गुरुवार, 22 जून 2017

सुरेन्द्र रघुवंशी

   सुरेन्द्र रघुवंशी की कविताओं की भावभूमि का विस्तार मनुष्यता की पूरी धरती नापता है।यहाँ औरत भी है,प्रकृति भी और अन्नदाता के साथ -साथ जीवन संघर्ष भी।

आज गाथांतर वरिष्ठ कवि का स्वागत करता है तथा साथ ही कवि की कविताऐं अपने पाठकों के सम्मुख करते हुए यह उम्मीद करता है कि कविताओं के संसार से गुजरते हुए वह कुछ न कुछ जीने की ललक जरुर पाएगा इस जलते हुए समय में।

।।  याद करो  ।।

खण्डहर होते उन निर्जन किलों को बार-बार देखो
जिनके कँगूरों पर सूखी घास सरसरा रही है
इनमें वे किले भी शामिल करो
जो कभी राज दरबार  हुआ करते थे
और अब वे सरकारी दफ़्तर या संग्रहालय हैं

इतिहास के कानों में दर्ज़ घोड़ों की टापों को सुनो
टप टप टप तब तबअब अब कब कब????
राजाज्ञाओं के पालन में घुड़सवार सैनिकों के चाबुकों की फट-फट फटकार सुनो
जो गरीब किसान मज़दूरों की चमड़ी उधेड़ने से उपजती थीं

उन स्त्रियों का करुण क्रंदन सुनो
जिनको पैरों में जूती की तरह पहना गया
ज़मीन और पैरों के बीच जिन्हें घिसा जाता रहा
जिनकी आवाज़ का गला घोंटा गया
और वे डरती हुईं
इशारों में जीने लायक संकेतों में बतियाती रहीं

राज दरबारों के क्रूरतम और जनविरोधी
आदेशों की वास्तविक पड़ताल करो
समय की अदालत में बुलाओ उन दीवारों को
गवाही के लिए जिन्होंने  देखा है सच
और जिनका पुनरदृश्यांकन ज़रूरी है
वर्तमान व्यवस्था को सबक के लिए।

******

                  ।।   सावधान  ।।

मन के मैदान में
क्रूरता के गड्ढे खोदने वालों से सवधान
ह्रदय के खुले समतल  में
विभाजन की दीवारें बनाने वालों से सावधान
सवधान कपट के घोड़ों की टापों से
संवेदनाओं की फसलें कुचलने वालों से

लौटा दो अवसरवादी सियासत के नुमाइंदों को
अविलम्ब अपने दरवाजों से
वे आपके दरवाजे की शोभा नहीं
बल्कि विषधर हैं जिनको दूध पिलाने से
उनका विष ही बढ़ेगा
और कहने की जरूरत नहीं
कि विष घातक है जीवन के लिए

नीले आसमान को चिड़ियों के लिए
अविलम्ब ख़ाली करो गिद्धों !

******
             ।। बागड़ चर गई फसल हमारी ।।

अच्छी खासी लहलहाती फसल  थी खेत में
आवारा ,असामाजिक सांड़ों से उसकी रक्षा हेतु
नुकीले काँटों के अधिकारों से लैस बागड़ को
खेत के चारों ओर तैनात कर दिया गया।

हवा में हिचकोले खाती जा रही हरी कच्च
जवान फसल के सौन्दर्य को देखकर
काँटों से भरी बागड़ के मुंह में पानी आ गया
बागड़ के शरीर में जगह- जगह उग आये दाँत

बागड़ अपनी तैनाती का उद्देश्य भूल
बलात कोमल फसल पर टूट पड़ी
यह आश्चर्यजनक किन्तु सत्य घटना थी
कि दिनदहाड़े और सरेआम बागड़ फसल को चर रही थी

बागड़ ने इसका कारण अपनी भूख बताया
उसने निरन्तर फसल चरने को
अपने हक़ की तरह दर्शाते हुए
इस पर जन स्वीकृति की मुहर चाही
जो थोड़े से प्रयास से मिल भी गई

बागड़ ने कुरेदने पर यह भी बताया
कि वह खुद भोपाल और दिल्ली की
बड़ी बागड़ों द्वारा चरी जाकर ही
इस खेत की निगरानी का अधिकार पा सकी है
कि हमें भी ऊपर देना पड़ता है
तब जाकर  यहां बैठे हैं साहब

कितने ही खेत चिल्ला रहे हैं
"बागड़ हमारी फसल खा गई साहब ! "
वे फसलभक्षी बागड़ों से ही बागड़ों की शिकायत कर रहे हैं।
जिसे कोई नहीं सुन रहा है
अमानवीय और बहरे हो गए अंधड़ में
कौन किसकी सुनता है?

