यह समकालीन स्त्री कविता का सबसे सुन्दर समय है जब एक साथ हिन्दी में विभिन्न प्रन्तीय भाषाओं की कवयित्रियों ने मजबूत दखल बनाई है।मीता दास मूलतः बांग्ला भाषी हैं और बंग्ला के साथ -साथ हिन्दी में भी कविताएँ लिखती हैं।आपकी कविताओं के प्रतिरोधी तेवर आपको कात्यायनी की परम्परा से हिन्दी में जोड़ते हैं।समाज के दबे कुचले शोषित वर्ग के प्रति मानवीय करुणा आपकी कविताओं में व्यापक फलक पर उभरता है।मीता दास हिन्दी और बांग्ला के बीच की वह मजबूत सेतु हैं जो दो भाषा संसार की सांस्कृतिक चेतना से हमें रू-ब-रू कराती हैं।मीता दास की कविताएँ{ 1 } ०००" चूहा भात - भात चूहा "०००चूहा भात - भात चूहाभात चूहा हो या चूहा भात ...........ओ मुसहरमुसुहा खा - खा कर बने हो मुसहरऔर यहाँ सारे सरकारी हथकंडे जारी हैं तुम्हे भुलाने औरतुम्हारी उपस्थित कोदर्ज करने में कर रहे कोताहीठेल रहे हैं बिलों में तुम्हारी सारी जनसँख्या कोतुम सब जिन्दा हो चूहों के लिए या चूहे जिन्दा हैंतुम्हे जिन्दा रखने के लिएकौन किसके लिए जिन्दा है ?चूहा सरकारचूहा मुसहरया चूहा भात या भात चूहासरकार के खोदे हुए बिल मेंछुपे हुये है तुम्हारे जीने मरने के आंकड़ेसरकारी दाल खा गये दुकानदारसब्जी खा गये चतुर जानवर ……
चांवल !दब गए खेतों में
पाले की मार से और बच गयेचूहेतुम्हार हिस्सेगोदाम मेंकिसिम - किसिम के चूहेइस खेत , उस जंगल इस प्रदेश उस प्रदेश सभी ओर के चूहेअब करते हैं
आवाजाहीवे भी भूखे , कीटनाशक से त्रस्तरोगों को वहन करती दौड़ पड़ती है अपनी जान बचानेतुम भी भूखे नंगे , बेरहम पेट की ज्वाला से त्रस्तपकड़ कर ही मानते , भात - चूहा को तरसतेखुदसा माझी ,बरहमु या चतुरा, एक्कापरिवार बड़ा , कुनबा बड़ाचूहे तो उतने ही होंगेजितनी उनकी प्रजनन क्षमता होगी यामुसहरों , कीटनाशकों और नामालूम बीमारी से न मर गए होंपर तुम्हारा क्या ...........मुसहरतुम्हारे तो प्रजनन क्षमता के सारे मुफ्त सरकारी उपाय भीहै कालाबाजारी के हत्थेहर कस्बे के मेडिकल शॉप मेंधड़ल्ले से बिक रहे मुंह मांगी कीमतों परकोई फैमिली प्लानिंग कैम्प भी नहीं चलतेन ही बंटता हैं तरीके ही मुफ्त और न ही बंटते है सरकारी राशनतुम्हारे भूखे - नंगे बच्चे और तुमअनजानी अनचाही बीमारियों से मरकर ही इतने बचे हैं किचूहा मिल ही जाता है एक आधऔर तुम दो वक़्त की ही नहींएक वक़्त की कम से कम जुगाड़ ही लेते होभात - चूहाकेरोसिन पर नहींझाड़ - झंकाड़ जलाकरभून ही लेते हो चूहाऔर भात संग सान गटक जाते होअगला चूहा मिलने तक |000000{ 2 }०००" फिलिस्तीनी कविता पढ़ते हुए "०००{ नवजान दरवीश कहते है -------- फ़ादो , औरों की तरह नींद मुझे भी आ ही जाएगी इस गोली बारी के दरमियान ............}हाँ, हाँ ,हाँरक्त की गंध में भी मुझे नींद आ ही जाएगीचीखते बिलखते बच्चों के खुनी फौवारों से नहा कर भी ,मुझे नींद आ ही जाएगीबस दुःख होगा इस बात परकि मेरा देश इस बात पर चुप्पी साधे बैठा हैहवाई दौरों के सफ़र में मशरूफ़दूरबीन से हवाई पट्टी को ताकता हुआ विमान की खुली खिड़की सेउन्हीं बच्चों की लाशों के ऊपर से हवाई उड़ान भरकरहर वो सरहद पार कर लेगाअपनी हदें पहचानने और भुनाने के लिएअधमरे , खून से लथपथ बच्चों की लाशों पर से गुजर जायेगाफिर न उफ़ न आह बस एक गंभीर हँसी लपेटेबढ़ जायेगा अपने दौरे के अगले पड़ाव की ओर...................ये चुप्पी तुम्हे महँगी न पड़ेबच्चे माफ़ नहीं करेंगे कभी तुम्हेनींद तुम्हें भी आ ही जाएगीराजसी ठाठ - बाट में पररक्त के सूखते धब्बों की गंधनहीं दब पायेगी किसी रूम फ्रेशनर से या न हीटेलीविजन पर विज्ञापित किसी डियोड्रेंड से ही |०००००००००{ 3 }००० कहाँ है वे संस्थायें " क्राई या सेव द चिल्ड्रन "०००बच्चे सिर्फ रो ही नहीं रहेतड़फ - तड़फ कर मर भी रहे हैंउनकी लाशों पर यह कैसी विजय पताकालहराने को उत्सुक होहे हथियार बंद सैनिको क्या तुम्हारे बच्चों की शक्लेंइन बच्चों की शक्लों से जुदा हैंकोई कहता है फिलिस्तीनी बर्बरता पर लिखो कवितापर हाथ नहीं उठते , लाल रंग बोलता है , लिखता कुछ नहींआँखे नहीं दोहराना चाहती उन मासूमों के चेहरेजो बर्बरता से कुचल दिए या भून दिए गए हैंनही चलाना चाहते कलम ,उठाना चाहते हैं बन्दूक बच्चे भी उनके खिलाफकई बच्चे तो मीडिया वालों के कैमरे को ही बन्दूक की नली समझअपने दोनों हाथ समर्पण की मुद्रा में उठा रखते हैपर हमें पता है मानवता का पाठ सिर्फ रटने या रटाने के लिए नहीं बनीजेरुसलम को अबयाद रक्खेंगे ईशा के सलीब के लिए नहींमासूम बच्चों के बिलखते रुदन सेऔर पेशावर को ?००००००००००००{ 4 }००० " सिगरेट की क्या बिसात " ०००उसने सिगरेट का कश लियाऔर फूंक डाले सारे अवसादसिगरेट के धुएं को लीला कुछ इस तरह किसारी चुभन लील गई एक ही साँस मेंसिगरेट फूंकना सिर्फ एक मर्ज नहींएक दवा भी हैउसने जान लिया थाधुंएँ के छल्ले उछालते उन मर्दों सेजो टेढ़ी हँसी हँस कर फिकरा सा कश ही देते थेक्या स्त्री फूंक सकती हैं सिगरेटवे हमेशा ही मुगालते में रहते हैंउन्हें नही पतासिगरेट क्या वे सारा जहाँ फूंक सकती हैंसिगरेट की क्या बिसात |उस स्त्री ने छल्ला बनाया धुंएँ कागोल मटमैला साऊपर उठता हुआदेखा तिरछी नजर सेछल्ला आहिस्ते - आहिस्ते विलीन हो गयारह गई सिर्फ गंधदुर्गन्ध भी कह सकते हैंफिकरे की चुभनउड़ा चुकी वह छल्ला बनाबची रह गई सिर्फ और सिर्फ दुर्गन्ध ............|००००००००{ 5}००० " बच्चों के नाम " ०००बच्चों ने दी शहादतगाजा आज खाली शिशु , बच्चों और किशोरों सेइज़राइली टैंक घूम रहे हैं सरपट , बच्चा खोर की तरहउधर भूमध्य सागर का सीना चीरताफुंफकारता है युद्धपोतपैलेस्टाइन के सीने पर खिंची वह तीस फुट ऊँची दीवार इज़राइलकीउस पार की जमीन पर अब कब्ज़ा है इजराइलों काबच्चों के खेलने के मैदानो में फ़ैल गए हैं इज़राइली मिलट्री कैम्पबच्चे तुम और तुमसे बड़े सभी बंदी हैं इज़राइली कैदखानों मेंहोता है रोज कत्लेआम वहां |००००००{ 6}००० " शहीद शिशु - बच्चे " ०००तुम्हारी कलपती आत्माएंक्या चैन से सोने देती होंगीउन कातिलों को ?शत्रुओं के हैलीकॉपटर लैंड होते हैंतुम्हारे पूर्वजों की छतों पर , खेत - खलिहानों परवे रौंदते हैं भारी - भरकम बूटों , बमों , बंदूकों सेघायल , मृत लाशों से भरे मिलट्री के ट्रक , एम्बुलेंस के चक्कों सेचाक होते हैं तुम्हारे ही रक्त बिंदु , अब झरते नहीं सूख गए हैं |सूखे हलक से उच्चारित भी नहीं होतेछलनी हुए उन शहीद शिशुओं के नामगाँव या स्कूलों के पतेअब वे पेशावर के नाम से पहचाने जाते हैंक्यूँ की शहीदों की शिनाख्त सिर्फकब्रिस्तान में या फिर फिजाओं में हैं दर्ज |००००००००००००परिचयनाम ---मीता दासजन्म ------12 जुलाई सन 1961, जबलपुर { मध्य प्रदेश }शिक्षा ------ बी . एस . सी विधा ------- हिंदी भाषा & बांग्ला भाषा में कविता , कहानी , लेख , अनुवाद और संपादनप्रकाशित ग्रन्थ ----- 1...." अंतर मम" काव्य ग्रन्थ , बांग्ला भाषा में 2003 में2 ....