बुधवार, 20 अक्टूबर 2021

पुस्तक -चर्चा

---लेखक की अमरता--- स्वप्निल श्रीवास्तव
( स्मृति- लेख  बनाम सचेत मूल्यांकन)
 पुस्तक समीक्षा - श्रीधर मिश्र

       





1954 में जन्मे हिंदी के प्रतिनिधि कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने एक लंबा रचनात्मक संघर्ष किया है व उनका संघर्ष आज भी अनवरत जारी है ।वे कविता के अप्रितम योद्धा हैं तथा कविता की लगभग चार पीढ़ियों के साक्षी ही नहीं रहे हैं वरन उसके सहयात्री रहे हैं, लेकिन इससे महत्वपूर्ण यह है कि वे कविता की बदलती प्रवृत्तियों, चुनौतियों से तादात्म्य स्थापित करते हुए आज भी उतने ही प्रासंगिक व महत्वपूर्ण बने हुए हैं,  इलियट ने  लिखा था-- बूढ़ा गिध्द पंख क्यों फैलाये- यह उसने अपने समय के वरिष्ठ रचनाकारों के सन्दर्भ में खीज के साथ कहा था,  और यह खीज हिंदी के कवियों के सन्दर्भ में भी उतनी ही प्रासंगिक है, कवि जब वरिष्ठ कवि होकर प्रसिद्धि की उपलब्धि पा लेता है तो फिर उसकी कविता में  तनाव का मुहावरा लगभग खत्म हो जाता है, वह खुद को दुहराने लगता है तथा वह मात्र कलाश्रयी होकर रह जाता है, उसकी कविता की दुनिया भी उसकी निजी दुनिया की तरह तनाव रहित, सुरक्षित व वैभवशाली हो जाती है, प्रयोगवाद के प्रवर्तक अज्ञेय तक अंतिम दिनों में इसके शिकार  होगये, " कितनी नावों में कितनी बार(1967)," पहले मैं सन्नाटा  बुनता हूँ"(1974) तक आते आते अज्ञेय का मुहावरा काफी शिथिल पड़ गया था तथा वे खुद को दुहराने लगे थे, जबकि स्वप्निल श्रीवास्तव के प्रकाशित पांचों कविता संग्रहों क्रमशः, ईश्वर एक लाठी है, ताख पर दियासलाई, मुझे दूसरी पृथिवी चाहिए, ज़िंदगी का मुकदमा, जबतक जीवन है, में स्वप्निल किसी दुहराव के शिकार नहीं हुए हैं बल्कि निरंतर वे अपनी ही भाषा तोड़ते हुए नज़र आते हैं, इसीलिए स्वप्निल की कविताओं में ताज़गी  तो महसूस होती ही है,  समय -समाज के दबावों की अनुगूंज भी मिलती है,  हिंदी के बहुत कम कवियों ने अपनी भाषा तोड़ने का जोखिम उठाया है, उसमें प्रमुख हैं निराला, एवम श्रीकांत वर्मा भी अपनी मगध सीरीज की कविताओं में अपनी भाषा तोड़कर  भाषा की सर्वथा नई भूमि पर कविताएं चरितार्थ करते हुए दिखते हैं, और इसी क्रम में स्वप्निल भी हिंदी कविता के प्रमुख कवि हैं जिन्होंने बदलते हुए परिवेश से साक्षात्कार करने के क्रम में अपनी भाषा तोड़ने का  लगातार जोखिम उठाया है इसीलिए वे आज भी उतने ही प्रासंगिक बने हुए हैं
    हालांकि उनके दो महत्वपूर्ण कहानी संग्रह " एक पवित्र नगर की दास्तान व स्तूप और महावत के साथ ही एक संस्मरण" जैसा  मैंने जीवन देखा" पहले प्रकाशित हो चुके हैं जो काफी चर्चित हुए, यह उनका नया संस्मरण याकि स्मृति लेख- "लेखक की अमरता"सद्यः प्रकाशित हुआ है  जो जितना रोचक- रोमांचक है उससे अधिक इस लिए महत्वपूर्ण है कि स्वप्निल ने अपने व्यक्तिगत संस्मरणों में  आज के साहित्यिक परिदृश्य की खूब खबर ली है, उनकी निडर व बेबाक टिप्पणियां धरोहर की तरह बहुमूल्य हैं, क्योंकि ये स्वप्निल के निरन्तर रचना-संघर्ष के घर्षण से उपजी अग्निस्फुलिंग सरीखी हैं, एक शांत व सम्वेदना के बड़े गहरे तल से सरोकार रखने वाले, सहज लेकिन विराट भाव बोध के कवि के उद्गार हैं। ये स्मृतिलेख वस्तुतः प्रकारांतर से मूल्यांकन भी हैं,     
    गिरीश कर्नाड, नामवर सिंह,केदरनाथ सिंह,मंगलेश डबराल, सव्यसाची, परमानन्द श्रीवास्तव,नंदकिशोर नवल,दूधनाथ सिंह,देवेंद्र कुमार बंगाली, बादशाह हुसैन रिज़वी जैसे महत्वपूर्ण  साहित्यकारों से साहचर्य के संस्मरण से स्वप्निल  अपने निजी अनुभव के सहारे  हमारे समय के साहित्यिक परिदृश्य की बड़ी गहन पड़ताल करते हैं, वे विमर्श के कई प्रस्थान विंदु नियत करते हैं, अपना अमर्ष व्यक्त करते हैं, उलाहना देते हैं व उनकी सीमाओं का रेखांकन भी करते हैं, अतः यह किताब कई अर्थों में महत्वपूर्ण  है।
   नामवर सिंह के सन्दर्भ में वे " तुमुल कोलाहल में आलोचना की आवाज़ " शीर्षक के लेख में कहते हैं कि "  बनारस में उन्हें हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसा गुरु मिला।यह परम्परा और आधुनिकता का मिलन था, नामवर सिंह ने अपने गुरु की लीक से हट कर अपने लिए एक मार्ग बनाया--- उनकी स्थापनाएं विवाद का विषय बनती रहीं।लेकिन वह आलोचना क्या, जो विवाद का कारण न बने" 
    आलोचना के सन्दर्भ में स्वप्निल  अपनी बेबाक व साहसिक टिप्पणीं करते हैं-" आज आलोचना लगभग समाप्त प्राय है लेकिन आलोचक के अपने दम्भ हैं।अपनी अपनी सेनाएं एक दूसरे से लड़ती हैं, जैसे वे एक दूसरे के शत्रु हों।आलोचक सेनापति की भूमिका में हैं"।  स्वप्निल आगे लिखते हैं कि" उन्होंने आलोचना को मार्क्सवादी धारा से जोड़ा और रचना को उसकी कसौटी पर कसने का काम किया।उनके सामने केवल रचना नहीं रचना के समय का समाज था,उनका मार्क्सवाद कट्टर मार्क्सवाद नहीं था, व्यवहारिक मार्क्सवाद था"
  स्वप्निल ने नामवर के बाद के दिनों पर भी खासी उत्तेजक टिप्पणी की  है जो उनके अदम्य साहस का परिचय देती है , स्वप्निल लिखते हैं कि " वह साहित्येतर कारणों से लोगों का उपनयन संस्कार करने लगे, सत्ता के साथ बढ़ती उनकी निकटता और उद्घाटन समारोहों की अतिशयता उन्हें निष्प्रभ करने लगी"
       "लेखक की अमरता" शीर्षक  के लेख में दूधनाथ सिंह से कृतित्व व उनके व्यक्तित्व से सम्वाद करते हुए स्वप्निल हिंदी की कुछ नई परम्पराओ पर बड़ा गहरा व खुला व्यंग्य करते हैं, हालाँकि भाषा की शालीनता अपनी जगह कायम है लेकिन व्यंग की धार इतनी पैनी है कि रक्त पहले निकला या दर्द पहले शुरू हुआ इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल होजाता है वे लिखते हैं " दूधनाथ सिंह ने अपनी अमरता के लिए कोई इंतजाम नहीं किया। उनके पास अंधभक्तो की फौज नहीं थी-- जो उनकी अमरता की कामना करे।हालांकि हिंदी में यह रिवाज बन रहा है कि कुछ लोग अमर होने के लिए मरने का इंतज़ार नहीं करते , वे जीते जी अमरता का अनुष्ठान करते रहते हैं, अपनी ग्रंथावलियाँ छपवाते हैं, किराए के आलोचकों से अपनी यशोगाथा लिखवाते हैं, नगर नगर में अभिनन्दन समारोह आयोजित करवाते हैं। ये वे लोग हैं जिन्हें अपने शब्दों पर भरोसा नहीं है" 
     खुद पर व्यंग्य करना सबसे साहसिक कार्य होता है, स्वप्निल अपनी ही साहित्यिक बिरादरी के सच का बड़ी निर्ममता से पर्दाफाश करते हुए लिखते हैं "लेकिन सबसे ज्यादा आदर्श की मांग लेखक से ही की जाती है।जबकि लेखक देवताओं से कम पतित पतित होता है" 
    वे दूधनाथ सिंह के सन्दर्भ में लिखते हैं" दूधनाथ सिंह ने अपने लेखन में परम्परा की रूढ़ि तोड़ा है, उनकी मूल विधा कहानी है लेकिन उन्होंने अपने लेखन को एक विधा तक सीमित नहीं किया है--- वे एक बेचैन लेखक हैं"  दूधनाथ सिंह की इस रचनात्मक बेचैनी के सन्दर्भ में स्वप्निल बड़ा वाजिब तर्क प्रस्तुत करते हैं " प्रायः विधाओं की आवाजाही को लोग संदेह की दृष्टि से देखते हैं, लेकिन उन्होंने अपनी बेचैनी को प्रकट करने के लिए अनेक विधाओं का चुनाव किया" रचनाकारों के विधागत कायांतरण के सम्बंध में स्वप्निल एक रोचक तथ्य प्रस्तुत करते हैं कि " वस्तुतः एक विधा में विफल लोग दूसरे विधा का चुनाव करते हैं। कतिपय असफल कवि आलोचना की दुनिया मे प्रवेश करते हैं"  स्वप्निल के इस अभिकथन की जांच की जाय तो हिंदी के दो शीर्ष आलोचकों पर सही साबित होता है और वे हैं रामबिलास शर्मा व नामवर सिंह क्योंकि इन दोनों ने पहले कविताएं लिखीं व बाद में कवि कर्म छोड़ कर स्थायी रूप से आलोचना के क्षेत्र में आगये ।
      " केदारनाथ सिंह की कविता के उद्गम स्थल" लेख में स्वप्निल हिंदी के प्रतिनिधि कवि केदारनाथ सिंह के जीवन संघर्षों व रचनात्मक संघर्षो की चर्चा करते हैं, केदार नाथ सिंह के सन्दर्भ में वे लिखते हैं " उनकी कविताओं में खुद अपना चेहरा देखता हूँ"
  केदार नाथ की काव्यप्रवृत्ति की चर्चा करते हुए स्वप्निल केदारनाथ की कविताओं में गीत तत्व की बड़ी बारीकी से शिनाख्त करते हुए लिखते हैं कि " केदारनाथ जी व देवेंद्र जी गीतों के बाद कविता की दुनिया मे दाखिल हुए और अपने गीत तत्व को सुरक्षित रखा" 
    केदारनाथ की कविताओं व आलोचना के मन्तव्यों को लेकर स्वप्निल  अपना खुला आक्रोश व्यक्त करते हुए केदारनाथ का पक्ष लेते हैं । वे लिखते हैं " हिंदी के वे आलोचक जो कविता को क्रांति का हथियार मानते हैं, उन्हें केदारनाथ की कविता नहीं भाती।कुछ तो इतने कटु होगये हैं कि वे उनकी मृत्यु के बाद उनपर हमलावर होगये हैं, कई तो व्यक्तिगत आक्षेप पर उतर आए हैं"।
   इसके अलावा , छोटा कद लेकिन बड़ा पद लेख में परमानन्द श्रीवास्तव, क्या यह स्मृति का दूसरा समय है लेख में मंगलेश डबराल, आलोचक की सजग दृष्टि लेख में नंद किशोर नवल ,देवेंद्र कुमार की कविताई,धर्मिक नगर में कामरेड की आवाज़, बादशाह हुसैन रिज़वी के अफसाने, आदि लेख अत्यंत रोचक व महत्वपूर्ण हैं
    स्वप्निल   इन रचनाकारों के साथ बिताए पलों को याद करते हुए जहां लेख में खुद को आद्यंत उपस्थित रखते हैं वहीं वे अपनी सजग आलोचनात्मक चेतना के चलते भावुकता के शिकार नहीं होते  यह उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है क्योंकि अपने परिचित व सुहृत को याद करते हुए प्रायः व्यक्ति भावुकता के वश में आकर अपने भीतर की अराजकता का शिकार हो जाता है, संस्मरण लेखन में इसके कई उदाहरण हैं,   स्वप्निल के ये स्मृति लेख इस लिए महत्वपूर्ण हैं कि इनमें उनकी आलोचनात्मक चेतना ने उनका कभी साथ नहीं छोड़ा है, अतः ये लेख जहाँ संस्मरण के रोचक प्रसंगों से किस्सागोई का आस्वाद देते हैं तो वहीं एक सचेत मूल्यांकन का निष्पक्ष उत्तरदायित्व भी निभाते हैं,  आलोचना का कोई बड़ा सामान्य पाठक वर्ग नही होता, इसके पाठक सीमित होते हैं  - शोधार्थी , शिक्षक, रचनाकार या आलोचक, लेकिन स्वप्निल ने स्मृतिलेखों के सिलसिले से आलोचना की जो नई प्रविधि इस किताब में विकसित की है इसे नए प्रयोग के रूप में लिया जाना समीचीन होगा
    इन लेखों में स्वप्निल ने अपने भाषा कौशल का परिचय दिया है,  संस्मरण के पलों में उनकी भाषा मे सम्वेदना की तरलता, भावुकता, के तत्त्व पर्याप्त मात्रा में उपस्थित हैं, लेखों में  कहानी की रोचक शैली में कथाविकास है  तो वहीँ मूल्यांकन के सन्दर्भो में भाषा का तेवर, ताप बदल कर गवेषणात्मक  व व्यंजना प्रधान हो जाता है, एक ही लेख में भाषा के इतने प्रस्तर का रचाव स्वप्निल के कलात्मक सौष्ठव का परिचय देता है।
     आज की आलोचना के सन्दर्भ में स्वप्निल ने लिखाहै-"आज आलोचना लगभग समाप्त प्राय है"-- उनकी इस चिंता को स्वीकार करते हुए यह कहा जा सकता है कि - "जब किसी युग मे कोई बड़ा आदमी नहीं होता तो लोग मिलकर उस समय को ही बड़ा कर लेते हैं"
  आलोचना के सन्दर्भ में इन  लेखों को अपने समय की आलोचना को बड़ा करने के सार्थक प्रयास के रूप में  लिया समीचीन होगा
  इतने महत्वपूर्ण लेखों के लिए स्वप्निल श्रीवास्तव को बधाई, आशा है यह किताब सुधी पाठकों में पर्याप्त समादर प्राप्त करेगी
 यह किताब पठनीय भी है व  संग्रहणीय भी।
    किताब के इतने सुरुचिपूर्ण व आकर्षक प्रकाशन  के  लिये प्रकाशक को साधुवाद
                       --  श्रीधर मिश्र, गोरखपुर
                        
  -  कृति-
लेखक की अमरता
 लेखक-  स्वप्निल श्रीवास्तव
 आपस पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स
   अयोध्या, उ0 प्र0

                                                                     स्वप्निल श्रीवास्तव

सोमवार, 18 अक्टूबर 2021

प्रतिभा श्रीवास्तव की कविताएँ

#समकाल_कविता_का_स्त्रीकाल

साहित्य की अपनी सत्ता है और यहाँ कविता का अपना दरबार और दरबारी हैं।आप उन्हीं नामों तक पहुँच पाते हैं जिनके नाम की मुनादी इन दरबारों से होती है।इसी दरबारी कविता के समानांतर एक आम जन की कविता कहीं भी जीवन की नमी पा अँखुआ उठती है और बार -बार पैरों से कुचले जाने,जड़ों के काटने और नकारने के बाद भी छछन-बिछन जाती है।
इधर गाँवों और कस्बों से भी इस कविता के अँकुर फूटे हैं और तेजी से इनकी लताएँ दरबारों को ठेंगा दिखाते उस आम भारतीय स्त्री का प्रतिनिधित्व कर रहीं है जिनका लिखा किसी लोकगीत की तरह पीले पड़े पन्नों में बिहउती बक्से में सड़-गल जाता था। 
प्रतिभा आज़मगढ़ जनपद में एक स्कूल टीचर हैं और दो बेटियों की माँ हैं।उन्हें दो बेटियों का ताना ख़ूब सुनने को मिलता है।कुछ आज भी सलाह दे देते हैं कि एक बेटा तो होना ही चाहिए।सहकर्मी पुरुष लिखनेवाली औरतों को निर्लज्ज तक की उपमा मुँहपर दे देते हैं और उनके उत्तर से मुँह की भी खा लेते हैं। यही हमारी दुनिया है और यही यहाँ की रवायत है।वह लिख रही हैं अपने जीवन का अनुभव और बड़ी बेबाकी से पितासत्ता से सवाल पूछती हैं अपनी कविताओं में।
कल गाथांतर के मंच से जनपद की युवा कवयित्री प्रतिभा सिंह की कविताएँ आपके बीच थीं आज उन्ही की हमनाम प्रतिभा श्रीवास्तव की कविताएँ हम आपसे साझा कर रहे हैं।उम्मीद है इन गाँव ,कस्बों की आवाज आप तक पहुँचेगी और इनकी कविता इस बात की मुनादी करेगी कि बदल रही है औरतों की दुनिया उस आखिरी कोनों में जहाँ कभी सिर उठा कर बोलने का साहस नहीं था।

प्रतिभा श्रीवास्तव की कविताएँ...

