सोमवार, 30 जनवरी 2017

वरिष्ठ कथाकार राजनारयण बोहरे की कहानी

राजनारायण बोहरे
जन्म
बीस सितम्बर उनसठ को अशोकनगर मध्यप्रदेश में
शिक्षा
एम0ए0हिन्दी साहित्य एवं लॉ तथा
पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक उपाधि
प्रकाशन
इज़्ज़त-आबरू , गोस्टा तथा अन्य कहानियां  और हादसा
( तीन कहानी संग्रह)
मुखबिर
(उपन्यास)
एवं किशोरों के लिए दो उपन्यास
साथ में
एक सौ से अधिक समीक्षा आलेख एवं
दो दर्जन व्यंग्य लेख
सम्मान
मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का बागीश्वरी पुरस्कार
एवं
साहित्य अकादेमी मध्यप्रदेश का सुभद्राकुमारी चौहान पुरस्कार
सम्पर्क
raj.bohare@gmail.com
205/11 विष्णुपुरी मैन, भंबर कुआ इन्दौर दूरभाष- 9826689939

राजनारायण बोहरे की कहानी
मलंगी

मैंने एक नजर चारों ओर देखा, तो पाया कि वहाँ केवल बच्चे ही नहीं थे, बल्कि मोहल्ले-भर की औरतें भी जुट आई थी।
बीजुरी वाली जीजी द्रवित होती हुई कह रही थीं, ” इस बेचारी ने जिंदगी-भर सबकी सेवा की है, जाने कौन-सा पाप हो गया कि ऐसे कष्ट भोगना पड़ रहे है। “
तुनककर जमुना बोली थी, ” पाप नही तो क्या था वो ? छिनारपना तो सबसे बड़ा पाप है। इसने तो सारे लिहाज तोड़ दिए थे, कुछ दिनों से । अब उसी की फल भोग रही है।”
बरोदिया वाली, मुँगावली वाली और टकनेरी वाली काकी ने जमुना की इस बात पर असहमति जताई थी और वे बीजुरी वाली जीजी की बात का समर्थन करने लगी थी। बच्चे भी चुप न थे, वे भी उसके गुण गाए जा रहे थे।
उसके, यानी कि मलंगी के!
मलंगी, यानी कि हमारे मोहल्ले की किसी एक की नही, सबकी पालतू कुतिया। धूसर रंग की, कद्दावर और भरपूर स्वस्थ इस कुतिया पर हम सबको नाज था।
मोहल्ले का हर बच्चा उसे सिर्फ अपनी कुतिया कहता था और इस मुद्दे पर परस्पर झगड़ बैठते थे। ऐसे ही एक बार मेरा पिक्कू से झगड़ा हो गया था। पिक्कू ने मुझे टोला मारा, तो मँझले भैया ने उसमें लठिया हँचाड़ दी थी। इधर हम उसके लिए लड़ रहे थे, और मलंगी किसी मस्त मलंग की तरह बच्चों के साथ खेल रही थी।  मलंगी की माँ चम्पी भी हमारे मोहल्ले की प्यारी कुतिया थी, तब मलंगी बहुत छोटी थी कि उसकी माँ चम्पी एक दिन नगरपालिका वालों के परोसे गए जहर के गुलाबजामुन खा गई। शाम तक चीखती हुई देह त्याग गई और मलंगी अनाथ हो गई थी। हम सब लोगों के मन में अनायास ही मलंगी के लिए वात्सल्य उमड़ आया था।
मलंगी का मामा ‘ टीपू ‘ कद्दावर नस्ल का बड़ा फुर्तीला कुत्ता था। पर वह उन दिनों बूढ़ा हो चला था, सो खारे-कुआँ को लाँघ जाने की कला का प्रदर्शन उसने बंद कर दिया था। हम बच्चे इससे कुछ निराश से थे। क्योंकि हमारे मोहल्ले का खारा कुआँ दस फीट चौड़ा कुआँ था, जिसे एक ही छलाँग में लाँघ जाने का कौशल टीपू ने जाने कब प्राप्त कर लिया था। जब भी मोहल्ले के बाहर का कोई बच्चा आता, हम लोग टीपू को दौड़ाते हुए कुआँ तक लाते और लाँघ जाने को उकसाते। टीपू सहज रूप से कुआँ लाँघ जाता।  यह हमारे लिए बड़े गर्व की बात थी। फिर एक दिन टीपू मर गया तो हमें लगा कि टीपू के साथ ही यह कला भी समाप्त हो जाएगी।
किसन और मुन्ना ने एक दिन यह कला मलंगी को सिखाना शुरू किया, तो सब बड़े खुश हुए थे। बाद में एक दिन मलंगी को भी यह कौशल प्राप्त हो गया, तो हम सब बच्चे फिर से गौरवान्वित हो उठे थे। अब हम फिर से दूसरे मोहल्लेवालों और बाहर के मेहमानों के सामने मलंगी का यह कौशल दिखाने लगे थे।
मलंगी धीरे-धीरे तगड़ी होती जा रही थी और उसी अनुपात में उसकी आवाज में क्रूरता बढ़ रही थी। वह दिन-भर यहाँ-वहाँ सोती हुई दिखती, पर रात को पूरी निष्ठा से जागकर मोहल्ले की चौकीदारी करती। वह भूल जाती थी, कि हम लोग कितने निष्ठुर हैं, जो दिन में उस पर लाड़ दिखाते है और रात में बाहर निकाल देते है, चाहे झमाझम पानी हो चाहे कड़ाके की जाड़ा।
