बुधवार, 16 मार्च 2022
समकाल : कविता का स्त्रीकाल-35
समकाल : कविता का स्त्रीकाल-36
समकाल: कविता का स्त्रीकाल-30
आसिया नकवी की कविताएँ1दो कलाकारपहला नाम से फिदादूसरे पर कुछ लोग फिदापहले ने दुनिया रंगों से भर दीदूसरे ने नज़रयाती जंगों से भर दीपहला सैकड़ों अल्फाज़ एक तस्वीर में भर देतादूसरा सैकड़ों जुमले एक तकरीर में भर देतापहले ने इज़हार को फरोग दियादूसरे ने इज़हार को रोक दियाथा पहला भी कलाकारहै दूसरा भी कलाकार2रंग(एक )बदल दिए जाते हैं रोज कविताओं के कपडे,कभी लाल, कभी भगवा और कभी सफ़ेद.हरा माना जाने लगा है ज़हरीला रंग.रोज़ खाने में परोसे जाते हैंअलग अलग रंग रूप के शब्दऔर हद तो यह है, कि खाने में हरा हरा ना होतो सब लाल हो जाता है(दो)लोग चाहते हैंकविताएँ भी बदलें कपड़ों की तरहबासी खाना और बासी कविताएँअक्सर लोगों को रुला देती हैं.लगता है कल ही स्टॉक आउट हुआ हैथ्रिल का बाज़ार(तीन )हत्या हत्या होती हैब्रेकिंग न्यूज़ की हत्या तकसब कुछ कितना रेपेटिटिव है.लोग चाहते हैंरोज़ बदलना चाहिएख़ून का रंग. धर्म का रंग.खाने का रंग. रंगों का रंग.......इंसानों से जब मन जायेगा भरढूंढ लूंगी कोई ऐसा घरबस्ती होगी जहां ख़ामोशी सूखी घासऔर संवेदनाओ की बेहोशीवहाँ न होगा आदमी जैसा कुछसब सम्बन्धों के परिमाण होगेंशुन्य एवं तुच्छ3आइनों से डरने वाला आदमी.१उसकी उंगलियाँ उससे पहले उठती हैंछोड़ कर पीछे उसकी मुट्ठीपूर्णता एक ऐसी चीज़ जो वो खोजता है दूसरों मेंऔर परछाईं से डरता है.दिन शुरू करता है पोतते हुए आइनों पर कालिख,दांत चमकाते हुए औरदुनिया का मखौल उड़ाते हुए.अपने अन्दर की उपेक्षा कर देता है वो.२.उसकी कमाई हैं आँसू और अपशब्द.जो सोख लिए जाते हैं उसकी अंतरात्मा के साथ.३.लेकिन आँसू कैसे काले करता वो?उन्होंने हमेशा वही किया जिनसे वो डरता था.दबी हुई अंतरात्मा....वापस मुखर...आईने में उसकी परछाई.,,४.कोई मखौल नहींकोई चमकाना नहीं दांतों का.बस दर्द पैदा होता है उसके अन्दर,दर्दजिससे कवि पैदा होता है.4कुछ कैदी हैं जो रिहा किए जा रहे हैंकुछ रिहायी है जो कैद की जा रही हैनसलों को भी मस्लों को समझना होगाफसलों को भी खेतों को समझना होगाऔरत हूँ तो आवाज़ तो हो सकती नहीसच्ची हूँ तो बेगुनाह तो हो सकती नहींइस दौर ए जाहालत का है अंदाज यहीजो तख्ता ए हाकीम है ऐजाज़ वहीकी हामला भी हमलावार हो गयी आजकी खामोशियां भी जुमला वर बन गयी आजउठो की शोर थम गया अब तोउठो की नब्ज़ जम गयी अब तोउठो की उड ना जाए रंग ए बाहारउठो की मिट ना जाए दौर ए ज़रग.......5एक कमरे के आगेवर्जिन्या वुल्फ़ कहती हैं कि हर स्त्री के पास लिखने के लिए अपना एक कमरा होना चाहिए. भारत में सिर्फ़ यही दबाव नहीं है जो स्त्री पर काम करता है. शायद एक कमरा देकर क़ैद करने की कोशिश के ख़िलाफ़ लड़ते हुए लिखना बहुत पीछे रह जाता है. कई कई दिन बाद लिखना और फिर रोज़ दुनिया के और कविता के चलते पैदा हुए डिसिलूज़न से जूझना थका देता है .