रविवार, 9 जनवरी 2022

समकाल : कविता का स्त्रीकाल -3

यह स्त्री कविता का वह समय है जब चारों दिशाओं से स्त्री स्वर समवेत स्वर में अपनी बात भौगोलिक दूरियों और भाषाई सीमा का अतिक्रमण कर ,कर रहा हैं।अभी तक आदिवासी समाज के उन कोने कंदराओं का जीवन यथार्थ उन लोगों की बयानी रहा जो सैलानी या खोजी बन उन क्षेत्रों में गये या पढ़ सुन कर उनके जीवन को जाना था। यह आवाजें जितनी प्रमाणिक हैं इनकी बयानी उतनी ही मौलिक है। अरूणाचल से लेकर आसाम के पहाड़ी जनजीवन और जनजातीय समाज के जीवन अनुभव और आधुनिकता की बयार से प्रभावित अपने समाज की बातों को लेकर हिन्दी कविता में जमुना बीनी जिस तरह इन दिनों सक्रिय  हैंं वह बेेेहद आस्वस्ति कारक है।


1-


युवा अरूणाचली

युवा अरुणाचली

अब नहीं बोलते 

अपनी बोली

अंग्रेजी और हिंदी

में ही बतियाते

औरों की बोली 

अधिक सहज 

और

सम्मानजनक लगता । 


आबोतानी1, आनअ दोञी2

आबो पोलो3 की कथाएँ

अब नहीं भातीं

टी.वी. पर 

परोसा जाने वाला

दॉरेमोन , पोकेमोन

उसे अपना सा लगता । 


वह गा नहीं सकता

कोई लोकगीत

बॉलीवुड के 

गीतों के बोल

ज्यादा मधुर लगता । 


अब नहीं खाता

हिकु - हुयुप4, होञोर5

और

उबला हुआ ओयिक6

फ़िज्जा और नुडल्स

बहुत जायकेदार लगता ।


उनमें संयम की

जबरदस्त कमी है

 जल्द 

गलत राह 

पकड़ लेतें 

दिन-ब-दिन 

निगल रही उसे

उपभोक्तावादी संस्कृति ।




  1. आबोतानी – एक मिथकीय पुरुष और अरुणाचल के तानी समुदाय के आदिम पूर्वज

  2. आनअ दोञी – सूर्य माता और मिथकीय पुरुष आबोतानी की पत्नी

  3. आबो पोलो – चंद्र पिता

  4. हिकु-हुयुप – सूखा बाँस जो भोजन में मसाले के रूप में होता है । 

  5. होञोर – एक काँटेदार सब्जी

  6. ओयिक – एक छोटी पत्तियों वाली सब्जी ।




2-

नदी के दो पाट


तुम्हारी अधिकांश बातें 

मुझे समझ 

नहीं आता 

बिल्कुल दूसरी बोली

बोलने लगे हो तुम

तुम्हारा पहनावा विचित्र

तुम्हारी आदतें अजीब

तुम वह हो

पर 

वह नहीं 

जिसे मैं जानता था । 


आज 

सालों बाद 

हम मिलें 

तुम तो 

जैसे कोई 

खोजी पर्यटक 

साहस 

और 

रोमांच के 

खोज में 

मेरी दुनिया को 

देखने आये । 


अचरज का 

विषय हूँ 

मैं तुम्हारे लिए 

हाँ !! 

आदिम संस्कृति के साथ 

जीता एक आदिवासी 

अजायबघर का 

आदर्श नमूना । 


सुविधा 

भोगने की ललक 

ले गया दूर 

तुम्हें हमारे गाँव से 

उन लोगों से दूर

जो तुम्हें 

जानता था 

समझता था

अपना मानता था । 


तुमने अपना लिया

ञीपाक1 के 

तौर-तरीके

तुम्हारे 

और 

मेरे बीच 

दूरी इतनी

बढ़ गई 

जैसे 

नदी के दो पाट । 



  1. ञीपाक – गैर आदिवासी या मैदानी वासी 


 








3-
देहात की याद

यामा

शहर आई

चाचा-चाची के 

साथ रहने ।


यहाँ उसे

कुछ अच्छा 

नहीं लगता 

उसकी उदास आँखें 

मीलों दूर 

कोई पेड़ खोजती 

इमारतों की 

लम्बी-लम्बी 

कतारों में 

पेड़ 

कहीं नहीं दिखाई देता । 


जब मन 

बहुत भारी होता उसका

ऊपर 

आकाश को ताकती 

आकाश तो 

नीला होता है 

मगर 

यहाँ तो आकाश 

मटमैला है 

कितना भद्दा रंग ! 


चाची उसकी

बहुत प्यारी है 

उससे कहती-

‘ यूँ अकेली 

और

गुमसुम

मत रहा करो

बच्चों के साथ 

घुलो‌-मिलो

हेलमेल रखो

मन बहलेगा ’ ।


पर बात क्या करती

जब वे दोनों 

टी.वी. पर 

पुतला देख रहे थें 

क्या कहते है उसे 

कार्टून !!

हाँ ! कार्टून 

सकुचाती हुई 

 पूछा उसने-

‘ क्या मैं भी साथ देखूँ ? ’ 

वे बोले-

‘ तुम्हारी देहाती बोली

हमें समझ नहीं आतीं

अंग्रेजी तो 

आयेगी नहीं तुझे

हिंदी में बात करो ’

तब से तीनों में 

बातचीत बंद । 


क्या उमस था

उस दिन

थोड़ी झिझक के बाद 

पूछ ही लिया

चाची से‌-

‘ यहाँ नदी कहाँ है ?

ठंडे पानी में 

डुबकी लगाने की 

चाह हो रही है ’ ।


चाची हँसी 

जोर से 

एक खनकदार हँसी

‘ यहाँ तो नदियाँ 

डम्पिंग ग्राउंड  बन चुकी है 

इधर नदियों में 

कूड़ा-कचरा 

बहाया जाता है 

खुजली हो जायेगी

नहाओगी तो ’ । 


बाजार में 

कितनी भीड़ थी

वह चली कहाँ ‍!

चाची का हाथ थाम

भीड़ के साथ 

बस बही जा रही थी । 

घर लौटी 

तो नथुनों में 

कुछ कुलबुलाहट हुआ

छोटी उँगली डाल 

साफ किया

अरे ! उँगली एकदम काली हो गई

यामा बहुत डरी

चाची ने ढाढ़स दी-

‘ हवा दूषित है 

अगली बार 

मास्क जरुर

लगाकर निकलना ’ । 


हरा पेड़ नहीं

साफ पानी नहीं

स्वच्छ हवा नहीं

अपनी बोली नहीं

आह! 

रह-रह कर उसे 

देहात याद आती । 


वह सहेलियों संग

छायादार पेड़ के नीचे

लेटकर सीने में 

खूब साँस भरकर

नीले आकाश की ओर फूँकना

पर दूर

ऊपर 

आकाश में छिटका 

इक्का-दुक्का 

सफेद बादल 

उन साँसों से 

नहीं छितराता । 


दोपहरी की

चिलचिलाती धूप में 

बेफिक्री से तैराकी करना

यापी की माँ

 चिल्लाकर डाँटती-

‘ बावली लड़कियों

तेज धूप में 

मत नहा

रंगत काला पड़ जायेगा ’ 

यापी और वह हँसती 

बंदरियों की तरह

‘ खीं खीं खीं ’ !!


याद है उसे 

पिताजी की 

बूढ़ी-बेबस 

आँखों का वह कहना- 

‘ चाचा-चाची के साथ रहकर

मन लगाकर पढ़ना

कुछ बनना 

और 

अपने भाई-बहनों का भी 

कुछ करना ’  

उसके फूल-सा  

नाजुक कंधों पर 

यह बोझ नहीं लादा होता 

तो यामा 

कब की 

देहात लौट चुकी होती

*********************


4-

डर



मन के अंदर

एक डर 

पैठ गया 

कल कहीं 

किसी हादसे का शिकार 

हो जाऊँ मैं ।


लोग अपनी-अपनी 

जेब से , बैग से 

तुरंत निकालेंगे 

मोबाइल अपना

फिर फोटो

और 

वीडियो लेने की 

आपस में 

होड़ाहोड़ी मच जायेगी । 


शाम तक 

सारे सोशल मीडिया में 

छा जाएगा 

मेरा क्षत-विक्षत शरीर

नंग-धड़ंग बदन । 


निश्चय ही 

हमारी संवेदनाएँ 

जंग खाती जा रही हैं 

वीभत्स रस में 

लोग अब 

रसास्वादन लेने लगे । 


तकनीक के 

इस अंधी दौड़ में 

सब सोशल हो गया 

निज कुछ भी न रहा 

न जन्म न मृत्यु ।




5-


वे और हम



वे कहते हैं 

सदा से हम 

ऐसे ही हैं 

बहुत जिद्दी

बहुत ढीठ 

समय के 

आरंभ बिंदु से । 


बदलाव से डर 

बदलाव से अंजान 

हम बदल नहीं सकते 

पर जरूर 

बदलना होगा । 


वे कहते हैं 

सभ्य 

और 

प्रबुद्ध समाज में 

पिछड़ा कोई न रहे 

विकास सब तक पहुँचे

चलो शहर बसाए 

इनके गंदे 

गाँव उजाड़कर 

पढ़-लिख जाए 

और 

बने ये 

आला अफसर । 


वे पूछते हैं 

इनकी पहचान 

क्या है 

घुमंतू

और 

शिकारी 

अनगढ़ धातु के

औजारों से लैस ।  


तीर-धनुष में 

डूबा रहने वाला

कंद-मूल खा 

जिंदा रहने वाला 

हिंस्र पशुओं के संग

सोने वाला 

चलो इनके 

घने जंगलों को 

साफ करें 

आदमखोर जानवरों से 

छुटकारा पाने । 


इन्हें सिखाया 

जाना चाहिए 

पेड़ , जंगल 

और 

पहाड़ अनमोल हैं 

परंतु 

इनको चीरना , उखाड़ना 

और 

काटना चाहिए 

अधिक से अधिक 

संसाधन , विकास 

और 

सभ्यता के लिए 

आदिवासियों को 

बदलते हैं वे 

अपने फायदे के लिए । 


जंगली , वहशी 

कहकर विभूषित 

हमें करते 

क्योंकि हम 

आदिवासी हैं 

और 

हम पता नहीं क्यों 

बदलना नहीं चाहतें 

या उनके अनुचित 

माँगों के आगे 

झुकना नहीं चाहतें । 


परिचय

                               

     डॉ. जमुना बीनी

जन्म : 20 अक्टूबर 1984

शिक्षा : एम. ए. हिंदी ( स्वर्ण पदक ), पी. एच. डी. ( राजीव गाँधी विश्वविद्यालय, अरुणाचल प्रदेश ) ।

प्रकाशित रचनाएँ : दो रंगपुरुष-मोहन राकेश और गिरीश कर्नाड ( आलोचना ); जब आदिवासी गाता है ( कविता संग्रह ); उईमोक ( न्यीशी लोककथा संग्रह ) । 

कविताओं एवं कहानियों का संताली, असमिया, मलयालम, पंजाबी, राजस्थानी, अंग्रेजी , तुर्की आदि भाषाओं में अनूदित ।

 इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एम. ए. पाठ्यक्रम में कविताएँ शामिल ।

 वर्तमान में अरुणाचल प्रदेश स्थित राजीव गांधी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर कार्यरत ।

संपर्क : हिंदी विभाग, राजीव गाँधी विश्वविद्यालय, रोनो हिल्स, दोईमुख, अरुणाचल प्रदेश, पिन 791112

ईमेल : jamunabini@gmail.com







शनिवार, 8 जनवरी 2022

समकाल : कविता का स्त्री काल - 2

                           समकाल : कविता का स्त्रीकाल - 2

पूनम वासम

समकालीन कविता में जैसे - जैसे स्त्रियों का हस्तक्षेप बढ़ रहा है , कविता का कैनवास उसके इतिहास और भूगोल के साथ उभर कर सामाने आ रहा है। यह जुड़ाव मिट्टी -पानी की सोंधी गंध लिए इतना सहज और सरल है कि हम सीधे उस दुनिया में पहुँच जाते हैं जहाँ की बात कवि अपनी कविता में कर रहा होता है।

यह सुखद है कि आज औरतों की बातें किसी और की बयानी नहीं हैं, वह अपनी दुनिया की बात अपनी ही भाषा में कर रही हैं।यह अभिव्यक्ति उस शिशु की तोतली बानी की तरह निर्दोष है जो जोई सोई कछु गा रहा होता है।यह भाषा स्त्रियों द्वारा रचित लोकगीतों की भाषा है जिसे मैं स्त्रियों द्वारा रचित आदिकविता मानती हूँ।पूनम वासम आदिवासी लोक की कवयित्री हैं ,जल,जंगल,ज़मीन उनके हमजोली हैं।पूनम ने इस आदिवासी संसार को हमारे सामने इतनी सहजता और सुघड़ता से रखा है कि हम इस लोक से  वैसेही जुड़ते जाते हैं जैसे पूनम और उनका संसार जुड़ा है। मछलियाँ गाएँगी एक दिन पंडुलम गीत 
पूनम का वाणी प्रकाशन से प्रकाशित और चर्चित काव्य संग्रह है।आज गाथांतर  पर  समकाल : कविता का स्त्रीकाल कालम में प्रस्त्तु्त है पूनम की कविताएँ- 

( १)

नमक हमेशा नमकीन नहीं होता
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नमक तुम्हारे लिए स्वादिष्ट खाना बनाने वाला 
पदार्थ मात्र है 
तुम्हारे रसोई घर में इसकी भरमार होती है
मेरी देह के पसीने की गंध में भी तुम्हें
नमक का खारापन लगता है 
मुझे चूमकर भी तुम बता सकते हो नमक का स्वाद

नमक तुम्हारे लिए उतना ही जरूरी होता है 
जितना दाल चावल

ठीक इसके विपरीत हमारे लिए नमक उतना ही ज़रूरी है
जितना जल, जंगल, जमीन

नमक हमारे लिए स्वाद बढ़ाने वाली चीज़ नहीं 
बल्कि एक बहाना है तुम तक पहुँच पाने का

हमारे यहाँ नमक की खेती नहीं होती वरन उगा लेते 
बोरा भर नमक धान की तरह

नमक की लत ने हमें भी व्यापार करना सीखा दिया 
झोला भर टोरा,  महुआ, अमचूर और चिरौंजी के बदले तुम्हारा एक सोली नमक 
स्वाद बदल कर रख देता है मुँह का

तुम्हें नमक की कीमत का अंदाजा नहीं
चूँकि तुम्हारी दुनिया में नमक ही नमक है
सस्ता और सुलभ पर
हमारी पहुँच से आज भी हजारों किलोमीटर दूर है नमक

कि सोली भर नमक कमाने के लिए हमारे कंधे उठाते हैं
कावड़ भर सपने
खोदते हैं पताल भर गोदी अंधेरी पगडंडियों को
पाटने के लिए

लगाते हैं मील का पत्थर अपनी आदिम सभ्यता
छुपाने के लिए 
ताकि खिसक सके दो- चार किलोमीटर और 
सूरज की सीध में

बावजूद
नमक का स्वाद हमेशा नमकीन नहीं होता 
कि नमक  का स्वाद कभी-कभी पाँव के छालों की टीस जितना कीमती और
कभी-कभी बंदूक की गोली से निकलने वाली
बारूद की गंध जैसा तीखा  
तो कभी-कभी आँखों की पुतलियों पर दम तोड़ चुके
कुछ सफेद ख़्वाब से भी फीका होता है

नमक की आजादी के लिए लड़ी गई थी एक लड़ाई 
सोचती हूँ  चुपके  से इनके कानों में  किसी  ऐसी ही
लड़ाई के प्रारम्भ का बिगुल फूँक दूँ क्या ?