*****

                     ।। जागरण ।।

नींदों को समन्दरों में डुबोकर
रहना है रातभर सफ़र में
काली रातों और बिगड़ैल दिनों के खिलाफ़
न्याय के सूरज को लाने के लिए
विश्राम को तिलांजलि देते हुए
वर्जित है ऊँघना समय की इस ऊँची चट्टान पर

अमानवीय खाइयों को पाटकर
विश्वास के पुल की बहाली के लिए
क्रियाशील रहना होगा आँखों से खुमारी उतारकर

नींदों के सपनों से निकल
दैत्य अब प्रत्यक्ष सामने आकर हमलावर हो गए है
अपनी संचित ऊर्जा को एकत्र कर
इनकी नाभि में शर संधान करके
इनके विश्व विजयी होने के दम्भ को चूर करते हुए
अमृत कुंड सोखकर इन्हें धराशाही करने का
माक़ूल वक़्त है ये

   ****

।। बुद्धा सिंह की तलाश ।।

रेल्वे की टिकिट खिड़की के पास चिपका है
बुद्धा सिंह की तलाश का पर्चा

नाम बुद्धा सिंह
उम्र सत्तर साल
हुलिया पर्चे में छपी फोटो मुताबिक

हाथ में बुद्धा सिंह गुदवाई द्वारा लिखा है
शरीर इकहरा
स्वभाव सीधा साधा
थाना केन्ट ,गुना

पता देने वाले को उचित इनाम दिया जायेगा।
नीचे लिखे मोबाइल नम्बर पर सूचना दें

आँखों में विश्वास और चेहरे पर मुस्कान लेकर
आखिर कहां चला गया बुद्धा सिंह
या भाग गया परिजनों से नाराज़ होकर
अथवा फसल बर्बादी और कर्ज़ के बोझ से दबकर
गले के गमछे से फंदा बना कर
किसी पेड़ की डाली से झूल तो नहीं गया बुद्धा सिंह

आशंकाओं के अंधड़ के बीच
आखिर शुकूनदायी है
बुद्धा सिंह की तलाश का यह पर्चा
जो समय की दीवार पर उम्मीदों की तरह चिपका है
कि आख़िर सत्तर साल के बूढ़े  बुद्धा सिंह की ज़रूरत
परिजनों को ही सही पर किसी को है तो सही।

*****
     
         ।।  माँ  ।।

मनुष्यता की उर्वरा धरती पर
तुम करुणा और वात्सल्य के
दो पय पर्वत हो माँ !

पानी से भरे हुए बादलों को
पृथ्वी पर बरसाने के लिए
तुम उनमें ज़रूरी हो गए  अनगिनित छिद्र हो

दुःख सुख और प्रेम में
सबसे पहले बरसने वाली
पृथ्वीनुमा गोल दो बोलती आँखें हो

संघर्षों के सूरज के झुलसाते ताप से
जीवन की धरा को बचाने वाली
सूरज और पृथ्वी के बीच तनी हुई
सफेद इच्छाओं वाली
काली सघन और मजबूत  विस्तार में फैली हुई
अनन्त केश राशि हो तुम माँ !

****

                ।।धरती-आकाश।।

जब गर्मी होती है असहनीय
धरती आकाश के भरोसे मौसम से हारती नहीं
उसके जेहन में बरसात का सुन्दर सपना होता है

काले बादलों के शरीर में हरियाली के बीज हैं
जिसे धरती अपनी कोख में धारण कर लेगी
धरती का गर्भाशय सृजन की सारी विधाओं का आधार है

धरती को देखते हुए आकाश
आश्वासन की मधुर मुस्कान बिखेरता है
और धरती आकाश से नजरें मिलाती हुई
अपनी उमस को अनदेखा करती है

हवाएं बदलाव के गीत गा रही हैं
और धरती की त्वचा पर घास के रोंगटे खड़े हो गए हैं
                   - सुरेन्द्र रघुवंशी

सुरेन्द्र रघुवंशी

जन्म- 2 अप्रैल सन 1972
गनिहारी , जिला अशोकनगर मध्यप्रदेश में
शिक्षा- हिंदी साहित्य , अंग्रेजी साहित्य और राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर ।
आकाश वाणी और दूरदर्शन से काव्य पाठ
देश की प्रमुख समकालीन साहित्यिक पत्रिकाओं ' समकालीन जनमत' , ' कथाबिम्ब' , ' कथन' , 'अक्षरा' , 'वसुधा' , ' युद्धरत आम आदमी' , 'हंस' , 'गुडिया' , ' वागर्थ', ' साक्षात्कार' , ' अब' , 'कादम्बिनी' , ' दस्तावेज' , ' काव्यम' , ' प्रगतिशील आकल्प' ' सदानीरा' ' समावर्तन ' एवं वेब पत्रिकाओं ' वेबदुनिया' , ' कृत्या' सहित देश की तमाम प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में
कविताएँ , कहानी, आलोचना प्रकाशित ।
मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा ' जमीन जितना' काव्य संकलन प्रकाशित
दूसरा काव्य संकलन 'स्त्री में समुद्र'
तीसरा काव्य संकलन ' पिरामिड में हम ' ।
शिक्षक आन्दोलन से गहरा जुडाव
विभिन्न जन आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी
अपने नेतृत्व में मध्य प्रदेश में 11000/- सरकारी शिक्षकों की सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से नियुक्ति ।
मध्य प्रदेश शासन के स्कूल शिक्षा विभाग में शिक्षक के रूप में कार्यरत ।
विभिन्न सामाजिक और मानवीय सरोकारों के विषयों पर विभिन्न मंचों से व्याख्यान ।
कुछ कविताओं का अंग्रेजी और फिलीपीनी टेगालोग भाषा एवं मराठी , गुजराती एवं मलयालम आदि भारतीय भाषाओँ में अनुवाद ।
कविता कोष में कविताएँ शामिल ।
हिंदुस्तान टाइम्स डॉट कॉम और नवभारत क्रॉनिकल का संयुक्त बोल्ट अवार्ड ।
एयर इंडिया का रैंक अवार्ड ।
मानवाधिकार जन निगरानी समिति में रास्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य के रूप में कार्य ।
प्रांतीय अध्यक्ष मध्य प्रदेश राज्य शिक्षक उत्थान संघ
जनवादी लेखक संघ में प्रांतीय संयुक्त सचिव (म. प्र.)
एडमिन/ सम्पादक-
'सृजन पक्ष' -वाट्स एप दैनिक एवं फेसबुक साहित्यिक पत्रिका
'जनवादी लेखक संघ'- फेसबुक साहित्यिक पत्रिका
'जनपक्ष'- फेसबुक साहित्यिक ग्रुप           'नई किताब नई पत्रिका'- फेसबुक समूह
संपर्क -महात्मा बाड़े के पीछे , टीचर्स कॉलोनी अशोक नगर मध्य प्रदेश, 473331 ।
मोबाईल 09926625886
email-surendraganihari@gmail.com
srijanpaksh@gmail.com