मैने बरसों बादअकेले ख़ामोश बेदम बक्से को खोलाउसके ऊपर जमी धूल के कण झूम उठे -अपने जी उठने के जश्न में इस बात से बेख़बरकि इतने लम्बे अरसे से अपने अंदर क्या दबा रखा था .सबसे ऊपर पड़ी जज़्बात की पोशाक बोसिदा हो चुकी हैएहसासात भी कुछ बेहतर नहीं हैं - उनके चिथडों पर खिलखिलाते दीमक रेंग रहे हैं.हक़ीक़त के रंग फींके हो गए हैं .ख़ुदपसंदी का क़द छोटा हो गया है,नज़र तो मजमे में नज़रअन्दाज़ हो जाएगीकोई तो है जो चमक रहा हैशायद बिरादरी स्टोर से ख़रीदा दिखावा है .आसियपरिचय :आसिया नकवीकवि एवं ऐक्टिविस्ट. विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित. अंग्रेज़ी,हिंदी में समान रूप से लेखन.संप्रति : अध्यापन. जन्म : 30.06.1988.मोब: 7543028451 ईमेल: aaasiya.naqvi@gmail.com
बुधवार, 2 मार्च 2022
समकाल,: कविता का स्त्रीकाल-29
समकाल कविता का स्त्रीकाल-28
बाबुषा कोहली का जन्म 6 फ़रवरी, 1979 को मध्यप्रदेश के कटनी में हुआ। वह बेहद कम उम्र से ही कविताएँ लिखने लगी थीं और पत्र-पत्रिकाओं में छपने भी लगीं। सोशल मीडिया पर आरंभिक लोकप्रियता के बाद भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार से सम्मानित होने पर उनकी चर्चा और बढ़ी। इसी पुरस्कार के साथ फिर उनका पहला कविता-संग्रह 'प्रेम गिलहरी दिल अखरोट' भी प्रकाशित हुआ।
‘बावन चिट्ठियाँ’ नाम से प्रकाशित हुआ है जिसे ‘कवि के गद्य’ अथवा ‘गद्य-कविता’ के रूप में प्रकाशित
मंगलवार, 1 मार्च 2022
समकाल : कविता का स्त्रीकाल -27
यह समकालीन स्त्री कविता का सबसे सुन्दर समय है जब एक साथ हिन्दी में विभिन्न प्रन्तीय भाषाओं की कवयित्रियों ने मजबूत दखल बनाई है।मीता दास मूलतः बांग्ला भाषी हैं और बंग्ला के साथ -साथ हिन्दी में भी कविताएँ लिखती हैं।आपकी कविताओं के प्रतिरोधी तेवर आपको कात्यायनी की परम्परा से हिन्दी में जोड़ते हैं।समाज के दबे कुचले शोषित वर्ग के प्रति मानवीय करुणा आपकी कविताओं में व्यापक फलक पर उभरता है।मीता दास हिन्दी और बांग्ला के बीच की वह मजबूत सेतु हैं जो दो भाषा संसार की सांस्कृतिक चेतना से हमें रू-ब-रू कराती हैं।मीता दास की कविताएँ{ 1 } ०००" चूहा भात - भात चूहा "०००चूहा भात - भात चूहाभात चूहा हो या चूहा भात ...........ओ मुसहरमुसुहा खा - खा कर बने हो मुसहरऔर यहाँ सारे सरकारी हथकंडे जारी हैं तुम्हे भुलाने औरतुम्हारी उपस्थित कोदर्ज करने में कर रहे कोताहीठेल रहे हैं बिलों में तुम्हारी सारी जनसँख्या कोतुम सब जिन्दा हो चूहों के लिए या चूहे जिन्दा हैंतुम्हे जिन्दा रखने के लिएकौन किसके लिए जिन्दा है ?चूहा सरकारचूहा मुसहरया चूहा भात या भात चूहासरकार के खोदे हुए बिल मेंछुपे हुये है तुम्हारे जीने मरने के आंकड़ेसरकारी दाल खा गये दुकानदारसब्जी खा गये चतुर जानवर ……
चांवल !दब गए खेतों में
