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गुरुवार, 23 मई 2024

गरिमा सिंह की कविताएँ

युवा कवि गरिमा सिंह का गाथांतर पर स्वागत है। इधर वह अपनी कविताओं से निरंतर ध्यान खींच रही हैं।आइए पढ़ते हैं उनकी कुछ कविताएँ -



(1)

वो लड़की 

वो लड़की देख रही है 

अपनी छत से सूरज को ढ़लते हुए

धीरे, धीरे बादलों की परतों को चीरकर 

सूरज समा रहा है सतरंगी आसमां में 


नीले रंग में वो उड़ा देना चाहती है 

अपना दुपट्टा 

सुना है उसने कि 

नीला रंग गहरे प्रेम का प्रतीक है 

जिससे वह आज लिख देना चाहती है 

एक गीत आसमान के सीने पर, 

और अपने हाथों को हवा में उठाकर 

बना देना चाहती है फ़ाख्ता का एक जोड़ा, 

और उन्हें उड़ा देना चाहती है 

उड़ रहे पंछियों के झुण्ड में 


सहसा व देखती है

आपस में कलरव करते 

एक पंछियो का जोड़ा 

उसकी ओर उड़ता चला आ रहा है, 


झुरमुट से साँझ झाँक आती है दूर तक 

सब कुछ वह आज 

बना देना चाहती है 

मुक़म्मल, 

इस शाम की तरह, 

और उतार लेना चाहती है 

अपनी जिन्दगी में भी

एक मुक़म्मल शाम 

जो हकीकत में कहाँ आती है 

उसकी जिन्दगी में

जिसका करती है वह रोज़ 

यूँ ही इंतज़ार। 


 


(2)

स्त्री 

तुम एक कल्पना नहीं हो 

न ही मात्र देह 

स्पंदित है तुम्हारा मन

स्याही-कलम से नहीं 

आंसुओ से लिखा गया 

इतिहास तुम्हारा, 

कई गार्गी, द्रोपदी में ढ़ली तुम 

न जाने कितनी बार ख़डी हुई 

सीता की तरह आज भी 

अग्नि परीक्षा जारी है। 

नहीं है तुम्हारे कई चेहरे 

किसी को छलना नहीं सीखा 

आँवा की नमिता की तरह 

जलती हो तुम, 

पिकासो के चित्रों में उभरी हो 

सूजन मैग्नो की कविता की तरह 

आज भी जंग तुम्हारी जारी है। 

रोटियों की परिधि से बाहर निकलकर 

धरती की गहराई को मापना होगा 

चरित्रों के खाके से झाँकना होगा बाहर 

इमारत की पहली ईंट हो तुम 

बदलनी होगी करवट एक बार फिर 

पुरुषों ने लिख डाला आधा इतिहास 

अब तुम्हारी बारी है। 

तोड़नी होंगी कुछ वर्जनाएं 

लगानी होगी छलांग इस घेरे से 

भले नाखूनों को न बनाओ सख्त 

कवच को बनाना होगा कठोर 

तोड़नी होगी श्रृँखला और बेड़ियाँ 

लेखनी में पैदा करनी होगी धार 

उठो, नया इतिहास लिखने की तैयारी है। 



(3)

गुड़िया 

वह छोटी बच्ची जो खेलती है 

छोटे छोटे घरौदे बनाकर 

अपने नन्हें हाथों को चूड़ियों से सजाती है, 

वह रोज सपने संजोती है बड़े होने के,

जिससे वह भी मम्मी की तरह डाँट सके, 

कई स्वांग रचती है 

कभी दुपट्टे को साडी की तरह लपेट कर 

माथे पर बिंदी लगाकर, 

पैरों में पहन लेती है  पायल 

अपनी नन्ही सी गुड़िया को सीने से लगाए 

एक माँ के कर्मों को सहज ही निभाती है, 

उसके लिए यह एक खेल है 

वह गुड़िया को थपकियाँ देकर सुलाती है, 

उसे नहलाती है, बड़े प्यार से खिलाती है, 

उसे डाँटती है, 

प्यार से समझाती है, 

गुड़िया को लड़की होने के सारे कर्म बतलाती है, 

जो अपने लिए माँ से सुनती है, 

वो सब गुड़िया को सुनाती है, 

डाँट पड़ने पर ,उस पर गुस्सा उतारती है, 

माँ के न रहने पर सब दुख दर्द उससे बाँटती है, 

उसे गुड़िया बनाया जाता है, 

वो बेचारी गुड़िया को लड़की बनाती है, 

लड़की होने के सारे गुण धर्म को निभाती है, 

बड़े होने पर भी गुड़िया को कहा भूल पाती है? 