नवारुण भट्टाचार्य की कविताएं ( अनुवाद - मीता दास ) प्रकाशित3 .... भारतीय भाषार ओंगोने ( अनुवाद हिंदी कवियों का बांग्ला भाषा मे अनुवाद - मीता दास ) प्रकाशित5... काठेर स्वप्न ( हिंदी की प्रतिष्टित कहानियों के बांग्ला अनुवाद ) संकलन प्रकाशित6... जोगेन चौधुरी की बांग्ला कविताओं का हिंदी अनुवाद प्रकाशित7... जोगेन चौधुरी के 2 संस्मरण का हिंदी अनुवाद प्रकाशित8... " पाथुरे मेये" स्वयं की बांग्ला कविताओं का संकलन प्रकाशित9.....'' अनुवाद एर जलसा'' {अनुदित कविताओं का संकलन बांग्ला भाषा में } प्रकाशधीन10 .... हिंदी कवि अग्निशेखर की कविताओं के बांग्ला अनुवाद - मीता दास ) प्रकाशित11.... नवारुण भट्टाचार्य की कविताओं के अनुवाद प्रकाशधीन(अनुवाद - मीता दास )12 ... सुकान्त भट्टाचार्य की कविताओं का अनुवाद ( मीता दास ) प्रकाशधीन ।13... स्वयं कीकहानियों का संकलन ( हिंदी ) संभावना प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित14 ... हिंदी में स्वयं की कविताओं का संकलन शीघ्र प्रकाशितसंपादन -------- 1... " हम बीस सदी के " काव्य संकलन में संकलित कवितायेँ और संग्रह के संपादक मंडल में2..." धरातल के स्वर "के संपादक मंडल में3..." छत्तीस गढ़ आस पास "के संपादन मंडल में4.... कृत्या पोएट्री वेब पत्रिका का संपादनप्रसारण ---1.... आकाशवाणी रायपुर से 25 वर्षों से लगातार स्वरचित कविताओं का प्रसारण2.... दूरदर्शन रायपुर से कवितआओं का प्रसारण3.... भोपाल दूरदर्शन से गीतों का प्रसारण { गायिका ....तपोशी नागराज , संगीत --- मुरलीधर नागराज }प्रकाशन --1... बांग्ला कहानी एवं कविताओं का लगातार15 वर्षों से लेखन ,एवं रेखांकन भी प्रकाशित2... हिंदी कहानी एवं कविताओं का लगारत लेखन ,एवं रेखांकन का प्रकाशन3... हिंदी से बांग्ला . बांग्ला से हिंदी में कविता , कहानियों का अनुवाद एवं प्रकाशनपत्र पत्रिकाएं ---- --- पहल , वागर्थ , नया ज्ञानोदय , मन्तव्य , पाखी , पक्षधर, नवनीत , समावर्तन , लहक , दोआबा, समकालीन जनमत , पब्लिक एजेंडा , जनसत्ता , युद्ध रत आम आदमी , प्रसंग , रेवान्त , संबोधन ,शेष , दुनिया इन दिनों , अभिनव मीमांशा ,सूत्र , अरावली ऊदघोष , परस्पर , सनद, समग्र दृष्टि ,सद्भावना दर्पण, राष्ट्र सेतु , छत्तीस गढ़ आस पास , छत्तीस गढ़ टुडे , नारी का संबल , विकल्प , साहित्य नामा , अक्षर की छांव , संतुलन ,बहुमत {ग्रामोदय } आदि ।समाचार पत्र --------दैनिक भाष्कर , नई दुनिया , नव भारत , देशबंधु , प्रभात खबर , जनसत्ता ,दैनिक प्रखर समाचार , देश बंधू , दैनिक युग पक्ष , अमृत धाराविविध ...............1... प्रौढ़ शिक्षा संस्थान द्वारा ....." नव साक्षर लेखन " पिछले 10 वर्षों से लगातार लेखन और कार्य शाला में शिरकत2...छत्तीस गढ़ पाठ्य पुस्तक निगम की तरफ से नव साक्षर लोगों के पुस्तकों के चयन मंडल में शामिलपुरस्कार ------------- कहानी ------" पहलू यह भी " भिलाई भाषा भारती पुरस्कार सन 1999 मेंसम्मान --------------1.... उत्तर बंग नाट्य जगत शिलिगुड़ी से ...." कवि रोबिन सूर सम्मान" { हिंदी कवि सम्मान }सन 2002 में2...." हिंदी विद्या रत्न भारती सम्मान " कादंबरी सहिय परिषद सन 2003 में3...." डा 0 खूब चंद बघेल सम्मान "2005 में4.... प्रसस्ती पत्र " हिंदी साहित्य हेतु , छत्तीस गढ़ अल्प संख्यक आयोग द्वारा सन 2005 में5.... " राष्ट्र भाषा अलंकरण " छत्तीस गढ़ प्रचार समिति द्वारा सन 2008 मे6.... प्रेमचंद अगासदिया सम्मान 2019 7.... बांग्ला साहित्य अकादमी { छत्तीस गढ़ शाखा द्वारा } प्रशस्ति पत्र 2010 मेंसंप्रति ----1.... जन संस्कृति मंच दुर्ग - भिलाई ( छत्तीसगढ़ की अध्यक्ष )2....बंगीय साहित्य संस्था भिलाई शाखा की संरक्षक।संपर्क --- 63/4 नेहरू नगर पश्चिम , भिलाई , छत्तीसगढ़ , 490020फोन न0...9329509050ईमेल ....mita.dasroy@gmail.com9329509050 यह मेरा व्हाट्सएप नम्बर है ।नोट- पोस्ट में प्रयुक्त सभी रेखाचित्र चित्रकार अनुप्रिया के बनाए हुए हैं।
मंगलवार, 1 मार्च 2022
समकाल : कविता का स्त्रीकाल -27
सोमवार, 28 फ़रवरी 2022
समकाल : कविता का स्त्रीकाल-26
जयश्री सिंह की कविताएँ जीवन की सघन अनुभूतियों से उपजी मानवीय संवेदनाओं की उपज हैं।यहाँ स्त्री जीवन के साथ -साथ समय और समाज के बदलते जीवन मूल्य एवं मानवीय करुणा की बानगी देखी -परखी जा सकती है।दुनिया में कितना दुख है इसे स्त्री अपनी दृष्टि से देख रही है,उसके लिए इस दुनिया को देखने के लिए कुछ रास्ते इसी कविता की भूमि ने उपलब्ध कराए हैं।जयश्री सिंह मुम्बई की भागमभाग में मानव का संघर्ष देखती हैं,लॉक डाउन में मजदूरों की पीड़ा हो या स्त्रियों के हिस्से की त्रासदी हो ,वह इन बातों के अन्दरखानों में उतरने का जोखिम लेती हैं और कविता में अपने रंग-ढंग से पिरोती हैं-
जयश्री सिंह की कविताएँ
1) खौफ़
एक भयानक कोलाहल
चारों ओर
सैकड़ों लोग दौड़ते - भागते हाँफते
पीछे चले आ रहे हैं
पलट कर देखती हूँ तो सन्नाटा है
इस कोने से उस कोने तक
कहीं कोई नहीं
एम्बुलेंस की एक उड़ती हुई आवाज
चीखते हुए गुजर जाती है
किनारे बैठे लोग
काली चादर ओढ़े सो चुके हैं
हजारों कदमों की धमक को एक बार में सह लेने वाला शहर का पुराना पुल
शवों के बोझ से थर्रा रहा है
अस्पतालों के गलियारे
पुल में बदल रहे हैं
मौत किनारे - किनारे काली चादर ओढ़े सो रही है
कुछ देखा - अनदेखा किये
सैकड़ों लोग
दौड़ते - भागते - हाँफते
एक दूसरे को धकियाते
गलियारे से गुजरते जा रहे लोग
चीखते पुकारते
हटो..., हटो..,
थोड़ी सी जगह दो
जल्दी करो, जाने दो मुझे
साँस उखड़ रही है
एक तीसरी निगाह भीड़ पर से उड़ कर गुजर जाती है
शहर बेचैन हो उठता है
टीवी खुली है
खिड़कियाँ बंद हो चुकी हैं
जगह - जगह धब्बे
गहरे काले धब्बे
दृश्यों के साथ उतरते जा रहे धब्बे
आगे कुछ दिखाई नहीं दे रहा
धब्बे घुप्प अँधेरे में बदल रहे हैं
चारों ओर निराशा
मायूसी अकेलापन
बेचैनी घबराहट घुटन संक्रामक हो कर
ज़ेहन में फैल रही है
लोग भाग रहे हैं
अपनों के छू जाने के डर से
बेतहाशा भाग रहे हैं
सारे रास्ते बंद हैं
सारे दरवाजे बंद
महीनों से घरों में बंद लोग
अपने - अपने में बंद हैं।
2) अस्तित्व
खोद कर जमीन
मिट्टी से पूछा
क्या तुम इसी ज़मीन का हिस्सा हो?