"भाग्य और ईश्वर "
भाग्य औरतों के मत्थे थोपा गया अश्लील रुदन है 
बेटियाँ भाग भरोसे जनी गईं
भाग भरोसे एक बाप के बारह  हुईं
सबने कहा ये बेहया के फूल हैं
 डाढ बन जाएंगी
इनको तेल ,बुकुवा , उबटन की जरूरत नहीं रही
भाग भरोसे बेटियों के  पैरों में जान आई
बेटियां सब  खाती थीं
साग ,भात ,बासी मच्छी , थाली की बची रोटी ,छूटा  दाल का कटोरा, कच्चा ,पक्का सब
बेटियां बाप, भाई कक्का, काकी भी खाती थीं
ये कुल का शाप कही गईं

जिन बेटियों की पीठ पर भाई जन्में
 बड़भागी कहाईं
इनको जरा दुलार मिला
 कभी दूध , घी मिला
 कभी अम्मा के हाथ की ताजी रोटी 
कभी जलेबी का बड़ा छत्ता
बेटियाँ बसवारी की कईन सी बढ़ती रहीं
इनके माथा, होंठ , कान , नाक ,हाथ, पैर से भाग विचारा गया
ऊँचा माथा ,चौड़े हाथ , चपटे पैरों वाली लड़कियाँ अभागी  हुईं
छोटा मत्था ,सुंदर हाथ और छोटे पैरों वाली लड़कियाँ सुभागी हुईं
सुभागी लड़कियों के रिश्ते घर आये
इनके ब्याह के लिए नकारे गए लड़के
ये मान दुलार से ब्याही गईं
जिन घरों में पुत्र जन्में
वहाँ पूत जन्मने वाली बहू
का मान बढ़ा
ये गोल बिंदी सेंदुर की लंबी रेखा सजाए साड़ी गहनों से लदी मर्दों की पसंदीदा औरतों ने
 मर्दों की हर बात मानी 
ये घर की लड़की को दफनाने से खुद दफन हो जाने तक
 होंठो पर मुस्कान सजाए पीती रहीं आसुओं में घुला रक्त
इन घर के पुरुषों की चहेती औरतों ने 
स्वयं का पुरुष हो जाना ही सच माना
जिन अभागी बेटियों के बाप वर खोजते थके
उनके फेरे बेल के पत्ते , केले के तने , नीम के पेड़ से हुये
इनके ब्याह के लिए केवल एक पुरुष चाहिये था
ये भाग भरोसे ब्याही गईं
ये कम सूरत ,कम सीरत ,कम दहेज वाली बहुओं को खाने में पहले दिन  बासी कढ़ी मिली
ब्याह की दूसरी सुबह ये रसोई में थीं
इनकी बनाई दाल में स्वाद न आया ,सब्जी रंगहीन रही और रोटियाँ कभी गोल न बनीं
ये फूँकती रहीं चूल्हे में साँसे
पिघलाती रहीं गर्म रोटी पर  प्रेमिल ख्वाब
इनकी आँखे धुयँ के बादलों संग भाप बनीं
इनकी पीठ पर लाल चिमटों के निशान पड़े
इनकी उंगलियां गर्म तवे पर सुर्ख हुईं
ये मायके की उपेक्षित बेटियाँ  ससुराल की बेशऊर बहू रहीं 
ये बेटा जनने के लिए कई कई बार गिराती रहीं कोख 
ये पुरुष प्रेम के लिए पूजती रहीं बरसों बरस ईंट, पत्थर , शिवाले
इनके देह में अबूझ रोग लगे 
ये बड़ी कम उम्र निकलीं 
कोई स्टोव फटने से 
कोई बच्चा जनने से
कोई कुआँ ,तालाब डूब मरी
किसी  किसी का मरना हमेशा राज रहा
इन लड़कियों के लिए जन्म से मरण तक 
रोया गया भाग्य का रोना 
ये जन्मते ही बोझ समझी गई लड़कियाँ 
पूरी उम्र अभागी रहीं।
भाग्य और ईश्वर औरतों के हिस्से ही अधिक आया 
मर्दों ने चालाकी से  अपने हिस्से सदा पुरुषार्थ रखा।
 

*********************

"माँग और पूर्ति"

आँचल से बांध लिया एक टुकड़ा बादल,
जब बन्द मुट्ठी में कसाया मन
पलकों पर कुछ बूंद बारिशें अटकीं
दर्द दबा लिया दांतों के बीच
कि टीसता रहा सदैव
वह आह्लादित थी, 
अचंभित भी
कठोर बाहुपाश में जब तलाशा जा रहा था मोक्ष 
कसे जा रहे थे बन्धन के तीखे ताँत 
उसकी
 स्वीकृति के उपबन्धों में 
वह मानुषी से परे
 मिथकों में वर्णित अप्सरा थी ।
तेज नाखूनों से गीली मिट्टी पर लिखे गए असंख्य प्रेमगीत
मधुर लहरी में डूबी बावरी , 
रजनीगन्धा हुई
बादलों संग हवा सी लिपटी 
आकाशगंगा की लहरों पर तैरती 
तेजोमय तारा थी,
वह चिंता ,भय ,दुख से मुक्त थी
आत्मसात किया 
ईश्वरीय सत्ता का सिंहासन
पूर्ण माना जीवन का प्रारब्ध
किन्तु......
अन्तर्ध्वनित , 
आशंकित प्रश्न
क्या  ... इतना भर  ...
प्रेम है ??
अचानक थम गये सरपट भागते सातों घोड़े
सूरज ने मुँह छुपा लिया 
खोहों से निकल टिड्डियाँ फड़फड़ाने लगी
यह बोलती है ...!
प्रश्न करती हैं....!
प्रेम में प्रश्न।
प्रेम ईश्वर है.!
ईश्वर पर प्रश्न ...!!
पाप है..! ,पाप है...!, पाप है...!।
अफवाहों के पँख पहन बहुत दूर उड़ चला प्रश्नवाचक चिन्ह,
काश..
  घड़ी की सुइयाँ भी प्रेम में पड़ती 
अड़ कर रोक देतीं ,
ऋतुओं का बदलना
पावस की आभा में खिलखिलाते इंद्रधनुषी रंग
छिटक गए ...
क्या इतना भर प्रेम है ..?
जैसे हर बरस लौट आते हैं रूठे आवारा बादल 
दहलीज तक आती कच्ची मिट्टी की सड़क पर ठहरे पैरों के निशान लौट पड़े
सड़क के दूसरे छोर पर
फुसफुसाती हवाओं ने देखे पीठ पर चुभती अंगुलियाँ
गहनतम क्षणों में,
आकुल आँखों में घुलित कतरा भर खारा प्रश्न ......
क्या मात्र यही प्रेम है ??
कसी हुई गुलेल से छिटके कँचे
जीतनी थी जमाने की दौड़ 
छूटता गया 
गाँव ,नदी पहाड़
लौटती डाक के पत्र सदा ही अलिखित  रहे।
एक ऋतु जो बीत  गई
ठहर गई कहीं भीतर
तमाम कोशिशों में एक कोशिश
कि पढ़ सके भाषा 
बांच ले ज्ञान 
किताबों ने जिसे प्रेम सिखाया
वह  मात्र भावनाओं का व्यापार है
प्रेम  के अर्थशास्त्र  में
संवेदनाएं मुद्रा
और अवधारणाएं
माँग और सापेक्ष , निरपेक्ष पूर्ति हैं।
 
********************





"प्रेम "

काल की निर्मम पीठिका पर
 प्रेम का हस्ताक्षर लिखता  ,
नायिका की आँखों में 
सुंदर सपनों की श्रृंखला सजाता
नायक,
विस्तृत दृढ़ वक्ष पर, सिर टिकाए 
 अनिश्चित ,
किंतु आश्वस्त  , 
उलझी उंगलियों के बीच ब्रम्हाण्ड थामे हुए
 नायिका ।
यह दृश्य  सबसे सुंदर  हो सकता था ..,
बशर्ते कि ....,
प्रेमियों की हत्या के षड्यंत्र न रचे जाते ।
खोने और पाने के बीच , 
प्रेम के हिस्से अक्सर खोना आया ।
मछलियों का सागर के विरुद्ध होना..?
हवा को खिड़कियों में कैद रखना ..,
पृथ्वी को सूर्य के विरुद्ध करना
क्या सम्भव है..?
प्रेम के सौंदर्यशास्त्र में,
 विछोह सर्वाधिक सुन्दर था ..।
बहुत बेबस थी ,
मुंडेर पर बैठी हुई मैना
उसने असंख्य विरह के गीत गाये ..!
सिर पटक ,पटक कर पत्थरों को  मोम होने की सौगंध दी  
परन्तु ...,
प्रेम का परिणाम बदलना 
चिड़िया के बस में कब था..??
मनुष्यता के विकासक्रम में,
'सृजन ' सृष्टि का सार है ।
तथापि ,
प्रेम कैद है,
 सभ्यता की ऊँची मीनारों में 
प्रेमियों की मुट्ठी में बन्द हैं 
लाल,
गुलाबी,
पीले रंग की तमाम चिट्ठियां
और,
प्रेमिका के गालों पर ,
खिंची हैं प्रतीक्षा की कालजयी रेखाएं ।
यकीन मानिए..,
एक दिन , 
समुद्र में नमक इतना अधिक होगा कि ,
गल कर नष्ट हो जाएगी धरती ।
मेरा,तेरा,उसका .....,
ईश्वर एक होगा
 अथ, 
पुनर्जन्म के लिए जुड़े होंगे सैकड़ों हाथ ।
वास्तव में .., 
'प्रेम ' प्रकृति का 'प्राण 'है 
और..,
प्रेमियों की हत्या ,
विश्व की सबसे बड़ी क्षति ।

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"राजधर्म ..  "

 अबकी,  झरबेरी के फूलों का रंग सुर्ख लाल है   
भटकटैया के काँटों की धार बड़ी तेज हुई ।
हवा में कुछ ऐसी तल्खी है कि
बिल्ली के बच्चों ने मना कर दिया दूध पीने से और
मिठाईलाल के कुएँ का पानी खारा हो गया है।
कई दिन से लापता है , 
बेचन की बेटी सोनपतिया 
बंशी किसान की फसल काट ले गए चोर
लेकिन  ...,
कहीं कोई क्षोभ नहीं 
हर्ष ही हर्ष है ।
सब देख रहे राजा को 
टकटकी लगाए
वह न्याय करेगा ....
वह दुःख हरेगा...
खबर फैली है कि.. ,
राजा  सर्वशक्तिमान है 
सर्वकालिक है 
उसे प्राप्त है ईश्वर का वरदान
उसके छूने भर से लोहा मोम और
 मोम लोहे में बदल जाता है।
बड़े भोर  ही 
मरचिरैया ने  टेर  लगाई है
सशंकित है पंडित रामदीन की गाय 
जो चरने जाती है 
कलीम कसाई के खेत के बगल
कामरान को एतराज है 
कि , उसके घर में मंदिर की घण्टियों की आवाज क्यों पहुँचे
राजा दोनों आँख खोल कुछ न देख पाने का अभ्यास कर रहा
राजा के अनुयायी तैयार हैं 
 अबकी ,
राजतिलक विशेष है
अबकी ,
अनिवार्य है मानव रक्त 
दीर्घजीवन के लिए।
अबकी, गौण  है भूख , प्यास ,दर्द 
 विशेष है ....,
राजधर्म ।।

***********



"मृत्यु से संवाद "

मौत..!
 खबर तुम कर देना..
दरवाजा खटखटाना या 
डोर बेल बजाना 
भीतर कदम रखने से पहले  ठहरना कुछ देर
आँधी जैसे , मत आना ..
न आना चोर जैसे
आना नदी की मद्धम लहर जैसे
अतिथि बन मत आना
कुछ रोज पहले आने के 
खबर करना 
टेलीफोन , फैक्स , एस एम एस 
या, 
 किसी रँगीन कागज पर भेज देना मेरा उजड़ा हुआ घर 
घर के भीतर 
बिलखते परिजन 
पगलाई प्रेमिका
और मिट्टी में धँसी मेरी अंकशायिनी 
मौत ..! 
 ये न हो पाए तो एक संकेत भर कर देना ।।
मेरे बच्चे  बहुत छोटे हैं ,
कहने का मौका भर  देना 
कि.... ,
गिद्ध बहुत हैं यहाँ
तुम्हें नोंच कर फेंक दें 
 इससे पहले ही
उड़ना सीख लो ।
न सही तो ....
पैरों पर दौड़ कर ,
बचना सीख लो
 माँ ... उसके जोड़ो में दर्द बहुत 
जिस  मालिश से दर्द जाता है 
 वह मेरे ही हाथ हैं।
पिता ...,
उन्हें दिखता कम है
मोतियाबिंद का ऑपरेशन करवाने से डरते उनकी आँखे मुझे देख के 
चमकती हैं ।
उन्हें सूचना देनी है 
 कि ...
ऑपरेशन सक्सेसफुल।
पत्नी.... 
उसका ईश , प्रेमी और और पूरी दुनिया 
 मैं...
उससे कहना है...  कि ,
मैं , उसे उतना नहीं चाहता जितना कि वह मुझे  
उससे प्रेम में किये ..
 छल गिनवाने हैं।
प्रेमिका ....जिसने कुछ नहीं चाहा  कभी
उसके साथ  एक पूरा दिन गुजारना है।
मौत ..! 
थोड़ा ठहरना ...
मुझे किये गए पाप और पुण्य का लेखा जोखा बनाना है।
ज्यादा नहीं ....
हफ्ते भर के कुल सात दिन  देना मुझे ,
छोटे बडे ,
सारे काम निबटा लूँगा ।

**************

"पति त्याज्या "

अभी कल की ही बात है.....
तुम्हारे कपड़े  ..हेयरस्टाइल ..चाल ढाल..  सक्रियता
ऑफिस से मिले किसी  काम में
जान लगा देने की तुम्हारी आदत चर्चा का विषय थी
उनका कहना था ..
 तुम्हारी बॉस के साथ बहुत नजदीकी है ..
ये कहते हुए 
उन दो पुरुषों के चेहरे पर  कुटिल मुस्कान थी ..
वहाँ बैठी दो औरतें उनकी हाँ में हां मिला रही थीं ।
एक तीसरी औरत जो शायद उनके विरोध में बोलना चाह रही थी 
 चुप कर गई  ।
उनका कहना था  ,
दुपटटा न लेना
दो  स्मार्ट फोन रखना
ऑफिस  के कार्यों में आगे रहना
प्रेम  कविता लिखना
फेसबुक पर फ़ोटो अपलोड करना 
बहस करना
पुरुष मित्र  बनाना.
सब औरतों की चरित्रहीनता के लक्षण हैं जैसे कि तुम्हारे बारे में वे सब जानते  हैं
तुम्हारे चारित्रिक दोष एक एक कर गिनाए जा रहे थे ।
तुम्हारे पक्ष में और उनके मत के विरुद्ध  बहुत से तर्क दिए मैंने
बात सिर्फ तुम्हारी ही तो नहीं थी  
  एक मुट्ठी आसमान  की खोज में निकली हर स्त्री की थी 
मैंने स्त्रियों के हक पर  कुंडली मारे 
कुंठित पुरुष सत्ता के विरुद्ध
एक पूरा वक्तव्य दिया 
वैदिक युग के बाद क्रमशः स्त्री की स्थिति में  अवनति की बात कही
धर्म के ठेकेदारों द्वारा रचित  आडम्बरों को स्त्री विरुद्ध सिद्ध किया
सती प्रथा  के विरुद्ध , समुचित शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए  औरत के  संघर्ष की याद दिलाई
गर्भ में मार दी गईं और बलत्कृत होती औरतों की बात कही ।
मैंने तर्क दिए यदि सावित्री बाई फुले पहला  महिला महाविद्यालय न देतीं 
 लडकियों के लिए विश्वविद्यालयों के द्वार आज भी बंद होते
 कहा कि ,
औरतें ..., 
घर से बाहर निकल रही  सब मिलकर बदलाव लाएंगी.
अभी तो शुरुआत  है 
आगे बहुत कुछ बदलेगा
जब संसद से सड़क तक आधी औरतें होंगी 
तब यह दुनिया औरतों के जीने लायक बन पाएगी
लेकिन ...
वे कब हार मानने वाले ...
ठठाकर हँसे ...
तुम्हारे ,घर.. परिवार ...खानदान. का समुचित पोस्टमार्टम के बाद
मेरे घर तक आये 
पुनश्च
तुम्हें पति त्याज्या
और मेरे लिये अर्थपूर्ण  मुस्कुराहट दिखा
अंततः
वे सन्तुष्ट हुए।।

*************

"छोड़ी गई प्रेमिकाएँ"

मैं प्रेम में नहीं ...!
ये सम्बन्ध , जरूरत भर है ।
जितना मुश्किल है ...
एक प्रेम में डूबी लड़की के लिए यह सुनना,
उतना ही आसान है ..
एक प्रेम से उकताए पुरुष के लिए यह कहना ।
लड़की तवे पर छौंकी जिंदा मछली सी छिटक गई,
प्रेमी की आँखों में ,
अमलताश के फूलों का रंग झक्क सफेद था।
वह सहेज लेती है , विभ्रांत मन
क्या ...?
अब नहीं आओगे  !
पता नहीं ..!
प्रेम व्यापार न हुआ
 कि  अधजगी रातों के बदले मांग लेती लड़के का एक पूरा दिन ।
दुर्लभता ही सदैव आकर्षक है,
सुलभता   से चाहत मर जाती।
यह मरी हुई चाहतों के लिये जिंदा बची लड़कियाँ..,
प्रेम बाँट ,
खाली  शीशी सा लुढ़कती हैं ,
रात बेरात ,
सूनी छत पर टहलती हैं,
भरी नींद में ,
चौंक कर जगती हैं।
ब्रम्हाण्ड की थाह लेने  वाला पुरुष,
औरत का मन की थाह न पा सका ।
बेहद उदास दिनों में ...,
लड़की पुरुष के लिए , 
घनी छांह... ,
मीठे जल का स्रोत.. ,
उजला दीपक ..., 
मां की लोरी... ,
कहानियों की सुंदर किताब थी ।
जिसे  सीने से लगा , वह बच्चा बना रहता।
जिन परिदों के अपने नीड़ नहीं .,
वे ,दूसरों के घोसले में अपने अंडे सेंकते हैं।
भावुक लड़कियां ,अभिशप्त हैं सेंक का आश्रय बनने को।
उसके ह्रदय में दर्द  का समंदर है।
भरी आंखों से प्रेमी को विदा करती लड़की ,
हमेशा ...खुश रहने की दुआ करती है ।
सड़क के उस पार जाने की शीघ्रता में 
प्रेमी नहीं देख पाता  , 
 कि ,उसके नाम का पहला अक्षर काढ़े हुए रुमाल को लड़की ने मुट्ठी में कस लिया है।
बाद के दिनों में...
स्याह रात की रोशनाई से लिखती है निशब्द चिट्ठियां ..,
पुराने सिक्कों को , मिट्टी की तहों में दबाती  
सिक्कों के घुल जाने की उम्मीद करती ।
ये , याद के कटोरे में तिनका तिनका घुलती हैं ।
ये ,भूले प्रेमी का नाम बायीं हथेली के उल्टी तरफ लिखाती हैं।
छोड़ी गई प्रेमिकाओं को ,
पुरानी डायरी सा भूलता प्रेमी ..
किसी नए जूड़े में ,रजनीगन्धा के फूल सजाते हुए गाता ...
"मेरे प्यार की ,उमर हो ,इतनी सनम,
तेरे नाम से शुरू ,तेरे नाम से खतम"
भावुक लड़कियाँ  ,
प्रेमियों के इन्तेजार में 
धरती में जमा 
कोई पेड़ बन जाती हैं।

************

नाम  - प्रतिभा श्रीवास्तव 
रसायन शास्त्र एमएससी 
प्राथमिक शिक्षिका 
पता -आजमगढ़ उत्तर प्रदेश 
कविताएं प्रकाशित .जन सन्देश टाइम्स समाचार पत्र,सुबह सवेरे समाचार पत्र , सामयिक परिवेश पत्रिका,अदहन पत्रिका, बहुमत पत्रिका,  कविता बिहान पत्रिका ,स्त्री काल पत्रिका,स्त्री काल ब्लॉग ,पुरवाई ब्लॉग स्वर्णवानी पत्रिका । अभिव्यक्ति के स्वर में लघुकथाएं  इंडिया ब्लॉग और प्रतिलिपि पर कहानियां प्रकाशित।



रविवार, 21 अक्टूबर 2018

जलेस लखनऊ आयोजन की रिपोर्ट


समकालीन कविता में स्त्री

कविता घुप्प अन्धेरे में आशा का टिमटिमाता एक कतरा उजास है।भारतीय परिवेश में स्त्री के हिस्से असंख्य बन्धनों से जकड़ी एक ऐसी दुनिया है जहाँ शिक्षा से लेकर खाने-पीने,पहनने-ओढ़ने,शादी तक के निर्णय का अधिकार पुरूषों के द्वारा थोपे जाते हैं।वह साक्षर हुई,लिखते-पढ़ते घर की देहरी लांघ देखते -देखते मध्य वर्ग एवं निम्न मध्य वर्ग की अर्थव्यवस्था का मेरूदंड बन गयी किन्तु उसकी कमाई पर मालिकाना हक आज भी बड़े पैमाने पर पुरूषों के हाथ में है ,ऐसे में उनके अन्दर की छटपटाहट तेज बढ़ी।वह अपनी बात कहने, सुनने ,सुनाने का रास्ता तलाशने लगी और एक खिड़की खुली सोशल मीडिया की।सोशल मीडिया ने स्त्रियों को अभिव्यक्ति का बड़ा मंच दिया और एक दम से हिन्दी जगत में कवयित्रियों की बड़ी फौज खड़ी हो गयी।अब समय है मूल्यांकन का।सवाल यह है कि जिस समय में एक साथ साठ से अधिक कवयित्रियाँ सक्रिय हों ,उनका लेखन कविता में कौन से नए वितान तान रहा है?