ताकि जान सकें ये भी नमक का असली स्वाद ।


       (२)


【हिड़मे का बेटा】

हिड़मे का बेटा इतिहास पढ़कर लौटा है 
अभी-अभी स्कूल से    

सारे पन्ने पलटने के बाद भी उसे वह कहानी नहीं मिली 
जिसे उसके बाप ने ऐतिहासिक घटनाओं में
दर्ज करते हुए उसे सुनाई थी.

हिड़मे के बेटे को नहीं पता 
देश की आजादी-गुलामी वाले किस्से 
उसने कभी नहीं सुनी हड़प्पा संस्कृति की वैभव-गाथा 
जनरल डायर की गोलियों की धधक 
शहीद भगतसिंह की अमर कहानी 
महात्मा गांधी का सत्याग्रह व नमक का आंदोलन.

नहीं सुनाया कभी उसके बाप ने 
चन्द्र शेखर की बंदूक से निकली बागी गोलियों की दास्तां

हिड़मे का बेटा बचपन से सुनता आया है 
गुण्डाधुर, डेबरीधुर की वीरता  

 उसे वह कहानी याद है  
कैसे इंद्रावती नदी में गेयर ने मोटर गाड़ी का पेट्रोल डालकर आग लगा कर ललकारा था 
हिड़मे के बाप-दादाओं को

तीर से शिकार करने वाले योद्धाओं को 
बंदूक की नोंक पर जलती इन्द्रावती की आग दिखा कर बताया था 
अंग्रेजों के देवता 
आदिवासियों के देवताओं से ज्यादा ताकतवर है.
 
हिड़मे का बेटा सुनता आया है
'रुपया का दो पैली चावल होना ही चाहिए'
जैसी मांग को लेकर बस्तर की महिलाओं के द्वारा लड़ी गई अद्भुत मौन क्रांति के किस्से

भाले, फरसे, तीर-कमान लिए हजारों हाथ कारतूस की दिशा जाने बिना टूट पड़े उनकी ओर

जिन्होंने छुआ था 
उनके जंगल की मिट्टी में पकने वाली फसल को 
बस्तर का आदिवासी चीखता आ रहा है- 'एक पेड़ के बदले एक सिर होगा' का नारा
कहीं पहाड़ों से टकराकर पंडुम गीत की तरह कानों में बजती हैं उसकी ध्वनियां.

बस्तर में आजादी की लड़ाई से बहुत पहले ही शुरू हो चुकी थी स्वाभिमान की लड़ाई.

हिड़मे का बेटा 
हल की नोंक से टकराकर पैदा हुआ है उसी मिट्टी में
जहाँ हिड़मे के बाप-दादा की इच्छाओं का अंतिम संस्कार होना बाकी है.

हिड़मे का बेटा 
पहाड़ को जी भर देखता है और गुनगुनाता है - डोंगरी के गागतो चो अधिकार नी हाय.

स्कूल में इतिहास का पाठ पढ़ाने के बाद गुरुजी पूछते हैं कई सारे सवाल 
हिड़मे का बेटा मात्राओं की हिज्जा करके
पढ़ने लगा है वह सब कुछ
जिसे दर्ज किया गया है देश की ऐतिहासिक घटनाओं में एक दस्तावेज की तरह

हिड़मे का बेटा अभी
पढ रहा है हिज्जा कर कर के इतिहास की सारी किताबें!

                              


     (३)

महुआ का पेड़ जानता है ]]

महुआ का पेड़ जानता है
महुआ की उम्र कच्ची है

कच्ची उम्र में टपकते हुये महुये को रोकना संभव नहीं.

गुरुत्वाकर्षण बल नहीं बल्कि  
धरती का संगीत खींचता है उसे अपनी ओर!

बाँस की टोकनी से लिपटने का मोह 
महुये को छोटी उम्र में किसी जिम्मेदार मुखिया की तरह काम करने को उकसाता है.

महुये को प्रेम है पांडु की छोटी लेकी से 
उसकी खुली देह के लिए किसी कवच की तरह टप से टपकता है महुआ.

महुआ इसलिए भी टपकता है 
ताकि इस बार साप्ताहिक बाजार में आयती के लिए जुगाड़  कर सके लुगा का.
 
आयती  के दिहाड़ी वाले काम के बारे में 
महुआ को सब पता है.

बड़े छाप वाले फूल और गहरे रंग वाली सूती लुगा भी 
कहाँ रोक पाती है उन आँखों की रेटिना को 
आयती की देह का पारदर्शी चित्र उकेरने से.

शैतानी आँखे ताड़ जाती हैं 
गदराई देह पर अंकित गहरे रंग की छाप कहाँ और कैसे फीकी पड़ जाती है.

चिमनियों से टकराकर आने वाली दूषित हवा  
किसी फुलपैंट वाले के नथुनों से होकर घुल न जाये तालाब के पानी में.

महुआ का टपकना जरूरी हो जाता है उस वक्त 
कि महुआ की मादकता बचाएं रखती है जलपरियों को खतरनाक संक्रमित बीमारियों से.

महुआ टपकता है 
अपनी मिट्टी पर/अपनी बाड़ी में/अपने गाँव-घर के बीच.

थकी देह के लिए महुआ पंडुम 
इंद्र देव के दरबार में रचाई गई रासलीला की तरह है.

महुआ के फूल से खेत-खलियान अटे रहें  
मन्नत के साथ गायता देता है बलि सफेद मुर्गे की.

दोना भर मन्द पीते ही, पत्तल भर भात खाते ही 
पांडु की इंद्रिया लंकापल्ली जलप्रपात के कुंड में डुबकी लगा आती हैं.
फुसफुसा आती है चिंतावागू नदी के कान में 
अपनी मुक्ति का कोई संदेश गोदावरी के नाम!
        
काली शुष्क हड्डियों से चिपका हुआ.
उसका मांस सब कुछ भुला कर पंडुम गीत गुनगुनाने लगता है.

किसी मुटियारी का धरती से अचानक रूठकर
आसमान पर चमकने की जिद्द पूरी करने के लिए 
महुआ को टपकना ही पड़ता है.

महुआ का टपकना 
मिट्टी के भीतर संभावित बीज के पनपने का संकेत मात्र नहीं है.

कि महुआ का टपकना,
गाँव के सबसे बुजुर्ग हाथ की नसों में स्नेह की गर्माहट का बचा रहना भी है.


        (४)

         【सही अंत】

तुम्हारे शरीर से महुए की गंध आती है
तुम्हारा चेहरा किसी बर्फ़ीली नदी सा सफेद हुआ जाता है
टोरा बीज फोड़ते हुए कठोर हुए जाते हैं तुम्हारे हाथ

तुम लूगा घुटनों तक बाँधती हो
तुम्हारे पैरों के नीचे फूटने वाला कोयला
तुम्हारी देह की गर्मी से आग हुआ जाता है
तुम्हारी फटी हुई एड़ियाँ सोख लेती हैं 
धरती का कसैलापन

तुम्हारा मन पुड़गा के जले हुए पत्ते पर
झर कर बिखर जाता है यहीं कहीं खेत की मिट्टी में

विदा से पहले तुम भर लेती हो आँचल में
मौसमी फलों के बीज

जीवन का सही अंत सिर्फ तुम्हें पता है 
मरने के बाद तुम्हारी आत्मा सरई का पेड़ होना चाहती है 
ताकि किसी मोटियारी के गुदना में 
तुम देख सको संसार का सुख

                         



       (५)

【फुलगुना】

तुम्हारी फुलगुना का आकार
तय करता है 
तुम कितनी सुखी हो 
तुम्हारी
नाक पर दमकता फुलगुना
तुम्हारे भीतर का ताप मापने का 
पैमाना भर नहीं 
बल्कि
तुम्हारे अस्तित्व का वह स्तम्भ है
जिस पर खड़ी होकर तुम
देख  सकती हो  
धरती के
वंचित समुदाय को नेपथ्य में 
धकेलने का सच

नाक पर उठा हुआ यह फुलगुना
तुम्हारी साँसों में क्रांति गीत की ऊष्मा 
बनाये रखती है

तुम जानती हो फुलगुना का इतिहास 
श्रृंगार से कहीं ज्यादा यह 
तुम्हारे आत्मभिमान का प्रतीक है

     (६)


 【मैं  धरती से  क्षमा मांगना चाहती हूँ 】

मैं धरती को अपने दोनों हाथ उधार देती हूँ
बड़ी जोर से धक्का मारकर चाहे तो धरती खुद को धकेल सकती है सालों साल पीछे

जहाँ मेरे  पूर्वज दरवाज़े पर पानी का कसेला लिए इंतजार कर रहे हैं पाँव पखारने का 
जहाँ जंगल के प्रेम में बौराई  प्रेमिका
अपने जुड़े में पके फलों की महक लिए लौटती है
जहाँ हल की नोंक से धरती तोड़ती है अपनी अंगड़ाइयाँ

मैं  धरती से  क्षमा मांगना चाहती हूँ 
टूटे हुए घरों  की कसम खा कर
बोनसाई के पौधों से 
एक्वेरियम में साँस लेती मछलियों से 
पिंजरे में कैद मेरी मैना से
उन तमाम पेड़ों की छालों से जंगली फूलों से 
मधुमक्खी के छत्तों से 
पहाड़ों की घटती हुई उम्र से 

मैं धरती को अपने दोनों हाथ उधार देती  हूँ 
धरती चाहे तो उगा सकती है मेरी हथेलियों पर एक पेड़ 

पेड़  धरती के लिए काला टीका है जिसके होने से उतारी जा सकती है धरती की बुरी से बुरी नज़र


     (७)


【शहर की छत से】

एक उजड़े हुए शहर की छत से उड़ते हुए 
मैंने स्वीकार किया मेरा जंगली होना कितना हरा भरा रखता है मुझको

एक रेस्टोरेंट में खाने का ऑर्डर देते हुए
मेरी जीभ बेस्वाद हुई जा रही थी.

मैंने  चावल के साथ एक ही तरह की दाल खाई है 
सब्जियों के स्वाद में जरूर अंतर रहा 
कोचई ,खट्टा भाजी, पोपट बीजा, सुक्सी हमेशा से पसन्द है.
पुड़गा खाते हुए मैंने जाना मेरा देहाती होना मुझे स्वाद के आनंद से भर देता है

एक बड़े पुल से गुज़रते हुए मैंने पानी में एक रुपये का सिक्का उछाला.

पत्थर की पीठ से टकराकर लौटते हुए सिक्के ने  
मेरी प्राथर्नाओं को मछलियों तक पहुँचा आने में अपनी असमर्थता जताई.

मेरे गाँव में ऐसी नदी नहीं है 
जिस पर पुल बनने की कोई गुंजाइश हो.

एक पुराना कछुआ
गाँव के तालाब में अब भी दरबार लगा कर लेता है सबकी
अर्जियां.
मेरा पिछड़ा होना गायता की पूजा थाली को फूलों से भर देता है.

दुनिया की भीड़ से गुजरते हुए 
मैंने बस इतना जाना 
कि हम सिमटते जा रहें हैं फस्ट क्लास , सेकेण्ड क्लास की बोगियों में.

मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं हो रहा है 
कि मैं जंगली हूँ  

दुनिया बहुत आगे की चीज बनती जा रही है 
जिसे पकड़ पाना मेरे वश की बात नहीं.

                      



     (८)


【 प्रतीक】

सब भूलते हैं अपना धर्म
पेड़ नहीं भूलते 

उनके रोमछिद्र खुले होते हैं 
प्रार्थनारत ध्वनियों के लिए
इसलिए
दुनिया के तमाम पेड़ों को
ईश्वर का प्रतीक मान लिया
जाना चाहिए .
 

(९)


【तुम्हें चूमकर
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चूमकर तुम्हारे माथे को
एक दिन पृथ्वी को
चूमना चाहती हूँ 

ताकि तुम्हारे माथे की 
उर्वर भूमि का स्वाद
चख सकें धरती के  वो तमाम बच्चे 
जिनकी जीभ को नहीं पता
स्वाद और स्वाद में अंतर

तुम्हारे माथे से टपकता पसीना
हल की नुकीली चोंच और 
धरती की मुलायम मिट्टी के बीच 
किसी सुरक्षा कवच की तरह है  

तुम्हारे माथे को चूमना  
मेरे लिए धरती पर प्रेम पुष्पों की 
पहली फसल का लहलहाना है ।

       (१०)

सागौन

सागौन के वृक्ष बस्तर भूमि पर उग आए
दो मजबूत हाथ हैं
जिनकी हथेलियों पर 
लिखा भूमकाल का विद्रोह 
धीरे-धीरे दम तोड़ रहा है 

सागौन की चौड़ी पत्तियाँ समेटना चाहती हैं 
जल,जंगल,जमीन की दुनिया
अपनी रेशों में 
टहनियों में बांध कर लाल मिर्च 
बनाना चाहती हैं
डारामिरी सा कोई प्रतिक चिन्ह
चूस कर छोड़ दी गई हरियल  छाती के लिए

सागौन की मोटी जड़ें भीतर ही भीतर 
जमा कर रही हैं दर्द का मवाद 
गीली मिट्टी की नमी में 
आँसू छुपाती सुबक रही जड़ें
अब लिखना चाहती हैं
उपेक्षा का एक पूरा का पूरा इतिहास

सागौन के दोनों हाथ चाहते हैं एक बार फिर
शोषण के खिलाफ़ लामबंद होना
एक बार फिर चाहते हैं 
अपनी इस धरती पर 
गुण्डाधुर जैसा 
कोई नन्हा बीज बोना।



नाम  - पूनम  वासम
शिक्षा - एम. ए .(समाजशास्त्र एवं अर्थशास्त्र ) वर्तमान में बस्तर विश्वविद्यालय से शोध कार्य जारी है।
सम्प्रति - शासकीय शिक्षिका  बीजापुर
निवास - ब्लॉक कॉलोनी बीजापुर, जिला बीजापुर   बस्तर (छत्तीसगढ़) पिन 494444

साहित्यिक परिचय-  मूलतः आदिवासी विमर्श की कविताओं का  लेखन,विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित,युवा कवि संगम 2017 बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रतिभागी,लिटरेरिया कोलकाता 2017 के कार्यक्रम में शामिल,भारत भवन भोपाल में कविता पाठ, रज़ा फाउंडेशन के कार्यक्रम युवा 2018 में शामिल, बिटिया उत्सव ग्वालियर में कविता पाठ,साहित्य  अकादमी दिल्ली में कविता पाठ, साहित्य अकादमी भोपाल में कविता पाठ.