पहाड़ों को ढ़हा कर
मलवों से
भू - कम्प ने
माँगा अस्तित्व।
पाट दिया गया प्रशांत भी
हिंद की
पहली बूँद की ख़ातिर
जला दिए गए जंगल
वाज़िब सबूत की तलाश में
शक में घिरी घटाएँ
जो दे न पायीं
अपने आसमानों की गवाही।
धरती इतनी बौखलायी
पहले कभी न थी
आसमानों ने
कभी न बरसायी थीं चिंगारियाँ
कभी राख न हुए थे
इससे पहले
करोड़ों की संख्या में
निर्दोष बेजुबाँ।
यह एक दुःसह
दुःस्वप्न था
जड़ - चेतन के
अस्तित्व का प्रश्न था
माँग लिया था किसी ने
पृथ्वी से
उसके होने का सबूत।
3 ) भागी हुई लड़कियाँ
घर की दीवारों से
भीतर तक उतर आयी दरारों में
रिस रही हैं धीरे - धीरे
मुक्ति की कामनाएँ
दुनिया भर की तोहमतों से अधिक
चार दीवारी के भीतर की
जहरीली हवा में
घुटने लगा दम
घिस चुके शब्दों की चोट से रक्तिम
उस एक भूल के लिए
लगातार कचोटता
अल्हड़ सा मन
अवचेतन में
पुरानी रील सा
जब - तब
घूम जाता
वो बीता बचपन।
रिहा होने की चाहत में
पार कर दी थी
उन्होंने सारी सीमाएँ
नये स्पर्श में बहक कर
डाल से टूटीं
और फिर
टूट कर रह गयीं
हर बार किसी तीसरे के साथ
भागे जाने के
नये शक में घिरीं।
रिक्त हो जाने की सारी हदें
पार कर देने के बाद भी
नहीं बुझा पायीं शक की प्यास
कटीली उलाहना
क्रूर प्रताड़ना से
रगड़ दी गयी
उनकी अंतर्आत्माएँ भी।
घर से भागी हुई लड़कियाँ
जितनी देर के लिए चुहल बनी
उतनी ही देर आजाद रह पायीं
फिर जीवन भर के लिए
किसी बद्दिमाग की निगरानी में
कैद हो गयीं।
4) मैं रहूँगी
यदि डर है तुम्हें
कि बचा नहीं रहेगा कुछ भी
अंत तक
मैं तब भी
बची रहूँगी।
मैं हवा हूँ
मिट्टी हूँ
आग हूँ
नमी हूँ
तुम्हारी अनुकृति हूँ
मैं स्वीकृति हूँ
बचे रहने के हर रूप में
स्त्री हूँ।
मुझे बेचाल चले
चलन से डर लगता है
जबरन हो रहे
हनन से डर लगता है
यदि बचाना चाहो
सब कुछ
तो बचा लो मुझे।
मैं सामूहिक पतन के
अपराध से डरी हुई हूँ।
5 ) चाँदनी
दिन ढ़लते ही
ये चौराहों पर चाँदनी सी उतरती हैं
लोगों की निगाहों से बच कर
खुद को
काले शीशे की गाड़ियों के सुपुर्द कर
निकल जाती हैं
रात की उन यात्राओं की ओर
जो इनके जीवन से भी लंबी हैं
ये सुबह अँधेरे
उन्हीं गाड़ियों से लौट आती हैं
दुपट्टों से मुँह ढँके
टूटते तारों सी
गाड़ियों से उतरकर
उन अँधेरी गलियों में खो जाती हैं
जहाँ से सज-धज कर
शाम इन्हें फिर से निकलना है।
ये आधी रात की
बदनाम गलियों को
अपनी अदाओं से गुलजार करती हैं
लचकती कमर
और चमके गालों के पीछे
छोड़ जाती हैं एक भरा-पूरा परिवार
लाचार माँ, बीमार बाप
और छोटे भाई - बहन।
ये उनके सुरक्षित भविष्य की खातिर
अपने लिए चुनती हैं
आधी रात की असुरक्षित दुनिया
और मेडिक्लेम पॉलिसी से परे का एक असाध्य रोग
जो जल्द ही इन्हें
जीवन से मुक्ति दे देता है।
इनकी यात्राएँ बहुत छोटी हैं
और रातें बहुत लंबी
ये अपने पीछे एक दूसरी चाँदनी छोड़ जाती हैं।
6) धुंध
शहर की सबसे ऊँची इमारत से
दूर की उस दुनिया को
कुछ पल के लिए
आँखों में उतार कर
अपने अकेलेपन को
भूल जाना चाहती हूँ
सहसा
बुझे बादलों के बीच खुद को घिरा पा कर
घबरा जाती हूँ
और उतर आती हूँ
एक ही साँस में
नीचे
उस बालकनी की ओर
जहाँ से देखती हूँ रोज
अपने हिस्से की एक सीमित दुनिया।
अचानक अपने चश्मे का नंबर बढ़ा पाती हूँ
आँखों को बार-बार रगड़ कर
देखती हूँ
एक चिड़िया
चोंच में चुग्गा लिए
बालकनी में
बिलकुल पास बैठी
मुझसे अपने घर का पता पूछ रही है
मैं दूर तक नजर दौड़ाकर
उसके घोंसले को ढूँढती हूँ
चूजों की जानी पहचानी आवाज
लोगों की आवाजाही
और मोटरों की चिल्लाहट के
सम्मिलित स्वर को
अपने आस - पास बिखरा पाती हूँ
एक धुंध सी है चारों ओर
जैसे गहरी नींद में, स्वप्नलोक में हूँ
सब कुछ सुन पाने
और कुछ न देख पाने की अकुलाहट में
जागने का विफल प्रयास करती हुई
किसी तरह अपने को
भीतर कमरे में बंद कर लेती हूँ
धुंधलापन
घबराहट और घुटन में बदल जाती है
जैसे किसी ने रोक रखी हो मेरे हिस्से की ताजी हवा
और मैं उन्हें पाने के लिए बेचैन हूँ।
एक लंबी शांति के बाद
अपने को फर्श पर पड़ा पाती हूँ।
कुछ ही देर में
इस उथल - पुथल को भूल
अपने रोजमर्रा के कामों में
उलझ जाती हूँ।
दरवाजे की घन्टियों
फोन कॉलों
और दो सौ पचहत्तर वाट्सऐप मैसेज से गुजर लेने के बाद
अचानक याद आये
उस खोये हुए घरौंदे को खोजने के लिए
झटपट बालकनी का दरवाजा खोल देती हूँ।
सूरज अब भी कहीं नहीं है
उधार की हल्की रोशनी लिये
धुंध वैसी ही जमी हुई है
चोंच में चुग्गा लिये चिड़िया
फर्श पर मृत पड़ी है
पेड़ पर मरघट सी शांति है
नीचे तक उतर आये
बुझे बादलों ने
चूजों से
उनके हिस्से का आकाश
छीन लिया।
परिचय :
जयश्री सिंह
एम. ए. (स्वर्ण पदक), पीएच. डी., नेट
सहायक प्राध्यापक एवं शोधनिर्देशक (मुंबई विश्वविद्यालय)
जन्म : 13 जुलाई, मुंबई
पुरस्कार एवं उपलब्धियाँ -
१) मुंबई विश्वविद्यालय द्वारा एम. ए. में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने हेतु 'स्वर्ण पदक' से सम्मानित।
२) मुंबई विश्वविद्यालय द्वारा (एम. ए. के लिए ही) ‘पंडित नरेंद्र शर्मा हिन्दी एकेडेमिक पुरस्कार' से सम्मानित।
३) मुंबई बोर्ड द्वारा 1999 में 'सरस्वती सुत सम्मान' से सम्मानित।
४) रज़ा फाउंडेशन, नई दिल्ली द्वारा 11- 12 अक्टूबर को आयोजित 'युवा 2019' में गाँधी जी के 'प्रार्थना प्रवचन' में विचार प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित।
प्रकाशन -
१) सुरेन्द्र वर्मा के नाटकों का अनुशीलन, २०१३ (समीक्षा)
२) पूर्वोत्तर भारत का आदिवासी समाज : लोकसाहित्य एवं संस्कृति, २०१८ (समीक्षा)
३) Hingher Education in India : Retrospect & Prospect, 2020 (संपादित)
४) विविध विषयों पर 35 से अधिक शोधालेख प्रकाशित।
५) मुंबई आकाशवाणी से 3 रेडियो वार्ता का प्रसारण।
६) विविध भारती मुंबई से ‘हरसिंगार के फूल’ कहानी का प्रसारण।
७) एम. ए. हिन्दी में मुंबई विश्वविद्यालय में सर्वश्रेष्ठ अंक प्राप्त करने पर महाराष्ट्र टाइम्स द्वारा साक्षात्कार प्रकाशित।
८) मुंबई आकाशवाणी द्वारा भी उसी समय साक्षात्कार का प्रसारण।
९) शहर की संवेदनाओं पर निरंतर लेखन।
१०) 'शहर बोलता है' (पहला काव्य संग्रह) प्रकाशाधीन।
११) कला, साहित्य, संस्कृति का शहर मुंबई' पर श्रृंखला लेखन।
१२) देश की प्रमुख पत्र - पत्रिकाओं में कई कविताएँ, कहानी और संस्मरण प्रकाशित।
पता - B /601, श्री एयर इंडिया सोसाइटी, प्लॉट क्र. - 24, सावरकर नगर, ठाणे - पश्चिम, मुंबई - 400606
फोन - 09757277735
ई मेल : jayshreesingh13@gmail.com
संप्रति : सहायक प्राध्यापक एवं शोधनिर्देशक, जोशी - बेडेकर ठाणे कॉलेज, मुंबई - 400601
शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2022
समकाल : कविता का स्त्रीकाल- 25
