रामवृक्ष मौर्य की कहानी 'घरवाली' मध्यमवर्गीय स्त्री के संघर्ष और अधिकारों की कहानी है।एक घरेलू स्त्री जो सुबह से देर रात तक पूरे घर की जिम्मेदारी उठाती है,फिर भी उसके त्याग और समर्पण को महत्व नहीं दिया जाता है।बल्कि जब-तब तानों से उसकी आत्मा पर चोट पहुँचाई जाती है।इसके बावजूद भी स्त्री धैर्यपूर्वक अपना कर्म करती है।यह कहानी ऐसी ही मध्यमवर्गीय स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाती हुई समाज को बड़ा सदेश देती है।
रामवृक्ष मौर्य की कहानी 'घरवाली' मध्यमवर्गीय स्त्री के संघर्ष और अधिकारों की कहानी है।एक घरेलू स्त्री जो सुबह से देर रात तक पूरे घर की जिम्मेदारी उठाती है,फिर भी उसके त्याग और समर्पण को महत्व नहीं दिया जाता है,बल्कि जब-तब तानों से उसकी आत्मा पर चोट पहुँचाई जाती है।इसके बावजूद भी स्त्री धैर्यपूर्वक अपना कर्म करती है।घरवाली कहानी ऐसी ही मध्यमवर्गीय स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाती हुई समाज को बड़ा सदेश देती है।
प्रतिभा सिंह
घरवाली
घरवाली और बाहरवाली में हमेशा लोगों ने बाहर वाली को अधिक चाहा है, उसके एक इशारे पर जमीन-आसमान एक करने को तैयार। कितने सत्तासीनों के बाहरवाली के चक्कर में राजपाट तक चले गये, बड़ी-बड़ी लड़ाइयां हुई, देश और परिवार तबाह हुए, पर बाहरवाली का आकर्षण पुराने जमाने से लेकर आज तक बरकरार है। खुदा न खास्ता कभी बाहर वाली घरवाली हो गयी, तो पुरुष का फिर कुछ दिनों बाद बाहरवाली का चक्कर प्रारम्भ। घरवाली हमेशा उपेक्षित रही, चाहे वह पूर्व प्रेमिका ही क्यों न रही। हमेशा और बार-बार घरवाली ही क्यों उपेक्षित? जिसने पति के लिए अपने माँ-बाप का घर छोड़ा, परिवार छोड़ा, गाव पुर और सखी-सहेली छोड़ी। पति को परमेश्वर माना, उसके परिवार को अपना परिवार माना, पति के माँ-बाप, भाई-बहन से सास-ससुर और देवर-ननद का नाता जोड़ा। वह पति की नींद सोती है और पति के लिए जागती है। पति शाम को समय से घर नहीं आया, तो उसे चिन्ता सताने लगती है और मन ही मन ईश्वर से पति के सही सलामत घर आने की दुआ मागने लगती है। पर देर से आये पति से उलाहना देते हुए पूछ लिया कि कहाँ रह गये इतनी देर, मैं खाने के लिए तुम्हारा इन्तजार कर रही थी, तो पति पत्नी की भावनाओं का बिना ख्याल किये आसानी से कह देता है, किसने तुमसे कहा था इन्तजार करने को। मेरे लिए खाना रखकर, तुम खाकर सो क्यों नहीं गई? गुस्से में आधा-तीहा खाया और सोने चले गये और पत्नी बिना खाये जाकर पैर दबाती हुई पति को मनाती रही और पुरुष बार-बार उसे रौदकर अपना गुस्सा उतारता रहा। यही पुरुष जब प्रेमी बनकर प्रेमिका के पास देर से पहुँचता है, तो रूठी प्रेमिका को मनाने के तमाम मिन्नते करता है, कान पकड़ता है कि दुबारा देर से नहीं आऊँगा। और वही पुरुष घरवाली की देर आने पर प्रेमभरी शिकायत पर चढ़ बैठता है, लगता है कि वह प्रेम की भाषा हीं नहीं समझता। ऐसा क्यों होता अधिकांश घरवालियों के साथ? इस समस्या पर गहन चिन्तन की विचार तन्द्रा रतिनाथ वर्मा की तब टूटी, जब पत्नी ने हाथ पकड़कर झकझोरते हुए कह, ‘‘लेटे-लेटे सो गये क्या? मैं कब से खाने के लिए आप का इन्तजार कर रही हूँ। कई बार बुलाया भी, लेकिन आप सो जो रहे हैं, सुने कैसे? आज भोजन नहीं करना है क्या? रोज भोजन नहीं बन पाता था कि आप कई बार पूछ चुके होते थे कि अभी भोजन नहीं बन पाया है क्या? आज भूख नहीं लगी है क्या? या कही किसी ने कुछ खिला पिया दिया है, जो निश्चिन्त पड़े है। अपना नहीं तो हमारा ही थोड़ा ख्याल कर लिया होता कि घर पर रहने पर बिना आप के खाना खाये मैं खाती नहीं हूँ।’’
अपनी गलती का एहसास होने पर भावनाजन्य अपराध बोध को मिटाने के लिए रतिनाथ जी पत्नी को बगल में खींचकर प्यार जताने लगे तो पत्नी ने कहा-
‘‘ये क्या कर रहे हैं? बच्चे अभी पढ़ रहे हैं, चलिए उठिए और भोजन कर लीजिए।’’
वर्मा जी उठे और पत्नी राधा के साथ भोजन के लिए चल दिये। भोजन करते समय वर्मा जी देखते क्या है कि उनकी थाली में कटोरा भर सब्जी और भरी गिलास दूध की है और राधा अपनी थाली में काछी-कूछी गयी, वह भी आधी कटोरी सब्जी और आधा गिलास दूध परोस कर लाई है। यह देख वर्मा जी पूछा- क्यों आज सब्जी और दूध कम था क्या? जो तूने बहुत कम लिया है।’’
‘‘नहीं, दोनों पर्याप्त मात्रा में थे, लेकिन सब्जी अच्छी बनी थी, इसलिए बच्चे माँग कर ज्यादा खा गये और दूध की दिन में एकाधबार ज्यादा चाय बन जाने से कमी हो गयी।’’
‘‘अपने हिस्से में ही तूने क्यों कम किया? हम दोनों बराबर कर लेते तो क्या हो जाता? चलो दोनों बराबर करो।’’
‘‘नहीं, आप खाइए, मेरा इतने से ही काम चल जायेगा।’’ ‘‘चलने को तो काम चल जायेगा, लेकिन केवल तुम ही काम क्यों चलाओ? मैं उसमें भागीदार क्यों नही।’’
‘‘क्योंकि आप मर्द है और कमाते हैं।’’
‘‘मर्द है तो क्या हुआ? क्या मर्द होते हुए ही सारे अधिकार और सुख-सुविधा के हकदार हो गये और तुम औरत होने के कारण अधिकार हीन और सुख-सुविधा से वंचित। कमाने का भी अर्थ यह नहीं कि हम भरपेट खाय और परिवार का कोई आधा पेट खाकर सोये। और तुम जो दिन भर कोल्हू के बैल की तरह घर-गृहस्थी के काम में लगी रहती हो। सुबह चार बजे जगती हो और रात 10 बजे सोती हो बीच में 10 मिनट कमर भी सीधी नहीं करती और खाने के नाम बचा खुचा आधा- अधूरा भोजन, कैसे जिन्दा रह पाओगी? मजाक करने की गरज से आगे कहे, ‘‘यदि हमसे पहले बुढ़ा गयी तो हमें ताक-झाँक करने को विवश कर क्या तुझे अच्छा लगेगा?’’ ‘‘बुढ़ायेगी हमारी सौतन, चलिए भोजन शुरू कीजिए। मुझे भूख लगी है। यह आपका मसखरापन अच्छा नहीं लगता है। राधा ने झल्लाकर कहा।
वर्मा जी माने नहीं और अपनी कटोरी की थोड़ी सी सब्जी पत्नी की कटोरी में डालकर दोनों गिलास का दूध बराबर कर दिया। जबकि राधा उन्हें बराबर रोकती रही, पर उसकी एक न चली। दोनों खाना खाये और सोने चले गये। राधा को पति का यह प्यार और विचार अन्दर तक छू गया। ऐसा नहीं कि वर्मा जी पहले पत्नी को प्यार नहीं करते थे, पर आज प्यार का अंदाज ही अनोखा था। यह केवल उसी से नहीं, अपितु पूरी औरत जाति से था। जिसको अधिकांश औरते मर्द से मांग भले न करे, पर उसके अन्तस में सम्मान और इस प्रकार के प्यार की भूख सदियों से सोई थी, जिसको वर्मा जी हक्की सी मधुर भाव ने जगाने का काम किया। राधा पति के इस व्यवहार से ऐसे अनोखे भाव से लबालब भर गयी। उसके जीवन में बहुत से सुख और सम्मान के अवसर आये थे, लकिन यह सुख और सम्मान सबसे भिन्न क्यों? खुद नहीं समझ पा रही है। वर्मा जी विस्तर पर जाते ही लेट गये और पत्नी घुटनों पर सिर टिकाये विचार की किस दुनिया में खोई है, वर्मा जी को तब पता चला, जब वह करवट बदलकर उसकी तरफ हुए। पत्नी को ऐसा सुध-बुध खोया देखकर वर्मा जी पूछा-
‘‘राधा क्या बात है? बैठी क्यों हो?’’