सोमवार, 19 जून 2017

सन्तोष तिवारी की कविताऐं

संन्तोष तिवारी:

*नंदिग्राम में भरत*
.........................

निरा ऐकान्तिक स्थल
नंदिग्राम में
अहर्निश ध्यानमग्न
व्रतधारी वह योगी
तपाए कंचन सा दीप्तमान कुटिया में
मुद्रा पद्मासन
रट रहा...राम राम

यह तो विक्षिप्त अयोध्या की थाती है
रामानुज भरत की जय हो|
..........

*दो*

हे राम! तुम्हारे अयोध्या त्यागते ही
कल- कल बहती सरयू को
काठ मार गया
महाअपशकुन!! टूट टूटकर गिरने लगे तारे
अयोध्या की किस्मत में
अमावस ही अमावस

भरत का गला रुँध गया  है
वे दसों दिशाओं में टेर लगा रहे

अब राम कहाँ लौट कर आने वाले थे
राम की राह देखते देखते
अयोध्या की आँखें पथरा गयीं|
़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़

युवा कवि सन्तोषकुमार तिवारी की कविताओं की दो किताबें...फिलहाल सो रहा था ईश्वर एवं अपने अपने दण्डकारण्य (ऑनलाइन) आ चुकी है | ये राजकीय इंटर कालेज..नैनीताल में प्रवक्ता हिन्दी पद पर सेवारत हैं |
अयोध्या में पैदा हुए कवि की सात लक्ष्य कविताएं आप सबकी नजर है|

..........
*पर्वतारोही*

पर्वतों पर रहने वाले लोग
सभी पर्वतारोही नहीं होते
पार करते ही रहते परिन्दे पहाड़ों- पर्वतो को
परिन्दे पर्वतारोही नहीं कहलाते
........

अपनी अपनी भूख
................

एक भूखा
दूसरे भूखे से कहता है
मुझे रोटी चाहिये
दूसरा उसे हिकारत से देखते हुए बोला
भूखा तो मैं भी बहुत हूँ
मुझे पूरी धरती
समूचा आसमान चाहिये|
...........

*बची रही पृथ्वी तो....*

हवा
पानी
और हरापन यदि बचा रहा
तभी बची रह सकेगी पृथ्वी
बचा रहेगा
जीने के वास्ते आक्सीजन|
..............

*बूढ़ी गाय*

शहर जैसी रौनक गायब है
अयोध्या के चेहरे से
बूढ़ी गाय के सूखे थन जैसी अयौध्या
अब पाँच साला वैतरणी पार का
खोलती है रास्ता|
..............

*जूता*

कुछ लोग जूतें में
पाँव नहीं
गर्दन डाल देते हैं
वे ऐसा हड़बड़ी मे नहीं करते |
..........
मेरी नजर में तो
दुख सुख दोनों
पैर के दोनों जूते हैं|
........

*तुमने ऐसा क्यों कहा होगा?*

जाने क्यों
तुमने ऐसा क्यों कहा होगा
प्यार आया है
मैं सारे काम-धाम छोड़
आँगन से चौपाल तक
देख आयी, एक जैसा सन्नाटा था
मैं जान गयी तुम शरारती ही नहीं
झूठे भी हो|
............

*चीख सुनायी नहीं पड़ती जब*

ऐसा अक्सर तो नहीं
कभी - कभी सभी के साथ होता है
जब हमें चीख सुनती तो साफ है
परंतु हम अनसुना कर देते हैं
हमे लहूलुहान आदमी का
छटपटाना विचलित नहीं करता
क्या करेंगे साब! खामोशी का तो आलम ये है
कुछ लोग समर में लड़ते हुए नहीं
नींद में मर जाते हैं|
...............

.....

*आम्रपाली की यादों में बुद्ध*
**********************
*एक*

कोई यत्न नहीं किया बुद्ध ने
बस, छूटता गया सब
मुट्ठी में रेत कहीं ठहरता है?

बुद्ध की ताकत रिक्तता है|
.........

*दो*

तुम्हें याद है क्या
कितने अपमान
कितनी ठोकरें
कितने हमले और
कितना ताप, शीत और बरसात तुमने झेले....
निस्संग रहे फिर भी|

बुद्ध का पूँजी तो मौन है
वे चोट का हिसाब कहां तक रखें
और क्योंकर रखें

उनके पास तो
यात्राओं के किस्से और नगरवधू
आम्रपाली की प्रेमपूर्ण यादें हैं|
............