शुक्रवार, 7 जनवरी 2022

समकाल : कविता का स्त्रीकाल -1

       समकाल : कविता का स्त्रीकाल

(1)- उषा दशोरा


हिन्दी साहित्य का वर्तमान स्त्री रचनाधर्मिता की दृष्टि से सबसे उर्वर समय है । स्त्री कविता में लगभग तीन पीढ़ियाँ जहाँ सक्रिय हैं वहींं एक चौथी पीढ़ी के कदमों की मजबूत धमक सुनाई दे रही है। स्त्री कविता की प्रमुख प्रवृत्ति पर यदि बात करें तो सामने जो दृश्य उभर कर आता है सबसे पहले वह पितृसत्ता के विरुद्ध स्त्रियों की मुखरता है। स्त्रियों का सार्वाधिक शोषण पितासत्ता ने किया और उसे दोयम दर्जे की समाज के प्रत्येक क्षेत्र में नागरिकता दी इस लिए यह उसका पितृसत्ता के प्रतिरोध में नागरिक विद्रोह ही है कि वह निरन्तर अपनी कलम से उन बन्धनों से मुक्ति की घोषणा कर रही हैं जिनके बन्धन में कैद स्त्रियों की प्रतिभा रसोईं से लेकर सउरी तक में होम होती रही।

गाथांतर पर हम कोशिश कर रहें हैं एक स्त्री कविता की श्रृंखला प्रकाशित करने की,आज इस क्रम में राजस्थान की कवयित्री उषा दशोरा की कविताओं को प्रकाशित कर रहे हैं।उषा की कविताओं में स्त्री जीवन के संघर्ष और समाज के दोमुँहेपन की परतों को खोलने की बेचैनी साफ दिखाई देती है। पिछले साल आपका कविता संग्रह भाषा के सरनेम नहीं होते बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ और चर्चित रहा।



उषा दशोरा
जन्मदिनांक- 5 फरवरी
जन्मस्थान -  उदयपुर, राजस्थान
वर्तमान निवास - जयपुर
सम्प्रति- अध्यापन
काव्य संग्रह - भाषा के सरनेम नहीं होते
बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित
कविता लेखन के अतिरिक्त  थियेटर के लिए स्क्रीप्ट राईटिंग , स्क्रीन प्ले एवं निर्देशन में सक्रीय।
मेल drushadashora@gmail.com




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1.हस्तिनापुर की रिक्त हथेलियाँ
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कहाँ दर्ज हो अमानवीय पाठ्यपुस्तक के धर्मशास्त्री दाँत
कहाँ दर्ज हो  चालाकियों के दोगले धारावाहिक
कहाँ दर्ज हो धोखे की आँख में बैठे यकीन के इस्तीफे
कहाँ दर्ज हो  डिब्बाबंद इश्क के  उपभोक्तावादी डॉयलॉग

इस वक्त हम किसी दूसरे के नहीं स्वयं की आंख के पानी के हत्यारे हैं

ऐसे ही ध्वस्त नहीं हुए कबूतर के मकान
ऐसे ही  नहीं फूटे प्रार्थनाओं के भाग्य
ऐसे ही नहीं  हाँफा नदी का अस्थमा
ऐसे ही नहीं उजड़ा धरती का मेरूदंड़

इन धांधलियों में एक ग्राम ही सही
धावा हमारी ओर से भी बोला गया है

भूतकाल की बाँहों कैद हम हस्तिनापुर की रिक्त हथेलियां हैं।

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2. मेरी नस्ल की ढेर औरतें
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उपले थापती औरतें
जो पीतल की परात में आटा गूँधने के बाद
चूल्हे पर दाल उबालते
टूटी फूँकनी  के कपाल पर धप्प मारते
रोज धुँए से झगड़ा करती हैं

आकाश में फाइटर प्लेन
उड़ाती वे औरतें
जिनके जन्म पर कभी
लड्डु नहीं बँटे थे
जो दधिची की हड्डियाँ पहनकर
खुद ही  लोहा हो जाती हैं

वो औरतें जो खोपरे का तेल
रगड़कर बाल काढती है
लहसुन छीलते मेरीकॉम की बॉक्सिंग देखती हैं
बुरे वक्त के लिए कभी -कभी
सब्जीवाली से दो-पाँच सिक्के
बचाकर झट दाल के कनस्तर में
छिपा देती हैं

वे औरतें जो नहीं जानती
क्षेत्रफल का सूत्र,
प्रकाश संशलेषण का नियम
पर वो बच्चों के होमवर्क
की चिंता में डूब कर
पूरा गूगल का पेट छान लेती हैं

वे जींस वाली औरतें भी
जो हेयर स्पा के बाद
सनग्लास लगाकर टिक-टॉक चलती है
माँ -बहन की हजार किलो वाली गालियाँ
नुक्कड़,बस और सड़कों पर
रोज सुनती हैं

सुनो कलफ लगी साड़ियों वाली
वे ढेर सारी  औरतें
जॊ मार के निशान को
मिसमेच पेटिकोट के साथ बाँध लेती है
शाम को नीले पड़े
होठ के निशान को
लाल लिपिस्टक में छुपाती हैं
ब्यूटी फेक्ट्री में बने गहरे काले काजल से
आँसू की रात  दबाती हैं
फिर  सुबह ऑफिस में ज्यादा
मुस्काती हैं

पुरुषों को जन्म देने वाली
मेरी नस्ल की ये ढेर औरतें
खारिज़ करती हैं मंगल पांडे  तुम्हारी
अट्ठारह सौ सत्तावन की प्रथम आजाद क्रांति को
जायसी तुम्हारी पद्मावत के नख-शिख व्याख्या को
अपने सर्वस्वदान की हज़ारों किस्तों के आगे
जयप्रकाश नारायण के भूदान आन्दोलन को

मेरी नस्ल की ये ढेर और औरतें
खारिज़ करती हैं
शेर पर बैठी  खुद के देवी पोस्टर को
ये औरतें खारिज़ करती हैं
चंद्र बरदाई के पृथ्वीराज रासो और चौहानवंश के
पौरुष पराक्रम को
ये औरतें खारिज़ करती है विश्व की
तमाम शांति वार्ताओं की फूटी आंखों को ।

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                      चित्र - सोनी पाण्डेय




3.मुख्तारनामा


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मेरा झगड़ा रोशनी के लिए था
दुर्भाग्य!
दुनिया में आज तक रोशनी की पूरी स्क्रीप्ट दरवाजों ने लिखी
टूटी झिर्री के खिलाफ़ फतवे गाड़े
जो धूप की उधारी जूतों पर
आउट ऑफ द बॉक्स पर पहला संवाद बोल रही थी

नुक्कड़ नाटक के सारे किरदार झूठ हां में हां मिलाते गए
इनको माफीनामा दिया जा सकता है

पर जिन आँखों ने सच की ध्वजा की कसमें खाई-खिलाई
फिर आधीरात को मुख्तारनामा झूठ के घर ट्रांसफर किए
उनको  मिले मृत्युदंड

हम प्रवंचना की कमीज़ सिलने वाले धूर्त टेलर हैं
मनुष्यता के भूगोल पर ढेले मारने वालों में सबसे आगे
हम ही मुँह पलटने वाले
हम ही बेशर्मों की तरह चिल्लाने वाले
भाई! अब ये दुनिया भरोसे लायक नहीं रही

जबकि हमारी पीठ अब चींटी के बोझ से भी दुखती है


4. इंकलाब के जश्न
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सारे मुहासों में
एक भगतसिंह बैठा है
हमारे अपराधिक हाथ उसकी हत्या के इश्क में हैं

बिना नाम की स्त्री ने
बहुत सालों से  इंकलाब के जश्न नहीं गटके

आओ न्युजएंकर
हरे पेड़ों को फांसी रात तीन बजे होगी
तैयार रहें
हमें देशभक्ति के छ्दम के मुखड़े गाने है

गलत  की  मृत्यु होगी।

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                          चित्र- सोनी पाण्डेय

        




5.हाँ फिर लिखूँगी कविता
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हाँ मैं लिखूँगी मनुष्यता
जब हिरोशिमा और नागासाकी का दर्द
माइनस डिग्री के पंख लेगा
जब मार्टिन लूथर की त्वचा का होगा
माल्यार्पण सामाजिक गोष्ठियों में

हाँ मैं लिखूँगी प्रेम
जब  चमकी बुखार का इल्जाम
पॉलिटक्स के सोड़े पानी से बच पाएगा
जब सिरिया के बच्चों का आकाश
किताब -पेंसिल का जादुई बॉक्स होगा

हाँ मैं लिखूँगी फक्कड़ता
जब कबीर के इश्क में डूबकर
केसरिया हरा से छिन लूंगी *खास छात्रवृत्तियाँ
जब सुकरात का ज़हर एथेंस से भागकर
दुनिया के सस्ते बाजारों का अधिपति हो जाएगा

हाँ मैं  फिर लिखूँगी एक नई कविता
जब कवि के अड्डे पर सूर्य मुज़रा बजाने आएगा।

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मंगलवार, 4 जनवरी 2022

कहानी - उँचे खाले की गिरहें

                                                उँचे खाले की गिरहें


                                                                                                                   चन्द्रकला त्रिपाठी

नारायन के द्वार पर रोज़ की तरह ही बैठकी लगी हुई थी। ज़्यादातर गांव के पुरनियों का ठीहा बनता गया था यह स्थान।नारायन के समोरिया लोगों के सुख दुःख कहने की इस जगह पर किसी के जुटने की मनाही नहीं थी।चाय पानी का जुगाड़ तो था ही इससे ऊपर भी कुछ न कुछ जुट जाता।घरनी को सत्कार अच्छा लगता था।चार प्राणी के इस तरह मिलने जुलने से हुई मनसायन से दरवाज़ा अजोर हुआ लगता।शहर में काफी दिन रहने के कारण शहरी आवभगत भी जानती थीं।साफ सफाई से दरवाज़े को सजाए रहतीं तो आए गए का यहां मन लगता था। कोई कोई तो बेना से मुंह ढंक कर वहीं पौढ़ भी जाता। उसके अपने घर से दूसरी तीसरी बुलाहट आ चुकी होती तब कहीं टलता था।

दो तीन घंटे की बैठकी तो मामूली बात थी कभी कभार दुपहरिया हो जाती।
नारायन खेत बगीचा की ओर निकल भी जाते तो पत्तन आ कर बैठ जाते और बतकही जमी रहती।

गांव की ज़िंदगी में इतवार सोमवार वगैरह का कोई हिसाब तो होता नहीं और दिनचर्या भी घड़ी की सुइयों पर नहीं टिकी होती मगर इस गांव से पढ़वइया और नौकरिहा निकलने लगे थे। रास्तों पर स्कूल जाते लड़के लड़कियां आम हो चले थे। नौकरी वाले तो सबेरे ही स्कूटर या मोटरसाइकिल पर निकल जाते।पतली सी सड़क पर एक हलचल मच जाती।आज संयोग से इतवार था। तो आज की बैठकी में और रौनक थी। बतकहियों का कोई हिसाब नहीं था।गांव भर की कुंडली का जखीरा खुल रहा था।नारायन इसे मन लगा कर सुने या न सुने इससे किसी को फ़र्क नहीं पड़ना था।

सुरारी इस महफिल के सबसे जागतिक समाजी थे। उनके एक दिन के भी नागा करने से इस समाज की रौनक घट जाती।बुढ़वे जम्हाने लगते तो जवान लोग यहां वहां  ताकते उठ कर चले जाते।कह सकते हैं कि महफ़िल का रोचक तत्व ख़त्म लगा करता था।सब जानते थे कि सुरारी गुरु एक नंबर के अड़भंगी हैं,बात फैलाने में उनके जोड़ का कोई दूसरा नहीं और न गहरे से गहरे पेट से बात निकाल लेने में उनका कोई सानी था मगर उनके कहने सुनने में ऐसी सरसता थी और ऐसा जादू था कि बड़े बड़े चुहलबाज फेल थे।
ऐसी बातें वे जिस गंभीरता से बताना शुरु करते कि सारी टकटकी उन पर लगी होती।लोग उस चमत्कारी प्रसंग तक पहुंचने के लिए बेताब हुए रहते।असल जगह पर पहुंच कर वे अपनी खैनी भरी गदोरी में ऐसा झुक जाते कि अब वहीं से कुछ नायाब निकलने वाला है , फिर इधर उधर देखते , कुछ फुसफुसाते और फिर असली फुलझड़ी छोड़ देते।
मंडली में हंसी का दौरा फूट पड़ता। लड़के बच्चे नाच नाच कर हंसते और उनकी ओर देखते कहते कि गुरु ई ठीक नहीं है ! ठीक नहीं है गुरु !

