ही नहीं

सच बताओ पिता!

तुमनें इन्द्र की झूठी कहानियाँ क्यों सुनाई


धूल मे नहाती चिड़िया

पानी के लिए लोटते बच्चे

किनकी इच्छाओं का परिणाम हैं

  

ओह पिता !

मुझे जितना शोक तुम्हारे लिए है

उतना ही उन पेड़ों के लिए

जिनसे कुर्सियाँ और मेंजे बनी


मैं शोक करती हूँ पिता!

आसमान में टंगी मछलियों

इन्द्र से गिड़गिड़ाते बच्चों और

नंगी औरतों के लिए 



5-सफेद दूब-सी तुम   

सपनों की दुनिया में

सीखों की गठरी 

साथ लायी थीं लड़कियां 

उम्र के दहलीज़ पर 

मचल रही थीं 

देह की अनचीन्हीं इच्छाएं 

प्रशाखाओं से फूट रहीं थीं 

सप्तपर्णी की कोपलें 

लड़कियां औरतें बन रहीं थीं 

उन्हें आकर्षित करतें 

उनके उम्र के लड़के

वे एक दूसरे की चिंता करतीं

ईर्ष्या करतीं एक दूसरे से


खेतों मेंड़ों से होकर 

उड़ा जा रहा था मेरा भी मन 

बवंडर-सा, तुम तक 

बज रहा था 

झिल्लियों का अनवरत संगीत 

हम बंजारों-सा बदल रहीं थीं 

बार-बार मिलन की जगहें

छोड़ती रहीं अपने घायल पैरों की छाप 

कितनी बार छीली गयी वह घास 

उसकी जंग थी 

अपनी हार के खिलाफ़

उस सफ़ेद दूब-सी तुम  

मन-कोटरों में उग आयी थीं  


उमस भरी रात 

हलचलों से पटी जगहें 

फिर भी बंद था एक दरवाज़ा

कम डर नहीं था उस समय 

दरवाज़ा खटखटाए जाने का 

कूकरों की सीटियों के बीच 

गैस का दाब ख़त्म होना आम बात थी 

वहां चीजें घटने का कोई कलेंडर नहीं था  

इच्छाओं ने डर से डरते हुए भी 

उसे परे ढकेल दिया था 

राम की घोड़ियों की तरह 

एक दूसरे को पीठ पर 

लाद लिया था हमने 


एक जोड़ी सांप की तरह 

एक दूसरे में गुंथी रात 

बूंद-बूंद पिघल रही थी हमारे बीच 

हमने पहली बार महसूस की

होंठों की मुलायमियत

तुम्हारे हाथ मेरे स्तनों को 

ओह !कितना तो अपनापा था 

न पीठ पर खरोंच 

न दांत के निशान 

आहत स्वाभिमान के घमंड से  

उपजी बदले की भावना भी नहीं 

एक दूसरे की देह को 

अपनी -अपनी आत्मा-सी 

बरत रहीं थीं हम 


हमारे बीच महक रही थी 

सप्तपर्णी की कच्च कोपलें 

देह के एक-एक अंग को हमने 

साझे में पहचाना था उस रात 


रात बीतती रही  

छंटती रही रात की उमस

हलचलों से पटी जगहों में 

पसर गया अंतिम पहर का सन्नाटा


रात बीत गयी 

अँधेरा चिपका रहा चहरे पर 

चेहरे की शिनाख्त में छोड़े गए हैं

कई जोड़ी खोजी कुत्ते  

परित्यक्त जगहों की तलाश में 

भटक रही हूँ 

मैं बदहवास 

अपना ही बधस्थल खोज रही हूँ 


सूखे हुए कुएं 

उखड़ी हुई पटरियां 

खचाखच भरी जगहें 

छुपने का ठौर नहीं इस शहर में 

सर्च लाइटें 

बेध रही हैं 

आँखों की पुतरियां 

ब्रम्हांड का शोर 

सुन्न कर रहा है कानों को 

बेआवाज़  चीखती मैं 

देवताओं की कसमे खाती

लौट रही हूँ  

मेरे साथ-साथ घिसटती रात 

फिर-फिर भर रही है भीतर 

रात और दिन का यह घमासान 

हुआ और-और गहरा अपराधबोध 

ताकतवर रात पछीट रही है दिन को 

पछाड़े खाता दिन 

हर रात थोड़ा कमजोर दिखा 


दिन की सारी कसमें तोड़ 

हमने हर बार रात चुनी 

इस तरह हमने जाना 

दिन से अधिक 

ताक़तवर होती है रात 

उसके उथलेपन से

ज़्यादा  गहरी भी

 