              इन बातों को केन्द्र में रख कर जनवादी लेखक संघ लखनऊ की इकाई ने अपने दो दिवसीय वार्षिक आयोजन में पूरे एक दिन का दो सत्र "समकालीन कविता में स्त्री" विषय फर केन्द्रित किया।यह किसी लेखक संगठन का पहला अवसर रहा जब मंच पूरी तरह युवा स्त्री लेखकों के हाथ था,यह पहल ही सर्व प्रथम स्वागत योग्य है कि वैचारिक लेखक संगठन ने स्त्रियों को मुख्यधारा से जोड़ने की बड़ी पहल की।कथित तमगे तो बहुत होंगे किन्तु प्रमाणित पहल यह लखनऊ में अपने आप में पहली रही।चर्चा सत्र की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध दलित लेखिका अनीता भारती ने की तथा संचालन डॉक्टर संध्या सिंह ने किया।मंच पर युवा लेखिका ज्योति चावला ,सोनी पाण्डेय, सुजाता और प्रतिभा कटियार मौजूद थीं।विषय प्रवर्तन सोनी पाण्डेय ने करते हुए कुछ सवाल खड़े किए,उन्होंने कहा कि आखिर कब तक स्त्री कविता रूदन पर केन्द्रित रहेगी,कब तक स्त्रियाँ लिखेंगी मैं नीर भरी दुख की बदरी,आज समय और समाज बदल चुका है,उसके संघर्ष के आयाम बदल चुके हैं,ऐसे में उसकी दृष्टि का विस्तार कब होगा?ज्यादातर स्त्रियाँ या तो प्रेम लिखती हैं या रूदन ,उनके पास अपनी भाषा का अभाव है,विचार का अभाव है ,जबकि कविता की सबसे बड़ी ताकत विचार होता है। 

           चूकीं आयोजन वैचारिक लेखक संगठन का था ,इस लिए कविता में विचार पक्ष की बात न हो यह संभव नहीं।एक तरफ स्त्रियाँ पुरूषों के समानांतर चलने की बात करती हैं और दूसरी तरफ स्त्री विमर्श का सुरक्षित क्षेत्र भी चाहती हैं ,ऐसे में पुरूष कविता के समानांतर उनका मूल्यांकन कैसे संभव है?इन पक्षों पर चर्चा को आगे बढ़ाते हुए डॉक्टर संध्या ने जरूरी बात कही कि" कहाँ तो हिन्दी कविता मीरा और महादेवी के स्वर में स्त्री की आन्तरिक चेतना का विद्रोह बनकर फूटी,वह अपनी बात कहने का साहस करते हुए आगे बढ़ी और कहाँ वह होना सोना दुश्मन के संग की ओर मुड़ कर देह विमर्श की बात करने लगी।नया ज्ञानोदय के नयी पीढ़ी की रचनाशीलता अंक में वरिष्ठ कवयित्री कात्यायनी भी इस पक्ष पर अपनी बात रखते हुए कहती हैं..."मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ेगा कि अपवादों को छोड़कर नयी पीढ़ी के सृजन का विचारात्मक आधार कमजोर है। उनमें न समाज की वैचारिकी की सुसंगत समझ है,न ही साहित्य की वैचारिकी की।इसका मूल कारण हमारी शिक्षा की पतनशीलता है।" कविता में जब तक विचार पक्ष मजबूत नहीं होगा,कविता की उम्र बड़ी नहीं होगी।समकाल में भले वह गोलबंदियों के आधार पर चर्चा पा जाए किन्तु आगे नकार दी जाएगी। हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ तेजी से उन्माद बढ़ रहा है,इतिहास के तथ्यों को उल्टा-पल्टा जा रहा है,लोग भीड़ में बदलकर न्याय कर रहे हैं,हर हाथ में हथियार है,समाज में हिंसा बढ़ी है।आम आदमी का जीवन संघर्ष बढ़ा है,स्त्रियों के साथ अपराध चरम पर है,ऐसे में केवल एक पक्षीय प्रेम या माँ,नानी,चाची का दुख लिखा जाए ,समझ से परे है।

एक बात  जो ध्यान खींचती है वह यह है कि औरतों में अस्तित्व बोध बढ़ा है...वह स्त्री मुद्दों पर सोशल मीडिया से लेकर ज़मीन तक प्रतिरोध दर्ज कर रहीं हैं,माना अभी इनकी संख्या इतनी नहीं की जुलूस में तब्दील हो सकें किन्तु व्यवस्था की जड़ में खटाई बखूबी ड़ाल रही हैं।इनका मुखर विरोध गद्य और पद्म दोनों विधाओं में सामने आ रहा है ,जिसमें गद्य की भाषा ज्यादा सशक्त है।प्रतिभा कटियार ने इन बिन्दुओं पर अपनी बात रखते हुए कहा-" समकालीन कविता में स्त्री एक जिद की तरह है,जब चारों तरफ समय विषमताओं से भरा हो स्त्री मिलन के सुख से भर जाना चाहती है,प्रेम को बचाए रखना चाहती है,क्या यह प्रतिरोध नहीं?बहस को आगे बढ़ाते हुए डॉक्टर संध्या ने कहा-स्त्री कविता को समझने के लिए आलोचकों को अपनी दृष्टि बदलनी होगी।एक विशेष चश्मे से देखने से इसके विस्तृत भाव पक्ष को अनदेखा ही छोड़ा जाता रहेगा।सुजाता ने कविता आलोचना को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि स्त्री लेखन को लेकर जो एक बात सामने आती है वह यह कि यदि स्त्री लिख रही है तो उसे पढ़ेगा कौन?यह दोयम दर्जे का आचरण ही स्त्री कविता को रेखांकित करने में सबसे बड़ी बाधा है।स्त्री लेखन को लेकर लेखक संवर्ग कितना सजग है इसका तत्काल उदाहरण कैफी आज़मी सभागार था जिसमें पहले दिन के आयोजन में उपस्थित रहने वाले तमाम वरिष्ठों में अगले दिन केवल नरेश सक्सेना जी उपस्थित रहे।सुजाता ने आगे कहा कि हमारे यहाँ लैंगिक कविता को लेकर किलेबंदी बहुत जोरदार है,हर जगह पुरुषों का वर्चस्व कायम है।स्त्री लेखन तभी मुख्यधारा में आएगा जब स्त्रीयों के हाथ में संपादन से लेकर आलोचन तक सभी विधाएँ आएंगी और स्त्रियों को यह प्रयास करने होंगे।

                 युवा लेखिका ज्योति चावला ने सोनी पाण्डेय के सवालों को जायज ठहराते हुए कहा कि- यह सच है कि स्त्री कविता वर्ग संघर्ष से बहुत आगे नहीं बढ़ी है जिसका सबसे बड़ा कारण समाज में स्त्रियों के प्रति बढ़ रही हिंसा है।ऐसा नहीं है कि स्त्रियों को राजनीतिक या सामाजिक मुद्दे उद्वेलित नहीं करते,करते हैं ,किन्तु जैसे ही उसके प्रति संवेदनात्मक भाव उपजते हैं एक बच्ची,एक औरत,एक बुजुर्ग ,हमारे सामने लहूलूहान आ जाती है और हम दस कदम आगे बढ़ कर फिरसे वहीं लौट आते हैं जहाँ हमारे भावनात्मक लगाव हैं।महिलाएं राजनैतिक कविताएं लिख रही हैं किन्तु आलोचक आलोचना करते समय उनकी एक कमजोर कविता उठाकर पूरे लेखन को खारिज कर देतें हैं।स्त्री कविता के मूल्यांकन में आलोचकों की यह सबसे बड़ी साजिश है। परिचर्चा सत्र की अध्यक्षता कर रही अनीता भारती ने कहा विमर्श ब्राह्मणवाद की देन है और पुरूष पितृसत्ता का एक टूल्स मात्र है।हम कितना भी आदर्श गढ़ लें किन्तु यह कभी नहीं मान सकते की स्त्री का भी अपना एक वर्ग है और वह अपना वर्ग संघर्ष लिख रही है विमर्श नहीं।जब तक तमाम वर्ग संघर्षों की तरह स्त्रियाँ अपने वर्ग संघर्ष के टूल्स खुद विकसित नहीं करेंगी स्त्री मुक्ति की बात बेमानी है।

दूसरा सत्र कविता पाठ का रहा जिसमें कवियित्रियों ने स्त्री जीवन के विविध पहलुओं पर अपनी कविता पढ़ीं।कविता पाठ में अनीता भारती,अंजू शर्मा, ज्योति चावला, सोनी पाण्डेय, सुशील पुरी,सुजाता,नताशा,प्रतिभा कटियार,भावना मिश्रा,संध्या सिह,संध्या नवोदिता, डॉक्टर संध्या सिंह,रेनू राज सिंह,इन्दू श्रीवास्तव, माधवी मिश्रा, आभा खरे ने प्रतिभाग किया।जलेस का यह आयोजन निःसंदेह लखनऊ के सफल आयोजनों में दर्ज होगा जिसने समकालीन कविता में स्त्री विषय पर हिन्दी कविता को बहस की ओर मोड़ कर एक सार्थक शुरूआत की।

