शनिवार, 25 अक्टूबर 2014


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नाम - राधा श्रोत्रिय"आशा"
जन्म स्थान - ग्वालियर

शिक्षा - एम.ए.राजनीती शास्त्र,
एम.फिल -राजनीती शास्त्र
जिवाजी विश्वविध्यालय ग्वालियर
निवास स्थान - आ १५- अंकित परिसर,राजहर्ष कोलोनी,
कटियार मार्केट,कोलार रोड
भोपाल
Mobile no. 7879260612
सर्वप्रथमप्रकाशित रचना..रिश्तों की डोर (चलते-चलते) ।
स्त्री, धूप का टुकडा , दैनिक जनपथ हरियाणा ।
..प्रेम -पत्र.-दैनिक अवध
लखनऊ । "माँ" - साहित्य समीर दस्तक वार्षिकांक।
जन संवेदना पत्रिका हैवानियत का खेल,आशियाना,
करुनावती साहित्य धारा ,में प्रकाशित कविता - नया सबेरा.
मेघ तुम कब आओगे,इंतजार. तीसरी जंग,साप्ताहिक ।
१५ जून से नवसंचार समाचार .कॉम. में नियमित ।
"आगमन साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समूह " भोपाल के तत्वावधान में साहित्यिक चर्चा कार्यक्रम में कविता पाठ " नज़रों की ओस," "एक नारी की सीमा रेखा" 


राधा जी आज कविताओं के क्षेत्र में कोई नया नाम  नहीं हैं,नियमित रूप से उनकी रचनायें प्रकाशित हो रही हैं  राधा जी की कवितायों में गहराई है।उनमे  नारी मन का दर्द परिलक्षित होता है की कैसे एक नारी पति -बच्चों की खातिर त्याग पर त्याग करती जाती है और खो जाती है उसकी पहचान उसकी हँसी। ............. हर कविता भावों में डुबोती है तो आइये आज गाथांतर के ब्लॉग पर पढ़े राधा जी की कवितायेँ 



***#*** आईने मैं कैद ***#***
हैराँन हूँ........
कुछ ढ़ूढ रही हूँ,
खो गयी है जो मुझसे कहीं!
मेरी हँसी..........
तेज रफ़्तार वक़्त मैं,
सबकी खुशियों की खातिर,
कहीं छूट गयी है मुझसे!
मेरी हँसी...........
पर कहाँ ???
खोज रहीं हूँ मैं!
जिनकी खुशियों की खातिर ,
ताउम्र भागती रही मैं!
मेरा घर, पति,बच्चे,
मेरे अपने,
इन सबमें गुम हो गयी है!
मेरी हँसी........
शिकायत है आज,
उन्हें ही मुझसे!
पति बात - बात पर ,
उलाहना देते हैं !
क्या हुआ है ,
तुम्हें
कितनी चिढ़-चिढ़ ,
करती हो,
आजकल!
हैराँन रह जाती हूँ मैं,
खोजती हूँ !
मेरी हँसी........
सोचती हूँ ???
जो कल तक कहते थे,
खुशियों के फूल झरते हैं ,
बातों से तुम्हारी!
नहीं समझ पाती कि किसे,
क्या हुआ है!
आज तक सब,
इन्हीं की खुशियों के खातिर ,
ही तो किया!
पर वो खुश नही मुझसे,
क्यों ???
और अब तो बच्चे भी!
जिन्हें बड़ा कर संस्कारों की,
दौलत से सींचने मैं,
खुद का असतित्व ,
ही भुला बैठी!
सिमट रह गयी ,
"पत्नी"और "माँ" मैं!
न अपनी कोई ख्वाईश न,
कोई चाहत!
वो तो इन सबमें ही,
सिमट रह गयी!
माँ आप इतना गुस्सा,
क्यों करती हो!
क्यों करती हो,
आप काम!
जब आपसे नहीं होता!
समझ ,
नहीं पाती क्या,
जबाब दूँ!
इनकी खुशियों के लिये तो,
मैं सब कर रही थी!
फ़िर भी खुश नहीं,
क्यों करती हूँ मैं ?
ये सब!
सोचा अपने लिये,
कुछ वक्त निकालूँ!
खोज लूँ अपनी,
"हँसी"
सबकी खुशियों को,
सहेजने मैं ,
जो कहीं छूट गयी मुझसे!
ढ़ूढ़ा...सब जगह,
तलाश लिया पूरा घर!
याद आया स्टोर रूम,
जहाँ मेरा पुराना आईना था!
जब उसमें अपना चेहरा
देखती,
शरमा जाता था,
मेरी हँसी से वो!
ऐसा मेरे पति,
पहले कहते थे!
इसी मैं कैद है मेरी हँसी...
फ़िर से इसे अपने कमरे मैं,
लगा लेती हूँ!
देखूँगीं रोज इसे,
लौट आयेगी मेरी हँसी!
मेरे पास.......
हैराँन हूँ........
कुछ ढ़ूढ रही हूँ,
खो गयी है जो मुझसे कहीं!
मेरी हँसी..........
...राधा श्रोत्रिय"आशा