पाले की मार से और बच गयेचूहेतुम्हार हिस्सेगोदाम मेंकिसिम - किसिम के चूहेइस खेत , उस जंगल इस प्रदेश उस प्रदेश सभी ओर के चूहेअब करते हैं
आवाजाहीवे भी भूखे , कीटनाशक से त्रस्तरोगों को वहन करती दौड़ पड़ती है अपनी जान बचानेतुम भी भूखे नंगे , बेरहम पेट की ज्वाला से त्रस्तपकड़ कर ही मानते , भात - चूहा को तरसतेखुदसा माझी ,बरहमु या चतुरा, एक्कापरिवार बड़ा , कुनबा बड़ाचूहे तो उतने ही होंगेजितनी उनकी प्रजनन क्षमता होगी यामुसहरों , कीटनाशकों और नामालूम बीमारी से न मर गए होंपर तुम्हारा क्या ...........मुसहरतुम्हारे तो प्रजनन क्षमता के सारे मुफ्त सरकारी उपाय भीहै कालाबाजारी के हत्थेहर कस्बे के मेडिकल शॉप मेंधड़ल्ले से बिक रहे मुंह मांगी कीमतों परकोई फैमिली प्लानिंग कैम्प भी नहीं चलतेन ही बंटता हैं तरीके ही मुफ्त और न ही बंटते है सरकारी राशनतुम्हारे भूखे - नंगे बच्चे और तुमअनजानी अनचाही बीमारियों से मरकर ही इतने बचे हैं किचूहा मिल ही जाता है एक आधऔर तुम दो वक़्त की ही नहींएक वक़्त की कम से कम जुगाड़ ही लेते होभात - चूहाकेरोसिन पर नहींझाड़ - झंकाड़ जलाकरभून ही लेते हो चूहाऔर भात संग सान गटक जाते होअगला चूहा मिलने तक |000000{ 2 }०००" फिलिस्तीनी कविता पढ़ते हुए "०००{ नवजान दरवीश कहते है -------- फ़ादो , औरों की तरह नींद मुझे भी आ ही जाएगी इस गोली बारी के दरमियान ............}हाँ, हाँ ,हाँरक्त की गंध में भी मुझे नींद आ ही जाएगीचीखते बिलखते बच्चों के खुनी फौवारों से नहा कर भी ,मुझे नींद आ ही जाएगीबस दुःख होगा इस बात परकि मेरा देश इस बात पर चुप्पी साधे बैठा हैहवाई दौरों के सफ़र में मशरूफ़दूरबीन से हवाई पट्टी को ताकता हुआ विमान की खुली खिड़की सेउन्हीं बच्चों की लाशों के ऊपर से हवाई उड़ान भरकरहर वो सरहद पार कर लेगाअपनी हदें पहचानने और भुनाने के लिएअधमरे , खून से लथपथ बच्चों की लाशों पर से गुजर जायेगाफिर न उफ़ न आह बस एक गंभीर हँसी लपेटेबढ़ जायेगा अपने दौरे के अगले पड़ाव की ओर...................ये चुप्पी तुम्हे महँगी न पड़ेबच्चे माफ़ नहीं करेंगे कभी तुम्हेनींद तुम्हें भी आ ही जाएगीराजसी ठाठ - बाट में पररक्त के सूखते धब्बों की गंधनहीं दब पायेगी किसी रूम फ्रेशनर से या न हीटेलीविजन पर विज्ञापित किसी डियोड्रेंड से ही |०००००००००{ 3 }००० कहाँ है वे संस्थायें " क्राई या सेव द चिल्ड्रन "०००बच्चे सिर्फ रो ही नहीं रहेतड़फ - तड़फ कर मर भी रहे हैंउनकी लाशों पर यह कैसी विजय पताकालहराने को उत्सुक होहे हथियार बंद सैनिको क्या तुम्हारे बच्चों की शक्लेंइन बच्चों की शक्लों से जुदा हैंकोई कहता है फिलिस्तीनी बर्बरता पर लिखो कवितापर हाथ नहीं उठते , लाल रंग बोलता है , लिखता कुछ नहींआँखे नहीं दोहराना चाहती उन मासूमों के चेहरेजो बर्बरता से कुचल दिए या भून दिए गए हैंनही चलाना चाहते कलम ,उठाना चाहते हैं बन्दूक बच्चे भी उनके खिलाफकई बच्चे तो मीडिया वालों के कैमरे को ही बन्दूक की नली समझअपने दोनों हाथ समर्पण की मुद्रा में उठा रखते हैपर हमें पता है मानवता का पाठ सिर्फ रटने या रटाने के लिए नहीं बनीजेरुसलम को अबयाद रक्खेंगे ईशा के सलीब के लिए नहींमासूम बच्चों के बिलखते रुदन सेऔर पेशावर को ?