गुरुवार, 4 मई 2017

नीतिश मिश्र की कविताऐं

नीतिश को पहले भी गाथांतर पर आप पढ़ चुके हैं। पेशे से पत्रकार नीतिश की कविताओं की भाव भूमि में प्रेम तत्व की प्रधानता होते हुए भी समसामिक घटनों की भी गहन पड़ताल है। युवा मन की छटपटाहट ....घूटन....संत्रास की अनुभूतियाँ सहेजे कवि की कविताओं की जमीन बेहद उर्वर है।



नमक पर प्रेमपत्र लिखता हूँ

मैं कागजों पर नहीं 
नमक पर प्रेमपत्र लिखता हूँ 
जिससे प्रेमपत्र का स्वाद 
सदियों तक सुरक्षित रहे 
हाँ 
मैं अब तुम्हे नमक के टुकड़ों पर प्रेमपत्र लिखता हूँ
ताकि मेरा प्रेमपत्र
समुद्र भी पढ़ सके
अनाज भी
इंसान भी
और बर्तन भी आग भी।।

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प्रश्न दीवारों में जीवित हैं .

सारे प्रश्न 
अभी भी दीवारों में 
जीवित हैं ......
रात भर मैं 
अपनी आत्मा से प्रश्नो की केंचुल उतारकर 
दीवारों पर सजाता रहता हूँ
मेरी दीवारें
मेरी आत्मकथा हैं
मैं दिन भर धरती पर 
उत्तर की खोज में साईकिल से भटकता रहता हूँ ...... 
इस क्रम में आँखों में कई बार इतिहास  चुभता हैं 
तो कई बार जख़्म  आईने में दिखाई देने लगते हैं ... 
सारी रात 
मैं अपने आत्मा के खाते में 
भागी हुई लड़कियों का रिपोर्ट दर्ज करता हूँ 
सारी रात टूटे हुए खिलौनों में एक रंग भरता रहता हूँ 
इसी बीच पता चलता हैं 
एक सांप मर गया 
जिसने पिछले साल रामअवतार  को मुक्ति का मार्ग दिखाया 
मैं सांप की मरी हुई आँखों में अपनी तस्वीर देखता हूँ 
और सोचता  मैं  इसकी आँखों से कैसे बच जाता था 
गेहुंअन सांप असंख्य बार मेरे कमरे में आता था 
और घंटो मेरी तरह गंभीर होकर 
मेरे प्रश्नों को पढता था 
फिर कुछ देर तक हँसता था 
मैं रात भर सांप के देह को देखता रहा 
और वह रात भर मुझे देखता रहा 

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एक बार गहरी नींद सोना चाहता हूँ

मैं युद्ध पर जाने से पहले 

एक बार गहरी नींद सोना चाहता हूँ 

और नांव के एकांत को 

अपने भीतर भरना चाहता हूँ 

मैं युद्ध पर जाने से पहले एक बार 

अपने घर की नीव में उतरना चाहता हूँ 

और वहां माँ की रखी हुई आस्था को 

एक नया अर्थ देना चाहता हूँ

मैं युद्ध पर जाने से पहले 

नींद में एक प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ 

मैं एक बार गंगा की रेत से मिलना चाहता हूँ .... 

मैं युद्ध पर जाने से पहले एक बार 

पीपल की पत्तियो पर जमी स्मृतियों को 

अपने भीतर भरना चाहता हूँ 

दीवारों पर निर्मित इतिहास को भाषा से रंगना चाहता हूँ 

मुझे मालूम हैं अगर 

मैं युद्ध से वापस नहीं लौटा 

तो कोई नहीं पूछेगा 

मेरे टूटे हुए खिलौनों का क्या अर्थ हैं 

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मेरा प्रेमपत्र लेकर कबूतर उड़ रहा हैं

मैं तुमको ऐसा प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ
जिसे कबूतर लेकर सरहदों के पार   उड़ सके
आसमान उसमे कुछ रंग भर सके
देवता प्रेमपत्र का वाचन कर सके
गरूण देखे तो कुछ देर तक बंद कर दे
अपनी उड़ान .....
इंद्र देखे तो उसे  भोग से घृणा हो जाए
वृहस्पति देखे तो टूट जाए उसका  अंहकार
मेनका देखे तो प्रायश्चित करने लगे......
गणेश देखे तो
मनुष्य होने के लिए
प्रार्थना में डूब जाए .....
मैं तुमको धरती से ऐसा प्रेमपत्र लिखना  चाहता हूँ
जिसे ऋषियों को यह कहना पड़े की
मुक्ति से ज्यादा कहीं पवित्र प्रेमपत्र लिखना हैं
सुनो ब्रह्मा !
मैं प्रेमपत्र में अपना प्यार भी लिखूंगा
अपनी गरीबी भी लिखूंगा
अपने खेत की हरियाली  भी लिखूंगा
अगर कुछ नहीं लिखूंगा तो केवल धर्म
जब मेरा प्रेमपत्र लक्ष्य तक पहुंचेगा
तब समझ लेना धरती पर मनुष्य हारता नहीं हैं
लेकिन मैं जानता  हूँ
तुममे से हर कोई
रोकेगा कबूतर को  ......
जब कबूतर प्रेमपत्र देकर वापस लौट रहा होगा
तब तुम लोग उसकी हत्या की नीति बना रहे होंगे
जिससे यह कबूतर दुबारा धरती से कोई अन्य प्रेमपत्र लेकर उड़ न सके
लेकिन मैंने सभी कबूतरों को दे दिया हूँ
अपना एक एक प्रेमपत्र ......
क्या ऐसे में तुम लोग आसमान में सारे कबूतरों को मार दोगे ?
बोलो देवताओं। ...

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इस सदी का प्रेमपत्र लिखना ही धर्म है

केवल मैं ही तुम्हें प्रेमपत्र नहीं लिखता हूं
मेरे प्रेमपत्र में मेरा शहर भी शामिल होता है
मेरे शहर की हवा भी उपस्थित रहती है
मेरे कमरे का अंधेरा भी प्रेमपत्र में शामिल हो जाता है
मैं जब खुश होता हूं या जब दुखी रहता हूूं
या जब  सुख- दुख कुछ भी नहीं होता है तब भी
मैं प्रेमपत्र लिखता हूं
शायद! इस सदी का प्रेमपत्र लिखना ही धर्म हो
धरती का सबसे बड़ा अविष्कार प्रेमपत्र लिखना ही रहा हो
जिसने भी प्रेमपत्र लिखने की कला का इजाद किया होगा
वह धरती का सबसे सभ्य मनुष्य रहा होगा
आज भी मैं उस आदमी के बारे में कल्पना करता रहता हूं
और उस लड़की के बारे में सोचता हूं
जिसके खाते में दर्ज हुई होगी सबसे पहले प्रेमपत्र के प्राप्त होने की खुशी
मैं जब भी तुम्हे प्रेमपत्र लिखकर खाली होता हूं
तब मैं दूसरे प्रेमपत्र के बारे में सोचने लगता हूं
मेरे लिए प्रेमपत्र बिल्कुल पानी की तरह है
प्रेमपत्र हर समाज का मनुष्य लिखता आया है
ऋषियों से लेकर आदिवासियों ने भी लिखा है
धरती पर रंग तभी तक बचे रहे
जब - तक हम प्रेमपत्र लिखते रहे
अगर हमे गंगा को या हिमालय को
जंगह को या अंधेरे को
आकाश को या धरती को बचाना है तो
हमे प्रेमपत्र लिखना ही होगा।।

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मैं कविता नहीं लिखना चाहता

अब मैं कविता नहीं लिखना चाहता 
या कविता लिखने की मुझमे योग्यता नहीं है 
अब मैं केवल और केवल 
प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ 
प्रेमपत्र सिर्फ मैं उस लड़की को नहीं लिखना चाहता हूँ 
जो मुझसे प्रेम करने की साहस रखती थी
बल्कि उस लड़की को भी लिखना चाहता हूँ
जिससे मैं प्रेम करने का साहस रखता था
बल्कि उस लड़की को भी लिखना चाहता हूँ
जो शहर में नदी से भी अधिक खूबसूरत थी
लेकिन मैं उससे प्रेम नहीं कर पाया
मैं उस कपास के पौधे को भी प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ
जिसके धागे का वह वस्त्र पहनती थी
मैं उस घर को भी प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ
जिसमे वह रहा करती थी
मैं उस देवता को भी प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ
जिससे वह मेरे लिए सिर्फ मेरे लिए प्रार्थना करती थी
मैं उस विश्वविद्यालय को भी प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ
जहाँ वह पढ़कर सभ्य होना सिख रही थी
मैं उस बिस्तर को भी प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ
जहाँ से वह पूरी रात सिर्फ मेरे बारे में सोचती थी
मैं उस गांव को प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ
जहाँ से वह चलकर सिर्फ मेरे लिए खाली हाथ आई थी
मैं उसके विषय को प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ
जो उसे इतना अवकाश देता था की वह मेरे बारे में सोच सके
अब मैं कविता नहीं लिखना चाहता हूँ
अब मैं केवल और केवल प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ।
मैं केवल सुबह ही नहीं बल्कि भोर में जब आसमान में तारे सो चुके होते है उस वक्त भी उसे प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ
मैं केवल बसंत में ही नहीं बल्कि खड़ी दुपहरी में रेत के बीच भी प्रेमपत्र लिखना  चाहता हूँ।