रूपम मिश्र खांटी भारतीय स्त्री का अपनी कविताओं में प्रतिनिधित्व करती हैं,हाशिये की अन्तिम औरत जो अपनी समस्त प्रतिभा चूल्हे में झोंक पितासत्ता को पोषित कर रही थी ,रूपम उसी अन्दरखानों का मुखर विद्रोह हैं।रूपम कहती हैं-मुझे गुस्सा आया उन कवियों परजिन्होंने नारी को नदीऔर पुरुष को सागर कहामैं अचरज से तुम्हें देखती रह गयीतुम वही सदियों के पुरूष थेमैं वही सदियों की स्त्रीमैं ,आज ठीक माँ ,चाची और भाभी के बगल में खड़ी थीऔर जान गई थी किक्षणिक प्रणय आवेग जीवन नहीं है...कवयित्री उन कवियों को भी कटघरे में खड़ा कर समझाती हैं कि औरत मात्र त्याग और भोग की वस्तु भर नहीं है,वह स्वतंत्र चेता स्त्री है जो तुम्हारी चालाकियों को भलीभांति समझती है और अब उनसे मुक्त हो अपना नया संसार अपने मानकों पर गढ़ना जानती है।रूपम मिश्र की कविताएँ(1)मेरा जन्म वहाँ हुआजहाँ पुरूष गुस्से में बोलते तोस्त्रियाँ डर जातीमैंने माँ ,चाची और भाभी कोहँसकर पुरुषों से डरते देखावो पहला पुरूष , पिता कोकिसी से भी तेज बोलते देख मैं डर जातीवो दूसरा पुरूष भाईजिसे मुझसे स्नेह तो बड़ा थामेरी किताबी बातों को ध्यानस्थ सुनतापर दुनियादारी में मुझे शून्य समझतावो कहता दी ! यहाँ नहीं जाना हैमैं कहती अरे ! जरूरी है क्यों नहीं जाना !तुम नहीं समझोगी!उसके चेहरे पर थोड़ा सा गुस्सा आ जातामेरा मन डर कर खुद को समझा देता था किबाहरी दुनिया तो उसी ने देखी हैमैंने घर और किताबों के सिवा क्या देखा हैफिर तुम....जीवन में तुम आये तो मुझे लगाये पुरूष मेरे जीवन के उन पुरुषों से अलग हैये वो पुरूष थोड़ी न हैये तो बस प्रेमी हैमिथक था वो मेरापुरूष बस प्रणय के क्षणों में प्रेमी होते हैंस्थायी रूप से वो पुरूष ही होता हैक्यों कि जब तुम पहली बार गुस्से से बोले तोवही डर झट से मेरे सीने में उतर आयाजो पिता और भाई के गुस्से से आता थामैं ढूँढने लगी उस पुरूष कोजो झुक कर महावर भरे पैरों को चूम लेता थाकहाँ गया वो पुरुष जो कहता था कितुमसे कभी नाराज नहीं हो सकतामुझे गुस्सा आया उन कवियों परजिन्होंने नारी को नदीऔर पुरुष को सागर कहामैं अचरज से तुम्हें देखती रह गयीतुम वही सदियों के पुरूष थेमैं वही सदियों की स्त्रीमैं ,आज ठीक माँ चाची और भाभी के बगल में खड़ी थीऔर जान गई थी किक्षणिक प्रणय आवेग जीवन नहीं है...चित्र- अनुप्रिया(2)सात रानियों वाले राजा की सबसे छोटी रानी मैं थी!पुकार का वो घण्टा राजा ने मेरे ही महल में बंधवाया था!पर पूर्व की कोई रानियाँ मुझसे जलती नहीं थींक्यों कि इस नई कहानी में बेचारी मैं नहीं वो लोग थीं!इस बार राजा ने मुझे चालाकी से अदृश्य कर दिया था !हालांकि घंटा अबकी अनायास मैंने खुद ही बजाया थाअंधेरे में तीर चलाना सीख रही थीपर तीर आकर किस्से की तरह ही ठीक मेरे सीने पर लगा था!राजा इस बार इतना क्रूर नहीं था कि देश निकाला दे देता!उसने सिर मूंडवा कर मुँह पर कालिख़ भी नहीं पोती!बस आत्मा के रेशे-रेशे को उघाड़ कर उसी पे खालिक पोत दी !क्यों कि ये आधुनिक युग का सभ्य राजा था और इसकी सिर्फ़ सात रानियां नहीं थीं।चित्र-अनुप्रिया(3)हैरान और निहाल हूँ तुम्हें देखकर !जीवन में मैंने तुमसे बड़ा अचरज नहीं देखा !तुम नदी से बातें कर सकते होचिड़िया के साथ गा सकते होतुम्हारा बस चले तो किसी स्त्री की प्रसव पीड़ा समझने के लिए गर्भ धारण कर सकते हो!तुम किसी किन्नर की मौत पर फूट- फूट कर रो सकते हो!तुम किसी समलैंगिक की शादी में बधाई गा सकते हो!तुम अपनी सारी डिग्रियां जला कर मेर साथ गाँव के भगवती देवी विद्या मंदिर में पढ़ सकते हो !तुम अपनी उदास छोटी बहन की गुड़िया की साड़ी भाभी की ब्रांडेड लिपिस्टिक चुराकर रंग सकते हो!तुम अपनी प्रेमिका के नये प्रेम के किस्से हँसकर सुन सकते हो !दरवेश ! तहज़ीबें चकित तुम्हें देखकर !तुमने सारे मठों और मान्यताओं को तोड़करअनलहक को आत्मा का दस्तार बनाया!तुम संसार के सारे युद्धस्तम्भों पर इश्क़ की इबारत लिख सकते हो!और युद्धरत सारे हाथों में उनकी प्रेमिकाओं के पत्र थमा सकते हो!रंगीले फ़कीर ! अभिजात विद्रूपता को मुँह चिढ़ाकरतुम मेरे डिहवा पर के मुसहर टोली में बैठकर महुआ की शराब पीकर रात भर नाच सकते हो!मैं तुम्हारे मांथे पर चुम्बन का नजर टीका लगाती हूँ मेरे अजब प्रेमी !मेरे साथ मेरी चिर लजाधुर संस्कृति भी अवाक है तुम्हें देखकर कितुम अपनी माँ को नवीन प्रेम में देख सकते हो।चित्र-अनुप्रिया(4)मैं यहाँ भी नहीं ठहरूँगी!मैंने जन्म से देह की घृणा पी थीसबसे आदिम सम्बन्ध बहुत घिनौना है ये मिथ मुझे माँ के दूध में पिलाया गया हैव्यर्थ श्रेष्ठता बोध मैं सिर पर लाद कर चल रही थीपर मैं वहाँ भी नहीं ठहरी ,कई रोते चेहरे मुझे पुकारने लगे थेमैं उठकर वहाँ पहुँची थीबहुत दिन तक वहीं रहीमैं सबसे अंत में तुमसे मिलीफिर खो गयी तुममेंपर मुझे आशंका है घृणा फिर से जन्म ले सकती हैमैने ढेरों हाथ हटाकर तुम्हरा हाथ पकड़ा थापर मुझे डर है तुम जब कभी प्रगाढ़ आलिंगन के लिए अपने हाथ बढ़ाओगे तो हो सकता है मुझमें रोपी गयी वो देह घृणा फिर जाग जायेऔर मैं झटक दूँ तुम्हारा हाथ !तब तुम कहाँ जाओगे!मुझे निसत्व लगेगीं तुम्हारी बेहद खूबसूरत आँखेंभ्रम लगेगें तुम्हारे तुम्हारे वो होंठ जिसपर एक चिर प्रणय निवेदन रखा हैजिन्हें जी भर देखने की मुझमें कभी क़ूवत न हो पायीमुझे गलीज़ लगेगी वो पवित्र रातें जब दो जोड़ी जागती आँखें बार- बार छलक पड़ती थीपर धीरज रखना मैं वहाँ भी नहीं ठहरूँगीतुमसे छूटकर मैं प्रायश्चित के लिए किसी मंदिर के द्वार पर खड़ी हो जाऊँगी !तुम आर्त होकर मुझे पुकारोगेमंदिर के घंटे- घड़ियाल में तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनुगीमैं संसार की सारी पवित्रता को देह में स्थापित कर दूँगीइसतरह मैं एक प्राकृतिक प्रेम की शीत हत्या कर दूँगीमैं किसी रोती हुई सीता या अग्नि कुंड में जली सती से सतीत्व की भीख माँगूंगीया किसी सूर्य या इंद्र के पैर पकड़ूँगी मुझे याद नहीं रहेगा कुन्ती व अहल्या का दुःखमैं वहाँ भी बहुत दिन नहीं ठहरूँगी फिर किसी गर्भ गृह में कोई बच्ची चीखेगी,प्रसाद और सिक्के उठाने के जुर्म में पुजारी किसी बच्चे को पीट देगातब मैं वहाँ भी नहीं ठहरूँगी!खूब भटकूगीं ,ठोकर भी लगेगीअंधेरे से रास्ता दिखायी नहीं देगा ,तुम भी नहीं लौटोगे!मैं कटी पतंग की तरह घूमूंगी!तभी कही दूर कोई भूखा बच्चा रोयेगा , वो मुझे पुकार सकता है अगर न भी पुकारे तो भी मैं वही जाकर ठहरूँगी!मैं आसपास बिखरी सारी किताबों को पढ़ डालूँगीफिर उसी रास्ते से मैं फिर तुम्हारे पास आऊँगीमैं तुम्हारे आँसुओं से तुम्हारा पता ढूढ लूँगीक्योंकि तुम जब - जब रोये होमुझे लगा कि कहीं औचक कोई दुलरुवा बच्चा घृणा की कड़ी निगाह से सहम कर रोया हैतुम्हारी बहुत याद आने पर मैं उस बच्ची को जाकर गले लगा लेती हूँ जो एकदिन शहतूत के पेड़ को तेल ,काजर लगाने की जिद कर रही थी !किसी अभिमंत्रित यंत्र की तरह मुझे तुम्हारा नाम रटने की लत लग गयी हैमैं तुम्हारे नाम के रंग से अपने कमरे की दीवारें रंगवा दूँगीचादरें और पर्दे भी उसी रंग के होंगेऔर इस तरह तुम्हारे नाम के आग़ोश में रहूँगी!तुम निश्चित मेरे प्रेमी हो ! तुम्हारे अंकपाश में पहरों बेसुध रही हूँ!पर जो डर की यातना तुम्हें रात को सोने नहीं देतीउससे द्रवित होकर मेरे सीने में दूध सा उतर आया था!मुझे अफ़सोस है मेरी जान ! मैं इस मनुष्यहन्ता युग की आँखों में झांककर करुणा न भर सकी!