सुरारी प्रकृतस्थ होते। कहते - जाओ तब देख लो , नहीं पतिया रहे हो तो देख लो जाकर 
आस पास से गुजरती घर या पड़ोस की औरतें इस टोली की तरफ आधा घूंघट कर लेतीं और लड़कियां फटफट गुजर जाना चाहतीं।
सुरारी की निगाह से वे नहीं बचतीं।
किसी को पहचान कर कह उठते वो - मुरलिया बो थी न
 नारायन टोकते - का महराज ! 
 गुरु कहते  - अरे हम कुछ कह नहीं रहे हैं और सुर्ती फांकते हुए उधर ही देखते हुए कोई किस्सा उचारते। 
 बैठकी जागृत हो जाती।
 सुरारी हर उम्र के लोगों की पसंद थे। एक से एक किस्सा उचारते मगर खुद गंभीर बने रहते।लोग उनके हाव भाव पर लहालोट होते।
मगर उस दिन  सुरारी जैसे किसी टोह में थे।
बातचीत में हमेशा की तरह  बढ़ चढ़ कर हिस्सा नहीं ले रहे थे।मदन सिधनाथ यहां तक कि हमेशा का मुहचोर तिरगुन तक बाजी मार रहा था।नारायन गुरु हमेशा की तरह रस ले रहे थे।उनका ध्यान सुरारी के उचटेपन पर जा रहा था मगर कारण समझ में नहीं आ रहा था।सुरारी भी बार बार उन्हें देख रहे थे।उसक रहे थे। एक दो बार फारिग होने भी चले गए।
उसी समय मदना पूछ बैठा - गुरु काहें चुप्पा हुए हैं 
 सब सोच उठे।
 नारायन के लिए तब पूछना ज़रुरी हो उठा - सब ठीक है न सुरारी

सुरारी नारायन से छोटे थे उम्र में। उनके सबसे छोटे भाई पंचानन की उमर के थे वे। मां बाप की एकमात्र संतान होने के कारण गांव के विद्यालय से पढ़ कर बगल के गांव के प्राइमरी स्कूल में मास्टर लग गए। जन्मतिथि बढ़ा कर लिखा दी गई थी सो नारायन से पहले रिटायर हो गए और गांव लौट कर सूद पर रुपया उठाने के धंधे में लग गए। खेती बारी भी बढ़ा लिए।हरवाह चरवाह तो थे ही उनके पास एक लठैत भी था।सूद पताई के काम में जोखिम के चलते जहां जाते वह लठैत भी साथ जाता।  पत्नी कभी किसी तो कभी किसी बेटे का घर संभालने बाल बच्चा पोसने शहर चली जाती मगर सुरारी का जी कभी वहां नहीं लगा। एक बार बेटी उन दोनों पति पत्नी को विदेश ले गई। लंबी हवाई यात्रा से वे इतना डर गए कि लौटने के लिए बवाल फान दिए।लौट कर इसी बैठकी में विदेश का ऐसा ऐसा चित्र खींचा कि लोगों का मुंह खुला का खुला रह गया। ख़ासकर अपनी अंग्रेज़ी से प्रभावित एयरहोस्टेस की परेशानी  बताने का उनका प्रसंग फरमाइशी प्रोग्राम में शामिल हो चुका था।
सबसे बढ़ कर तो वे मानने को तैयार नहीं थे कि लंदनियों को हिंदी नहीं आती। डंके की चोट पर कहते कि सब नहीं जानने का बहाना करते हैं।
इस तरह अपनी बेटी दामाद को ही नहीं नातिन को भी सांसत में डालने का प्रसंग वे  बड़े गर्व से सुनाते थे।
आज उनकी चुप्पी से सब शंकित हो चले थे।लग रहा था कि गुरु के मन में कुछ भारी पक रहा है।

किसी फिकिर में हैं क्या गुरु ! सिधनाथ पूछ बैठा।

सुरारी गमखाए से सबको देख उठे।सब उनका अझुरायापन समझ रहे हैं यह आभास उनको हुआ। यह उनके परिहासमय स्वभाव के विरुद्ध बात थी। बहुत कम होता था कि सुरारी गुरु ऐसे मद्धिम भाव में रहें। घर बाहर सब जगह इसकी उसकी चुटकी लेते बीत रही थी उनकी।जब कभी टोटा पड़ता तो अपनी ही हंसी उड़ाने पर आमादा हो जाते। यह बूता उनका ग़ज़ब था।
आज की बैठकी में यह धज नहीं थी।
नारायन को भी ऐसे गढ़ुआए सुरारी समझ में नहीं आ रहे थे।

सहसा सुरारी चलने को उठ खड़े हुए। 
नारायन की घरनी ने
 यह देख लिया। समझ गईं कि
अब दरवाजे का यह मेला अपनी राह लेगा ।

इस समय वह  चितिया के साथ चारा कटवा रही थीं।  वहीं से सबको रोक उठीं।ठमक गए सुरारी।
 थोड़ी ही देर में तश्तरी में सज कर आया पाहुर सबके सामने था।चितिया पानी लेकर आई थी। बड़े बड़े लड्डुओं की आब से बैठकी में जान क्या आई कि सुरारी नारायन से पूछ बैठे - बिना लिखा-पढ़ी के मजनुआ को रुपया क्यों दे रहे हो। एकबार भी हमसे चर्चा नहीं किए।एतना धोखा मिला है ,अबहिन पेट नहीं भरा ...
 दरअसल नारायन से यही पूछने का मौक़ा खोज रहे थे सुरारी मगर सबके सामने नहीं पूछना चाहते थे। नारायन की सिधाई के कारण कहीं न कहीं  वे खुद को नारायन का अभिभावक मान बैठे थे। यहां अफसरी मियां के हाते में उनकी रिहाइश का इंतजाम उन्होंने ही किया था और बढ़ चढ़ कर नारायन के स्वार्थी बड़े भाई और उनके वकील बेटे की दबंगई का निबटारा किया था।तब भी तो वे यह चाहते थे कि नारायन जमीन जायदाद के बटवारे के मामले में अपना ज़ोर दिखाएं मगर नारायन सधुआ उठे थे।
भरभराई आंखों से देखते हुए  बोल उठे थे कि अपनों से लड़ कर सब मिल भी गया तो क्या मिला।

नारायन तो सब भूल भाल गए मगर सुरारी के कलेजे में फांस अटकी थी।
जब से निरंजन का लड़का वकील हुआ है आधा गांव दीवानी फौजदारी के मुकदमें में फंस गया है। जब उस बाप बेटे ने नारायन के लिए बेहयाई दिखाई तो पूरा गांव समझ गया कि उनके मुंह में खून लग चुका है। गांव भी नारायन के प्रति हुए अन्याय से आहत था। मगर मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त वाला हिसाब था। नारायन तो सब छोड़ छाड़कर वहीं कलकत्ता के अपने संकरी गली वाले किराए के मकान में लौट जाने वाले थे ।उस मकान में जिसमें दिन बिताते हुए वे हमेशा गांव लौट कर बसने के बारे में सोचते थे। जो कलकत्ता परदेस था।पचास से ज़्यादा साल बीतने के बाद भी परदेस था।साल छ: महीने पर शादी ब्याह काज परोजन में जब गांव आते तब कलकत्ता के पड़ोसियों से कहते देस जा रहे हैं।सल्किया की उस बजबजाती गली में सबसे तीखी गंध गोबर की ही थी।पुरबिए ही अधिक थे वहां मगर सब जड़ों से टूटे हुए से।सबकी कमाई धमाई गांव घर खेत बारी में लग रही थी।सब अपने बाक़ी दिन गांव में हीत नात , टोले पड़ोसी से हेलमेल में बिताना चाहते थे।
सबकी याद में खुले आसमान के नीचे पनपता उनका धूसर गांव था।खेत बगीचा था और बोली बानी थी। सबसे ऊपर यह बोली बानी ही थी जिसकी कशिश अपरंपार थी।
बाहर चाहे बांग्ला झर झर फूट उठती रही हो मगर घर लौटते ही अपनी गंवई बोली का रंग लपेट लेता।तब जैसे सांस आती थी।
परायापन थोड़ा ढ़ीला पड़ता।

नारायन के चित्त में सबसे प्रगाढ़ यही था।अपनों के बीच में लौटना।
तेरहवां लगा था जब पिता ने पढ़ने के लिए कलकत्ता भेज दिया था। पढ़ाई में बहुत मन लगता था नारायन का। निरंजन को पहलवानी रास आ गई थी और वे उसी में ताल ठोकते बड़े हो रहे थे।
पिता ने अनुभव किया था कि धीरे धीरे निरंजन के व्यवहार में भी पहलवानी उतर रही थी।हाथी की तरह झूमते हुए वे बेहाथ होने लगे तो उनके पिता सरजू झटपट उनका गवना ले आए। खेती बारी संभालने लायक जांगर था ही उनका। खेती ठीक-ठाक थी। बिगहा भर में बगीचा भी था। घर में तीन तीन बखरी थी। गाय गोरु थे ही और एक खाते पीते किसान का अन्न धन से भरा पूरा घर दुआर था।सरजू , निरंजन नरायन और पंचानन के पिता स्वभाव से बड़े संतुष्ट किस्म के थे। पत्नी भी वैसी ही थी। उसने ही नारायन की पढ़ाई पर ज़ोर दिया था। गांव के स्कूल में डिप्टी साहब के सवालों का जवाब देकर नारायन हीरो बन गए थे।लोग कहने लगे थे कि पढ़ाई लिखाई से मिली नौकरी में ज़्यादा बरकत है।हर घर से पढ़वइया निकल कर अगल बगल के शहरों में जा रहे थे।

सुरजू ने नारायन को कलकत्ता भेजना तय किया। उनके लंगोटिया दोस्त मेराज का बेटा नइम वहीं पढ़ता था।मेराज भी पढ़ लिख कर अफसर बन गए थे और कलकत्ता में बैंक में मैनेजर थे। अपनी कमाई धमाई से गांव में खेत बारी बढ़ा रहे थे।नइम बड़ी क्लास में था। बड़े हियाव से छोटे भाई की तरह संभालता हुआ नारायन को अपने साथ ले गया था और दोनों के बीच भाई जैसा भाव हमेशा बना रहा था।
कलकत्ता शहर में अफसर च्चा की वजह से ही नारायन बस पाए थे।
एक दुर्घटना में नइम के गुजर जाने पर मेराज उनके भीतर ही नइम को देखने लगे थे।
गलते चले गए थे वे और एक दिन अफसराइन चच्ची और एकमात्र बिटिया मुन्नी  को छोड़कर वे भी गुज़र गए।

नारायन के पिता सरजू का कलेजा भी टूट गया था।
तब अपने जिगरी दोस्त की गृहस्थी बचाने में लग गए थे।उसकी पत्नी जिसे गांव अफसराइन कहता था उसका मनोबल और खेत जमीन बचाने में लग गए थे वे।
मजनू मुन्नी का बेटा था।खाला के बेटे से ब्याही गई मुन्नी का नसीब अच्छा नहीं था। पढ़ी लिखी थी मुन्नी मगर पति की ज़ाहिलियत का ठिकाना नहीं था। घर की माली हालत कमज़ोर हुई तो उसने ज़मीन जायदाद बेचने के लिए कलह फान दिया था।अफसराइन टूट गईं।सुरजू ने बीच बचाव किया। काफी कुछ बिक भी गया। घरेलू झगड़ों में गुंजाइश तो होती नहीं। बुरा यह हुआ कि उसने मुन्नी को तलाक़ दे दिया।
अफसराइन भी इसी ग़म में चल बसीं। मुन्नी बेसहारा ही हो जाती अगर नारायन ने संभाला न होता।

वही नारायन जब कलकत्ता छोड़ कर यहां बसने चले आए तो फिर लाग डांट वाली वही कहानी उभर आई।
नारायन को बसने के लिए जो चगह मिली वह अफसर च्चा की ही पुरानी रिहाइश थी ।अब वे लोग गांव के पास के कस्बे में रहने लगे थे। मजनू दूध के व्यापार में लग गया था। खेती बारी भी देखता था।
उसने निरंजन और उसके बेटे के व्यवहार के बारे में सुना तो दौड़ा चला आया था।सुरारी साथ में थे।तैश में थे सुरारी। मगर नारायन का निश्चय नहीं बदल पाए। यह ज़रुर हुआ कि नारायन ने अफसरी हाता के उस तीन कमरों वाले घर में रहना मान लिया मगर उसका किराया देकर। मुन्नी बहुत मर्माहत हुई। बहुत दबाव डाला उसने ,भाई बहन के रिश्ते का हवाला भी दिया मगर नारायन नहीं माने।

बोले कि पैसा फ़र्क पैदा करने लगा है बहिनी!
उसी मुन्नी की हालत बहुत गंभीर हो गई है। मजनू बौरा सा गया है।इलाज बहुत महंगा है। प्राइवेट अस्पताल में भर्ती है मुन्नी। पानी की तरह रुपया बह रहा है।
बहुत लाचार होकर वह नारायन के पास कल रात आया था - मम्मा ! अम्मी चाहती हैं कि आप यह अहाता खरीद लें। इलाज के लिए बहुत पैसा चाहिए ,कौनों और रास्ता दिख नहीं रहा है 

सुबक उठा था मजनू।
दुखी हो गए नारायन।
यह बात केवल उन दोनों के बीच हुई थी। नारायन कैसे अफसर च्चा के परिवार की ऐसी बेबसी का फ़ायदा उठा सकते थे।
रुपया उन्होंने मजनू के हाथ में पकड़ाया था। उसे और देने का भरोसा भी दिया। विश्वास दिलाते रहे कि अब रुपए पैसे की तंगी वाले दिन नहीं हैं उनके।लल्लू , उनके बेटे कमा रहे हैं और अपने बाप का ख्याल रखने वाली संतान हैं वे। कुछ बाकी नहीं लगाएंगे सो निश्चिंत होकर यह रुपया लो और बहिन का इलाज करो '
मजनू गिनने में लग गए तो नारायन उसे बरज उठे , कहने लगे कि तुम्हारे नाना ने अगर मेरे लिए ऐसे गिन कर मदद की होती तो मैं भी कहीं बिल्लला घूम रहा होता बेटा ! जाओ,  वक्त बर्बाद मत करो

नारायन को अचरज था कि यह सब कैसे  राई रत्ती से सुरारी को मालूम हो गया था।
वे नारायन के सबक न सीखने की आदत से परेशान हो गए थे। उन्हें पता था कि जमाना अब पहले जैसा नहीं है।अब कोई अफसर च्चा नहीं बचे हैं।जब सगा भाई अपनी संतान को पिता जैसे चाचा को बेइज्जत करने से नहीं रोक रहा है तब इस मजनू के ईमान पर ऐसे भरोसा करना ? 
यह ठीक है क्या
क्या लल्लू ने पानी में फेंकने के लिए बाप को रुपया दिया है।

नारायन चुप हैं।
समय का बदलना जानते हैं वे। समय तो मद्रास में भी बदल ही रहा था। पैसे का रुतबा बढ़ता जा रहा था।शहर कस्बा गांव सर्वत्र हर चीज़ पैसे से बदल कर देखी जा रही थी।सुरारी लंदन गए तब हर चीज़ पौंड में बदल कर सकते में पड़ जाते।  गांव आकर पहला काम यही किए कि सब खर्चा  पौंड में बदल कर देखे। चिल्ला कर कह उठे थे कि उतने में तो चार बिगहा खेत लिखवा उठा होता। 
पैसे की प्रधानता संबंधों का रस सोख रही थी मगर लल्लू  के लिए पिता का सपना  उनका अपना भी सपना था। उन्हें भी लगने लगा था कि उनके सपनों की दुनिया गांव में ही है।
पिता की कतरब्यौत में बीती ग़रीब ज़िंदगी का एक एक लम्हा उन्हें याद था। कलकत्ता में खाने पहरने का दिखावा न मां ने किया और न पिता ने।सब कुछ बचा कर वे भाइयों के बच्चों की पढ़ाई लिखाई शादी ब्याह के काम आते रहे। उसके अपने ऊपर कुछ खर्चे करने की उन्हें कभी ज़रुरत ही नहीं पड़ी और पढ़ाई पूरी कर रिसर्च में आते ही वह भी कमाई में लग गए और फिर नौकरी भी मिल गई। घर में पैसा आने लगा तब भी पिता ने कम में गुजारे वाली अपनी आदत नहीं छोड़ी। उन्हीं रुपयों से गांव में तेरह बीघा खेत लिखवाया जिस पर निरंजन के वकील सपूत ने सब पर दावा पेश कर दिया था।कहा कि बंटवारे के पहले घर का जो कुछ भी है उसमें सबका हिस्सा है। बहुत मर्माहत हुए नारायन।सिर झुक गया उनका।
लल्लू को पिता के दु:ख का बोध था।वे तो यह भी चाहते थे कि पिता वहां का सब कुछ उन लोगों के लिए छोड़ कर मद्रास चले आएं।वे यह चाहते तो थे मगर जानते थे कि पिता आएंगे नहीं।