एक रात किसन के घर की बाहरी दीवार मे कोई बदमाश सेंध लगाने के चक्कर में था, कि मलंगी ने दबे पाँव आकर उसका हाथ उपने जबड़े में ले लिया था। पता नहीं कैसे वह उठाईगीरा अपना हाथ छुड़ाकर भागा, लेकिन मलंगी ने भौंक-भौंक कर पूरा मुहल्ला जरूर जगा दिया था। दिवार के पास पड़ी सब्बलिया, जमीन पर फैली खून की बूँदें और दीवार में बनाया गया छोटा-सा छेद मलंगी की चौकसी की दास्ताँ बयान कर रहा था। हम स ब फिर मलंगी के कृतज्ञ हुए थे।
सितंबर का महीना आया, तो जाने कहाँ- कहाँ से ठट्ठ के ठट्ठ कुत्ते हमारे मोहल्ले के चक्कर काटने लगे थे। वे सब मलंगी के इर्द-गिर्द लम्बी अपनी लम्बी जीभ लटकाते घिरे  करते थे। हम सब बच्चे दहशत में थे, लेकिन मलंगी बड़ी निश्चिंत और लापरवाह-सी दीखती थी, उलटे इतराती थी। खामख्वाह किसी भी कुत्ते पर खोंखिया  बैठती, और देर तक भौंकती रहती। हमारे मोहल्ले के बुजुर्गों को इन दिनों मलंगी बड़ी दुश्मन-सी लगती थी। वे पाराशर मोहल्ला के कल्ला कुत्ता, रूसल्ले के नीचे के पंगा और पुराने बाजार के मोती कुत्ता से तो पहले से ही नाराज थे, जो कि रात-बिरात अकेले निकलते किसी भी यात्री को नोचने-खसोटने को उद्यत रहा करते थे। ऐसे बिगड़ैल कुत्तों को अपने मोहल्ले में भला कौन पसंद करता सो जिसका मौका लगता ऐसे कुत्ते को ठोंक ही देता उनके साथ कभी कभी मलंगी मे भी लठिया पड़ जाती थी।
फिर एकाएक सारे कुत्ते गायब हो गए। बीजुरी वाली जीजी ने प्रसन्न होते हुए सिरोंज वाली चाची को बताया था कि मलंगी अब गर्भवती है, जल्दी ही पाँच-छः पिल्लों को जन्म देगी।
यह सूचना हमारी मंडली के लिए बड़ी आल्हादकारी थी, हम सबको पाँच-छः खिलौने जो मिलने जा रहे थे। हम सबने अपने -अपने घरों मे प्रसव के लिए सुरक्षित कोने तलाश कर लिये थे और वहाँ मलंगी को घुमा भी लाए थे। मोहल्ले की सारी औरतें और बच्चे व्यग्रता से मलंगी की प्रसव पीड़ा की प्रतीक्षा कर रहे थे। हम सबने उसके संभावित प्रसूतिगृहों में रोटियाँ इकट्ठी करना शुरू कर दिया था। कहावत है, कि प्रसव के तुरंत बाद कुतिया को भूख लगती है और ऐसे में वह अपना एकाध पिल्ला खा जाती है। हम नहीं चाहते थे कि मलंगी का एक भी पिल्ला कम हो, इसलिए मलंगी की प्रसवोत्तर भूख के लिए पर्याप्त खाना जुटाने के बाद हम निश्चिंत थे।
प्रसव के लिए मलंगी ने बीजुरी वाली जीजी का घर चुना। छः पिल्लों को जन्म दिया उसने। बीजुरी वाली जीजी बड़ी खुश हुई, और उन्होंने हम बच्चों को इस उपलक्ष्य में एक दावत दे डाली थी।
हम लोग सुबह-शाम मलंगी के पिल्लों को देखने जरूर जाते थे। नर्म, गुदगुदे और नन्हे-नन्हे वे पिल्ले हम सबको बड़े प्यारे लगाते थे। बीजुरी वाली जीजी ने बताया कि मलंगी उन बच्चों को दूध नहीं पिलाती थी, इससे बच्चों के बचने की गुंजाइश बहुत कम था। यही हुआ। रूई के फोहों से उन पिल्लों को बचा। बच जाते तो सभी अच्छे कुत्ते बनाते, क्योंकि हरेक पिल्ला बीसा था। यानी कि बीस नाखूनों के साथ जन्म लिया था, हरेक पिल्ले ने।
फिर कई सालों तक ऐसा ही हुआ, पिल्ले ऐसे ही जन्म लेते और ऐसे ही म जाते। हम लोगों को बहुत दुःख होता, बीजुरी वाली जीजी तो रोती भी थी। पर मलंगी इस सबसे बड़ी बेपरवाह थी। मस्जिदवाले मौलवीजी कहते थे- इसका तो नाम ही मलंगी है। मलंगी यानी कि मस्त मलंग-सी रहनेवाली मादा। सचमुच मस्त मलंग की ही तरह तो थी मलंगी। मोहल्ले के लोग उसे आवारा भी कहते थे, तो कोई सड़क छाप कुतिया भी कहने से न चूकते। पर उसको कोई फर्क न पड़ता, वह सबके प्रति वफादार थी।