(5)मुझे नहीं बनना था मुझे कभी भीतुम्हारी पहली और आखिरी प्रेमिका!मैंने तुमसे प्रेम करते हुएतुम्हारी सारी पूर्व प्रेमिकाओं से भी प्रेम किया !जिसने भी तुम्हें प्यार से देखामैंने उससे भी प्रेम किया !प्रतिदान की कभी मुझमें चाह ही नहीं हुईबस एक साध रही किएक बार ! तुम एक बार कहते किहाँ सच है !उसपल मैं तुम्हारे प्रेम में था !और वही पल मेरे लिए निर्वाण का पल होता !क्यों कि मैंने तुम्हें खालिश प्रेम किया!सारे मिलावटी भावों से बचा कर उसे विशुद्ध रखाइसलिए तुमसे प्रेम करती सारी स्त्रियाँ मुझे प्रिय रहींसंसार में वो सारे लोग जो तुम्हें प्यार करते हैंउनके लिए मैं मन से आभारी हो जाती हूँ!मैं तुम्हारी पहली दूसरी ,चौथीसारी प्रेमिकाओं केको छूकर देखना चाहती हूँजिनके हाथों को तुमने कभी छुआ होगा!जाने क्यों तुमसे जुड़ा जो भी मुझे मिलावो तुम्हारी तरह ही ज़हीन मिलामैं कुछ देर के लिए वहीं रुक जाती हूँजहाँ तुम्हारा कोई नाम ले लेता है !सोचती हूँ कोई ऐसा मिलता !जो बस तुम्हारी ही बात करता!और मैं आँखें बंद करके उम्र भर सुनती!_______________________कवयित्री रूपम मिश्र, पूर्वांचल विश्वविद्यालय से परस्नातक हैं और प्रतापगढ़ जिले के बिनैका गाँव की रहने वाली हैं. कुछ पत्र पत्रिकाओं में इनकी कविताएँ प्रकाशित हैं।
समकाल : कविता का स्त्रीकाल -24
1मृत्यु के बाद मेरी आँखें खुली रह जायेंगी ....तुम पुराने दिनो के गज़ल से निकलाचुभने वाला दर्द होमैं हूँ रियाज़ से पहले की गईउस्ताद की गरारीतुम हो उस पवित्र ढाई अक्षर कासबसे ऊँचा वाला कुलाँचमैं हूँ सफेद चाँद का सबसे बदसूरतकाला गहरा गड्ढातुम कई त्वचाओं के पीछे छिपानवसंचार होमैं चिथड़े से बनाया गया खुरदराबिस्तर हूँतुम खून सुखाते पाप के लिए ईश्वरद्वारा रचा गया वरदान होमैं पकड़ी गई मछली की जातीहुई सांस हूँतुम ठप्प पड़े कारोबार की आखिरीआस भरी उम्मीद होमैं गलतफहमी मे जीने वालीअसलियत का कलंक हूँतुम पहली मिलन की रात काघबराया हुआ लम्हा होमैं उसी रात का मुरझाया हुआसुबह का फ़ूल हूँतुम इतना जो बंद बंद रहते हो मुझसेनिश्चित ही मृत्यु के बाद मेरी आँखें खुली रह जायेंगी2कविता हलक से ठाँय करती हुई उड़ जायेगी एक दिन ....उसने अँधेरे से घुप्प लियासड़कों से सीख ली भिड़ंत की हड़बड़ीपानी से ले लिया भापबुतों से छीना वधस्थानो़ का इतिहासगुम्बदों से जाना चिड़ियों का विवेकबिगुल से सीखती रही अभिनय के नुस्खेंकर्फ्यू से ले ली मूर्खों की उक्तियाँइतना कुछ पाने के बावजूद भीदेश जब थर्रा रहा थाउसे अभिनय की सूझीपिछले दिनों रंगमंच में एक चालाकलड़की का किरदार करते हुएवह गच्चा खा गईन्यायार्थ ही दर्शकों को अपने अभिनयसे दण्डित कियाएकांत में कविता लिखीवह बंदूक से नहीं मरेगीकविता हलक से ठाँय करती हुईएक दिन उड़ जाने का अभिनय करेगी3मेरे जीवन के रंगमंच केतुतलाते हुये अभिनेता ....दर्शक तर्रार हैं,बड़े बड़े बल्ब नाटकीयऔर रंगमंच की ज़मीनमेरी आत्मा हैतुम अपने पाँव अच्छे से जमा लेनाकभी अटको तोअपने दायीं तरफ के परदे कीतरफ देखनामैने अपने प्रेम की कुछ चित्रलिपियाँचिपकाई है वहाँअपने कंठ मे भर लेना अभिनयतालियों की गड़गड़ाहट रख लेना तुमऔर मुझे दे देना उनकी गूँजये मेरे कानो को लम्बा जीवन देंगेस्मरण रहेरंगमंच पर अभिनय की भूमिका ने लोगों को अमर किया हैरंगमंच के बाहर अभिनय की भूमिका ने सैकड़ो शिशुओं कोझूठ और फूहड़ता नामक दो पिताओं से जना हैहम कभी कोई शिशु संभाल पायेइतने बड़े कभी हम बन नही पायेंगेचित्र-अनुप्रिया4तुम्हारी कविताएँ अगर कोईदेश होती तो ....तुम्हारी कविताएँ अगर कोई देशहोती तो वहाँ यात्रा करते वक्तदेखी जा सकेगीबाघो और बकरियों मे सुलहबाज़ारों मे बिकते शीरमालको देख झाड़ देंगेलोग अपनी थकानबच्चो की हँसी तय करेगीनक्षत्रों की गतिफूलों की घाटियाँ अपनी आयुदेंगी प्रेमियों कोतुम्हारी कविताऐंअगर कोई देश होती तोमैं होती वहाँ की पहली नागरिकपरंतुकोई आश्चर्य नहींं जो मेरी उचटीहुई नींद से छिटक कर दूर जागिरो तुम और रात माँगे मुझसेमेरे होने का हिसाबकोई आश्चर्य नहींं जो किसी दिनमैं सिकुड़कर बन जाऊँ एकईल मछली और दुःखो के एवज़ मेंंझटकोंं का करूँँ इस्तेमालकोई आश्चर्य नहींं जोशास्त्रार्थ की ज्ञाता विद्योतमा कोकरना पड़ा था अनपढ़ कालिदास से विवाहविचेष्ट मन की विचेष्ट स्वप्नों से छिटककर ही मैंनेपाया है जीवनतुम्हारी कवितिओं की माधवीलता पकड़करउठ रही हूँ ऊपर की ओरतुम्हारी कविताओं ने मुझे विधात्री बनाया5पच्चीसवें घंटे का टोटका ....क्या सीखा तुमनेएक लौटे हुये पतझड़ सेएक इंतज़ार मे बैठी लड़की सेइकट्ठी रखी शिकायतों सेऊँघती हुई सरहदी मिट्टी सेक्या सीख पाओगे तुमबूढ़े नाविकों से समुद्र के साम्राज्य की बारिकियाँउस कविता से जिसे एक असफल प्रेमकथा ने जनागिरे हुये फ़ूलो से डालियों के पकड़ की प्रक्रियाउस ऋण से जो अनुत्तरित प्रश्नो से दुगना हो रहा हैक्या सबकुछ सीख कर भी सिखा पाओगेचिड़ियों को चिड़ीमारो का रहस्यमयी मनोविज्ञानप्रेमियों को प्रेमगीत लिखवाकर ग्रैमी जीतने का नुस्ख़ाईश्वर के प्रैस्क्रिप्शन पर कैसे लिखी जाती है चन्द सांसेएक बेहद सरफिरी लड़की को पच्चीसवें घंटे का टोटकापरिचयजोशना बैनर्जी आडवानीस्प्रिंगडेल मॉर्डन पब्लिक स्कूल में प्रधानाचार्या पद पर कार्यरतजन्म- आगरा, उत्तर प्रदेशजन्म तिथि- 31 दिसम्बर, 1983शिक्षा- सेंट कॉनरेड्स इंटर कॉलेज से स्कूलिंग की,आगरा कॉलेज से ग्रैजुएशन और पोस्ट ग्रैजुएशन करने के बाद सेंट जॉन्स डिग्री कॉलेज से बी.एड और एम.एड किया,आगरा विश्वविद्यालय से पी.एचडी की तथा पंद्रह साल पी.जी.टी. लेवल पर अंग्रेज़ी पढ़ाने के बाद प्रधानाचार्या का पद संभाला ।सीबीएसई की किताबों के लिए संपादन कार्यसीबीएसई के वर्कशॉप्स और सेमिनार्स संचालित करवाने का कार्य पिछले दस सालों सेकत्थक में प्रभाकरलिखने में रूचि बचपन से ही थीअंग्रेज़ी और हिंदी में कई कविताएँ लिखीपर पहचान मिली पहली पुस्तक "सुधानपूर्णा" से जो दीपक अरोड़ा स्मृति सम्मान के तहत बोधि प्रकाशन से आई थीसुधानपूर्णा का अर्थ किसी शब्दकोश में नहींपिता का नाम - स्वर्गीय सुधानबाबू बैनर्जीमाँ का नाम- स्वर्गीय अन्नपूर्णा बैनर्जीपिता के नाम से सुधान और माँ के नाम से पूर्णा लेकरसुधानपूर्णा नाम रखा किताब कापूर्व में थियेटर किया कई सालों तक।
शनिवार, 19 फ़रवरी 2022
समकाल : कविता का स्त्रीकाल 23
भारत भूषण युवा कविता पुरस्कार से पुरस्कृत अनामिका अनु समकालीन युवा स्त्री कविता में मजबूत दखल रखती हैं।स्त्री सार्वाधिक रुप से प्रेम में छली गयी। भारतीय स्त्री की ममतामयी त्याग की मूर्ति छवि को हमारी इन कवयित्रियों ने न केवल पहचाना बलकि उन बारीक तन्तुओं के रेशे खोले और उधेड़े जिसके ताने-बाने पर पितासत्ता स्त्री को स्थापित कर महिमामंडित करती रही है। अनामिका अनु केरल में रहते हुए स्त्री जीवन के विविध रंगों को क्षेत्रीय फलक पर देखती हैं और अपनी कविताओं में उन बिम्बों को समाहित करती हैं जिनसे गुजरते एक टीस मन को बेचैन कर जाती है।
अनामिका अनु की कविताएँ
1.