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जूते की शिकायत

बारिश से पूरा शहर खुश था 
सबसे अधिक शहर के नाले खुश थे 
साल में कुछ ही दिन तो होते है 
जब नालों की प्यास बुझती है
प्यास बुझने के बाद
नाले शहर के विवेक को बचाने में जूट जाते है
अगर नाले शहर में न हो
तब शहर का विवेक मर जाता है
कभी कभी बहुत जरूरी होता है नालों का होना
बारिश में जहाँ पूरा शहर खुश था
वही चूल्हें उदास थे
चूल्हें खो चुके थे अपना चेहरा
अपना धर्म ......
टूटे हुए चूल्हें बगावत की मुद्रा में
आसमान से नजरें मिला रहे थे
बारिश में पेड़ भींगकर एक नई भाषा को जन्म दे रहे थे
वहीँ इस बारिश में
शहर के तमाम जूते
बादल से शिकायत कर रहे थे
जबकि जूतों ने कभी अन्य मौसम के खिलाफ
कभी शिकायत नहीं किए
लेकिन सदी में पहली
बार जूतों ने शिकायत दर्ज कराई है
जूते मोची की भी शिकायत कर रहे थे
मोची को जूता बनाने से पहले हमारे बारे में कुछ सोचना चाहिए था
बारिश में सबसे अधिक नुकसान जूता को ही उठाना पड़ता है।।

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दिल्ली केवल भाषा है

दिल्ली एक आईना है 
जहाँ हर कोई अपना चेहरा देखना चाहता है 
दिल्ली एक किताब है 
जहाँ पूरा हिंदुस्तान अपना अध्याय खोज रहा है 
दिल्ली एक जूते के समान है 
जिसे हर पाँव पहनना चाहता है 
दिल्ली एक बेल्ट है 
जिसे सभी लोग कमर में कसना चाहते है 
दिल्ली एक पर्स है 
जो किस्मत बदलने का हूनर सिखाती है 
लेकिन मेरे लिए दिल्ली केवल भाषा है .....

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सड़क सब कुछ जानती है

तुम कहाँ हो
तुम कैसी हो
मुझे नहीं मालूम 
कई बार जानना चाहा
पर परिंदों की तरह शाम को अजान होने से पहले
खाली मुंह वापस लौट आता
लेकिन तुम्हारे बारे में मुझसे अधिक
सड़के जानती है
हर सड़क को मालूम है
तुम्हारा वजन कितना है
हर सड़क को मालूम है
तुम्हारे पाँव में जूते किस नंबर के आते है
शहर की सभी सड़के जानती है
तुम कब बालों में दो चोंटी करती थी
तुम कब डरती थी
तुम कब खुश होती थी
तुम कबसे साड़ी पहनना शुरू कर दी
शहर की सभी सड़के जानती है
तुम आखिरी बार मुझसे मिलकर कहाँ गई
लेकिन आज तक यह सड़के तुम्हारे बारे में किसी को कुछ भी नहीं बताई
मैंने सड़को से हजार बार तुम्हारे बारे में पूछा होगा
पर हर बार सड़के मौन होकर मेरी तरफ देंखती है और मुस्कुरा देती है।
तुम खुद को लाख नास्तिक कहो लेकिन
सड़के बताती है
तुम आस्तिक थी।।

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मैं रेल की तरह सभ्य होना चाहता हूँ

मैं रेल की तरह सभ्य होकर 

तुमसे प्यार करना चाहता हूँ 

मैं रेल की तरह तुम्हारे शहर में सिटी बजाते हुए 

धुंआ  उड़ाते हुए आना चाहता हूँ 

सोचो !

अगर मैं रेल की तरह तुम्हे सभ्य होकर प्यार करूँ तो 

सारा आसमान कुछ देर के लिए तुम्हारे छत पर उतर सकता हैं 

और तुम पूरी रात चाँद में दबी  हुई हरी घास बिनते  रहना 

मैं जानता  हूँ 

अगर ! 

तुम्हारे शहर में 

मैं आत्मा या भाषा बनकर आऊंगा तो कभी भी मार दिया  जाऊंगा 

अगर मैं तुम्हारे शहर में सड़क बनकर आऊंगा 

तो लोग मेरे प्यार का मजाक उड़ाएंगे 

अगर पतंग बनकर आऊंगा तो हवा में ही दफ़न हो जाऊंगा 

जब भी रेल की तरह आऊंगा तो तुम आसमान की तरह मुझसे मिलोगी और कुछ देर के बाद 

हम रोशनी में तब्दील जाएंगे 

मैं अब रेल की तरह  सभ्य होना चाहता हूँ 

तुम केवल आसमान की तरह फैलना  सीख  जाओं ॥ 

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मेरी खबर में

आज एक बच्चे की गेंद गायब हो गई
एक क्षण के लिए मुझे लगा की धरती गायब हो गई 
आज उसी बच्चे के पांव से जूता गायब हो गया 
मुझे लगा की मेरे दोनों पांव गायब हो गए
आज एक बच्चे का चेहरा गायब हो गया
मुझे लगा की अब शहर की नैतिकता मर चुकी है
आज एक बच्चे का बस्ता गायब हो गया
मुझे लगा की आज किसी ने मेरा दिल चुरा लिया
आज एक बच्चे का खिलौना गायब हो गया
मुझे लगा की मेरा विस्थापन हो गया।
आज मैं खबर लिख रहा था बचपन की
शहर में इसी बीच कोई मेरा प्रेमपत्र चुरा रहा था।।

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सिग्रेट की डीबिया

सिग्रेट की डीबिया पर 
शाम को तुम्हारा नाम लिखा था 
रात को धुएं के साथ 
तुम्हारा नाम 
आसमान में अपना वजूद खोज रहा था 
अँधेरे में 
सिग्रेट की डीबिया पर 
रात भर तुम्हारा स्केच बनाता रहा 
सुबह जब नींद खुली 
तब सभी ख्वाब राख हो चुके थे 
और तुम्हारा स्केच भी गायब हो चूका था
ठीक वैसे ही जैसे तुम बिना बताएं
नदी के रास्ते चली गई थी।

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सबसे अच्छी प्रार्थना सुअर के पास

समय के दुष्चर्क में दिल्ली हो या उज्जैन
सुबह- शाम होती रहती है प्रार्थनाएं
कभी यह प्रार्थनाएं संविधान की हत्या के लिए कभी
नजीर, कबीर/ मोहित- मोहन जैसे लोगोंं को मारने के लिए
सभ्यता की पहली सीढ़ी से लेकर आखिरी सीढ़ी तक आदमी
बिस्तर से लेकर संसद तक करता रहता प्रार्थनाएं
आदमी की सुबह से लेकर रात तक की प्रार्थनाओं में सिर्फ सुविधा के मंत्र की आवाज आती है
यहां तक कि दुनिया का सबसे बड़ा उस्ताद अस्पताल में भी सुविधा के मौत को ही मांगता है
लेकिन दुनिया की परिधि में सबसे अच्छा प्रार्थना कोई करता है
तो वह है सुअर!!
सुअर अपनी प्रार्थना में जगल में भी पानी मांगता है और पानी में भी जंगल
सुअर अपनी प्रार्थना में कभी अपने हाथ को साफ करने की सुविधा नहीं मांगती है
इसलिए गौर से देखे तो धरती पर सबसे खूबसूरत अगर कोई है तो वह है सुअर
सुअर दिल्ली से लेकर दौलताबाद तक एक आवाज में बात करती है
जबकि आदमी दिल्ली से लेकर बनारस के बीच अपनी आवाज और शक्ल भी बदल लेता है
सुअर कभी किसी देवालय में नहीं
सुअर तुमकों देखकर प्रार्थनांए करती है ।।



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शनिवार, 29 अप्रैल 2017

भाषांतर में कुछ मराठी कविताओं का अनुवाद सुनीता डागा जी द्वारा बहुत ही जीवन्त रुप में मूल कविता के अन्तरभावों को समेटे मिला।गाथांतर मराठी की युवा स्त्री स्वरों का स्वागत करता है।

1----

      
                         आस

सूरज के तेजस्वी किरणों को मुट्ठी में भींचे ,
मैंने जन्म लिया, तो कहते हैं ..
रात्रि के मध्य प्रहर में भी फक्क उजियारा था
आँचल से निकलती दूध की धाराओं को सँभाले हुए
माँ ने मुझे सीने से जकड़ कर रखा था
सभी ने पर नाक -भौं सिकोड़े थे, क्युँकि
आठ भाइयों को निगल कर मैने जन्म लिया था ।
सच हैं, कहते हैं कि मेरे पूर्व
आठ बच्चों का गर्भपात हुआ था
माँ के तरल गर्भाशय से फिर मेरा जन्म हुआ था ।

माँ ने कहा, अच्छा हुआ, जो वे मर गए
अरी ! जो माँ के पेट से निकलने में न हो सक्षम
कैसे दिखा पाएँगे वे दुनिया में दमखम ?
सच हैं , कृष्ण से पहले आधा डझन बच्चे भी तो
कुत्ते की मौत मरे थे
कंस ने बिना झिझक उन्हें दीवारों पर दे मारा था
और खुन से लथपथ वे सभी गिर कर पड़े थे
रातों रात भाग निकलने में कृष्ण के तो ,
फिर हाथ - पाँव ही फुल गए  थे ..

पर वह बित्ता भर की लड़की
बिजली की तरह कड़कती
भविष्य का घंटानाद करती हुई
कंस के हाथ से निकल कर , ऊपर-की-ऊपर उड़ गई थी ।
जाते - जाते मुझ से कह गई,
तुम दुर्गा , चंडिका , महामाया,
रणरागिणी , महिषासुरमर्दिनी
लो हाथ में शस्त्र, करो दुष्टों का निर्दालन
हाथ में आसूड़ धरे, नराधमों का शरसंधान

तब से मैंने हाथ में पकड़ी हैं कलम
वार - पर - वार करने ,
अन्याय पर प्रहार करने के लिए
फूलों को देने श्वास, परिंदो को निश्वास
मित्रों , मेरी कलम को अब हैं पसायदान की आस !