******** दर्द- ऐ -दिल **********
मेरे दर्द- ऐ -दिल की सदा,
किसी ने सुनी नही !
मेरे रिसते जख्मों पर मरहम,
किसी ने रखा नहीं !
जलती रही तुम्हारी याद की ,
अगन में ता-उम्र !
तुमने अपने एहसास कि औंस से ,
मुझे छुआ तक नहीं !
मिट गये जिसके खातिर हम ,
उसे हमारी खबर तक नहीं !
किससे करें हम शिकवा कि कोई,
दर्द- ऐ -दिल की सुनता नही!
आँसू भी न रहे अब आँख में देखो,
धड़कन कि हमें कुछ खबर नहीं !
कैसा हमारा नसीब कि देखो ,
काँटों में भी चुभन नहीं !
इस कदर सताया है जमाने ने हमें,
कि शहद में भी हमें खार ही मिली !
क्यों है जालिम इतनी ये दुनियाँ,
हमारे जज्बातों का भी मोल नहीं!
दफ़न कर दिया हर एहसास ,
जिसकी खातिर हमने !
हमारी वफ़ा पर उसे अब ,
एतबार तक नही !
टूट रहा भरोसा अब खुद से ही,
किस तरह जियेंगें,खुद खबर नहीं !
मेरे दर्द- ऐ -दिल की सदा,
किसी ने सुनी नही !
मेरे रिसते जख्मों पर मरहम,
किसी ने रखा नहीं !
...राधा श्रोत्रिय"आशा"

***एहसास***
१ .किसने देखा है कल को
किसको खबर है पल की
जिनको नहीं एहसासों
की कीमत
वो क्या समझेंगे तड़प
किसी के दिल की .

२.बहुत आसाँन है
ऊँगली उठाना किसी पे
अपने गिरेंबाँ मैं झाँकना
उतना ही मुशकिल है .

३.बहुत आसाँन है
दम भरना मोहब्बत का
पर करके निभाना
उतना ही मुशकिल है .

४.यूँ तो आसाँन नहीं
होता सफ़र जीवन का
पर हमसफ़र मनचाहा हो
तो फ़ूलों भरी ड़गर है .

५ .जीवन के सफ़र मैं
मिलते तो हैं
हमराह अकसर
पर जो दिल मैं बस जाये
वही सच्चा हमसफ़र है .


*****ज़ख्म *****
तुम्हारे दिये,
ज़ख्म ही....
अब
मकसद हैं,
मेरे जीने का!
और
किसी दर्द का,
असर,
अब मुझे
नहीं होता!
कर याद तुम्हें,
हरा ,
कर लेती हूँँ!
तुम्हारे दिये,
जख्मों को!
मरहम ,
बन जाती है!
मेरे लिये,
तुम्हारी याद !
अज़ीज़
होते हैँ जो ,
जाँ से ज्यादा!
बेहद ,
खास होती है!
उनकी,
दी हर चीज़!
हमें भी हमारे,
ज़ख्म,
जाँ से ज्यादा,
अज़ीज़ हैं!
इसमें तुम्हारी,
यादें जो हैं!
भूलना,
नहीं चाहते है,
हम जिन्हें!
बहुत अज़ीज़ हैं हमें,
प्यार मैं मिलें ,
ज़ख्म भी...