‘‘बस वैसे ही।’’
‘‘रोज तो विस्तर पर आई नहीं कि सो जाती थी, जब आज रोज से अधिक थकी हो। सोने को कौन कहे, सोचने में लगी हो। कुछ बात तो जरूर है, बताओ न, क्या बात है?
‘‘नहीं कोई बात नहीं है।’’
‘‘बात तो कोई जरूर है, इधर आओ सोओ।’’ कहकर वर्मा जी ने पत्नी को पास खीचकर सोने पर मजबूर कर दिया और चुचला मुचलाकर बहुत पूछने की कोशिश की, पर पत्नी हर बार मना करती रही। उसे भी समझ में नहीं आ रहा है कि क्या बताये और इस अनोखे सुख का कैसे वर्णन करे, वह इस अनोखे सुखानुभूति का न संयोजन कर पा रही है और न उसके लिए उपयुक्त शब्दों का चयन ही। इसी संकोच में वह वर्मा जी के कई बार पूछने पर चाहते हुए भी कुछ न कह सकी। कई बार पूछने के बाद राधा कुछ नहीं बताई तो वर्मा जी ने कहा, ‘‘नहीं बताना चाहती हो तो मत बताओ, मुझे नींद आ रही है और मैं सोने जा रहा हूँ।
राधा उठी पैर की तरफ सरककर वर्मा जी के पैर दबाने लगी। वर्मा जी अभी नींद की गोद में पहुँचे नहीं थे कि राधा का यह व्यवहार देखकर उनकी समझ में नहीं आ रहा था, उसे हो क्या गया है। उन्होंने जबरदस्ती बगल में खींचकर बाहों में भर लिया और कब सो गये पता ही नहीं चला।
राधा प्योर हाउस वाइफ तो है, लेकिन वेल क्वालीफाइड। पतिदेव के ऑफिस और बच्चों के स्कूल जाने के बाद घर के काम-धाम से छुटकारा पाने के बाद फोन से आठ-दस अपनी परिचित महिलाओं को फोन करके अपने घर बुला लिया। कई महिलाओं ने फोन पर ही पूछा, कोई विशेष आयोजन तो नहीं है, तो राधा उन सबसे कही, ‘‘ऐसी कोई बात नहीं है बस आप चली आइए।’’
सभी महिलाएं नियत समय से आ गई और आते ही पूछा, ‘‘ऐसी क्या इमरजेन्सी है, जो सबको आनन-फानन में बुला लिया।’’
‘‘कोई इमरजेन्सी नहीं है, बैठिए पानी-चाय कीजिए, फिर कुछ बातंे करते हैं।’’
‘‘बातें तो हमलोग करती ही रहते हैं। हमारी इन्हीं बातों को लेकर मर्दों द्वारा कहा जाता है कि दो औरतें एक साथ हो और चुप रहे तो वह विश्व का आठवां आश्चर्य होगा। इसके लिए तुमको सबको फोन करके आनन-फानन में बुलाने की क्या जरूरत पड़ी?’’ निर्मला जी ने थोड़ा उत्तेजित होकर कहा।
‘‘निर्मला दीदी का गुस्सा जायज है। हम औरते जहाँ भी इकट्ठा होती हैं, तो चौके चूल्हे, सामान की खरीदारी और इनकी-उनकी शिकायत के अलावा कुछ नहीं करती और खास करके महिलाओं के चरित्र की समीक्षा अधिक करती है। यदि ऐसी बातों के लिए मैं आप लोगों को बुलाई होती तो गलती करती। आज तो मैंने आपलोगों को एक विशेष प्रकार के विचार-विमर्श के लिए बुलाया है। जो हमारी पूरी औरत जाति की भलाई के लिए है, उसके हक और हुकूक के लिए है और पूरी औरत जाति को अज्ञान और मोह की निद्रा से जगाने के लिए हैं। राधा ने सब को बुलाने के मंतव्य का थोड़ा सा खुलासा करने और निर्मला जी के गुस्से को शांत करने की गरज से कहा। राधा की बात सुन सभी महिलाएं आश्चर्यचकित हो सकते मे आ गई और एक दूसरे का मुँह ताकने लगी। कुछ देर के लिए स्तब्धता छा गयी। स्तब्धता तोड़ते हुए निर्मला जी ने पुनः कहा।
राधा! आज तुझे अचानक हो क्या गया है? कैसी बहकी-बहकी बाते कर रही हो? मियां से कुछ खटपट तो नहीं हो गयी। यदि हो भी गई है तो कोई बात नहीं मियां बीबी में ऐसा होता रहता है। इसमें दूसरों को घुसेड़ना दामपत्य जीवन के लिए अच्छा भी नहीं होता। दूसरे रात में मियां-बीबी एक हो जाओगे और बुरे बनेंगे हम लोग। इसलिए अच्छा इसे रात के लिए छोड़ दो। मर्द मुएं जायेंगे कहाँ, उन्हें घूमफिर के हमारे पास ही आना है।’’
‘‘नहीं, दीदी न मुझे कुछ हुआ है, न मैं बहकी-बहकी बाते कर रही हूँ और न मियां से मेरी कुछ अनबन हैं। आज तक हम सभी लोग बहके है, क्योंकि अनेक बन्धनों से बाधकर हमारे स्वतंत्र अस्तित्व को नकारा जा रहा है और हम सब उसी में खुश है। हम सब कुछ होते हुए वास्तविकता में सामाजिक दृष्टि से हम कुछ नहीं है। टेलीविजन में एक विज्ञापन में एक ग्रामीण महिला से उसका नाम पूछा जाता है, तो वह अपना एक निश्चित नाम नहीं बताती है। कहती है कि बचपन में उसे लली कहकर पुकारा जाता था। विवाह होने पर ‘बहुरिया’ और बच्चा होने पर उसकी माई के नाम से पुकारा जाता है। कभी उसे अपने नाम से पुकारा ही नहीं गया तोवह अपना क्या नाम बताये। यही हालत हम सबकी है, लेकिन उसे देखकर हम पढ़ी-लिखी अधिकांश महिलाएं हँसकर टाल जाती है, पर इस पर थोड़ा सचेत होकर विचार करें, तो यह पूरी औरत जाति के गाल पर जोर का तमाचा है। इससे औरत जाति के अहित के साथ-साथ समानता का भी कितना अहित हुआ है? इस पर हमलोगों ने कभी फुरसत में विचार हीनहीं किया। रही मियां से कुछ होने की बात तो मुझे यह कहते हुए गर्व हो रहा है कि ये जो बातें जो आप लोगों को बहकी-बहकी सी लग रही है, वह उन्हीं के द्वारा मेरे मन में जगाई गई है और दुनिया के सारे मर्द मेरे मियां जैसे हो जाय, तो औरतों का बहुत सारा दुख-दर्द ही मिट जाय। राधा ने रात की सारी घटना को विस्तार से सबको बताया। एक बार फिर सन्नाटा छा गया। राधा की सब बातें तो