००००००००००००{ 4 }००० " सिगरेट की क्या बिसात " ०००उसने सिगरेट का कश लियाऔर फूंक डाले सारे अवसादसिगरेट के धुएं को लीला कुछ इस तरह किसारी चुभन लील गई एक ही साँस मेंसिगरेट फूंकना सिर्फ एक मर्ज नहींएक दवा भी हैउसने जान लिया थाधुंएँ के छल्ले उछालते उन मर्दों सेजो टेढ़ी हँसी हँस कर फिकरा सा कश ही देते थेक्या स्त्री फूंक सकती हैं सिगरेटवे हमेशा ही मुगालते में रहते हैंउन्हें नही पतासिगरेट क्या वे सारा जहाँ फूंक सकती हैंसिगरेट की क्या बिसात |उस स्त्री ने छल्ला बनाया धुंएँ कागोल मटमैला साऊपर उठता हुआदेखा तिरछी नजर सेछल्ला आहिस्ते - आहिस्ते विलीन हो गयारह गई सिर्फ गंधदुर्गन्ध भी कह सकते हैंफिकरे की चुभनउड़ा चुकी वह छल्ला बनाबची रह गई सिर्फ और सिर्फ दुर्गन्ध ............|००००००००{ 5}००० " बच्चों के नाम " ०००बच्चों ने दी शहादतगाजा आज खाली शिशु , बच्चों और किशोरों सेइज़राइली टैंक घूम रहे हैं सरपट , बच्चा खोर की तरहउधर भूमध्य सागर का सीना चीरताफुंफकारता है युद्धपोतपैलेस्टाइन के सीने पर खिंची वह तीस फुट ऊँची दीवार इज़राइलकीउस पार की जमीन पर अब कब्ज़ा है इजराइलों काबच्चों के खेलने के मैदानो में फ़ैल गए हैं इज़राइली मिलट्री कैम्पबच्चे तुम और तुमसे बड़े सभी बंदी हैं इज़राइली कैदखानों मेंहोता है रोज कत्लेआम वहां |००००००{ 6}००० " शहीद शिशु - बच्चे " ०००तुम्हारी कलपती आत्माएंक्या चैन से सोने देती होंगीउन कातिलों को ?शत्रुओं के हैलीकॉपटर लैंड होते हैंतुम्हारे पूर्वजों की छतों पर , खेत - खलिहानों परवे रौंदते हैं भारी - भरकम बूटों , बमों , बंदूकों सेघायल , मृत लाशों से भरे मिलट्री के ट्रक , एम्बुलेंस के चक्कों सेचाक होते हैं तुम्हारे ही रक्त बिंदु , अब झरते नहीं सूख गए हैं |सूखे हलक से उच्चारित भी नहीं होतेछलनी हुए उन शहीद शिशुओं के नामगाँव या स्कूलों के पतेअब वे पेशावर के नाम से पहचाने जाते हैंक्यूँ की शहीदों की शिनाख्त सिर्फकब्रिस्तान में या फिर फिजाओं में हैं दर्ज |००००००००००००परिचयनाम ---मीता दासजन्म ------12 जुलाई सन 1961, जबलपुर { मध्य प्रदेश }शिक्षा ------ बी . एस . सी विधा ------- हिंदी भाषा & बांग्ला भाषा में कविता , कहानी , लेख , अनुवाद और संपादनप्रकाशित ग्रन्थ ----- 1...." अंतर मम" काव्य ग्रन्थ , बांग्ला भाषा में 2003 में2 ....