इंटर पास करते न करते लल्लू ने अपनी पढ़ाई के लिए पैसा कमाना शुरु कर दिया था।
पिता की मितव्ययता  और संघर्ष देखा था उन्होंने। 
 उन्हें गांव के अपने परिवार की चिंता करते देखा था । पिता अपने भाइयों के बाल बच्चों की पढ़ाई लिखाई  शादी ब्याह के लिए पैसा भेजते रहते और खुद कड़ी मेहनत में जुते रहते।
सल्किया के जिस जर्जर मकान के निचले तल पर वे रहते थे वह बहुत सस्ता था किराए के हिसाब से मगर बहुत अंधेरा था वहां।सूरज की रोशनी तक की  वहां गुंजाइश नहीं थी।खाने पीने के सामान के हिसाब से कलकत्ता बहुत सस्ता था हमेशा। वहां चीजों का दाम बढ़ते ही बवाल कटने लगता सो यह बात इतनी अच्छी थी कि चार पैसे बचने की ब्यौत बन गई थी।उस बचत से ही सब कुछ निभाते हुए नारायन ने  गुजारा किया था। कलकत्ता के अपने संकरे दिनों को बिताते हुए वे हमेशा गांव घर के खुले और फैले दिनों के बारे में सोचते थे। फसलों की गंध सोच कर उमगते थे। एक तरह से वे बंदी जीवन जीते हुए आज़ादी से भरे भविष्य की कल्पना करते थे। उन्हें भरोसा था कि उनके जीवन का कर्मठता से भरा हिस्सा वहीं  मिलने वाला है। शहरी उपभोग और सुविधा का जीवन चारो ओर बहता रहा और उनके भीतर मिट्टी में बस कर जीने की लौ उमगती रही।अपने पिता की तरह ही खेती करने की उमंग उनमें बड़ी गहरी थी। मां और पिता की तरह ही सहने लहने की आदत भी थी तभी तो जब हमेशा आदर में बिछे रहने वाले भतीजे ने गुर्रा कर कहा कि बिना बंटवारे के जितना कुछ खेत है सबमें तीन हिस्सा लगेगा।

फक हुए चेहरे से वे बड़े भाई को देख उठे थे। कुछ कहने के लिए शब्द नहीं बचे थे उनके पास।
वैसे भी वे मौरुसी जायदाद में हिस्सा कहां चाहते थे। जानते थे कि
बड़े भइया का परिवार बड़ा था, खर्चे बड़े थे सो वे वहां कोई बंटवारा नहीं चाहते थे।अब तक वे उनकी जिम्मेदारियों में सहयोग ही करते आए थे।उनकी लड़कियों का एक से बढ़कर एक घर में विवाह करवाया। तीनों लड़कों की पढ़ाई में मदद की।छोटे भाई पंचानन का हिसाब दूसरा था। उसने बाज़ार में घर बनवा लिया था और पुश्तैनी घर के कई कमरे अपने परिवार के लिए ताला लगा कर बंद कर दिए थे।जब तब आकर अनाज पानी पर हक जमा देता।उस पर किसी का कोई ज़ोर नहीं था मगर नारायन के लिए बड़े भाई का आदर हमेशा पहली चीज़ था। पिता के बाद उनको ही अपनी छत्रछाया मानते रहे वे।उनकी जिम्मेदारी को अपनी जिम्मेदारी समझा। यही भतीजा इतना मीठा बोलता था , कि उसे वे मिट्ठू कहते थे। ऐसे बिछा रहता था कि देखने वाले दंग हो जाते।

 वही इतना कुरस हो कर बोल रहा था। ऐसा लग रहा जैसे नारायन के कुछ बोलते ही अनर्थ हो जाएगा।

नारायन बस इतना ही बोल पाए कि ठीक है ।लग जाएगा उसमें भी तीन हिस्सा। कोई बात नहीं है।
कहते हुए वे सिर झुकाए बाहर आ गए। पत्नी भी पीछे पीछे आ गईं।
पीछे पीछे आती हुई बड़ी भौजाई पूछ रही थीं - कहां जा रहे हैं बबुआ , अरे एक बखरी तो आपकी है ही।का कहेंगे गोती दयाद ! रुकिए न। अच्छा जाना ही है तो खा कर जाइएगा 

नहीं भाभी ! नारायन ने उन्हें बिना देखे यह कहा।


भरभराई आंखों से सब धुंधला दिख रहा था। बरामदा आंगन ओसारा और सब कुछ जैसे अदृश्य हो रहा था।वो दिन याद आने लगा जब उनकी मां ने चुपके से हथेली में चांदी का सिक्का पकड़ा दिया था और कहा था - परदेस में कोई अपना नहीं है बचवा ! गम खा कर रहना ।नारायन वही गम निगलते हुए जैसे विलुप्त हो जाना चाहते थे।

नारायन अपनी हथेली देख उठे। वह खाली थी।
पत्नी उनके बुझे हुए चेहरे को देख रही थीं।

कोई और बाहर नहीं आया।
चुपचाप दोनों प्राणी ने बस अड्डे की राह पकड़ी थी।
 
वहीं दौड़ा आया था मजनू। साथ साथ सुरारी भी थे।
उस दिन भी सुरारी को सारी खबर मिल गई थी।

"ऐसे कैसे सब छोड़ दिए भाय ! अरे कानून है कायदा है । मनमानी थोड़े चलेगी। चलिए पूरा गांव आपका तप जानता है।ऐसा नहीं होने देंगे हम। चूड़ी थोड़े पहिने हैं । "
बड़बड़ाते रहे सुरारी और नारायन उन्हें बरजते रहे।


लड़ाई भिड़ाई की सलाह रमंती को भी अच्छी नहीं लग रही थी। पहली बार वही बोल उठीं कि  - अब अपनी अर्जी हम ऊंहां लगाएंगे बबुआ जी , झगड़ा रगड़ा नहीं करेंगे। बच्चों के लिए रार छोड़ कर नहीं जाएंगे। मर्माहत हुई वह ऊपर की ओर इशारा कर रही थीं।

सुरारी तब भी अपनी ही रट में लगे रहे। उन्हें यह नारायन की कायरता लग रही थी।

मजनू सब सुनता चुप खड़ा था।अंत में वही बोला - अम्मी कह रही हैं कि अफसरी हाता मम्मा के लिए साफ करा दो।

नारायन भींग उठे थे। मजनू को अकवार में भर लिया था उन्होंने।
अब गांव में नारायन के हक़ की बात ज़ोर पकड़ गई थी। उनके सीधे मन मिजाज़ के प्रति सबकी करुणा उमड़ पड़ी थी। निरंजन को इसका अनुमान नहीं था। गांव पहले भी उनसे छत्तीस हो गया था।उनका गुमान पचता नहीं था किसी को।अब तो पानी सर के ऊपर से बह उठा था।

निरंजन अब लोगों को जुटा कर तरह तरह से अपनी सच्ची झूठी सफाई दे रहे थे।
गांव था कि उनको सुनने बरतने का तरीका खूब जानता था।

अफसरी हाता गांव से कटकर एक तरह से बीराने में था।
बीच में कई बीघा का ऊसर बंजर था। एक छिछला होता जाता पोखर था।
उसी में देखते देखते नारायन की गृहस्थी गुलजार हो उठी।
चारो तरफ से मददगार उठ आए।
सबेरे संझा कुछ न कुछ रजगज जुटी रहती। अखबार पढ़ा जाता।देस दुनिया की बात होती। सबसे ऊपर थी सुरारी की बैठकी।

उसी में आज मजनू को लिखा पढ़ी के बिना रकम दे दिए जाने की बात खुल गई। नारायन एकदम असहज हो उठे।सुरारी का ढ़ंग उन्हें अनखा गया था। अफसर चच्चा के परिवार के प्रति उनका शक उन्हें बहुत बुरा लगा।उनका जी पूरा उखड़ गया और वे गंभीर हो कर उठ खड़े हुए ।बोल पड़े -" सबके मन में जहर मत देखो भाई ! मजनू रकम डकार भी जाएंगे तो भैने हैं हमारे।खून सफेद करके कैसे जिएंगे मर्दे ? "
सुरारी अवाक हो गए।
महफ़िल भी भरुआ गई जैसे।



                चित्र- सोनी पाण्डेय







.........

दो पहर रात बीत चुकी होगी ।
गांव से अलग थलग पड़े इस हाते के आसपास का इलाका रात की अनेकानेक आवाज़ों से भर गया था। झिंगुर की सीटियां सबसे अधिक मुखर थीं। बीच-बीच में किसी भारी पक्षी के पंखों की आवाज़ भी थी।
पोखर के ऊंचे नीचे हिस्सों में बसे हुए सियार भी इधर उधर चल पड़ते थे। इस वीराने तक उनकी भी खूंद खांद सुनाई देती थी।
रमंती थोड़ा डर जातीं।
नारायन भी इस उजाड़ में रहने के अभ्यास में कहां थे।सल्किया की मकानों से घिरी हुई उस अंधेरी रिहाइश से बहुत अलग ज़मीन थी यह।
रमंती खाना पीना निबटने के बाद चितिया के साथ सब धरने ओसारने में लगी थीं। बाहर छान छप्पर में बंधे मवेशियों में हल्की फुल्की आवाज़ें थीं।चितिया का आदमी गोरख भी दो दिन से मजनू के साथ शहर में था सो वह भी बच्चों को लेकर मलकिन के हिस्से में ही सोने वाली थी।उसकी अपनी रिहाइश अहाते से ज़रा सा हट कर थी मगर यह पूरा इलाका इतना सुनसान था और थोड़ी ही दूर पर सड़क निकल रही थी जिसके चलते असुरक्षा भी थी सो उसे अपने बच्चों सहित यहीं रहना था। रमंती बहुत मिलनसार और दयालु थीं। नारायन तो थे ही। गोरख और चितिया अफसर चच्चा के मुरीद थे।नारायन गांव में रहने आए तो मजनू ने ही उन्हें उनके सुपुर्द कर दिया कि बहुत कर्मठ और ईमानदार हैं साथ ही उन्हें भी अच्छे घर में आसरा मिल जाएगा।

चितिया को ज़मीन पर ठक ठक लाठी ठकठकाने की आवाज़ सुनाई दी।
गांव में रात बिरात लोग ऐसे ही चलते हैं कि को सांप गोजर हो तो अपना रास्ता ले ले।
चारो तरफ छाए सन्नाटे को तोड़ती इस आवाज़ को नारायन ने भी सुन लिया। थोड़ा शंकित हुए वे तब तक देखा चिति उनकी गोजी लिए चली आ रही है। धीरे से बोली वह - बब्बा ! कोई है दुआर पर ।

तब तक सर मुंह ढ़के दो जने आकर ओसारे में खड़े हो गए। मद्धिम पीली रोशनी वाला बल्ब उनकी परछाई को लंबा फैला रहा था। नारायन शंकित हुए। कुछ कहते कि सहसा पहचान उठे। अपने लठैत के साथ सुरारी थे ये। थोड़ी ही देर बाद एक और लहीम शहीम व्यक्ति वहां लाठी ठकठकाता हुआ आ खड़ा हुआ।

"नींद नहीं आ रही थी भाई हमको ।आज बैठकी में मुंह से न जाने क्या क्या निकल गया।डर गए हम। तुम्हारे पास नकद रकम की खबर चोर चाईं को लग गई होगी।अब गांव पहले की तरह नहीं है। मदकची बढ़ गए हैं यहां भी।कुएं से लोटा डोरी तक उठा ले जा रहे हैं सब। मेरी ही बेवकूफी से सब मामला खुल गया तो मैं ही सब ठीक करुंगा।समझे " 
नारायन सुन रहे थे सुरारी को।सिर हिलाया उन्होंने। जिसका मतलब था कि " नहीं समझे "


सुरारी हाता पर लठैत तैनात करने के लिए आए थे। नारायन को बेफिक्र करने के जतन में लगे थे वे। यह भी बताया उन्होंने कि इसके लिए उन्हें कुछ खर्चा पानी नहीं करना पड़ेगा बल्कि  बोधू अपने लिए खुद रसोई बना लेगा।उन पर कोई भार नहीं पड़ेगा।
सुरारी जब तक बैठे ,यही रटते रहे कि अपनी बेवकूफी में उन्होंने मामला बिगाड़ दिया है।

नारायन भी थोड़ा परेशान हो गए। गांव के बदले हुए हालात उनके फैसले को हिला रहे थे।जाते जाते सुरारी यह भी चेताते गए कि गांव के मियां लोग भी बहुत बदल गए हैं।सब अरब जाकर कमाई कर रहे हैं। अयोध्या के बाद सबका मिजाज़ बदल गया है।मजनुआ के अड़ार पर जब देखो तब उनकी जुटान होती है।मिले हुए हैं सब। पहिले की तरह नाते रिश्ते का लिहाज नहीं है अब।
सुन सुन कर नारायन का कलेजा बैठा जा रहा था। यह तो भारी निस्सहायता थी।

रमंती समझ रही थी सब।
 बोल पड़ी कि उसे नहीं लगता कि मजनू बेइमान है।
 गांव बहुत बदल चुका था।  
 मुफ्तखोरी धोखा ठगी और अब  तो डकैती भी यहां आम हो गई थी। गांव के संपन्न घरों से निकले पढ़वइया तो शहर में रोज़ी रोटी के लिए बस चुके थे। खेती किसानी से मरहूम लोग भी तरह तरह की आजीविका पकड़ अब दूर पास के शहरों में बस गए थे मगर यह ज़रुर था कि उनका रिश्ता गांव से बना हुआ था।
 हुआ यही था कि गांव में अब लखैरे  बहुतायत रह गए थे। वे ही चोरी चकारी उचक्कागिरी में मुब्तिला थे।
 वे एक आतंक थे अब।
 सुरारी को यही चिंता थी कि नारायन को गांव की इन सच्चाइयों का पूरा पता नहीं था।
 उन्हें बार बार लग रहा था कि नारायन को गांव के ऊंचे खाले का अनुभव नहीं है। 
 वे गांव घर के लिए प्रेम और भरोसे से लबालब भरे हुए  आए थे।
  हालांकि यहां उन्हें एक बाहरी व्यक्ति की तरह ही समझा जा रहा था।ऐसा बाहरी व्यक्ति जिसकी गांठ में इफरात पैसा है। पैसे रुपए की चर्चा गांव में बहुत ज़ोर पकड़ती है और गुड़ पर चूंटा लगने की तरह  चोर बेइमान लोग घेरने लगते हैं।