नौ नवम्बर
प्रेम की स्मृतियाँ
कहानी होती हैं ,
पर जब वे आँखों से टपकती हैं
तो छंद हो जाती हैं।
कल जब पालयम जंक्शन
पर रुकी थी मेरी कार
तो कहानियों से भरी एक बस रुकी थी
उससे एक-एक कर कई कविताएँ निकली थीं
उनमें से मुझे सबसे प्रिय थी
वह साँवली, सुघड़ और विचलित कविता
जिसकी सिर्फ आँखें बोल रही थीं
पूरा तन प्रशांत था।
उसके जूड़े में कई छंद थें
जो उसके मुड़ने भर से
झर-झर कर ज़मीन पर गिर रहे थें
मानो हरश्रृंगार गिर रहे हों ब्रह्ममुहुर्त में।
ठीक उसी वक्त
बस स्टैंड के पीले छप्पर
को नज़र ने चखा भर था
तुम याद आ गये
"क्यों?
मैं पीला कहाँ पहनता हूँ? "
बस इसलिए ही तो याद आ गये!
उस रंगीन चेक वाली सर्ट पहनी
लड़की को देखते ही तुम मन में
शहद सा घूलने लगे थे
"वह क्यों?
तुम तो कभी नहीं पहनती सात रंग?"
तुम पहनते हो न इंद्रधनुषी मुस्कान
जिसमें सात मंजिली खुशियों के असंख्य
वर्गाकार द्वार खुले होते हैं
बिल्कुल चेक की तरह
और मेरी आँखें हर द्वार से भीतर झाँक कर
मंत्रमुग्ध हुआ करती हैं।
आज सुग्गे खेल रहे थें
लटकी बेलों की सूखी रस्सी पर
स्मृतियों की सूखी लता पर तुम्हारी यादें के हरे सुग्गे
मैंने रिक्त आंगन में खड़े होकर भरी आँखों से देखा था
वह दृश्य
तुम्हारी मुस्कान की नाव पर जो किस्से थें
मैं उन्हें सुनना चाहती हूँ
ढाई आखर की छत पर दिन की लम्बी चादर को
बिछा कर
आओगे न?
तुम मेरे लिए पासवर्ड थे
आजकल न ईमेल खोल पाती हूँ
न फेसबुक
न बैंक अकाउंट
बस बंद आँखों से
पासवर्ड को याद करती हूँ
क्या वह महीना था?
नाम?
या फिर तारीख
2.मैं ज्यां पाॅल सार्त्र
मैं ज्यां पॉल सार्त्र
एक अस्तित्ववादी
फर्डीनेण्ड के साथ
आँखों से पी रहा हूँ स्वेज़ नहर को
मेरे लिखे स्वतंत्रता पत्र
नहर पर तैर रहे हैं हंस बनकर
पोत बन गया हैं इंक़लाबी चौक
जहाँ खड़े होकर मैं दे रहा हूँ भाषण
और बता रहा हूँ
यूरोप का लोकतंत्र विश्व को बाँट रहा है ग़ुलामी
मेरा वतन नहीं हड़प सकता
अल्जीरिया की आज़ादी
मैं चीख रहा हूँ
और भीड़ मेरी चीख को बता रही है
एक अनीश्वरवादी की दहाड़
लोग कहते हैं
मैं स्वनियन्ता नहीं भाग्यनियन्ता शिशु था
अट्ठारह महीने में पिता
और बारह वर्ष में माँ ने ले ली विदाई
दो विश्वयुद्ध एक आँख से देख चुका आदमी
एक दिन दार्शनिक हो गया
मैं डंके की चोट पर नकार रहा हूँ उसी भाग्य को
सोरेन कीर्केगार्ड कहते रहे
मनुष्य से दूर ईश्वर को गहन विश्वास से
किया जा सकता है महसूस
मैं सार्त्र ईश्वर की उस सत्ता से भी
करता हूँ इंकार
कई काँच की गिलासों में पीकर जाम
मैं सो जाता हूँ
स्वप्न में बजाता हूँ वायलिन
ताकि माँ के गीत से कर सकूँ संगत
नौ महीने गर्भ में, बारह वर्ष गोद में
बिठाकर
माँ ने क़ब्र में समेट लिया है मेरा बचपन
क्या मैं रूसो, काण्ट, हीगेल और मार्क्स
की अगली कड़ी हूँ ?
या मार्क्सवाद के महल का एक सुंदर झरोखा
जिससे आती है रौशनी स्वतंत्रता की
जिसने कभी नहीं की प्रतीक्षा
किसी प्रभु की
वह झरोखा जो रसोई तक जाता था
और वायलिन के बगल
में किताबों की मेज के पास खुलता था
जिससे दिखती थी सड़क की चौपाटी
जिस पर वाच
और बाँट रहा था मैं अखबार
इंक़लाब वाले
ये दुनिया की रीत है
इंक़लाबियों के घरों पर गिरते हैं बम
माथे पर तानी जाती हैं बंदूकें
फिर भी मन पर उनके कोई बोझ नहीं होता है
सच बोलने के बाद आदमी निडर
और भीतर से हल्का महसूस करता है
मैंने लिखा
लुमुम्बा के भाषणों का प्राक्कथन
हाँ मैंने ही लिखा
फ्रांज़ फ़ैनन की पुस्तक का पूर्वकथन
अल्जीरिया के 121घोषणापत्र पर
करवाता रहा हस्ताक्षर
मुझे नहीं चाहिए था नोबेल या लेनिन पुरस्कार
नंगे यथार्थ को वस्त्र पहनाने की
हर गंभीर साज़िश
पर नज़र थी मेरी
मैं हर नाटक की पटकथा
और सच से वाक़िफ़ था
मैं एक आँखों वाला दूरदृष्टा
मैं जानता था
विचार और स्थिति हैं दो बहनें
एक ही रोग से ग्रसित
जिसका नाम है अस्थिरता
इस व्याधि के तीन स्पष्ट लक्षण हैं
विकास, गति और परिवर्तन
मैं दिमाग़ से ऊब जाता हूँ
गंभीर वैचारिक यात्राओं से थककर
खोजता हूँ परिवर्तन
शारीरिक तत्वों में लीन
मैं प्रशांत सरोवर में फेंकता हूँ
पत्थरों सा कई देहों को
संकेंद्रित तरंगों से भर जाता है ताल
माटी की प्रसन्न मूर्ति के भंग अंग
टूटे सिर में उच्च ज्वर
मैं खोजता हूँ
कोरीड्रेन की गोलियाँ
और एक नीम बेहोशी
मुझे आत्मा के परिणय का
सम्मान करना चाहिए था
वैसे ही जैसे
कैथोलिक चर्च में मरियम का होता है सम्मान
मैं मिला था सिमोन से
किसी देव को साक्षी मानकर
नहीं किया कोई भी वादा
जैसे दो देह करते आए थें
विवाह मंडपों में
स्थापित से द्वन्द
और टूटती प्रतिमाओं
का विसर्जन तब आवश्यक था
दो लोग जो एक थें
जिन्हें तोड़नी थी सामाजिक मान्यताएँ
जो अपेक्षाओं से भय खाते थें
और भाग रहे थें
उस संस्कृति से जो समानता के समक्ष
एक कलात्मक दुर्ग सी खड़ी थी
पूरे रंग रोगन और रुआब के साथ
ईर्ष्या स्वतंत्रता की शत्रु है
यह व्यक्ति को नियंत्रित करती है
इस तरह से यह वैयक्तिक स्वतंत्रता पर
लगाती है लगाम
परिस्थितियो में होती है
रिश्तों के निर्माण की विलक्षण शक्ति
इकावन वर्षों का साथ
जिसमें कई लोग आए और गए
प्रेम, जलन, देह, घृणा, विरह और मिलन की कई
परतों ने बना दिया था
रिश्ते को डोलोमाइट चट्टान
यह संबंध जो
किसी ढाँचे में समायोजित न होकर भी
चिरकालिक और विशिष्ट रहा
कई तूफानों के बाद भी
जिससे सतत ऊत्सर्जित स्नेह
ने इसे बचाए रखा
एक दूसरे में रूचि बनी रही मृत्यु तक
दर्शन बचा लेता है प्रेम को
मैं सार्त्र
मेरे पास कई रंग हैं
सिमोन के पास हैं कई धागें
सिमोन रंगों से नहीं करती है ईर्ष्या
मैं नहीं गिनता हूँ सिमोन के धागे
हम जानते हैं
कई स्थूल रिश्तों ने ठीक-ठीक है समझाया
बस एक सूक्ष्म रिश्ता बनता है
पूरे जीवन में
मैं सार्त्र रिक्त हो रहा हूँ
बगल में सिमोन खड़ी है दवा की बोतल सी
वह दवा जो मेरी पीड़ा
को न्यूनतम कर देगी
केस्टर(सिमोन) कह रही है
चिकित्सक के कानों में
वह नहीं बताए मुझे
कि मैं मर रहा हूँ
जीवन को जीने की मैं कर रहा हूँ
अंतिम अनाधिकारिक चेष्टा
मौत को आता देख जैतून के फूल-
सा खिल उठा है मेरा चेहरा
मैं जानता हूँ
जीवन एक हास्यास्पद नाटक है
जिसे गंभीरता से जी रहे हैं हम सब
मैं जानता हूँ
नाटक से विदाई का अवश्यंभावी सच
और मेरी उँगलियाँ थिरक उठती हैं
कुछ नया लिखने को
3.