धीरे-धीरे सभी महिलाओं के दिलो दिमाग में घुसती तो जा रही थी, लेकिन राधा ने जो अपने पति की प्रशंसा की तो प्रियंवदा जी को अच्छा नहीं लगा, क्योंकि उनको भ्रम हो गया है कि जितना अच्छा और प्रेम करने वाले उनके मियंा है उतना और किसी का मियां नहीं। इसी कारण अपनी खींझ़ को निकालते हुए उन्होंने कहा- ‘‘राधा, तुम्हारा मियां कब से इतना बढ़िया हो गया, उसे तो कई बार मैंने अन्य महिलाओं से हँस-हँसकर बात करते देखा है, अधिकांश मर्दुएं तो बेर जैसे होते हैं और ऊपर से मीठे-मुलायम और अन्दर से कठोर। झांसे में मत आना, नहीं तो कभी बहुत बड़ा धोखा खाओंगी, हाँ कहे देती हूँ। ‘‘प्रियंवदादीदी अपने मियां की तो आप बड़ी तारीफ करती है, क्या यह टिप्पणी उनके विषय में भी है? प्रियंवदा को आड़े हाथों लेते हुए कामिनी ने कहा।
अपने मियां के विषय में कहने का अवसर पाकर प्रियंवदा ने कहा, ‘‘वे तो सबसे अनोखे देवता सरीखे है। वह तो दूसरे सभी मर्दाें से भिन्न भौंरे की तरह मेरे ही इर्द-गिर्द घूमते रहते है। यदि सभी मर्द उनके जैसे हो जाय तो औरतो को रोना ही न रहे।’’
‘‘तो बड़ी दीदी आप भी मुगालते में रहती है, उनके विषय में मैंने ऐसा सुना है कि वे ऐसा पानी पीते हैं कि खुदा भी न जाने।’’ कामिनी ने कहा।
‘‘यदि खुदा नहीं जानता, तो तुम्हें कैसे पता चल गया। क्या तू खुदा से भी बड़ी है?’’
‘‘नहीं, दीदी मेरे खुदा से बड़ा होने का तो सवाल ही नहीं है। मैं तो आपसे भी बहुत छोटी हूँ। तालाब में डुबकी लगा कर पानी पीने वाले को भ्रम रहता है कि उसके पानी पीने को खुदा भी नहीं जानता है, लेकिन जब गले में मछली फँसती तो खुदा को कौन कहे सभी लोग जान जाते हैं। वे डुबकी लगाकर खूब पानी पीते है। उनके विषय में भी कुछ रोचक तथ्य तीसरी आँख से छन कर आये है, आदेश हो तो कहूँ।’’
बात आगे और बढ़ती देख उसे यही समाप्त करने की गरज से निर्मला जी ने दोनों को रोकते हुए कहा,‘‘आप दोनों लोग ईश्वर के लिए शांत हो जाइए। हम क्या करने आये थे और क्या करने लगे। इसी लिए तो औरतों को बदनाम किया जाता है। आप भी प्रियंवदा दीदी किसी दूसरे के मियां की तनिक भी प्रशंसा नहीं सुन सकती। वैसे राधा ने अपने मियां की प्रशंसा करने की गरज से तो प्रशंसा की नहीं, वह तो बात के प्रसंग में आ गया तो कह दिया। उसकी बात सुनी नहीं गयी और बहस को कहाँ से कहाँ ले गई। दूसरे किसी औरत से मर्द हंसकर बात कर लें और किसी औरत ने किसी मर्द से हँसकर बात कर लिया तो इसका अर्थ यह तो नहीं होता कि वह मर्द और औरत दोनों चरित्रहीन है। चरित्रहीनता कोई छूत की बीमारी तो है नहीं जो हंसकर बात करने और एक साथ आने-जाने से हो जाती है। किसी मर्द और औरत के विषय में इस प्रकार के गलत निष्कर्ष निकलना अच्छी बात नहीं है। दोनों सच्चे दोस्त भी हो सकते हैं, जैसे दो औरत और दो मर्द आपस में होते हैं।
राधा ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘यहाँ चार-छः लोग इकट्ठा होते हैं, तो इस तरह की कुछ ऐसी बाते हो जाती है, पर हमलोगों को अपना मुख्य उद्देश्य याद रखना चाहिए। मैंने आप लोगों को इसलिए यहां बुलायाहै कि परिवार और समाज निर्माण में महिलाओं की एक आधारभूत और मुख्य भूमिका होती है। उसे हम महिलाएं भी भूली रहती है और पुरुष प्रधान समाज तो उसे महत्व देता ही नहीं। वह हमारा कार्य है सन्तानोत्पत्ति और परिवार की सेवा। हम महिलाओं की ये दो भूमिकाएं ऐसी है, जो हटा ली जाय तो समाज में बहुत बड़ी अराजकता उत्पन्न हो जायेगी। कल्पना कीजिए यदि महिलाएं सन्तानोत्पत्ति के कार्य से विमुख हो जाय और बच्चों का पालन पोषण करना छोड़ दे, तो क्या होगा? सृष्टि का विकास क्रम ही रुक जायेगा। पश्चिमी जगत में कुछ उग्र नारीवादी आन्दोलनों के चलते कुछ महिलाएं सन्तानोत्पत्ति से विरत हो गयी है और अन्य कार्यों में महिलाओं की व्यस्तता के कारण बच्चे नर्सों द्वारा या बोर्डिंग स्कूलों में पल रहे हैं, जिसका दुष्परिणाम बच्चों में एकाकीपन, मानसिक विक्षिप्तता आदि के रूप में उभरकर पश्चिमी समाज के लिए अभिशाप बनता जा रहा है।
सभी उपस्थित महिलाएं राधा की मुंह की तरफ देखती जा रही है। उन सबों के समझ में नहीं आ रहा कि रोज इतनी शांत दिखने वाली राधा में इतनी प्रखरता कहां से आ गयी। वैसे सबको पता है वह अच्छे परिवार की और अधिक पढ़ी-लिखी है, पर उसके इस रूप से अभी कोई परिचित नहीं था। उसकी सारी बातें सामान्य स्तर से ऊँचा तो हैं, पर सबकी समझ में आ रही है। कुछ को तो इस बात की जलन हो रही है कि ये बातें उनके दिमाग में क्यों नही उपजी, हम सब भी तो उसी के बराबर पढ़ी-लिखी है, पर बाजी आज राधा के हाथ है।