*****प्यार (एक एहसास) ******
तेरे प्यार को ही मेंने,
अपना ,
खुदा बनाया है!
दुनियाँ की हर शै मैं ,
मुझे तू ही ,
नजर आया है!
जब भी दुनियाँ की ,
भीड़ से,
दिल मेरा घबराया है!
अपने
ख्यालों मैं ,
तेरेएहसास से
मेंने ,
दिल को बहलाया है

" दिल"
जब तन्हाँ बैठे तो ,
तुम्हारा ख्याल आया,
और दिल भर आया!!
हमारी नजरों की ,
ओस से भीगी,यादें !!
दर -परत-दर,
खुलती चली गई,
और दिल भर आया!!
जो अफ़साने,
अंजाम तक न पहूँचें,
और दिल में ही ,
दफ़न हो गये!!
जेहन में,
दस्तक दे उठे!!
वो एहसास फ़िर ,
मचल उठे,
और दिल भर आया!!
बहुत कोशिश की
दिल के बंद,
दरवाजे न खोले!!
पर नाकाम रहे,
जो वादा तुमसे ,
किया था ,
वो टूट गया,
और दिल भर आया !!
…राधा श्रोत्रिय “आशा ”

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014

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नाम :रुचि भल्ला जन्म :25 फरवरी 1972 शिक्षा : बी. ए. बी .एड. प्रकाशन: विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में कवितायें प्रकाशित (परिकथा में प्रकाशित) प्रसारण : इलाहाबाद -पुणे आकाशवाणी से कवितायें प्रसारित कवि -सम्मेलन सम्पर्क: एम -506 सिसपाल विहार, सेक्टर-49 गुडगाँव -122018 हरियाणा मो .09560180202 ई. मेल ruchibhalla72@gmail.com


आत्म कथ्य
जब मुझे लगता है कि किसी बात पर अपने तरीके से कुछ कहना चाहिए तो मेरी लेखनी चल जाती है और कोरे कागज़ पर कविता की सूरत में बदल जाती है।मेरे लिए कविता दुखों से साक्षात्कार और सुखों से अनुभव है।सांसारिक, राजनैतिक, प्राकृतिक और मानसिक संवेदनाओं की अभिव्यक्ति से शब्द पुंज का सृजन करना ही मेरे लिए कविता लिखना है।


रूचि भल्ला जी छोटी -छोटी कवितायें लिखती हैं पर उसमें गहरे भाव पिरोना उनके लेखन की खूबसूरती है ,विभिन्न परिस्तिथियों  का वह सहज ,सूक्ष्म अवलोकन कर उन्हें अपने अनोखे अंदाज़ में प्रस्तुत करती हैं। तो ............. आइये आज गाथांतर के ब्लॉग पर उनके रचनायों का आनंद ले ………… 







1) एक बात
एक बात कहूँ
यहाँ कत्ल सिर्फ़ उसका ही नहीं होता
जो आया है संसार में
हत्या उसकी भी हो जाती है
जो अजन्मा है संसार में
राज़ की ये बात जानती हैं
घर -घर की चश्मदीद दीवारें
जो सुनती हैं
कंठ में घुटती सिसकियों को
अजन्मी कराहती आहों को
पर हत्या की गवाही नहीं दे सकतीं