सोनी पाण्डेय

शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2017

बुद्धि शुद्धि महायज्ञ


बुद्धि शुद्धि महायज्ञ

तनी एक प्लेट फटाक से दीजिए .......जगत मिसिर कह लाईन में लग गये.....
बड़े से स्टील के प्लेट में भर कर मंसूरी चावल और गमगम -गमकते गरम मसाले की गाढ़े रस्से की तरकारी देख आँखें भर आईं ......मारे भूख के अतड़ियाँ लहक रही थीं ।पेट में चूहों की धमा -चौकड़ी मची थी। पिछले चौबीस घण्टे से अन्न के दाने से भेंट नहीं हुआ था।
                         हुआ यह कि जगत मिसिर बी.एड. कालेज के सहपाठियों संग आगरा शैक्षिक भ्रमण को चले थे। पहले आज़मगढ़ से साठ की संख्या में लड़के -लड़कियाँ तय समय पर बनारस पहुँचे.....शिक्षकों ने मरुधर एक्सप्रेस की एक बोगी पहले से रिर्जव करा रखी थी। कैण्ट स्टेशन पर शिक्षक -शिक्षिकाओं का दल पहले से ही उपस्थित था। .... ,साथ में दो चपरासी ।आते पता चला ट्रेन एक घण्टे लेट है  .....फिर देखते -देखते एक्कम का चाँद पूर्णिमा को प्राप्त हुआ और पूरे आठ घण्टे बाद ट्रेन चली ।चलते वक्त माँ ने आठ -दस पूड़ियाँ और आलू -गोभी की सब्जी अखबार में लपेट कर दिया था जो स्टेशन पर ही सफाचट हो गया ....लगभग सभी छात्रों का यही हाल । गाड़ी हिचकोले खाते चली ....जगत मिसिर पहली बार किसी ऐतिहासिक जगह के भ्रमण को जा रहे थे ....मन रोमांचित था ....प्रेम की निशानी ताजमहल आँखों के सामने नाचने लगी ....खिड़की से ठण्डी हवा का झोंका गालों को सहलाने लगा तो मन नदी में भावों के लहर मचल उठे ।याद आई अनीता.....सोचने लगे ,नौकरी लगते अनीता से पहले शादी करेंगे और  साल भीतरे  आगरा घूमाऐंगे । बोगी में कुछ लड़के -लड़कियों की सेटिंग पहले से थी....उनका समूह एक -दूसरे के आमने- समाने के बर्थ साथियों से अनुनय -विनय कर फिट कर चुका धा। शिक्षिका मनोरमा राय अपने साथ दोनों बच्चों को लेकर आई थीं ....उन्हीं में व्यस्त -मस्त।हंसराज सिंह भी अपनी नवेली दुल्हन के साथ सबसे किनारे के बर्थ पर अपनी दुनिया में मगन,हाँ हेड माथुर साहब जरुर हरकत में थे।चलीस लड़के/बीस लड़कियों के दल को सम्हालना आसान नहीं था । अक्टूबर की सिहरन भरी शाम में पसीने से तर -बतर घूम-घूम कर कभी छात्रों की संख्या गिनते ,कभी तरह -तरह की हिदायते देते....लड़के ट्रेन की बाट जोहते थक कर चूर थे....विनय यादव बर्थ पर चद्दर बिछा ,कम्बल ओढ़ सोने चले...ट्रेन भी रफ्तार पकड़ने लगी....माथुर साहब थे कि चुप होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। वह  मुँह ढ़ापें हेड पर पिल पड़ा...अरे तनी चुप रहते महराज!....का तबसे पटपटा रहे हैं,साला इहां कपार टभक रहा है और आपका भोंपू बन्दे नहीं हो रहा। हा हा हा हा की चारों तरफ गूंज....माथुर सटक गये,जानते थे विनय नम्बरी लंठ है....ऊपर से बाप ब्लाक प्रमुख। भाई दिन दहाड़े तीन जने को ठोंक ,खुलेआम ठेकेदारी करता था,सो चुप रहना भला समझ अपनी बर्थ पर आकर लेट गये। बोगी में सन्नाटा हो गया ।बत्तियाँ बुझ गयीं...रेल छुक...छुक....धांय करती चली जा रही थी।जगत मिसिर भी हिचकोले खाते सपनों के झूले पर झूलते मगन थे । 
                     कभी -कभी परेशानियाँ जो एक बार पीछे पड़ती हैं .....पीछा छोड़ती ही नहीं।ट्रेन हर दूसरे पड़ाव पर रुठ कर बैठ जाती उस पर दूसरी मार ट्रेन में पेन्टीकार नहीं....रात बीत गयी.....सूरज चढ़ा तो लड़के निबटने के लिए लाईन में लगे।गवइं लड़के पहले ही निबट चुके थे.....ट्रेन भागी जा रही थी ,ब्रश कर मोनिका ने माथुर से शिकायत की....क्या सर,कैसी ट्रेन है?मुझे बेड़ टी की आदत है....अब तो सर दुखने लगेगा ।मोनिका , विनय की खास दोस्त थी ....शहर के नामी व्यापारी की बेटी ।मुँह फुला कर अपनी बर्थ पर बैठ गयी। विनय से देखा न गया ....आकर बगल में बैठ गया,मुस्कुरा कर कहा ....घबड़ाईये नहीं....आपको चाय पिलाते हैं,नज़रे मिलीं और दोनों के चेहरे लाल हो गये....अगल बगल की लड़किया ध्यान से देख रही थीं....लड़के भी ताक -झांक जा रहे थे ...पिछले पाँच मिनट से दोनों आँखों में आँखे डाले एक दूसरे में खोए थे कि जगत मिसिर ने टोका ...विनय भाईssss
वह झेंप गया ,उठ कर साथ हो लिया।दोनों खास मित्र थे,आकर दरवाजे पर खड़े हो गये.... ट्रेन गाँवों के बीच से गुजर रही थी....धान की तैयार फसल लहलहा रही थी.....कुछ खेतों में काट कर क्रम से बिछी थी।जगत ने कहा....मरदे ऐन्नी त धान खूबे हुआ है । किसान का बेटा किसानी की बातें समझता था ,विनय का परिवार कई पीढ़ियों से राजनीति में था सो हूं कह कर रह गया ।उसका ध्यान चाय में अटका था। अन्दर लड़कियाँ नमकीन -बिस्कुट आपस में बांट कर खा रही थीं,ज्यादतर लड़के देहात के थे....अपनी- अपनी बर्थ पर बैठ लाई -चने का मिक्स दाना गुड़ ले फांक रहे थे ।शेखर लाल एक पन्नी में दाना भेली लिए दोनों के पास आए....लिजिए भाई...टाईम पास,जगत और विनय मुस्कुराकर दाना भेली खाने लगे।शेखर ,विनय ,जगत अभिन्न मित्र थे,आपस में बतियाते ...दाना फांक ही रहे थे कि खचाक की तेज आवाज के साथ झटके से ट्रेन रुकी ......विनय यादव फाटक से फेंकाते -फेंकाते बचे,....लपक कर जगत ने पकड़ लिया। 
शेखर लाल.....का हुआ मरदे,इ ससुरा टापू में ले आ के काहें रोक दिया?
जगत मिसिर फाटक से मुँह निकाल कर....बुझाता है कौनों कटाया है?
विनय यादय गमछे से सिर पर पगरी बाँधते... हत ते रे की,साला हो गया जय सिया राम ।अब तो जब तक पुलिस आके बाड़ी नहीं ले जाएगी इ ससुरी हिलेगी नहीं।
तीनों ने सिर पीट लिया ।देखते -देखते सभी बोगियों में हलचल बढ़ी ....लोग निकल कर इंजन के पास जुटने लगे...रेलवे पुलिस के चार सिपाही खैनी फांकते भींड़ को ढ़केलते घटना स्थल का मुआयना करने लगे...पीछे -पीछे गॉड साहब हांफते -दांफते पहुँचे। एक जवान औरत सीने पर बच्चा बांधे कट गयी थी। ....ट्रेन की रुकने की आवाज सुन आस -पास के खेतों में कटाई कर रहे ग्रामीण भी आ पहुँचे। औरत की सिनाख्त हो गयी.....थोड़ी देर में पगडंडियों पर दौड़ते ...चिखते...चिल्लाते लोगों का रेला आता दिखा तो जगत ने सिर के बाल खुजलाते हुए कहा.. बवाल नाधेंगे सारे ,देखिएगा। राजनीति का रुख हवा की चाल देख भांप लेते थे। 
जगत-बवाल का करेंगे भाई...अपने कटी है सारी,बस -गाड़ी थोरे न है कि मुआवज -सुवावजा मिलेगा मनइ को ।
विनय ... हँसते हुए,....कोशिश करने में का जाता है ।कौन जाने मिलिए जाए।इ गाँव के लोग चक्काजाम करने में माहीर होते हैं बाबू---जब केहू न सुने तो  सड़क पर मेहरारुन के बैठा के जाम ठेल दो ...देखो हाकिम सुनेगा काहें नहीं।
शेखर और जगत मुस्कुराए ,कालेज में भी आए दिन अवैध वसूली के नाम पर विनय की नारे बाजी चलती रहती थी और प्रिंसपल जगदंबा पाल कुर्सी पर पैर चढ़ा अॉफीस चपरासियों से पिटने के भय से बन्द करवा लेते थे । मजाल की मनमानी मैनेजमेण्ट की चले ....परिणामस्वरुप लड़के /लड़कियों में विनय की अच्छी धौंस थी।
                        तीनों अपनी बोगी में लौट आए.....लड़के बाहर निकल कर तफ़रीह में व्यस्त थे ।माथुर साहब गेट पर खड़े हो लोगों से पूछ-ताछ कर रहे थे ....बेचारे लड़कियों को छोड़ कर हटने का खतरा नहीं ले सकते थे। मनोरमा राय बच्चों को जबरन बैठाए अपनी सीट पर अंगद का पैर बने ज़मीं थीं...।हंसराज सिंह झांक -झूंक कर बीबी के पास आकर बैठे बतियाने में  मशगूल ...बातें थीं कि हनुमान की पूंछ की तरह बढ़ती ही जा रही थीं । लड़कियाँ देख -देख मुस्कुराती तो मनोरमा राय ...बेशर्मी की हद कह अन्दर ही अन्दर कुढ़तीं। पति के लिए वह केवल एक जरुरत भर थीं...जैसे रोटी और कपड़ा । गाँव वाले ट्रैक पर धरना दे मुआवजे की मांग ले बैठ गये...थोड़ी दूर पर हसुआ गिरा देख ,घटना को ड्राईबर की लापरवाही बताने लगे...एक स्वर में सबने नारा दिया...हारन नहीं बजा था । गाँव वालों के भय से ड्राईबर और गॉड दुबक कर बैठ गये। पूरे चार घण्टे बाद पुलिस आई ....नोक -झोंक गाँव वालों से होने लगा ....दरोगा ने फोन करके और पुलिस बुलाई...जब पुलिस गाँव वालों पर भारी पड़ी ,तब मामला सलटा,इस पूरी प्रक्रिया में दो घण्टे और गये।शाम हो आई....पुलिस ने लाश सील कर उठवाई और गन मैनों से ट्रैक साफ करवाया तो इंजन से हार्न के घनघनाने की आवाज गूंजी ....सभी यात्री अपनी अपनी बोगी में फटाफट चढ़े।  ट्रेन चली तो सबने राहत की साँस ली। हंसराज सिंह पहली बार छात्रों के बीच आकर सफर में बैठे.....अइसा टापू में अटके की साला चाय -पानी को भी मुहाल हो गये ,कहते हुए झल्लाहट बंया किया ।का माथुर साहब !आपको भी इहे ट्रेन मिली थी। ...जैसे छछून्नर छूई हो रह -रह कर बिपता रही है।आठ घण्टे उधर ,सात घण्टे इधर ,हो गया टूर इहें ससुर ।दो घण्टा पहिले चौंहपे होते ,अभी आधे रास्ते पर अटके हैं।
माथुर साहब कोई अंग्रेजी का उपन्यास खोले, लेट कर पढ़ रहे थे ....धीर -गम्भीर आदमी।धीरे से बिना उनकी तरफ देखे....उत्तर दिया ,हर बार तो इसी से आते थे,संयोग है । 
हंसराज सिंह पनपनाते हुए दुबारा अपनी बर्थ पर आ कर बैठ गये,सोचे थे मुफ्त में बीबी पर रौब गाठेंगे कि विभाग में उनकी खूब चलती है और इधर माथुर चिढ़े बैठे थे।एक बार नाम तक नहीं लिया था ।हंसराज एढ़ाक पर नियुक्त थे ...कालेज उन्हीं के गाँव में था।....अच्छी दबंगइ थी पर माथुर नियन्त्रण से बाहर रहते ,कारण छात्रों में अपनी रेगुलर्टी ....पंचुअल्टी और अच्छे शिक्षण कार्य के लिए खासा लोकप्रिय थे ।
रात हुई तो भूख ने जोर पकड़ा ....साथ में लाई गयी थोड़ी बहुत नमकीन ...बिस्कुट ...दाना -भूजा की सफाई सुबह ही हो चुकी थी । सभी बेचैन ....ट्रेन भागी जा रही थी । अजीब हाल था .... रुकती भी तो ऐसी जगहों पर जहाँ खोमचे वाले अपना ठेला बाँध बूंध कर सो रहे होते ..... विनय ने एक स्टेशन पर मिन्नत करके चाय बनवाई और सबसे पहले मोनिका और शिक्षकों को पिलवाया ..जगत ने चुस्की ले कर शेखर से कहा ....ऊंट की मुँह में जीरा ...इससे तो करेजवे फूंका जाएगा ,का जानी कैसे पीते हैं इ शहरी लोग भिनहिए हो मुन्शी जी ।शेखर लाल ने भी उसी लय में जवाब दिया.. पंडी जी! जिसका जौन कल्चर है करेगा ही ...और धीरे धीरे चुस्की लेने लगे। हंसराज भड़कते हुए स्टेशन मास्टर के केबीन में धड़धडाते हुए पहुँचे....काहें साहब !...इस मुरदहिया स्टेशन पर आके इ बैलगाड़ी काहें बैठ गयी। एक हाथ कमर पर दूसरा मेज पर रखे हंसराज सिंह क्रोध में हांफ रहे थे ....पीछे -पीछे कुछ लड़के भी आ पहुँचे ।स्टेशन मास्टर जम्हाई लेते हुए......लाइनिये क्लीयर नहीं है साहब ,क्या करें ।तीन एक्सप्रेस पास कराऐंगे फिर जाएगी । पीछे से दनदनाते हुए एक छात्र कालर चढ़ाए आगे आया .....हद है महराज ,ये पहले से ही इतनी लेट है ,ऊपर से और....अभी वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि स्टेशन मास्टर ने हँसते हुए टोका ....अब लेट वालों के लिए टाईमवालों को तो नहीं रोक सकते ,जो पीछे है पिछड़ता ही जाएगा भाई साहब । यही नियम है और उठ कर दूसरे कमरे में चला गया । जगत ने खीझ कर कहा ...."एक त धिया अपने गोर ,ओपर अइली कमरी ओढ़ "। इ त मुअन हो गया यादव जी । 
तीनों स्टेशन पर बनी बेंच पर बैठ गये ....रात के तीन बज रहे थे ,चारों तरफ सन्नाटा ....स्टेशन किसी ऊसर , सिवान में था । दूर -दूर तक कहीं कोई अबादी नहीं । दो -चार पीली रोशनी के छोटे बल्ब जरुर जल रहे थे ,पर अन्धेरे को जरा भी आँख दिखाने में सफल नहीं थे। कुछ कुत्ते रह -रह कर निरवता में खलल डालते और स्टेशन को पूरी तरह भूतहिया बनाने का प्रयास करते....।
                        घण्टे भर बाद तीन ट्रेनों को आगे निकाल गाड़ी चली ......घूमने का सारा रोमांच खत्म हो रहा था ....जैसे -जैसे समय बढ़ता जा रहा था ।तीन दिन के टूर में एक दिन लगभग निकल चुका था....तीसरे दिन वापसी का टीकट,लड़के जम कर ट्रेन की माँ/बहन एक कर रहे थे,....लड़कियाँ इन बातों से असहज थीं।मोनिका ...विनय से दो बार गाली बकने पर लड़ चुकी थी।    .....खैर ,जो हुआ सो हुआ .....आगरा आ ही गया।सभी ट्रेन से उतरते बोगी को एक लात जरुर मारते...माथुर से रहा न गया....दो तुम लोग परिचय बढ़ियाँ से अपने पूरबियापन का....रह गये वहीं के वहीं। माथुर ने थूकते हुए कहा।लड़के स्टेशन के बाहर निकले.....धर्मशाला पहले से बुक था।माथुर हर दूसरे साल छात्रों को लेकर आते थे.....परिणाम स्वरुप अब सारी व्यवस्था फोन से ही कर लेते थे।.....धर्मशाला पास में ही था....पहुँचते मैनेजर ने हँस कर स्वागत किया......वेलकम सर!....आप लोग काफी लेट हो चुके हैं। झट -पट रेड़ी हो जाइये।ठीक दस बजे बस आ जाएगी। घड़ी की तरफ देख कर....आठ बज रहे हैं। माथुर ने छात्रों को जल्दी नहा -धो कर तैयार होने का आदेश दिया। लड़कियाँ मनोरमा राय के साथ हो लीं....न चाहते हुए भी हंसराज सिंह को पत्नी को भी साथ में भेजना पड़ा।माथुर लड़कों को लेकर एक बड़े हाल में पहुँचे.....गलियारे में लाईन से लैट्रीन /बाथरुम बने थे।लड़के कपड़ा खोल ,गमछा लपेट कतार में लग गये। ......इधर लड़कियाँ भी टावेल /साबुन/शैम्पू लिये हो हल्ला करती नहाने लगीं।डेढ़ घण्टे में लड़के तैयार होकर लाबी में आ गये.....कैण्टीन से चाय ,नाश्ता ले कर करने लगे।जगत मिसिर ने थैली में हाथ डाला.....पाँच सौ की नोट......नोट छू कर छोड़ दिया,गांठ के पूरे पक्के जगत यजमानिका बाभन ठहरे।रुपया दाँत से पकड़ते थे। अन्दर अभाव था पर बाहर पूरी सजगता से परदेदारी थी।चार भाईयों और दो बहनों में सबसे छोटे जगत को पिता दो बिस्से खेत बेच कर प्राईवेट कालेज से बी.एड.करा रहे थे।बड़े भाई संस्कृत थोड़ा बहुत जानते थे.....काशी चले गये।जम गये....अच्छी पुरोहिती चलती थी।दोनों उनके बाद के ससुराल   की मदद से बी.एड.कर शहर में प्राईमरी स्कूलों में मास्टर हो बस गये। .....बीबियों की धौंस से दोनों दबे गाँव को भूल चुके थे।पिता ने एन केन प्रकारेण बेटियों को ब्याह मुक्ति पा ली थी।बच गये थे जगत.....सत्तर की उमर में पिता पंडिताई से मिली दान दक्षिणा से उन्हें पढ़ा रहे थे.......गाँव में बीस बिस्से की जोत और अठन्नी चवन्नी की यजमानिका में किसी तरह गुजारा चल रहा था। जगत नोट तुड़ाना नहीं चाहते थे.....जानते थे टूटा की खर्च हुआ।उधर विनय यादव लड़कियों के आते प्रेमिका में मशगूल हो गये।शेखर भी एक कायस्थ लड़की से मेल जोल बढ़ा रहे थे।मन मसोस कर रह गये....विनय कभी जेब में हाथ नहीं ड़ालने देते थे। शेखर भी लेहाज करते थे....पर आज दोनों अपनी -अपनी गणित में व्यस्त थे। बेचारे मन मार कर बाहर निकल आए।बस आकर खड़ी थी....दस की जगह साढ़े दस हो गया तो ड्राईबर हार्न बजा बुलाने लगा । माथुर ने शोर मचाना शुरु किया .....सभी बस की ओर भागे।पहले बस फतेहपुर सिकरी चली .....किले के भग्नावशेष से लेकर पंचमहल ,बुलंद दरवाजा देखते घूमते सभी दरगाह पर पहुँच मन्नत का धागा बांध रहे थे। जगत की अतड़ियों में अन्न की मांग का आलम यह था कि आँखों के सामने रह- रह कर तितलियाँ नाचने लगतीं । समय कम था और अभी माथुर कम से कम छात्रों को ताजमहल और आगरे का किला जरुर दिखा देना चाहते थे। सबको आवाज लगा बस की तरफ चले.....बस अगले गन्तव्य की ओर चल पड़ी.. अचानक किसी लड़के को उल्टी होने लगी तो माथुर ने बस रुकवाया,कुछ लड़के उतर कर सड़क के किनारे ही पैंट खोल खड़े हो गये,जगत भी.....लड़के को पतली दस्त भी महसूस हुई तो सड़क किनारे पानी का बोतल ले झांडियों के पीछे चला गया। हंसराज का भन्ननाना चालू था। जगत की नज़र अचानक सड़क किनारे एक मड़ई में चल रहे ढ़ाबे पर गयी। जगत की क्षुदाग्नि का जोर इस कदर उफान पर था जैसे जेठ की दुपहरी में लू का तूफान। उड़ियाये-पड़ियाये मड़ई  में पहुँचे और प्लेट में भात तरकारी चांप रहे लोगों को देख झट एक प्लेट मांग टूट पड़े । ऐसा न था कि मांस गन्ध पहचानते न थे ,पर भूख न जाने जूठा भात  की गणित से अनुप्रेरित हो मन ही मन तय कर चुके थे कि पकड़े जाने पर भात तरकारी का भ्रम बता पल्ला झाड़ लेंगे।रस्से से भात सरपोट -सरपोट खा रहे थे जगत....शेखर और विनय की भी नज़र पड़ी,चल पड़े मित्र का साथ देने। जब पेट में जरुरत भर भात पहुँचा जगत का चित्त शान्त हुआ...प्लेट में चार बड़े आलू के फांक जान एक को मीस कर खाने के लिए दबाए ही थे कि शेखर लाल आ धमके।जगत मारे भय के हिल गये..।झेंप मिटाते हुए धीरे से बोले..हत तेरी की ....इ मीट है का मरदे,होटल वाला मुस्कुराया।जगत को काटो तो खून नहीं,सरेआम मास खाते पकड़े गये थे।ये तो गनीमत था कि सहयात्री बस में बतकुच्चन में व्यस्त थे वरना आज पंड़ी जी की इज्जत का जनाजा निकल जाता । मित्रों को निकट देख प्लेट फेंकने ही वाले थे की शेखर लाल ने लपक लिया,बचपन की यारी थी ,एक दूसरे के जूठे बेर खूब खाए थे, साथ ही पोखरे से मारी  भुनी सिधरी का स्वाद लूक -छिप कर शेखर के साथ जगत ने बचपन में खूब लिया था। आज मामला पंडी जी का सार्वजनिक था इस लिये लेहाजे बनावटी परहेज दिखा रहे थे।भूख शेखर को भी लगी थी ...बस ड्राईबर हार्न बजाने लगा तो बड़े -बड़े कौर मुँह में डालने लगे।जगत पैसा देने हाथ धो कर पहुँचे ।पाँच सौ की कड़क नोट अन्तत: टूट ही गयी।चार सौ पचास रुपये लौटे।जगत चौंके...मीट इतना सस्ता।आस- पास खा रहे लोगों पर नज़र दौडाई...ज्यादतर मजदूर तबके के लोग खा रहे थे।शरीर में बिजली सी कौंध गयी....धीरे से दुकान वाले से पूछा ...काहें का मीट था?    इहां तो बड़का ही मिलता है साहब...होटल वाले ने मुस्कुराकर कहा।मामला कुछ -कुछ समझ रहा था। बड़का मन्ने?जगत समझते हुए अरथियाये....सुअर बाबू! ,उत्तर मिला।शेखर हाथ साबुन से मांज आवाज दे रहे थे। जगत के सामने धरती आसमान नाचने लगा।अन्दर से रुलाई आँखों में उमड़ी- घुमड़ी चली आ रही थी।झट दोस्तों संग बस में सवार हुए....मन में भूचाल मचा था,धर्म नसा चुका था ...पेट में सुअर का मांस जीभ चिढ़ा रहा था।ऊपर से भेद खुलने का भय ,साथ में शेखर को भी नासने का अपराधबोध सालने लगा। ताज के दिदार की चाहत हवा हो गयी .....आँखें बन्द करते शौच खाती सुअर आ धमकी। ऐसी हूल आई की सर खिड़की से निकाल हकर- हकर मन भर उल्टी करने के बाद ही राहत मिली।मन ऐसे बेचैन था जैसे किसी प्रिय जन की आकस्मिक मृत्यु हुई हो। चेहरा रह- रह कर पसीने से भींग जाता तो गमछे से झट पोंछ भाव छिपाने की नाकाम कोशिश करते। उनकी हालत देख विनय और शेखर कई बार तबियत का हाल पूछ चुके थे। खैर दिन भर के तूफानी दौरे के बाद वापसी के लिए सभी ट्रेन में बैठे....पूरे सफर जगत मौन धरे रहे।जैसे आंधी- तूफान के बाद मौसम सुहावना हो जाता है तपती गरमी में....ट्रेन समय से बनारस की ओर भागी जा रही थी। सभी खुश थे ....कोई पेठे का गुणगान कर रहा था तो कोई ताज का गान। बस मातमी सन्नाटा था तो जगत की दुनिया में। बनारस पहुँच लड़के विदा ले अपने- अपने घर की ओर चले।लड़कियाँ माथुर साहब के साथ कैण्ट बस अड्डे की तरफ चहकती ,मचलती लड़कों को हाथ हिला विदा कर बढ़ गयीं।माथुर उन्हें आज़मगढ़ बस अड्डे से पहले छोड़नेवाले नहीं थे। 
                        शेखर और जगत एक गाँव के होने से साथ चले।शेखर ने जगत के कन्धे पर हाथ रख पूछा....काहें एतना उदासे हैं बाबा,?...देख रहा हूँ, मरदे आगरे से चुप हैं। जगत  भरभरा कर रो पड़े। शेखर से लिपट गये....यार!...धरम नसा गया। 
शेखर...हेंssssssssss,आश्चर्य से आँखें फटी रह गयीं,जानते थे जगत नियम ,धरम और बात के पक्के हैं। भींड़ भाड़ वाले कैण्ट स्टेशन पर दोनों एक किनारे खड़े थे..।का हुआ पंडी जी!....मारे जिज्ञासा के उनकी खोपड़ी उड़ी जा रही थी...लप्प से गमछी की पगड़ी बांध कमर पर हाथ धर ऐसे तन गये जैसे किसी से मार करनी हो। ....जगत ने खुद को नियन्त्रित किया...हमको माफ करना मित्र...ये पाप अनजाने में हुआ...वो जो मास तुमने खाया था,बड़का का था...कहते कहते गला रुंध गया।शेखर तनिक विचलित हुआ...क्या कहते हैं महराज!...फिर सम्हल कर ,जगत को दोनों हाथों से बाहों में भर कर मुस्कुराते हुए...अच्छा ,चलिए...था तो था।इ बात हम दोनों तक है ...रहेगी।चल कर गंगा नहाते हैं और विश्वनाथ बाबा को एक लोटा जल चढ़ा कर शुद्धि कर लेते हैं। जगत अभी भी नज़रें चुरा रहे थे। दोनों अॉटो पकड़ गोदौलिया पहुँचे ...वहाँ से सीधे गंगा घाट....शेखर ने कहा...चलिए नाए से ओह पार चलते हैं...सालों ने इधर बहुत कचरा फैला रखा है।जगत चुपचाप चल पड़े। उस पार शान्ति थी....गंगा अपने मन्थर वेग में बह रही थी....दोनों उस पार से सामने के घाट को देख रहे थे....अचानक घाट से हट कर एक बड़े नाले से गिरते गन्दे पानी को देख कर शेखर ने कहा....देखिए न बाबा,एतना मइला गिरने के बाद भी गंगा पवित्र है...हम तो अनजाने में खाये....जगत उसके चेहरे को ध्यान से निहार रहे थे। शेखर कपड़ा खोल मुस्कुराते हुए नदी में उतरने लगे....जगत ने हिम्मत करके धीरे से कहा....मास सुअर का थाsss, शेखर पानी में फिसलते -फिसलते बचा ।का कहते हैं यार!....हत मरदे....पानी से निकल बालू पर पसर गये। कपार पर हाथ रख थोड़ी देर मौन रहे...जगत बार -बार अपने आँसू पोंछता सुबक रहा था। कुछ देर बाद शेखर सामान्य हुआ ....चलिए जौन हुआ उसमें सारी गलती भूख की थी,उ कहा गया है न...भूख न जाने जूठा भात। धीर गम्भीर बहती गंगा को देख कर , माँ नहाते शुद्धि करेगी ,और गंगा में  उतर गये,दोनों मल -मल के नहाने के बाद इस पार आए।प्लास्टिक का लोटा खरीद गंगा जल भरा और मन्दिर में जा बाबा को नहला ,कान पकड़ माफी मांगी।
घर पहुँचते -पहुँचते दोनों को रात हो गयी....शेखर ललान की ओर विदा होकर निकल गये।बाभनों का टोला गाँव के मध्य में था....अन्धेरी रात में झिंगुरों की झनझनहाट निरवता में भय पैदा कर रही थीं....इक्के दुक्के घरों में बाहरी ताखे पर ढ़िबरी जल रही थी।सभी घर में दुबक गये थे, जगत के बूढ़े पिता को छोड़ कर।जगत दुवार पर  पहुँचे....पिता मड़ई में बैठ  कउड़ा ताप रहे थे। देखते खुश हो गये...आ गये बाबू....मन कैसा कैसा ना जाने हो रहा था...बड़ी रात कर दी। ढ़िबरी की रोशनी में बूढ़े पिता की नम आवाज सुन जगत सिहर गये।सुना था उन्हें होनी अनहोनी ज्ञात हो जाती है....सोचने लगे ...हो न हो बाबूजी को उसी का भान हुआ हो। जल्दी जल्दी घर में घुस गये....माँ चारपाई पर लेटे -लेटे बोली...खाना चौकी पर तोप कर रखा है....खा लेना।वह हूंssss कह अन्दर आँगन में आ हाथ मुँह धो कर किसी तरह एक रोटी खा बिस्तर में आ कर लेट गये। बगल में माँ की खटिया थी।तीन दिन की थकान का आलम था कि अपने बिस्तर में घुसते नाक बजने लगी। भोर में नींद अपने चरम पर थी कि लगा सिराहने सुअरों का झुण्ड मंडरा रहा है...जगत उछल कर उठ बैठे....माथे से पसीने की धार बह निकली ,इतने भयभीत हुए ।वह लगभग हांफ रहे थे। माँ उठ कर खटिया पर बैठी राम राम रट रही थी....का हुआ बाबू ? कौनों खराब सपना देखे का ? ...जगत हामी में गर्दन हिला उठ कर बाहर निकल गये। सुबह के पाँच बज रहे थे .....औरतें खेतों की ओर झुण्ड में बतियाती आ -जा रही थीं। जगत के बाबा प्राईमरी के हेडमास्टर थे.....खासे प्रगतिशील।गाँव में पक्केमकान में पहला पायखाना इन्हीं के घर बना। औरतों लड़कियों को खेतों में जाने की सख्त मनाहट थी। माँ बाल्टी का पानी ले हाते के पखाने में जा रही थीं...पिता खरहरा से दुआर झार रहे थे....भुअरी गाय तीन दिन बाद जगत की आहट पा खूंटे के चारों ओर चक्कर लगा रम्भाने लगी....जगत की दुलारी गाय।जगत पास आ भुअरी की गर्दन सहलाने लगे....पगहा खोल चरन पर लाकर बारी- बारी से गाय बाछी को बान्ह ,लेहना चला निबटे ही थे कि पेट में मरोड़ मची।पखाने में माँ के बाद पिता घुस चुके थे।प्रेसर बढ़ता जा रहा था।लोटा उठा सामने के ऊख के खेत की ओर निकल गये....अभी निबट कर उठे ही थे की सामने फूंफूआती एक सुअर शौच की गन्ध पा आ धमकी ....जगत का मारे भय के परान सूख गया।लोटा उठा कर भागे। नौ बजे खा पी कर साईकिल उठा विद्यालय निकले.....आज परीक्षा का प्रवेश पत्र बंटना था,गाँव के बाहर खडंजे पर शेखर पहले से जोह रहे थे।दोनों मित्र बोलते बतियाते चले जा रहे थे कि अचानक सुअरों का झुण्ड रास्ता काट कर निकल गया।जगत की बेचैनी बढ़ती जग रही थी ....सुअरें नींद से लेकर हर जगह आ कर धमका जा रही थीं....वह भुलाना चाहते थे,सुअरें थीं कि आश्चर्यजनक ढ़ंग से सामने आ जा रही थीं।शाम तक पाँच बार सुअर के सामने पड़ने पर जगत हिल गये.....निश्चित कोई दैवी कोप है जान सोचने लगे कि क्या करें?किससे कहें? एक बार खयाल आया काशी चलें बड़े भाई कर्मकांडी हैं ....कोई हल निकालेंगे।फिर खयाल आया भावज नम्बरी चुगलखोर है....चारों तरफ पुगिया देगी .....बियाह होना मुश्किल हो जाएगा।
सोचते -सोचते बेचारे की हालत खराब ....शाम घिरते माँ आँगन में रसोंई बनाने लगीं,..बूढ़ों को जाड़ा कुछ ज्यादा ही लगता है,....पिता दुवार पर पुवाल जला कउड़ा बार बैठ गये।दूध दूह कर जगत बाल्टी चुल्हानी रख पिता के पास आकर बैठ गये....मन व्यथित होने से चेहरा उतर गया था ।बुढ़ापे की औलाद से मोह कुछ ज्यादा ही होता है .....जगत को चुप बैठे देख पिता ने पूछा......सब भला है न बबुआ? जगत मौन.....कुछ कहेंगे तबे न हल निकलेगा...पिता की आवाज में चिन्ता थी,सोच रहे थे शायद कालेज वालों ने फिर पैसे की मांग की है। जगत पास सरक आए.....सबसे छोटे थे....पिता का साथ और दुलार खूब मिला था.....सिर पर पिता का हाथ पड़ते रो पड़े.....बाबूजी बड़ी भारी गलती हो गयी.....और सारा हाल कह सुनाया। पिता ने धीरज रखने को कहा .....चिन्ता में पड़ गये,कहें तो किससे कहें.....क्या उपाय निकालें की लड़के का हाड़ शुद्ध हो।मन ने कहा ....हाड़ जनेऊ अशुद्ध हुआ है ,शुद्धि करनी होगी।सुबह सबसे पहलेे गंगा जल में बोर कर नया जनेव पहनाया और चुपचाप पड़ोसी गाँव के लल्लू पंडी जी से मिलने निकल गये।लल्लू पंड़ी जी बहुत पहुँची चीज थे ....सभी विद्याओं के ज्ञाता।ओझा सोखा सब मन्त्र ले दीक्षित होते थे।जगत के पिता डोलू भर दूध लिए  दरवाजे पर पहुँचे......बाहर उनकी युवा बेटी गोबर से दुवार लीप रही थी। देखते अन्दर भागी .....अन्दर से लल्लू पंड़ित उसी गति से बाहर आए। ये माजरा जगत के पिता को समझ नहीं आया...आते लपक कर दुवार पर खटिया बिछा कर हाथ पकड़ कर बिठाया .....अउर कैसे महारज इधर को? पूछते उनकी गोल गहरी धसी आँखें खुशी से उछल कूद रही थीं....। जगत के पिता ने पहले तो इधर- उधर की बात कर भूमिका बांधी ,फिर दाऐं बाऐं देख कर पूरी बात कह डाली। सुनते लल्लू पंडित मुँह बाए जगत के पिता का मुँह ताकने लगे....राम राम राम चारपाई से उठ खड़े हुए" इ तो भयंकर अनर्थ हो गया ।" हाड़ बुद्धि सब गयी।जगत के पिता हाड़ मांस के ढ़ाचे में खड़ा मात्र जीवित प्राणी थे।भहरा कर खटिया पर बेहोश हो गये....लल्लू पंड़ित ने घर में से पानी मंगा चेहरे पर छिड़का ....होश आया,आँख खोलते लल्लू का पैर धर रोने लगे ....बचाईए,आप ही का आसरा है। लल्लू मन ही मन मगन थे पर चेहरे पर आक्रोश का भाव पूरी तरह बनाए थे। जगत पर पहले से निगाह थी और बनिया सौदा लिए खुद ही दुवार पर चढ़ा था।चाय -पानी करा घर के पिछवारे साधना स्थल पर ले गये। छोटा सा पोखरा .....पोखरे के किनारे शिवाला, दो मड़ई सामने की तरफ ,...जिसमें चौकी पर कुछ पोथी पतरा रखा था।धूप चढ़ आया था.....कुछ आदमी औरत झाड़ फूंक कराने के लिए आकर बाट जोह रहे थे। देखते हाथ जोड़ कर खड़े हो गये....लल्लू पंड़ित आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठा ..शिव शिव शिव रटते आसन पर जम गये।भक्तों को झट निबटा पोथी पतरा उलाटने पलाटने लगे ....कुछ देर बाद गहरी साँस छोड़ते हुए मुस्कुराकर कहा..."बुद्धि सुद्धि महायज्ञ" करना होगा। जगत के पिता ने बुझे मन से कहा.....करिए....का का चाहिए? लल्लू गजब जाल फैलाउ बाभन थे ....मछली कांटे में फंस चुकी थी ....पहले तो भाई जी लड़के का हाड़ जनेव वाले शुद्ध ब्राह्मण की लड़की से ब्याह करा गंगा नहलाइए फिर संकल्प होगा.... उ त आपो जानते हैं कि बिना पत्नी के जग्य नहीं होता। ....कुछ सोच कर एक रुद्राक्ष की माला गले से निकाल हाथ पर रखते हुए कहा....पहना दीजिएगा बाबू को...मलेच्छ नहीं छुएगा। जगत के पिता माला थैली में डाल घर पहुँचे। पत्नी आँगन में बैठ चश्में में आँख गड़ाए कुछ सिल रही थीं.....पास जाकर बैठ गये ....जो सुना सब कह सुनाया,....जगत भी पिता को देख आकर पास खड़े हो गये ....।तनी संकोचते हुए कहा...छोटकी भाभी के घर वाले बढ़ियाँ बाभन हैं,कितनी बार आ चुके ,हाँ कर दीजिए।अनीता भाभी के चाचा की लड़की थी ।जगत पिछले चार साल से प्रेम में पड़े थे।आज मौका देख मन की बात कह दी। माँ छोटी बहू को तनिक पसन्द नहीं करती थीं।कारण आते पति के साथ शहर निकल गयी...जबकि बेटा गाँव में ही पोस्टिंग चाहता था। चुप्पी तोड़ी ....उसके बाप की फुआ मनिहारे संग भागी थी....सुच्चा नहीं है।जगत को सुनते साँप सूंघ गया। पिता भी नापसन्द ही करते थे....ना में गर्दन हिलाया।थैली से माला निकाल पहनने को दे खेतों की ओर निकल गये।
                         अनीता से शादी की अस्वीकृति की पीड़ा थी कि जगत के सपनों से सुअर का भय लुप्त हो गया।पिता सोचते लल्लू के माले का प्रभाव है।छ: महीने बीत गये...परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर गये....दो महीने बाद सरकार ने बी.एड. पास अभ्यर्थियों के लिए प्राईमरी स्कूलों में बंपर भर्ती निकाली। जगत चार माह बाद प्रशिक्षु शिक्षक बन ट्रेनिंग लेने लगे।तिलकहरुओं की भींड़ लगने लगी....पर मामला हाड़ जनेउ के सुच्चे बाभन पर आ कर अटक जाता ।जांच पड़ताल के बाद कोई न कोई पै खानदान का उजागर हो ही जाता।इधर लल्लू पंडित मचर माटा से बेचैन रात दिन जगत का बियाह काटने में जुटे रहते।अपने भक्तों को चारों गाँवों ,सोलह पट्टी में फैला रखा था ।पल -पल की खबर रखते कि कौन -कौन आज जगत के दरवाजे पहुँचा। लल्लू जानते थे कि ऐसे सीधे हाथ उनकी बेटी जगत के साथ ब्याहने से रही। बाप बिना मोटी रकम गांठे ब्याह के लिए हामी नहीं भरेंगे और वह ठहरे कथावाचक साधारण बाभन, इस लिए सारे हथकंण्डे आजमा रहे थे....पर दाव थे कि खाली जा रहे थे। एक शाम मन मजबूत कर माधोपुर बाभन टोला लाव लश्कर संग पहुँच गये .।...जगत के बड़े भाई सपरिवार आए हुए थे। घर में बच्चों के चहल -पहल से रौनक थी,जगत को पहली तनख्वाह मिली थी।सबको देशी घी के मोती चूर के लड्डू खिलाए जा रहे थे। दरवाजे पर पहुँचते धधाकर जगत के बड़े भाई के गले लगे....कुशल क्षेम के बाद कुर्सी पर बैठ गये....मिठाई पानी होने लगा। जगत के पिता को छोड़ सभी लल्लू को देख सामान्य थे...दर दयाद ,टोला मुहल्ला जुटा था।बेचारे पिता भयभित थे लल्लू से कि कहीं राज उगल न दे।लल्लू ने मौका देख कर नज़र चुराते जगत के पिता से पूछा....कहीं  बाबू का बियाह तंय हुआ की नहीं ....साल भर बाद हम भी कुछ नहीं कर पाऐंगे भाई जी। कह मुस्कुराने लगें। इतना सुनते जगत के बड़े भाई पिनक गये....का कहें चाचा,....एक से एक पार्टी आ रही है ,मस्टराईन लड़कियाँ मिल रही हैं और बाउजी हैं कि हाड़ जनेव लिए बैठे हैं....क्रोध में आवाज और ऊंची हो गयी...पिता की तरफ देखते हुए.....कौनों पाप किए हैं बबुआ कि कउवा का मास भक्षे हैं?.......इतना सुनते जगत और पिता की साँस गले में अटक गयी....लल्लू की बाछें खिल गयीं बाप बेटे के चेहरे का भय देख कर। भय है तो भक्ति....यज्ञ के न होने का कोप बाप बेटे को सामने दिखने लगा। लल्लू का इशारा पा साथ आए महेश यादव ने कहा ....हें हें हें....महराज!का हाड़ जनेव में उलझे हैं,इलाके में लल्लू महाराज से सुच्चा बाभन कौन है। आ लड़की भी इसी भरती में मास्टरी पाई है। जोड़ जुगत इससे निम्मन क्या होगा।जगत के बड़े भाई की तरफ देख कर....ठीक कहते हैं न महराज?....दरवाजे पर सन्नाटा छा गया....जगत को न रोना बन रहा था न हँसना...अनीता से ब्याह के उम्मीद की अन्तिम इति श्री सामने थी।पिता भी पस्त थे लल्लू के दाव के सामने....जानते थे ना करने पर पूरे इलाके में इज्जत लूट लेगा ....न माया मिलेगी न राम ,जिस प्राईमरी के मास्टर का खुला ब्याह भाव इन दिनों पाँच लाख नगद और चार चक्का गाड़ी चल रहा था ,कौड़ी के मोल निकल रहा था ।अब कोई चारा नहीं था....मन मार कर हामी भरी...लल्लू की ओझैती उन्हें तनिक नहीं सुहाती थी....और आज उसी ओझा सोखा की लड़की घर लानी पड़ रही थी। शाम तक दिन बारी तय हो गया ...माँ को छोड़ सभी का मुँह गिरा था....माँ खुश थी कि लड़की गाँव में ही मस्टराईन थी,हमेशा साथ रहेगी। दस दिन के अन्दर बरछा ,तिलक ,ब्याह सब निबट गया।
               जगत उस दिन को मन भर कोसते जिस दिन टूर गये..रोए धोए और अन्त में सब किस्मत की मार मान सन्तोष कर लिया। माह भर बाद ससुर के साथ बनारस सपत्नीक जा गंगा नहा आए....लल्लू पंड़ित ने अपनी आराधनास्थली पर गुप्त यज्ञ किया। प्रसाद दामाद को अन्तिम दिन खिला मगन घर लौट रहे थे.....अचानक मोटरसाईकिल के आगे हांफती सुअर आ कर खड़ी हो गयी ....लल्लू ने सुअर को देख कर मुस्कुराते हाथ जोड़ते हुए कहा ....देवी आभार जो उपकार किया ,बिना दहेज के बेटी योग्य वर संग गयी....इस जीव जगत का हर प्राणी महान ।और बिना सुअर के रास्ता काटने का मन्त्र पढ़े गाते गुनगुनाते आगे बढ़ गये........।