मूल कविता - नीलम माणगावे
अनुवाद - सुनिता डागा ।

2----

होते जाते हैं चेहरे अभ्यस्त

तस्वीरों से झाँकती झुठमुठ की हँसी से
और आदी होता जाता है जीवन भी
सायास बटोरे हुए धीरज का
मेगा फिक्सेल चाहे जितना भी बढ़े
भीतर की चोट को आसानी से छुपाए
बड़ी सफाई से मिलाएँ जाते हैं रंग
फीके-सफेद जीवन में
झूठा चेहरा झूठी संवेदनाएँ
झूठी ही होती है प्रतिमा चिपकाई हुई
जिसके आरपार प्रवेश की
होती है सख्त मनाई
स्वयं को भी !
भीतर के मैले-कुचले मलिन जीवन से
मोड़ा जाता है मुँह
बिन बुलाए मेहमान की तरह
और पहनाएं जाते हैं वस्त्र
झिलमिलाते उजियारे के
हाथ मिलाने की औपचारिकता से
हस्तांतरित होती है असुरक्षा
एक से दूजे के पास
दूजे से तीसरे के पास
कुछ पल उफनते रहते हैं मस्ती में
चार लोगों के बीच तब
भीतर-ही-भीतर छटपटाती रहती है
एक घुटन जिसे सहलाया न जा सके
चढ़ती रहती हैं परतों पर परतें
जमता जाता है कादे पर कादा
दिन-ब-दिन
और फिर किसी आकस्मिक पल में
होता है हमला निशब्द मन पर
हरहराकर टूट जाता है अस्तित्व
धराशायी होने के लिए कहाँ
बचता है चेहरा
सिर्फ जार-जार बहते हैं आँसू निरंतर
रणभूमि की भी आदत हो ही जाती है
धीरे-धीरे...

अनुवाद - सुनिता डागा
मूल मराठी कविता - योगिता पाटील

3----

"खड़ा रिक्त पुरूष..!"

घिर ही आता है मेरा आसमान
कहते हो तुम,
यह तो नित्य का ही है...
वैसे,
नहीं समझ पाओंगे तुम...
वैसे भी तुम शुष्क निरभ्र
किसी कसमसाते फूल से पूछो
कैसी होती है भीतर की अकुलाहट...
कैसे जान पाओंगे तुम।
तुम तृण-पात की तरह खड़े
एक रिक्त खाली पुरूष..
पर विश्वास है मुझे
जब तुम भी दुलराओगे
किसी ओस की बूँद को
अपनी अंजुली में
अनायास ही छू जाएँगी
मेरे भीतर की कोमलता तुम्हें
और फिर
तुम्हारे अंदर भी फूट पड़ेगा
सोता कोई ममता भरा...!

अनुवाद - सुनिता डागा
मूल मराठी कविता - पुष्पांजली कर्वे

4----

तुम्हारे साथ बिताई हर रात्रि में
जलाती रहती हूँ मैं
नारीत्व की एक-एक निशानी
तब कहाँ याद आते हैं तुम्हें
चाँद - रौशनी- छिटकी चाँदनी
कुछ भी तो नहीं...

सुंदरता के सभी अहसासों को
ताक पर रख कर
भोग करते रहते हो तुम
मेरे भीतर की अविनाशी आदिमता से

तब भी नहीं दिखाई देती है तुम्हें
मेरे अंदर गाती हुई मीरा या राधा

दिन में परिचित से लगते तुम
हो जाते हो मत्त
पीकर रात्रि का अंधकार
तब विमुढ़-सा मेरा स्त्रीत्व
जम जाता है भैरवी की गहन कालिमा में...

टटोलते रहते हो आदतन
मेरा अंग-अंग
तब भूले से भी नहीं बढ़ते हैं हाथ तुम्हारे
मेरे अस्तित्व की तलाश में

गर्व से भरे सवार होते हो
आसपास के सभी संबंधों पर
जैसे अधिराज्य हो तुम्हारा
रात्रि के कृत्रिम उजियारे में

इस सबके बावजूद
देखती हूँ मैं तुम्हारी आँखों में
भय की एक उग्र रेखा
मिटा कर उसे आ पाओ

तब शायद
शुभ्र उजाले में
नारीत्व की निशानियों को
मैं भी सहेज सकूँ तुम्हारे साथ...

अनुवाद - सुनिता डागा
मूल मराठी कविता - वृषाली विनायक

4---

मत ढूँढो तुम मुझे
उन पुराने गुलाबी प्रेम पत्रों में
जिनमें माँगी है मैंने माफी उन गलतियों की
जो कभी की ही नहीं मैंने
मत ढूँढो
साड़ियों की अलमारी में
या
मोतियों के उन गहनों में
जिन्हें ले आए थे तुम...

तुम्हारी ही गलतियों का खामियाजा भुगतने
भूनती रही तुम्हारे पसंद की मछलियाँ
उस रसोईघर में भी जाती हूँ मैं अब
कभी कभार ही

आजकल घूमती रहती हूँ मैं
किसी कला-दीर्घा में
अमूर्त चित्रों के अर्थ खोजती
कभी
किसी महफिल में सम पर दाद देती
भारी-भरकम किताबों में
सिर को खपाएँ
चाय की प्याली-पर-प्याली खत्म करती
इत्मीनान से
घर के ही किसी कोने में !
गपशप भी लड़ा लेती हूँ कभी बेटे से स्काईप पर
वहाँ के इतिहास और उसके भविष्य
दोनों के बारे में !

समय के साथ
नहीं बदल पाएँ तुम
इसमें मेरा तो कोई कसुर नहीं !

अभी भी कहाँ गया है वक्त...
शहर के बाहर खलिहान में
पुकारती है तोता-मैना की जोड़ी एक-दूजे को
कल ही पढ़ा है मैंने..
क्या चलकर देखें उन्हें आज शाम में ?

अनुवाद - सुनिता डागा
मूल मराठी कविता - योगिनी राऊळ

5----

तुम्हारे जाने के पश्चात
पूरी तरह से बंद
बेड़रूम के दरवाजे को
धकेला मैंने हल्के से
कल पहली बार
तो...
भक्क से घुस आई चाँदनी भीतर
फैल गई मनमुराद
उदास बिस्तर पर,
साथ में गुनगुना जाड़ा
और
आर्त पुकार आकुल कोयल की...

सोचती हूँ तुम्हारी तस्वीर
लगा दूँ बच्चों के कमरे में
मेरे नए बसंत में
तुम्हें व्यर्थ ही
कोई झिझक न हो !

अनुवाद - सुनिता डागा
मूल मराठी कविता - योगिनी राऊळ

परिचय

सुनीता डागा
हिंदी साहित्य में M.A.
हिंदी - मराठी परस्पर अनुवाद करती हूँ
मराठी दलित आत्मकथा का हिंदी अनुवाद " दाह" - इस माह के समकालीन भारतीय साहित्य पत्रिका में इसकी समीक्षा छपकर आई है । लमही" में भी हेमराज कौशिक ने इस उपन्यास का परिक्षण लिखा है ।
डाॅ . केशुभाई देसाई की किताब " फूलजोगनी" का मराठी अनुवाद ।
पत्रिकाओं के हेतु अनुवाद का काम ।
कई किताबों के अनुवाद पर काम चल रहा है ।
अखिल भारतीय गंधर्व महाविद्यालय की बहुचर्चित पत्रिका " कलाविहार" के लिए अनुवाद का काम करती हूँ ।
अभी हाल ही में स्वतंत्र लेखन के चलते कुछ मराठी और हिंदी कविताएँ लिखी है ।

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

मणि मोहन की कविताऐं

चर्चित कवि और अनुवादक मणि मोहन एक सजग संवेदशील कवि हैं। कहते हैं कविता समय से मुठभेड़ करती है...इस तथ्य का अवलोकन मणि मोहन जी की भाषा और कविता दोनों में किया जा सकता है।
गाथांतर पर आज मणि मोहन जी की कुछ कविताऐं प्रस्तुत हैं।


कविताएं : मणि मोहन

इंतज़ार
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किसी दिन
ड़ाल दूंगा
एक कटोरी आटे के साथ
अपनी थोड़ी सी भाषा भी
किसी मंगते की झोली में

किसी दिन
अख़बार की रद्दी बेंचते हुए
चढ़ा दूंगा
अपनी थोड़ी सी भाषा भी
किसी कबाड़ी की बेतरतीब सी तराजू पर

किसी दिन
ड़ाल दूंगा चुपके से
एक सिक्के के साथ
अपनी थोड़ी सी भाषा भी
आरती की थाली में

किसी दिन
प्रसाद में मिलाकर बाँट दूंगा
अपनी थोड़ी सी भाषा भी
चाटूकारों के बीच

किसी दिन
इस तरह क़िस्तों में
पूरी तरह खाली हो जाऊंगा
अपनी संचित भाषा से
फिर इंतज़ार करूँगा

इंतज़ार करूँगा
नई कोपलों का
हरियल तोतों का
बगीचे से अमरुद चुराते बच्चों का
जाने नहीं दूंगा उन्हें
जब तक वसूल नहीं लूँगा
अमरुद के बदले थोड़ी सी भाषा

इस तरह
इंतज़ार करूँगा
एक नई भाषा का -
तब तक
स्थगित रहेगी कविता ।




कविता
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माथे से बहता हुआ पसीना
कभी - कभी
होंठों तक आ जाता है

कभी - कभी
गालों तक लुढ़कते हुए आँसू भी
आ जाते हैं होंठों तक

कभी - कभी
ऐसे ही बहते - बहते
आ जाता है ख़ून भी
होंठों तक

ऐसे भी कभी - कभी
आता है होंठों तक
नमक का स्वाद

कभी - कभी
ऐसे ही आ जाती है
कविता की भाषा भी
होंठों तक ।


एक दिन
-------
देखना ! एक दिन
बस हम दोनों ही रह जायेंगे
इस घोंसले में

देखना ! एक दिन
मैं कहूँगा तुमसे -
अच्छा हुआ न
जो घोंसला बड़ा नहीं बनाया हमने

देखना ! एक दिन
इसी घोंसले की देहरी से
हम देखेंगे
दूर आसमान में
सितारों के तिनकों से बना
हमारे बच्चों का घोंसला

देखना ! एक दिन
अपनी नम आँखों से
मेरी तरफ देखते हुए
तुम ज़िद करोगी
वहां चलने की
और मैं कहूँगा -
उड़ सकोगी
इतने प्रकाश वर्ष दूर ...