......सन्तानोंत्पत्ति में मर्द केवल निमित्त मात्र होता है। इसे यदि दार्शनिक शब्दावली में कहे तो पुरुष निमित्त कारण में भी गौड़ भूमिका में होता है। औरत की निमित्त कारण में भी मुख्य भूमिका के साथ-साथ उपादाकारण भी है। औरत की कोख में उसी की मज्जा और रुधिर से संतान वजूद में आता है और औरत के हाव-भाव तथा आचरण सबका प्रभाव संतान पर पड़ता है। सेहद और सौन्दर्य दोनों को मातृत्व के लिए अर्पित कर नौ महीने अपनी कोख में बच्चे को धारण करती है। और औरत अंत में असह्य प्रसव पीड़ा को सहन कर बच्चे को जनम देती है, जिससे संतति शृृंखला आगे बढ़ती है।आप सबने बच्चे पाले हैं, कितने कष्ट और तकलीफ सह करके। रहती कही थी, लेकिन ध्यान बच्चे पर रहता। बच्चा रात में बिस्तर पर पेशाब कर देता, तो भींगे स्थान पर स्वयं सो जाती और सूख पर बच्चे को सुला देती थी और पूरा विस्तार भीग गया, तो बच्चे को अपनी छाती पर सुला देती थी। क्या यह सेवा और समर्पण और किसी तरह से संभव है? नहीं ना। बच्चे की देखभाल की वजह से पुरुष पर हम उतना ध्यान नहीं दे पाते जितना पहले देते थे, तो ऊपर से किसी मर्द से चक्कर चलने का लांक्षन पति और लगा देता है।
आपकी इस महत्वपूर्ण भूमिका को पुरुष प्रधान समाज ने सदैव उपेक्षित किया। पुरुष जब गुस्से में होता है, तो औरत के इस कार्य को हेय दिखाने के लिए औरत से कहता है कि तूने जिन्दगी में बच्चा पैदा करने के सिवा और किया ही क्या है? चार पैसे बाहर से कमाकर लाती तो पता चलता कि पैसा कैसे पैदा किया जाता है? हमेशा पुरुष ने हमारे इस महत्वपूर्ण कार्य की अपेक्षा बाहर पैसा कमाने के अपने कार्य को श्रेष्ठ साबित किया। पुरुष औरत को पहले भोगता है और खुदा न खास्ता पुरुष के कारण से ही बच्चा नहीं होता है, तो भी उसके औरत को ही दोषी बनाया जाता है। पुरुष घरवाली को अपने पैर की जूती समझती है और बाहरवाली पर जान छिड़कता है।’’
राधा की बात अभी जारी ही थी कि इतने में निर्मला जी के घर से फोन आया उनके बेटे का कि मम्मी जल्दी घर चली आओ, कुछ मेहमान आ गये हैं, उनके लिए नाश्ता तैयार करना है। फोन से निपटते ही निर्मला जी ने कहा, ‘मुझे घर जल्दी बुलाया है, क्यों कि कुछ मेहमान आ गये हैख् उनके लिए नाश्ता तैयार करना। नाश्ता तैयार नहीं करना होता, तो मुझे नही बुलाया जाता। मुझे घर जाना पड़ेगा, लेकिन तुमने राधा हमलोगों को मोहनिद्रा से जगा दिया है। हम जगत रचने के महान कार्य करने के बाद भी अज्ञानतावश अपने को हेय समझती रही। मैं कल अपने घर पर और लोगों को भी बुलाती हूँ। आपलोग भी आएगा वहाँ आगे और विचार करेंगे।’’
‘‘दीदी रुक जाइए मैं चाय बनाकर लाती हूँ, पीकर जाइएगा इतने दिनों बाद आप लोग आई है और मैं कुछ अच्छी तरह से सेवा सत्कार भी न कर पाई। एक कप चाय पिला के लगा दिया इस मगजमारू काम में।’’ राधा ने शिष्टाचार में कहा।
कृतार्थ होते कामिनी ने कहा, ‘‘दीदी आज तो आपने हमलोगों के अन्दर की औरत को जगा दिया, औरत होने के मायने और महत्व को समझा दिया। चाय नाश्ता की औपचारिकता तो हर जगह निभती रहती है।’’ इस वायदे के साथ कि कल हम सभी लोग निर्मला जी के यहाँ मिलते है, सभी महिलाएं चली गयी।
रतिनाथ जी के ऑफिस में उनके वॉस डॉ0 रजनीकान्त श्रीवास्तव महिला लिपिक को को इसलिए फटकार रहे थे कि ऑफिस बन्द होेने से एक घण्टा पूर्व चली गयी थी जिसके कारण उनका कुछ कार्य अधूरा रह गया था। महिला लिपिक बार-बार सफाई देते हुए कह रही थी-
‘‘सर मेरे बेटे की अचानक हालत खराब हो गयी, घर से फोन आया, उस समय आप किसी से बात कर रहे थे। मुझे तुरन्त निकलना था, इसलिए बड़े बाबू से कहकर चली गयी।’’
‘‘आप लोगों को कुछ न कुछ रोज बहाना मिल जाता है, ऑफिस से जल्दी घर जाने का। ऑफिस को खाला का घर समझ रखा क्या? जब चाहा आ गये और जब चाहा चले गये।’’
‘‘रीयली सर, मेरे बेटे की तबियत खराब थी। मैं झूठ नहीं बोल रही हूँ।’’
‘‘कोई अपने से कहता है कि झूठ बोल रहा हूँ। परिवार और निजी परेशानियों का बहाना बनाकर आप लोग ऑफिस से जाती रहती है और छुट्टी न दो आंसू बहाना शुरू कर देती हैं। सरकार साली कितनी बेवकूफ है, ये ऑफिस में काम भी नहीं करती है और ऊपर से तीन-चार महीने की मैटरनीटी लीव भी देती है।’’
पास बैठे रतिनाथ जी को सम्बोधित करते हुए बॉस ने कहा, ’’आप ही बताइए रतिनाथ जी इस प्रकार आफिस कैसे चल पायेगा। ऑफिस की चार-पाँच महिलाएँ ऑफिस का भट्ठा बैठाकर ही दम लेगी।’’
महिला लिपिक किंकर्त्तव्यविमूढ़ खड़ी है और बॉस महिलाओं को तो कभी सरकार को, तो कभी लौटकर पास खड़ी उस महिला पर टिप्पणी किये जा रहे है। रतिनाथ जी को बॉस की इस प्रकार की हरकत बहुत नामवार गुजर रही है, लेकिन अपने को संयमित करते हुए कहा, ‘‘सर, ये अन्य दिनों को जैसी रही हो, मैं नहीं जानता, लेकिन कल रीयली इनका बेटा बीमार था, मुझे ऑफिस से जाते हुए ये डॉक्टर के पास से दिखाकर लौटती हुई मिली थी। इसलिए इन्हें आज जाने दिया जाये।’’ ‘‘ठीक है आप जाइए, लेकिन ऑफिस के कामांे को भी करने में मन लगाया कीजिए, क्योंकि इसी से आपकी रोजी-रोटी चलती है।’’
लिपिक महिला जब चली गयी, तो रतिनाथ जी कहा, ‘‘सर, महिलाओं और खासकर नौकरी पेशा महिलाओं पर हमलोग सहानुभूतिपूर्वक कभी विचार नहीं करते और तनिक भी अवसर मिलने पर उल्टी-सीधा चार्ज लगाने से भी नही चूकते।......