सोनी पाण्ड़ेय
शिक्षा-एम.ए....हिन्दी,बी.एड.,पी एच डी
पता- कृष्णा नगर ,मऊ रोड ,सिधारी
         आज़मगढ़,उत्तर प्रदेश
प्रकाशित पुस्तक...मन की खुलती गिरहें...काव्य संग्रह।
इसके अतिरिक्त पाखी ,कथादेश...कथाक्रम...इन्द्रप्रस्थ,भारती....शैक्षिकदखल..स़ुखनवर..सृजनलोक...संप्रेषण..कृतिओर..कृत्या..दैनिक हिन्दुस्तान ...नई दुनिया...दैनिक भास्कर ..छत्तीसगढ़ मेल आदि पत्र पत्रिकाओं तथा स्त्री काल...अनुनाद,सबरंग,लाईव इण्डिया...पहली बार,सिताब दियारा...इण्टरनेशनल ब्लाग...पर निरन्तर कविता कहानी लेख प्रकाशित।

सम्मान...2015 का युवा कविता का शीला सिद्धांतकर सम्मान पहली किताब को।

सोमवार, 17 जुलाई 2017

सोनी पाण्डेय की कहानी

                                                                      -सोनी पाण्डेय  

             टूटती वर्जनाऐं                        
                     
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राजधानी एक्सप्रेस सरपट भागी जा रही थी।ज्योत्सना अतित को कुरेदती ना जाने कितने पड़ावों पर ठहर कर सोचती कि एक कुल कथा जिसके फलने -फूलने से लेकर एक -एक घटना क्रम की वह गवाह रही कि कैसे छोटी -छोटी आस्थाऐं विशाल मिथक में बदलती हैं और हम भय में जकड़े तमाम ज्ञान विज्ञान के बाद भी थोड़ा बहुत सरलीकरण कर उसे पोषित करते हैं। उसे महिला महाविद्यालय में स्त्रियों की आन्तरिक सामाजिक संरचना पर तीन दिन व्याख्यान देना था। वह अनायास खुद के भोगे हुए सच को सोच मुस्कुरा उठी....लौटने लगी अतित की पगडण्डियो़ं पर जहाँ से उजालों के मुख्य सड़क को तलाशा था......

बाबा ब्रह्मदेव तिवारी के दुवार पर भिनहिये से कल्लुवा की माई  डुगडुगी डिबीर-डिबीर बजा रही थी। डीब-डीब-डीब के बेढब आवाज से तंग आकर ज्योत्सना ने ननद से पूछा- ‘‘बीबीजी ये आपके यहाँ कौन सा रिवाज है कि ब्याह के तीसरे दिन भी डीब-डीब लगा हुआ है।’’ मंजू नयी नवेली दुल्हन का मुँह आवाक हो ताकने लगी, चेहरे का रंग एकदम उतर गया, जैसे किसी ने चोरी पकड़ ली हो। मंजू ने पूरी सजगता के साथ उत्तर दिया- ‘‘जब तक कक्कन नहीं छूटता।’’ ज्योत्सना ने दूसरा सवाल दागा- ‘‘और कक्कन कब छूटता है? हमारे यहाँ तो विदायी वाले दिन ही छुड़ा देते हैं? मंजू को गुस्सा आ गया। भाभी! ये आपका घर नहीं है, यहाँ के रस्मो-रिवाज अलग हैं, समझी। अम्मा को भेजती हूँ, जो-जो जानना है पूछ लिजियेगा।’’तमक कर जाने लगी, ज्योत्सना को ध्यान आया कि वह अभी नव वधू है, ननद को नाराज करना ठीक नहीं। तेजी से दरवाजे की तरफ बढ़ती हुयी छोटी ननद का हाथ थाम लिया- अरे! रे ऽऽऽ मेरी प्यारी बीबीजी नाराज हो गयीं । गालों को हथेलियों से थपथपाते हुए कहा- चलिए अभी तो आपको प्यारी-प्यारी चूड़ियाँ और नगों वाली बाली देनी है, जिसे आपने मेरे मेकअप बाक्स में पसन्द किया था। मंजू पिघल गयी। ननद-भौजाई चूड़ीकेश और मेकअप बाक्स में उलझी छेड़-छाड़ में मगन थीं कि नाउन बुकवा लिए कमरे में दाखिल हुई- ‘‘चलो हो दुलहिन तनी मीज दें ,कहते चटाई बिछाकर बैठ गई। ज्योत्सना को सरसों के उबटन से उबकाई आती थी। मई का महीना और तीन दिन पहले उसके घर की नाउन के हाथों का पीसा हुआ बुकवा फुलहा कटोरे में लेकर नाउन बैठी मुस्कुरा रही थी। मंजू भाभी के मनोभाव ताड़ गयी- ‘‘मुस्कुराते हुए भाभी से कहा- बुकवा तो यहीं लगेगा भाभी, रिवाज है, पाँच दिन तक  नइहर का फिर सवा महीना ससुरे का बुकवा लगता है हमारे यहाँ बहुओं को, कोहनी से ढकेलते हुए भाभी से कहा- सोचती क्या है कूद जाईए मैदान में।’’ ज्योत्सना ने खीझते हुए कहा- मुझे सरसों  के तेल से एलर्जी है। उसी क्षण चाची सास अपने साल भर के बेटे को गोंद में लिए आ धमकी- ‘‘क्या हुआ ओ नाउन, कनियवा बुकवा लगवाने में निहोरा करवा रही है क्या?’’ नाउन मुँह चमकाकर रह गयी। ज्योत्सना मुँह गिराकर चटाई पर बैठ गयी, नयी नवेली दुल्हन का यह व्यवहार शाम तक पूरे गाँव-जवार में फैल जायेगा जानती थी। माँ की बात याद आयी- ‘‘परजा-पसारी चार घर की घुमनी जीव होती हैं रंजू ,ससुराल में इनसे सम्भल कर व्यवहार करना, वरना अफवाह उड़ाते देर नहीं लगेगी।’’