रात के इस पहर गढ़ुआए हुए आए सुरारी नारायन और रमंती को चिंता से ज़्यादा अफ़सोस में डाल गए थे। मजनू के लिए शक का कोई कीड़ा नारायन के कलेजे में नहीं उतार पाए वे। 



                        चित्र- सोनी पाण्डेय







एक दो दिन का रिश्ता नहीं था वह।वह जो भी था उनके रक्त में घुल चुका था।जिन संबंधों में बसने के लिए वे यहां लौटे थे उनमें से एक का खूंटा भले उखड़ गया मगर अफसर चच्चा से , उनकी बेटी और नाती से ऐसे वक़्त में वे तिजारती कैसे हो सकते थे।सुरारी क्या इस रिश्ते के बारे में जानते नहीं। पूरा गांव जानता है यह।नारायन की पढ़ाई लिखाई पर जो लगा वह अफसर चच्चा का ही था। सरजू ने जब इसरार किया था तब हो हो करके हंसे थे चच्चा।बोले  थे वे कि देना है तो नईम की फीस भी दो , अकेले नारायन की देकर तो बच्चों में फ़र्क ही डाल रहे हो ।


फिर दोनों दोस्तों ने एक दूसरे पर लानत भेजने का सिलसिला जारी रखा था।
नईम जब नहीं रहा था  तब वे बार बार आकर नारायन को देख जाते थे। स्कूल से लौटने में ज़रा सा देर होने पर सड़क पर आकर खड़े हो जाते।उनका गोरा चेहरा चिंता से तप जाता। नारायन तब कुछ अधिक समझने लायक नहीं थे। मगर उस प्यार को कैसे न समझते जिसमें इतनी परवाह मिली थी। चच्चा रिटायर हो कर गांव लौट आए तब कलकत्ता सचमुच उनका परदेस हो गया था। और फिर दोनों नहीं रहे। 

आज नारायन की स्मृति में यह सब जाग उठा है। बेचैनी है जिसकी थाह तो मिल रही है मगर संभालना मुश्किल है।
ऐसा लग रहा है जैसे लल्लू के सिर से कोई छाया खींच लेने पर आमादा है।
रमंती को उनकी बेकली समझ में आ रही है।उनका अपना मन भी  तो दुनियादारी में गर्क नहीं है।

दोनों प्राणी जैसे एक दूसरे की चुप्पियों में घूम रहे थे।
रात शिथिल सी बीतती रही और बीत गई।


"लल्लू आ रहे हैं " नारायन ने रमंती को बताया।
अभी अभी वे बस अड्डे से लौटे थे। उनके साथ लगा बोधू अपनी खैनी से गर्द उड़ाता हुआ ओसारे में लौट गया।
दो दिन बाद फगुआ था। हवा की तासीर बदल चुकी थी। दृश्य में वसंत और पतझर साथ साथ दिख रहे थे। सालों बाद फगुआ पर नारायन गांव में थे इस बार। लल्लू और उनका परिवार भी त्यौहार पर साथ होने वाला था । उसके बाद सबको साथ साथ चेन्नई चले जाना था।
रमंती ने पूछ लिया -  "मुन्नी बहिन से मिलने नहीं गए ?"

उदास थे नारायन।
" फटे दूध से घी नहीं निकलता मलकिन " - कहते हुए वे भीतर चले गए थे।
बोधू के कान इधर ही लगे थे।
पिछले कुछ दिनों से वह इस घर में बदली हुई फिज़ां महसूस कर रहा था। अधिक कुछ जान सकने का उपाय उसके पास नहीं था मगर यह पता चल गया कि नारायन लौट कर अपने बेटे के पास जा रहे हैं। गांव से उनका जी उचट गया है। गोरख ने बताया कि गाय गोरु सब मजनू की गौशाला में जा रहे हैं।
चितिया और गोरख बहुत उदास थे।
उदास तो रमंती भी बहुत थीं।नारायन का टूटा हुआ जी उनके कलेजे में अटक गया था। अपने ही मोह का चिथड़ा उड़ते देखा था उन्होंने।इतना तो वे सगे भाई भतीजे के स्वार्थ से नहीं टूटे थे।
वैसे ही भग्न मन वे गायों के पास जाकर खड़े हो गए। कजरी ने पलट कर उन्हें देखा। उन्हें लगा जैसे उसकी आंखों में शिकायत है।वे आंखें फेर कर हट गए वहां से। गोरख चारे के गट्ठर सहेज रहा था। नारायन की खामोशी से वह भी भारी हुआ था जैसे।दुआर पर कहीं कोई ध्वनि ही नहीं थी।नीम पर चढ़ती उतरती गिलहरियां भी आज आवाज़ नहीं कर रही थीं। 
दुआरा खाली तो था ही उदास भी बहुत था।
आज बैठकी के लिए भी कोई नहीं आया।

शाम को सुरारी हांक लगाते हुए चले आए।
उनके लठैत के गोजी की धप्प धप्प आकर नारायन की खटिया के पास ठहर गई थी।
धीरे धीरे सब जुट गए। बल्कि अचरज था कि बेनी की माई ,परबोधी फुआ और  गुनी आजी भी दुआर से होती हुई रमंती के पास भीतर चली गईं। शायद अब सबको उन लोगों के लौट जाने की खबर लग गई थी।
दुःखी थे सब।

उधर सुरारी सबसे ज़्यादा ही तैश में थे।उनको लग रहा था कि मजनू ने ही कुछ धोखा कर दिया है जिससे नारायन का जी टूट गया है।
मजमें के बीच हांथ नचाते हुए वे बोल पड़े - " मर्दे मियां मकड़ी के ब्यौहार से उखड़ गए! हम से बताए काहें  नाहीं ?हम उसकी नटई में हाथ डाल कर तुम्हारा पाई पाई वसूल लेते ।समझे का हो। गांव में रहने का कलेजा रखो यार ! एतना सब जुटा लिए।खेत बगइचा का डौल भी बइठ ही गया । ऐसा बड़ा फैसला कर लिए अऊर हमको कुछ पता ही नहीं चला। बेगाना कर दिए यार तुम " 

नारायन उन्हें थिर हुए से देखते रहे ।
सुरारी की बात पर सिर हिलाते समाज को भी देख उठे वे।

" जिसे मियां मकड़ी कह रहे हो उसने सैकड़ा पीछे दो रुपया जोड़ कर सब पैसा लौटा दिया है ,समझे ! उसने मुझे भी तुम्हारी तरह पैसे से पैसा उगाहने वाला समझ लिया । मेरे मुंह पर रुपया मार दिया है "
सुरारी हैरत में आ गए।
नारायन का आवेश बढ़ता चला जा रहा था।आवाज़ में रोष था , दुःख था  - " मैं गांव में सूद पर पैसा उठा कर लठैतों के बल पर रहने के लिए नहीं आया था।पूरी जवानी मैंने इस ज़मीन के लिए तड़पते हुए बिताई। सोचता था इतनी मेहनत इतना पसीना अपनी भूमि पर गिराता तो क्या जीवन नहीं कटता। अफसर चच्चा की बदौलत इतना जुटा सका कि अपने गांव जवार के लिए कुछ कर सकूं। खेती पताई पढ़ाई लिखाई में यहां के लोगों के काम आ सकूं। लल्लू के दिल दिमाग में भी यही सपना भरता रहा। मगर तुमने तो मुझे मेरी ही निगाह में गिरा दिया।हिंदू मुसलमान चलाने लगे।" 
नारायन की आवाज़ भरभरा आई थी। सुनते हुए स्तब्ध थे सभी।
सुरारी की असुविधा का तो कोई हिसाब ही नहीं था।वे बार बार पहलू बदल रहे थे।नारायन का कहना उन्हें भीतर तक छील रहा था। उन्हें उनके ऐसे बेलिहाज हो जाने का अंदाज़ नहीं था। अपनी ओर से तो उन्होंने उनके भले में कुछ उठा कर नहीं रखा था।उनका अनुभव तो यही था। दिनदहाड़े गांव में लूट मची हुई थी।हर तरह की लंपटई का बोलबाला था। उससे बचाना ही तो चाहते थे वे। और हिन्दू मुसलमान में फाड़ तो हो ही गया है। कहां है वहां कोई गुंजाइश।अपना भाई गर्दन पर पैर रखकर नहीं खड़ा हो गया था क्या ?
मगर यह सब कुछ बस सोच रहे थे सुरारी।नारायन ने उनके कुछ भी कहने का स्पेस नहीं छोड़ा था।उनका दुःख और तैश बढ़ता ही जा रहा था।
कह रहे थे वे - जिसे मुसलमान कहते हो उसकी बदौलत ही इस तीन एकड़ के इलाके में बसा हूं। दो दो गाएं खड़ी हैं छप्पर में।दो टहलुए काम यहां करते हैं उजरत मजनू से पाते हैं। मेरे तलवों के नीचे हथेली बिछा देता है वह। मम्मा मम्मा कहते थकता नहीं। उसने मेरे एकाउंट में सूद सहित पैसा लौटाया है। यह है मेरी कमाई। तुम्हारी तरह वाली कमाई ।
अब मैं ऐसे ही कमाने के लिए यहां रहूं, तुम्हारी तरह ? तुम्हारी तरह वसूली करते हुए पैसे पर पैसा चढ़ाते हुए सबका खून चूसते हुए बना रहूं। अरे मैं यह करने नहीं आया था।तुम करते हो यह , क्यों करते हो , क्या सुख है तुम्हें तुम जानो। बेटा बेटी सब अपना कमा खा रहे हैं। कोई कमी नहीं लगी है।तब भी तुम्हें उगाही करना है। गांव में चोरी चकारी बढ़ गई है , यह कहते हो। कभी सोचा कि कुछ बेबस लोगों के लिए करते ? बच्चों के लिए करते , जवानों के लिए करते। उसमें क्या जी नहीं लगता। मास्टरी भी तो ऐसे ही किए तुम !  गायब ही रहे स्कूल से। तुम्हारे जैसों के कारण ही लोगों के मुंह में खून लग गया है। सोचते हो यह कभी ?"

यह सब सुनते हुए लोग भी अब बहुत असुविधा महसूस कर रहे थे।
सुरारी का चेहरा सफ़ेद पड़ता जा रहा था।
ऐसी दुर्दशा के बारे में तो वे सोच भी नहीं सकते थे।
उन्हें लग रहा था जैसे इस फटकार में वहां बैठे सब लोगों की आंच जाकर मिल गई है।
सब फटक कर उठ खड़े हुए वे।
 "बहुत हो गया भाय अब , बहुत हो गया।भरी मजलिस में खूब इज्जत उतारे तुम। हमसे ही गलती हो गई कि तुम्हारे मामले में कूद पड़े। आजतक किसी के लिए कुछ नहीं किए थे हम , तुम्हारे लिए किए तो मुंह भर पा गए।पूरे गांव में हमारी ताजपोसी फइल जाएगी अब। 
 जाओ , जहां रहो खुस रहो "

 पूरा दुआरा स्तब्ध था।

मजनू की फटफटइया आकर रुकी तब सुरारी से वहां रुकते नहीं बना।

नारायन ने देखा उसे।
मुंह फेर कर खड़े हो गए।
 दुआर पर जमे समाज ने मजनू को नारायन के पैरों पर झुकते देखा  " मम्मा "

" क्या मम्मा यार ! हिंदू मुसलमान में मम्मा भैने नहीं हो सकते।भैने मम्मा के मुंह पर सूद समेत पैसा लौटा कर बेइज्जत करता है। इससे तो अच्छा था कि चौराहे पर खड़ा करके जूता मार देते बेटवा !"

बिलख उठा मजनू - " मारिए मुझे !  जूतों से मारिए मगर ऐसी सज़ा मत दीजिए। अम्मा मुंह में कौर नहीं दे रही है।कह रही मैंने उसके भाई को बेगाना कर दिया।चाहे जो करिए मगर गांव छोड़ कर मत जाइए ।अनाथ हो जाएंगे हम "

 रमंती की आंखों से आंसू झर रहा था।
 सब हिल उठे थे इसे देख कर।

 लोगों ने पस्त क़दमों से लौटते सुरारी के पीछे जाते हुए मजनू को देखा।वह उन्हें कक्का हो ! कह कर पुकार रहा था।

हवा के साथ उड़ती हुई एक ठंडी लहर आ कर सबका माथा सहला गई थी।

चन्द्रकला त्रिपाठी








परिचय

प्रोफेसर चंद्रकला त्रिपाठी सुप्रसिद्ध कवयित्री हैं। उनके दो कविता संग्रह क्रमशः ‘वसंत के चुपचाप गुजर जाने पर’ तथा ‘शायद किसी दिन’ बेहतरीन संग्रहों में से हैं। इससे इतर गद्य की उनकी पुस्तक ‘इस उस मोड़ पर’ पिछले वर्षों में काफी चर्चित रही।
पूर्वग्रह , शब्दयोग ,  चौथी दुनिया , परिकथा ,सुलभ इंडिया आदि पत्र -पत्रिकाओं  में कहानियाँ प्रकाशित।

सोमवार, 13 दिसंबर 2021

वन्दना वाजपेयी की कहानी

                 तारीफ



मटर-पनीर , मलाई कोफ्ता, बथुए का रायता , इमली की चटनी ,मेवों से तर-बतर गाज़र का हलवा  और रुमाली रोटी, डाइनिंग टेबल पर सुन्दर डोंगों में ये सारा कुछ सजा कर ज्योति अपने पति राहुल का इंतजार करने लगी | माहौल को थोडा रोमांटिक करने के लिए उसने बगीचे से दो गुलाब के फूल तोड़ कर एक काँच की प्लेट में थोड़ा पानी भर कर उनकी पंखुरियां बखेर दी | भीनी –भीनी खुशबु से पूरा कमरा महक उठा |

  इस उत्साह  की खास वजह ये थी कि आज ज्योति ने पहली बार  राहुल के लिए खाना बनाया था | विवाह के बाद ससुराल में यूँ तो सासू माँ ने एक कड़ाही में पांच गुलगुले चुआ कर रसोई छूने का शगुन करवा लिया था , पर पूरा खाना बनाने को उन्होंने ये कहकर मना कर दिया था कि अभी नयी आई हो , दो चार दिन आराम कर लो , चकला-बेलन तो एक बार पकड़ा तो मरते दम तक औरत के हाथ से छूटता नहीं है |

 

अब सासू माँ को ये तो पता नहीं था कि खाना बनाना ज्योति का शौक था | बचपन से ही जब माँ रसोई में खाना बना रही होतीं वो भी पास बैठ कर बनाने की जिद करती | माँ ने बच्चों का खेल समझ कर उसको छोटा सा चकला बेलन ला कर दे दिया था | यहीं से शुरू हुआ खाना बनाने के प्रति उसका अगाध प्रेम , जो उम्र के साथ बढ़ता ही गया | पढाई लिखाई में वो सामान्य थी पर रसोई शास्त्र में हमेशा अव्वल नंबर लाती |