बात को बीच में टोकते हुए बॉस ने कहा, ‘‘आपके कहने का मतलब क्या है? ये जो भी उल्टा-सीधा करे वह सही है, पुरुषों को उस पर कुछ नहीं कहना चाहिए।’’
‘‘नहीं सर, मेरा ऐसा कोई अभिप्राय नहीं है। मैं तो ये कहना हूँ कि इनको कुछ कहने से पूर्व इनकी परिस्थितियों पर विचार कर ले, तो इनको समझने में हम सबको सहूलियत होगी और इनके साथ न्याय हो सकेगा। जैसे सर, मैं आप की मैडम सरिता जी को लेता हूँ। वह भी एक नौकरी पेशा महिला हैं। आपसे पहले घर में सुबह जागती होगी, प्रातः क्रिया से निवृत्त होने के बाद आपके लिए बेट टी बनाती होगी। आप फ्रेस हुए और सुबह की सैर पर निकल जाते होंगे। और वह बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करती होगी, सास, ससुर और आपके लिए नाश्ते का इन्तजाम करने के बाद आप सबको ले जाकर नाश्ता देती होगी। देती है कि नहीं देती है।’’
‘‘स्वयं नाश्ता नहीं करती होगी, लग जाती होगी लंच की तैयारी के लिए और आप अखबार से छुटकारा पाकर ऑफिस के तैयार होने लगते होंगे। इसी बीच सरिता जी लंच को तैयार कर स्वयं नहा धोकर आपके साथ लंच करती होगी और आपके साथ ऑफिस के लिए निकल जाती होगी। शाम को ऑफिस से लौटने पर फिर चाय बनाकर पूरे परिवार को पिलाती होगी और शाम के भोजन के लिए सब्जी खरीदने से लेकर सब काम वही करती होगी और आप सन्ध्या भ्रमण के पश्चात् टीवी से चिपक जाते होंगे और डिनर के बाद आप सोने चले जाते होंगे। वह डिनर के बाद चौका-चूहा संभालने के बाद आप के पास आती होगी तो आप भूखे भेड़िये की भाँति टूट पड़ते होंगे।’’
‘‘आपको हमारे घर का ये सब कैसे मालूम हुआ। क्या कभी सरिता ने आपसे शिकायत के तौर पर बताया हैै।’’ ‘‘नहीं सर, ये आपके ही घर की बात नहीं है, यह पूरे भारतीय समाज की स्थिति है। सरिता जी को इतनी फुर्सत कहॉ जो आपकी शिकायत कर सके। आफिस का बॉस खण्डूस होगा तो उनको ऊपर से टेन्शन।’’
बच्चा बीमार हो जाय, तो सरिता जी ही दिखाने जाय डॉक्टर के पास, कोई खरीदारी करनी हो तो सरिता जी जाय। अब आप ही बताइए इतना सब अन्दर से बाहर का तनाव झेलने के बाद औरत की क्या मानसिक स्थिति होगी। कभी आपने इस पर गौर किया।’’
‘‘नहीं भाई रतिनाथ जी, मैंने तो इस प्रकार कभी सोचा ही नहीं और ऊपर से सरिता को उल्टी-सीधा और सुनाता हूँ। आज तो आपने घरवाली के प्रति एक नई दृष्टि दी। अभी कुछ देरे पहले मैं उस महिला लिपिक को क्या-क्या सुनाता रहा, कभी उसकी स्थिति को समझने की कोशिश ही नहीं की। सच बताओं ऐसी दृष्टि तुझे कहाँ से मिली, जबकि मैं तुमसे अधिक क्लाइफाइड एम0ए0, पी-एच0डी0 हूँ। मैं तुम्हारे जैसा क्यों नहीं सोच पाया।’’
‘‘सर, पढ़ना-लिखना और बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ मायने नहीं रखती है। ये बस नौकरियों के लिए ही अनिवार्य होती है। सोचने के लिए ये अनिवार्य नहीं है, अनिवार्य है एक दृष्टि, जो कम पढ़े-लिखे में भी हो सकती है और अधिक पढ़े-लिखे में नहीं भी हो सकती है। कबीर कौन से पढ़े थे, लेकिन धार्मिक अन्ध विश्वास और सामाजिक कुरीतियां पर अपनी सोच का ऐसा प्रहार किया वैसा बड़े-बड़े किताबी ज्ञान और डिग्री वालों ने नहीं सोचा होगा। और आजकल सर, लोग शिक्षित नहीं साक्षर मात्र होते हैं। समझ का विकास संगत और चिन्तन से होता है।’’ ‘‘तुमको कैसे हुआ?’’
‘‘एक दिन मैं गौर से अपनी पत्नी की दिनचर्या पर विचार किया। तो बात परत-दर-परत सामने आती गयी और तब लगने लगा कि पत्नी के बिना तो परिवार एक क्षण भी न ही चल पायेगा और ये घरवालिया ही परिवार की धुरी है। सर, इसी से कहा गया कि ‘बिन घरनी धरभूत के डेरा’ और हमलोग है कि घरवालियों को बिना वेतन की जीवन भर की नौकरानी समझते हैं। हर तरह से उनका शोषण करते हैं और अपमानित करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते हैं और घरवालियां है कि पति को परमेश्वर मानकर जन्म जन्मान्तर तक के साथ की ईश्वर से मन्नते मानती रहती है। करवाचौथ से लेकर क्या-क्या पति-पूजा का व्रत रहती है। हममें से अधिकांश घरवालियों के श्रद्धा और पति परमेश्वर की शक्ति को धता बताकर बाहरवालियों के चक्कर में करवाचौथ के दिन भी देर से पहुँचते या पहुँचते ही नहीं। अब आप ही बताइए सर, हम लोग घरवालियों के साथ ज्यादती नहीं करते। गलती परिवार का कोई करे, चाहे बच्चे, बूढ़े पर दोष हम घरवाली पर लगाते हैं कि तुम्हें देखना चाहिए।’’
अधिक समय हो जाने पर झेपते हुए रतिनाथ जी ने कहा, ‘‘अरे सर, आज तो हमने आपका बड़ा समय ले लिया। बहुत सारी फाइलें आपके मेज पर निपटाने के लिए पड़ी है और मेरे टेबुल पर भी बहुत सारा काम पड़ा है। आज की धृष्टता के लिए क्षमा करेंगे। मैं चला।’’ ‘‘अरे भाई रतिनाथ जी, आपने समय लिया नहीं,समय दिया है। फाइलें तो आज यहाँ नहीं, तो घर पर या कल निपट जायेंगे, लेकिन जीवन को समझने के सूत्र जो तुमने बताये, वे कहाँ मिलते हैं। आज तक तो मैं गधे की तरह तमाम डिग्रियों के भार ढोते रहा हूँ। असली शिक्षा और जीवन दृष्टि तो आज मिली। तुमने आज मुझे सोते से जगा दिया। पुरुषीय अहंकार का मेरी दृष्टि पर एक आवरण जो पड़ा था, उसे हटा दिया। एक प्रकार से मेरे वैचारिक जीवन के जन्मदाता हो। मैं इसके लिए तुम्हारा बहुत बहुत आभारी हँू।’’