रूपान्तरण
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हरे पत्तों के बीच से
टूटकर बहुत ख़ामोशी के साथ
धरती पर गिरा है
एक पीला पत्ता
अभी - अभी एक दरख़्त से

रहेगा कुछ दिन और
यह रंग धरती की गोद में
सुकून के साथ
और फिर मिल जायेगा
धरती के ही रंग में

कितनी ख़ामोशी के साथ
हो रहा है प्रकृति में
रंगों का यह रूपान्तरण ।

ईश्वर
-----
क्या भिंची हुई मुट्ठियों के साथ
नहीं हो तुम  ?

क्या तुम्हारा जी भी मितलाता है
पसीने की गंध से  ?

अपने हक़ के लिए लगते नारों की गर्जना सुनकर
क्या तुम भी कानों में ठूंस लेते हो ऊँगली ?

क्या प्रार्थना के अलावा
हर आवाज महज एक शोर है ?

क्या प्रार्थना के बाहर
कोई वजूद नहीं तुम्हारा ?

और अंत में
एक सूचना -
भिंची हुई मुट्ठियों में रहता है
हमारा ईश्वर ..

बांधे रहना
अपनी मुट्ठियाँ
खुल गईं
तो फिसल जायेगा
हमारा ईश्वर ।


ईश्वर की दिनचर्या

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अगर रहता होगा ईश्वर
तो कितने सुकून से रहता होगा
इस छोटी सी मड़िया में
जो आबादी से दूर
जंगल में बनी हुई है

शायद किसी एकांतप्रिय व्यक्ति ने
बनवाई होगी यह मड़िया...
पता नहीं कौन सी मनौती पूरी हुई हो उसकी
और किसी नौसीखिए कारीगर ने
बनाया होगा इसे बरसों पहले

कितने आराम से
कट रहे होंगे दिन
न आरती का झंझट
न सन्ध्या-वन्दन का इंतज़ार
और न भोग की लालसा

जब मन करता होगा
निकल जाता होगा जंगलों में
खा लेता होगा
गिलहरी के कुतरे हुए बेर
या सुआ -कटेल अमरुद

घूमता रहता होगा
यूँ ही बेसबब जंगलों में
जब थक जाता होगा
तो लौट आता होगा
अपनी मड़िया में

और फिर
नींद में आती होगी पूरी सृष्टि
नदी , वृक्ष , पहाड़ , झरने
धरती , समुद्र , आकाश , तारे
फूल , तितली , स्त्री और बच्चे
सपनों में आती होगी पूरी सृष्टि

सूर्य की पहली किरण के साथ
खुल जाती होगी उसकी नींद
( हो सकता है
देर तक सोते हों महाराज
इतवार को
मेरी तरह  )
फिर दतौन करता  होगा
नीम या बबूल की
और फिर नहाता होगा
किसी पहाड़ी झरने के नीचे खड़े होकर

कितना आनंद है
इस धरती पर
कितना आनंद है
मनुष्य की तरह जीने में
कम से कम एक बार तो
जरूर सोचता  होगा ईश्वर

कितना सुखद लगता है
इस तरह
ईश्वर के बारे में सोचना ।

अगर अपनी पत्नी की बात पर भरोसा करूँ
तो ईश्वर का एक रूप
कुलपति का भी है -
किसी विराट विश्वविद्धालय का कुलपति
जिसका एकमात्र काम
इम्तिहान लेना है

जरा - सा  दुःख
एक इम्तिहान
जरा - सी तकलीफ
फिर एक इम्तिहान

वह रोज़ जिक्र करती है
इन इम्तिहानों का
मैं भी रोज़ समझाता हूँ उसे
कि पढ़ना होगा
तैयारी करनी होगी
जैसे इम्तिहानों की तैयारी करते हैं
हमारे बच्चे

रोज़ समझाता हूँ उसे
सिर्फ प्रार्थना के दम पर
पार नहीं होगी नैया ।


इतवार की एक सुबह
----------------
यह एक अलग तरह की सुबह है
और सुबहों से एकदम अलग
देसी गुलाब की तरह खिली हुई
इतवार की सुबह

कांव - कांव करता हुआ एक कौआ
अभी - अभी उड़ा है किसी दरख़्त से
एक पल के लिए
मैं अपने अधिकारी के बारे में सोचता हूँ
और खिलखिलाकर हंस पड़ता हूँ
यह कल्पनाओं की सुबह है

बगीचे की बाउंड्रीवाल पर
दौड़ती हुई निकल जाती हैं
दो नन्हीं गिलहरियां . . .
उफ़्फ़ ! मैं तो भूल ही गया उनसे पूछना
सेतु - समुद्रम की कथा -
भूलने से याद आया
यह तो भूलने की सुबह है

एक - एक कर बुहारना है अभी
सप्ताह के बाकी तमाम दिन
और फिर बगीचे में गिरे हुए
सूखे पत्तों के साथ
उनमे आग लगानी है -
हांलाकि मुझे पता है
वे फिर पैदा होंगे
अपनी ही राख से
फिनिक्स की तरह . . .

बहरहाल
फिलवक्त मुझे
सिर्फ इस सुबह के बारे में सोचना है
जो खिली हुई है
अपराजिता की लता में
नीले रंग की तितली बनकर ।