*तीन*

ध्वनियों के पार जा चुके बुद्ध
कभी श्लोकों के अन्वय में उलझे नहीं दिखे|

मौन रहकर मृत्यु का
जश्न मनाना सिर्फ़
उन्हीं को आता है|
+++++++++++++++++

*सन्तोषकुमार तिवारी*
*प्रवक्ता, राजकीय इण्टर कॉलेज, ढिकुली( नैनीताल)*
*09456137315*
*09411759081*

रेखाचित्र...अनुप्रिया

गुरुवार, 4 मई 2017

नीतिश मिश्र की कविताऐं

नीतिश को पहले भी गाथांतर पर आप पढ़ चुके हैं। पेशे से पत्रकार नीतिश की कविताओं की भाव भूमि में प्रेम तत्व की प्रधानता होते हुए भी समसामिक घटनों की भी गहन पड़ताल है। युवा मन की छटपटाहट ....घूटन....संत्रास की अनुभूतियाँ सहेजे कवि की कविताओं की जमीन बेहद उर्वर है।



नमक पर प्रेमपत्र लिखता हूँ

मैं कागजों पर नहीं 
नमक पर प्रेमपत्र लिखता हूँ 
जिससे प्रेमपत्र का स्वाद 
सदियों तक सुरक्षित रहे 
हाँ 
मैं अब तुम्हे नमक के टुकड़ों पर प्रेमपत्र लिखता हूँ
ताकि मेरा प्रेमपत्र
समुद्र भी पढ़ सके
अनाज भी
इंसान भी
और बर्तन भी आग भी।।

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प्रश्न दीवारों में जीवित हैं .

सारे प्रश्न 
अभी भी दीवारों में 
जीवित हैं ......
रात भर मैं 
अपनी आत्मा से प्रश्नो की केंचुल उतारकर 
दीवारों पर सजाता रहता हूँ
मेरी दीवारें
मेरी आत्मकथा हैं
मैं दिन भर धरती पर 
उत्तर की खोज में साईकिल से भटकता रहता हूँ ...... 
इस क्रम में आँखों में कई बार इतिहास  चुभता हैं 
तो कई बार जख़्म  आईने में दिखाई देने लगते हैं ... 
सारी रात 
मैं अपने आत्मा के खाते में 
भागी हुई लड़कियों का रिपोर्ट दर्ज करता हूँ 
सारी रात टूटे हुए खिलौनों में एक रंग भरता रहता हूँ 
इसी बीच पता चलता हैं 
एक सांप मर गया 
जिसने पिछले साल रामअवतार  को मुक्ति का मार्ग दिखाया 
मैं सांप की मरी हुई आँखों में अपनी तस्वीर देखता हूँ 
और सोचता  मैं  इसकी आँखों से कैसे बच जाता था 
गेहुंअन सांप असंख्य बार मेरे कमरे में आता था 
और घंटो मेरी तरह गंभीर होकर 
मेरे प्रश्नों को पढता था 
फिर कुछ देर तक हँसता था 
मैं रात भर सांप के देह को देखता रहा 
और वह रात भर मुझे देखता रहा 

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एक बार गहरी नींद सोना चाहता हूँ

मैं युद्ध पर जाने से पहले 

एक बार गहरी नींद सोना चाहता हूँ 

और नांव के एकांत को 

अपने भीतर भरना चाहता हूँ 

मैं युद्ध पर जाने से पहले एक बार 

अपने घर की नीव में उतरना चाहता हूँ 

और वहां माँ की रखी हुई आस्था को 

एक नया अर्थ देना चाहता हूँ

मैं युद्ध पर जाने से पहले 

नींद में एक प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ 

मैं एक बार गंगा की रेत से मिलना चाहता हूँ .... 

मैं युद्ध पर जाने से पहले एक बार 

पीपल की पत्तियो पर जमी स्मृतियों को 

अपने भीतर भरना चाहता हूँ 

दीवारों पर निर्मित इतिहास को भाषा से रंगना चाहता हूँ 

मुझे मालूम हैं अगर 

मैं युद्ध से वापस नहीं लौटा 

तो कोई नहीं पूछेगा 

मेरे टूटे हुए खिलौनों का क्या अर्थ हैं 

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मेरा प्रेमपत्र लेकर कबूतर उड़ रहा हैं

मैं तुमको ऐसा प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ
जिसे कबूतर लेकर सरहदों के पार   उड़ सके
आसमान उसमे कुछ रंग भर सके
देवता प्रेमपत्र का वाचन कर सके
गरूण देखे तो कुछ देर तक बंद कर दे
अपनी उड़ान .....
इंद्र देखे तो उसे  भोग से घृणा हो जाए
वृहस्पति देखे तो टूट जाए उसका  अंहकार
मेनका देखे तो प्रायश्चित करने लगे......
गणेश देखे तो
मनुष्य होने के लिए
प्रार्थना में डूब जाए .....
मैं तुमको धरती से ऐसा प्रेमपत्र लिखना  चाहता हूँ
जिसे ऋषियों को यह कहना पड़े की
मुक्ति से ज्यादा कहीं पवित्र प्रेमपत्र लिखना हैं
सुनो ब्रह्मा !
मैं प्रेमपत्र में अपना प्यार भी लिखूंगा
अपनी गरीबी भी लिखूंगा
अपने खेत की हरियाली  भी लिखूंगा
अगर कुछ नहीं लिखूंगा तो केवल धर्म
जब मेरा प्रेमपत्र लक्ष्य तक पहुंचेगा
तब समझ लेना धरती पर मनुष्य हारता नहीं हैं
लेकिन मैं जानता  हूँ
तुममे से हर कोई
रोकेगा कबूतर को  ......
जब कबूतर प्रेमपत्र देकर वापस लौट रहा होगा
तब तुम लोग उसकी हत्या की नीति बना रहे होंगे
जिससे यह कबूतर दुबारा धरती से कोई अन्य प्रेमपत्र लेकर उड़ न सके
लेकिन मैंने सभी कबूतरों को दे दिया हूँ
अपना एक एक प्रेमपत्र ......
क्या ऐसे में तुम लोग आसमान में सारे कबूतरों को मार दोगे ?
बोलो देवताओं। ...