  ज्योत्सना ने पाँव की पाँच उंगलियां रूमाल से पैर ढककर आगे बढ़ाया, चाची सास ने तपाक से लिहेड़ी लिया- ‘‘हे इनसे का लजाना, साले भर में नंगटे मिसाओगी। मंजु हा-हा-हा हँसने लगी। नाउन ने पैर खींचा- ‘‘दा दुलहिन निम्मन से मीज देइं।’’ ज्योत्सना रूमाल दाबे सिर झुकाये बैठी रही। सास दूसरे बेला का मांग बहोरने आयी- ‘‘ऐ नाउन! चला जा- आपन माया जाल हटावा, मांग बहोरे के है। नाउन हाथ में का बुकुवा छुड़ाकर उठ खड़ी हुई। पंडी बाबा को कितने बजे बुलाना  है? बता देयीं त कल कहते आउंगी। आज चार दिन हो गया, पुजइया काल्हे होना है न ? ज्योत्सना की सास सिर का पल्ला ठीक करते हुए बोली- कुल पोवत करत चार त बजीए जाई- पाँच बजे के कहि दिहा। और ज्योत्सना के आँचल में पाँच बड़े-बड़े लड्डू डाल कर सिन्होरा से सिन्दूर निकाल कर पूरा मांग पीला सिन्दूर भर गयी। गर्मी में इतना सिन्दूर देख ज्योत्सना रूआंसी हो जाती किन्तु ससुराल में नवेली दुल्हन का विरोध सम्भव नहीं था, इसलिए अन्दर ही अन्दर कुढ़ती रहती।
               अगली सुबह नीम अंधेरे सास आकर जगा गयी, पूरे परिवार की औरतों की चहल-पहल सुनकर ज्योत्सना चौकन्नी हुई। याद आया आज ब्याह के पाँचवे दिन की पुजइया है जो सुबह पाँच बजे से शाम पाँच बजे तक चलेगी, सास शाम को ही समझा गयी थी। झट-पट नहा-धोकर तैयार हो गयी।मन रोमांचित था। आज कक्कन भी छूट जायेगा। चार दिन बाद हृदयेश को देखेगी, जिसने विदाई वाले दिन पूरे रास्ते यही समझाया कि जो भी माँ कहे करते जाना। महीने भर की बात है बाद में तो साल में एक बार छुट्टियों में गाँव आना होगा। कितना सहज और साल पुरुष है हृदयेश, उसकी हथेलियों को अपने हाथों में लेकर कितनी बार चूमा था उसने सफर में, सोच कर सिहर उठी।
ज्योत्सना एक बात सोच कर दंग थी कि घर-भर के मर्द पूरे दिन आँगन-दुवार एक किए रहते, लेकिन हृदयेश की एक झलक भर उसे पिछले चार दिन में नहीं दिखी थी। गजब का शासन चलता था उसके सास का घर में, मजाल की कोई घर में उनका विरोध कर दे।सास कमरे में दाखिल हुई, पीछे-पीछे छोटी सास हाथ में आटे का फुलहा थाल लिए। सास ने आदेश दिया- ‘‘पाँच बार जय चमइया जी- जय चमइया जी बोल कर छू दो दुलहिन। ज्योत्सना को सुनने में भ्रम सा लगा- जी कौन मईया? ‘‘चमईया’’ सास ने तेज आवाज में कहा। ज्योत्सना आवाज कड़की समझ गयी। चुपचाप उच्चारण कर आँटा छू लिया। सास चली गयी। थोड़ी देर में बूढ़ी आजी सास बड़ी फुआ सास के साथ हाथ में फूल-बताशा, धार लिए आयी और वही आदेश दिया जो सास कह गयी थी। बारी-बारी घर भर की औरतें ऐसे ही कुछ-न-कुछ लेकर आतीं और जय चमइया, कहवा जाती। ज्योत्सना सोच में पड़ गयी। चमइया कौन है भला? मंजू मिलती तो उगलवा लेती या फिर हृदयेश से पूछती। अजीब, पेशोपेश में वह कमरे में साड़ी के आँचल का कोर तोड़ते- मरोड़ते घूम रही थी की नाउन पधारी।

‘‘आइये नाउन, बैठिये।’’ नाउन खुश हो गयीं शहरी पढ़ी-लिखी बहू से आदर पाकर। चटाई बिछाकर बैठ गयी। आज पाँचवे दिन के कटोरे वाले बासी उबटन से मुक्ति का दिन था। नाउन ने नेम पूरा किया और हँस कर कहा- कमासुध कनिया से का मिली? ज्योत्सना ताक में थी। पाँच सौ की कड़कती नोट पर्स से निकालकर नाऊन की हथेलियों में दबाकर रखते हुए कहा- अम्मा जी से मत बताइयेगा, नाराज होंगी। तीर निशाने पर लगा था, नाउन फैल गयी। अरे बहिनी, इ तोहार सास त सछाते चण्डी हई, इनसे के कही? ज्योत्सना ने पूछा- चाची इ चमाइया कौन देवी हैं? नाउन व्यंग्य से मुस्कुरा उठी। ऐ दुलहिन इ राज तोहरे हमरे पुरखन की पेट क राज है। जेके मरत घरी सास पतोह से बतावेले, अईसे ना। ज्योत्सना की जिज्ञासा प्रबल हुई। काहे? .....बहुत तो नहीं जानती ऐ दुलहिन, बाकी ऐतना है कि कौनो चमाइन को तोहरे पुरखा फसायेे रहे, पुजइया लेती, नाहीं त वंशे नहीं चले,कह कर उठी और दाऐं -बाऐं चोर नज़र से देख कर चल दी। ज्योत्सना सुनकर दंग रह गयी। हद है इतने शिक्षित परिवार में ऐसा ढ़ोंग।
         दोपहर में पकवान बनने के बाद ज्योत्सना को बड़ी ननद रसोई में ले गयी। सास निर्देश देती रही, ज्योत्सना ने कोरे चूल्हे पर कढ़ाई चढ़ाकर पाँच पूड़ी बनाया, थोड़ा सा हलवा नेम के लिए, पहली रसोई का भोग भी ‘‘चमइया’’ को पहले चढ़ता था। दो बजे हृदयेश और ज्योत्सना का नाउन ने गठजोड़ किया, पति-पत्नी ने चार-दिन बाद एक दूसरे को कनखियों से निहार, छोटी चाची सास ने देख लिया- देखिये-देखिये बड़का बबुवा, आज इनके भोग का भी दिन है। ‘‘लड़कियाँ ठहाका मारकर हँस पड़ी, सास ने आँख तरेरा तो चाची सास चुप हो बैठ गयीं। औरतें लड़कियाँ गाती-बजाती भोग के सोलह थाल लेकर पैदल चल रही थीं। आगे-आगे नाउन सिर पर दौरी में पूजन का सामान अछत, फूल, सेन्दूर आदि लिए और सास भर लोटा धार लिए चल रही थीं। लड़कियाँ गा रही थीं- गोरा बदन नीली साड़ी ओ साड़ी वाली....।

ज्योत्सना नंगे पाँव कच्चे रास्ते पर चल रही थीं। ज़मीन तवे की तरह जल रही था। कोस भर चलने के बाद पति से पूछा, अभी कितना चलना है? बस, सामने वाली बारी में। ज्योत्सना ने पारदर्शी चादर में से देखा, सामने घना आमों का बाग पोखरा और एक छोटा सा कमरे नुमा मन्दिर दिखाई दे रहा था।
औरतों का समूह पोखरे के पास बने चबूतरे पर सामान रखकर बैठ गया। सभी थक चुकी थीं। सास ने हृदयेश से पूछा- कै बजा? साढ़े तीन,.... अरे राम रे। ऐ छोटकी दुलहिन के बता रे पूजा का विधि ,हम पोखरे से पानी लेकर आते हैं। चार बजे पंडी जी कक्कन छोड़ाने और सतनरायन बाबा का कथा बाचने का आ जायेंगे। पाँच बजे तक सब निबट जाना चाहिए।
                     ज्योत्सना के ससुर चार भाईयों में सबसे बड़े थे, छोटा भाई हृदयेश से महज पाँच साल बड़ा था। परिवार में उनके त्याग के कारण सभी अदब-लेहाज करते थें। पत्नी परिवार को बाँधने की कला में माहिर थी सो चार भाईयों का संयुक्त परिवार चार गाँवों में मिसाल था। परिवार में बारह पुरुष, बलिष्ठ, गाड़ी-घोड़ा, छकड़ा से दुवार रज-गज। पुरखे जमींदार, सैकड़ों बीघे की खेती, प्रगतिशील किसान होने के कारण अन्न धन से घर भरा था। इस पीढ़ी में सबसे बड़े बेटे हृदयेश ने विश्वविद्यालय में प्राध्यापकी पाकर कुल परम्परा में चार चाँद लगा दिया था। लड़के बाहर बड़े शहरों में पढ़ने निकल चुके थे। लड़कियाँ घर की जीप से पास के शहर पढ़ने जाती थीं। हृदयेश के पिता पढ़े-लिखे प्रगतिशील विचारधारा के व्यक्ति थे इसलिए उच्च शिक्षित बेटे के लिए बहू भी उसी के टक्कर की खोज निकाला था, एक पैसा दहेज नहीं लिया, पक्के बनिया थे, लड़की कॉलेज में लेक्चरर थी,अच्छा कमाती थी। दहेज न लेकर मुफ्त में वाह-वाही लूटकर प्रगतिशीलता पर मुहर पक्की कर गए।
मन में ‘‘चमइया’’ की पूजा को लेकर सशंकित थे, पत्नी को सख्त हिदायत दिया था जब तक बहू पुरानी नहीं हो जाती भेद नहीं खुलना चाहिए। चमइया की पुजइया में विशेष सतर्कता घर भर की औरतें बरत रही थीं। छोटी सास ज्योत्सना को मन्दिर के पिछवाड़े लेकर गयीं, हृदयेश ने गठजोड़ का गमछा उसके कन्धे पर रख दिया। चाची सास ने एक टीले पर बैठाकर धीरे से हाथ जोड़ कर ज्योत्सना से विनय के स्वर में कहा- ‘‘दुलहिन ये बड़ी कठिन पुजइया है, न करने पर चमइया डागर बजाते हुए गर्भ के समय आयेंगी और सोए में कोख काछ कर चली जायेंगी। ज्यादा कुपित हुई तो माँग भी धो सकती हैं। ये जो घर में तीन निपुती राड़ देख रही हो न बहू !...रोते हुए,..चमइया की पुजइया ठीक से न करने का परिणाम है। ज्योत्सना ने चाची सास का हाथ थाम लिए- ‘‘चाची जी आप ऐसे क्यों कह रही हैं? जो कुल परम्परा है उसे मानना मेरा धर्म है। आप पूजा की विधि बताइये। ऐसी कौन कठिन पूजा है जो मैं नहीं कर सकती। हँसते हुए गर्व से कहा- ‘‘बताइये-बताइये... मैं गोल्ड मेडलिस्ट हूँ। चाची सास ने लम्बी साँस छोड़कर मुस्कुराते हुए हाथ थामकर खड़ा किया। मन्दिर के पीछे का चोर दरवाजा खोलकर ज्योत्सना को आदेश दिया, दुलहिन ‘‘चमईया’’ की पूजा निर्वस्त्र होकर पति-पत्नी प्रथम मिलन के पहले करते हैं, बारी-बारी सोलहों भोग थाल का परसाद चढ़ाकर पिंडी को पीले सेन्दूर से पाँच बार टीककर लोटे में पोखरे का पानी होगा,उसमें धार घोलकर पिंड़ी पर गिरा देना ,अगरबत्ती बार कर दिया जलाकर अढ़हूल का पाँच फूल चढ़ाकर कहना- ‘‘हे चमइया’’ हमने अपना सबकुछ उतारकर आपको दे दिया आप भोग लगाए तो हम पहने। और थोड़ी देर आँख मूंदकर हाथ जोड़कर खड़ी रहना फिर एक-एक थाल में तुम दोनों के लिए कोरे कपड़े रखे हैं, उठाकर पहन लेना और दरवाजा खोलकर बाहर आ जाना। ज्योत्सना को काठ मार गया। वह चीख पड़ी ‘‘आप पागल तो नहीं हो गयी हैं? नंगे ऽ ऽ ऽ, नंगे इनके सामने मैं सीधे जाकर खड़ी हो जाऊँ। हद है मूर्खता की, मुझसे ये नहीं होगा। छोटी सास भागते हुए ज्योत्सना के सास के पास पहुँची। जीजी नहीं मान रही। सास चिंतित हो उठी, डर पहले से था। बहू के पास आयी, ज्योत्सना सुबक-सुबक कर रो रही थी। सास ने पेट पकड़ लिए, बेटी नहीं किया तो इ चमइया कुल नाश देगी। हमार बहिनी इ विनती है तोहसे, आँचल फैलाकर रोते हुए बहू से अनुनय करने लगीं । ज्योत्सना पिघल गयी- नहीं अम्मा जी ये क्या कर रही हैं। हम आपके बच्चे हैं, आप पाँव छूकर पाप मत चढ़ाइये। सास का यत्न मारक था। रोते-धोते ज्योत्सना तैयार हो गयी। एक-एक कर सारे कपड़े उतार कमरे में दाखिल हुई, कमरा चूने की नई-नई पुताई से चमक रहा था। बीच में बड़ी सी मिट्टी की पिंडी बनी थी। कच्चे फर्श को गोबर से लीप-पोत कर चिकना किया गया था। चारों तरफ सोलह थाल करीने से रखे हुए था। जब तिवारियों के घर में बेटे का ब्याह होता था कमरा ऐसे ही चमकता था। बाकी दिनों में गाँव के मनचले आशिकों के आशिकी का अड्डा रहता। अब तो बाकायदा आस-पास के गाँव के मजनू -लैला, इतवार को चढ़ावा चढ़ाने लगे थे।
सास ने खट से दरवाजे की कुण्डी चढ़ाई। ज्योत्सना सहम गई, धम्म से घुटनों में मुँह छिपाकर बैठ गयी। चाची सास ने जूड़ा खोल दिया था, कोई बन्धन लेकर जाना वर्जित था। आगे के दरवाजे से हृदयेश अन्दर दाखिल हुआ। ज्योत्सना घुटनों में मुँह छिपाये दीवार के सहारे बैठी थी। लम्बे घने बाल शरीर पर आवरण का काम कर रहे थे। हृदयेश ने हाथ पकड़कर उठाने का प्रयास किया, जल्दी करो ज्योत्सना लेट हो रहा है। जितनी जल्दी करोगी इस यातना से उतनी जल्दी मुक्ति मिलेगी। ज्योत्सना पैरों से लिपट गयी। ये किस पाप की सजा है हृदयेश? वह रोये जा रही थी। इतने प्यारे रिश्ते की शुरूआत इस मानसिक यातना से क्यों ? हृदयेश बैठ गया, उसकी आँखों से भी आँसू बह निकले थे। कोई फायदा इस तर्क-वितर्क का नहीं। मैं तुम्हे रात में सब बताता हूँ। प्लीज अभी इसे खत्म करो। मैं आँखें बन्द करता हूँ। हृदयेश आँखें  बन्द कर वहीं दीवार की तरफ खड़ा हो गया, ज्योत्सना ने हिम्मत करके सभी निर्देश चाची सास के पूरा किया। अन्त में पेटीकोट गले तक बाँध कर पति से कहा अब आप माथा टेके मैं आँख बन्द करती हूँ। हृदयेश में गमछा उतार कर माथा टेका और फिर दोनों ने नए कपड़े पहनकर दरवाजा खोला। इस पूरी घटना से ज्योत्सना इतनी विचलित हो चुकी थी चलना दूभर था। छोटी चाची सास ने हाथ में कसकर पकड़ लिया। कच्चे रास्ते की जलती तपिश ने अब उसके अन्तस तक को झुलसाना शुरू कर दिया था। परम्पराओं के नाम पर दिये जाने वाले मानसिक यातना का यह सबसे बड़ा उदाहरण था ज्योत्सना के सामने, जिसने नव जीवन में प्रवेश से पूर्व ही एक अजीब घुटन भर दी थी। घर पहुँचते पहुँचते साढ़े चार बज चुके थे। दुवार पर मर्दों की चौपाल लगी थी। लकड़ी की हत्थ वाली कुर्सी पर पैर रखकर पंडी जी बैठे भागवत कथा का सार सुना रहे थे। बीच-बीच में घड़ी देख लेते और बेवा औरतों की ओर देखकर बड़बड़ाते- ‘‘इ मेहरारून का झमेला, कुच्छौ नहीं समझता, विलम्ब हो गया तो मुँह पिटाएंगी अपना।’’ नाउन दौरी कपार पर लिए हाली-हाली भागी आ रही थी। पीछे-पीछे बड़की तिवराईन (ज्योत्सना की सास) हाफी-दाफी आती दिखीं तो पंडी जी कुर्सी पर से कूद कर खड़े हो गये- ‘‘का रे ऽ ऽ ऽ नउनियाँ तोहूं के सिखवे पड़ी, ....टेम निकरे जात है और तोर चकल्लस अबही ले चलत बा।

नाउन- अरे बाबा ऽऽऽ अरे बाबा ऽऽऽ बोलती हुई बरामदे की सीढ़ियां चढ़ती आंगन की ओर भागी। पंडित जी पीछे पीछे ....आंगन में चौक चन्दन पहले से पूरकर, कलशा और गणेश स्थापित देख पंडित जी मुस्कुराते, खैनी पीटते हुए- बोले ,वाह शेर मैदान मार लिए। चलो अब जल्दी निपट जायेगा। पंडि जी अपने आसन पर जम गये। उनके मुँह से केवल ऊँऽऽऽ का उच्चारण स्पष्ट सुनाई देता। बाकी मंत्र गले में घनघना कर रह जाता। तिवराइन को आवाज लगाया- वर-कन्या को बुलाइये। तभी आंगन में हृदयेश और पीछे लड़खड़ाते हुए ज्योत्सना चाची सास के साथ दाखिल हुयी औरतों ने ज्योत्सना को पकड़ कर चौक पर बिठाया। पंडी जी ने दोनों के कक्कन खोलकर सास को दिया और बँसवार में फेंकवाने का सख्त निर्देश दिया और कथा बाचने लगे। हर अध्याय के आरम्भ में केवल कलावती कन्या सुनाई देता बाकी अऽऽऽ हूँऽऽऽ हंऽऽऽ की ध्वनि के साथ लुप्त हो जाता। नाउन को उनके संस्कृत ज्ञान पर पूरा संदेह था ,छेड़ते हुए बोली- ए बाबा! तनी अरथ सहित बांचा कुछ बुझाते नइखे। पंडी जी पिनक गये, बगल में पड़ी अपनी लाठी जमीन पर पीटते हुए चिल्लाये- ससुरी बिघन डालती है, जानती है, कुबेला हो रहा है, साली नीच जात, नीच बुद्धि। नाउन भी कम नहीं थी तमतमा उठी- ए बाबा जात पर त जइबे न करी नाही त अब्बे कुलआई माई उबेर देइला। मामला बिगड़ते देख हृदयेश ने हस्तक्षेप किया। पंडी जी खतम करिये पाँच मिनट बचा है। पंडी जी का अऽऽऽ हूँऽऽऽ हंऽऽऽ तेज हुआ। गौरी की सिन्दूर पूजा के बाद कथा सम्पन्न हुई। बड़की तिवराइन ने चैन की सास लेकर पूरब में सुरुज नरायन को आरती दिखा पूजा सम्पन्न होने की घोषणा की।
             रात ग्यारह बजे हृदयेश कमरे में आया। ज्योत्सना के मन में प्रथम मिलन का रोमांच समाप्त हो चुका था। ननदों और चाची सास ने कमरे को सुगन्धित इत्र से इतना गमका दिया था कि उसे उबन हो रही थी। भारी बनारसी साड़ी और गहने उसे चुभ रहे थे। एक तरफ छोटे से मेज पर दो गिलास दूध, सूखे मेवे और मिठाईयां करीने से सजाकर रखे थे। हृदयेश ने दरवाजे की कुंडी बन्द कर दी। ज्योत्सना खिड़की के पास आकाश में उगे पूर्णिमा के चाँद को एकटक निहारते हुए सोच रही थी, पूर्णता भी कितना बड़ा भ्रम है। चाँद का एक दाग के साथ उगना और घटते बढ़ते लुप्त हो जाना। सही है ‘‘सब दिन रहत न एक समाना’’ का उदाहरण इस चाँद से बड़ा और क्या होगा। वह नाहक मुस्कुरा उठी हृदयेश ने उसे मुस्कुराता देख बाहों में भीच लिया। ज्योत्सना की तन्द्रा टूटी। एकदम से उसका मन कसैला हो गया। खुद को उसके मजबूत गिरफ्त से छुड़ाने की कोशिश की। हृदयेश ने उसके गालों पर चुम्बन देते हुए कहा- ‘‘अब इतनी क्या शर्म? सब तो ओपेन हो चुका है।’’ ज्योत्सना चीख पड़ी- बस करिये हृदयेश मुझे आपके साथ नार्मल होने में थोड़ा समय लगेगा। हृदयेश नर्वस हो गया। ‘‘अब क्या हुआ?’’ सब नार्मल तो है न? ज्योत्सना छिटकर दूर खड़ी हो गयी- ‘‘नहीं! सब एबनार्मल है, मुझे घुटन हो रही है, शायद मैं बेहोश हो जाऊंगी। हृदयेश ने दरवाजा खोल दिया, हाथ पकड़कर कहा- ‘‘चलो ऊपर छत पर, शायद खुले में कुछ राहत मिले, गरमी बहुत है, हाँ ये सब उतार कर कुछ हल्का पहन लो। इससे भी घुटन हो रही होगी।’’ ज्योत्सना ने पति से कहा- ‘‘आप चलिए! मैं आती हूँ।’’
                ब्रह्मदेव तिवारी के बीघे भर फैले हुए पुस्तैनी मकान में चार भाईयों का परिवार रहता था। दो बीच के भाई क्रमशः एयरफोर्स में कार्यरत थे। छोटा यहीं प्राथमिक में मास्टर था। भाईयों की शादी भी बड़के तिवारी जी ने खूब ठोक-बजाकर कर दिया था। वहां भी दहेज के फेरे में न पड़कर घराना देखकर भाईयों को ब्याहा था। तीन भाईयों की शादी आस-पास के दबंग ब्राह्मणों के घर में किया। इसका परिणाम यह निकला कि बड़े से बड़ा अधिकारी, नेता दरवाजे पर सलामी लगाकर ही आगे बढ़ता। दूसरे नम्बर के भाई के ससुर विधायक, पिता के तर्ज पर दोनों साले भी राजनीति में कूदे और पार्टी बदल-बदल कर सत्ता में काबिज रहते। बस एक फोन मिलाया बड़के तिवारी ने कि थाना पुलिस हाजिर। तीसरे के ससुर इण्टर कॉलेज में प्रिंसिपल, नकल का सेंटर बना अकूत धन कमाया। रिटायर होने पर खुद ही स्कूल, कॉलेज खोल लिया। आज के दिन वे इलाके के मदन मोहन मालवीय थे। चौथा पढ़ने में होनहार था, इलाहाबाद तैयारी को भेजा लेकिन वहां जाकर वामपंथ और साहित्य में रम गया। बड़के तिवारी को पांच साल बाद भाई के रंग-ढंग का पता तब चला, जब अखबार के साहित्यक पृष्ठ पर उनकी क्रांतिकारी कविता छपी मिली। पढ़ते हुए कान खड़े हो गये- लिखते हैं-
मुझे तोड़नी है,
बनी बनाई पुरातन की वज्र वह दीवार
जो तुम्हारे और मेरे बीच
खड़ी की गयी थी
उस दिन जब तुम गाँव के दक्खिन में
और मैं पूरब में जन्म ले रहा था
जब तुम्हें मुँह में
सभ्यता की काली स्याही से
अक्षर -अक्षर कालिमा के नियम
दूध में घोलकर
पिलाया जा रहा था
मुझे सभ्यता के विशाल आंगन में
चौक, चन्दन, पूर
सोने के कलश पर
सूरज की अरुणिमा का
चन्दन लगाकर
चाँदी की कटोरी में
चाँदी के सिक्के से
अन्न प्राशन के नाम पर
चटाया जा रहा था
विभेद......
प्रिये!
मुझे गिरानी है
पुरातन की वज्र दीवार,
तुम्हारे लिए,
जोड़कर अधूरे सम्बन्धों की डोर
तुम्हारे दक्खिन से
अपने पूरब तक।