रविवार, 26 मार्च 2017

चलो ,स्टेशन आ गया

सुनो ssन!.....
हूंsss सोने दो...
मत सुनो,कुम्भकर्ण के वशंज...कहते ,पैर पटकते सौम्या उठकर बाल्कनी में आकर रेलिंग  के सहारे खड़ी हो स्माइली के आकर के चाँद को देख मुस्कुरा उठी। ....आँखों के कोर नमी सहेजे चाँद को निहारते रहे और वह यादों की बस्ती में खोने लगी।....पिता माँ के उभरे पेट पर कान लगाए अजन्मे बच्चे को पुचकार रहे थे। वह भी उनकी नकल करती माँ के पेट पर चुम्बन दे बड़े प्यार से कहती..मेरा छोटा सा भाई कब आएगा पापा? पिता उसे गोद में उठा घूमाते और कहते जल्दी ही माँ अस्पताल से लेकर आएगी।
स्नेह की रसभरी डोर जिसे सौम्या बार -बार थामने की कोशिश करती ...अतित के पन्ने टटोलती ,उतनी ही बेचैनी बढ़ती जाती।पेट में शिशु करवटें बदलने लगा था....वह चाहती अमित को बताए कि उनका बच्चा अब महसूस कर सकता है उनका स्पर्श।वह चाहती कि पति पेट में चलते हुए बच्चे से बतियाए ...पर sss अफसोस कि उसे अपनी भागती दुनिया से इतर सब कुछ बस निबटाउ काम लगता।अॉफिस से लौट लैपटाप ले बैठ जाता....टोकने पर अॉफिस का जरुरी काम कह नाराजगी जताता।वहाँ से निबट मोबाईल ले बैठ जाता ...सौम्या के नाराज होने पर छत पर चला जाता।ये एक लाईलाज बीमारी बनती  जा रहा थी।सोते ,बैठते ,खाते यहाँ तक कि बाथरुम में भी मोबाईल साथ रहता। सौम्या की उब बढ़ती जा रही थी....।स्कूल से लौट वह अकेली अपनी दुनिया में इस कदर उबन महसूसने लगी थी की घर में दम घूटने लगा ।भाग कर कभी पार्क में जाकर बैठती...कभी बाल्कनी तो कभी छत पर जाकर घण्टों सामने पार्क में खेलते बच्चों को निहारती।एक शूकुन भरी मुस्कान चेहरे पर फैल जाती और पेट पर हाथ रख वह घण्टों मन की सुकोमल बातें अजन्में बच्चे से करती छत पर टहलती रहती।एक दिन पड़ोसी सान्याल ने अमित से कहा भी....यार अमित!..भाभीजी की तबियत तो ठीक है न?
क्यों ,क्या हुआ उसे ?भली चंगी तो है।...उल्टे उसने ही सौ सवाल दाग दिए।
बुरा न मानना...लेकिन उनकी मानसिक हालत ठीक नहीं लगती,...मानषी कह रही थी की अकेले घण्टों छत पर बड़बडाती रहतीं हैं।टेक केयर यार!...किसी अच्छे .....
अभी उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी की अमित दनदनाता हुआ लिफ्ट की ओर भागा।दरवाजे पर लगातार दस्तक सुन सौम्या ने हड़बडा कर दरवाजा खोला...अमित का चेहरा गुस्से से लाल देख सहम गयी।
क्या हुआ,किसी से लड़ाई हो गयी?....वह डरी थी ... अमित अपना बैग सोफे पर पटक उबल पड़ा...बिल्ड़िंग वाले तुम्हें पागल कहने लगें हैं...समझी sssss
सुबह -सुबह सान्याल ने मूड खराब कर दिया..
सौम्या आवाक उसका मुँह ताकती रही। हुवा क्या?धीरे से पूछा।वह सीधे उसके मुँह के पास आकर खड़ा हो गया...अच्छा ये बताओ ,अकेले में छत पर क्या बड़बड़ाती होsss
उसकी आवाज बहुत ऊँची थी....इतनी की मन की सुकोमल परतें चटक जाऐं।वह रोते हुए बस इतना ही पेट पर हाथ रख कह सकी....बेबी सेss...और फूट -फूट कर रोने लगी। अमित अब भी चिल्ला रहा था...बेवकूफ ....अपनी ये सेण्टी हरकतें घर में किया करो।सोसाइटी में मेरी बैण्ड मत बजवाओ...प्लीज ।वह हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ा रहा था।आगे वह कुछ और कहता कि तभी मोबाईल बज उठा....सॉरी सर ...बस ssबस पहुँच रहा हूँ,...फोन पर कहते वह बैग उठा कर फूर्ती से बाहर निकल गया। 
                    घण्टो रोने के बाद सौम्या संयत हुई....सिर भारी हो गया था । मन घबड़ा रहा था ...वह किसी से कुछ कहना चाहती थी।दरवाजा खोल बाहर निकली...सामने की पड़ोसन अपना कुत्ता ले टहलाने ले जा रही थीं...हाय सौम्या! कहती मुस्कुराकर निकल गयीं।अगल बगल के फ्लैट से बच्चों के रोने की आवाज आ रही थी....माँ -बाप नौकरी पर निकल चुके थे ,आया टी.बी .चला कर बैठी अपने में मगन..उसकी घबराहट बढने लगी...दरवाजा लॉक कर लिफ्ट की ओर तेज कदमों से बढ़ गयी.....लिफ्ट की दीवार से सिर टिका आँख मूंद लिया....और जैसे तेज बवंडर उठा हो....लोग बेतहाशा भाग रहे थे....सरपट,....वह कुछ चेहरे पहचानती थी...पकड़ना चाहा और हाथ फिसल जा रहा था।अचानक एक झटके से लिफ्ट रुकी..सिक्योरिटी गॉड ने आवाज दी...मैड़म!
वह जेसे नींद से जागी हो,...जागी। बाहर निकल वह पार्क में एक पेड़ की छाया में आ बैठी। सामने कुछ घरों की आया बच्चों को झूला झूला रही थीं...कुछ गेंद खेल रहे थे।वह खेलते बच्चों को मुग्ध देख रही थी ....अचानक एक बच्चा गिर गया....घुटना छिल गया .बच्चा मम्माssss मम्मा कह रोए जा रहा था...उसकी आँखें भर आईं...आया ने उठा कर चुप करा वापस खेलने भेज दूसरी से बतियाने लगी।
               जाड़े की गुनगुनी धूप में खिले रंग -बिरंगे फूलों पर मंडराती तितलियों को देख सौम्या मन्द मुस्कान सहेजती कभी बच्चों को देखती ,कभी तितलियों को...चारों तरफ रंग और हरितिमा के बीच बच्चों की मोहक मासूम हँसी का कलरव ।वह जैसे परियों के देश में जा पहुँची...एक नन्हा फरिश्ता उसकी अंगुली थाम कर चल पड़ा हो फूलों की वादियों में.
सौम्याssss...अरे यार! तुम यहाँ बैठी हो और मैं पूरी बिल्ड़िंग में पागलों की तरह खोजता फिर रहा हूँ।अमित नाराज हो रहा था...उसकी आवाज में चिन्ता साफ झलक रही थी।तुम इतनी जल्दी लौट आए? 
हाँ,..मैंने आज अपनी बेगम के लिए छुट्टी ले ली है।हाथ पकड़ कर उठाते हुए...चलो जल्दी रेडी हो जाओ ...पिक्चर चलते हैं। जेब से टिकट निकाल कर दिखाते हुए।वह मुस्कुराकर उठ गयी। सौम्या का मन नहीं था पर अमित के अनुनय पर बेमन से तैयार हो चल पड़ी ।जानती थी आज अमित उसे लेकर परेशान है इस लिए ये सब कर अपनी गिल्टी दूर करना चाहता है।दोनों दिल्ली की भागती सड़कों से गुजरते मैट्रो स्टेशन पहुँचे। कार पार्किंग में लगा टिकट ले मैट्रो की प्रतीक्षा करने लगे...आज अमित गलती से भी मोबाईल हाथ में नहीं ले रहा था।सौम्या को देख कर खुशी हुई कि शायद अमित कुछ कुछ प्राब्लम समझ रहा है।सामने सर्रssss की आवाज के साथ मैट्रो रुकी ...एक जत्था निकला ,एक दाखिल हुआ। अन्दर भीड़ थी....एक लड़की सौम्या के उभरे पेट को देख कर अपनी सीट छोड़ उसे हाथ पकड़ बिठा दिया। सौम्या ने चारों तरफ नज़र दौड़ाई...लड़के, लड़कियाँ ,बूढ़े ,जवान से लेकर हाथों में गट्ठर लिए फेरी खोमचे वाले तक हाथ में मोबाईल लिए व्यस्त थे।उसे घुटन होने लगी...उसने अमित की तरफ देखा...बहुत देर से धैर्य रखे अमित भी हाथ में मोबाईल लिए टिपटाप करने में व्यस्त था।उसके चेहरे पर तरह तरह के भाव आ जा रहे थे..उसने नज़रें फेर ली ।बगल में बैठी लड़की गूगल पर ब्यूटी टिप्स सर्च कर रही थी।दूसरी शायद अपने प्रेमी से चैटिंग कर रही थी..रह-  रह कर चेहरे पर लाली फैल जा रही थी। सौम्या चारों तरफ बार -बार देखती और समझने की कोशिश करती ...जब सारी कोशिशें बेकार हो गयीं ,अचानक उसने अपना हाथ पर्स में डाल अपना फोन निकाल नेट आन कर गूगल पर टाईप किया....बेबी केयर टिप्स...एक एक कर ढ़ेर सारे  बुक ,विडियो के लिंक उभरने लगे।उसकी आँखें चमक उठीं...एक -एक को खोल देखने लगी।प्यारे -प्यारे बच्चों की मनभावन तस्वीरें देख उसके चेहरे पर बार- बार मुस्कान फैल जाती।वह खोई हुई थी...हाथ में मोबाईल ...स्क्रीन पर उभरती किलकारियों की अनुगूँज ..अमित ने देखा ....एक शुकून भरी लम्बी साँस ले उसने सौम्या के सिर पर हाथ रख पूछा....क्या देख रही हो?..बहुत दिनों बाद सौम्या के चेहरे पर पहले वाली मुस्कान लौटी...बेबी केयर टिप्स।....सौम्या चहकते हुए बता रही थी।राजीव चौक स्टेशन आने की उदघोषणा सुन सौम्या का हाथ थाम अमित ने उठने का आग्रह कर कहा चलो स्टेशन आ गया।
                सौम्या खड़ी हो गयी ...फोन अभी भी हाथ में था....पीछे मुड़ कर देखा।सबकी गर्दन मोबाईल में झूंकी हुई थी।मुस्कुराते हुए अमित को देखा और बाहर निकल आई।

सोनी पाण्डेय

चलो ,स्टेशन आ गया

                                                         चलो स्टेशन आ गया




सुनो ssन!.....
हूंsss सोने दो...
मत सुनो,कुम्भकर्ण के वशंज...कहते ,पैर पटकते सौम्या उठकर बाल्कनी में आकर रेलिंग  के सहारे खड़ी हो स्माइली के आकर के चाँद को देख मुस्कुरा उठी। ....आँखों के कोर नमी सहेजे चाँद को निहारते रहे और वह यादों की बस्ती में खोने लगी।....पिता माँ के उभरे पेट पर कान लगाए अजन्मे बच्चे को पुचकार रहे थे। वह भी उनकी नकल करती माँ के पेट पर चुम्बन दे बड़े प्यार से कहती..मेरा छोटा सा भाई कब आएगा पापा? पिता उसे गोद में उठा घूमाते और कहते जल्दी ही माँ अस्पताल से लेकर आएगी।
स्नेह की रसभरी डोर जिसे सौम्या बार -बार थामने की कोशिश करती ...अतित के पन्ने टटोलती ,उतनी ही बेचैनी बढ़ती जाती।पेट में शिशु करवटें बदलने लगा था....वह चाहती अमित को बताए कि उनका बच्चा अब महसूस कर सकता है उनका स्पर्श।वह चाहती कि पति पेट में चलते हुए बच्चे से बतियाए ...पर sss अफसोस कि उसे अपनी भागती दुनिया से इतर सब कुछ बस निबटाउ काम लगता।अॉफिस से लौट लैपटाप ले बैठ जाता....टोकने पर अॉफिस का जरुरी काम कह नाराजगी जताता।वहाँ से निबट मोबाईल ले बैठ जाता ...सौम्या के नाराज होने पर छत पर चला जाता।ये एक लाईलाज बीमारी बनती  जा रहा थी।सोते ,बैठते ,खाते यहाँ तक कि बाथरुम में भी मोबाईल साथ रहता। सौम्या की उब बढ़ती जा रही थी....।स्कूल से लौट वह अकेली अपनी दुनिया में इस कदर उबन महसूसने लगी थी की घर में दम घूटने लगा ।भाग कर कभी पार्क में जाकर बैठती...कभी बाल्कनी तो कभी छत पर जाकर घण्टों सामने पार्क में खेलते बच्चों को निहारती।एक शूकुन भरी मुस्कान चेहरे पर फैल जाती और पेट पर हाथ रख वह घण्टों मन की सुकोमल बातें अजन्में बच्चे से करती छत पर टहलती रहती।एक दिन पड़ोसी सान्याल ने अमित से कहा भी....यार अमित!..भाभीजी की तबियत तो ठीक है न?
क्यों ,क्या हुआ उसे ?भली चंगी तो है।...उल्टे उसने ही सौ सवाल दाग दिए।
बुरा न मानना...लेकिन उनकी मानसिक हालत ठीक नहीं लगती,...मानषी कह रही थी की अकेले घण्टों छत पर बड़बडाती रहतीं हैं।टेक केयर यार!...किसी अच्छे .....
अभी उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी की अमित दनदनाता हुआ लिफ्ट की ओर भागा।दरवाजे पर लगातार दस्तक सुन सौम्या ने हड़बडा कर दरवाजा खोला...अमित का चेहरा गुस्से से लाल देख सहम गयी।
क्या हुआ,किसी से लड़ाई हो गयी?....वह डरी थी ... अमित अपना बैग सोफे पर पटक उबल पड़ा...बिल्ड़िंग वाले तुम्हें पागल कहने लगें हैं...समझी sssss
सुबह -सुबह सान्याल ने मूड खराब कर दिया..
सौम्या आवाक उसका मुँह ताकती रही। हुवा क्या?धीरे से पूछा।वह सीधे उसके मुँह के पास आकर खड़ा हो गया...अच्छा ये बताओ ,अकेले में छत पर क्या बड़बड़ाती होsss
उसकी आवाज बहुत ऊँची थी....इतनी की मन की सुकोमल परतें चटक जाऐं।वह रोते हुए बस इतना ही पेट पर हाथ रख कह सकी....बेबी सेss...और फूट -फूट कर रोने लगी। अमित अब भी चिल्ला रहा था...बेवकूफ ....अपनी ये सेण्टी हरकतें घर में किया करो।सोसाइटी में मेरी बैण्ड मत बजवाओ...प्लीज ।वह हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ा रहा था।आगे वह कुछ और कहता कि तभी मोबाईल बज उठा....सॉरी सर ...बस ssबस पहुँच रहा हूँ,...फोन पर कहते वह बैग उठा कर फूर्ती से बाहर निकल गया। 