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इस सदी का प्रेमपत्र लिखना ही धर्म है

केवल मैं ही तुम्हें प्रेमपत्र नहीं लिखता हूं
मेरे प्रेमपत्र में मेरा शहर भी शामिल होता है
मेरे शहर की हवा भी उपस्थित रहती है
मेरे कमरे का अंधेरा भी प्रेमपत्र में शामिल हो जाता है
मैं जब खुश होता हूं या जब दुखी रहता हूूं
या जब  सुख- दुख कुछ भी नहीं होता है तब भी
मैं प्रेमपत्र लिखता हूं
शायद! इस सदी का प्रेमपत्र लिखना ही धर्म हो
धरती का सबसे बड़ा अविष्कार प्रेमपत्र लिखना ही रहा हो
जिसने भी प्रेमपत्र लिखने की कला का इजाद किया होगा
वह धरती का सबसे सभ्य मनुष्य रहा होगा
आज भी मैं उस आदमी के बारे में कल्पना करता रहता हूं
और उस लड़की के बारे में सोचता हूं
जिसके खाते में दर्ज हुई होगी सबसे पहले प्रेमपत्र के प्राप्त होने की खुशी
मैं जब भी तुम्हे प्रेमपत्र लिखकर खाली होता हूं
तब मैं दूसरे प्रेमपत्र के बारे में सोचने लगता हूं
मेरे लिए प्रेमपत्र बिल्कुल पानी की तरह है
प्रेमपत्र हर समाज का मनुष्य लिखता आया है
ऋषियों से लेकर आदिवासियों ने भी लिखा है
धरती पर रंग तभी तक बचे रहे
जब - तक हम प्रेमपत्र लिखते रहे
अगर हमे गंगा को या हिमालय को
जंगह को या अंधेरे को
आकाश को या धरती को बचाना है तो
हमे प्रेमपत्र लिखना ही होगा।।

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मैं कविता नहीं लिखना चाहता

अब मैं कविता नहीं लिखना चाहता 
या कविता लिखने की मुझमे योग्यता नहीं है 
अब मैं केवल और केवल 
प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ 
प्रेमपत्र सिर्फ मैं उस लड़की को नहीं लिखना चाहता हूँ 
जो मुझसे प्रेम करने की साहस रखती थी
बल्कि उस लड़की को भी लिखना चाहता हूँ
जिससे मैं प्रेम करने का साहस रखता था
बल्कि उस लड़की को भी लिखना चाहता हूँ
जो शहर में नदी से भी अधिक खूबसूरत थी
लेकिन मैं उससे प्रेम नहीं कर पाया
मैं उस कपास के पौधे को भी प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ
जिसके धागे का वह वस्त्र पहनती थी
मैं उस घर को भी प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ
जिसमे वह रहा करती थी
मैं उस देवता को भी प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ
जिससे वह मेरे लिए सिर्फ मेरे लिए प्रार्थना करती थी
मैं उस विश्वविद्यालय को भी प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ
जहाँ वह पढ़कर सभ्य होना सिख रही थी
मैं उस बिस्तर को भी प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ
जहाँ से वह पूरी रात सिर्फ मेरे बारे में सोचती थी
मैं उस गांव को प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ
जहाँ से वह चलकर सिर्फ मेरे लिए खाली हाथ आई थी
मैं उसके विषय को प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ
जो उसे इतना अवकाश देता था की वह मेरे बारे में सोच सके
अब मैं कविता नहीं लिखना चाहता हूँ
अब मैं केवल और केवल प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ।
मैं केवल सुबह ही नहीं बल्कि भोर में जब आसमान में तारे सो चुके होते है उस वक्त भी उसे प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ
मैं केवल बसंत में ही नहीं बल्कि खड़ी दुपहरी में रेत के बीच भी प्रेमपत्र लिखना  चाहता हूँ।

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जूते की शिकायत

बारिश से पूरा शहर खुश था 
सबसे अधिक शहर के नाले खुश थे 
साल में कुछ ही दिन तो होते है 
जब नालों की प्यास बुझती है
प्यास बुझने के बाद
नाले शहर के विवेक को बचाने में जूट जाते है
अगर नाले शहर में न हो
तब शहर का विवेक मर जाता है
कभी कभी बहुत जरूरी होता है नालों का होना
बारिश में जहाँ पूरा शहर खुश था
वही चूल्हें उदास थे
चूल्हें खो चुके थे अपना चेहरा
अपना धर्म ......
टूटे हुए चूल्हें बगावत की मुद्रा में
आसमान से नजरें मिला रहे थे
बारिश में पेड़ भींगकर एक नई भाषा को जन्म दे रहे थे
वहीँ इस बारिश में
शहर के तमाम जूते
बादल से शिकायत कर रहे थे
जबकि जूतों ने कभी अन्य मौसम के खिलाफ
कभी शिकायत नहीं किए
लेकिन सदी में पहली
बार जूतों ने शिकायत दर्ज कराई है
जूते मोची की भी शिकायत कर रहे थे
मोची को जूता बनाने से पहले हमारे बारे में कुछ सोचना चाहिए था
बारिश में सबसे अधिक नुकसान जूता को ही उठाना पड़ता है।।

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दिल्ली केवल भाषा है

दिल्ली एक आईना है 
जहाँ हर कोई अपना चेहरा देखना चाहता है 
दिल्ली एक किताब है 
जहाँ पूरा हिंदुस्तान अपना अध्याय खोज रहा है 
दिल्ली एक जूते के समान है 
जिसे हर पाँव पहनना चाहता है 
दिल्ली एक बेल्ट है 
जिसे सभी लोग कमर में कसना चाहते है 
दिल्ली एक पर्स है 
जो किस्मत बदलने का हूनर सिखाती है 
लेकिन मेरे लिए दिल्ली केवल भाषा है .....