                                                            रेखाचित्र   -   अनु्प्रिया


साँस -परान हलक में अटक गया।सरपट पत्नी से सतुआ-पिसान लिए पहली ट्रेन से इलाहाबाद भागे। हाथ -पैर जोड़कर माँ की अस्वस्थता का हवाला देकर घर लाए। अनुभवी ब्राह्मण मानसिकता ताड़कर बाण छोड़ता है। माँ को समझा-बुझाकर तैयार किया। व्याह का दबाव बनाने लगे। भाई दो बार घर छोड़कर भागे। तब अन्तिम ब्रह्मास्त्र छोड़ा बड़के तिवारी ने। जोरदार हर्ट अटैक का सन्देश भाई के यहाँ भेज अस्पताल में भर्ती हो गये। पिता तुल्य भाई के हर्ट अटैक की खबर सुन छोटके तिवारी गिरते-पड़ते घर भागे। डाक्टर रिश्तेदार थे, एकांत में ले जाकर समझाया ..तनाव इनके लिए जानलेवा हो सकता है। बेचारे छोटके तिवारी फंस गये और रोते-धोते ब्याह के बंधन में बंध गये।पहले क्रांतिकारी प्रेम का भूत पूरी तरह माथे पर चढ़ा हुआ जानकर बड़के तिवारी ने इस बार न घर देखा, न घराना। इलाके की सबसे खूबसूरत ब्राह्मण कन्या घर लायी गयी। अल्हड़ गाँव की लड़की, किसी तरह नकल से बी.ए. पास किया था। पिता को रिश्ता घर बैठे मिला तो इलाके भर मूसरन डोल बजा-बजा कर ऐलान किया, हमारी बेटी तिवारीपुर के तिवारियों में जा रही है। स्त्री के देह का सौन्दर्य पुरुष की सबसे बड़ी कमजोरी है, पत्नी का सौन्दर्य सारे क्रांति पर भारी पड़ा और छोटके तिवारी का वामपंथ छू मंतर हो गया।
                          आधी रात को गुलाबी शिफॉन की खूबसूरत नाइटी में ज्योत्सना छत पर पहुँची, हृदयेश ने आकाश के चांद को आंख मारते हुए कहा- ‘‘तुम्हारी ज्योत्सना मेरे पास है।’’ दोनों कुछ क्षण एक दूसरे को एकटक निहारते रहे। गोरा रंग, गोल चेहरे पर काली बड़ी-बड़ी आँखें। उसे याद आया जब आजी उसे पहली बार देख कर आयी थी, कहते नहीं अघाती थीं- ‘‘बाबू चनरमा अइसन गोल मुँह पर आम के फाक नियर बड़-बड़ आँख अउर तोता के ठोर नियर नाक, टह-टह लाल ओठ और पीठ पर धौल जमाते हुए कहती अउरी गावे ले ए बाबू एकदम कोइलिया नियर।’’ ज्योत्सना ने ननद के आग्रह पर मीरा का भजन सुनाया- ‘‘पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।’’
हृदयेश ने उसके होठों को चूमने का प्रयास किया तो ज्योत्सना छिटककर भागने लगी। बड़े से सुनसान छत पर मियाँ-बीबी एक दूसरे के साथ भागा-भागी खेलने लगे। थककर हँसते-हँसते लोटपोट हुए जा रहे थे- ‘‘बाप रे धाविका पत्नी पहली रात में इतना दौड़ायेगी पता नहीं था।’’ ज्योत्सना ने कहा- ‘‘हृदयेश! एक बात पूंछू?’’ हाँ क्यों नहीं।....
आप भौतिकी के ही प्राध्यापक हैं न?
आफकोर्स, व्हाई नाट।
तुम्हें आशंका क्यों?
‘‘कमाल करते हैं, इतनी मूर्खतापूर्ण परम्परा का निर्वहन पूरे मनोयोग से करते देख।’’ 
ज्योत्सना ने व्यंग्य से मुस्कुराते हुए कहा- बात ठस्स से दिमाग में धस गयी। बना बनाया रोमैंटिक मूड उखड़ गया।

  ‘‘विवशता है।’’ हृदयेश का चेहरा क्रोध से खींच गया। जिसे छिपाने की उसकी कोशिश नाकाम रही।
दूसरा सवाल उससे भी घातक था।
‘‘सुना है आप डी.यू. में आइसा के पदाधिकारी थे और अभी प्रलेस के पदाधिकारी हैं। मैंने आपके कई वैचारिक लेख हंस जैसी बड़ी पत्रिकाओं में पढ़े हैं। आश्चर्य होता है समाज की रुढ़ परम्पराओं, जातिय व्यस्था का खण्डन करने वाला युवक ऐसी यातनापूर्ण कुल परम्परा का न केवल पालन करता है बल्कि पत्नी को भी मानने के लिए विवश करता है।’’
ज्योत्सना पूरे आवेग में थी। ‘‘जिन बुराईयों का आपको पुरजोर खण्डन करना चाहिए उसके प्रति यह अन्ध आस्था क्यों?’’ 
हृदयेश बगलें झांकने लगा, कोई मजबूत उत्तर न दे सका तो कुतर्क करने लगा।
देखों! ...ज्योत्सना। कुछ बातें मानसिक तौर पर इस कदर हमसे जुड़ी रहती हैं कि हम उसे मानने के लिए विवश हो जाते हैं। इस पूजा से मेरी माँ मनोवैज्ञानिक तौर पर जुड़ी है और एक अजीब संयोग भी है कि जिन लोगों ने इसे मानने से इनकार किया उन सब का सफाया हो गया। अब न मानने का कोई विकल्प नहीं बचता मेरे पास।
ज्योत्सना को हँसी आ गयी- ‘‘यह भौतिकी का प्राध्यापक कह रहा है, आई डोंट बिलिव, ह्वाट अ-नॉनसेंस जोक।’’

हृदयेश चिढ़ गया- ‘‘तुम्हें इतनी उलझन क्यों हो रही है, कर्मकाण्डी आचार्य चन्द्रसेन शास्त्री की बेटी कुल परम्पराओं के निर्वहन पर सवाल खड़े कर रही है।’’ कंधे उचका कर कहा- ‘‘घोर आश्चर्य तो मुझे हो रहा है।’’
हृदयेश हाथ से पकड़ी हुई रेलिंग की ओर पीठकर ज्योत्सना की तरफ खड़ा अंधेरे शून्य में निहार रहा था।
पति की कोई प्रतिक्रिया न पाकर ज्योत्सना ने पास जाकर कहा- ‘‘वैदिक संस्कृति में पितृसत्ता की साजिशें विषय पर शोध किया है मैंने।’’ हृदयेश झट से बोला- ‘‘पितृसत्ता की साजिशें? तुम्हें शीर्षक किसने दिया?’’
जब तर्क मजबूत होते हैं आपके तो रास्ते रोकने का साहस किसी में नहीं होता। 
ज्योत्सना के होठों पर दृढ़ता की मधुर मुस्कान थी। 
हृदयेश मुस्कुरा उठा- ‘‘तो तुम्हें वैदिक नियम स्त्रियों के पक्ष में घोर षड़यंत्र लगते हैं?’’
‘‘बिल्कुल’’- ज्योत्सना ने दृढ़ता से कहा। 
फिर तो तुम नास्तिक हो। ...हृदयेश में व्यंग्यपूर्ण मुस्कान में लपेटकर तीर छोड़ा। मना क्यों नहीं कर दिया माँ को पूजा से। कहां थी तुम्हारी वैचारिकी डाक्टर ज्योत्सना उस वक्त?
ज्योत्सना आहत हुई, पुरुष स्त्री के आधुनिकता बोध या वैचारिक होने को किस रूप में ग्रहण करता है वह अच्छी तरह से जानती थी। हृदयेश अपनी गलती छिपाने के लिए उसे घेर रहा था। उसे समझते देर न लगी कि अब उसका जूता उसी के सर है।

‘‘डाक्टर साहब !स्त्री का आस्तिक या नास्तिक होना यहाँ प्रासंगिक नहीं है, प्रसंग एक विकृत परम्परा को जबरन ढोने का है।’’ 
ज्योत्सना ने पूरी ताकत झोककर कहा। पति के आँखों में आक्रोश चांदनी रात के धवल प्रकाश में स्पष्ट दिखाई दे रहा था। एक पराजित पुरुष कितना आक्रामक हो सकता है उसके आँखों की लालिमा में साफ-साफ देखा जा सकता था।‘‘
ज्योत्सना तुम्हें नहीं लगता कि तुम हमारे मधुर रिश्ते की नींव कटुता की कटीली पृष्ठभूमि पर रख रही हो। ह्रदयेश की आवाज में कठोरता थी।
ज्योत्सना ने खुद को संयत करते हुए कहा- ‘‘आप नहीं समझेंगे हृदयेश!’’ हमारी संस्कृति में पुरुष का पौरुष कठोरता के प्रदर्शन में निहित है लेकिन स्त्री जिसे प्राकृतिक तौर पर आपने कोमलांगी घोषित कर रखा है । सब कुछ सुकोमल चाहती है वह चाहती है पुरुष उसे फूल की नाजुक पंखुड़ियों से स्पर्श करे और आप जैसे पुरुषों ने स्त्री को सभ्यता के पिंजरे में कैद खूबसूरत परिन्दा ही माना। पुरुष शिकारी की दृष्टि से देखता है नारी देह को और उसके लिए केवल देह है। व्यक्ति मानने का साहस अभी तक हमारे समाज में मर्दो में नहीं है।’’

उसके चेहरे पर घृणा के भाव स्पष्ट उभर आये थे ।
‘‘बाप रे बाप!’’ तो आप स्त्रीवादी हैं? हृदयेश ने भयभीत होने का अभिनय किया।‘‘
नहीं केवल मनुष्य। जिसे प्रकृति ने वाचिक तौर पर प्रतिरोध करने की क्षमता से नवाजा है।’’ ज्योसना ने घृणा से दाँत पीसते हुए कहा।

पूरब में शुक्र ग्रह उग आया था। सप्त ऋषि और शुकउवा काे देखकर हृदयेश ने झल्लाते हुए कहा- ‘‘भोर हो गयी, जीवन की सबसे मधुर रात इतनी कड़वी होगी मुझे पता नहीं था।’’

‘‘पवित्र रिश्ते की पृष्ठभूमि भयंकर मानसिक यातना के साथ आरम्भ हो तो उसका हश्र यही होता है हृदयेश!’’ ज्योत्सना रुआसी हो गयी ‘‘मुझे थोड़ा वक्त दें आपके साथ सहज होने में मुझे थोड़ा वक्त लगेगा।’’ कहते-कहते वह रो पड़ी।हृदयेश से ज्योत्सना का रोना नहीं देखा गया। स्त्री के आंसू में बड़ी ताकत होती है। बड़े से बड़े चट्टान पुरुष को पिघलाने की क्षमता से लैस। हृदयेश ज्योत्सना को सीने से लगाकर पुचकारने लगा।
‘‘अरे यार! मैं तो गुस्से में यह सब कह गया। रही बात वक्त की तो जानेमन, अब पूरा जीवन तुम्हारा है जब तक चाहो इंतजार करा लो।’’ दोनों की आंखें मिली। सजल स्नेहिल कंपकपाते होठों से हृदयेश ने ज्योत्सना के होठों को चूम लिया। ज्योत्सना ने शर्माकर पति के सीने में चेहरा छिपा लिया।
हृदयेश ने कहा- ‘‘क्या हुआ? आखिर मैं तुम्हारा पति हूं वैसे भी हमारे बीच कोई पर्दा नहीं फिर उस क्षण को लेकर इतना विचलन ठीक नहीं ज्योत्सना। ज्योत्सना ने उसी मधुरता से उत्तर दिया- ‘‘जानती हूं लेकिन जो पर्दा अपनी स्वीकृति के साथ पूरी सजगता से उठना चाहिए था वह मेरे जीवन में भयंकर दुर्घटना बनकर आया हृदयेश! मैं घोर मानसिक पीड़ा से गुजर रही हूं। थोड़ा वक्त दें ,..पति पत्नी दोनों का वाक्युद्ध पूरी रात चलता रहा, भोर की लालिमा पूरब में छिटकने लगी। सास- बहू को जगाने कमरे में पहुंची। कमरे में दोनों को न पाकर शंका हुई कि कहीं गर्मी के कारण दोनों छत पर न सो रहे हों। जल्दी जल्दी सीढ़ियां चढ़ती हुई छत पर पहुँची। माँ को देख हृदयेश ने पत्नी को झट से बाहों से अलग किया। ज्योत्सना तुरन्त नीचे भागी। माँ ने बहू को नाइटी में देख बेटे को आँखों ही आँखों में बहुत कुछ सुनाया। हृदयेश ने सर झुकाकर आगे ऐसा न करने का आश्वासन दिया।

                  ब्याह के पन्द्रह दिन बीत गये। बड़ी मान मनउल्ल के बाद मुश्किल से दो बार पति पत्नी एक हुए थे। ज्योत्सना पति की सहजता सरलता और संयम पर मुग्ध हुई जा रही थी। गाड़ी पटरी पर लौट रही थी। दोनों बड़े चाचा ससुर अपने परिवार को लेकर नौकरी पर लौट चुके थे। घर में तीन बेवा वृद्ध औरतें छोटे चाचा सुसर-सास, सास ससुर के अतिरिक्त छोटी ननद मंजू और साल भर का चचेरा देवर बिट्टू रह गये थे। बड़ी ननद को हफ्ते भर बाद ही ससुराल वाले विदा कराकर ले गये थे। हृदयेश दो बहन एक भाई में सबसे बड़ा था। चाचा का हमजोली होने के कारण उनसे वह मित्रवत व्यवहार रखता था। वह उनसे इतना प्रभावित था कि उनके कहने पर कुएं में कूद सकता था। अल्हड़ गाँव की लड़की चाची भी उसके साथ देवरों सा हास-परिहास करती थीं। बड़की तिवराइन आँखों की आँखों में देवरानी को समय-समय पर सीमाओं का ज्ञान कराती रहती। आवश्यकता पड़ने पर जबान भी चलाती।

भरे पूरे परिवार में कमकरिन बर्तन चौका के लिए, महराज रसोई बनाने के लिए, तथा दरवाजे पर तीन नौकर झाड़ू बटोरू के लिए, गोरु चउवा की देखभाल के लिए और इसके अतिरिक्त चुनमुन यादव बड़के तिवारी के व्यक्तिगत ड्राइवर कम बॉडीगार्ड अधिक थे। पिस्टल टांगकर लकदक सफेद शर्ट, पैंट और स्पोर्ट शूज में पूरे माफिया लगते। आगे-आगे मूछों पर ताव दिये सभा पंचायतों में बड़के तिवारी चलते पीछे-पीछे पिस्टल पर हाथ फेरते चुनमुन यादव। दोनों की जोड़ी इलाके में सरनाम थी। ज्योत्सना ने घर में अच्छी पैठ बना ली। तीनों आजी सासों का पैरा दबा देती बाल झाड़ती, सुबह उठ कर पैर छूती। बड़की तिवराइन संस्कारी बहू पाकर धन्य हुई।

  ज्योत्सना छोटी सास से घुल मिल गयी, दोनों घंटों बातें करती, साथ खाती-पीती, बिल्कुल सहेलियों की तरह। धीरे-धीरे आपसी दुःख-सुख भी बांटने लगीं। ज्योत्सना विज्ञान पढ़ना चाहती थी, पिता ने कुल परम्परा के अनुसार जबरन संस्कृत पढ़ने को विवश किया। जिसका गहरा क्षोभ उसके मन में था। वह अपने विद्रोह से पितृ सत्ता को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहती थी। चाची सास की खूबसूरती ने उन्हें घर में इस कदर कैद कर लिया था कि वह बाहर की दुनिया का विकास स्कूल, अस्पताल, डाकखाने से ज्यादा नहीं जानती थी। दबाकर रखने का परिणाम यह हुआ कि वह बात-बेबात अनायास हँसती और किसी को बिना सोचे समझे कुछ कहतीं।
ज्योत्सना पिता को कोसती, वह समाज को। एक दिन ज्योत्सना ने पूछा- ‘‘चाची जी आप चमइया माई की पूजा करते असहज नहीं हुई थीं?’’