नवारुण भट्टाचार्य की कविताएं ( अनुवाद - मीता दास ) प्रकाशित3 .... भारतीय भाषार ओंगोने ( अनुवाद हिंदी कवियों का बांग्ला भाषा मे अनुवाद - मीता दास ) प्रकाशित5... काठेर स्वप्न ( हिंदी की प्रतिष्टित कहानियों के बांग्ला अनुवाद ) संकलन प्रकाशित6... जोगेन चौधुरी की बांग्ला कविताओं का हिंदी अनुवाद प्रकाशित7... जोगेन चौधुरी के 2 संस्मरण का हिंदी अनुवाद प्रकाशित8... " पाथुरे मेये" स्वयं की बांग्ला कविताओं का संकलन प्रकाशित9.....'' अनुवाद एर जलसा'' {अनुदित कविताओं का संकलन बांग्ला भाषा में } प्रकाशधीन10 .... हिंदी कवि अग्निशेखर की कविताओं के बांग्ला अनुवाद - मीता दास ) प्रकाशित11.... नवारुण भट्टाचार्य की कविताओं के अनुवाद प्रकाशधीन(अनुवाद - मीता दास )12 ... सुकान्त भट्टाचार्य की कविताओं का अनुवाद ( मीता दास ) प्रकाशधीन ।13... स्वयं कीकहानियों का संकलन ( हिंदी ) संभावना प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित14 ... हिंदी में स्वयं की कविताओं का संकलन शीघ्र प्रकाशितसंपादन -------- 1... " हम बीस सदी के " काव्य संकलन में संकलित कवितायेँ और संग्रह के संपादक मंडल में2..." धरातल के स्वर "के संपादक मंडल में3..." छत्तीस गढ़ आस पास "के संपादन मंडल में4.... कृत्या पोएट्री वेब पत्रिका का संपादनप्रसारण ---1.... आकाशवाणी रायपुर से 25 वर्षों से लगातार स्वरचित कविताओं का प्रसारण2.... दूरदर्शन रायपुर से कवितआओं का प्रसारण3.... भोपाल दूरदर्शन से गीतों का प्रसारण { गायिका ....तपोशी नागराज , संगीत --- मुरलीधर नागराज }प्रकाशन --1... बांग्ला कहानी एवं कविताओं का लगातार15 वर्षों से लेखन ,एवं रेखांकन भी प्रकाशित2... हिंदी कहानी एवं कविताओं का लगारत लेखन ,एवं रेखांकन का प्रकाशन3... हिंदी से बांग्ला . बांग्ला से हिंदी में कविता , कहानियों का अनुवाद एवं प्रकाशनपत्र पत्रिकाएं ---- --- पहल , वागर्थ , नया ज्ञानोदय , मन्तव्य , पाखी , पक्षधर, नवनीत , समावर्तन , लहक , दोआबा, समकालीन जनमत , पब्लिक एजेंडा , जनसत्ता , युद्ध रत आम आदमी , प्रसंग , रेवान्त , संबोधन ,शेष , दुनिया इन दिनों , अभिनव मीमांशा ,सूत्र , अरावली ऊदघोष , परस्पर , सनद, समग्र दृष्टि ,सद्भावना दर्पण, राष्ट्र सेतु , छत्तीस गढ़ आस पास , छत्तीस गढ़ टुडे , नारी का संबल , विकल्प , साहित्य नामा , अक्षर की छांव , संतुलन ,बहुमत {ग्रामोदय } आदि ।समाचार पत्र --------दैनिक भाष्कर , नई दुनिया , नव भारत , देशबंधु , प्रभात खबर , जनसत्ता ,दैनिक प्रखर समाचार , देश बंधू , दैनिक युग पक्ष , अमृत धाराविविध ...............1... प्रौढ़ शिक्षा संस्थान द्वारा ....." नव साक्षर लेखन " पिछले 10 वर्षों से लगातार लेखन और कार्य शाला में शिरकत2...छत्तीस गढ़ पाठ्य पुस्तक निगम की तरफ से नव साक्षर लोगों के पुस्तकों के चयन मंडल में शामिलपुरस्कार ------------- कहानी ------" पहलू यह भी " भिलाई भाषा भारती पुरस्कार सन 1999 मेंसम्मान --------------1.... उत्तर बंग नाट्य जगत शिलिगुड़ी से ...." कवि रोबिन सूर सम्मान" { हिंदी कवि सम्मान }सन 2002 में2...." हिंदी विद्या रत्न भारती सम्मान " कादंबरी सहिय परिषद सन 2003 में3...." डा 0 खूब चंद बघेल सम्मान "2005 में4.... प्रसस्ती पत्र " हिंदी साहित्य हेतु , छत्तीस गढ़ अल्प संख्यक आयोग द्वारा सन 2005 में5.... " राष्ट्र भाषा अलंकरण " छत्तीस गढ़ प्रचार समिति द्वारा सन 2008 मे6.... प्रेमचंद अगासदिया सम्मान 2019 7.... बांग्ला साहित्य अकादमी { छत्तीस गढ़ शाखा द्वारा } प्रशस्ति पत्र 2010 मेंसंप्रति ----1.... जन संस्कृति मंच दुर्ग - भिलाई ( छत्तीसगढ़ की अध्यक्ष )2....