                    घण्टो रोने के बाद सौम्या संयत हुई....सिर भारी हो गया था । मन घबड़ा रहा था ...वह किसी से कुछ कहना चाहती थी।दरवाजा खोल बाहर निकली...सामने की पड़ोसन अपना कुत्ता ले टहलाने ले जा रही थीं...हाय सौम्या! कहती मुस्कुराकर निकल गयीं।अगल बगल के फ्लैट से बच्चों के रोने की आवाज आ रही थी....माँ -बाप नौकरी पर निकल चुके थे ,आया टी.बी .चला कर बैठी अपने में मगन..उसकी घबराहट बढने लगी...दरवाजा लॉक कर लिफ्ट की ओर तेज कदमों से बढ़ गयी.....लिफ्ट की दीवार से सिर टिका आँख मूंद लिया....और जैसे तेज बवंडर उठा हो....लोग बेतहाशा भाग रहे थे....सरपट,....वह कुछ चेहरे पहचानती थी...पकड़ना चाहा और हाथ फिसल जा रहा था।अचानक एक झटके से लिफ्ट रुकी..सिक्योरिटी गॉड ने आवाज दी...मैड़म!
वह जेसे नींद से जागी हो,...जागी। बाहर निकल वह पार्क में एक पेड़ की छाया में आ बैठी। सामने कुछ घरों की आया बच्चों को झूला झूला रही थीं...कुछ गेंद खेल रहे थे।वह खेलते बच्चों को मुग्ध देख रही थी ....अचानक एक बच्चा गिर गया....घुटना छिल गया .बच्चा मम्माssss मम्मा कह रोए जा रहा था...उसकी आँखें भर आईं...आया ने उठा कर चुप करा वापस खेलने भेज दूसरी से बतियाने लगी।
               जाड़े की गुनगुनी धूप में खिले रंग -बिरंगे फूलों पर मंडराती तितलियों को देख सौम्या मन्द मुस्कान सहेजती कभी बच्चों को देखती ,कभी तितलियों को...चारों तरफ रंग और हरितिमा के बीच बच्चों की मोहक मासूम हँसी का कलरव ।वह जैसे परियों के देश में जा पहुँची...एक नन्हा फरिश्ता उसकी अंगुली थाम कर चल पड़ा हो फूलों की वादियों में.
सौम्याssss...अरे यार! तुम यहाँ बैठी हो और मैं पूरी बिल्ड़िंग में पागलों की तरह खोजता फिर रहा हूँ।अमित नाराज हो रहा था...उसकी आवाज में चिन्ता साफ झलक रही थी।तुम इतनी जल्दी लौट आए? 
हाँ,..मैंने आज अपनी बेगम के लिए छुट्टी ले ली है।हाथ पकड़ कर उठाते हुए...चलो जल्दी रेडी हो जाओ ...पिक्चर चलते हैं। जेब से टिकट निकाल कर दिखाते हुए।वह मुस्कुराकर उठ गयी। सौम्या का मन नहीं था पर अमित के अनुनय पर बेमन से तैयार हो चल पड़ी ।जानती थी आज अमित उसे लेकर परेशान है इस लिए ये सब कर अपनी गिल्टी दूर करना चाहता है।दोनों दिल्ली की भागती सड़कों से गुजरते मैट्रो स्टेशन पहुँचे। कार पार्किंग में लगा टिकट ले मैट्रो की प्रतीक्षा करने लगे...आज अमित गलती से भी मोबाईल हाथ में नहीं ले रहा था।सौम्या को देख कर खुशी हुई कि शायद अमित कुछ कुछ प्राब्लम समझ रहा है।सामने सर्रssss की आवाज के साथ मैट्रो रुकी ...एक जत्था निकला ,एक दाखिल हुआ। अन्दर भीड़ थी....एक लड़की सौम्या के उभरे पेट को देख कर अपनी सीट छोड़ उसे हाथ पकड़ बिठा दिया। सौम्या ने चारों तरफ नज़र दौड़ाई...लड़के, लड़कियाँ ,बूढ़े ,जवान से लेकर हाथों में गट्ठर लिए फेरी खोमचे वाले तक हाथ में मोबाईल लिए व्यस्त थे।उसे घुटन होने लगी...उसने अमित की तरफ देखा...बहुत देर से धैर्य रखे अमित भी हाथ में मोबाईल लिए टिपटाप करने में व्यस्त था।उसके चेहरे पर तरह तरह के भाव आ जा रहे थे..उसने नज़रें फेर ली ।बगल में बैठी लड़की गूगल पर ब्यूटी टिप्स सर्च कर रही थी।दूसरी शायद अपने प्रेमी से चैटिंग कर रही थी..रह-  रह कर चेहरे पर लाली फैल जा रही थी। सौम्या चारों तरफ बार -बार देखती और समझने की कोशिश करती ...जब सारी कोशिशें बेकार हो गयीं ,अचानक उसने अपना हाथ पर्स में डाल अपना फोन निकाल नेट आन कर गूगल पर टाईप किया....बेबी केयर टिप्स...एक एक कर ढ़ेर सारे  बुक ,विडियो के लिंक उभरने लगे।उसकी आँखें चमक उठीं...एक -एक को खोल देखने लगी।प्यारे -प्यारे बच्चों की मनभावन तस्वीरें देख उसके चेहरे पर बार- बार मुस्कान फैल जाती।वह खोई हुई थी...हाथ में मोबाईल ...स्क्रीन पर उभरती किलकारियों की अनुगूँज ..अमित ने देखा ....एक शुकून भरी लम्बी साँस ले उसने सौम्या के सिर पर हाथ रख पूछा....क्या देख रही हो?..बहुत दिनों बाद सौम्या के चेहरे पर पहले वाली मुस्कान लौटी...बेबी केयर टिप्स।....सौम्या चहकते हुए बता रही थी।राजीव चौक स्टेशन आने की उदघोषणा सुन सौम्या का हाथ थाम अमित ने उठने का आग्रह कर कहा चलो स्टेशन आ गया।
                सौम्या खड़ी हो गयी ...फोन अभी भी हाथ में था....पीछे मुड़ कर देखा।सबकी गर्दन मोबाईल में झूंकी हुई थी।मुस्कुराते हुए अमित को देखा और बाहर निकल आई।

सोनी पाण्डेय



सोमवार, 30 जनवरी 2017

वरिष्ठ कथाकार राजनारयण बोहरे की कहानी

राजनारायण बोहरे
जन्म
बीस सितम्बर उनसठ को अशोकनगर मध्यप्रदेश में
शिक्षा
एम0ए0हिन्दी साहित्य एवं लॉ तथा
पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक उपाधि
प्रकाशन
इज़्ज़त-आबरू , गोस्टा तथा अन्य कहानियां  और हादसा
( तीन कहानी संग्रह)
मुखबिर
(उपन्यास)
एवं किशोरों के लिए दो उपन्यास
साथ में
एक सौ से अधिक समीक्षा आलेख एवं
दो दर्जन व्यंग्य लेख
सम्मान
मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का बागीश्वरी पुरस्कार
एवं
साहित्य अकादेमी मध्यप्रदेश का सुभद्राकुमारी चौहान पुरस्कार
सम्पर्क
raj.bohare@gmail.com
205/11 विष्णुपुरी मैन, भंबर कुआ इन्दौर दूरभाष- 9826689939