मलंगी की वजह से हमारे कभी बाहर से कोई आवारा और खूँखार जानवर नहीं आ पाया। अपने नुकीले पंजे, तीखे दाँत और क्रूर आवाज से वह घुसपैठिए में दहशत पैदा कर देती थी। लेकिन उस बार एक ऐसा प्राणी हमारे मोहल्ले में घुस आया, जो जमीन पर नहीं, मकानों और पेड़ों पर छलाँग लगाता था। इस कारण उसको मलंगी का भी बिलकुल भय न था।
काले मुहँ का एक लंगूर जाने कहाँ से भटक कर हमारे मोहल्ले में आ धमका था और सबकी नाक में दम किए था। वह धड़ाधड़ छप्परों पर कूदता, हमारो कबेलू फोड़ता, छतों पर सूखते अनाज-दालों को बर्बाद करता और अचार तथा मुरब्बों के मर्तबान भी फोड़ डालता था। सब परेशान थे और उससे निपटने के नए-नए उपाय खोज रहे थे।
अभी बीसेक दिन पहले की बात है, कल्याण ने लंगूर को एक नीचे से छाप्पर पर बैठा देख मलंगी को भी उठाकर ऊपर बैठा दिया था और मलंगी को लंगूर पर छू कर दिया था। मलंगी लंगूर पर झपटी तो लंगूर यह जा और वह लंगूर तो लंगूर ही था, वह एक डाल पर चढ़ा और दूसरी से होकर एक बड़ी ऊँची छत पर जा पहुँचा। मलंगी बेचारी नीचे बैठी टाँपती रह गई थी और वह ऊपर बैठा दाँत दिखा रहा था।
फिर तो दो दिन तक ऐसा ही खेल चलता रहा। मलंगी नीचे बैठी रहती और वह ऊपर बैठा अपन अजीब-अजीब करतब करता रहता।
मोहल्लेवालों के साथ लंगूर का बर्ताव अब बड़ा उग्र हो गया था। अकेले-दुकेले निहत्थे आदमी को देख वह अब हमला भी करने लगा था। जो कुछ हाथ में मिलता, छीन लेता। कोई खाली हाथ होता, तो लंगूर जी - भर के नोचता - खसोटता और झट से ऊपर चढ़ जाता। कभी-कभी वह लोगों के आँगन में उतर आता, और जो हाथ पड़ता, ले भागता।
एक दिन और अजूबा दिखा, लंगूर ऊपर छप्पर पर बैठा हुआ किसी के घर से उठाया गया रोटी गपक रहा था और नीचे बैठी मलंगी ऊपर मुहँ किए टुकुर-टुकुर उसे ताक रही थी। एकाएक लंगूर ने एक रोटी उठाई और मलंगी की ओर उछाल दी। एक-दो मिनट तक मलंगी कभी दायीं तो कभी बायीं आँख ऊँची करके रोटी को देखती रही, फिर उठी और सूँघ के मानो उसकी शुद्धता की पड़ताल की, फिर बड़े प्यार से छोटे-छोटे टुकड़ों में स्वाद के साथ पूरी रोटी चबा गई।  उस एक रोटी ने उन दो विजातीय प्राणियों के बीच मैत्री की शुरूआत कर दी।
अब लंगूर जो कुछ भी छीनता, बड़ी ईमानदारी से मलंगी को हिस्सा देता। अ बवह नीचे भी उतर आता और मलंगी के ऐन बगल मे आकर बैठ जाता। उसके शरीर में से जुएँ बीनता। मलंगी अपनी लंबी निकाल लंगूर की पीठ चाटने लगती।
हम लोग बड़े बेबस और हैरान थे, कि अब इसके विरूद्ध किसे भिड़ाएँ। इसने तो हमारा ही एक सदस्य तोड़कर अपने साथ मिला लिया। मोहल्ले के बुजुर्ग अब दिन-रात मलंगी को गरियाते रहते जो नोचने-खसोटनेवाले जंगली लंगूर से दोस्ती कर बैठी थी। हमारे घर-आँगन तक निर्द्वंद्व रूप् से घुस आनेवाली मलंगी हम सबको लंगूर के असर के कारण बदली-बदली नजर आने लगी थी। हमारी गहरी आत्मीय रही मलंगी को ये क्या सूझा था कि वह बाहरी परिवेश के प्राणी को अपना मान बैठी थी।
मोहल्ले की औरतें मलंगी को बदचलन, धोखेबाज, आवारा, नकटी, छिनाल और न जाने क्या-क्या बदनाम उपाधियाँ दे रहीं थीं, जबकि मलंगी लंगूर के साथ बहुत मस्त थी। दोनों दौड़ते हुए किसी भी दिशा में चले जाते, फिर घड़ी-दो घड़ी बाद हाँफते-काँपते लौटते। उनकी आँखों में मादक चमक होती और हरकतों में भरी होतीं खूब-सी चुहलबाजियाँ। कभी वे दोनों छप्परों पर चढ़ जाते, तो एक मकान से दूसरे पर होते हुए तड़ज्ञतड़ कबेलू चटकाते फिरते। लंगूर तो भाग जाता पर मलंगी को ताड़ना मिलती। हम सबको मलंगी में भारी परिवर्तन दीखने लगा। लंगूर के साथ रहने के कारण अब उसमे बिना बात भौकने, हमला करने और खूब लंबी दूरी के छप्परों पर छलाँग लगाने की प्रवृति आ गई थी।
आज सुबह की बात है।  नगरपालिकावाले कुत्ता पकड़ने का पिंजरा लेकर हमारे मोहल्ले मे घुसे। वे लंगूर को पकड़ने आए थे। हम बच्चे चिंतित थे कि लंगूर के चक्कर में मलंगी को भी न घेर लिया जाए। पिंजरे को एक बनाके रख दी, फिर मोहल्लेवालों से कहा था, कि अपने-अपने छप्परों और छतों पर खड़े होकर लंगूर को हड़काओ। सब लोग लाठी लेकर अपने घरों के ऊपर चढ़ गए और लंगूर को बिदकाने लगे।