 रसोई उसकी संगीतशाला  थी , चकला, बेलन , कड़ाही और चमचा , उसके वाध्ययंत्र , जिनसे वो तरह –तरह के भोजन रागों का आविष्कार करती थी | तभी तो खाने वाले भी अंगुलियाँ चाट-चाट कर खाते थे | पिताजी तो तारीफ़ करते नहीं थकते थे, मेरी बेटी का बनाया जाफरानी पुलाव कभी खाया है? , कभी आइयेगा हमारे घर कलाकंद खाने पूरे भारत में ऐसा कलाकंद कहीं नहीं मिलेगा, अरे नहीं भाई साहब , बाज़ार के नहीं हैं ये मोतीचूर के लड्डू तो मेरी बेटी ने घर में बनाये हैं , नाम जरूर ज्योति है पर है अन्नपूर्णा |  

किशोरावस्था से उसके यहाँ सहेलियों का जमघट लगा रहता | सबकी माँ की हिदायत जो होती ,  जाओ ज्योति से दो चार ढंग की चीजें सीख कर आओ , कितना भी पढ़ लिख जाओ, रसोई तो औरत को ही संभालनी पड़ती है | और सहेलियाँ उसे घेर लेतीं | ज्योति जरा रुमाली रोटी बनाने की विधि बताना , अच्छा ज्योति बताना खीर में शक्कर का अंदाज कैसे करते हैं, खिचड़ी में पानी कितना डालें?  वो किसी शिक्षक की भांति सबके सवालों को सुलझाती रहती |

जब विवाह की बात चली तब अनुप्रिया ने उसका हाथ पकड़  कर कहा , “ बड़े नसीब वाले हैं  राहुल जीजाजी जो उन्हें इन हाथों से बना खाना खाने को मिलेगा | “देखना अंगुलियाँ चाट –चाट कर तारीफ़ करेंगे , इतना हुनर है हमारी ज्योति के पास” , राधिका ने समर्थन किया | मृणालिनी भी कहाँ चुप बैठने  वाली थी झट से बोल पड़ी,  “देखना इनका लव सॉंग होगा , ‘तुम खिलाती रहो , मैं खाता रहूँ , इतना बढ़िया खाने से और प्यार आता है “ उसकी इस बात पर सब खिलखिला पड़ीं |

 

 ज्योति लजाते हुए अपने भविष्य के सुनहरे सपने देखने लगती  , जब वो अपने राहुल के लिए खाना बनाएगी और वो अपनी बाहों में भींच कर कहेगा , मेरी ज्योति से अच्छा खाना कोई नहीं बना सकता, सारी  जिन्दगी खाता रहूँगा तब भी कभी मन तृप्त नहीं होगा | मैं बहुत खुशनसीब हूँ ज्योति जो मुझे तुम्हारे जैसे पत्नी मिली |” वो उसके होंठों पर हाथ रखकर कहेगी , “ इतनी तारीफ़ ना करिए , आप जैसे ज्ञानी पति  को अपने हाथों से बना कर खिलाना मेरा भी तो सौभाग्य हैं |” राहुल उसका हाथ हटा कर उसे अपने सीने से लगा लेगा और जिन्दगी रसगुल्लों की चाशनी की तरह मिठास से तर –बतर हो जायेगी |

 

वो अपने ख्यालों में खोयी ही थी कि राहुल आ गया | वो जल्दी –जल्दी डोंगों से खाना उसकी प्लेट में परोसने लगी | राहुल ने उसे रोकते हुए कहा , “ मैं कर लूँगा इतना , तुम अपनी प्लेट भी लगा लो |” वो अपनी प्लेट लगाने लगी | राहुल ने प्लेट लगाने के बाद अखबार खोल लिया | सुबह घंटा भर पढ़ा हुआ अखबार वो दोबारा पढने लगा | ज्योति उसके चेहरे के बनते –बिगड़ते भावों से खाने के पसंद –नापसंद का अनुमान लगाने लगी | तभी राहुल की उडती से नज़र ज्योति पर पड़ी , वो उसे ही एकटक देख रही थीं | “ क्या हुआ ?” राहुल ने पूछा | कु ... कु... कुछ नहीं , खाना कैसा लगा ?” उसने सकपकाते हुए पूंछा | “ हूँ , ठीक है |” राहुल ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया |

 

थोड़ी देर अखबार में सर घुसाए रखने के बाद उसने फिर सर उठाया | ज्योति को आशा जगी | राहुल ने कहना शुरू किया , “ ये शेयर मार्किट इस समय बहुत गड़बड़ कर रही है | मेरे ख्याल से इस समय बुल की जगह बीयर मार्केट   में पैसा लगाना सेफ रहेगा | “ उसके बाद उसने फिर से अखबार में डुबकी  लगा ली | उसे शेयर मार्किट तो समझ में नहीं आती थीं पर इतना तो समझ ही गयी कि उसके मलाई-कोफ्ते , मटर पनीर .... राहुल ने नहीं , बुल और बीयर ने खा लिए | मन में निराशा तो थी पर उसने अपनी उम्मीद की थाली  शाम के खाने की तरफ सरका दी |

 

शाम से सुबह हुई , सुबह से फिर शाम की यात्रा करते –करते चार  महीने बीत गए पर ज्योति के हिस्से में तारीफ़ नहीं आई | राहुल खाने की मेज पर कभी देश की उठती गिरती समस्यों में उलझा होता, तो केक कितनी मुलायम  बनी है इस बात का ध्यान कहाँ जाता   , कभी कोई अंतर्राष्ट्रीय घटना के आगे इडली-सांभर  की बात करना भी अल्पज्ञता की निशानी होती , कभी ऑफिस की समस्याओं में जलेबी उलझ कर रह जाती तो कभी घर परिवार की समस्याएं जाफरानी पुलाव को चट कर जातीं | कारण कुछ भी हो उसको इतने महीने बाद भी तारीफ नहीं मिली तो नहीं मिली |

धीरे –धीरे उसका सब्र जवाब देने लगा | सलीके से रसमलाई की गार्निश करती अँगुलियाँ शब्दों का सलीका भूल गयीं | “ कभी तो मुंह से खाने की तारीफ में कुछ बोल दिया करो, क्या सर  अखबार में घुसाए –घुसाए खाते रहते हो , ये जो मुँह  में बिना ठीक से देखे  ठूस रहे हो ना उसको बनाने में भी मेहनत  लगती है |” वो गुस्से में फूट पड़ी |

“ तो क्या , तुम्हारी प्रशंसा के लिए गीत –काव्य लिखूं , खाना ही तो बनाया है , ऐसा कौन सा मंगल गृह का नया रास्ता खोज लिया है , दुनिया भर की औरतें बनाती हैं, इसमें नया क्या है ? जरा सा कुछ हल्दी मसाले इधर –उधर कर दिए और लगीं तारीफ की उम्मीद करने | देखो मैं तुम्हारा पिता की तरह भोजन भट्ट नहीं हूँ ,  जो हर रोज अँगुलियाँ चाट –चाट कर तुम्हारे खाने की तारीफ़ करता फिरूँ |  बहुत सारे काम हैं मेरे पास करने को, बैठे –बैठे तारीफ़ करने के अलावा  |”  धडाम से कुर्सी फेंकते  हुए राहुल ने कहा और खाना अधूरा छोड़ कर ही चला गया | शायद पुरुष का अहंकार ज्योति का कहने का तरीका बर्दाश्त नहीं कर पाया था |

 

उसकी आँखें पछतावे से भीग गयीं | बेकार ही कहा , खाना भी नहीं खाया | कम से कम पूरा खा तो लेते थे | सारा दिन ऑफिस में मेहनत करते हैं , मैं भी किस बात पर उलझ पड़ी | तुरंत राहुल को मनाने चली गयी |  “ सॉरी राहुल , मुझे ऐसे नहीं कहना चाहिए था , तुम प्लीज खाना खा लो |” राहुल अपनी फ़ाइल में सर गड़ाए बैठा रहा | दो –दिन बात भी नहीं की | धीरे –धीरे सीज फायर हो गया | राहुल सामान्य तौर से खाना खाने लगा और वो सामान्य तौर से तारीफ की उम्मीद करने लगी |

 

एक दिन राहुल अपने दोस्त के घर  उसको लेकर गया | वहां  खाना खाते समय ना अखबार था ना  शेयर मार्किट  ना राष्ट्रीय , अंतर्राष्ट्रीय समस्याएं , राहुल खाना खाते हुए बार –बार तारीफ कर रहा था | भाभी जी , आपके हाथों का जवाब नहीं , ये मटर पनीर  कितना स्वादिष्ट बना है | वाह –वाह जाफरानी पुलाव के तो कहने ही क्या | वो विस्फारित नेत्रों से राहुल को देखने  लगी | उसने नोटिस किया कि जब भी अपने दोस्तों के यहां जाता है, स्वाद को गैरमामूली चीज समझने वाला राहुल  उनकी पत्नियों के बनाये खाने की तारीफ़ करता है | ये वजह एक बार फिर उसको नाराज करने के लिए काफी थी |

 

घर आ कर साड़ी बदलते हुए उसने राहुल को टोंका , “ क्या बात है राहुल , अपने दोस्तों की पत्नियों के खाने की तो इतनी तारीफ़ करते हो , कभी मेरी भी कर दिया करों |

“ हाँ , तो ?, खाना पसंद आया तो कर दी , कभी तुम भी अच्छा बनाओगी  तो तुम्हारी भी कर दूँगा | अभी तो तुम्हारी फिगर की तारीफ करने का दिल कर रहा है “,कहते हुए राहुल ने उसे अपनी और खींच लिया | सुबह भारी  मन से उठने के बाद वो सोचने लगी  कि शरीर की संतुष्टि हमेशा मन की संतुष्टि नहीं होती | अपने स्नेह और हुनर के पारिश्रमिक के रूप में तारीफ के दो बोल ही चाहती थी वो | उसकी ये छोटी से इच्छा भी राहुल पूरी नहीं कर सकता | सोचते –सोचते उसे तेज उबकाई आने लगी |







 

अब उनकी जिंदगी में नन्हा गौरव भी शामिल हो गया था | मातृत्व के शुरू के वर्षों में ज्योति का राहुल की तारीफ़ के प्रति इतना ध्यान ही नहीं गया | उन दोनों के बीच बातें भी मुख्यत : गौरव की ही होती | अरे देखो , ‘पापा कहा , अरे ये तो चलने लगा , कौन से स्कूल में एडमिशन कराना है | ऐसा नहीं था कि जिन्दगी थम गयी थी , अभी भी दोस्तों के यहाँ जाना –खाना पीना यूँ ही चल रहा था पर जिन्दगी की प्राथमिकता ‘गौरव के इर्द –गिर्द ही घूमती | सेरेलेक और बेबी फ़ूड की बातों में अपने व् राहुल के लिए क्या पका रही है इसका ख्याल भी कम ही  रहता |

 

इसी बीच अनुप्रिया का ट्रांसफर उसी शहर में हो गया | उसने राहुल और ज्योति को खाने पर बुलाया |  उसने सरसों का साग और मक्के की रोटी, हरी धनिया की चटनी , दाल मखनी और साथ में थोडा सा नैनू (ताज़ा निकाला हुआ मक्खन) परोसा | जाड़े के दिन थे  गर्म –गर्म खाने का स्वाद कुछ और ही बढ़ गया था | राहुल ने खाते –खाते कहा , अनु , आपके हाथों का जवाब नहीं क्या खाना बनती हैं आप , बड़े भाग्यशाली हैं आप के पति जो आप जैसे पत्नी मिली है | कौर मुँह में ले जाते हुए ज्योति के हाथ जैसे रुक गए |

तभी अनु बोल पड़ी , “ जीजाजी आप तो झूठी तारीफ़ रहने ही दीजिये , गुरु तो आपके घर की रसोई में बैठा हैं , ये सब बनाना मैंने ज्योति से ही तो सीखा है |”

“गुरु गुड ही रह गया और चेला चीनी हो गया , ये सारे हुनर तो बेगम साहिबा मायके में ही छोड़ आयीं “ राहुल ने हँसते हुए कहा और सब उसकी बात पर हँस पड़े |

उसकी वर्षों दबी इच्छा कुरिद गयीं , आँखें डबडबा  गयीं , वो खाना छोड़ कर अंदर दूसरे कमरे  में चली गयी | अनु बात को भांप कर उसके पीछे –पीछे आई और उसके पास बैठ कर बड़े प्यार से बोली , “ ज्योति तू  भी ना ,किस बात पर दुखी होने बैठ  गयी ,  दुनिया के सारे मर्द ऐसे ही होते हैं , उन्हें अपनी बीबी में कोई हुनर नज़र नहीं आता , और दूसरों की बीबी में कोई दोष नहीं , ऐसी बातों को दिल पर नहीं लेते | फिर जीजाजी ने तो मजाक में कहा था |

“मजाक” ज्योति ने अनु का हाथ हटाते हुए कहा , “ शायद मजाक ही होगा, पर मेरी तो हसरत रही ही गयीं अपने बनाये खाने की तारीफ़ सुनने की |”

“ हाँ तुझे लग सकता है तू इतना स्वादिष्ट खाना जो बनाती आई है , मैं तो रोज बनाती भी नहीं पर जिस दिन बनाती हूँ , मन तो तारीफ़ के लिए मचलता है , पर मेरे पति को भी देखो , जल्दी से आवाज़ फूटेगी ही नहीं तारीफ की , जैसे भगवान् ने स्वादेन्द्रियाँ बनायीं ही ना हो , अगर कभी कुछ कहेंगे भी तो नमक कम है , आज हल्दी कुछ ज्यादा हो गयी, इसलिए तो  मैं रोज बनाने का सिरदर्द लेती ही नहीं , पार्टी वगैरह में ही रसोई में हाथ लगाती हूँ , अपना मियाँ नहीं तो दूसरों के मियाँ तो तारीफ़ करते हैं ना” कहते हुए अनुप्रिया ने शरात में बायीं आंख दबा दी | उसको भी हंसी आ गयी |   

 

लौटते समय कार में सन्नाटा पसरा रहा ,वो सोचती रही अनुप्रिया कह सकती है कि उसे कोई फर्क नहीं पड़ता , ऑफिसर है ,महीने के आखिर में नोटों की गड्डी  लाती है, उसके पति भी उसके ऑफिस और घर संचालन की कितनी तारीफ़ कर रहे थे, पर उसका तो एक यही हुनर है , जिसका गर्व वो अपने पति की आंखो में देखना चाहती है ....पर वो बस खाना ही तो बनाती हो , कहकर उसका स्वाभिमान ही कुचल देते हैं | उस रात   पति –पत्नी अलग –अलग कमरे में सोये | इस बार वो भी हथियार डालने के मूड में नहीं थी | दो दिन बाद राहुल ही आया उसे मनाने , “ क्या  यार जरा सी बात पर मुँह फुलाए बैठी हो , देखो मुझे खाने का ज्यादा शौक  नहीं है , तुम भी अच्छा खाना बनाती  हो , पर अपनी ही बीबी की रोज –रोज क्या तारीफ करूँ | वैसे अनु ने खाना वाकई अच्छा बनाया था | मतलब मुझे अच्छा लगा , कह दिया | तुम चाहो तो उससे सीख लो |” ज्योति कुछ कहना चाहती थी कि गौरव आ गया| मेरी मम्मी दुनिया की बेस्ट कुक हैं कहते हुए वो उससे लिपट गया |  ज्योति अपने आंसू ना रोक सकी | उम्मीदों  की सुई गौरव की और घूम गयी |