राजनारायण बोहरे की कहानी
मलंगी

मैंने एक नजर चारों ओर देखा, तो पाया कि वहाँ केवल बच्चे ही नहीं थे, बल्कि मोहल्ले-भर की औरतें भी जुट आई थी।
बीजुरी वाली जीजी द्रवित होती हुई कह रही थीं, ” इस बेचारी ने जिंदगी-भर सबकी सेवा की है, जाने कौन-सा पाप हो गया कि ऐसे कष्ट भोगना पड़ रहे है। “
तुनककर जमुना बोली थी, ” पाप नही तो क्या था वो ? छिनारपना तो सबसे बड़ा पाप है। इसने तो सारे लिहाज तोड़ दिए थे, कुछ दिनों से । अब उसी की फल भोग रही है।”
बरोदिया वाली, मुँगावली वाली और टकनेरी वाली काकी ने जमुना की इस बात पर असहमति जताई थी और वे बीजुरी वाली जीजी की बात का समर्थन करने लगी थी। बच्चे भी चुप न थे, वे भी उसके गुण गाए जा रहे थे।
उसके, यानी कि मलंगी के!
मलंगी, यानी कि हमारे मोहल्ले की किसी एक की नही, सबकी पालतू कुतिया। धूसर रंग की, कद्दावर और भरपूर स्वस्थ इस कुतिया पर हम सबको नाज था।
मोहल्ले का हर बच्चा उसे सिर्फ अपनी कुतिया कहता था और इस मुद्दे पर परस्पर झगड़ बैठते थे। ऐसे ही एक बार मेरा पिक्कू से झगड़ा हो गया था। पिक्कू ने मुझे टोला मारा, तो मँझले भैया ने उसमें लठिया हँचाड़ दी थी। इधर हम उसके लिए लड़ रहे थे, और मलंगी किसी मस्त मलंग की तरह बच्चों के साथ खेल रही थी।  मलंगी की माँ चम्पी भी हमारे मोहल्ले की प्यारी कुतिया थी, तब मलंगी बहुत छोटी थी कि उसकी माँ चम्पी एक दिन नगरपालिका वालों के परोसे गए जहर के गुलाबजामुन खा गई। शाम तक चीखती हुई देह त्याग गई और मलंगी अनाथ हो गई थी। हम सब लोगों के मन में अनायास ही मलंगी के लिए वात्सल्य उमड़ आया था।
मलंगी का मामा ‘ टीपू ‘ कद्दावर नस्ल का बड़ा फुर्तीला कुत्ता था। पर वह उन दिनों बूढ़ा हो चला था, सो खारे-कुआँ को लाँघ जाने की कला का प्रदर्शन उसने बंद कर दिया था। हम बच्चे इससे कुछ निराश से थे। क्योंकि हमारे मोहल्ले का खारा कुआँ दस फीट चौड़ा कुआँ था, जिसे एक ही छलाँग में लाँघ जाने का कौशल टीपू ने जाने कब प्राप्त कर लिया था। जब भी मोहल्ले के बाहर का कोई बच्चा आता, हम लोग टीपू को दौड़ाते हुए कुआँ तक लाते और लाँघ जाने को उकसाते। टीपू सहज रूप से कुआँ लाँघ जाता।  यह हमारे लिए बड़े गर्व की बात थी। फिर एक दिन टीपू मर गया तो हमें लगा कि टीपू के साथ ही यह कला भी समाप्त हो जाएगी।
किसन और मुन्ना ने एक दिन यह कला मलंगी को सिखाना शुरू किया, तो सब बड़े खुश हुए थे। बाद में एक दिन मलंगी को भी यह कौशल प्राप्त हो गया, तो हम सब बच्चे फिर से गौरवान्वित हो उठे थे। अब हम फिर से दूसरे मोहल्लेवालों और बाहर के मेहमानों के सामने मलंगी का यह कौशल दिखाने लगे थे।
मलंगी धीरे-धीरे तगड़ी होती जा रही थी और उसी अनुपात में उसकी आवाज में क्रूरता बढ़ रही थी। वह दिन-भर यहाँ-वहाँ सोती हुई दिखती, पर रात को पूरी निष्ठा से जागकर मोहल्ले की चौकीदारी करती। वह भूल जाती थी, कि हम लोग कितने निष्ठुर हैं, जो दिन में उस पर लाड़ दिखाते है और रात में बाहर निकाल देते है, चाहे झमाझम पानी हो चाहे कड़ाके की जाड़ा।
एक रात किसन के घर की बाहरी दीवार मे कोई बदमाश सेंध लगाने के चक्कर में था, कि मलंगी ने दबे पाँव आकर उसका हाथ उपने जबड़े में ले लिया था। पता नहीं कैसे वह उठाईगीरा अपना हाथ छुड़ाकर भागा, लेकिन मलंगी ने भौंक-भौंक कर पूरा मुहल्ला जरूर जगा दिया था। दिवार के पास पड़ी सब्बलिया, जमीन पर फैली खून की बूँदें और दीवार में बनाया गया छोटा-सा छेद मलंगी की चौकसी की दास्ताँ बयान कर रहा था। हम स ब फिर मलंगी के कृतज्ञ हुए थे।
सितंबर का महीना आया, तो जाने कहाँ- कहाँ से ठट्ठ के ठट्ठ कुत्ते हमारे मोहल्ले के चक्कर काटने लगे थे। वे सब मलंगी के इर्द-गिर्द लम्बी अपनी लम्बी जीभ लटकाते घिरे  करते थे। हम सब बच्चे दहशत में थे, लेकिन मलंगी बड़ी निश्चिंत और लापरवाह-सी दीखती थी, उलटे इतराती थी। खामख्वाह किसी भी कुत्ते पर खोंखिया  बैठती, और देर तक भौंकती रहती। हमारे मोहल्ले के बुजुर्गों को इन दिनों मलंगी बड़ी दुश्मन-सी लगती थी। वे पाराशर मोहल्ला के कल्ला कुत्ता, रूसल्ले के नीचे के पंगा और पुराने बाजार के मोती कुत्ता से तो पहले से ही नाराज थे, जो कि रात-बिरात अकेले निकलते किसी भी यात्री को नोचने-खसोटने को उद्यत रहा करते थे। ऐसे बिगड़ैल कुत्तों को अपने मोहल्ले में भला कौन पसंद करता सो जिसका मौका लगता ऐसे कुत्ते को ठोंक ही देता उनके साथ कभी कभी मलंगी मे भी लठिया पड़ जाती थी।
फिर एकाएक सारे कुत्ते गायब हो गए। बीजुरी वाली जीजी ने प्रसन्न होते हुए सिरोंज वाली चाची को बताया था कि मलंगी अब गर्भवती है, जल्दी ही पाँच-छः पिल्लों को जन्म देगी।
यह सूचना हमारी मंडली के लिए बड़ी आल्हादकारी थी, हम सबको पाँच-छः खिलौने जो मिलने जा रहे थे। हम सबने अपने -अपने घरों मे प्रसव के लिए सुरक्षित कोने तलाश कर लिये थे और वहाँ मलंगी को घुमा भी लाए थे। मोहल्ले की सारी औरतें और बच्चे व्यग्रता से मलंगी की प्रसव पीड़ा की प्रतीक्षा कर रहे थे। हम सबने उसके संभावित प्रसूतिगृहों में रोटियाँ इकट्ठी करना शुरू कर दिया था। कहावत है, कि प्रसव के तुरंत बाद कुतिया को भूख लगती है और ऐसे में वह अपना एकाध पिल्ला खा जाती है। हम नहीं चाहते थे कि मलंगी का एक भी पिल्ला कम हो, इसलिए मलंगी की प्रसवोत्तर भूख के लिए पर्याप्त खाना जुटाने के बाद हम निश्चिंत थे।
प्रसव के लिए मलंगी ने बीजुरी वाली जीजी का घर चुना। छः पिल्लों को जन्म दिया उसने। बीजुरी वाली जीजी बड़ी खुश हुई, और उन्होंने हम बच्चों को इस उपलक्ष्य में एक दावत दे डाली थी।
हम लोग सुबह-शाम मलंगी के पिल्लों को देखने जरूर जाते थे। नर्म, गुदगुदे और नन्हे-नन्हे वे पिल्ले हम सबको बड़े प्यारे लगाते थे। बीजुरी वाली जीजी ने बताया कि मलंगी उन बच्चों को दूध नहीं पिलाती थी, इससे बच्चों के बचने की गुंजाइश बहुत कम था। यही हुआ। रूई के फोहों से उन पिल्लों को बचा। बच जाते तो सभी अच्छे कुत्ते बनाते, क्योंकि हरेक पिल्ला बीसा था। यानी कि बीस नाखूनों के साथ जन्म लिया था, हरेक पिल्ले ने।
फिर कई सालों तक ऐसा ही हुआ, पिल्ले ऐसे ही जन्म लेते और ऐसे ही म जाते। हम लोगों को बहुत दुःख होता, बीजुरी वाली जीजी तो रोती भी थी। पर मलंगी इस सबसे बड़ी बेपरवाह थी। मस्जिदवाले मौलवीजी कहते थे- इसका तो नाम ही मलंगी है। मलंगी यानी कि मस्त मलंग-सी रहनेवाली मादा। सचमुच मस्त मलंग की ही तरह तो थी मलंगी। मोहल्ले के लोग उसे आवारा भी कहते थे, तो कोई सड़क छाप कुतिया भी कहने से न चूकते। पर उसको कोई फर्क न पड़ता, वह सबके प्रति वफादार थी।
मलंगी की वजह से हमारे कभी बाहर से कोई आवारा और खूँखार जानवर नहीं आ पाया। अपने नुकीले पंजे, तीखे दाँत और क्रूर आवाज से वह घुसपैठिए में दहशत पैदा कर देती थी। लेकिन उस बार एक ऐसा प्राणी हमारे मोहल्ले में घुस आया, जो जमीन पर नहीं, मकानों और पेड़ों पर छलाँग लगाता था। इस कारण उसको मलंगी का भी बिलकुल भय न था।
काले मुहँ का एक लंगूर जाने कहाँ से भटक कर हमारे मोहल्ले में आ धमका था और सबकी नाक में दम किए था। वह धड़ाधड़ छप्परों पर कूदता, हमारो कबेलू फोड़ता, छतों पर सूखते अनाज-दालों को बर्बाद करता और अचार तथा मुरब्बों के मर्तबान भी फोड़ डालता था। सब परेशान थे और उससे निपटने के नए-नए उपाय खोज रहे थे।