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सड़क सब कुछ जानती है

तुम कहाँ हो
तुम कैसी हो
मुझे नहीं मालूम 
कई बार जानना चाहा
पर परिंदों की तरह शाम को अजान होने से पहले
खाली मुंह वापस लौट आता
लेकिन तुम्हारे बारे में मुझसे अधिक
सड़के जानती है
हर सड़क को मालूम है
तुम्हारा वजन कितना है
हर सड़क को मालूम है
तुम्हारे पाँव में जूते किस नंबर के आते है
शहर की सभी सड़के जानती है
तुम कब बालों में दो चोंटी करती थी
तुम कब डरती थी
तुम कब खुश होती थी
तुम कबसे साड़ी पहनना शुरू कर दी
शहर की सभी सड़के जानती है
तुम आखिरी बार मुझसे मिलकर कहाँ गई
लेकिन आज तक यह सड़के तुम्हारे बारे में किसी को कुछ भी नहीं बताई
मैंने सड़को से हजार बार तुम्हारे बारे में पूछा होगा
पर हर बार सड़के मौन होकर मेरी तरफ देंखती है और मुस्कुरा देती है।
तुम खुद को लाख नास्तिक कहो लेकिन
सड़के बताती है
तुम आस्तिक थी।।

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मैं रेल की तरह सभ्य होना चाहता हूँ

मैं रेल की तरह सभ्य होकर 

तुमसे प्यार करना चाहता हूँ 

मैं रेल की तरह तुम्हारे शहर में सिटी बजाते हुए 

धुंआ  उड़ाते हुए आना चाहता हूँ 

सोचो !

अगर मैं रेल की तरह तुम्हे सभ्य होकर प्यार करूँ तो 

सारा आसमान कुछ देर के लिए तुम्हारे छत पर उतर सकता हैं 

और तुम पूरी रात चाँद में दबी  हुई हरी घास बिनते  रहना 

मैं जानता  हूँ 

अगर ! 

तुम्हारे शहर में 

मैं आत्मा या भाषा बनकर आऊंगा तो कभी भी मार दिया  जाऊंगा 

अगर मैं तुम्हारे शहर में सड़क बनकर आऊंगा 

तो लोग मेरे प्यार का मजाक उड़ाएंगे 

अगर पतंग बनकर आऊंगा तो हवा में ही दफ़न हो जाऊंगा 

जब भी रेल की तरह आऊंगा तो तुम आसमान की तरह मुझसे मिलोगी और कुछ देर के बाद 

हम रोशनी में तब्दील जाएंगे 

मैं अब रेल की तरह  सभ्य होना चाहता हूँ 

तुम केवल आसमान की तरह फैलना  सीख  जाओं ॥ 

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मेरी खबर में

आज एक बच्चे की गेंद गायब हो गई
एक क्षण के लिए मुझे लगा की धरती गायब हो गई 
आज उसी बच्चे के पांव से जूता गायब हो गया 
मुझे लगा की मेरे दोनों पांव गायब हो गए
आज एक बच्चे का चेहरा गायब हो गया
मुझे लगा की अब शहर की नैतिकता मर चुकी है
आज एक बच्चे का बस्ता गायब हो गया
मुझे लगा की आज किसी ने मेरा दिल चुरा लिया
आज एक बच्चे का खिलौना गायब हो गया
मुझे लगा की मेरा विस्थापन हो गया।
आज मैं खबर लिख रहा था बचपन की
शहर में इसी बीच कोई मेरा प्रेमपत्र चुरा रहा था।।

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सिग्रेट की डीबिया

सिग्रेट की डीबिया पर 
शाम को तुम्हारा नाम लिखा था 
रात को धुएं के साथ 
तुम्हारा नाम 
आसमान में अपना वजूद खोज रहा था 
अँधेरे में 
सिग्रेट की डीबिया पर 
रात भर तुम्हारा स्केच बनाता रहा 
सुबह जब नींद खुली 
तब सभी ख्वाब राख हो चुके थे 
और तुम्हारा स्केच भी गायब हो चूका था
ठीक वैसे ही जैसे तुम बिना बताएं
नदी के रास्ते चली गई थी।

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सबसे अच्छी प्रार्थना सुअर के पास