लंगूर ने यह नजारा देखा तो वह घबरा गया और हड़बड़ाकर एक और को भाग निकला। मलंगी उसके पीछे-पीछे थी। बदहवास होकर भागता लंगूर मोहल्ले  के दायीं ओर मौजूद तिलौआ बाग की ओर बढ़ने लगा था। इसी क्रम मे उसने जमुना की अटारी से मोहन की अटारी पर छलाँग लगाई, फिर नीम की डाली पकड़ी व उस पर चढ़कर उस ओर को लपक गया था। इधर उसका अनुकरण करती मलंगी भी उसी जोश में दौड़ती हुर्इ्र आई और जमुना की अटारी से मोहन की अटारी के लिए उछल पड़ी थी। पर लंगूर, लंगूर ही होता है और कुत्ता, कुत्ता। बीस फीट की ऊँची जमुना की अटारी से तीस फीट ऊँची मोहन की अटारी के छप्पर पर दस फीट की  गली फाँदकर छलाँग लगाना मलंगी के लिए भला कहाँ संभव था! सो अपनी ही झोंक में मलंगी उछल तो गई, मगर छप्पर तक पहुँचने के बजाय वह मोहन की दीवार से टकरा बैठी और दीवार पर रिसकती हुई, नीचे पक्की गली में आ गिरी थी।
गिरते ही उसने आर्तनाद किया था, जिसे सुन अपने-अपने घरों में बैठे हमस ब बच्चे चौंक उठे थे और आनन-फानन में नीमतले जुट आए थे। बच्चे ही नहीं औरतें और पुरूष भी एकत्रित हो गए थे वहाँ।
तब से सब लोग मलंगी को ही घेर के बैठे है। मेरी तंद्रा टूटी तो मैंने मलंगी को तड़पते ही पाया।
हमारे मोहल्ले में ढेर-अस्पताल के एक कंपाउंडर वर्माजी भी रहते है। अचानक बीजुरी वाली जीजी को यह ख्याल आया, तो उन्होंने सबको याद दिलाया। फिर क्या था ? सात-आठ बच्चों के साथ पिक्कू के दादा वर्माजी को बुलाने चल दिए।
वर्माजी ने शायद घर पर ही पूरा किस्सा सुन लिया था, सो वे अपने साथ दवाइयों का बैग लिये चले आए।
पाँच मिनट तक वे मलंगी के शरीर पर हाथ फेरते रहे, फिर अपना बैग खोला और एक इंजेक्शन निकाल लिया। सिरिंज में एक पीला-सा द्रव भर के उन्होंने मलंगी के कूल्हे में इंजेक्शन की सूई ठूँस दी। सूई बाहर निकाल के रूई से पोंछकर वे बैग में रखते-रखते रूक गए, और कुछ सोचते हुए से एक शीशी और निकाल ली। दूधिया रंग का वह पदार्थ दुबारा इंजेक्शन में भर के वर्माजी ने एक बार और मलंगी को इंजेक्ट किया, फिर बीजुरी वाली जीजी से वोले, ‘‘चिंता मत करो जीजी, मलंगी ठीक हो जाएगी। दरअसल ऊपर से गिरने की वजह से इसकी कुछ पसलियाँ टूट गई है। उनमें दर्द हो रहा होगा और गिरने की दहशत भी होगी, इस वजह से रो रही है। मैनें इंजेक्शन लगा दिया है, अब आराम से सोएगी ये कल तक। कल दर्द भी कम हो जाएगा और इसका डर भी खत्म हो जाएगा।‘‘
हमने संतोष की साँस ली। उधर नगरपालिकावालों ने लंगूर को पकड़ लिया था। इधर अगले चौबीस घंटे मलंगी सोती ही रही। बीजुरी वाली जीजी उसे उठवाकर अपने घर ले गई थी, सो हम बच्चे दूसरे दिन सुबह वहीं इकट्ठे हुए। वहीं बैठे-बैठे दोपहर ऐसे ही बीत गई ।
यकायक मलंगी ने अँगड़ाई ली, तो हम उत्सुक हो उसे निहारने लगे। उसने आँखें खोंली, सिर उठाया, और हमें देखकर भू-भू के प्रेमभरे स्वर में आलाप लिया। मह बच्चे प्रसन्न हो उठे थे।
मलंगी ने दो-चार दिन के बाद दुबारा चलना-फिरना शुरू किया तो वह बिलकुल बदली हुई-सी नजर आई। अब वो बीचवाली मलंगी न थी बल्कि वही पुरानी मलंगी थी, जो हमारे मोहल्ले की चौकीदार थी, हर घर की सदस्य थी और हम बच्चों की प्यारी सखी थी। वह अपने अंदाज में घर-घर पहुँचकर अपना हिस्सा पाने लगी और पूर्ववत् रात को अपनी ड्यूटी निभाने लगी।
पता नहीं लंगूर उसकी यादों में शेष था या नहीं, पर हम सब एक दुःस्वप्न की तरह लंगूर को भूल चुके थे।
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राजनारायण बोहरे
205/11 एकता अपार्टमेंट, विष्णपुरी मैन
भंवर कुंआ इन्दौर म0प्र0 452001