2) उसके सवाल
जब उसने किया सवाल
मुझे कब दिखलाओगी
वो बीते बरस की गौरेया-मैना
सूरज के संग भोर का
गाना गाती भूरी चिड़िया
गिल्लु क्या सिर्फ़ कहानी में है
किधर उड़ गया कठफोड़वा
चारों ओर जवाब तलाशा मैंने
फिर हाथ थाम कर बोली मैं
एक शर्त पर मिलेंगे वे सब
सृष्टि ले अगर जो पुनर्जन्म



3) वो गोरा -चिट्टा बच्चा
चमचमाती कार में
बैठा हुया
वो गोरा-चिट्टा बच्चा
जब भी खेलने जाता है
बीच रास्ते में
झुग्गी के सामने
उसे दिखते हैं
अपनी माँ के संग खेलते
कई फटेहाल बदरंग बच्चे
गोरा चिट्टा बच्चा
मुड़-मुड़ कर उनके
खेल देखता है
कार
आया को साथ लिए
पार्क की ओर मुड़ जाती है



4) मलबा
घर से थोड़ी दूर
बस चौराहे के पहले
एक मंदिर था कई सालों से
मेरी आदत में शामिल था
उस मंदिर से रोज़ मिलना
कुछ रोज़ हुए मैंने देखा
अब मंदिर नहीं
वहाँ मलबा है
अब जब भी गुज़रती हूँ उस राह से
उस ओर देखने की आदत
बदलती नहीं
मस्तक खुद ब खुद झुक जाता है
और दृष्टि अटक जाती है जाकर
मलबे के उस ढेर में


5) पेड़ों से मुलाकात
बहुत ज़रूरी है सिखलाना
बच्चों को अक्षर ज्ञान
लेकिन उससे कहीं ज़रूरी है
बच्चों की करवायी जाए
पेड़ों से मुलाकात
वहाँ घनी छाँव के नीचे
बिठा कर उन्हें
पहले सिखलाया जाए
कैसे बनी है
'क' से कलम
'क' से काॅपी
'क'से किताब



6) गहरी नींद
जब छोटी थी
दादी हर रात
कहानियाँ सुनाती थी
और मैं सुनते सपनों में खोते
मीठी नींद सो जाती थी
अब न दादी है
न कोई कहानी
मैं फ़िर भी सो जाती हूँ
दिन थका देता है
रात सुला जाती है
गहरी नींद



7) ईश्वर मौन रहा
खामोश रहा ईश्वर
जब मैंने पूछा
प्रभु !
तुमने जगत बनाया
फिर यह मिथ्या क्यों
क्यों तजने को कहा
अपने ही बसाये संसार को
मृत्यु क्यों दी
जीवन देने के बाद
क्यों तोड़ा अपने ही
आस-विश्वास को
बिल्कुल मौन
बस देखता रहा
सन्नाटे से भरा
अपना नीलाम्बर

8) झरना
उसकी वो
कुँवारी हँसी
प्रेमपगी खिल-खिल हँसी
झर - झर झरने सी
वो हँसती जाती
मैं भीगता जाता
आज कई बरसों बाद
अचानक वो दिखी
देखते ही खिल-खिलाई
और मैं उसे देखता रहा
सुनता रहा
उसकी हँसी
खोजता रहा
वो झरना
जिसमें भीगता था कभी



9) राजपथ को गयी लड़की
पीपल का पेड़
रहता होगा उदास
तेरे घर की खिड़की को रहती होगी
तेरे आने की आस
छत पर टूट-टूट कर बिखरती होगी
धूप की कनी
जहाँ तुम खेला करती थी नंगे पाँव
चाँद को आती होगी तुम्हारी याद
घर का कोना होगा खाली
तुम्हारे होने के लिए
एक रात मेरी नींद में उतर कर
मेरे राष्ट्रध्यक्ष ने बतलाया
तारकोल का काला - कलूटा राजपथ
रोता रहा कई दिन कई रात
तुम्हें निगलने के बाद



10) सुनो! तुम
जब कोई भूखा
दे तुम्हें दो रोटी के लिए दस्तक
सुनो !तुम दरवाज़ा न खोलना
कोई फायदा नहीं इसमें
लेकिन हाँ!  याद से हर
पूर्णिमा-अमावस्या
पंडित जी को ससम्मान न्यौता भेजना
जी भर खिलाना
नकद-कपड़ा भी देना
वो देगा तुम्हें ढेरों आशीर्वाद
तेरे पुरखों की आत्मा रहेगी तृप्त
और तेरा घर भी रहेगा सदा
धन- धान्य से भरा.