अपनी सारी चंचलता को गुड़िया के भीतर 

उसी देहरी पर छोड़ आती है। 


  


(4)

कविता का जन्म 

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एक कविता यूँ ही 

नहीं जन्मती 

बिना भाव, 

बिना पीड़ा, 

एक कविता

मन की कोख से 

, एक बच्चे की 

तरह रोज सृजित होती है 

, धीरे -धीरे बनता है 

कविता का मन शरीर, मस्तिष्क, 

और दर्द से पैदा होती है 

कविता, जिसे देखकर 

कवि ऐसे ही खुश होता है 

जैसे एक माँ, 

और हर कविता दुनिया 

की सबसे सुन्दर कविता 

बन जाती है, 

या समझी जाती है, 

वह रोज उसे निहारता है, 

उसकी किलकारियाँ सुनकर 

आनंदित होता है, 

उसे बार बार सवारता है, 

सुधारता है, 

कुछ दिन बाद वही कविता 

बड़ी हो जाती है, 

वो देखता है, उसके भावों से 

अब मेल नहीं खाती, 

एक संघर्ष छिड़ जाता है 

जिसे पीढ़ी संघर्ष कहते है, 

कवि का मन फिर तड़पता है, 

नए भाव फिर कुलबुलाते है, 

सृजन की आंकाक्षा से 

फिर पैदा हो जाती है 

कविता, जीवन की अनवरत 

प्रक्रिया में शामिल होने के लिए। 

                             गरिमा सिंह 

                     

         

परिचय 

हिंदीसहित्य विषय से नेट जे आर एफ गरिमा सिंह जौनपुर (उत्तर प्रदेश )जिले की मूल निवासिनी है,जो वर्तमान समय मे राज्य कर अधिकारी के पद पर कार्यरत रहते हुए अपने लिए कुछ समय निकाल कर साहित्य सृजन का कार्य करती है, इनकी कविताए पत्र पत्रिकाओं मे प्रकाशित है। ,

शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

शेखर सावंत की कविताएँ

शेखर सावंत की कविताएँ


शेखर सावंत उन कवियों में से हैं जो नपी –तुली शैली और शब्द –गुम्फन से ही अपनी बात कह देते हैं ,आज गाथांतर में प्रस्तुत है उनकी तीन कविताएँ ,आइये पढ़ते हैं-



1  ब्लड-टेस्ट "
------------
उससे थोड़ी सी पहचान थी
पहले से
इसलिए जब उसने
पैथोलॉजी की क्लिनिक खोली
तो मैं उसका पहला रोगी था
जो उसके यहाँ गया था
अपना ब्लड-टेस्ट कराने
देखा था
एक छोटे से पनबारी की दुकान जैसी कोठरी में
बैठा था चुपचाप वह
कोने में एक छोटा सा टेबुल
और उसपर कुछ फ्लास्क , कुछ परखनलियाँ
और कुछ स्लाइड्स रखे थे
नमस्कार-पाती के बाद मैं वहाँ बैठ गया
बैठते ही एक सुई से उसने मेरा खून निकाला
और डाल दिया एक बेहद छोटे से शीशी में
ठेपी बंद की और हिलाना शुरू किया
शीशी को आहिस्ते
मुझे ऐसा लगा जैसे उसके हाथ में
शीशी नहीं मेरा पूरा बदन हो
जिसके खून को फेट रहा हो वो
मैंने उसकी तरफ देखा , वो मुस्कुराया
फिर धीमे से गंभीर लहजे में बोला--
 बरसो से कोई जोशीली कविता
नहीं लिखी क्या
खून काफी ठंढा पर गया सा लगता है
मैं चुप रहा
उसने हाथ स्थिर किया
और निहारना शुरू किया शीशी के खून को
अरे यह क्या !
उसके चेहरे पे इतना पसीना इतनी बेचैनी !
उसने बडबडाना शुरू किया---
 हाँ यही खून  नहीं नहीं ऐसा ही खून
ऐसा ही लाल लाल
भाई मेरे  ऐसा ही खून था वह , ऐसा ही
जिसने मेरे घर को मटियामेट कर दिया
जो मेरे स्वर्ग-सिधारे बाप के
छलनी शरीर से निकला था
सिर्फ इसलिए कि एक जमीन के टुकड़े को
उसने अपना कहा था
और उस भेड़िए जमींदार की औलाद ने---
खैर ! छोड़ो
बात पूरी किए बगैर ही वह रुका
मैं अचंभित बुत बना बैठा रहा
उसकी आँखों में आँसू थे
वह फिर बुदबुदाया--
 अगर कुछ देर बैठ सको तो बैठो
रिपोर्ट लेके ही जाना
कुछ बातें भी हो जाएंगी '
मैं एक टक उसे निहारता रहा
उसने थोडा सा खून
एक पतली परखनली में डाला
एक दो बार हिलाया
और परखनली की तरफ देखते ही चीख सा पड़ा
' हाँ ऐसा ही खून , हाँ-हाँ ऐसा ही खून
हाँ बंधू ऐसा ही खून था
जो मेरी किशोरी बहन के मासूम जिस्म
से निकला था
जब कुछ दरिंदों ने रौंद डाला था
उसके जिस्म को बर्बर्तापुर्बक
और--और--वह चल बसी थी  उफ़ !
मैंने उसकी भावना को समझते हुए
उसके कन्धों पर सांत्वना के थपकी दिए
उसने मेरी तरफ देखा और फिर बोल पड़ा--
 मैंने तुम्हे परेशान किया न
अब तुम रिपोर्ट लेके ही जाना
अकेला हूँ  मैं भी साथ चलूँगा '
मैं चुपचाप बैठ गया
उसने शीशी से दो बूंद खून ले
फैला दिया स्लाईड पर
और यह क्या , फैलाते ही
लगभग बेहोश हो गया
और उसकी मिमियाती सी आवाज निकली--
 हाँ ऐसा ही था
ऐसा ही था वह खून जो मेरी स्वर्गीया माँ के
सर फटने से निकला था
जब रास्ते में ही कुछ गुंडों ने
उसपर हमला बोल दिया था
क्योंकि वह थाने जा रही थी
पिताजी और बहन के कातिलों के खिलाफ
रपट लिखवाने ।
                    ----शेखर सावंत ----