करमा आदमी नहीं पूरा स्टेशन है (फणीश्वर नाथ रेणु की आदिम रात्रि की महक)
करमा आदमी नहीं पूरा स्टेशन है।
स्टेशन है
तो स्टेशन वाली गंध भी होगी
करमा उसी गंध के समुद्र में डूबा रहता है।
उसकी गंध को सूँघता कुत्ता
उसके सामने खड़ा हो जाता है
और एक फटकार पर दुम दबाकर भाग जाता है
करमा खिखियाकर कर हँस देता है।
छोटी-छोटी ज़रूरतों वाले आदमी की खुशी हमेशा बड़ी होती है
उसे तलाशनी नहीं पड़ती खुशियाँ
गरीब के हज़ार नाम होते हैं
करमा,कोरमा, कुरमा, कामा,करमचंद या करम कह लो
फ़र्क़ नहीं पड़ता आएगा दौड़ कर करमा ही
पर जिसे आदमी एक बार
अपने से छोटा मान लेता है,
उसके नाम को
फिर कभी महत्व नहीं देता है।
मान लेना शायद इसलिए भी
इतना बुरा है
बोली की खटास ऐसी
कि दूध फट जाए
फिर आदमी का कलेजा
क्या चीज़ है?
लखपतिया के चिरई-चुरमुन
की मीठी आवाज़
खींचकर पास बुलाती है
हतिया नक्षत्र में खेत में
चमकती मछलियाँ
हँसकर बातें करती हैं
काली,झिलमिलाती और
डंक मारती माँगुर मछली
बोलती नहीं
बस काटती है
वह जैसे ही याद करता है
मनिहारीघाट को
मस्ताना बाबा का चेहरा बरगद
और उनकी हँसी आकाश हो जाती है।
धरती, गाछ-वृक्ष सब बोलने लगते हैं
फ़सल नाचती गाती है
और रोने लगती है
अमावस्या की रात
कदम की चटनी खाए एक युग हो गया!
उसके लिए सुख का मतलब है
वैशाख के महीने में आईना के तरह झिलमिलाते पानी
में घंटों नहाना
लखपतिया स्टेशन के पूरब में हैं दो पोखरें
और वहीं गड़ा है उसका वह सुख
सुख से बहुत ज़्यादा है
मिल जाना
सोनबरसा के आम
कालूचक की मछलियाँ
भटोतर की दही
कुसियारगाँव की ईख
उसके जीवन में हैं
गोभी के खेत की बाड़े
घी जैसा बैंगन
मेंड़ पर फों-फों करता ढोढि़या साँप
और एक अव्यक्त खालीपन।
एक आँख सौ कारतूस के बराबर
ठांय- ठांय चलती गोलियाँ
हाय! उस डोमिन को याद करते ही
करमा की
चवन्नी सी आँख
एक रूपया का सिक्का हो जाती है।
वह चाहता है
चलती रेल से स्टेशन हो जाना।
4
वे लिखते थें
मैं क्या देख लूंगी सपनों में
जो यथार्थ से भिन्न होगा
आँखें देख लेंगी वे यथार्थ
जो सपनों से भिन्न बहुत था
वर्जीनिया उल्फ की रातों में
स्वप्न थें, नींद नहीं
उसके जीवन में प्रेम था
कविता के लिए समय
और आने वाले समय के लिए कविता थी
वह नहीं करती आत्महत्या
अगर कविता बचा सकती
कविता मरते कवि का हाथ नहीं पकड़ती
वह मौन रहती है
क्योंकि कविता के लिए मौन का अर्थ मृत्यु का आमंत्रण
हेमिंग्वे के भीतर युद्घ मचा रहता था
उसके पात्र इसलिये पुरुषार्थी थें
पर उसके गुणसूत्रों में
बंदूक की गोलियों का थरथराता डर रोप दिया गया था
इसी डर ने एक दिन
धराशायी कर दिया उनकी कहानियों के सभी
योद्घाओं को
एक बार वह चूका और
अपनी कलात्मक ऊँचाई से फिसलता हुआ
गिर गया मौत की खाई में
एक बूढ़ा मछुआरा और विशाल समुद्र
यह सब देख रहे थें
अमृता प्रीतम स्वप्न, प्रेम और शब्द
की दुनिया से इतर
एक जागता बिखरा देश समेटी थी
खुद के भीतर
जो चाय की चुस्कियों, कलम ,किताबों
में चहलदमियाँ करता रहता था
वह चली गयी
पर आज भी उनका वह देश जाग रहा है
और
उनकी किताबों के पन्नों में बिखरा पड़ा है
प्रेमचंद गरीब नहीं थे
गोदान करने और लिखने वाला आदमी गरीब नहीं होता
दोनों के पास धन होता है
धन की प्रकृति भिन्न हो सकती है
ओमप्रकाश वाल्मीकि ने कई बार झाड़ू
बनाकर विद्यालय प्रांगण को बुहारा था
वे जानते थे
यहाँ कचरा बहुत है
और बीमारियाँ कई
ये बीमारियाँ घर-घर न फैले
इसलिए स्वच्छता बहुत जरूरी है
5
श्यामा और शाम्भ
शाम्भ तुम लौट जाओ
अब वृंदावन
मिथिला के जुते खेत में
कैसी प्रतीक्षा ?
सड़क किनारे खड़े वृक्ष सब शापित बहनें
आज कटे या कल
शाम्भ तुम लौट जाओ अब वृंदावन
कार्तिक पूर्णिमा
जुते खेत की खड़ी प्रतीक्षा
नव धान बालियाँ
कटने-कूटने को आतुर
सींके पर जमी दही अब डोल रही
गमछे में अशरफ़ी सा
मुरही और बताशों को अब करने दो शोर
अरपन सज्जित यह चंदन का पीढ़ा
ले जाओ वापस
शाम्भ तुम लौट जाओ
मिथिला से अब वृंदावन
कृष्ण पिता
चुरक मंत्री
चुगलों की गवाहियों पर
लिखा जा रहा युग का विधान
चाटुकारों से सभा सजी है
प्रपंच की अखंड रीत से ग्रसित देश यह
बाँट रहा अब शाप
देह से निष्कासन
देश से निर्वासन
राजा और पिता का जब न्याय यही है
फिर ऐसे देश की चाह किसे है?
अफवाह की आग लगी
दह-दह जलता वृंदावन
शाम्भ तुम लौट जाओ अब घर
पुत्री की झोली दंडपात्र
युग शापित बहनें
चिड़ियाँ बन उड़ जाएंगी
शरद शीत में ठिठुर मरेंगी
गोद हिमालय
पर लौटेंगी नहीं देश तुम्हारे
सारे वरदानकोष रिक्त
स्त्री अंजुली के सम्मुख
देव और देश विरक्त मैं
शाम्भ तुम लौट जाओ
अब देश द्वारका
केले के थम की पालकी
दिखे हरी
पर चिन्ह अमिट विदाई का
उसी थम की मैंने नाव बनाकर रखी है
कार्तिक चन्द्र कोसी की लहरों
पर करे किलोल
सोचा था
बैठ करेंगे सैर उसी पर
देखेंगे छठ का डाला
गाँव से आते दूध बगिया की खुशबू में
खूब नहाएंगे हम-तुम
वन विचरण पुरुषों के लिए तपस्या,
ज्ञानार्जन और जिज्ञासा
स्त्री के लिए फिर आँवारापन क्यों?
बोलो शाम्भ कैसे लौट जाऊं मैं देश द्वारका?
सतभईया, खड़रीच, चुगिला और
झाझीकुकुर डाल में नहीं रूचते मुझको
कब कोसी से मिली है जमुना?
मिथिला से वृंदावन
शाम्भ लौट जाओ तुम अब
गंगा के तलछट की चिकनी मिट्टी
खरोंच गढ़ लेना श्यामा तुम
शरद पूर्णिमा की अमृत वर्षा
शाम्भ तुम खाना खीर मखान
चारू संग मैं बैठ आमौर की फुनगी पर
देखूँगी
चाँदनी में तेरा मुख
शाम्भ हुई देर अब
लौट जाओ तुम वृंदावन
पहले क्षिति को करो मुक्त
व्यभिचारियों की भीड़ से
तब देना मुझे आमंत्रण
वन से बेहतर
खग से सुंदर
जीवन का
हो विकल्प प्रिय
तो बतलाना
शाम्भ तुम लौट जाओ अब वृंदावन
6
मैं भूल जाता हूँ
जब घोंघे आते हैं
घर का नमक चुराने
मैं बतलाना भूल जाता हूँ
नमक जो बंद है शीशियों में
उनका उनसे कौन सा रिश्ता पुराना है
कृष्ण की मजार पर चादर हरी सजी है
मरियम के बुर्के में सलमा सितारा है
अल्लाह के मुकुट में मोर बँधे हैं
नानक के सिर पर नमाज़ी निशान है
लोग कहते हैं —
मैं भूल जाता हूँ
कौन सी रेखाएं कहाँ खींचनी है!
मैं आजकल बाजार से दृश्य लाता हूँ
समेट कर आँखों में
भूल जाता हूँ खर्च कितना किया समय?
झोली टटोलती उँगलियों को
आँखों के सौदे याद नहीं रहते
मैं पढ़ता जाता हूँ
वह अनपढ़ी रह जाती है
मैं लिखता जाता हूँ
वह
मिटती जाती है
खिड़की के पास महबूब की छत है
मैं झाँकना भूल जाता हूँ
वह रूठ जाती है
मैं भूल जाता हूँ
चार तहों के भीतर इश्क़ की चिट्ठियाँ छिपाना
आज जब पढ़ रहे थे बच्चे वे कलाम
तो कल की वह आँधी
और मेरी खुली खिड़कियाँ याद आयी
अब तलक कलम की निभ तर है
कागज भीगा है
मैं भूल गया
कल बारिश के साथ नमी आयी थी !