- रुचि भल्ला

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014


                                    चालीस पार की औरतें 




जन्म लेने से मृत्यु तक  हम सीढी दर  सीढ़ी चढ़ते हुए  हर वर्ष उम्र की एक पायदान ऊपर चढ़ जाते हैं परन्तु कुछ पड़ाव ऐसे होते हैं जिनका हमारे तन -मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है इसी में एक पड़ाव है उम्र का संध्या काल यानि ४० के वय  के पार का समय।बचपन मीलों दूर पीछे छूट गया ,बुढ़ापा  अभी दूर है। …………  बालों में सफेदी झाँकने लगी है ,विचारों में परिपक्वता आनी शुरू हो  गयी है।जरा -जरा सी बात में उत्तेजना नहीं आती ,मन शांत रहने लगा  है।  यू तो चालीस पार का समय स्त्री पुरुषों दोनों के लिए एक अलग अहसास ले कर आता है ,पर स्त्रियों पर इसका असर कहीं ज्यादा है  ………इसका कारण  स्पष्ट है.……… बच्चे बड़े हो गए हैं ,नैपी बदलने से हल्दी और तेल सने आंचल से  थोड़ी सी आज़ादी मिली है, थोड़ा सा अपने लिए सोचने का समय मिला है।कुछ शारीरिक प्रक्रियाओं से आज़ादी मिली है। जीवन के प्रति नज़रिये में परिवर्तन आया है। ………इतना सब कुछ हो जाये और कवि का ध्यान न जाये ऐसा तो हो ही नहीं सकता। …………चालीस की उम्र मेँ लेखन के क्षेत्र मेँ आज कयी सशक्त हस्ताक्षर हमारे बीच मौजूद हैँ । इनके पास अनुभव का भण्डार . समय की नब्ज टटोलती ये महिलाऐँ सधे कदमेँ से अपनी उडान को तत्पर हैँ । चालीससाला औरतोँ का ये विस्तार अदभुत है ।
प्रस्तुत है एक साथ इन कवियत्रियों की कविताऐँ ,आशा है आप इनके विचारों से सहमत होंगे   ………… वंदना बाजपेयी (सह सम्पादिका -गाथान्तर )

Anju Sharma


अंजू शर्मा 


चालीस साला औरतें

इन अलसाई आँखों ने
रात भर जाग कर खरीदे हैं
कुछ बंजारा सपने
सालों से पोस्टपोन की गयी 
उम्मीदें उफान पर हैं
कि पूरे होने का यही वक़्त
तय हुआ होगा शायद


अभी नन्ही उँगलियों से जरा ढीली ही हुई है
इन हाथों की पकड़
कि थिरक रहे हैं वे कीबोर्ड पर
उड़ाने लगे हैं उमंगों की पतंगे
लिखने लगे हैं बगावतों की नित नयी दास्तान,
संभालो उन्हे कि घी-तेल लगा आंचल
अब बनने को ही है परचम


कंधों को छूने लगी नौनिहालों की लंबाई
और साथ बढ़ने लगा है सुसुप्त उम्मीदों का भी कद
और जिनके जूतों में समाने लगे है नन्हें नन्हें पाँव
वे पाँव नापने को तैयार हैं
यथार्थ के धरातल का नया सफर


वे बेफिक्र हैं कलमों में घुलती चाँदी से 
चश्मे के बदलते नंबर से
हार्मोन्स के असंतुलन से 
अवसाद से अक्सर बदलते मूड से
मीनोपाज़ की आहट के साइड एफ़ेक्ट्स से   
किसे परवाह है,
ये मस्ती, ये बेपरवाही,
गवाह है कि बदलने लगी है खवाबों की लिपि