‘‘सर, मैं इस लायक कहाँ। यह सब आपकी अपनी वैचारिक सम्पन्नता है, जो मेरे जैसे अदने आदमी के निमित्त से प्रखर हो गयी।नहीं तो मेरी ऐसी बातें सुन बहुत से लोग मुझे मेहरवस्सा, जोरू का गुलाम न जाने क्या कहते। अच्छा सर, अब मैं अपने केबिन में चल रहा हूँ। नमस्कार।’’
रतिनाथ जी के चले जाने के बाद भी डॉ0 रजनीकांत श्रीवास्तव जी इसी विषय पर सोचते रहे और पूर्व में की गयी बेवकूफियों पर उनको ग्लानि हो रही है। इसी सन्दर्भ में उनको अपने स्वर्गीय ताऊ गिरधारी लाल की याद आई, जो महिलाओंके प्रति किसी प्रकार की सहूलियत के शख्त विरोधी थे और बात-बात पर कहा करते थे कि- ‘‘महावृष्टि चल फूट कियारी। जिनि स्वतंत्र होइ विगरे नारी।’’ और ढोल गवार शूद्र पशु नारी। ये सब ताड़ने के अधिकारी।’’ वे मानते थे औरत को किसी प्रकार की छूट दिया नहीं कि वह बिगड़ी। औरत को जितना लात घूंसे से अपने वश में रखोगे, तो अच्छी तरह से काम करेगी। इसीलिये वे ताई जी को हर बात पर डांटते-डपटते रहने के साथ कभी-कभार मारने से भी नहीं चूकते। वह भी बेचारी बेबस होकर सब सहती रहती थी। इसी प्रताड़ना का यह परिणाम हुआ कि उनके लड़के बाद में थोड़ा सयाने होने पर इतना स्वतंत्र हो गये कि सब ताऊ जी की सोच के विरुद्ध चले गये और वे कुढ़ते-कुढ़ते दुनिया से चले गये। इसी वैचारिक सोच में ही थे कि चपरासी ने आकर कहा- ‘‘साहब जी, चार बजे हैं, ये फाइल आलमारी में रख दूँ या मेज पर ही रहने दूँ।’’
‘‘नहीं, इसे आलमारी में रखो और आफिस बन्द करो, अब घर चलेंगे।’’
घर आये, तो पत्नी रोज की भांति चाय बनाकर लायी और रखकर जाने लगी, तो श्रीवास्तवजी ने कहा- ‘‘तुमने चाय पिया।’’
‘‘अभी कहाँ।’’
‘‘तो यही लाओ और मेरे साथ पिओ।’’
’’अभी तो मैं सब्जी लेने जा रही हूँ, आकर पी लूँगी। तब तक बाबूजी और अम्मा जी भी चाय पी लेंगे।’’
‘‘जाओ अपनी चाय लाओ और मेरे साथ पीओ। सब्जी मैं ला दूँगा। बाबूजी और अम्मा को भी चाय भेजवा दो।’’
‘‘मैं जाकर देती हूँ, कौन यहां है जिससे भेजवाऊँगी, बच्चे तो खेलने या ट्यूशन गये हैं।’’
‘‘चाय दो मैं दे आता हूँ।’’
पत्नी तीन कप चाय लायी और एक कप चाय मेज पर रखकर दो कप चाय स्वयं ले जाने लगी, तो उन्होंने ट्रे अपने हाथ में पत्नी से लेकर कहे, ‘‘तुम यहां बैठो, मैं उनको लॉन में चाय देकर आता हूँ।’’
पत्नी तब तक चाय पीने का इंतजार करती रही, जब तक वह आ नहीं गये और सोचती रही आज इनके व्यवहार में इस प्रकार का परिवर्तन कैसे? बहुत विचार किया, लेकिन कुछ भी सूत्र हाथ नहीं लगा। श्रीवास्तवजी के आने पर दोनों चाय पीना आरम्भ करते हैं। पत्नी चाय पीते जा रही है और श्रीवास्तव जी को देखती जा रही है। पत्नी द्वारा इस प्रकार देखे जाने पर श्रीवास्तव जी पूछते हैं- ‘‘इस प्रकार क्या देख रही हो? इससे पहले कभी देखा नहीं था क्या?’’
‘‘देखती तो रोज हूँ, लेकिन इस रूप में आज पहली बार देख रही हूँ।’’
‘‘रूप में मेरे क्या हो गया है। रोज जैसा तो हूँ। किस एंगिल से तुझे परिवर्तित नजर आ रहा हूूँ।’’
‘‘रोज तो एक मीठे बोल के लिए तरस जाती थी और आज है कि मक्खन पर मक्खन लगाये जा रहे हैं, इससे बड़ा परिवर्तन और क्या होगा।’’
‘‘ये मक्खन लगाना नहीं है। मेरा जो कर्तव्य है जिसे आज तक भूला था, उसका निर्वाह कर रहा हूँ और तुम्हारा जो अधिकार है, उसे दे रहा हूँ।’’
‘‘लेकिन इतना बड़ा परिवर्तन हुआ कैसे? कोई साधू महात्मा मिल गये थे क्या? या कहीं चोट खाये हैं, किसी बाहरवाली से जिसकी प्रतिक्रिया में घरवाली पर प्रेम प्रदर्शित कर रहे हैं।’’
’’तुमने जितने भी कारण गिनाए उनमें से कोई नहीं है। हुआ यह कि आज मैं एक महिला टाइपिस्ट को कल आफिस से बच्चे की बीमारी का कारण बताकर चले जाने की वजह से डांट-फटकार रहा था, वही बैठे थे रतिनाथ जी जिनको मेरी बात बुरी लग रही थी, तो उन्होंने ही बताया कि वास्तव में इनके बच्चे की तबियत खराब थी, मैं इन्हें डॉक्टर के यहां से बच्चे को दिखाकर आते हुए देखा था। इस पर मैंने उस महिला को शख्त हिदायत देकर जाने को कहा। महिला के जाने के बाद रतिनाथ जी ने घरवालियों की समाज निर्माण की आधारभूत भूमिका का ऐसा पक्ष प्रस्तुत किया कि मुझे अपने आप पर शर्म आने लगी। अब तो मुझे केवल अपनी ही नहीं, सभी घरवालियों के प्रति सहानुभूति जगी है, जिसको तुम मेरा परिवर्तित रूप बता रही हो। अच्छा अब थैला लाओ, सब्जी ला दूँ।’’
श्रीवास्तव जी थैला लिये और सब्जी के लिए चल दिये। उनको जाने के बाद सरिता ने रतिनाथ जी को फोन लगाया। फोन पहले राधा ने उठाया।
‘‘हैलो! राधा मैं सरिता बोल रही हूँ। भाई साहब हैं, जरा उनको फोन देना तो।’’
‘‘दीदी हमसे नहीं, सीधी उन्हीं से बात करेंगी। हमसे कोई गलती हो गयी क्या?’’
‘‘तुमसे बाद में निपटूँगी, पहले भाई साहब को फोन दें।’’
‘‘दीदी उनसे कुछ गलती हो गयी है क्या?’’