हमने थोड़ा सपने जिये 

थोड़ा सीखें छोड़ीं  

थोड़ा गुमान किया एक दूसरे पर 

जब शब्द नहीं थे हमारे पास 

तब भी थे कुछ मुलायम भाव 

जब बन रही हो भाषा की नई दुनिया 

भाषा में स्थायी महत्त्व हो रात का 

तो हिचक कैसी 

कैसा अपराधबोध 

हाँ ! प्रेम में थीं  हम दो लड़कियां


6- ज़हरबाद


वे एक जून भूखी रह लेतीं  

बीजों को हाथ न लगाती थीं  


झरबेरी मकोय और भटकइया तक को 

भविष्य के लिए संचित रखा उन्होंने 

उनके बच्चे भी 

इस बात के अभ्यासी थे  

फिर भी उनके आँखों में तिरती रहती

निश्छल सावलीं हँसी  

अब किस देश से आती हैं ये हवायें 

सूख गयी बीजों के भीतर की नदी 

उनके पसीने से भरी नहीं दरारें खेतों की   



कोने में पड़ा-पड़ा उनका हल  

खोता गया अपनी चमक 

घुनी हुई हरसि पिछले ही साल 

लगा दी गयी चूल्हे में 

इस तरह अन्तिम बार उन्होंने 

अन्न और आग को मिलकर 

अपना भोजन पकाया 

अन्तिम बार उनके चूल्हे से उठा धुआं  

हमेशा के लिए जम गया उनकी आँखों में 

और डूब गयी आँखों की रोशनी उनके

आँखों में किरचों की तरह गड़ती है 

आसमान की सफेदी 


अब उन्हें कचोटता है कोई मूर्त दुःख 

जो उनके हाथ के घट्ठों की तरह ही 

उग आया है उनकी जीभ पर 

और वे अपने ही रक्त और नमक में 

अंतर करना भूल गए  



खो गए उनके जुआठा के दोनों शइल

या ले गया कबाड़ी वाला भंगार-भाव  

बच्चों को थोड़ी-सी सोनपापड़ी दे 

या किसी ने गाड़ दिया उनकी ही पीठ में 

छूरे की तरह 


उनके ख़ून में जो बह रहा है 

वह लोहा नहीं 

उसकी कमी का सबूत है ज़हर है मोरचे का 

जहाँ तोपते थे वे ख़ून  सने बलगम अपने  

वहीँ खेतों में दफ्न है

उनका शव भी


उनके बैलों को लकवा नहीं था 

बस नहीं रहा नाधने वाला गोसइयाँ उनका 

वे भूलते गए खेतों में चलने की कला 

दांया और बायां अपना  

कसाई को देख बैलों ने खन डाला ख़लिहान पूरा 

उनके खुरों को 

गोबर और आँसू से मिटाती हैं औरतें

  


छातियों में उतरा नहीं दूध 

तो औरतें पागल हो गयीं 

कें कें करते बच्चे छातियाँ नीछ्ते   

सो गये लम्बी नींद   

औरतें भूंख को पल्लू से बाधें

नींद आँखों में छुपायें हुए

डोलती हैं परछाइयों की तरह 

वे भागी जा रहीं अपना लूगा समेटे 

धरती के साथ ही 

वे भी दफ्न होना चाहती हैं 

 

अपने ही भाग्य से बचे बच्चे 

हत्तियारों की क़ैद में सुबकते हैं  

कई दिनों से कलेवा नहीं खाये हैं वे 

अब उमगता ही नहीं 

उनकी आँखों में कोई सपना 

उनकी जंग खाई आँखें ....!  

उन्होंने इस मिट्टी से  

ज़हरबाद बनते देखा है

लेखक परिचय-

नाम-अनुपम सिंह ,

पता -गाँव लबेदा ,जिला प्रतापगढ़ ,उत्तर प्रदेश ।

शिक्षा-इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में परास्नातक ,

दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में पी-एच॰डी॰ ।

 विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कवितायें प्रकाशित ।

‘आल इंडिया प्रोग्रेसिव वीमेन एसोसिएशन’ एवं ‘जसम’ से संबन्धित।