बंगीय साहित्य संस्था भिलाई शाखा की संरक्षक।संपर्क --- 63/4 नेहरू नगर पश्चिम , भिलाई , छत्तीसगढ़ , 490020फोन न0...9329509050ईमेल ....mita.dasroy@gmail.com9329509050 यह मेरा व्हाट्सएप नम्बर है ।नोट- पोस्ट में प्रयुक्त सभी रेखाचित्र चित्रकार अनुप्रिया के बनाए हुए हैं।
सोमवार, 28 फ़रवरी 2022
समकाल : कविता का स्त्रीकाल-26
जयश्री सिंह की कविताएँ जीवन की सघन अनुभूतियों से उपजी मानवीय संवेदनाओं की उपज हैं।यहाँ स्त्री जीवन के साथ -साथ समय और समाज के बदलते जीवन मूल्य एवं मानवीय करुणा की बानगी देखी -परखी जा सकती है।दुनिया में कितना दुख है इसे स्त्री अपनी दृष्टि से देख रही है,उसके लिए इस दुनिया को देखने के लिए कुछ रास्ते इसी कविता की भूमि ने उपलब्ध कराए हैं।जयश्री सिंह मुम्बई की भागमभाग में मानव का संघर्ष देखती हैं,लॉक डाउन में मजदूरों की पीड़ा हो या स्त्रियों के हिस्से की त्रासदी हो ,वह इन बातों के अन्दरखानों में उतरने का जोखिम लेती हैं और कविता में अपने रंग-ढंग से पिरोती हैं-
जयश्री सिंह की कविताएँ
1) खौफ़
एक भयानक कोलाहल
चारों ओर
सैकड़ों लोग दौड़ते - भागते हाँफते
पीछे चले आ रहे हैं
पलट कर देखती हूँ तो सन्नाटा है
इस कोने से उस कोने तक
कहीं कोई नहीं
एम्बुलेंस की एक उड़ती हुई आवाज
चीखते हुए गुजर जाती है
किनारे बैठे लोग
काली चादर ओढ़े सो चुके हैं
हजारों कदमों की धमक को एक बार में सह लेने वाला शहर का पुराना पुल
शवों के बोझ से थर्रा रहा है
अस्पतालों के गलियारे
पुल में बदल रहे हैं
मौत किनारे - किनारे काली चादर ओढ़े सो रही है
कुछ देखा - अनदेखा किये
सैकड़ों लोग
दौड़ते - भागते - हाँफते
एक दूसरे को धकियाते
गलियारे से गुजरते जा रहे लोग
चीखते पुकारते
हटो..., हटो..,
थोड़ी सी जगह दो
जल्दी करो, जाने दो मुझे
साँस उखड़ रही है
एक तीसरी निगाह भीड़ पर से उड़ कर गुजर जाती है
शहर बेचैन हो उठता है
टीवी खुली है
खिड़कियाँ बंद हो चुकी हैं
जगह - जगह धब्बे
गहरे काले धब्बे
दृश्यों के साथ उतरते जा रहे धब्बे
आगे कुछ दिखाई नहीं दे रहा
धब्बे घुप्प अँधेरे में बदल रहे हैं
चारों ओर निराशा
मायूसी अकेलापन
बेचैनी घबराहट घुटन संक्रामक हो कर
ज़ेहन में फैल रही है
लोग भाग रहे हैं
अपनों के छू जाने के डर से
बेतहाशा भाग रहे हैं
सारे रास्ते बंद हैं
सारे दरवाजे बंद
महीनों से घरों में बंद लोग
अपने - अपने में बंद हैं।
2) अस्तित्व
खोद कर जमीन
मिट्टी से पूछा
क्या तुम इसी ज़मीन का हिस्सा हो?