वे उठा चुकी हैं दबी हंसी से पहरे  
वे मुक्त हैं अब प्रसूतिगृहों से,
मुक्त हैं जागकर कटी नेपी बदलती रातों से,
मुक्त हैं पति और बच्चों की व्यस्तताओं की चिंता से,


ये जो फैली हुई कमर का घेरा है  न
ये दरअसल अनुभवों के वलयों का स्थायी पता है
और ये आँखों के इर्द गिर्द लकीरों का जाल है
वह हिसाब है उन सालों का जो अनाज बन
समाते रहे गृहस्थी की चक्की में

ये चर्बी नहीं
ये सेलुलाइड नहीं
ये स्ट्रेच मार्क्स नहीं
ये दरअसल छुपी, दमित इच्छाओं की पोटलियाँ हैं
जिनकी पदचापें अब नयी दुनिया का द्वार ठकठकाने लगीं हैं 
ये अलमारी के भीतर के चोर-खाने में छुपे प्रेमपत्र हैं
जिसकी तहों में असफल प्रेम की आहें हैं 
ये किसी कोने में चुपके से चखी गई शराब की घूंटे है
जिसके कडवेपन से बंधी हैं कई अकेली रातें,   

ये उपवास के दिनों का वक़्त गिनता सलाद है
जिसकी निगाहें सिर्फ अब चाँद नहीं सितारों पर है,
ये अंगवस्त्रों की उधड़ी सीवनें हैं
जिनके पास कई खामोश किस्से हैं 
ये भगोने में अंत में बची तरकारी है
जिसने मैगी के साथ रतजगा काटा है 

अपनी पूर्ववर्तियों से ठीक अलग
वे नहीं ढूंढती हैं देवालयों में
देह की अनसुनी पुकार का समाधान
अपनी कामनाओं के ज्वार पर अब वे हंस देती हैं ठठाकर,
भूल जाती हैं जिंदगी की आपाधापी
कर देती हैं शेयर एक रोमांटिक सा गाना,
मशगूल हो जाती हैं लिखने में एक प्रेम कविता,

पढ़ पाओ तो पढ़ो उन्हे
कि वे औरतें इतनी बार दोहराई गई कहानियाँ हैं
कि उनके चेहरों पर लिखा है उनका सारांश भी,
उनके प्रोफ़ाइल पिक सा रंगीन न भी हो उनका जीवन
तो भी वे भरने को प्रतिबद्ध हैं अपने आभासी जीवन में
इंद्रधनुष के सातों रंग,

जी हाँ,  वे फ़ेसबुक पर मौजूद चालीस साला औरतें हैं.................



सुशीला शिवराण


चालीस साला औरतें
मुर्गे की बाँग से पहले
जग जाती हैं चालीस साला औरतें
घड़ी के अलार्म से पहले
घनघना उठता है उनके मन का अलार्म
पाँवों में लग जाते हैं पहिए
बल्ब, ट्यूब-लाईट की रोशनी को
मात देती हैं तीन-चार बर्नरों की लौ
मशीन हो जाते हैं हाथ
उम्र को धता बताते हुए।
कलफ़ लगी सलीके से पहनी साड़ी
सधे क़दमों से बढ़ती हैं गाड़ी की ओर
रसॊईवाले हाथों की
चपलता, सतर्कता
संभाल लेती है स्टीयरिंग
कलियों-सी मुस्कान बिखेरती
फूलों-सी महक लिए
दफ़्तर में दाखिल होती हैं
चालीस साला औरतें।
थकी-हारी पहुँचती हैं घर
एक चुस्की चाय
चहकते बच्चों की मुस्कान
भर देती है ऊर्जा से
बच्चों की पढ़ाई
दफ़्तर की गुफ्तगू
घर की बातें
समस्याएँ, चुनौतियाँ
चाँदी बन झाँकने लगती हैं
सुरूचि से बंधी केशराशि से
बच्चों की उपलब्धियों से
हो जाती हैं गरिमामयी
बच्चों की ट्रॉफियों की चमक से
दिपदिपाती हैं चालीस साला औरतें।
तृप्त मन लिए
रसोई में हो जाती हैं अन्नपूर्णा
कामवाली बाई अचरज से देखती है इन्हें
दीदी कभी थकती नहीं !
रात के खाने पर
पुडिंग में घोल देती हैं
ढेर-सी नेह की मिठास
बच्चों की तारीफ़ से
पिया की नेहभरी चितवन से
हो जाती हैं बाग़-बाग़
चालीस साला औरतें।
बिस्तर पर निढाल
थका तन, ताज़ा मन लिए
अगले दिन का ख़ाका बना
बेहद सुकून की
सबसे मीठी नींद सोती हैं
चालीस साला औरतें।
- सुशीला शिवराण