 2 बिजली का खंभा "
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इस गली की
ना जाने कितनी कहानियों का
पक्का गवाह है
यह बिजली का खंभा
वह सामने के मकान को
बगलवाले पनवारी की दूकान को
उस खूंसट पहरेदार को
और उन बेहाये कुत्तों को
सबको पहचानता है
क्यों आते हैं इतने लोग
इस पान की दूकान पर
और उनकी नज़रें
क्यों रहती हैं उस मकान पर
वह सब जानता है
अपनी लम्बाई का फायदा उठाते हुए
झांकता रहता है वह
उस मकान के आँगन में
वहाँ उसे दिखता है एक तुलसी का पौधा
और एक शर्मीलापन
जिसपर दीवाना है इतिहास गली का
और वो खूंसट पहरेदार
जो बेवजह रात में
डंडे पटकता है
गली की सड़क पर
खंभे की पीठ को घड़ी समझता है
जब तब आकर दो चार डंडे
जर देता कसके
बिजली का खंभा दर्द से कराहता है
लोग उस पहरेदार पर खुश हैं
लेकिन यह खंभा ही जानता है
कि वह कितना इमानदार है
कि सिर्फ पहरेदारी ही नहीं उसका रोजगार है
इलाके के सारे चोर-उचक्कों के साथ
उसका अपना
शेयर का फलता-फूलता कारोबार है
और वो बेहाए कुत्ते
जो रात के सन्नाटे में
लाज़-शरम बेचकर
रंगरेलियां मनाते हैं
खुलेआम गली में
कितनी बार समझाया है इस बिजली के खंभे ने
उन कुत्तों और कुतियों को
लेकिन उनकी भी भौं-भौं खंभे से कहती है--
आखिर ये सफेदपोश आदमी भी तो
हमारी ही नक़ल करते हैं
रात की गहराई में
मासूमो से छल करते हैं
हमदोनों की सभ्यता कलयुग में एक है
यह सुनकर शर्म से
खंभे के माथे पर लगा बल्ब
फ्यूज कर जाता है
अब तो यह खंभा भी
कुछ कहने से घबराता है ।
                     ----शेखर सावंत----

 ताले का सुख-दुःख "
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मेरे ताले की नाभि में कैद हैं
ढेरों  संवाद
जिसको वह कभी नहीं
चाहता है भूलना
रखता है याद
कितने जन आते हैं
रह-रह कर जब-तब
खोजने को मुझको
भाई या मित्रगण या कोई कुटुम्बजन
यदा-कदा पिताजी
और कभी  वो
जो भी है आता
ताले को बंद देख
कागज़ का एक टुकड़ा
उसकी नाभि में घुसाता
उसमे है सुख-दुःख का कोई संवाद
मिलने की आरजू
देखने की चाहत
परखने की ललक
या कोई न्योता
या कोई नोटिस
भाई का पैगाम या पिता का आशीर्वाद
या मित्र की ठिठोली
या फिर  उसकी  शिकायत
ताले को दुःख भी है
होता वह आहत
कि मेरे आगुन्तुक का
स्वागत न कर पाता
बस यूं ही निहारता लटका ही रह जाता
पर अन्दर ही अन्दर वह होता कुछ खुश भी है
पढ़ लेता चुपके से
कागज़ का टुकड़ा वह
और मुझे अकेले में मुंह चिढाता है ।
-------------शेखर सावंत--------