‘‘ये बाद में बताऊँगी, पहले उनको फोन दो।’’
वहीं पास में बैठे रतिनाथ जी ने कहा- ‘‘किसका फोन है राधा’’।
‘‘सरिता दीदी का फोन है। आपको बुला रही है, जल्दी कीजिए। गुस्से में लग रही है।’’
फोन लेकर रतिनाथ जी ने कहा- ‘‘हैलो! भाभी नमस्कार।’’
‘‘नमस्कार भाई साहब, आज आपने इनको क्या पिला दिया है कि आपके मुरीद हो गये हैं और इनका तेवर ही बदल गया है। उनके लाइफ स्टाइल में टोटली चेंज आ गया है। मेरे ऊपर ऐसा जान छिड़क रहे हैं, जैसे मैं उनकी घरवाली न होकर बाहरवाली हूँ। मेरी तबियत खराब रहने पर भी जो सब्जी लेने नहीं जाते थे, आज मुझे रोककर स्वयं सब्जी लेने गये है। इस सबके लिए मैं आपकी बहुत आभारी हूूँ।
‘‘भाभी जी अभी तो दिन है, रात आने दीजिए और आभारी रहेंगी।’’
‘‘आप भी भाई साहब, मजाक पर उतर आये।’’
‘‘मेरी इतनी मजाल कहां जो बॉस की बीवी से मजाक करूँ, मियां से कह करके भूंस भरवा देगी। मैं वास्तविकता बता रहा हूँ।’’
‘‘अच्छा ठीक है, अब फोन राधा को दीजिए।’’
’’लो भाभी तुमसे बात करना चाह रही हैं।’’
’’हाँ दीदी, बड़े जल्दी गुस्सा उतार दिया। उनसे कुछ भूलचूक हो गयी हो, तो माफ करियेगा।’’
’’अरे पगली!वह तो मैं बनावटी गुस्से से तुझे सस्पेंस में डाल रही थी। आज तुम्हारे मियां ने मेरे मियां का हृदय परिवर्तन कर दिया है कि अब वे मेरे पति के साथ-साथ दोस्त भी हो गये हैं। इसके लिए मैं तुम दोनों की जीवन भर कृतज्ञ रहूँगी। कभी फुर्सत लगे, तो उन्हें लेकर घर आओ।’’
‘‘जरूर आऊँगी दीदी।’’
‘‘अपने मियां का ख्याल रखना, हीरा है हीरा। अच्छा अब फोन रखती हूँ।’’
पति की तरफ मुखातिब होकर राधा ने कहा- ‘‘आपने तो घरवालियों को देवी बनाने का मिशन बना लिया है।’’
’’देवी नहीं, दोस्त।’’
’’हाँ-हाँ वही।’’
’’नहीं, दोनों में बहुत अंतर है। देवी बनाने की ‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।’’ की मनुस्मृति आदर्श तो सुना ही है, पर तुम्हारी जानकारी के लिए यह और बता दूँ कि मनुस्मृति ने औरत के ऊपर जितने प्रतिबन्ध लगाये हैं उतना और किसी ने नहीं। एक में पूजा की भावना है जो मात्र दिखावा बनकर रह गई है और दूसरे में समान अधिकार देने की बात है, जो आज के समाज के लिए अति आवश्यक है।’’
‘‘तभी तो सरिता दीदी, आपका बखान करते थकती नहीं थी और अंत में कहा कि तुम्हारा मियां हीरा है, उसे संभाल के रखना। अच्छा अब मैं चलती हूँ भोजन बनाने। बच्चे खेल के आयेंगे, तो उन्हें अधिक देर तक भूखा नहीं रखा जा सकता।’’
निर्मला जी के यहाँ बहुत सारी महिलाएं एकत्रित हैं, चूँकि निर्मला जी एक महिला डिग्री कॉलेज में मनोविज्ञान की प्राध्यापिका है। जब राधा के यहां आई थी, तो उस दिन भी उनका कॉलेज बन्द था। आज तो रविवार है, इस कारण उनके कॉलेज की बहुत सारी महिलाएं यहां आई हुई है। राधा थोड़ा विलम्ब से पहुँच रही है, तो प्राध्यापिकाओं को एक शुद्ध हाउस वाइफ का इंतजार अच्छा नहीं लग रहा है, लेकिन जब आयोजिका महोदय ही इंतजार कर रही हैं, तो अन्य की मजबूरी है। कुछ देर बाद राधा आई तो सबसे पहले उसने निर्मला जी से देरी के लिए क्षमा मांगी। सभी लोग विचार विमर्श के लिए बैठे, तो निर्मला जी ने भूमिका के तौर पर कहा- ‘‘आज मेरा सौभाग्य है कि मेरी शार्ट नोटिस पर आप सब लोग मेरे घर पर पधारे। मैं इसके लिए आप सबकी आभारी हूँ। मैं आप सबको इकट्ठा इसलिए की हूँ कि कल राधा की शार्ट नोटिस पर हम सब करीब आए। दस महिलाएं इनके घर इकट्ठा हुई थी। वहां राधा के प्रस्ताव पर महिलाओं के सन्तानोत्पत्ति और उनके द्वारा घर में किये जाने वाले श्रम पर कुछ हल्का फुल्का विचार हुआ। खास करके इस सम्बन्ध में राधा के जो विचार हैं, उसकी जो सोच है, उसका खुलासा हुआ। इनके विचारों को सुनकर हम सभी लोग आश्चर्यचकित और गद्गद थे। कुछ निजी व्यस्तताओं के चलते विचार विमर्श को यहां इकट्ठा होने के संकल्प के साथ जल्दी खत्म किया गया। कल की अपेक्षा आज अधिक संख्या में हम लोग इकट्ठा हैं, तो मैं बात को आगे बढ़ाने के लिए सबसे पहले राधा से कहूँगी कि वह कल के अपने विचार को आज पुनः खुलासा करे, जिससे कल के विचार विमर्श को आज के विचार-विमर्श से जोड़ा जा सके।’’
राधा उठी और सबका अभिवादन करते हुए कहा- ‘‘यहां पर एक से एक कॉलेज की विद्वान प्राध्यापिकाएं बैठी है। निर्मला जी ने विषय का खुलासाकर दिया है। मुझे शुद्ध हाउस वाइफ की इतनी औकात कहां कि आप लोगों के सामने कुछ बोल सकूँ।’’
राधा के ऐसा कहने पर कुछ प्राध्यापिकाओं का अहं थोड़ा बहुत संतुष्ट हुआ, जिससे वे सहज सी हुई। निर्मला जी ने कहा- ‘‘यह विचार की गंगा जो तुमसे बही है, उसे यहां भी दिखना चाहिए। हम लोग तो अपनी बात कहेंगे ही, पहले तुम अपनी बात शुरू करो।’’
राधा ने निर्मला जी का आदेश पाकर कल के अपने विचार आज भी यहां रखे। सुनकर नयी महिलाएं भी आश्चर्यचकित। तब उनके समझ में आया कि निर्मलाजी इसको इतना भाव क्यों दे रही थी। कुछ महिलाओं को तो उसकी वैचारिक सम्पन्नता से स्पर्धा हो रही है और कुछ जल-भुन भी गयी। जलने-भुनने वालियों में से एक थी कादम्बिनी जी, जो खड़े होते हुए कही, ‘‘राधा जी घरवालियों के इन दोनों कार्यों को जो महिमामण्डित किया है और सारा दोष पुरुषों के मत्थे मढ़ते हुए दिखाया है कि पुरुष नारियों का शोषण करते हैं, परिवार की सेवा में किये गये श्रम को महत्व नहीं देते हैं और नारियों को अपने बराबर अधिकार नहीं देते हैं। मैं राधाजी से और इनकी बातों पर तालियां बजाने वालों से पूछना चाहती हूँ कि हमारे बीच की राधाएं जब पुरुष पर डोरे डालती है। सँज-धज कर अपने हाव-भाव और अंग-प्रदर्शनों द्वारा पुरुषों को काम का खुला निमंत्रण देती है। पुरुष को अपने रूप के मद में पागल बनाकर ठगती रहती है और अंत में दूध में पड़ी मक्खी भांति निकाल बाहर फेंकती है और दूसरा मुल्ला ढूंढ़ने में लग जाती है। पुरुष का घर बर्बाद करने वाली भी ये अधिकांश घरवालियांे ही होती है। इनके विषय में राधा जी क्या कहेंगी?’’