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

विमल चन्द्राकर की पाँच कविताऐं

स्वभाव से सहज और सरल विमल निरन्तर रचनाशील हैं।जिद है कि कुछ करना है और लगातार लिखते -पढ़ते  अग्रसर हैं साहित्य की पगडण्डियों पर ।रास्ते मुश्किल हैं किन्तु कछुए कभी विफल नहीं होते के सिद्धान्त पर बढ़ते विमल कविता का कहरा सिखते हुए अथक श्रमशील कवि हैं।आईए आज गाथांतर पर विमल का स्वागत करें......

1-----
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!!  रात और दिन का असद  !!
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सुनो रात/तुम बढ़ने लगी हो
बोझिल और ज्यादा महसूस होने लगी हो
दिन तो जल्दी ढल जाता है
प्रिय.....बेरूखी से तुम्हारी /दिल दुख जाता है
छोटा दिन इंतजार में तुम्हारे
नैनों से अनवरत अश्रु बहाता है
प्रिय.....संग स्वप्न मिलन के लाता है
एक तुम हो कि निरा स्याह और घुप्प
घटाटोप अंधकार सी छाकर
मेरी वेदना में त्वरित घुलती जाती हो
रात तुम बढ़ती जाती हो/प्रेम के बढ़ते अन्तराल के साथ
तुम और बढ़ती जाती हो
जो रह गया अनकहा/अकथनीय सा
वो अन्तराल पाट जाती हो
अधूरे #हमतुम के बीच/जो काबिज है समर्पण
सहज एहसासात करा जाती हो
जन्म जन्मांतर तक सुरक्षित प्रेम
परस्पर हम-तुम के दरम्यान👫
सुनो रात
सुनो हम तुम की अन्तरात्मा की बात।।

2----

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!!  बहुधा कम ही देखा जाता है  !!
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बहुधा कम ही देखा जाता है
पिता के होते हुये भी
सालों पिता के स्नेह से
किसी बेटी का वंचित होना
पिता के लिये आसान नहीं होता
बेटी की परिवरिश के लिये
बेटी से मोह भंग करना
शिक्षा-दीक्षा लालन-पालन के लिये
लाडली को नज़रों से दूर करना
बहुधा कम ही देखा जाता है।।