वीणा वत्सल सिंह
वीणा वत्सल सिंह 
चालीस पार की औरतें 
***********************
कुछ कच्चे कुछ पके सपनों की 
दहलीज पर खडी होती हैं 
चालीस पार की औरतें 
जीवन के सच को पह्चानती 
कर्तव्यों की वेदी पर 
स्वयं को चढ़ाए होती हैं 
चालीस पार की औरतें 
इन्हें अब 
दूध का उफन कर गिरना 
उद्वेलित नहीं करता 
हाथ से छूटकर 
शीशे का टूटना 
इनके ह्रदय की आहट नहीं होता 
ये हर छोटी - बड़ी घटनाओं का 
सच पहचान लेती हैं 
चीडियों की चहचहाहट पर 
पहले की तरह उमग कर नहीं हँसतीं
बस ,मुस्कुराकर 
बच्चों को उनके चहकने की महत्ता 
बताने लगती हैं 
चालीस पार की औरतें 
एकदम अलग होती हैं 
एक अल्हड किशोरी 
और अपने से कम उम्र की औरतों से 
चालीस पार कीऔरतें 
पुरुष में प्रेम नहीं 
प्रेम में पुरुष को 
तलाशती हैं 
जीवन के कड़वेपन को 
आँसुओं के साथ घोल 
चुपचुपाप पीने में 
माहीर होती हैं 
ये चालीस पार की औरतें 

DrSony Pandey

सोनी पाण्डेय 
उम्र के चालीसवे पायदान पर . . . . .
भाग -1
उम्र के चालीसवेँ पायदान पर
खडी मैँ देख रहीँ हूँ पलट कर
जीवन अध्याय ।
जीवन कभी अल्मस्त , अल्हड सी गाँव की गुईयाँ संग खेले गये
गुड्डे और गुडिया की कहानी तो
कभी माँ के गीतोँ मेँ पिरोये
राजा और रानी के जीवन संघर्ष की कहानी लगता है ।
धीरे - धीरे छूटते गये
रेत की तरह फिसलते गये
मुट्ठी मेँ कैद बचपन के स्वप्न
किशोर मन की आकाँक्षा
वो पहले प्रेम - पत्र की गुदगुदाहट
और युवा मन की बेचैन अभिलाषाओँ का अर्न्तद्वन्द
कैद ही रहा चौखट के भीतर
तुलसी के चौरे पर बँधे कलावे की तरह जीवन आँगन और गलियारे के मध्य भटकते हुए
बीत गया संस्कारोँ के बिहड मेँ
जीवन के बीस वर्ष ।
उम्र के चालीसवेँ पायदन पर बैठी निहारती हूँ
जीवन के मध्य का इतिहास
तो पाती हूँ सर्वत्र अपने मैँ का बिखरा हुआ भग्नावशेष
और कण्ठ तक रुका पडा विष
जो अभी तक रुका है ठीक ह्रदय के ऊपर
बैठी हूँ बनकर नीलकण्ठ ।
बीस के बाद मैँ पृथ्वी के रंगमँच पर ,
निभाती रही माँ , बहन , बेटी .बहू .पत्नी का किरदार
पाती रही स्वर्णपदक
मार कर खुद के अस्तित्व को ।
बचपन छूट गया . पीछे . बहुत पीछे
चलता रहा समय चक्र ।