 

वो दिन उसकी जिंदगी के थोड़े अच्छे दिन थे | जो भी बनाती गौरव व् उसके दोस्त प्रशंसा कर देते | वो दुगने जोश से कुछ नया , बेहतर बनाने की कोशिश करती | हमेशा अखबार में सर घुसा कर खाने वाला राहुल भी अब बेटे की देखा देखी खाने पर टिप्पडी करने लगा , पर ज्यादातर टिप्पड़ियाँ नकारात्मक ही होतीं |

“मेरी माँ , साग को सरसों के तेल में बनाती थीं | ये आँवले रात में में पानी में भिगो दो तभी मुरब्बा अच्छा बनेगा , तुम हल्दी –नमक  तेजस्वनी की तरह थोडा कम डाला करो |  मुलायम सा नैनू कैसे बनाते हैं जरा अनु से पूँछ लो ना प्लीज |कभी –कभी उसका दिल दुखता पर गौरव की तारीफ़ उस पर लेप लगा देती | मन में सोचती , शायद अनुप्रिया सही ही कहती है , पुरुष दुनिया भर की औरतों क तारीफ़ करेगा पर अपनी पत्नी में उसे नुक्स ही नज़र आयेंगे | चलो बेटे के बहाने ही सही उसकी प्रयोगशाला चल तो रही है , वाद्य यंत्र बज तो रहे हैं |

 

किशोरावस्था में कदम रखते ही गौरव ने भी रंग बदलना शुरू कर दिया | अब उसे माँ के हाथ का खाना नहीं बाज़ार का खाना पसंद आने लगा | स्थिति ये हो गयी  की आज क्या खाओगे बेटा ? , पूंछने पर भी वो नाराज़ हो जाता , “ क्या खाना –खाना लगा रखा है ? जीवन में और कोई काम नहीं है क्या , जो हर समय खाने की बात करती रहती हो ? वो जो भी बनाती कभी कॉपी , कभी लैपटॉप , कभी मोबाइल करते हुए गटक लेता | कभी –कभी उसकी प्रश्न वाचक निगाहों को देखकर झुन्झुला जाता , “ मम्मी आप भी , खा तो लिया ना बस इतना काफी नहीं , आपको इतनी तारीफ की जरूरत क्यों महसूस होती है |” वो महसूस कर रही थी कि गौरव तेजी से अपने पिता में बदलता जा रहा है , जिनके मन में औरतों की मेहनत और घरेलु काम के प्रति कोई सम्मान नहीं  होता | वो ऑफिस या स्कूल –कॉलेज में किये गए अपने काम को तो काम मानते हैं , उसकी तारीफ़ भी चाहते हैं , पर उनकी निगाह में घरेलू औरतें  “ दिन भर करना ही क्या होता है “ के दायरे में आती हैं | माँ की ममता पर पिता का खून भारी पड़ने लगा |

 

बारहवीं के बाद गौरव इंजीनयरिंग करने हॉस्टल चला गया | ज्योति को अब खाना बनाने से अरुचि होने लगी | गठिया के कारण शरीर भी साथ नहीं देता , उच्च रक्त चाप और अन्जाइना भी शरीर में घर बना चुके थे | घी –तेल , मिर्च –मसाला , शक्कर , स्वाद के ज्यादातर नुमाइनदे  स्वास्थ्य ने छीन लिए  थे | सादा और उबला ही बनना था | अब तो बस खाना बनाने के लिए बनाती , मन भी नहीं लगता , बस पेट भरना है यही ख्याल रहता |धीरे –धीरे रसोई में घुसने की भी इच्छा साथ छोड़ने लगी |  कभी –कभी कोई पुरानी  सहेली याद दिला देती तो आश्चर्य होता क्या वही थी वो ज्योति जो इतना अच्छा खाना बनाती थी |

 

जिन्दगी अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ रही थी | समय ने उसकी थाली से एक स्वाद और छीन लिया | दो दिन के बुखार में राहुल उससे हमेशा के लिए दूर चले गए | जब तक डेंगू पॉजिटिव की रिपोर्ट आती मरीज ही जा चुका  था | उस समय गौरव की पोस्टिंग मुंबई में थी जहाँ वह अपनी पत्नी परिधि और दो जुडवाँ बच्चों के साथ रह रहा था | पिता के ना रहने पर कुछ दिन के लिए आया था , फिर वापस चला गया | वो अकेली घर की दीवारों पर सर मारती | एक टाइम खाना बना लेती वही दोनों टाइम खाती | कई बार तो फ्रिज में रख देती और  गर्म कर –कर के दो तीन दिन में खा कर खत्म कर पाती | टी . वी पर आस्था चैनल देखकर मन बंटाती  और शाम को अपनी लाठी के सहारे पास के मंदिर में चली जाती | जीवन और थाली दोनों ही बेस्वाद हो चले थे |

 

धीरे –धीरे शरीर अशक्त हो चला था | अब तो चला –फिर भी ना जाता , काम किये ना होता |  ७२ की उम्र से कहीं ज्यादा रोगों ने उसे तोड़ दिया था | अकेली बीमार अशक्त माँ की आंखे  गौरव और उसके बच्चों के आने  की बात जोहती रहतीं| बच्चे आ जाते तो कुछ रौनक हो जाती | खाना बनाने के लिए उन दिनों कांता को बुलवा लेती | कांता दूसरों के घर में खाना बनाया करती थीं | कितनी बार कह चुकी थी , अम्माँ हमें हमेशा के लिए लगवा लो , गर्म –गर्म रोटियाँ देंगे , पर वो ही ना कर देती |  “अरे अकेले प्राणी को खाना ही कितना है, बच्चे आते हैं तो जी करता है कुछ खा लें, उबला सादा खाना पसंद ही नहीं करते | अब उम्र हो गयी है , रसोई में ज्यादा देर खड़े होने का ही मन नहीं करता , घबराहट होने लगती है , इसलिए तुम्ह्को बुला लेती हूँ |” कांता जानती थी कि बुढ़िया अपने लिए ज्यादा कुछ बनाती नहीं है , तो उसे क्या लगवायेगी , फिर भी चुहल में हर बार आग्रह करती और हर बार वही उत्तर सुन मुस्कुरा देती |    उधर परिधि की नौकरी लग गयी | उस साल गर्मी की छुट्टियों में गौरव अकेले ही आया | आते ही ऐलान कर दिया , “मम्मी , अब तुम अकेली नहीं रहोगी , हमारे साथ चलो |”

“क्या बहु भी ऐसा ही चाहती है |” उसने बेटे से अपनी शंका का समाधान चाहा |

“ हां माँ , उसी ने ही तो मुझे भेजा है , तुम्हे लाने के लिए , कहा है अब मम्मी अकेले नहीं रहेंगी , अब उनकी बैठ कर खाने की उम्र है |”  गौरव ने कहा तो ख़ुशी से उसकी रुलाई फूट गयी | कहीं  तो उसकी कदर है सोच कर वो अपना सामन बांधने  लगी |

 

मुंबई में हफ्ता – पंद्रह दिन बहुत अच्छे बीते | बहु पूछ –पूछ कर खाना बनाती | बच्चे दादी –दादी कर के पास घूमते | यहां  बुढ़ापा ठीक से कटेगा ये सोच कर वो आश्वस्त हो चली थीं |

 हर रात की तरह उस रात भी घुटनों की अलसी के तेल से मालिश कर वो सो गयी , इस बात से बेखबर की बगल के कमरे में बहु –बेटा उसी के कारण झगड़ रहे हैं |  

परिधि – “देखो तुम्हारी माँ को रोज –रोज पका –पका कर मैं नहीं खिला सकती | बुढ़िया तो किचन में घुसती भी नहीं |”

गौरव – “ठीक से बात करो , माँ का गठिया का दर्द जोरो पर है , आजकल , ठीक से चला नहीं जा रहा |”

परिधि – लो जी , कर लो बात ,ठीक से क्यों बोलूं , मैंने तो इसी लिए बुलाया था कि खाना और बच्चे वो संभाल लेंगी तो मैं आराम से नौकरी कर पाऊँगी | मुंबई के खर्चे कितने हैं , खाना पकाने वाली भी कितनी महंगी  है , ऊपर से छुट्टियां भी बहुत करती हैं , दो का चार खर्च करती हैं , सामान मारती  हैं सो अलग  |

गौरव –“पर मैं तो तुम्हारे नाम से ही माँ को लाया था , अब तुम हीं ... अपनी मंशा पहले बताना चाहिए  थीं ना |” 

परिधि –“कितनी बार कहा था , मम्मी आ जायेंगी तो बच्चों और उनकी फरमाइशों को वही देखेंगी , मूल से सूद प्यारा जो होता है | सुनते कहाँ हो मेरी बात , पर देखो ये मुझसे नहीं होगा , दिन भर ऑफिस में काम करूँ और सुबह शाम रसोई में पूरी ड्यूटी  दूँ और बुढिया आराम से गठिया का बहाना बना कर पलंग तोड़े |मैंने तो बुलाया ही रसोई के काम में मदद के लिए था | सोच लो , नौकरी छोड़ दूंगी तो लोन की क़िस्त कैसे भरोगे ?”

गौरव – “लेकिन... लेकिन अब माँ को वापस कैसे भेजूँ ?”

परिधि – “देखिये मैं कुछ नहीं जानती | मैं एक दिन साफ़ –साफ़ कह दूंगी , यहां  रहना है तो खाना बनाना पड़ेगा , जब सारा दिन घर में ही रहती हो तो ऐसी आरामतलबी नहीं चलेगी |”

गौरव  – “रुको , रुको , मैं ही कोई तरकीब निकालता हूँ | “

परिधि – “ठीक है , पर जल्दी करना | “

                       गौरव चुपचाप उठ कर माँ के कमरे की तरफ गया  | इन बातों से बेखबर वो निश्चिन्त सो रही थी | उसे इत्मीनान हुआ की माँ ने उसके व् परिधि के बीच की कोई बात नहीं सुनी है | सारी  रात अपने बिस्तर पर लेते-लेते योजनायें बनता रहा | आँखों में नींद का नाम नहीं था |

दूसरे दिन सुबह गौरव जल्दी उठ कर माँ के कमरे में गया | वो घुटनों में अलसी के तेल की मालिश कर रही थी | गौरव ने माँ के हाथ से तेल की शीशी ले ली और घुटनों में लगाने लगा | ज्योति ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहा , ‘ चल हट , तुझे ऑफिस को देर हो रही है |

गौरव ने मालिश जारी रखते हुए ,” माँ अपनी सेवा का हक़ तो ना छीनो मुझसे , सही ही कहा गया है , माँ के क़दमों में तो जन्नत होती है |”

ज्योति : “अरे , आज तो बड़ी –बड़ी बातें कर रहा है , किसने सिखाया तुझे ये सब ?”

गौरव : “ उम्र के साथ ये ज्ञान आ ही जाता है कि माता –पिता अनमोल होते हैं , फिर  परिधि भी आपकी बहुत तारीफ़ करती है |”

“अच्छा “अपनी आंखो में उठ आये बवंडर को पल्लू से पोछने लगी |

 

 “ हाँ माँ , एक बात कहने का दिल और कर रहा है ...... वर्षों हो गए तुम्हारे हाथों के आलू के पराठे नहीं खाए | कितने स्वादिष्ट बनाती  थी तुम, मेरे पूरे क्लास में हिट  थे , पराग तो अक्सर कहता , अपनी माँ से आलू के पराठे बनवा कर लाओ |” गौरव माँ की और स्नेह से देखता हुआ बोला |

 “ माँ , कभी तबियत ठीक महसूस हो तो फिर बनाना” थोडा रुक कर गौरव ने फिर कहा |

ज्योति ने हाथ झिटकते  हुए कहा , हट पगले , पहले क्यों नहीं बताया | अभी बना देती हूँ | कहते हुए अपने घुटनों के दर्द को भूल वो झटके से उठी , दर्द के जोर से एक हल्की चीख निकली , पर वो रुकी नहीं , उसके कदम लाठी लेकर रसोई की ओर बढ़ने लगे |

 

सुबह नाश्ते की टेबल पर पूरा परिवार यानि परिधि बच्चे और गौरव, अपने स्कूल और ऑफिस के लिए तैयार होकर  नाश्ता करने लगे |

माँ , तुम्हारे हाथों के आलू के पराठों का जवाब नहीं , गौरव ने  परिधि को देखकर आँख मारते हुए जोर से कहा |

“ हाँ माँ , मैं तो कभी भी आप के जैसा खाना नहीं बना सकती “ आँख मारते हुए परिधि ने भी जवाबी तान मिलाई |  

“अरे बेटा, उठना नहीं ,  ये वाला और खाना , ये और भी ज्यादा कुरकुरा है”, दर्द से बेजार टांगों की परवाह ना करते हुए माँ का ममत्व रसोई से उड़ता हुआ डाइनिंग टेबल पर छितर  गया |

अब वो रोज खाना बनाती है और सब जी भर –भर के उसकी  तारीफ़ करते हैं ।





परिचय


वंदना बाजपेयी 
शिक्षा : M.Sc , B.Ed (कानपुर विश्वविद्ध्यालय ) 
सम्प्रति : संस्थापक व् प्रधान संपादक atootbandhann.com
 दैनिक समाचारपत्र “सच का हौसला “में फीचर  एडिटर,त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका गाथान्तर  के कुछ अंकों में सह सम्पादन, मासिक पत्रिका “अटूट बंधन”में एक्सिक्यूटिव एडिटर का सफ़र तय करने के बाद अभी ऑनलाइन साहित्यिक वेब पत्रिका www.atootbandhann.com का संचालन 
कलम की यात्रा : देश के अनेकों प्रतिष्ठित समाचारपत्रों, साहित्यिक पत्रिकाओ, वेब पत्रिकाओं में कहानी, कवितायें, लेख, व्यंग, समीक्षा  आदि प्रकाशित | कुछ कहानियों, कविताओं, समीक्षाओं  का नेपाली, पंजाबी, उर्दू और मराठी, अंग्रेजी  में अनुवाद ,महिला स्वास्थ्य पर कविता का मंडी  हाउस में नाट्य मंचन | 
 प्रकाशित पुस्तकें
 
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सम्पादित –दूसरी पारी( आत्मकथात्मक लेख संग्रह )
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