पहाड़ों को ढ़हा कर
मलवों से
भू - कम्प ने
माँगा अस्तित्व।
पाट दिया गया प्रशांत भी
हिंद की
पहली बूँद की ख़ातिर
जला दिए गए जंगल
वाज़िब सबूत की तलाश में
शक में घिरी घटाएँ
जो दे न पायीं
अपने आसमानों की गवाही।
धरती इतनी बौखलायी
पहले कभी न थी
आसमानों ने
कभी न बरसायी थीं चिंगारियाँ
कभी राख न हुए थे
इससे पहले
करोड़ों की संख्या में
निर्दोष बेजुबाँ।
यह एक दुःसह
दुःस्वप्न था
जड़ - चेतन के
अस्तित्व का प्रश्न था
माँग लिया था किसी ने
पृथ्वी से
उसके होने का सबूत।
3 ) भागी हुई लड़कियाँ
घर की दीवारों से
भीतर तक उतर आयी दरारों में
रिस रही हैं धीरे - धीरे
मुक्ति की कामनाएँ
दुनिया भर की तोहमतों से अधिक
चार दीवारी के भीतर की
जहरीली हवा में
घुटने लगा दम
घिस चुके शब्दों की चोट से रक्तिम
उस एक भूल के लिए
लगातार कचोटता
अल्हड़ सा मन
अवचेतन में
पुरानी रील सा
जब - तब
घूम जाता
वो बीता बचपन।
रिहा होने की चाहत में
पार कर दी थी
उन्होंने सारी सीमाएँ
नये स्पर्श में बहक कर
डाल से टूटीं
और फिर
टूट कर रह गयीं
हर बार किसी तीसरे के साथ
भागे जाने के
नये शक में घिरीं।
रिक्त हो जाने की सारी हदें
पार कर देने के बाद भी
नहीं बुझा पायीं शक की प्यास
कटीली उलाहना
क्रूर प्रताड़ना से
रगड़ दी गयी
उनकी अंतर्आत्माएँ भी।
घर से भागी हुई लड़कियाँ
जितनी देर के लिए चुहल बनी
उतनी ही देर आजाद रह पायीं
फिर जीवन भर के लिए
किसी बद्दिमाग की निगरानी में
कैद हो गयीं।
4) मैं रहूँगी
यदि डर है तुम्हें
कि बचा नहीं रहेगा कुछ भी
अंत तक
मैं तब भी
बची रहूँगी।
मैं हवा हूँ
मिट्टी हूँ
आग हूँ
नमी हूँ
तुम्हारी अनुकृति हूँ
मैं स्वीकृति हूँ
बचे रहने के हर रूप में
स्त्री हूँ।
मुझे बेचाल चले
चलन से डर लगता है
जबरन हो रहे
हनन से डर लगता है
यदि बचाना चाहो
सब कुछ
तो बचा लो मुझे।
मैं सामूहिक पतन के
अपराध से डरी हुई हूँ।
5 ) चाँदनी
दिन ढ़लते ही
ये चौराहों पर चाँदनी सी उतरती हैं
लोगों की निगाहों से बच कर
खुद को
काले शीशे की गाड़ियों के सुपुर्द कर
निकल जाती हैं
रात की उन यात्राओं की ओर
जो इनके जीवन से भी लंबी हैं
ये सुबह अँधेरे
उन्हीं गाड़ियों से लौट आती हैं
दुपट्टों से मुँह ढँके
टूटते तारों सी
गाड़ियों से उतरकर
उन अँधेरी गलियों में खो जाती हैं
जहाँ से सज-धज कर
शाम इन्हें फिर से निकलना है।
ये आधी रात की
बदनाम गलियों को
अपनी अदाओं से गुलजार करती हैं
लचकती कमर
और चमके गालों के पीछे
छोड़ जाती हैं एक भरा-पूरा परिवार
लाचार माँ, बीमार बाप
और छोटे भाई - बहन।
ये उनके सुरक्षित भविष्य की खातिर
अपने लिए चुनती हैं
आधी रात की असुरक्षित दुनिया
और मेडिक्लेम पॉलिसी से परे का एक असाध्य रोग
जो जल्द ही इन्हें
जीवन से मुक्ति दे देता है।
इनकी यात्राएँ बहुत छोटी हैं
और रातें बहुत लंबी
ये अपने पीछे एक दूसरी चाँदनी छोड़ जाती हैं।
6) धुंध
शहर की सबसे ऊँची इमारत से
दूर की उस दुनिया को
कुछ पल के लिए
आँखों में उतार कर
अपने अकेलेपन को
भूल जाना चाहती हूँ
सहसा
बुझे बादलों के बीच खुद को घिरा पा कर
घबरा जाती हूँ
और उतर आती हूँ
एक ही साँस में
नीचे
उस बालकनी की ओर
जहाँ से देखती हूँ रोज
अपने हिस्से की एक सीमित दुनिया।
अचानक अपने चश्मे का नंबर बढ़ा पाती हूँ
आँखों को बार-बार रगड़ कर
देखती हूँ