समय के दुष्चर्क में दिल्ली हो या उज्जैन
सुबह- शाम होती रहती है प्रार्थनाएं
कभी यह प्रार्थनाएं संविधान की हत्या के लिए कभी
नजीर, कबीर/ मोहित- मोहन जैसे लोगोंं को मारने के लिए
सभ्यता की पहली सीढ़ी से लेकर आखिरी सीढ़ी तक आदमी
बिस्तर से लेकर संसद तक करता रहता प्रार्थनाएं
आदमी की सुबह से लेकर रात तक की प्रार्थनाओं में सिर्फ सुविधा के मंत्र की आवाज आती है
यहां तक कि दुनिया का सबसे बड़ा उस्ताद अस्पताल में भी सुविधा के मौत को ही मांगता है
लेकिन दुनिया की परिधि में सबसे अच्छा प्रार्थना कोई करता है
तो वह है सुअर!!
सुअर अपनी प्रार्थना में जगल में भी पानी मांगता है और पानी में भी जंगल
सुअर अपनी प्रार्थना में कभी अपने हाथ को साफ करने की सुविधा नहीं मांगती है
इसलिए गौर से देखे तो धरती पर सबसे खूबसूरत अगर कोई है तो वह है सुअर
सुअर दिल्ली से लेकर दौलताबाद तक एक आवाज में बात करती है
जबकि आदमी दिल्ली से लेकर बनारस के बीच अपनी आवाज और शक्ल भी बदल लेता है
सुअर कभी किसी देवालय में नहीं
सुअर तुमकों देखकर प्रार्थनांए करती है ।।



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शनिवार, 29 अप्रैल 2017

भाषांतर में कुछ मराठी कविताओं का अनुवाद सुनीता डागा जी द्वारा बहुत ही जीवन्त रुप में मूल कविता के अन्तरभावों को समेटे मिला।गाथांतर मराठी की युवा स्त्री स्वरों का स्वागत करता है।

1----

      
                         आस

सूरज के तेजस्वी किरणों को मुट्ठी में भींचे ,
मैंने जन्म लिया, तो कहते हैं ..
रात्रि के मध्य प्रहर में भी फक्क उजियारा था
आँचल से निकलती दूध की धाराओं को सँभाले हुए
माँ ने मुझे सीने से जकड़ कर रखा था
सभी ने पर नाक -भौं सिकोड़े थे, क्युँकि
आठ भाइयों को निगल कर मैने जन्म लिया था ।
सच हैं, कहते हैं कि मेरे पूर्व
आठ बच्चों का गर्भपात हुआ था
माँ के तरल गर्भाशय से फिर मेरा जन्म हुआ था ।

माँ ने कहा, अच्छा हुआ, जो वे मर गए
अरी ! जो माँ के पेट से निकलने में न हो सक्षम
कैसे दिखा पाएँगे वे दुनिया में दमखम ?
सच हैं , कृष्ण से पहले आधा डझन बच्चे भी तो
कुत्ते की मौत मरे थे
कंस ने बिना झिझक उन्हें दीवारों पर दे मारा था
और खुन से लथपथ वे सभी गिर कर पड़े थे
रातों रात भाग निकलने में कृष्ण के तो ,
फिर हाथ - पाँव ही फुल गए  थे ..

पर वह बित्ता भर की लड़की
बिजली की तरह कड़कती
भविष्य का घंटानाद करती हुई
कंस के हाथ से निकल कर , ऊपर-की-ऊपर उड़ गई थी ।
जाते - जाते मुझ से कह गई,
तुम दुर्गा , चंडिका , महामाया,
रणरागिणी , महिषासुरमर्दिनी
लो हाथ में शस्त्र, करो दुष्टों का निर्दालन
हाथ में आसूड़ धरे, नराधमों का शरसंधान

तब से मैंने हाथ में पकड़ी हैं कलम
वार - पर - वार करने ,
अन्याय पर प्रहार करने के लिए
फूलों को देने श्वास, परिंदो को निश्वास
मित्रों , मेरी कलम को अब हैं पसायदान की आस !

मूल कविता - नीलम माणगावे
अनुवाद - सुनिता डागा ।

2----

होते जाते हैं चेहरे अभ्यस्त

तस्वीरों से झाँकती झुठमुठ की हँसी से
और आदी होता जाता है जीवन भी
सायास बटोरे हुए धीरज का
मेगा फिक्सेल चाहे जितना भी बढ़े
भीतर की चोट को आसानी से छुपाए
बड़ी सफाई से मिलाएँ जाते हैं रंग
फीके-सफेद जीवन में
झूठा चेहरा झूठी संवेदनाएँ
झूठी ही होती है प्रतिमा चिपकाई हुई
जिसके आरपार प्रवेश की
होती है सख्त मनाई
स्वयं को भी !
भीतर के मैले-कुचले मलिन जीवन से
मोड़ा जाता है मुँह
बिन बुलाए मेहमान की तरह
और पहनाएं जाते हैं वस्त्र
झिलमिलाते उजियारे के
हाथ मिलाने की औपचारिकता से
हस्तांतरित होती है असुरक्षा
एक से दूजे के पास
दूजे से तीसरे के पास
कुछ पल उफनते रहते हैं मस्ती में
चार लोगों के बीच तब
भीतर-ही-भीतर छटपटाती रहती है
एक घुटन जिसे सहलाया न जा सके
चढ़ती रहती हैं परतों पर परतें
जमता जाता है कादे पर कादा
दिन-ब-दिन
और फिर किसी आकस्मिक पल में
होता है हमला निशब्द मन पर
हरहराकर टूट जाता है अस्तित्व
धराशायी होने के लिए कहाँ
बचता है चेहरा
सिर्फ जार-जार बहते हैं आँसू निरंतर
रणभूमि की भी आदत हो ही जाती है
धीरे-धीरे...

अनुवाद - सुनिता डागा
मूल मराठी कविता - योगिता पाटील

3----

"खड़ा रिक्त पुरूष..!"