पिता लिखते हैं हर साल
वे मिलते नहीं एक बार को भी
बस उकेरते हैं बिना मिले
झौव्वा भर अतुलनीय स्नेह,
देते हैं शुभाशीष और नसीहतें
वे मानकर खुद को अपराधी
करते हैं पश्चाताप आज भी/कागजी पाती पर
बहुधा कम ही देखा जाता है।।

पिता बातों ही बातों में बता देते हैं सहूलियत
सिखा देते हैं परदेश में रहकर
जिन्दगी को जी लेने का हुनर
वे दिखा देते हैं आसानी से आईने में
समाज के विकृत चेहरों की पहचान करना
समाज के कुंठितों से बचाव करना/कागज़ी पाती पर
सच पिता साथ न होकर भी/होते हैं साथ
बहुधा कम ही देखा जाता है।

                                                    
3-
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शीर्षक-सुन रहे हो ना।ओ कैक्टस

सुन रहे हो ना! ओ कैक्टस।
कौन कहता- कि तुम चुभते हो,
बस बात अपनी, तीक्ष्णता से कहते हो
तुम तल्ख,बेहद नुकीले...शूल सम दिखते हो
सब कहते हैं कि अनायास चुभते हो
तुम कैसे उन्मुक्त हंसी हँसते हो
बढ़ाकर तुम भी देखो,अपना स्टेटस।
सुन रहे हो ना।ओ कैक्टस।🌵🌵

तपते जलते परिवेश में देखा है
जब सूखने लगते हैं हर वृक्ष,डाल, पात।
प्रकृति की सम/विषम जलवायु में,
काँटो के बीच हरियाना देखा है।
और कंटीली तुम्हारी सतहों का
विषमता के बीच मुस्कुराना देखा है।
कोमल कांटों का इतराना देखा है
सुन रहे हो ना।ओ कैक्टस।।🌵🌵

तुम खाद पानी से जितना वंचित/
उतना ही होते पूर्ण विकसित
तुम और फलते फूलते दिखते हो।
काँटो की फकत के बीच, कैसे हँसते हो।।
तुम इसी गुणीभूत विशेषता से
अधिकतर घरों की बैठकों का/साजो-श्रृंगार बनते हो
मेरे हृदय में निःसंदेह बसते हो,उतना
प्रसार पाती है हरीतिमा, अन्तस तक/ जितना

छोडतीं हैं बातें तुम्हारी, गजब का इम्पैक्टस।
सुन रहे हो ना।ओ कैक्टस।।🌵🌵
                                           

4-
*************************
!!  मन की बात जता लेते हो  !!
*************************

साध अनोखे कहन की शैली
सच कैसे झुठला सकते हो...
तरह तरह से भावुक होकर
मन की बात जता लेते हो...

तनिक रूकते हो
चिंतन करते हो
गजब संवाद अदा करते हो
मन की बात बता लेते हो....

देखा जा सकता है तुम्हारा
रूकना,आसमान तकना
रूंधे गले से ध्वनि परिवर्तन करना
अजब हालकुशल सुना लेते हो

गरीब की गरीबी अमीर की अमीरी
दोनों से तुम भी हो वाकिफ
फिर कैसे अन्तर दिखला लेते हो
मन की बात बता लेते हो...

तुम्हारे मन की बात से
मुझे भरम सा होता है
पैसे वाला तो मदमस्त यहां
बस गरीब ही रोता है.....

सच ही तो लगता है मुझको
ओ भाषायी जादूगर
है अखिल देश में वर्चस्व तुम्हारा
मन की बात जताने से.....

                              
5-
दूर होकर भी
हर एक आहट
तुम्हारे होने की
बार बार दस्तक देती है
और तुम
एकाधिकार करते जाती
मौजूदगी जताती हो
ये जानता है कोई
नहीं मिलना वाज़िब
और मुनासिब शायद...
हम तुम का मिलान संभव नहीं
तुम रखती ख्याल
भावों का जज्बातों का
लेश मात्र तक छल से परे
हो आज भी..
उतनी आत्मीय जितने निर्मल हम
लगती हो....तुम
जैसे रेलगा़डी की पटरियों सी
दूर दूर
हमीद के खरीदे चिमटे की तरह....
नदी के दो किनारे ...की तरह
मथानी का बिना रस्सी का होना
मंथन के दरम्यान
जिसे परस्पर दो माध्यम के
बिना मथे पाया नहीं जा सकता।
नाम की अर्थवत्ता
तुम अब उतने ही गहरे अन्तर्साध
जो कभी नहीं रही विलग ...अन्तर्मन से
हैं जितने सहज हम उतनी तुम
पर उतने ही विमल "हम" जितनी प्रिय.."तुम"
हैं वर्तमान इस धरा पर काबिज "हम तुम"
जितने अधूरे हम उतनी ही अधूरी तुम।
जितने समर्पित हम....उतनी समर्पित तुम।।

                                           
***विमल चन्द्राकर****
       कानपुर
        उत्तर प्रदेश

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

समीर कुमार पाण्डेय की कविताऐं

बागी बलिया की क्रांतिधर्मा धरती के समीर स्वभाव से ठेठ गवईं व्यक्ति हैं ,उनकी निगाह गाँव से होकर शहर जाती है और दोनों के आन्तरिक द्वन्द को बखुबी जानती -पहचानती है। समकालीन कविता में समीर तेजी से उभरता युवा नाम हैं।आईए आज गाथांतर पर समीर की रचनाधर्मिता का स्वागत करें.....

1------

पुरबिया कामगार औरतें

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दिल्ली भागी औरतें 

उच्छृंखल पहाड़ी नदी होती हैं 

जो भूख और गरीबी के तटों से होकर

यहाँ पहुँच कर गुम हो गयी हैं

ईमारतों और भींड भरी सड़कों में  

जिनके विरुद्ध गढ़े जाते हैं 

श्लील-अश्लील मुहावरे 

तब महानगर का वक्त मुठ्ठियों में कश जाता है...

ये आजन्म जीती है अशिक्षित 

सड़क की जिंदगी संसद के पिछवाड़े में

वह रोज सुबह निकलती है 

मुसल्सल दौड़ती, भागती, रेंगती

पूरे दिन फिरकी सी घरों में घूमती है 

उनके लिए एक पल ही काफी होता है

उन मुखौटों की हकीकत उजागर करने में 

जिस वासनागत समाज ने कभी स्नेह नही दिया 

सहलाया नही प्रेम में उन गठे जिस्मों को....।

जनवरी की ठिठुरती शाम में 

मेट्रो का दरवाजा खुलते ही 

घुस जाती है वही औरतें 

विजेता की तरह कुचलती जाती है उजले चेहरों को

ध्वस्त होते देखती है अभिजात्य ओढ़े ओहदों को

ये औरतें आदतन क्रांतिधर्मी नही होती

ये तो उदास, धूसर गली-मोहल्लों से निकल

जैसे-तैसे चली आयी हैं इस महानगर में

जहाँ आदमी कम मशीनें ज्यादे होने से 

वह भी मारना सीख गयी हैं भावनाओं को 

इस प्रदूषित हवा में 

लेती हैं साँस ईर्ष्या,अपमान की गर्म हवाओं में 

उनके फैसले से 

बंद हो जाते हैं घर के सभी दरवाजे 

केंचुल बदलते गाँव में 

उसके लिए ऐसे घृणा पसर जाती है

जैसे मेट्रो के नीचे यमुना मैली-कुचैली उदास सी...।

वे डरती नही 

चुपचाप अपनों में बतियाते

भीड़ को चीरती घुसती है मेट्रो के भीतर 

लम्बी गहन उदासी को 

झटके में उड़ा 

खिलखिलाती हैं जोर से

उनकी आँखों में तैरती है सोन मछलियाँ 

उनके शरीर में केवल

मरे पसीने की गंध नही

हाथों में मोबाईल 

और होठों पर लाल लिप्सटिक भी पुती होती है 

मॉल और मल्टीप्लेक्स की दुनिया के बीच 

वे औरतें गद्गद भावुकता 

प्रवंचित बौद्धिकता के बीच खड़े लोगों को छू कर 

बिना प्रेम किये निकल जाती है

इन औरतों का हँसना नही सुहाता दिल्ली को

कुछ छिल सी जाती है चकमक हाँफती दिल्ली

भीड़ के चेहरे की चमक झरकर

चिपक सी जाती है एक अनजान चुप्पी

पर इन्हीं पुरबिया कामगार औरतों से ही 

यह आधी-अधूरी दिल्ली पूरी दिल्ली हो पाती है....।

(2).

मजाक

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गाँव का मजाक 

क्यों नही बना सकते शहर

जब शहर मजाक करते हैं 

तो पता नही चलता वे मजाक कर रहे हैं

जब गाँव मजाक करते हैं 

तो तमाम अँधेरे के बावजूद

गेहूं, उडद और अजवायन उजाले में उगते हैं

वे दुनिया के आदिम कारीगर हैं

जिनके सिरहाने है हँसिया, हल और कुदाल

जिन विजेताओं के इतिहास में 

वास्तविकता कम मजाक ज्यादे होते है

गाँव ऐसे शहरी मजाक को नही समझ पाते

वे विहँसते हैं 

गाँव की भाषा और पहनावे पर

झुग्गी-झोपड़ियों और पगडंडियों पर

यह दुनिया जिन मिट्टी सने हाथों 

बना एक खिलौना है 

जमीन से उछला आकाश है 

इनकी मिट्टी से निकला पत्थरों का जंगल है

उनसे ऐसा रिश्ता 

कोई उचित रास्ता नही होता मजाक का....।

(3).

जमीन से उगे लोग

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मैंने देखा है 

मिट्टी में गड़े पैरों की दरारें

कुहरे संग अडिग खेतों में खड़ी परछाइयाँ

कर्ज में दबे हृदय के चेहरे पर मुस्कान

कच्ची दीवार से भुर-भुराती पक्की संवेदनाएं

चूल्हे की आंच के आसरे सोये जांत 

आभाव में भाव धारण किये झुके कंधे

छान्ही के तले पुआल पर पड़ा सिकुड़ा जीवन...।

मैंने देखा है 

झोपड़ियाँ उजड़ते 

चूसे खून के गारे से बनी 

राख के ढेर पर बनी भव्य इमारतें 

चिमनियों के धुँए में मरते खेत और पेड़

हरे पेड़ों के बेहतरीन ताबूत पर अगराये शहर

खेतों की हरियाली को कंकरीट में बदलना      

धरती को बचाने के लिए नही

नायकत्व धारण कर इसे नष्ट करने को आतुर लोग...।

मैंने देखा है 

सत्ता के बदलते रूप के बीच

लोकतंत्र के चूहों द्वारा अन्न की बोरियाँ कुतरते  

धरती की कोख से पैदा भाग्य विधाताओं के 

पंजे में दबे भूखे, कुपोषित और बेघर जन

सत्य से अनजान पालतू सुग्गों की उम्मीद 

कि मंच और मंच से बाहर का नाटक सही चल रहा 

साज़िश में लिप्त महलों को पता नही

कि नही उखड़ते लाख कोशिशों के बावजूद 

नदी-नाले, खेत-बघार और जमीन से उगे लोग...।

(4).

हस्तक्षेप जरुरी है

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एक टटका फूल रोज खिलता है

ओस से भीगा निर्दोष लाल फूल

रोज सुबह उम्मीद की पेट से 

सुनहली गुनगुनी धूप निकल आती है 

बच्चों के मुँह में दाना डालकर 

रोज चिड़िया पंख खुजा रही होती है 

रोज खुली धूप में आलोचक 

खरगोश की आँखों के चटक रंगों को नकार

बकरियों को घास चरते देख खूब खुश होता है....।

सब कुछ ठीक है

तो यह क्या है जो मन में गड़ता है

क्या है जो रोज कील सा चुभता है 

यहाँ सब कुछ ठीक करने का शोर बहुत है

पर वह सच्चाई से कतराकर गुजर जाता है

दुःख के दुःख की पीठ में कील ठोकने वाले 

लोगों में श्रेष्ठ लोगों मुझे माफ़ करना 

इस महादेश में 

सत्ता के सामने नतमस्तक

तुम्हारा डरा मन रोज बजाता है आयातित बाजा

चट्टी-चौराहों, शराबखानों और सम्मेलनों में...।

हस्तक्षेप जरूरी है

मेरे मन में है भूख और हाथ में कलम 

धार का मुकाबला कलम की नोक से है

मेरे कविता के सहमे पैर 

उस वंचित कुनबे की ओर अनायास बढ़ जाते हैं

जहाँ ऐसे ख़ुशामद मौसम में भी 

पेड़ पर टंगे हैं कर्ज में डूबे लोग

जिनकी मुठभेड़ हर वक्त होती है ताकत से

जहाँ तन के खड़े होने मात्र से बढ़ जाती है

अकड़, अश्लीलता, मठों और तंत्र की मार....।

(5).

गाँव नही मरते

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घोषणा हो चुकी है

कि अब कोई गरीब नही रहा 

विकास के बड़े-बड़े दावे के बीच

कुछ कहना-सुनना ठीक नही समझा जाता...

जब फटी छाती वाली धरती चीखती है

तब मुहावरेदार अर्थ निकलते हैं

कि झोपड़-पट्टियाँ खतरनाक हो चली हैं

और कुछ बंद रास्ते 

वक्त आने पर ही स्वयं ही खुल सकते हैं...। 

इस शोर में

आओ तलाशते हैं

कुहरे से घिरे इलाके में राह

जहाँ कुहरा जल रहा है आग की तरह...

वहाँ तंत्र की गरमी से 

नही जल जाते हैं अपने गाँव

पर सत्ता के इंद्रजाल से भींग जाते हैं 

तब जरूर जब मुखौटेधारी 

सत्ता का खून पसीना बन जाता है 

और वही पानी चुल्लू भर पानी में डूब मरता है....।

यह निर्विवाद है

कि रास्ते हर जगह होते हैं 

दीवार के भीतर कठोरता में

नदी के बहाव के बीच में 

खेतों की कट चुकी डँड़ारों पर

अँधेरी रातों और अनिश्चय के जखाड़ में...

रास्ते कभी नष्ट नही होते 

वे अपनी जीवन्त भूमिका में 

खो जरूर जाते हैं 

मगर जमीन पर आश्रित गाँव मरते नही है....।

      समीर कुमार पाण्डेय

        बलिया