एक चिड़िया
चोंच में चुग्गा लिए
बालकनी में
बिलकुल पास बैठी
मुझसे अपने घर का पता पूछ रही है
मैं दूर तक नजर दौड़ाकर
उसके घोंसले को ढूँढती हूँ
चूजों की जानी पहचानी आवाज
लोगों की आवाजाही
और मोटरों की चिल्लाहट के
सम्मिलित स्वर को
अपने आस - पास बिखरा पाती हूँ
एक धुंध सी है चारों ओर
जैसे गहरी नींद में, स्वप्नलोक में हूँ
सब कुछ सुन पाने
और कुछ न देख पाने की अकुलाहट में
जागने का विफल प्रयास करती हुई
किसी तरह अपने को
भीतर कमरे में बंद कर लेती हूँ
धुंधलापन
घबराहट और घुटन में बदल जाती है
जैसे किसी ने रोक रखी हो मेरे हिस्से की ताजी हवा
और मैं उन्हें पाने के लिए बेचैन हूँ।
एक लंबी शांति के बाद
अपने को फर्श पर पड़ा पाती हूँ।
कुछ ही देर में
इस उथल - पुथल को भूल
अपने रोजमर्रा के कामों में
उलझ जाती हूँ।
दरवाजे की घन्टियों
फोन कॉलों
और दो सौ पचहत्तर वाट्सऐप मैसेज से गुजर लेने के बाद
अचानक याद आये
उस खोये हुए घरौंदे को खोजने के लिए
झटपट बालकनी का दरवाजा खोल देती हूँ।
सूरज अब भी कहीं नहीं है
उधार की हल्की रोशनी लिये
धुंध वैसी ही जमी हुई है
चोंच में चुग्गा लिये चिड़िया
फर्श पर मृत पड़ी है
पेड़ पर मरघट सी शांति है
नीचे तक उतर आये
बुझे बादलों ने
चूजों से
उनके हिस्से का आकाश
छीन लिया।
परिचय :
जयश्री सिंह
एम. ए. (स्वर्ण पदक), पीएच. डी., नेट
सहायक प्राध्यापक एवं शोधनिर्देशक (मुंबई विश्वविद्यालय)
जन्म : 13 जुलाई, मुंबई
पुरस्कार एवं उपलब्धियाँ -
१) मुंबई विश्वविद्यालय द्वारा एम. ए. में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने हेतु 'स्वर्ण पदक' से सम्मानित।
२) मुंबई विश्वविद्यालय द्वारा (एम. ए. के लिए ही) ‘पंडित नरेंद्र शर्मा हिन्दी एकेडेमिक पुरस्कार' से सम्मानित।
३) मुंबई बोर्ड द्वारा 1999 में 'सरस्वती सुत सम्मान' से सम्मानित।
४) रज़ा फाउंडेशन, नई दिल्ली द्वारा 11- 12 अक्टूबर को आयोजित 'युवा 2019' में गाँधी जी के 'प्रार्थना प्रवचन' में विचार प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित।
प्रकाशन -
१) सुरेन्द्र वर्मा के नाटकों का अनुशीलन, २०१३ (समीक्षा)
२) पूर्वोत्तर भारत का आदिवासी समाज : लोकसाहित्य एवं संस्कृति, २०१८ (समीक्षा)
३) Hingher Education in India : Retrospect & Prospect, 2020 (संपादित)
४) विविध विषयों पर 35 से अधिक शोधालेख प्रकाशित।
५) मुंबई आकाशवाणी से 3 रेडियो वार्ता का प्रसारण।
६) विविध भारती मुंबई से ‘हरसिंगार के फूल’ कहानी का प्रसारण।
७) एम. ए. हिन्दी में मुंबई विश्वविद्यालय में सर्वश्रेष्ठ अंक प्राप्त करने पर महाराष्ट्र टाइम्स द्वारा साक्षात्कार प्रकाशित।
८) मुंबई आकाशवाणी द्वारा भी उसी समय साक्षात्कार का प्रसारण।
९) शहर की संवेदनाओं पर निरंतर लेखन।
१०) 'शहर बोलता है' (पहला काव्य संग्रह) प्रकाशाधीन।
११) कला, साहित्य, संस्कृति का शहर मुंबई' पर श्रृंखला लेखन।
१२) देश की प्रमुख पत्र - पत्रिकाओं में कई कविताएँ, कहानी और संस्मरण प्रकाशित।
पता - B /601, श्री एयर इंडिया सोसाइटी, प्लॉट क्र. - 24, सावरकर नगर, ठाणे - पश्चिम, मुंबई - 400606
फोन - 09757277735
ई मेल : jayshreesingh13@gmail.com
संप्रति : सहायक प्राध्यापक एवं शोधनिर्देशक, जोशी - बेडेकर ठाणे कॉलेज, मुंबई - 400601