अभी बीसेक दिन पहले की बात है, कल्याण ने लंगूर को एक नीचे से छाप्पर पर बैठा देख मलंगी को भी उठाकर ऊपर बैठा दिया था और मलंगी को लंगूर पर छू कर दिया था। मलंगी लंगूर पर झपटी तो लंगूर यह जा और वह लंगूर तो लंगूर ही था, वह एक डाल पर चढ़ा और दूसरी से होकर एक बड़ी ऊँची छत पर जा पहुँचा। मलंगी बेचारी नीचे बैठी टाँपती रह गई थी और वह ऊपर बैठा दाँत दिखा रहा था।
फिर तो दो दिन तक ऐसा ही खेल चलता रहा। मलंगी नीचे बैठी रहती और वह ऊपर बैठा अपन अजीब-अजीब करतब करता रहता।
मोहल्लेवालों के साथ लंगूर का बर्ताव अब बड़ा उग्र हो गया था। अकेले-दुकेले निहत्थे आदमी को देख वह अब हमला भी करने लगा था। जो कुछ हाथ में मिलता, छीन लेता। कोई खाली हाथ होता, तो लंगूर जी - भर के नोचता - खसोटता और झट से ऊपर चढ़ जाता। कभी-कभी वह लोगों के आँगन में उतर आता, और जो हाथ पड़ता, ले भागता।
एक दिन और अजूबा दिखा, लंगूर ऊपर छप्पर पर बैठा हुआ किसी के घर से उठाया गया रोटी गपक रहा था और नीचे बैठी मलंगी ऊपर मुहँ किए टुकुर-टुकुर उसे ताक रही थी। एकाएक लंगूर ने एक रोटी उठाई और मलंगी की ओर उछाल दी। एक-दो मिनट तक मलंगी कभी दायीं तो कभी बायीं आँख ऊँची करके रोटी को देखती रही, फिर उठी और सूँघ के मानो उसकी शुद्धता की पड़ताल की, फिर बड़े प्यार से छोटे-छोटे टुकड़ों में स्वाद के साथ पूरी रोटी चबा गई।  उस एक रोटी ने उन दो विजातीय प्राणियों के बीच मैत्री की शुरूआत कर दी।
अब लंगूर जो कुछ भी छीनता, बड़ी ईमानदारी से मलंगी को हिस्सा देता। अ बवह नीचे भी उतर आता और मलंगी के ऐन बगल मे आकर बैठ जाता। उसके शरीर में से जुएँ बीनता। मलंगी अपनी लंबी निकाल लंगूर की पीठ चाटने लगती।
हम लोग बड़े बेबस और हैरान थे, कि अब इसके विरूद्ध किसे भिड़ाएँ। इसने तो हमारा ही एक सदस्य तोड़कर अपने साथ मिला लिया। मोहल्ले के बुजुर्ग अब दिन-रात मलंगी को गरियाते रहते जो नोचने-खसोटनेवाले जंगली लंगूर से दोस्ती कर बैठी थी। हमारे घर-आँगन तक निर्द्वंद्व रूप् से घुस आनेवाली मलंगी हम सबको लंगूर के असर के कारण बदली-बदली नजर आने लगी थी। हमारी गहरी आत्मीय रही मलंगी को ये क्या सूझा था कि वह बाहरी परिवेश के प्राणी को अपना मान बैठी थी।
मोहल्ले की औरतें मलंगी को बदचलन, धोखेबाज, आवारा, नकटी, छिनाल और न जाने क्या-क्या बदनाम उपाधियाँ दे रहीं थीं, जबकि मलंगी लंगूर के साथ बहुत मस्त थी। दोनों दौड़ते हुए किसी भी दिशा में चले जाते, फिर घड़ी-दो घड़ी बाद हाँफते-काँपते लौटते। उनकी आँखों में मादक चमक होती और हरकतों में भरी होतीं खूब-सी चुहलबाजियाँ। कभी वे दोनों छप्परों पर चढ़ जाते, तो एक मकान से दूसरे पर होते हुए तड़ज्ञतड़ कबेलू चटकाते फिरते। लंगूर तो भाग जाता पर मलंगी को ताड़ना मिलती। हम सबको मलंगी में भारी परिवर्तन दीखने लगा। लंगूर के साथ रहने के कारण अब उसमे बिना बात भौकने, हमला करने और खूब लंबी दूरी के छप्परों पर छलाँग लगाने की प्रवृति आ गई थी।
आज सुबह की बात है।  नगरपालिकावाले कुत्ता पकड़ने का पिंजरा लेकर हमारे मोहल्ले मे घुसे। वे लंगूर को पकड़ने आए थे। हम बच्चे चिंतित थे कि लंगूर के चक्कर में मलंगी को भी न घेर लिया जाए। पिंजरे को एक बनाके रख दी, फिर मोहल्लेवालों से कहा था, कि अपने-अपने छप्परों और छतों पर खड़े होकर लंगूर को हड़काओ। सब लोग लाठी लेकर अपने घरों के ऊपर चढ़ गए और लंगूर को बिदकाने लगे।
लंगूर ने यह नजारा देखा तो वह घबरा गया और हड़बड़ाकर एक और को भाग निकला। मलंगी उसके पीछे-पीछे थी। बदहवास होकर भागता लंगूर मोहल्ले  के दायीं ओर मौजूद तिलौआ बाग की ओर बढ़ने लगा था। इसी क्रम मे उसने जमुना की अटारी से मोहन की अटारी पर छलाँग लगाई, फिर नीम की डाली पकड़ी व उस पर चढ़कर उस ओर को लपक गया था। इधर उसका अनुकरण करती मलंगी भी उसी जोश में दौड़ती हुर्इ्र आई और जमुना की अटारी से मोहन की अटारी के लिए उछल पड़ी थी। पर लंगूर, लंगूर ही होता है और कुत्ता, कुत्ता। बीस फीट की ऊँची जमुना की अटारी से तीस फीट ऊँची मोहन की अटारी के छप्पर पर दस फीट की  गली फाँदकर छलाँग लगाना मलंगी के लिए भला कहाँ संभव था! सो अपनी ही झोंक में मलंगी उछल तो गई, मगर छप्पर तक पहुँचने के बजाय वह मोहन की दीवार से टकरा बैठी और दीवार पर रिसकती हुई, नीचे पक्की गली में आ गिरी थी।
गिरते ही उसने आर्तनाद किया था, जिसे सुन अपने-अपने घरों में बैठे हमस ब बच्चे चौंक उठे थे और आनन-फानन में नीमतले जुट आए थे। बच्चे ही नहीं औरतें और पुरूष भी एकत्रित हो गए थे वहाँ।
तब से सब लोग मलंगी को ही घेर के बैठे है। मेरी तंद्रा टूटी तो मैंने मलंगी को तड़पते ही पाया।
हमारे मोहल्ले में ढेर-अस्पताल के एक कंपाउंडर वर्माजी भी रहते है। अचानक बीजुरी वाली जीजी को यह ख्याल आया, तो उन्होंने सबको याद दिलाया। फिर क्या था ? सात-आठ बच्चों के साथ पिक्कू के दादा वर्माजी को बुलाने चल दिए।
वर्माजी ने शायद घर पर ही पूरा किस्सा सुन लिया था, सो वे अपने साथ दवाइयों का बैग लिये चले आए।
पाँच मिनट तक वे मलंगी के शरीर पर हाथ फेरते रहे, फिर अपना बैग खोला और एक इंजेक्शन निकाल लिया। सिरिंज में एक पीला-सा द्रव भर के उन्होंने मलंगी के कूल्हे में इंजेक्शन की सूई ठूँस दी। सूई बाहर निकाल के रूई से पोंछकर वे बैग में रखते-रखते रूक गए, और कुछ सोचते हुए से एक शीशी और निकाल ली। दूधिया रंग का वह पदार्थ दुबारा इंजेक्शन में भर के वर्माजी ने एक बार और मलंगी को इंजेक्ट किया, फिर बीजुरी वाली जीजी से वोले, ‘‘चिंता मत करो जीजी, मलंगी ठीक हो जाएगी। दरअसल ऊपर से गिरने की वजह से इसकी कुछ पसलियाँ टूट गई है। उनमें दर्द हो रहा होगा और गिरने की दहशत भी होगी, इस वजह से रो रही है। मैनें इंजेक्शन लगा दिया है, अब आराम से सोएगी ये कल तक। कल दर्द भी कम हो जाएगा और इसका डर भी खत्म हो जाएगा।‘‘
हमने संतोष की साँस ली। उधर नगरपालिकावालों ने लंगूर को पकड़ लिया था। इधर अगले चौबीस घंटे मलंगी सोती ही रही। बीजुरी वाली जीजी उसे उठवाकर अपने घर ले गई थी, सो हम बच्चे दूसरे दिन सुबह वहीं इकट्ठे हुए। वहीं बैठे-बैठे दोपहर ऐसे ही बीत गई ।
यकायक मलंगी ने अँगड़ाई ली, तो हम उत्सुक हो उसे निहारने लगे। उसने आँखें खोंली, सिर उठाया, और हमें देखकर भू-भू के प्रेमभरे स्वर में आलाप लिया। मह बच्चे प्रसन्न हो उठे थे।
मलंगी ने दो-चार दिन के बाद दुबारा चलना-फिरना शुरू किया तो वह बिलकुल बदली हुई-सी नजर आई। अब वो बीचवाली मलंगी न थी बल्कि वही पुरानी मलंगी थी, जो हमारे मोहल्ले की चौकीदार थी, हर घर की सदस्य थी और हम बच्चों की प्यारी सखी थी। वह अपने अंदाज में घर-घर पहुँचकर अपना हिस्सा पाने लगी और पूर्ववत् रात को अपनी ड्यूटी निभाने लगी।
पता नहीं लंगूर उसकी यादों में शेष था या नहीं, पर हम सब एक दुःस्वप्न की तरह लंगूर को भूल चुके थे।
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राजनारायण बोहरे
205/11 एकता अपार्टमेंट, विष्णपुरी मैन
भंवर कुंआ इन्दौर म0प्र0 452001