घिर ही आता है मेरा आसमान
कहते हो तुम,
यह तो नित्य का ही है...
वैसे,
नहीं समझ पाओंगे तुम...
वैसे भी तुम शुष्क निरभ्र
किसी कसमसाते फूल से पूछो
कैसी होती है भीतर की अकुलाहट...
कैसे जान पाओंगे तुम।
तुम तृण-पात की तरह खड़े
एक रिक्त खाली पुरूष..
पर विश्वास है मुझे
जब तुम भी दुलराओगे
किसी ओस की बूँद को
अपनी अंजुली में
अनायास ही छू जाएँगी
मेरे भीतर की कोमलता तुम्हें
और फिर
तुम्हारे अंदर भी फूट पड़ेगा
सोता कोई ममता भरा...!

अनुवाद - सुनिता डागा
मूल मराठी कविता - पुष्पांजली कर्वे

4----

तुम्हारे साथ बिताई हर रात्रि में
जलाती रहती हूँ मैं
नारीत्व की एक-एक निशानी
तब कहाँ याद आते हैं तुम्हें
चाँद - रौशनी- छिटकी चाँदनी
कुछ भी तो नहीं...

सुंदरता के सभी अहसासों को
ताक पर रख कर
भोग करते रहते हो तुम
मेरे भीतर की अविनाशी आदिमता से

तब भी नहीं दिखाई देती है तुम्हें
मेरे अंदर गाती हुई मीरा या राधा

दिन में परिचित से लगते तुम
हो जाते हो मत्त
पीकर रात्रि का अंधकार
तब विमुढ़-सा मेरा स्त्रीत्व
जम जाता है भैरवी की गहन कालिमा में...

टटोलते रहते हो आदतन
मेरा अंग-अंग
तब भूले से भी नहीं बढ़ते हैं हाथ तुम्हारे
मेरे अस्तित्व की तलाश में

गर्व से भरे सवार होते हो
आसपास के सभी संबंधों पर
जैसे अधिराज्य हो तुम्हारा
रात्रि के कृत्रिम उजियारे में

इस सबके बावजूद
देखती हूँ मैं तुम्हारी आँखों में
भय की एक उग्र रेखा
मिटा कर उसे आ पाओ

तब शायद
शुभ्र उजाले में
नारीत्व की निशानियों को
मैं भी सहेज सकूँ तुम्हारे साथ...

अनुवाद - सुनिता डागा
मूल मराठी कविता - वृषाली विनायक

4---

मत ढूँढो तुम मुझे
उन पुराने गुलाबी प्रेम पत्रों में
जिनमें माँगी है मैंने माफी उन गलतियों की
जो कभी की ही नहीं मैंने
मत ढूँढो
साड़ियों की अलमारी में
या
मोतियों के उन गहनों में
जिन्हें ले आए थे तुम...

तुम्हारी ही गलतियों का खामियाजा भुगतने
भूनती रही तुम्हारे पसंद की मछलियाँ
उस रसोईघर में भी जाती हूँ मैं अब
कभी कभार ही

आजकल घूमती रहती हूँ मैं
किसी कला-दीर्घा में
अमूर्त चित्रों के अर्थ खोजती
कभी
किसी महफिल में सम पर दाद देती
भारी-भरकम किताबों में
सिर को खपाएँ
चाय की प्याली-पर-प्याली खत्म करती
इत्मीनान से
घर के ही किसी कोने में !
गपशप भी लड़ा लेती हूँ कभी बेटे से स्काईप पर
वहाँ के इतिहास और उसके भविष्य
दोनों के बारे में !

समय के साथ
नहीं बदल पाएँ तुम
इसमें मेरा तो कोई कसुर नहीं !

अभी भी कहाँ गया है वक्त...
शहर के बाहर खलिहान में
पुकारती है तोता-मैना की जोड़ी एक-दूजे को
कल ही पढ़ा है मैंने..
क्या चलकर देखें उन्हें आज शाम में ?

अनुवाद - सुनिता डागा
मूल मराठी कविता - योगिनी राऊळ

5----

तुम्हारे जाने के पश्चात
पूरी तरह से बंद
बेड़रूम के दरवाजे को
धकेला मैंने हल्के से
कल पहली बार
तो...
भक्क से घुस आई चाँदनी भीतर
फैल गई मनमुराद
उदास बिस्तर पर,
साथ में गुनगुना जाड़ा
और
आर्त पुकार आकुल कोयल की...

सोचती हूँ तुम्हारी तस्वीर
लगा दूँ बच्चों के कमरे में
मेरे नए बसंत में
तुम्हें व्यर्थ ही
कोई झिझक न हो !

अनुवाद - सुनिता डागा
मूल मराठी कविता - योगिनी राऊळ

परिचय

सुनीता डागा
हिंदी साहित्य में M.A.
हिंदी - मराठी परस्पर अनुवाद करती हूँ
मराठी दलित आत्मकथा का हिंदी अनुवाद " दाह" - इस माह के समकालीन भारतीय साहित्य पत्रिका में इसकी समीक्षा छपकर आई है । लमही" में भी हेमराज कौशिक ने इस उपन्यास का परिक्षण लिखा है ।
डाॅ . केशुभाई देसाई की किताब " फूलजोगनी" का मराठी अनुवाद ।
पत्रिकाओं के हेतु अनुवाद का काम ।
कई किताबों के अनुवाद पर काम चल रहा है ।
अखिल भारतीय गंधर्व महाविद्यालय की बहुचर्चित पत्रिका " कलाविहार" के लिए अनुवाद का काम करती हूँ ।
अभी हाल ही में स्वतंत्र लेखन के चलते कुछ मराठी और हिंदी कविताएँ लिखी है ।