राधा पुनः खड़ी होकर कहती है, मैं कादम्बिनी जी की बात से सहमत हूँ कि समाज में कुछ ऐसा होता है, लेकिन यहां के प्रस्तावित विषय का इससे घालमेल करना उचित नहीं। मेरे कहने मात्र का अर्थ यह है कि घरवालियों के इन दोनों कामों को समाज नकारता है, जबकि ये दोनों कार्य समाज निर्माण की मुख्य आधारशिला है। इन दोनों के बिना परिवार और समाज की कल्पना कितनी विकृत होगी, इसका सहज अनुमान आप लगा सकती है। घरवालियों का कार्य अपनी जगह है और बाहरवालियों का काम अपनी जगह है, जैसे सूर्पणखा के कार्य या चरित्र से सीता के कार्य या चरित्र की महत्ता कम नहीं होती है। उसी प्रकार बाहरवालियों के चरित्र से घरवालियों के चरित्र पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता है। दूसरी तरफ बाहरवालियों को जो देखने में लगता है कि वह पुरुष को ठगती है, उनका शोषण करती है, पर थोड़ा गहराई में जाकर देखिए तो आप को पता चलेगा कि यहां भी औरत ही ठगी जाती है। स्वभाव से कई स्त्रियों से प्रेम करने वाला पुरुष अपने पैसे के बल पर औरत को अपनी भोग की वस्तु बनाता है। दारू और दारा की बात तो आप लोगों ने सुनी होगी, औरत की गणना वस्तु के रूप में करके भोगता है पुरुष आपको बाहरवालियों के रूप में और आप को भ्रम होता है कि बाहरवालियां उसे भोग रही है। इन्हीं पुरुषों द्वारा बाहरवालियों को उपाधि मिलती है, रण्डी-वेश्या, विषकन्या और काल गर्ल जो अपने आप में घृणास्पद और गाली है। आप ही निर्णय कीजिए शिकारी कौन है और शिकार कौन, रही राधा की बात तो राधा उस प्रेम की पराकाष्ठा है, जिसमें शारीरिक कामजनित सम्बन्ध कुछ मायने नहीं रखता। वह अपने प्रेमी के लिए अपना सबकुछ न्यौछावर कर देती है। राधा तो कृष्ण की सर्वभवन्-सामर्थ्यरूपा शक्ति का नाम है। राधा मीरा है जो अपने प्रेमी कृष्ण के लिए सबकुछ छोड़ देती है। राधा तो सांसारिकता की धारा को आध्यात्मिकता की तरफ प्रवृत्त होना है। अब आप ही बताइए राधा गलत, मीरा गलत, घरवालियां गलत या और कोई? मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि औरत का विकसित रूप मां का है और सारे रूप उसके जीवनयात्रा के पड़ाव है। घरवाली उसी माँ का रूप है।’’
राधा की बात सुन कादम्बिनी जी का सिर नीचे झुका, तो ऊपर उठने का नाम ही नहीं ले रहा है और उपस्थित सभी महिलाएं बड़ी देर तक तालियां बजाती रही। उन महिलाओं में एक महिला खड़ी होती है और पूछती है कि- ‘‘राधा जी ने आपने घरवालियों को मां का रूप बताया है, लेकिन कुछ घरवालियां अपने पति और बच्चों पर ऐसा हॉवी रहती है कि उनके साथ नौकरों जैसा व्यवहार करती है। जबकि माँ ऐसा कभी व्यवहार नहीं करेगी। ऐसी महिलाओं के विषय में आपका क्या कहना है?’’
‘‘देखिए महोदया, ऐसी महिलाएं पुरुषीय स्वभाव की शिकार हो गयी है, जिसके चलते उनका व्यक्तित्व विकृत हो गया है। ऐसी महिलाएं महिला तो रहती नहीं, पुरुष भी नहीं बन पाती है। किसी भी वस्तु का विकृत रूप कितना भयानक होता है, वह तो आप सब लोग जानती है। पर ऐसा इक्का दुक्का उदाहरणों से घरवालियों की मातृत्व भावना कलंकित नहीं होती है। मुझ सामान्य सी महिला को आप लोग जैसी विद्वान महिलाओं ने झेला, इसके लिए मैं आप सबकी आभारी हूँ। अब निर्मला दीदी आप लोग से कुछ कहेंगी।’’ अपनी बात समाप्त कर राधा अपने स्थान पर बैठ जाती है।
निर्मला जी उठती उसके पूर्व सरिता जी जो कुछ देर से आई थी। उठकर राधा को बहुत सारा साधुवाद देते हुए कही- इसके मियां ने तो मेरे अक्खड़ मियां को ऐसा परिवर्तित कर दिया है कि वह मुझे घरवाली कम बाहरवाली अधिक मानने लगे है। बराबर का सम्मान और अधिकार देते हैं। सबसे मजे की बात यह है कि इससे पूछो तो यह कहती है कि यह सब मैं अपने मियां से पाया है और इसके मियां से पूछो तो कहता है यह दृष्टि मैंने अपनी पत्नी से पाई है। इन दोनों में कौन किसके वजह से ऐसा सोच पाया है, यह तो यह दोनों जाने, लेकिन जो भी सोचा है, सबके भले की सोचा है।’’
अंत में निर्मला जी कहती है कि- ‘‘राधा के इतना कहने के बाद अब कुछ कहने को शेष नहीं रह गया है। अब हम सबकी जिम्मेदारी बनती है कि हम सब अपने कर्तव्य के साथ-साथ अधिकार के लिए सचेत रहे।’’ सभी लोग उठती हैं और एक चेतना के साथ-साथ अपने-अपने घर को चल देती है।
परिचय
डॉ० श्यामवृक्ष मौर्य का जन्म 12 अगस्त 1957 को टहरकिशुन देवपुर. आजमगढ़ (उ० प्र०) के एक साधारण कृषक परिवार में हुआ।
शिक्षा: एम० ए० (दर्शनशास्त्र), पी-एच० डी०, बी० जे०, डिप्लोमा इन योग, काशी हिन्दु विश्वविद्यालय, वाराणसी, उ० प्र० से।
लेखन विधा: कहानी, कविता, उपन्यास एवं निबंध।
प्रतियोगी परीक्षा सम्बन्धी लेख और पुस्तकें प्रतियोगी परीक्षाओं से सम्बन्धित लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। उपकार प्रकाशन, आगरा से आई० ए० एस० मुख्य परीक्षा (दर्शनशास्त्र), प्रारम्भिक परीक्षा (उ० प्र०, मौर्य राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़) बौद्धिक एवं तार्किक युक्त परीक्षा आदि
डॉ. श्यामवृक्ष
पुस्तकें प्रकाशित।
कविता संग्रह: समय की शिला पर (दोहा संकलन, कई कवियों के साथ), जले सुधि के दीप (क्षणिका संकलन, कई कवियों के साथ)।
कहानी संग्रह: एक और द्रौपदी, एहसास के नए दायरे।
उपन्यास : मुझे चाँद छूना है, हैलो.... मैं कृष्ण बोल रहा हूँ, मैं बुद्ध हूँ।
निबंध संग्रह: समाज दर्शन और राजनीति, चिन्तन प्रवाह।
दर्शनिक ग्रन्थ : अद्वैत वेदान्त (सिद्धान्त बिन्दु के आलोक में), बौद्ध धर्म एवं दलित चेतना, नारीवाद : एक दार्शनिक अध्ययन, दर्शनशास्त्र परिभाषा कोश (वैज्ञानिक तकनीकि शब्दावली आयोग, नई दिल्ली सदस्य विशेषज्ञ समिति)।
संपादित ग्रन्थ: पर्यावरण प्रदूषण के विविध आयाम एवं समाधान, स्मृतियों के आईने में शिक्षा मनीषी स्व० रमाशंकर सिंह, यादों के उजाले में डॉ० उमाशंकर सिंह (व्यक्तित्व एवं कृतित्व)।
शीघ्र प्रकाशनाधीन ग्रन्थ समाजवादी चिन्तक डॉ० राम मनोहर लोहिया।
अध्यापनः बी० एच० यू० दर्शनशास्त्र विभाग, ए० के० कॉलेज, शिकोहाबाद, जी० एस० एस० पी० जी० कॉलेज, कोयलसा, आजमगढ़।
सम्प्रति : पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर (दर्शनशास्त्र), ग्रा० टहर किशुनदेवपुर, पो० टहर वाजिदपुर, आजमगढ़ (उ० प्र०)।
मोबाईल : +91-9411411684
ई-मेल: dr.s.b.maurya@gmail.com
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें