बुधवार, 16 मार्च 2022

समकाल : कविता का स्त्रीकाल-35


रीता दास राम   की कविताएँ




1. 
युगीन स्त्री-पुरुष 

व्यवस्था के साथ 
परपराओं की आड़ में 
रीति-रिवाजों पर चलते 
संस्कृति की छांव में 
संस्कारों की जुगाली करते 
पुरुष बसाना चाहते है घर ... 
सपनों की कल्पना में 
प्रेम की डाल पर 
तितलियों से प्रकाश में 
धानी चूड़ियों की आवाज में 
रेशम की नमी और कोमलता थामें 
धमनियों में बहते रक्त की लाली संग 
स्त्री बसाना चाहती है घर ... 
घर बसता है 
व्यवस्था, परंपरा, रीति-रिवाज़, संस्कृति, संस्कारों को 
बदलते हुए 
स्वप्नों, कल्पना, प्रेम, प्रकाश, आवाज, नमी, कोमलता और रक्त को 
रखते हुए ताक पर 
ये हर युग का बदलाव 
वक्त के हस्ताक्षर पर 
यंत्र चालित सा उभरता सत्य है 
बस पृथ्वी को घूमते चले जाना होता है 
होते हुए सूर्य से प्रकाशित 
परिवर्तन की नियति को स्वीकारते हुए 
बसते हुए देखना जीव की नैसर्गिक पराकाष्ठा 
समाज़ पर लगा वेदना का पैबंद  
संतुष्टि की घोषणा का अघोषित सत्य।  
 
2. 
इंसान 

गीला मन 
भीगी भीगी औरतें 
भरी-भरी आँखें 
पसीने से तर-बतर 
संस्कृति की जुगाली पर 
खींच रही जिंदगी 
खोलते हुए बंधन 
एक एक इंच गांठ 
गर्भाशय को मशीन 
शब्द से करते हुए आज़ाद 
इंसानी दर्जा दिलाते हुए खुद को 
विकलांग समाज़ की 
सदियों से करते हुए सेवा 
सहूलियत, सफाई, भूख, जरूरत मुहैया कराती हिस्से की आस 
इंसानी पैदावार के लिए की जाती है इस्तेमाल 
पाठ, उपवास, मान, सम्मान, ऊंच, नीच, सही, गलत, सबमें हिस्सेदारी 
निठल्ले घूमते पुरुषों की बनती जूठन  
संस्कार, बच्चे, रिवाज़, परंपरा सब है इसके जिम्मे 
शरीर, वासना, इच्छा, बहकना बेगानी मिल्कियत  
स्वेच्छा से किया एक संभोग जिंदगी का कलंक 
बलात भोगे दस पुरुष वह भी इसका दोष 
सारे कुकर्मों से रिश्ते इसके 
बेटियाँ बनाई जाती है पराई 
बहू को अपनाता एहसान जताता सामाज  
पुरुष के बाद पाती दुय्यम स्थान 
स्त्री अब बोलने लगी खुलेआम  
बीती जिंदगी के राज़ खोल रही है 
घर से बाहर निकल रही है या निकाली जा रही है  
रीति-रिवाज को मनमाना निभा रही है 
परिवार को किचन का रास्ता दिखा रही है 
अपनी मर्जी जीने को है उत्सुक 
पुरुषों के आदेश करने लगी है ख़ारिज  
लिव-इन में रहना चुनाव कर रही है 
शरीर को समझने लगी है अपना 
क़लक़ मान सम्मान मानती है सब अज्ञानी बातें 
औरत खुद को औरत ही नहीं, अब इंसान कहलाने लगी है।  
3. जरूरतों की ख़ातिर प्यार 
हथेलियाँ भर थी खुशियाँ 
पत्थर तोड़ना चाहती थी
जब जब रीति-रिवाज बदले 
भरना चाहती थी संस्कृति के छेद 
बोल के बता दिए गए नहीं बोलने के कारण 
बड़बड़ाती रही खामोशी में बदहवास 
उपेक्षित छोड़े झड़ते सपने 
उलीचती रही हकीकत की स्याही  
जबकि सपनों को मुट्ठी में बंद कर दिया गया 
नहीं पहचानी दर्द और खुशी की अलग परिभाषा 
फूल को फूल कहा और चाँद को चाँद 
रोशनी वाले अंधेरे भर-भर के दिखाई पड़ते रहे 
बंधन-मुक्त होना चाहा जब 
विशेषण जकड़ते रहे, हड़बड़ाते 
दृश्यों में चाहती थी तैरना 
ख़्वाहिशों में डुबोते रहे तुम 
 
पूरे पंख फैलाकर उड़ने से पहले देखा 
चमगादड़ की तरह अंजान शिकायती मूक दृष्टि तुम्हारी  
खत्म कर दी थी आजादी गृहप्रवेश के बाद 
पूरे घर की चाहत के लिए 
उसने तलाश ली मुट्ठी भर श्वास 
आज गठरी सी जिंदगी आदत है 
निहारते हुए अपलक कहा जाता है प्यार 
प्यार की खोज में बीती जिंदगी ढोती देखती रही 
जरूरतों की खातिर प्यार होता रहा। 
 
4. पटरी 
कैसे कैसे लम्हों से मिलती हुई 
पटरी सी पड़ी पड़ी छिलती हुई 
मैं देखती गाड़ी धड़धड़ाती गुजरती हुई 
और आवाज़ आवाज़ में धुल जाती 
जब जब आँखें मुँदें मैं खुद से गुजरती 
जाने कितने डिब्बे चले जाते 
शब्दों के विस्फोट से कांप जाती 
छाती पर पटरियों की चिंगारी बसती 
घुटती साँसे पत्थरों-सी मार सहती 
जब जब आँखें मुँदें मैं खुद से गुजरती 
देह पटरी-सी गर्द, धक्कड़, धूप में भी 
वितृष्णा दबाए पड़ी पड़ी तड़कती 
उजाले में भी रोशनी का इंतजार करती 
हर बार नई ठेस रोशनी की ओर तोड़ा और सरका जाती 
जब जब आँखें मुँदें मैं खुद से गुजरती 
गोल पहियों से वक्त घूमते जाते 
छूते पास आकर दूर चले जाते 
घूमते पहियों के छेदों को घूरती 
गिनने की असंख्य कोशिश करती 
जब जब आँखें मुँदें मैं खुद से गुजरती 
अक्सर पटरी की ये कल्पना मेरी 
मेरे और कल्पना के बीच होती 
और वह चिकनी, सपाट समानांतर पटरी 
मुझे हमेशा जिंदगी के रूबरू लगती 
जब जब आँखें मुँदें मैं खुद से गुजरती। 
 



5. 
पुरुष (आजकल में छपी) 


फैल जाती है 
भीतर इक नदी 
जब जब तुम 
सिंदूर लगाती हो 
तितर-बितर हो जाता है चाँद  
जब माथे पर 
बिंदी सजाती हो 
बौखला हो जाती है चाह 
चूड़ियों सी मिल जाती है 
दिशाएँ जब छोरों पर 
मैं पूरा औंधा लेटा होता हूँ तुम पर 
जब-जब सूर्य चमकता है 
तेज़ देता पृथ्वी को 
तुम हौले से उतरती हो देह में 
बन तरल चाँदनी 
तुमसे तुम्हारे सारे राज़ 
जान लेने को उत्सुक मैं 
पल-पल हारता हूँ 
तुम्हारी आगोश में 
कोशिश पर की गई अनन्य कोशिश 
मुझे नुक्कड़ पर 
खड़े होने का आभास कराती है 
जब भी तुम 
बंद हो जाती हो खुद में 
मैं मौन तोड़ना चाहता हूँ 
एक आल्हाद भरी चीख़ 
में तब्दील देखना चाहता हूँ 
तुम तृप्ति बनती हो जब 
तेज़ बिखरा जाती हो मुझे 
मुझसे मेरा सत्य जान लेने के बाद 
मेरी ही नज़रों में 
करते हुए मुझे ख़ारिज़ ... ए स्त्री 
जागती हो मेरे भीतर 
अपूर्ण अनंत तक 
हर कदम
जीता हूँ यह सत्य 
जब जब निहारता हूँ तुम्हें।  





परिचय – डॉ. रीता दास राम
नाम :-  डॉ. रीता दास राम  
संप्रति : कवयित्री / लेखिका 
शिक्षा : एम ए., एम फिल, पी.एच.डी.(हिन्दी) 
      मुंबई विश्वविद्यालय, मुंबई.  
जन्म :- 1968 नागपूर. 
वर्तमान आवास : मुंबई                                                  
पता :- 34/603, एच॰ पी॰ नगर पूर्व, वासीनाका, चेंबूर, मुंबई – 400074.  
मो॰ न॰ – 09619209272. 
ई मेल :- reeta.r.ram@gmail.com
कविता संग्रह :- 
    1. “तृष्णा” प्रथम कविता संग्रह 2012.
    2. “गीली मिट्टी के रूपाकार” दूसरा काव्यसंग्रह 2016 में प्रकाशित। 
कहानी :- ‘लमही’(2015), ‘गंभीर समाचार’ (2018) , ‘मनस्वी’ 2018 एवं ‘आजकल’-मार्च 2019, ‘छतीसगढ़ मित्र’ (2020) पत्रिका और प्रतिलिपि (ब्लॉग) में कहानी प्रकाशित। 
यात्रा संस्मरण : ‘इजिप्ट’ पर ‘नया ज्ञानोदय’ एवं ‘भवन्स नवनीत’ में संस्मरण प्रकाशित। 
स्तंभ लेखन :- मुंबई के अखबार “दबंग दुनिया” 2015 में और “दैनिक दक्षिण मुंबई” 2016 में स्तंभ लेखन।  
साक्षात्कार : 
1. ‘हस्तीमल हस्ती जी’ का साक्षात्कार मुंबई की ‘अनभै’ पत्रिका में प्रकाशित। 
2. कवि, आलोचक प्रोफेसर (मुंबई विश्वविद्यालय) ‘डॉ. हूबनाथ पाण्डेय’ का साक्षात्कार ‘बिजूका’ ब्लॉग में।  
3. साहित्यकार डॉ. असग़र वजाहत से फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती पर संवाद वीडियो यूट्यूब पर।              
सम्मान :- 
   1. ‘शब्द प्रवाह साहित्य सम्मान’ 2013, तृतीय स्थान ‘तृष्णा’ को उज्जैन।  
   2. ‘अभिव्यक्ति गौरव सम्मान’ – 2016 नागदा में ‘अभिव्यक्ति विचार मंच’ नागदा की ओर से 2015-16 का। 
   3. ‘हेमंत स्मृति सम्मान’ गुजरात विश्वविद्यालय अहमदाबाद 7 फरवरी 2017 में ‘गीली मिट्टी के रूपाकार’ को ‘हेमंत फाउंडेशन’ की ओर से। 
   4. ‘शब्द मधुकर सम्मान-2018’ मधुकर शोध संस्थान दतिया, मध्यप्रदेश, द्वारा ‘गीली मिट्टी के रूपाकार’ को राष्ट्र स्तरीय सम्मान। 
   5. ‘आचार्य लक्ष्मीकांत मिश्र राष्ट्रीय सम्मान’ 2019 की घोषणा, मुंगेर, बिहार से। 
कवियों की संग्रहीत कविता संकलन में मेरी कविताओं को स्थान : 
1. गौरैया (मध्यप्रदेश) 
2. शब्द प्रवाह, वार्षिक काव्य विशेषांक (मध्यप्रदेश) 
2. समकालीन हिन्दी कविता भाग 1 (आरा, बिहार)  
3. साहित्यायन (मध्यप्रदेश) 
4. मुंबई की कवयित्रियाँ (मुंबई) 
5. चिंगारियाँ (मध्यप्रदेश)                                   
विभिन्न पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित :- 
‘मृदंग’ (2020), ‘नवनीत’ (2019) ‘चिंतन दिशा’ (2019), ‘आजकल’ जनवरी 2018 (दिल्ली), ‘वागर्थ’ जुलाई 2016, ‘पाखी’ मार्च 2016 (दिल्ली), ‘दुनिया इन दिनों’ (दिल्ली), ‘शुक्रवार’ (लखनऊ), ‘निकट’ (आबूधाबी), ‘लमही’ (लखनऊ), ‘सृजनलोक’ (बिहार), ‘उत्तर प्रदेश’ (लखनऊ), ‘कथा’ (दिल्ली), ‘व्यंजना’ 2019 (कानपुर), ‘आचार्य पथ’ 2018 (रायबरेली), ‘जीवन प्रभात’ 2018 (मुंबई), ‘युग गरीमा’ मार्च 2018 (लखनऊ), ‘अनभै’ (मुंबई), ‘शब्द प्रवाह’ (उज्जैन), ‘आगमन’ (हापुड़), ‘कथाबिंब’ (मुंबई), ‘दूसरी परंपरा’ (लखनऊ), ‘अनवरत’ (झारखंड), ‘विश्वगाथा’ (गुजरात), ‘समीचीन’ (मुंबई), ‘शब्द सरिता’ (अलीगढ़), ‘उत्कर्ष’ (लखनऊ) आदि पत्रिकाओं। 
वेब-पत्रिका/ई-मैगज़ीन/ब्लॉग/पोर्टल :- ‘मृदंग’ अगस्त 2020 ई पत्रिका, ‘मिडियावाला’ पोर्टल ‘बिजूका’ ब्लॉग व वाट्सप, ‘शब्दांकन’ ई मैगजीन, ‘रचनाकार’ व ‘साहित्य रागिनी’ वेब पत्रिका, ‘नव प्रभात टाइम्स.कॉम’ एवं ‘स्टोरी मिरर’ पोर्टल, समूह आदि में कविताएँ प्रकाशित।  
रेडिओ :- वेब रेडिओ ‘रेडिओ सिटी (Radio City)’ के कार्यक्रम ‘ओपेन माइक’ में कई बार काव्यपाठ एवं अमृतलाल नागरजी की व्यंग्य रचना का पाठ।  
प्रपत्र प्रस्तुति : एस.आर.एम. यूनिवर्सिटी चेन्नई, बनारस यूनिवर्सिटी, मुंबई यूनिवर्सिटी एवं कॉलेज में इंटेरनेशनल एवं नेशनल सेमिनार में प्रपत्र प्रस्तुति एवं कई पत्र-पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित। 

समकाल : कविता का स्त्रीकाल-36


चन्द्रकला त्रिपाठी की कविताएँ

1)-



 राजा को अभिनेता पसंद आता गया

उसका प्रजा पर असर ज़ोरदार दिखा

प्रजा वैसे तो कोई मुश्किल न थी

मगर ऐसे तो थी कभी और बहुत ज्यादा थी


राजा ने शिक्षा ली अभिनेता से मगर कहा इसे

गुप्त रखना

अभिनेता को भी दुनिया से यह रिश्ता छिपाना था

उसे प्रजा के हिए में अपनी जगह नहीं घटाना था


राजा ने कहा उसे प्रजा पर प्रभाव के मौके पर आंसू चाहिए

अभिनेता अचकचाया और अपना भेद बता गया

आंसू के मौके पर वह असली आंसू रोता है

अभिनय उसका इतना भी छल नहीं है कि वह रोने का

दिखावा करे

इन दिनों तो उससे हंसना हो ही नहीं पाता है

दिल में उसके मां के शव से चिपका एक बच्चा बिलखता है

इन दिनों कारोबार मंद है सबका

कोई भी कैसे भी प्रदर्शन में नहीं हिलगता


सुन रहा था सुकवि

उसने अपने भीतर बसे मुसाहिब को संभाला

राजा से कहा प्रभु

रोना बहुत आसान है

और प्रजा भी 

आंसू कौन देखता है

मुद्राएं संभाल लें


देखिए ऐसे

नहीं तो ऐसे 

सुकवि का चेहरा सिकुड़ता फैलता रहा

राजा अचरज से

चेहरे का बिगड़ना 

लटकना देखता रहा


आंसू पर चली बात तमाशा हुई जा रही थी

अभिनेता शर्मिंदा था

वह एक्ज़िट के बारे में सोच रहा था


ख़ैर

चंद्रकला त्रिपाठी

------

2)-

 राजा ने कहा  ,



 मेरी प्रशंसा में लिखो

कवि को बहुत कम शब्दों की जरुरत पड़ी 

चिकने चपटे शब्दों से काम चल गया 

व्यंग्य की

वैदग्ध्य की

करुणा की 

गुंजाइश ही नहीं थी

जो ललित कलित चाहिए था उसे

यहां वहां

इसके उसके गद्य पद्य से उठा लिया


फिर भी निचुड़ उठा कवि

असली मुश्किल पेश आई व्यंग्य का गला घोटने में

आंखों में कील जड़ने में

करुणा को दरबदर करने में

निचुड़ उठा


राजाओं को कवियों की कहां कमी पड़ी कभी

कवि था कि गुम हो गया


कलेजे में गड्ढा लिए कवियों के पीछे 

अर्थियां  घूमती हैं


कुछ हैं जो राजाओं से ज्यादा

राजकवियों से डरते हैं


ख़ैर .....


चंद्रकला त्रिपाठी


-----



3)-



सड़कें चाहने लगीं हैं कि वे इन दिनों मखमल हो जाएं


मौसम नम होना चाहते हैं


आग भस्म कर देना चाहती है प्रेम के सारे प्रदर्शन


पृथ्वी हिल रही है कि सही करवट जीना चाहती है


पत्थर शोक में हैं कि वे इतने पत्थर तो नहीं थे


 मसखरे क़समें उठा रहे हैं कि उनके जुमले झूठे नहीं होते

बस नकाब खींचते रहे हैं


जानवर चाहते हैं कि वे भी कोई किताब लिखें इंसानों के बारे में

लिखें कि उनके लिए बेरहम होने का अर्थ इंसान होना हुआ जा रहा है


 चीलें गिद्ध सियार सभी मरघटों पर इतनी बरक़त नहीं चाहते थे

इतना बड़ा नहीं है उनका पेट


माएं अब बांझ होना चाहती हैं


बद्दुआएं हैं कि हैरान हैं 

वे सही जगह लगती ही नहीं


चंद्रकला त्रिपाठी

--------


4)-


बहुत दिन बीत जाने पर

 वह परछाइयों में घुल जाता है


हंसने के ढंग में

चुप्पी होकर धड़कता है 


संगसाथ में दोस्त की तरह बरतता है


ऐसा तो कोई नहीं होता इतना टिक कर रहने वाला

दुःख की तरह का


इस दुनिया में कौन है ऐसा जिसे

कहीं जाने की कोई हड़बड़ी नहीं


5)-


धीमें बहुत धीमें चलती दिखती हैं चींटियां 

बेसब्री दिखाने भर काया नहीं उनके पास 


 बहुत झुक कर नहीं उड़ते पक्षी 

हवा छितराने के लिए भी नहीं 


बहुत दिनों से सन्नाटा है इधर

उन्हे तो इधर का ही पता है


सूख चुका है बगल की बस्ती का हैंडपंप

अगल की कॉलोनी में पानी अभी बाक़ी है


बांध कर ले जाया जा रहा है भगेलू

उसका असली नाम भी अब यही हो गया है

पांच बजे बंद कर देनी थी अंडे की दुकान

वह आठ बजे अपने ठेले के साथ पकड़ा गया 

पीछे पीछे दौड़ती जा रही है नसीमा

चिल्ला नहीं रही है

सिर्फ़ बिलख रही है 


उसके पीछे कोई खोल ले जाएगा उसकी बकरी

आसपास बहुत दिनों से उपवास चल रहा है


नीरज को अब से आधी तनख्वाह भी नहीं मिलेगी 

सुधा को नहीं मिल रहा है साड़ियों में फाल टांकने का काम भी

पढ़े-लिखे दोनों भीख मांगने में हिचकते हैं

छ: महीने के छोटे बच्चे के लिए भी जीना नहीं चाहते


किसी की कुंडी खटकी तो पृथ्वी तक कांप गई

क्या है ? कोई कुरस हो कर चिल्लाया 

स्त्री ने फोंफर से देखा उस दूसरी स्त्री को

उसकी उम्र कम थी और वह कांप रही थी

 उसके हाथ में गीली हुई पर्ची कांपती इस हांथ में चली आई और वह स्त्री अदृश्य हो गई

फोन नंबर था उस पर एक

पानी से पसर गए थे नंबर मगर बाक़ी थे


क्या है क्या है ?

वाली आवाज़ सख़्त थी 

दूसरों के झमेले में कोई नहीं पड़ता आजकल


बहुत दिनों से उस घर में स्त्री के नहीं होने की आवाज़ है

बाक़ी आवाज़ें अब ज़्यादा हैं , जैसे घिसटती हुई रुकतीं है बड़ी गाड़ियां और

सन्नाटे में किसी के नहीं होने को बार बार सुना जाता है


स्त्री ने हिम्मत करके उस नंबर पर फोन कर दिया मगर तब नहीं किया जब 

ख़त्म होने से पहले कुछ बचा लिया जाता है


बचा तो वह भी नहीं

वह छ: महीने का बच्चा भी


चंद्रकला त्रिपाठी



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परिचय

चन्द्रकला त्रिपाठी

नाटकों का निर्देशन और अभिनय भी। अकादमिक क्षेत्र की महत्त्वपूर्ण समितियों की सदस्य

शुकदेव सिंह स्मृति सम्मान गाथांतर सम्मान सुचरिता गुप्ता अकादमी सम्मान



किताबें : कविता संग्रह - वसंत के चुपचाप गुजर जाने पर , नेशनल पब्लिशिंग हाउस नई दिल्ली

शायद किसी दिन , नमन प्रकाशन नई दिल्ली

कथा डायरी ,इस उस मोड़ पर अंतिका प्रकाशन

आलोचना , अज्ञेय और नई कविता 

आलेख कविताएं कहानियां , हंस कथा देश पूर्वग्रह,वागर्थ , रचना समय आलोचना, वसुधा, पल प्रतिपल वगैरह में

दूरदर्शन, आकाशवाणी के दिल्ली लखनऊ गोरखपुर वाराणसी इलाहाबाद केंद्रों से वार्ताएं साक्षात्कार वगैरह प्रसारित

यूजीसी कैरियर अवार्ड प्राप्त

42 वर्ष बीएचयू में अध्यापन और महिला महाविद्यालय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राचार्या पद से रिटाय-

समकाल: कविता का स्त्रीकाल-30

आसिया नकवी की कविताएँ

1

 दो  कलाकार 

पहला नाम से फिदा 
दूसरे पर  कुछ लोग फिदा 

पहले ने दुनिया रंगों से भर दी 
दूसरे ने नज़रयाती जंगों  से भर दी 

पहला सैकड़ों अल्फाज़ एक तस्वीर में भर देता 
दूसरा सैकड़ों जुमले  एक तकरीर  में भर देता 

पहले ने इज़हार को फरोग दिया 
दूसरे ने इज़हार को रोक दिया 

था पहला भी कलाकार 
है दूसरा भी कलाकार


2

रंग 

(एक )

बदल दिए जाते हैं रोज कविताओं के कपडे, 
कभी लाल, कभी भगवा और कभी सफ़ेद.
हरा माना जाने  लगा है ज़हरीला रंग. 

रोज़ खाने में परोसे जाते हैं 
अलग अलग रंग रूप के शब्द
और हद तो यह है, कि खाने में हरा हरा ना हो 
तो सब लाल हो जाता है

(दो)

लोग चाहते हैं 
कविताएँ भी बदलें कपड़ों की तरह 
बासी खाना और बासी कविताएँ 
अक्सर लोगों को रुला देती हैं. 
लगता है कल ही स्टॉक आउट हुआ है 
थ्रिल का बाज़ार 

(तीन )

हत्या हत्या होती है 
ब्रेकिंग न्यूज़ की हत्या तक
सब कुछ कितना रेपेटिटिव है. 
लोग चाहते हैं 
रोज़ बदलना चाहिए 
ख़ून का रंग. धर्म का रंग. 
खाने का रंग. रंगों का रंग
.......

इंसानों से जब मन जायेगा भर
ढूंढ लूंगी कोई  ऐसा  घर

बस्ती होगी  जहां ख़ामोशी  सूखी  घास 
और  संवेदनाओ की बेहोशी

वहाँ न  होगा  आदमी  जैसा  कुछ 
सब सम्बन्धों के परिमाण होगें 
शुन्य  एवं तुच्छ  



3
आइनों से डरने वाला आदमी.

उसकी उंगलियाँ उससे पहले उठती हैं
छोड़ कर पीछे उसकी मुट्ठी
पूर्णता एक ऐसी चीज़ जो वो खोजता है दूसरों में
और परछाईं से डरता है.
दिन शुरू करता है पोतते हुए आइनों पर कालिख,
दांत चमकाते हुए और
दुनिया का मखौल उड़ाते हुए.
अपने अन्दर की उपेक्षा कर देता है वो.

२.
उसकी कमाई हैं आँसू और अपशब्द.
जो सोख लिए जाते हैं उसकी अंतरात्मा के साथ.

३.
लेकिन आँसू कैसे काले करता वो?
उन्होंने हमेशा वही किया जिनसे वो डरता था.

दबी हुई अंतरात्मा....वापस मुखर...
आईने में उसकी परछाई.,,

४.
कोई मखौल नहीं
कोई चमकाना नहीं दांतों का.
बस दर्द पैदा होता है उसके अन्दर,
दर्द
 जिससे कवि पैदा होता है.

4
 कुछ  कैदी   हैं  जो  रिहा  किए जा   रहे  हैं 
कुछ  रिहायी  है  जो  कैद  की  जा  रही है 

नसलों  को  भी  मस्लों  को  समझना  होगा  
फसलों  को  भी  खेतों  को  समझना  होगा 

औरत  हूँ  तो  आवाज़  तो  हो  सकती  नही
सच्ची  हूँ  तो  बेगुनाह  तो  हो  सकती  नहीं 

इस  दौर  ए  जाहालत  का  है  अंदाज  यही 
जो  तख्ता  ए  हाकीम  है  ऐजाज़  वही 

की  हामला  भी  हमलावार  हो  गयी  आज 
की  खामोशियां  भी  जुमला  वर  बन  गयी आज 

उठो  की  शोर  थम   गया  अब  तो 
उठो  की  नब्ज़  जम  गयी  अब  तो 
उठो  की  उड  ना  जाए  रंग  ए  बाहार 
उठो  की  मिट  ना  जाए  दौर  ए ज़रग

.......
5
 एक कमरे के आगे 

वर्जिन्या वुल्फ़ कहती हैं कि हर स्त्री के पास लिखने के लिए अपना एक कमरा होना चाहिए. भारत में सिर्फ़ यही दबाव नहीं है जो स्त्री पर काम करता है. शायद एक कमरा देकर क़ैद करने की कोशिश के ख़िलाफ़ लड़ते हुए लिखना बहुत पीछे रह जाता है. कई कई दिन बाद लिखना और फिर रोज़ दुनिया के और कविता के चलते पैदा हुए डिसिलूज़न से जूझना थका देता है . 

मैने बरसों बाद 
अकेले ख़ामोश बेदम  बक्से को खोला 
उसके ऊपर  जमी धूल  के कण झूम उठे -
अपने जी   उठने के  जश्न  में इस बात से बेख़बर 
कि  इतने  लम्बे अरसे से  अपने  अंदर क्या दबा  रखा था . 

सबसे ऊपर पड़ी जज़्बात  की पोशाक बोसिदा हो चुकी है 
एहसासात भी कुछ बेहतर नहीं हैं - उनके    चिथडों  पर  खिलखिलाते दीमक रेंग  रहे हैं. 
हक़ीक़त के रंग फींके हो  गए हैं . 
ख़ुदपसंदी का क़द छोटा हो गया है, 
नज़र तो  मजमे में नज़रअन्दाज़ हो जाएगी 

कोई तो है जो चमक रहा है 
शायद बिरादरी स्टोर  से  ख़रीदा दिखावा  है . 


आसिय


परिचय : 
आसिया नकवी  
कवि एवं ऐक्टिविस्ट. विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित. अंग्रेज़ी,हिंदी में समान रूप से लेखन. 
संप्रति : अध्यापन. जन्म : 30.06.1988. 
मोब: 7543028451 ईमेल: aaasiya.naqvi@gmail.com

बुधवार, 2 मार्च 2022

समकाल,: कविता का स्त्रीकाल-29

भगवती देवी हिमाचल की रहनेवाली स्त्री कविता के वृहद भूगोल की नागरिक हैं,स्त्री कविता का वर्तमान राजधानियों से निकल गाँव कस्बों की सीमा पार कर विभिन्न प्रान्तों की स्थानीय परिस्थितियों का चित्रण अपनी कविता में मुखर रूप से कर रहा है।भगवती चुपचाप हिन्दी स्त्री कविता में प्रवेश करती वह कवयित्री हैं जिनकी कविता स्त्री मुक्ति की छटपटाहट को बयां करती स्त्री विमर्श की धारा को मजबूत करती है।

माँ

मैं देख रही थी 
चुपके से 
खिड़की के झरोखे से
मां के माथे पर 
उभर आ‌‌ईं सिलबट्टे...

वहांनहीं थी वह
जहां दिख रही थी 
वह पढ़ रही थी
खोज रही थी खुद को 
65 की उम्र में...

जो बहुत पहले थी
इस समय हरगिज़ नहीं थी वह
उसके द्वारा बुने गए
तमाम सपने
तमाम उड़ाने और आकांक्षाएं
इस वक्त हवा में थी...

कहां गया उसका समय
जो उसकी मुट्ठी में था
कहीं फिसलता ही चला गया
रेत की भांति
जीवन की पगडंडी पर 
चलते चलते...

माथे की सिलबट्टे बताती
वह भरे पूरे घर में 
अकेलेपन का दंश झेल रही है
सबकी ज़िंदगियां बनाने के बाद 
अब वह कहीं नहीं थी...

उसी दिन निहार रही थी शीशा
तलाश रही थी वह  खुद को
झुर्रियों से भरे चेहरे में...

आज वह थकी हुई
बैठी थी चूल्हे के पास...
बस चूल्हा ही था
जो उसे भीतर तक समझ पाया
भरे पूरे घर में...
वही एक खास साथी निकला
जिससे मां जीवन के गूढ़ रहस्य 
साझा करती
और तृप्त रहती...

*************
अहसास

जब मुझे आदेश मिला 
घर पर रहो 
मैं घर पर रहने लगा
आबोहवा ही ऐसी थी 
कि खुद के साथ - साथ 
सबको सुरक्षित रखना था 
एक बेहतरीन नागरिक की 
ज़िमेदारी थी मुझ पर 
मैं ज़िमेदारी को निभा रहा था 
घर पर ...
 पहले दिन के बाद 
 मुझसे रहा नहीं गया 
 मैने कुछ  युक्ति  बनाई 
 पत्नी संग हाथ बटाया
 बहुत रीझ से बनाया 
 फास्ट फूड 
 और फोटोशूट के बाद 
  रेसिपी का स्वाद 
  आभासी दुनिया को खूब दिलाया
  मेरा ये कार्य केवल  
  हफ़्ते भर ही चल पाया 
 उसके बाद दिमाग की नसों ने 
 फट्टना प्रारंभ  किया
 बाहर वालों से घर पर बैठने 
 के तरीके पूछे 
 सबने अपनी-अपनी युक्ति बताई ।

 इतना सब होने के बाद 
 घर पर रहने का राज़
 नहीं मिल पाया।

अचानक उसकी नज़र 
धर्मपत्नी पर पड़ी 
सोचने पर मजबूर हुआ 
 कि इस स्त्री ने 
 घर पर ही चुप्पी साध
 जीवन की पगडंडी पर
 कैसे चलती रही 
 उसे मालूम पड़ा 
 कि यह स्त्री बन्द दीवारों में कैसे 
 खुश रह लेती है 
 दिमाग और शरीर में
 नसे क्यों नहीं फूलती 
 वह कैसे घर पर रहकर 
सबका भविष्य संवार देती हैं 
वह कितनी बड़ी कलाकार है
जब उसे कोई चुप करवाता है 
वह चुप हो जाती है 
जब उसे कोई बुलबाता है 
तो वह बोलने लगती है 
वह इतनी सदिया 
आदेशानुसार ही चली 
और चुप रहकर जीती चली गई ...
ऐसे दौर ने
स्त्री के रहस्य से वाकिफ़ करवाया
कि वह बन्द कमरों में कैसे खुश रह लेती है 
पूरा जीवन इन भीतरी दीवारों में 
कैसे जी लेती है।

************
 उदास सड़क 

देखा कभी सड़कों को उदास 
गलियों को रोते हुए 
मैने देखा है 
सड़कों को सुबकते हुए 
21वीं सदी में...

21वीं सदी में इंसान के लिए
एक समय बिल्कुल थम गया
घर में कैद 
उसे होना पड़ा 
और छोड़ना पड़ा
सड़कों को सड़कों पर उदास।

ये ऐसा समय था 
जिसमें सड़कों पर से
नहीं थे स्कूल जाते बच्चे
नहीं था ठेले बाला 
नहीं था साईकल बाला 
नहीं था गाड़ी और रेलगाड़ी बाला 
हवाई यात्रा के पहिए भी 
रुक गए
ये ऐसा समय था 
कि पूरी दुनिया के डॉक्टरों
के रोंगटे खड़े थे
योगी गेट की सांसे भी 
फूल चुकी थी 
अन्तिम यात्री को  कंधा नहीं था
सड़कों के साथ 
पूरा संसार उदास था 
ये संदेह से भरा समय था 

ऐसे खौफ़नाक समय में 
डर पहली दफा महसूस किया।

**********




 डॉ भगवती देवी
 
हिन्दी में एम.ए, एम.फिल , पीएचडी ( जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू)
मैं हिंदी विभाग, जम्मू विश्वविद्यालय,जम्मू, 
जम्मू - कश्मीर में लेक्चरर (कन्ट्रैक्चुयल) हूं। 
 जम्मू - कश्मीर के सांबा जिला की तहसील घगवाल की वासी हूं। 
लेखन मेरी रूचि है। विभिन्न मंचों से काव्य पाठ । साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय रहती हूं ।विभिन्न पत्रिकाओं और ब्लॉग पर कविताएं प्रकाशित। विभिन्न जर्नल्स में शोध पत्र प्रकाशित।राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शोध पत्रों की प्रस्तुति। साहित्य के प्रचार प्रसार के लिए ' संदर्भ ' नाम की वेबसाइट और '  तवी ' नाम से यू ट्यूब चैनल ।

समकाल कविता का स्त्रीकाल-28



बाबुषा कोहली की कविताओं के बिंब अनूठे हैं,वह अपनी कविताओं में बिंबों के माध्यम से रहस्यमयी कविता लोक गढ़ती हैं ।मूलतः प्रेम की कवयित्री बाबुषा स्त्री जीवन और सामाजिक विसंगतियों को बड़ी संजीदगी से अपनी कविताओं में दर्शाती समकालीन स्त्री कविता की अपनी शैली की कवयित्री हैं।बाबुषा का शिल्प जितना सुघड़ है कथ्य उतना ही मजबूत है।


बाबुषा कोहली की कविताएँ

१.

सायकिल वाली लड़की


वह क़स्बाई लड़की अपनी मौज में सायकिल चलाती हुई 
कहीं चली जा रही थी

क्षण भर का यह दृश्य अपने आकार में इतना विराट था
कि अब तलक मेरी सपनाई आँखों में 
सत घट रहा है
यह अक्षुण्ण क्षण झरने लगता है कभी मेरी आँखों से
और कभी अँगुलियों से

इस दिव्य क्षण की उर्वर मिट्टी में 
खिल रहे शब्दों के फूल
अँधेरे काग़ज़ पर असंख्य सूरजमुखी उग रहे हैं

**

वह क़स्बाई लड़की अपनी मौज में सायकिल चलाती हुई  
कहीं चली जा रही थी

क्या सायकिल इस ढंग से चलाई जा सकती है 
जैसे कोई कहीं न जा रहा हो 
सिवाय अपनी ताल में नृत्य करने के ?
वह लड़की ठीक इसी तरह सायकिल चला रही थी 
मानो रास्ते पहले से ही उसके वश में हों
जब  चाहे तब वह दुनिया की सबसे मायावी सड़क को 
अपनी सायकिल के पहिये तले बिछा सकती हो

न ही वह किसी से बतिया रही थी फ़ोन पर, 
न ही कोई उसके साथ था
मगर वह मुस्कुरा रही थी सायकिल के पैडल पर 
बेफ़िक्री से पाँव मारते हुए

इस कोलाहल भरे समय में ऐसी एकाकी मुस्कुराहट
दुनिया की बड़ी घटना है

घृणा को तोते की तरह पाल कर रखने वाले 
इस दौर में मैं नहीं जानती 
उसकी गौरैया-सी उन्मुक्त मुस्कुराहट का रहस्य
पर यह तय है कि इस रुत के घने मेघ 

लडकी की मोहिनी मुस्कुराहट से बने हैं
मेरे हृदय को तर करते हुए--

(मैं कुछ अनुमान करने लगती हूँ
अम्म्म... 
हो न हो, लड़की प्रेम में है 
उसकी चुस्त काली कुर्ती 
किसी प्रतिरोध का प्रतीक नहीं, 
वरन इसका पसंदीदा पहनावा है )

दरअसल उसे प्रतिरोध की आवश्यकता ही नहीं !
उसकी बेपरवाह मुस्कुराहट 
दुनिया भर के फ़ासिस्ट अट्टाहास को ठेंगा है

उसकी अस्त-व्यस्त नारंगी चुन्नी भोर की एक किरण है 
रात के कालिम को काट कर धरती पर बिखरती हुई
काँधे छूते उसके लटकन हिल रहे हैं 
हौले-हौले आगे-पीछे
तमाम घन्टाघरों की घड़ी के काँटों को मात देते

( एकाएक ठहर गया समय 
मेरी कलाई पर बँधी घड़ी बंद हो गयी है )

मैं उसे कोई नाम देना चाहती हूँ
मसलन कि उज्ज्वला, मुक्ता, स्वयंप्रभा, 
अक्षुण्या या आकाशगंगा
मगर दे नहीं पाती

सायकिल चलाती मंद-मंद मुस्कुराती वह लड़की 
किसी नाम में समा सकेगी ?
उसकी सायकिल में वह गति है कि नाम तो क्या
समय और स्थान भी पिछले चौराहे पर छूट सकते हैं

जबकि उसकी बलखाती देह यह संकेत देती है 
कि उसे कहीं नहीं पहुँचना

( मानो उसे जहाँ पहुँचना था वह पहले ही पहुँच चुकी है )

उस लड़की को किसी पार्टी का 
चुनाव चिह्न होना चाहिए
( क्या नहीं ? )

क्या इस भरपूर मुस्कुराहट को पाने के लिए ही नहीं रहा है 
मनुष्यों का सारा संघर्ष ?

वह लड़की धरती पर घटा एक ऐतिहासिक दृश्य है
एक सच्ची क्रान्ति
और मैं-
कृतज्ञता से भरी हुई उसकी मूक दर्शक।

(कहीं ऐसा तो नहीं कि वर्ड्सवर्थ की भटकती हुई रूह अपनी 'सॉलिटरी रीपर' को ढूँढ़ते हुए मुझ में प्रवेश कर गयी हो और असीम सुख के इस क्षण में समय एक बार फिर से घूम कर चल पड़ा हो। )

वह क़स्बाई लड़की मंद-मंद  मुस्कुराते हुए
पैडल पर दे रही पाँव के हल्के थाप 
पृथ्वी घूम रही मगन 
अपनी लय में 

दुनिया के दोनों हिस्सों पर बारी-बारी से 
सुबह हो रही है



२.

रियाज़


तुम्हारी उजली चितवन में जितना भी कालिम है  
कष्ट है वह, प्रीत में तुमने जो पाया

उस सियाह के निःसीम आलोक में 
सीखते हो तुम संसार को देखना
इस नाते मैं-
तुम्हारी आँखों की पुतली हूँ

आँखें प्रायः दो कारणों से मूँदी जाती हैं
पहला, 
सत्य से बचने के लिए 
और दूसरा, सत्य को देखने के लिए

मेरे कंठ में थिरकती-फिरतीं सुरीली परियाँ जिन रागों की 
सुख है वह, प्रेम में मैंने जो गाया

वह राग हो तुम,
 हर गवैये से जो सधता नहीं
 कष्ट हूँ मैं ऐसा-
हर प्रेमी से उठता नहीं

चित्त की ऊँची शिला पर ध्यानस्थ हो तुम-
हवा का इकतारा लिए बैठी मैं
नरम दूब की चटाई पर 
चन्द्रमा की लौ में अपने अधसिंके सुरों का रियाज़ करती हूँ

३.

प्रेम की गालियाँ


तुम्हें औषध मिले, पीर न मिले
दृष्टि मिले, दृश्य न मिले
नींदें मिलें, स्वप्न न मिले
गीत मिलें, धुन न मिले
नाव मिले, नदी न मिले

प्रिय !
तुम पर प्रेम के हज़ार कोड़े बरसें
तुम्हारी पीठ पर एक नीला निशान तक न मिले


४.

पानी से बँधती है नाव 


पिता हँस कर पूछते कि कैसा वर खोजा जाए
मैं कहा करती वर स्वयं मुझे खोज लेगा 
पिता निश्चिंत रहे आए

महँगे उपहार नहीं चाहिए थे मुझे
न ही सुंदरतम उपमाओं से सज्जित कविताएँ
न ही जीवन बीमा सरीखे लम्बे व जड़ वचन

मेरे साथ रहने की न्यूनतम अर्हता इतनी सी थी
कि उसके शहर में एक नदी हो

जो पुरुष मेरे प्रेम में पड़े उनके शहरों में नदियाँ थीं
जो पुरुष मेरे द्वार की चौखट छू कर लौट गए 
वे नदियों के प्रेम में पड़े 

जो पुरुष नदी किनारे मेरे संग बैठे 
वे जान गए

कि तट से नहीं -
पानी से बँधती है नाव 


५.

मुझे अपनी नदी को कुछ जवाब देने हैं


जिन तितलियों को मैंने आँखों से छू कर छोड़ दिया
वे फूल-फूल बैठ कर 
लौट आईं मेरी कविताओं में महफ़ूज़ रहने

जिस प्रेम को छोड़ दिया मैंने एक कोमल धड़क से अस्त-व्यस्त कर
वह छूटते ही उड़ गया परिन्दा बन 
आकाश छू लेने

मेरे केश की कामना ने बाँध लिया है छूटा हुआ एक पंख उस फीते से
जो चन्द्रमा के दो उजले रेशों से बना है
आकाश के आँगन में सम्पन्न होने वाली उड़ानें
धरती पर किसी लड़की की चोटी से बंधी हैं
लड़की की " उँहू !" पर हिलती हुई चोटी से जूझती है रात
कोई जान नहीं पाता कि रात क्यों इस तरह लहकती है

अपने केश में उलझे इस पंख को एक दिन मैं नदी में सिरा दूँगी 
नदी उसे तट के हवाले करेगी
तट पर खेलती मल्लाह की नन्ही बेटी उसे अपनी स्कूल की कविता वाली किताब में रखेगी
किताब में बंद अधमरी चिड़िया उसे सहलाएगी

नन्ही जान नहीं पाती 
कि किताबों के पन्ने वायु की मति से नहीं फड़फड़ाते
पन्नों में हलचल दरअसल छूटे हुए पंख की फड़फड़ाहट है

सम्भव है कि नदी और उसका तट
मल्लाह की बेटी और उसकी किताब 
चिड़िया और पन्नों की हलचल
एकदम कोरी गप्प निकले
और सचमुच ! ऐसा होने में बहुत परेशानी नहीं है 
कि गप्प कई बार जीवन की इस तरह से देखभाल करती है
जैसे तो कभी-कभी कविता भी नहीं कर पाती 

कविता आख़िर करती ही क्या है ? 
वह तो महज़ तितलियों की सम्भाल में खर्च कर देती है अपना सारा कौशल
वह नहीं तोड़ती फूलों का भरोसा
वह रचती है रंग इन्द्रधनुष को उधार देने
वह बताती है दुनिया को कि ये आवारा चाँद किसके आसरे पे लटका है
वह सुनाती है नदी के तट पर मल्लाह की बेटी को किसी परिन्दे की कथा

उधर एक परिन्दा उड़ता ही जाता है आजीवन
इन्द्रधनुष का स्वप्न लिए आँखों में
बादलों की टहनियों पर बैठता है
भीगता है 
चोंच में दबाता है नमी के कुछ कण
फिर उड़ता है 
इन्द्रधनुष के पीले आँचल में अटकता है 
छूटता है भटकता है
इधर मल्लाह की वह नन्ही बेटी किताब से निकालती है पंख
मेरी कविता में डुबो देती है

मैं तितलियों को शुक्रिया कह आगे निकल जाती हूँ 
कोई लुभावनी-सी गप्प ढूँढने

मुझे अपनी नदी को कुछ जवाब देने हैं

__________




मंगलवार, 1 मार्च 2022

समकाल : कविता का स्त्रीकाल -27

यह समकालीन स्त्री कविता का सबसे सुन्दर समय है जब एक साथ हिन्दी में विभिन्न प्रन्तीय भाषाओं की कवयित्रियों ने मजबूत दखल बनाई है।मीता दास मूलतः बांग्ला भाषी हैं और बंग्ला के साथ -साथ हिन्दी में भी कविताएँ लिखती हैं।आपकी कविताओं के प्रतिरोधी तेवर आपको कात्यायनी की परम्परा से हिन्दी में जोड़ते हैं।समाज के दबे कुचले शोषित वर्ग के प्रति मानवीय करुणा आपकी कविताओं में व्यापक फलक पर उभरता है।मीता दास हिन्दी और बांग्ला के बीच की वह मजबूत सेतु हैं जो दो भाषा संसार की सांस्कृतिक चेतना से हमें रू-ब-रू कराती हैं।


मीता दास की कविताएँ


  { 1 }      ०००" चूहा भात - भात चूहा "०००    

                                         
                             
        चूहा भात - भात चूहा  
        भात चूहा हो या चूहा भात ...........ओ मुसहर 
        मुसुहा खा - खा कर बने हो मुसहर 
        और यहाँ सारे सरकारी हथकंडे जारी हैं तुम्हे भुलाने और 
        तुम्हारी उपस्थित को 
        दर्ज करने में कर रहे कोताही 
        ठेल रहे हैं बिलों में तुम्हारी सारी जनसँख्या को 
        
        तुम सब जिन्दा हो चूहों के लिए या चूहे जिन्दा हैं 
        तुम्हे जिन्दा रखने के लिए 

        कौन किसके लिए जिन्दा है ?

        चूहा सरकार 
        चूहा मुसहर 
        या चूहा भात या भात चूहा 

        सरकार के खोदे हुए बिल में 
        छुपे हुये है तुम्हारे जीने मरने के आंकड़े 

        सरकारी दाल खा गये दुकानदार 
        सब्जी खा गये चतुर जानवर …… 
        चांवल !
        दब गए खेतों में
        पाले की मार से और बच गये 
        चूहे 
       तुम्हार हिस्से 
       गोदाम में 
       किसिम - किसिम के चूहे 
        इस खेत , उस जंगल इस प्रदेश उस प्रदेश सभी ओर के चूहे 
        अब करते हैं
        आवाजाही 
        वे भी भूखे , कीटनाशक से त्रस्त 
        रोगों को वहन करती दौड़ पड़ती है अपनी जान बचाने 
        तुम भी भूखे नंगे , बेरहम पेट की ज्वाला से त्रस्त 
        पकड़ कर ही मानते , भात - चूहा को तरसते 
        खुदसा माझी ,बरहमु या चतुरा, एक्का 

        परिवार बड़ा , कुनबा बड़ा 
        चूहे तो उतने ही होंगे 
        जितनी उनकी प्रजनन क्षमता होगी या 
        मुसहरों , कीटनाशकों और नामालूम बीमारी से न मर गए हों 
        पर तुम्हारा क्या ...........मुसहर 
        तुम्हारे तो प्रजनन क्षमता के सारे मुफ्त सरकारी उपाय भी 
        है कालाबाजारी के हत्थे 
        हर कस्बे के मेडिकल शॉप में
        धड़ल्ले से बिक रहे मुंह मांगी कीमतों पर 
        कोई फैमिली प्लानिंग कैम्प भी नहीं चलते 
        न ही बंटता  हैं तरीके ही मुफ्त और न ही बंटते है सरकारी राशन 

        तुम्हारे भूखे - नंगे बच्चे और तुम 
        अनजानी अनचाही बीमारियों से मरकर ही इतने बचे हैं कि
        चूहा मिल ही जाता है एक आध 
        और तुम दो वक़्त की ही नहीं 
        एक वक़्त की कम से कम जुगाड़ ही लेते हो 
        भात - चूहा 
        केरोसिन पर नहीं 
        झाड़ - झंकाड़ जलाकर 
        भून ही लेते हो चूहा 
        और भात संग सान गटक जाते हो  
        अगला चूहा मिलने तक | 

                       000000 


   

{ 2 }
   
              
    ०००" फिलिस्तीनी कविता पढ़ते हुए "००० 


         { नवजान दरवीश कहते है -------- फ़ादो , औरों की  तरह नींद मुझे भी                                       आ ही जाएगी इस गोली बारी के दरमियान ............}

                                                                      

        हाँ, हाँ ,हाँ 
        रक्त की गंध में भी मुझे नींद आ ही जाएगी 
        चीखते बिलखते बच्चों के खुनी फौवारों से नहा कर भी , 
        मुझे नींद आ ही जाएगी 
        बस दुःख होगा इस बात पर 
        कि मेरा देश इस बात पर चुप्पी साधे बैठा है 
        हवाई दौरों के सफ़र में मशरूफ़ 
        दूरबीन से हवाई पट्टी को ताकता हुआ विमान की खुली खिड़की से 
        उन्हीं बच्चों की लाशों के ऊपर से हवाई उड़ान भरकर 
        हर वो सरहद पार कर लेगा 
        अपनी हदें पहचानने और भुनाने के लिए 
        अधमरे , खून से लथपथ बच्चों की लाशों पर से गुजर जायेगा 
        फिर न उफ़ न आह बस एक गंभीर हँसी लपेटे 
        बढ़ जायेगा अपने दौरे के अगले पड़ाव की ओर 


       ...................


        ये चुप्पी तुम्हे महँगी न पड़े 
        बच्चे माफ़ नहीं करेंगे कभी तुम्हे 
        नींद तुम्हें भी आ ही जाएगी 
        राजसी ठाठ - बाट में पर 
        रक्त के सूखते धब्बों की गंध 
        नहीं दब पायेगी किसी रूम फ्रेशनर से या न ही 
        टेलीविजन पर विज्ञापित किसी डियोड्रेंड से ही | 


                      ००००००००० 


 
{ 3 }
    
    ००० कहाँ है वे संस्थायें " क्राई या सेव द चिल्ड्रन "०००  

                                                 


        बच्चे सिर्फ रो ही नहीं रहे 
        तड़फ - तड़फ कर मर भी रहे हैं 
        उनकी लाशों पर यह कैसी विजय पताका 
        लहराने को उत्सुक हो 
        हे हथियार बंद सैनिको क्या तुम्हारे बच्चों की शक्लें 
        इन बच्चों की शक्लों से जुदा हैं 


        कोई कहता है फिलिस्तीनी बर्बरता पर लिखो कविता 
        पर हाथ नहीं उठते , लाल रंग बोलता है , लिखता कुछ नहीं 
        आँखे नहीं दोहराना चाहती उन मासूमों के चेहरे 
        जो बर्बरता से कुचल दिए या भून दिए गए हैं 


        नही चलाना चाहते कलम ,
        उठाना चाहते हैं बन्दूक बच्चे भी उनके खिलाफ 
        कई बच्चे तो मीडिया वालों के कैमरे को ही बन्दूक की नली समझ 
        अपने दोनों हाथ समर्पण की मुद्रा में उठा रखते है 


        पर हमें पता है मानवता का पाठ सिर्फ रटने या रटाने के लिए नहीं बनी 
        


        जेरुसलम को अब 
        याद रक्खेंगे ईशा के सलीब के लिए नहीं 
        मासूम बच्चों के बिलखते रुदन से 


        और पेशावर को ? 


                        ०००००००००००० 



{ 4 }        

०००  " सिगरेट की क्या बिसात " ०००                     

          उसने सिगरेट का कश लिया 
          और फूंक डाले सारे अवसाद 
          सिगरेट के धुएं को लीला कुछ इस तरह कि 
          सारी चुभन लील गई एक ही साँस में 


          सिगरेट फूंकना सिर्फ एक मर्ज नहीं 
          एक दवा भी है 
          उसने  जान लिया था 
          धुंएँ के छल्ले उछालते उन मर्दों से 
          जो टेढ़ी हँसी हँस कर फिकरा सा कश ही देते थे 
          क्या स्त्री फूंक सकती हैं सिगरेट 
          वे हमेशा ही मुगालते में रहते हैं 
          उन्हें नही पता 
          सिगरेट क्या  वे सारा जहाँ फूंक सकती हैं 
          सिगरेट की क्या बिसात | 


          उस स्त्री ने छल्ला बनाया धुंएँ का 
          गोल मटमैला सा 
          ऊपर उठता हुआ 
          देखा तिरछी नजर से 
          छल्ला आहिस्ते - आहिस्ते विलीन हो गया 
          रह गई सिर्फ गंध 
          दुर्गन्ध भी कह सकते हैं  
          फिकरे की चुभन
          उड़ा चुकी वह छल्ला बना 
          बची रह गई सिर्फ और सिर्फ दुर्गन्ध ............|


                             ०००००००० 


{ 5}         

 ०००   " बच्चों के नाम " ००० 

                                      
          बच्चों ने दी शहादत 
          गाजा आज खाली शिशु , बच्चों और किशोरों से 
          इज़राइली टैंक घूम रहे हैं सरपट , बच्चा खोर की तरह 
          उधर भूमध्य सागर का सीना चीरता 
          फुंफकारता है युद्धपोत 

          पैलेस्टाइन के सीने पर खिंची वह तीस फुट ऊँची दीवार इज़राइलकी 
          उस पार की जमीन पर अब कब्ज़ा है इजराइलों का 
          बच्चों के खेलने के मैदानो में फ़ैल गए हैं इज़राइली मिलट्री कैम्प 
          बच्चे तुम और तुमसे बड़े सभी बंदी हैं इज़राइली कैदखानों में 
          होता है रोज कत्लेआम वहां |
          
                       ०००००० 
{ 6}       

०००  " शहीद शिशु - बच्चे " ००० 

                                  

          तुम्हारी कलपती आत्माएं 
          क्या चैन से सोने देती होंगी 
          उन कातिलों को ? 


          शत्रुओं के हैलीकॉपटर लैंड होते हैं 
          तुम्हारे पूर्वजों की छतों पर , खेत - खलिहानों पर 
          वे रौंदते हैं भारी - भरकम बूटों , बमों , बंदूकों से 
          घायल , मृत लाशों से भरे मिलट्री के ट्रक , एम्बुलेंस के चक्कों से 
          चाक होते हैं तुम्हारे ही रक्त बिंदु , अब झरते नहीं सूख गए हैं | 


          सूखे हलक से उच्चारित भी नहीं होते 
          छलनी हुए उन शहीद शिशुओं के नाम 
          गाँव या स्कूलों के पते 
          अब वे पेशावर के नाम से पहचाने जाते हैं 
          क्यूँ की शहीदों की शिनाख्त सिर्फ 
          कब्रिस्तान में या फिर फिजाओं में हैं दर्ज | 

                           ०००००००००००० 





परिचय 

नाम ---मीता दास 
जन्म ------12 जुलाई सन 1961, जबलपुर { मध्य प्रदेश }
शिक्षा ------ बी . एस . सी विधा ------- हिंदी भाषा & बांग्ला  भाषा में कविता , कहानी , लेख , अनुवाद और संपादन

प्रकाशित ग्रन्थ -----  1...." अंतर मम" काव्य ग्रन्थ , बांग्ला भाषा में  2003 में
2 ....नवारुण भट्टाचार्य की कविताएं ( अनुवाद - मीता दास ) प्रकाशित 
3 .... भारतीय भाषार ओंगोने ( अनुवाद हिंदी कवियों का बांग्ला भाषा मे अनुवाद - मीता दास ) प्रकाशित 
5... काठेर स्वप्न ( हिंदी की प्रतिष्टित कहानियों के बांग्ला अनुवाद ) संकलन प्रकाशित
6... जोगेन चौधुरी की बांग्ला कविताओं का हिंदी अनुवाद प्रकाशित 
7... जोगेन चौधुरी के 2 संस्मरण का हिंदी अनुवाद प्रकाशित 
8... " पाथुरे मेये" स्वयं की बांग्ला कविताओं का संकलन प्रकाशित 
9.....'' अनुवाद एर जलसा'' {अनुदित कविताओं का संकलन बांग्ला भाषा में } प्रकाशधीन
10 .... हिंदी कवि अग्निशेखर की कविताओं के बांग्ला अनुवाद - मीता दास ) प्रकाशित 
11.... नवारुण भट्टाचार्य की कविताओं के अनुवाद प्रकाशधीन(अनुवाद - मीता दास )
12 ... सुकान्त भट्टाचार्य की कविताओं का अनुवाद ( मीता दास ) प्रकाशधीन ।
13... स्वयं कीकहानियों का संकलन ( हिंदी ) संभावना प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित 
14 ... हिंदी में स्वयं की कविताओं का संकलन शीघ्र प्रकाशित 

संपादन -------- 1... " हम बीस सदी के " काव्य संकलन में संकलित कवितायेँ और संग्रह के संपादक मंडल में
2..." धरातल के स्वर "के संपादक मंडल में
3..." छत्तीस गढ़ आस पास "के संपादन मंडल में
4.... कृत्या पोएट्री वेब पत्रिका का संपादन 

प्रसारण ---1.... आकाशवाणी रायपुर से 25 वर्षों से लगातार स्वरचित कविताओं का प्रसारण
2.... दूरदर्शन रायपुर से कवितआओं का प्रसारण
3.... भोपाल दूरदर्शन से गीतों का प्रसारण { गायिका ....तपोशी नागराज , संगीत --- मुरलीधर नागराज }

प्रकाशन --1... बांग्ला  कहानी एवं कविताओं का लगातार15 वर्षों से लेखन ,एवं रेखांकन भी प्रकाशित
2... हिंदी कहानी एवं कविताओं का लगारत लेखन ,एवं रेखांकन का प्रकाशन
3... हिंदी से बांग्ला . बांग्ला से हिंदी में कविता , कहानियों का अनुवाद एवं प्रकाशन
पत्र  पत्रिकाएं ---- --- पहल , वागर्थ , नया ज्ञानोदय , मन्तव्य , पाखी , पक्षधर, नवनीत , समावर्तन , लहक , दोआबा, समकालीन जनमत , पब्लिक एजेंडा , जनसत्ता , युद्ध रत आम आदमी , प्रसंग ,  रेवान्त , संबोधन ,शेष , दुनिया इन दिनों , अभिनव मीमांशा ,सूत्र , अरावली ऊदघोष  , परस्पर , सनद, समग्र दृष्टि ,सद्भावना दर्पण, राष्ट्र सेतु , छत्तीस गढ़ आस पास , छत्तीस गढ़ टुडे , नारी का संबल , विकल्प , साहित्य नामा , अक्षर की छांव , संतुलन ,बहुमत {ग्रामोदय } आदि ।

 समाचार पत्र --------दैनिक भाष्कर , नई दुनिया , नव भारत , देशबंधु , प्रभात खबर , जनसत्ता ,दैनिक प्रखर समाचार , देश बंधू , दैनिक युग पक्ष , अमृत धारा

विविध ...............1... प्रौढ़ शिक्षा संस्थान द्वारा ....." नव साक्षर लेखन " पिछले  10 वर्षों से लगातार लेखन और कार्य शाला में शिरकत
                                     
2...छत्तीस  गढ़ पाठ्य पुस्तक निगम की तरफ से नव साक्षर लोगों के पुस्तकों के चयन मंडल में शामिल


पुरस्कार ------------- कहानी ------" पहलू यह भी " भिलाई भाषा भारती पुरस्कार सन 1999 में

सम्मान -------------- 
1.... उत्तर बंग नाट्य जगत शिलिगुड़ी से ...." कवि रोबिन सूर सम्मान" { हिंदी कवि सम्मान }सन 2002 में                                      
2...." हिंदी विद्या रत्न भारती सम्मान " कादंबरी सहिय परिषद सन 2003 में 
3...." डा 0 खूब चंद बघेल सम्मान "
 2005 में
4.... प्रसस्ती पत्र " हिंदी साहित्य हेतु , छत्तीस गढ़ अल्प संख्यक आयोग द्वारा सन 2005 में
5.... " राष्ट्र भाषा अलंकरण " छत्तीस गढ़ प्रचार समिति द्वारा सन 2008 मे       
6.... प्रेमचंद अगासदिया सम्मान 2019       7.... बांग्ला साहित्य अकादमी { छत्तीस गढ़ शाखा द्वारा } प्रशस्ति पत्र 2010 में

संप्रति ----
1.... जन संस्कृति मंच दुर्ग - भिलाई ( छत्तीसगढ़ की अध्यक्ष )                       
2....बंगीय साहित्य संस्था भिलाई शाखा की संरक्षक।                            

संपर्क --- 63/4 नेहरू नगर पश्चिम , भिलाई , छत्तीसगढ़ , 490020
फोन न0...9329509050
ईमेल ....mita.dasroy@gmail.com
9329509050 यह मेरा व्हाट्सएप नम्बर है ।



नोट- पोस्ट में प्रयुक्त सभी रेखाचित्र चित्रकार अनुप्रिया के बनाए हुए हैं।

सोमवार, 28 फ़रवरी 2022

समकाल : कविता का स्त्रीकाल-26


जयश्री सिंह की कविताएँ  जीवन की सघन अनुभूतियों से उपजी मानवीय संवेदनाओं की उपज हैं।यहाँ स्त्री जीवन के साथ -साथ समय और समाज के बदलते जीवन मूल्य एवं मानवीय करुणा की बानगी देखी -परखी जा सकती है।दुनिया में कितना दुख है इसे स्त्री अपनी दृष्टि से देख रही है,उसके लिए इस दुनिया को देखने के लिए कुछ रास्ते इसी कविता की भूमि ने उपलब्ध कराए हैं।जयश्री सिंह मुम्बई की भागमभाग में मानव का संघर्ष देखती हैं,लॉक डाउन में मजदूरों की पीड़ा हो या स्त्रियों के हिस्से की त्रासदी हो ,वह इन बातों के अन्दरखानों में उतरने का जोखिम लेती हैं और कविता में अपने रंग-ढंग से पिरोती हैं-

जयश्री सिंह की कविताएँ


1) खौफ़

एक भयानक कोलाहल

चारों ओर 

सैकड़ों लोग दौड़ते - भागते हाँफते

पीछे चले आ रहे हैं

पलट कर देखती हूँ तो सन्नाटा है

इस कोने से उस कोने तक 

कहीं कोई नहीं

एम्बुलेंस की एक उड़ती हुई आवाज 

चीखते हुए गुजर जाती है

किनारे बैठे लोग

काली चादर ओढ़े सो चुके हैं

हजारों कदमों की धमक को एक बार में सह लेने वाला शहर का पुराना पुल 

शवों के बोझ से थर्रा रहा है

अस्पतालों के गलियारे

पुल में बदल रहे हैं

मौत किनारे - किनारे काली चादर ओढ़े सो रही है

कुछ देखा - अनदेखा किये

सैकड़ों लोग 

दौड़ते - भागते - हाँफते

एक दूसरे को धकियाते

गलियारे से गुजरते जा रहे लोग

चीखते पुकारते

हटो..., हटो.., 

थोड़ी सी जगह दो

जल्दी करो, जाने दो मुझे

साँस उखड़ रही है

एक तीसरी निगाह भीड़ पर से उड़ कर गुजर जाती है

शहर बेचैन हो उठता है

टीवी खुली है

खिड़कियाँ बंद हो चुकी हैं

जगह - जगह धब्बे

गहरे काले धब्बे

दृश्यों के साथ उतरते जा रहे धब्बे

आगे कुछ दिखाई नहीं दे रहा

धब्बे घुप्प अँधेरे में बदल रहे हैं

चारों ओर निराशा 

मायूसी अकेलापन 

बेचैनी घबराहट घुटन संक्रामक हो कर 

ज़ेहन में फैल रही है

लोग भाग रहे हैं

अपनों के छू जाने के डर से 

बेतहाशा भाग रहे हैं

सारे रास्ते बंद हैं

सारे दरवाजे बंद

महीनों से घरों में बंद लोग

अपने - अपने में बंद हैं।




2) अस्तित्व


खोद कर जमीन 

मिट्टी से पूछा

क्या तुम इसी ज़मीन का हिस्सा हो?

पहाड़ों को ढ़हा कर

मलवों से

भू - कम्प ने 

माँगा अस्तित्व।


पाट दिया गया प्रशांत भी

हिंद की 

पहली बूँद की ख़ातिर

जला दिए गए जंगल

वाज़िब सबूत की तलाश में

शक में घिरी घटाएँ

जो दे न पायीं 

अपने आसमानों की गवाही।


धरती इतनी बौखलायी

पहले कभी न थी

आसमानों ने

कभी न बरसायी थीं चिंगारियाँ

कभी राख न हुए थे

इससे पहले 

करोड़ों की संख्या में

निर्दोष बेजुबाँ।


यह एक दुःसह

दुःस्वप्न था 

जड़ - चेतन के

अस्तित्व का प्रश्न था

माँग लिया था किसी ने

पृथ्वी से

उसके होने का सबूत।


3 ) भागी हुई लड़कियाँ


घर की दीवारों से

भीतर तक उतर आयी दरारों में

रिस रही हैं धीरे - धीरे

मुक्ति की कामनाएँ

दुनिया भर की तोहमतों से अधिक 

चार दीवारी के भीतर की

जहरीली हवा में

घुटने लगा दम

घिस चुके शब्दों की चोट से रक्तिम

उस एक भूल के लिए

लगातार कचोटता 

अल्हड़ सा मन

अवचेतन में

पुरानी रील सा 

जब - तब

घूम जाता

वो बीता बचपन।


रिहा होने की चाहत में

पार कर दी थी

उन्होंने सारी सीमाएँ

नये स्पर्श में बहक कर

डाल से टूटीं

और फिर 

टूट कर रह गयीं

हर बार किसी तीसरे के साथ 

भागे जाने के

नये शक में घिरीं।


रिक्त हो जाने की सारी हदें

पार कर देने के बाद भी

नहीं बुझा पायीं शक की प्यास

कटीली उलाहना 

क्रूर प्रताड़ना से

रगड़ दी गयी 

उनकी अंतर्आत्माएँ भी।


घर से भागी हुई लड़कियाँ

जितनी देर के लिए चुहल बनी

उतनी ही देर आजाद रह पायीं

फिर जीवन भर के लिए

किसी बद्दिमाग की निगरानी में

कैद हो गयीं।


4) मैं रहूँगी


यदि डर है तुम्हें

कि बचा नहीं रहेगा कुछ भी 

अंत तक

मैं तब भी 

बची रहूँगी।


मैं हवा हूँ

मिट्टी हूँ

आग हूँ

नमी हूँ

तुम्हारी अनुकृति हूँ

मैं स्वीकृति हूँ

बचे रहने के हर रूप में

स्त्री हूँ।


मुझे बेचाल चले

चलन से डर लगता है

जबरन हो रहे 

हनन से डर लगता है


यदि बचाना चाहो 

सब कुछ

तो बचा लो मुझे।


मैं सामूहिक पतन के

अपराध से डरी हुई हूँ।


5 ) चाँदनी


दिन ढ़लते ही

ये चौराहों पर चाँदनी सी उतरती हैं

लोगों की निगाहों से बच कर

खुद को 

काले शीशे की गाड़ियों के सुपुर्द कर

निकल जाती हैं 

रात की उन यात्राओं की ओर

जो इनके जीवन से भी लंबी हैं


ये सुबह अँधेरे

उन्हीं गाड़ियों से लौट आती हैं

दुपट्टों से मुँह ढँके

टूटते तारों सी 

गाड़ियों से उतरकर 

उन अँधेरी गलियों में खो जाती हैं

जहाँ से सज-धज कर

शाम इन्हें फिर से निकलना है।


ये आधी रात की 

बदनाम गलियों को

अपनी अदाओं से गुलजार करती हैं

लचकती कमर

और चमके गालों के पीछे

छोड़ जाती हैं एक भरा-पूरा परिवार 

लाचार माँ, बीमार बाप

और छोटे भाई - बहन।

ये उनके सुरक्षित भविष्य की खातिर 

अपने लिए चुनती हैं

आधी रात की असुरक्षित दुनिया

और मेडिक्लेम पॉलिसी से परे का एक असाध्य रोग

जो जल्द ही इन्हें 

जीवन से मुक्ति दे देता है।


इनकी यात्राएँ बहुत छोटी हैं

और रातें बहुत लंबी

ये अपने पीछे एक दूसरी चाँदनी छोड़ जाती हैं।


6) धुंध

शहर की सबसे ऊँची इमारत से

दूर की उस दुनिया को 

कुछ पल के लिए

आँखों में उतार कर

अपने अकेलेपन को

भूल जाना चाहती हूँ


सहसा

बुझे बादलों के बीच खुद को घिरा पा कर

घबरा जाती हूँ 

और उतर आती हूँ 

एक ही साँस में

नीचे 

उस बालकनी की ओर

जहाँ से देखती हूँ रोज

अपने हिस्से की एक सीमित दुनिया।


अचानक अपने चश्मे का नंबर बढ़ा पाती हूँ

आँखों को बार-बार रगड़ कर

देखती हूँ 

एक चिड़िया 

चोंच में चुग्गा लिए

बालकनी में

बिलकुल पास बैठी

मुझसे अपने घर का पता पूछ रही है

मैं दूर तक नजर दौड़ाकर

उसके घोंसले को ढूँढती हूँ

चूजों की जानी पहचानी आवाज

लोगों की आवाजाही

और मोटरों की चिल्लाहट के

सम्मिलित स्वर को

अपने आस - पास बिखरा पाती हूँ

एक धुंध सी है चारों ओर

जैसे गहरी नींद में, स्वप्नलोक में हूँ

सब कुछ सुन पाने

और कुछ न देख पाने की अकुलाहट में 

जागने का विफल प्रयास करती हुई

किसी तरह अपने को

भीतर कमरे में बंद कर लेती हूँ

धुंधलापन 

घबराहट और घुटन में बदल जाती है

जैसे किसी ने रोक रखी हो मेरे हिस्से की ताजी हवा

और मैं उन्हें पाने के लिए बेचैन हूँ।

एक लंबी शांति के बाद

अपने को फर्श पर पड़ा पाती हूँ।

कुछ ही देर में 

इस उथल - पुथल को भूल 

अपने रोजमर्रा के कामों में 

उलझ जाती हूँ।


दरवाजे की घन्टियों

फोन कॉलों

और दो सौ पचहत्तर वाट्सऐप मैसेज से गुजर लेने के बाद

अचानक याद आये

उस खोये हुए घरौंदे को खोजने के लिए

झटपट बालकनी का दरवाजा खोल देती हूँ।


सूरज अब भी कहीं नहीं है

उधार की हल्की रोशनी लिये

धुंध वैसी ही जमी हुई है

चोंच में चुग्गा लिये चिड़िया

फर्श पर मृत पड़ी है

पेड़ पर मरघट सी शांति है

नीचे तक उतर आये 

बुझे बादलों ने

चूजों से 

उनके हिस्से का आकाश 

छीन लिया।








परिचय : 

जयश्री सिंह 

एम. ए. (स्वर्ण पदक), पीएच. डी., नेट

सहायक प्राध्यापक एवं शोधनिर्देशक (मुंबई विश्वविद्यालय)

जन्म : 13 जुलाई, मुंबई


पुरस्कार एवं उपलब्धियाँ -

१) मुंबई विश्वविद्यालय द्वारा एम. ए. में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने हेतु 'स्वर्ण पदक' से सम्मानित।

२) मुंबई विश्वविद्यालय द्वारा (एम. ए. के लिए ही) ‘पंडित नरेंद्र शर्मा हिन्दी एकेडेमिक पुरस्कार' से सम्मानित।

३) मुंबई बोर्ड द्वारा 1999 में 'सरस्वती सुत सम्मान' से सम्मानित।

४) रज़ा फाउंडेशन, नई दिल्ली द्वारा 11- 12 अक्टूबर को आयोजित 'युवा 2019' में गाँधी जी के 'प्रार्थना प्रवचन' में विचार प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित।


प्रकाशन - 

१) सुरेन्द्र वर्मा के नाटकों का अनुशीलन, २०१३ (समीक्षा)

२) पूर्वोत्तर भारत का आदिवासी समाज : लोकसाहित्य एवं संस्कृति, २०१८ (समीक्षा)

३) Hingher Education in India : Retrospect & Prospect, 2020 (संपादित)

४) विविध विषयों पर 35 से अधिक शोधालेख प्रकाशित।

५) मुंबई आकाशवाणी से 3 रेडियो वार्ता का प्रसारण।

६) विविध भारती मुंबई से ‘हरसिंगार के फूल’ कहानी का प्रसारण। 

७) एम. ए. हिन्दी में मुंबई विश्वविद्यालय में सर्वश्रेष्ठ अंक प्राप्त करने पर महाराष्ट्र टाइम्स द्वारा साक्षात्कार प्रकाशित।

८) मुंबई आकाशवाणी द्वारा भी उसी समय साक्षात्कार का प्रसारण।  

९) शहर की संवेदनाओं पर निरंतर लेखन।

१०) 'शहर बोलता है' (पहला काव्य संग्रह) प्रकाशाधीन।

११) कला, साहित्य, संस्कृति का शहर मुंबई' पर श्रृंखला  लेखन।

१२) देश की प्रमुख पत्र - पत्रिकाओं में कई कविताएँ, कहानी और संस्मरण प्रकाशित।



पता - B /601, श्री एयर इंडिया सोसाइटी, प्लॉट क्र. - 24, सावरकर नगर, ठाणे - पश्चिम, मुंबई - 400606

फोन - 09757277735

ई मेल : jayshreesingh13@gmail.com

संप्रति : सहायक प्राध्यापक एवं शोधनिर्देशक, जोशी - बेडेकर ठाणे कॉलेज, मुंबई - 400601