काहे की असहजता बहिनी, देहियें न देखेगी छिनरी, कोठरी में घूसकर उसके कपार पर टांग पसारकर खड़ी हो गयी। साया उठा दिया और गाने लगी ....देखो-देखो चमईया हमार सुतूहीss देखो sssssऔर ठठाकर हँसते हँसते लोट-पोट हो गयी। 
और चाचा जी? ज्योत्सना पूछते वक्त फटी आँखों से चाची सास को एकटक देख रही थी, उ तो कोने में खड़े होकर मूत रहे थे। हमने तो कह दिया। देखो जी हम साया नहीं उतारेंगे, खाली साया में आपकी भाभी ने अन्दर आने दिया आप आंख मूने नहीं तो हम समनवे पहिन लेंगे, फिर यह न कहियेगा की बड़ी निर्लज है।’’ फिर? ज्योत्सना अवाक थी। फिर क्या इन्होंने आंख मूंद लिया, मैंने कपड़ा पहिना सामान चढ़ाया और निकल गयी। इ देखो, साल भितरे की देन है।
पलंग पर गोल मटोल बच्चा निश्चिंत सोया था। ज्योत्सना का दिमाग घूम गया। उफ्फ! ये गाँव की औरत भी इतनी समझदार निकली और मैं संसार की सबसे बड़ी मूर्ख जिसे ये सब नहीं सूझा। उसे अपने ऊपर गहरा क्षोभ हुआ ,जी में आया सिर दीवार पर दे मारे।

           मई में शादी हुई और जुलाई में दो माह गाँव रह कर हृदयेश और ज्योत्सना दिल्ली लौट आये। महानगर की जीवन शैली और व्यस्त दिनचर्या में पिछले दिनों का गम जाता रहा। हृदयेश और ज्योत्सना दोनों अभी बच्चा नहीं चाहते थे। सास हर महीने फोन कर कोई नई बात का सवाल दागती और ज्योत्सना टाल जाती। सास को चिन्ता हुई पढ़ी-लिखी आधुनिक खयालों वाली शहरी लड़की ने लगता है पूजा में कोई कमी कर दी है। पति से चिन्ता जाहिर कर रोने लगी। एक अज्ञात भय ने दंपति को घेर लिया। क्वार का महीना, जाड़े ने अपना असर दिखाना शुरु कर दिया था। शाम होते ही बुर्जुग ओढ़ना-बिछावन डाल बिस्तर में दुबक कर बैठ जाते। एक शाम बड़के तिवारी शहर से लौटकर संध्या वंदन कर दुवार पर आराम कुर्सी पर आँख बन्द कर कुछ मंथन करने में लीन थे। बड़की तिवराईन ऐसे समय पर अक्सर पूरे घर की रिपोर्ट देती। ज्यादातर छोटे भाई की ,...छोटके तिवारी पूरे विद्रोही, आज कल खुलेआम मांस मछली खाने लगे थे। तिवारी कुर्सी छोड़कर खड़े हो गये, क्या बात है हृदय की अम्मा, तुम्हारा इतना मौन मुझे अखर जाता है। कोई तो चिन्ता का विषय अवश्य है तुम्हारे मन में बड़की तिवराईन ने पति को सजल आँखों से देखा।
‘‘सुनिये जी छः महीने बीत गया और बहू ने अभी तक खुशखबरी नहीं दी, मेरा जी घबराता है। ना जाने क्या होने वाला है। पति के हथेलियों को पकड़कर आँखों में आंखें डालकर कहा- ‘‘हमको दिल्ली जाना है। बड़के तिवारी ने तुरन्त स्वीकृति दी। ठीक है चलो तुम्हे देश की राजधानी दिखाते हैं, तुम भी क्या याद रखोगी।

हफ्तेभर बाद का टिकट मिला, हृदयेश को फोन से खबर कर दिया गया। ज्योत्सना ने जिंस-कुर्ते, टाउजर, टाप सब आलमारी में छिपा दिया। रात में सोते वक्त हृदयेश से कहा- ‘‘अम्मा-पिताजी कब तक रहेंगे? हृदयेश कोई किताब पढ़ रहा था- सुनकर हँस पड़ा। जानेमन घबड़ा गयी? अभी वो आये नहीं और आपने जाने का हाल पूछ लिया।’’ ज्योत्सना झेप गयी। मेरा मतलब ये नहीं था, अब गाँव की तरह यहाँ तो दस नौकर-चाकर है नहीं, और अम्माजी ठहरी पूरी कर्मकांडी, सब कैसे मैनेज होगा? सोच रही हूँ और एक बात ध्यान रखना, चेतावनी देते हुए कहा- ‘‘अण्डे-आमलेट का फरमान मत देना उनके सामने गलती से भी वरना मेरा छूवा जीते-जी नहीं खायेंगे। ज्योत्सना के चेहरे से चिन्ता साफ झलक रही थी।सास आई, हफ्ते भर रहकर हिदायते देतें, डाक्टर को दिखाते-सुनाते दिल्ली घूमकर चली गयीं। स्टेशन पर रोते हुए बेटे से वचन लिया छुट्टी होते घर चले आना। छुट्टियों में ज्योत्सना मायके जाना चाहती थी लेकिन हृदयेश तैयार नहीं हुआ। कई दिनों तक पति-पत्नी में शीत युद्ध चलता रहा। अन्त में हृदयेश ने समझौता करते हुए कहा- ‘‘अपने पिता से कहो घर आकर ले जायें विदा कराकर।’’ ज्योत्सना मान गयी, कोई चारा नहीं था। दिल्ली से बनारस के लिए ट्रेन रवाना हुई, स्टेशन पर बड़के तिवारी बुलैरो लिए पहले से खड़े थे। बेटे-बहू को देखकर हर्षित हुए, मिलने-मिलाने, हाल-चाल के बाद गाड़ी तिवारीपुर की ओर चल पड़ी। रास्ते भर पिता-पुत्र पूरे गाँव का हाल-चाल, देश-प्रदेश की राजनीति का गाँव पर प्रभाव आदि विषयों पर चर्चा करते रहें। अबकी गर्मी में किन-किन के घर में लगन है और कितना दान-दहेज मिल रहा है पर बड़के तिवारी विशेष रस लेकर बतियाते। ज्योत्सना सर झुकाये दोनों की बातें सुनती और मन ही मन पति को बनारस की सड़कों से गुजरते हुए कोसती, नैहर के रास्ते से गुजर रही थी, हृदयेश ने खबर तक करने को सख्त मना किया था। ‘‘तुम्हारे माँ-बाप का ड्रामा स्टेशन पर ही चालू हो जायेगा, आकर घर से ले जायें समझी। हमारे घर की बहुयें बिना दिन रखे विदा नहीं होती।
                 गाँव का नैसर्गिक वातावरण ज्योत्सना को बचपन से लुभाता रहा है। दुवार पर पूरा खानदान जमा था, गाड़ी रुकते ही छोटी ननद मंजू भागकर जल्दी से गाड़ी खोलकर भाभी के पाँव छूकर सामान निकालने में भाई की मदद करने लगी। बड़की तिवराईन ने भर लोटा धार से बेटे-बहू को ओईछ कर नजर उतारा। बहू को पकड़कर अन्दर ले गयीं। टोले भर की औरतें और लड़कियों का हुजूम आंगन में उमड़ा देख ज्योत्सना सहम गयी। सफर की थकान से शरीर टूटा जा रहा था। चाची सास गले मिलीं और बारी-बारी सभी बड़ी-बुर्जुग महिलाओं के पैर छुलाया। लड़कियों ने भाभी को छेड़ा, ‘‘अकेले आयी भाभी, हम तो सोच रहे थे भतीजे का नेग लेंगे।’’ बड़की तिवराईन का दिल बैठ गया। चाची सास ज्योत्सना को भीड़ से निकालकर कमरे में ले गयीं।
‘‘जाओ नहा-धोकर आराम करो, शाम को बतियाते हैंऔर आंख दबाकर खिलखिला उठीं। ज्योत्सना को छोटी चाची की खिलखिलाहट बड़ी प्यारी लगती थी। औरतों का खिलखिलाकर हँसना कितना दुभर है, जानती थी। याद आया मायके में माँ कभी खुलकर हँसने नहीं देती थी। बड़े भाई तो कई बार हाथ तक बचपन में चला देते थे। वह हँसना चाहती थी कई बार छोटी चाची की तरह खिलखिलाकर, स्वच्छन्द हँसी।

महीना भर बीत गया, मई-जून में विदाई की कोई तिथि नहीं मिली, सास दुखी मन से हृदयेश से कह गयीं- ‘‘स्टेशन पर माँ-बाप से मिला देते तो बहू को दुख न होता।’’ हृदयेश को भी दुख हुआ, पिता-भाई तो कई-बार दिल्ली आकर मिल गये थे, लेकिन माँ से मिले ज्योत्सना को पूरा एक साल हो गया था। वह घंटों रोती रही। एक दिन ज्योत्सना बड़की आजी का पैर दबा रही थी, आजी खुश हो गयीं, खूब दूध-पूत का आशीष दे अपनी कोठरी में ले गयीं। काठ के पुराने सन्दूक को खोलकर एक छोटा सा नक्कासीदार बक्सा निकाला, बक्सा गहनों से भरा था। दो मोटे-मोटे पछुऐ उसके हाथ में रख पहना दिया, तुम्हारी कलाईयां वैसी ही गोल-मटोल है बहू, जैसे जवानी में मेरी थी। आँखों से झर-झर आंखू बहने लगा। ज्योत्सना उनके कष्ट को समझ सकती थी। भरे यौवन में वैध्वय कितना बड़ा अभिशाप है उसने बनारस के विधवा आश्रमों, घाटों आदि पर भटकती, भीख मांगती विधवाओं के जीवन में बहुत नजदीक से देखा था शोध कार्य के दौरान।

आजी मौन थीं.... उसने हिम्मत करके पूछा..ये ‘चमइया’ और इसकी अन्धभक्ति घर में क्यों होती है?  आजी ने संयत होकर कहा ..बताती हूँ तुम्हें, और काठ के सन्दूक से सास की जनानी वंशावली निकालकर बैठ गयीं- ‘‘हमारे पुरखों में एक थे जटाशंकर बाबा, बड़े विद्वान, बलिष्ठ और सुन्दर। गाँव की जमींदारी राजा साहब से शास्त्रार्थ में जीतने के कारण इनाम में मिला था। घोड़े से गाँव-गाँव घूमते आसासियों का दुख-दर्द पूछते, सूखा पड़ने पर किसानों का लगान राजा को अपने खजाने से देते। न्यायप्रिय और दयालु थे। बाबा के जीवन में सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन भोरे राजा का बुलावा आया, घोड़े से चल दिये, सूनसान रास्ते में एक जगह घोड़ा अड़ गया, बड़ी कोशिश करते रहे, लेकिन घोड़ा टस से मस न होता। बेचारे सिर पर हाथ रख पास के बगीचे में जा बैठे ,दिन चढ़ आया था, भूख-प्यास से बेहाल, बाग में कुँआ तो था, लेकिन लोटा डोर नहीं। बाबा ने सोचा अब जीवन समाप्त। बेचारे ईश्वर को याद कर रोने लगे, तभी एक बूढ़ी औरत अपनी जवान बेटी के साथ लोटा-डोर लिए आई,
बाबा गिरते-पड़ते पहुँचे। बूढ़ी औरत ने कहा- आप बड़ मनई बुझाते हैं, हमारे हाथ का छुआ पियेंगे। बाबा ने हाथ जोड़ विनय किया, जीवन मिले तो सोचेंगे। बुढ़िया ने बेटी को इशारा किया। लड़की भर लोटा पानी लिए आई और मुस्कुराते हुए बाबा को पिलाने लगी। लड़की दिव्य सुन्दरी थी, बाबा मुग्ध हो गये। अक्सर बाग से गुजरने लगे। लड़की और उनका मेल-जोल बढ़ा तो बुढ़िया की झोपड़ी तक पहुँचे। बुढ़िया को कुजात छांट जात वालों ने गाँव निकाला दे रखा था, विधवा औरत जवान बेटी के साथ विराने में झोपड़ी डाल रहती थी। कहते हैं- ‘‘इतनी बड़ी डाईन थी कि उड़ती चिड़िया का पंख बांध देती थी।’’ धीरे-धीरे मड़ई अटारी में बदल गयी। गर्भ रहता तो बुढ़िया मार कर गिरा देती। लड़की महीने शोक मनाती फिर पुराने ढर्रे पर लौट आती। आखिरी गर्भ माँ से छिपा ले गई। जब-तक पेट उभरा पाँच माह हो चुके थे। माँ ने जहर खा लिया। लड़की बाबा के दरवाजे पर आकर बैठ गयी। बाबा का तीनों त्रिलोक घूम गया। समझा-बुझा कर वापस किया, अगले पूरे दिन साथ रहे, सोचते रहे कैसे मुक्ति मिले? आखिरकार अपने विश्वासपात्र नौकर को आदेश दिया, हाथ-पैर बाँध के पोखरे में बोर दो और ब्रह्महत्या से मुक्ति के लिए चार धाम को निकल गये।

इधर बाबा के चार भाईयों में तीन की पत्नियों को गर्भ था। आधी रात को डग्गर बजाते सपने में आयी और पेट काछ के चली गयी। सबेरे तक घर-आँगन खूने-खून। क्या बतायें बिटिया पुरनिया (आजी सास) कहती थी, लगा खूँट नसा गया। साल भर बाद बाबा लौटे तो दरवाजे पर सियापा छा गया था। देवी प्रकोप से बारी-बारी तीन जवान बेवा औरते घर में दहाड़ रही थी। पत्नी बेटी को छाती से साटे पास आने से डरती। बाबा ने देस-देस के पण्डितों को दिखाया। कोई फायदा नहीं। पण्डा, मौलवी, पीर, मजार सब एक किया लेकिन जस का तस सब बना रहा। इसी बीच किसी ने एक ओझा का पता दिया ओझा बुलाया गया। गजब हो गया बहिनी- ‘‘ओझा बकने लगा, गर्भ के साथ चमइनिया डोला रही है।’’ बाबा ने उपाय पूछा- ‘‘ओझा बोला- वंश-दर-वंश पुजइया लेगी महराज!.,चौरी मांग रही हैं। हिस्सा मांग रही है।’’ कोई चारा नहीं था- बाबा मान गये- उसकी कोठी ओझा को दे बारी वाले पोखरे के पास चौरी बन्हा दिया। पत्नी गर्भ से हुई, नौ माह पर जुड़वा बेटे हुए। ओझा आ धमका, पूजन दें महराज! नहीं तो छोड़ेगी नहीं, जनम-विवाह सब पर। पत्नी हाथ जोड़ विनती करने लगी, देंगे क्या मांगती है? ओझा ने उसकी मांग सबको सुनाई, पैदाइस पर उसका मन्दिर, विवाह पर वर-बहू नंगे जेवनार, गहना, कपड़ा चढ़ा कर पाँचवें दिन साथ रहें, तभी वंश चलेगा।







  मन्दिर के नाम पर बाबा ने एक कोठरी बनवा दी। पत्नी ने चार बेटों को जनमा लेकिन आगे बेटों ने चमइया को पूजा देने से मना कर दिया। देखते ही देखते तीन बेटे मर गये। छोटा बेटा बारह का था जल्दी-जल्दी ब्याह कर पुजइया दिलाया। वंश इसी से आगे बढ़ा। इनके भी चार बेटे हुए, ये हमारे पति थे। बड़के भाई माँ की बात मानकर सब करते गये। हमारे पति पढ़े-लिखे होने के कारण नहीं माने। नतीजा देख रही हो। ‘चमइया’ बड़ी जगता हैं। कह कर फफक-फफक कर रोने लगीं। ज्योत्सना पूरी कहानी ध्यान से सुन रही थी। अजीब संयोग जुड़ा था वंशावली की कहानी से। एक तरफ छोटी चाची सास तो दूसरी तरफ आजी सास का वृतांत। माथा घूम गया, अब समझ आया उसे कि बच्चा पैदा करना बेहद जरुरी है वरना सास पागल हो जायेगी। साल भर बाद ज्योत्सना ने बेटे को जन्म दिया। सास ने अंग्रेजी बाबा बजवा कर ‘चमइया’ को कांची-पाकी मसाला चढ़ाया, बड़के तिवारी ने बारह गावों के ब्राहम्णों को महाभोज दिया।
  कुल परम्परा चलती रही। शादी के पन्द्रह साल बीत गये। ज्योत्सना अब दो सुन्दर बेटों की माँ थी। सास खुशी से मुसरन ढ़ोल बजातीं। चाची सास भी अब तक दो बेटों की माँ बन चुकी थी। जिस कुल में तीन पीढ़ियों से एक खूँट पर वंश बेल आगे बढ़ती थी वहाँ अब चारों भाईयों की वंश वृद्धि हो रही थी। ज्योत्सना हर साल छुट्टियों में घर आती, रास्ते में ‘चमइया का मन्दिर’ देख सभी गाड़ी में बैठे-बैठे हाथ जोड़ते। देखते ही देखते इन पन्द्रह सालों में ‘चमइया’ की महिमा पूरे इलाके में फैल गयी, तिवारीपुर के तिवारियों की कुल देवी ‘चमइया’ की कृपा से दरवाजे पर हंस लोटता है। सावन में आस-पास की औरतें कढ़ाई चढ़ाने लगीं। प्रेमी मन्नत का धागा बाँधने लगे। कोठरी भव्य मन्दिर में बदल गया। चुनमुन यादव के संरक्षण में हाट-बाजार सजने लगा। ‘चमइया’ के गीतों के कैसेट से बाजार पट गया। चमइया देवी शक्ति पीठ के नाम से जाना जाने लगा। औरतें उनके नाम पर अतवार का उपवास रख मन्नत रखने लगीं।लोक में आस्था ज्यों -ज्यों फैल रही थी तिवारी कुल में आगे पूजा का सरलीकरण बढ़ता जा रहा था।ज्योत्सना इस यात्रा को निरन्तर डायरी में दर्ज कर रही थी।

  ज्योत्सना के बाद सबसे पहले बड़े चाचा ससुर के बेटे का ब्याह हुआ। पति-पत्नी दोनों डॉक्टर, बहू को कुल परम्परा के अनुसार चमइया की पूजन विधि बताने की बारी आई। मन्दिर के पिछवाड़े वाले चोर दरवाजे पर नवेली दुल्हन को ले जाकर ज्योत्सना ने वही निर्देश दिया जो छोटी चाची ने किया। लड़की आवाक मुँह ताकने लगी। पुजइया हो गयी। साल भर बाद बहू ने बेटे को जन्म दिया।धीरे -धीरे पूजन विधि का पढ़ी- लिखी घर की औरतें सरलीकरण करती गयीं। आगे की पूजा भोग थाल से घट कर पान,फूल,बताशे पर आ गयी। ज्योत्सना के सामने महज तीस साल में एक अन्ध आस्था ऐसी रुढी बनकर उभर कि पूरे ससुराल क्षेत्र में कि आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। यह उसके लिए शोध का विषय था कि कैसे छोटे छोटे भ्रम भक्ति में और फिर अन्ध भक्ति में बदलते हैं।वह चुप चाप इस यात्रा को दर्ज करती रही और साठवे साल में उसकी आत्म कथा आई ‘‘देखो देखो चमइया हमार सुतूही।’’आज वह  छात्राओं के बीच अपनी आत्मकथा पर बात करते हुए समाज में फैले अन्ध आस्था में लिपटी अपनी जिन्दगी और पुन: उस भ्रम से बाहर निकलने की लम्बी दास्तान सुनाते -सुनाते भावुक हो उठी....बस मैं तुम सभी से आज इतना ही कहना चाहती हूँ कि सोचो,समझो और अपनी बात कहना सीखो।हम औरतों को पिता सत्ता ने ऐसे ही तमाम जंजीरों में जकड़ रखा है। ....अपनी इस यात्रा को इस तरह दुनिया के सामने लाना जोखिम भरा है....पर जो सहा न गया उसे कहा....आगे तुम सब को कहना है।
लड़कियाँ देर तक तालियाँ बजाती रहीं....ज्योत्सना को लगा ...मन से मनो बोझ उतर गया।

नोट : जातिसूचक शब्दों का प्रयोग यथार्थ के सन्दर्भ से है, लेखिका की उनसे कोई सहमति नहीं है

सोनी पाण्डेय