परिचय-
अनामिका अनु
परिचय:-
एम एस सी (वनस्पति विज्ञान, श्वविद्यालय स्वर्ण पदक)
पी एच डी (लिमनोलाॅजी, इंस्पायर अवार्ड, DST)
प्रकाशन:-
हंस, कादम्बिनी, नया ज्ञानोदय, समकालीन भारतीय साहित्य, कथादेश, पाखी, आजकल, परिकथा, बया, वागार्थ, दोआब, जानकीपुल, समालोचन, पोषम पा, नवभारत टाइम्स, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, चौथी दुनिया, कविताकोश आदि पत्र पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन।
नोट- पोस्ट में प्रयुक्त सभी रेखाचित्र अनुप्रिया जी द्वारा बनाए गये है।
समकाल : कविता का स्त्रीकाल 22
१
फिर भी
कितने जन्मों से रुके हुए
मेरे सवाल
और
सवालों से पीठ फेरकर
तुम्हारा चले जाना
जन्मों से ही चला आ रहा...
तुम्हारी पीठ पर आँखें गड़ाए
जवाब की प्रतीक्षा
यह तो जैसे तय ही है
और तुम्हारी उपेक्षा भी
कितनी जरुरी
बिना उसके
कैसे सम्भव हो
अलग-अलग दिशाओं का प्रवास ?
पास आने के सभी जोड़-घट
सिफ़र पर ही आकर रुके हुए
और मेरे सवालों का पर्चा
अंततः कोरा-का-कोरा
कितनी धूप-छाँव को सहा
तूफानों को झेला
फिर भी भीगने नहीं दिया पर्चा कि
सवालों के जरुरी सन्दर्भ
कहीं मिट न जाएँ
लेकिन आँखों से टपकती कुछ बूँदे
लाख मना करने के बावजूद
ढूल गई कागज पर
और फिर पोंछने की हड़बड़ी में
धुँधले पड़ ही गए कुछ सन्दर्भ
अब बिना संदर्भो के
इन सवालों को
कितना भी गड़ा लूँ मैं
तुम्हारी पीठ पर
तुम मुड़कर देख लोगे
यह भरोसा नहीं है
वैसे भी इन सवालों में शायद
तुम्हारी कोई सहभागिता न हो
मेरे ही भ्रम हो पाले हुए
ऊपर से
बिना सन्दर्भों के ये ऐसे सवाल
और भी बेजा हो सकते हैं
तुम्हारी दृष्टि में
और फिर जब
नए ढेर सारे सवाल
मुंह बाएं खड़े दिख रहे है मुझे यहाँ से
तब क्या जूझना न होगा उनसे ?
भले ही वे भी हो सकते हैं
अनुत्तरित होने के दर्प से भरे हुए
फिर भी
फिर भी...?
2
ये बातूनी स्त्रियाँ
कितना बतियाती रहती हैं स्त्रियाँ
जब आपस में मिलती हैं तब
हाथ में पकड़े थैले को
इधर-से-उधर करती हुई
उकताई-सी खड़ी रहती हैं देर तक
खत्म ही नहीं होती है कभी
स्त्रियों की बातें
चौका-चूल्हा, घर-परिवार
घरवालों के उलाहने, बच्चों की चिंताएं,
शिकायतें, तीज-त्यौहार,
बढ़ती हुई महंगाई,
मायके की यादें
बातों का अथक प्रवाह
जैसे लबालब भरी बहती है नदियाँ
खाली-खाली-सी महसूस करती है
तब भान पर आती है अकस्मात
और मुड़ जाती है अपने-अपने घरों की तरफ
किसी अदृश्य समान धागे से बँधी
चुपचाप-सी
बातूनी स्त्रियाँ
घर में कदम रखते ही
फिर से घेरा बनाकर खड़े हो जाते हैं
स्त्रियों के इर्दगिर्द
कई-कई सर्ग
एक-एक सर्ग से
काल की परिधि से परे
किसी इतिहास में दर्ज न होता
रचता जाता है एक अद्भुत महाकाव्य
और
सृजन के आनंद से वंचित
केवल खाली होने के लिए
बस बतियाती ही रहती है
ये बातूनी स्त्रियाँ !
3
जैसे-तैसे उग आने के लिए
मोह की फिसलन भरी राहों को
ठुकराया था निग्रह से भरकर
तब
निर्लिप्त भाव से सब कुछ देखने की
समझदारी थी वह या
एक जिद थी अटूट
कुछ भी न पनप पाए इसकी ?
नकारते हुए हर कदम पर
जीवन की हरियाली को
नहीं उग आएगी अब कोई
खरपतवार भी
मन की जमीन पर
इसे भी बड़ी आसानी से
भूला दिया गया था
तुम्हारी विरक्त आँखों की
भीगी आसक्ति
नहीं तोड़ पाई यह भ्रम कि
ऐसी एकाध झड़ी ही होती है
सराबोर कर देनेवाली
शेष तो सूख जाना
यही
यही होता है अंतिम...
अब जब कि
खुला कर दिया है मैंने
तुम्हारा मार्ग
तब
उस निमिष भर की
हरियाली को रौंदकर
धुँधले होते जाते
तुम्हारे पदचिन्हों तले
उग आये हैं
कई हारे हुए रिश्ते
घास-पात की तरह
जिन्होंने माँगा था कभी
मेरी बंजर जमीन का
छोटा-सा टुकड़ा
जैसे-तैसे
उग आने के लिए
4
अंतर
यथार्थ की अपरिहार्यता कहें या
उब-उचट
स्वीकारना होगा अब
हमारे बीच बढ़ते जाते अंतर को
सच कहो तो खादपानी डालकर
सहेजना होगा इस अंतर को
मनबहलाव समझकर
पास आने के सभी रास्तें
एक-एक करते हुए मिट चले हो तब
किसलिए यह जद्दोजहद
और जो हुआ हमारे बीच
वह इतना भी नहीं था कि
यूँही मसोसकर
नाराजगी से फिरा ले हम पीठ अपनी
या आंसुओं से भिगो दिया जाए
व्यर्थ ही सही चुपचाप गुजरते जाते
इन दिन-रात्रियों को
बहुत कुछ हुआ तो
एकाध कविता लिख लूंगी मैं
या दिन भर में
मेरी स्मृति का कोई टुकड़ा
चमक उठे तुम्हारे
विशाल आसमान में
बस इतना ही...
बहुत कुछ बिगड़ने से रहा
यह जानते हो तुम भी
हालाँकि तुम अच्छे से कर ही लोगे
तुम्हारी व्यस्तता से भरी दिनचर्या में
मेरी कमी का विचार करने का
क्षणिक अवकाश भी
नहीं फटकेगा तुम्हारे आसपास
केवल इतना हो
तुम्हारे अडिग निग्रह का
कुछ अंश पहुँचे मेरे तक
सारा बल संजोकर
तुम्हारी विरक्ति की छाँव का
एकाध टुकड़ा लपेटकर
चल पडूँ मैं भी
इस चिलचिलाती धूप में
फिर भी डरती हूँ कि
मेरे कदम होगे तुम्हारे मार्ग पर
तब पीछे मुड़कर मत देखना तुम
हिकारत से
या सचेत होकर
बदल मत देना अपना मार्ग
मैं धीमे-धीमे रखूंगी अपने कदम
तुम्हारे पदचिन्हों पर
तुम्हारे-मेरे बीच के अंतर को
पूरी तरह से सहेजकर...
5
अपनी ही राह देखते हुए
अपनी ही राह देखते हुए
खूब लगाए गोते
खंगाला खुद को गहरे-गहरे
फिर भी नहीं हाथ लगा
लुप्त हो चुका अपना होना
मजबूत होती जाती दीवारों से
रिसने लगते हैं
दुखों के सोते
तब विस्मय-चकित होकर केवल
देखना रह जाता है शेष
माथे पर व्याप्त अथाह आसमान का
अंदाजा लेते हुए
दहलीज पर ही ठिठकते हैं कदम
और अस्तित्व की परतों को
छिलने बैठो तो
समझ में ही नहीं आता है
किस सिरे से करे शुरुआत
असमंजस से भरकर
छटपटाते हुए
अगर करना चाहो
जड़ों पर प्रहार
तब किस तरह से बेईमान जड़ें
करने लगती हैं आपस में कानाफूसी
और खोपती हैं पीठ में छूरा
लहूलुहान होकर गिरने से पहले
अपनी चपेट में लेना चाहती है
ढीठ बेखौफ दीवारें
और
आवाज देकर पुकारता आसमान
होता जाता है
अपनी पहुँच से दूर-दूर
और भी
धुँधला-काला...
परिचय
सुनीता डागा
कवयित्री और अनुवादक
शिक्षा – एम.ए. ( हिंदी साहित्य )
प्रकाशित साहित्य :
दाह – मराठी दलित आत्मचरित्र ‘होरपळ’ ( ल.सि.जाधव )का हिंदी अनुवाद : अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद |
सुलझे सपनें राही के – मराठी उपन्यास ( भारत सासणे ) का हिंदी अनुवाद : साखी प्रकाशन, भोपाल |
समकालीन मराठी स्त्री कविता (सदानीरा- ग्रीष्मकालीन अंक – २०१९ )
कई महत्वपूर्ण मराठी-हिंदी पत्रिकाओं के लिए निरंतर अनुवाद में संलग्न |
मराठी तथा हिंदी कविताएँ प्रकाशित |
‘दाह’ के लिए कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित |
संपर्क-
मो.- ८७६६५८९४३५