भाग - 2
उम्र के चालीसवेँ पायदान पर बैठी 
मैँ देख रही हूँ . बीते हुए पतझड और बसन्त
वर्षा और धूप
पाती हूँ
मेरी उँगली थाम चलने वाले पौधे , भाग रहे हैँ सरपट
निबटा चुकी हूँ जीवन के साठ प्रतिशत काम
फिरभी कुछ रिक्त है ।
अब थक चुकी हूँ बुहारते हुए आँगन
चढते हुए मन्दिर की सीढियाँ
आस्था - अनास्था का द्वन्द
जारी है
अब नहीँ लगती मुझे देवी की मूर्ति ,सच्ची
वह पुरुष सत्ता की साजिश के तहत
कैद , मन्दिरोँ मेँ
उपयोग की हुई वस्तु लगती है ।
और मैँ निकल पडी हूँ अब
तलाशने , अपना अस्तित्व
हाँ
उम्र के चालीसवेँ पायादन पर
मैँ खुद को पहचाने लगी हूँ
इस लिये माँग लायी हूँ
कुम्हार से चाक
कुछ शब्दोँ की गिली माटी का लोना
और गढ रही हूँ
हाशिये पर बिखरे हर्फ़ से
जीवन का मजबूत गढ
जहाँ चल रही है कोशिश
रचने की . एक नयी कहानी ,
क्योँ कि मैँ जान चुकी हूँ कि
उम्र के चालीसवेँ पायदान पर , एक बार फिरसे
जन्म लेती है औरत ,और लिखती है
जीवन की कहानी
यहाँ कोयी राजा है न रानी ।

भाग 3 .
उम्र के चालीसवेँ पायदान पर
बैठी , देख रही हूँ
कि , अब मैँ जीवन समर मेँ
ठहरी हुयी , स्थिर मैदानी नदी हूँ ।
अब नहीँ आते स्वप्न रंग- बिरंगे
नाचते , गाते , रुठते , मनाते
बचपन के ।
युवा मन की तरंग , जो बहा ले जाना चाहती थी
तमाम बेमानी वर्जनाओँ को ।
अब मैँ शिकायत नहीँ करती पिता से
कि क्योँ ब्याह कर भेज दिया
पराये देश ।
अब मैँ निकल पडी हूँ निश्चिँत
खुद की तलाश मेँ
निभाते हुए डयोढी की शर्त ।
शारीरिक . मानसिक . सामजिक , अनुबन्धोँ को धीरे - धीरे रख रही हूँ
तुलसी के चौरे पर बने ताखे मेँ
और खोज रही हूँ अपने हिस्से का आकाश
लिख रही हूँ " बदनाम औरतोँ " का सच
दर्ज कर रही हूँ " तीसरी बेटी का हलफनामा "
अब देवालयोँ मेँ नहीँ लगाती आस्था के फेरे
ये समय बीतता है अनुभव के पुस्तकालय मेँ
पढती हूँ . रचती हूँ . देखती हूँ .
सुनती हूँ, जीवन समर मेँ
गुनती हूँ , चुनती हूँ समुद्र से कुछ मनके
और सजा देती हूँ टूटती हुई वर्जनाओँ के द्वार पर टाँक कर तोरण मेँ ।
उम्र के चालीसवेँ पायदान पर ।

भाग . 4
उम्र के इस पायदान पर
मुक्त हो शारीरिक अनचाही
क्रियाओँ से औरत निश्चिँत एक नया अध्याय लिख रही है
अब गीता , मानस , मन्दिर की परिक्रमा छोड , रच रही है
शब्दोँ की तुलिका से यौवन के गीत ।
हाँ मैँ देख रही हूँ कि ये औरतेँ अपनी दमित इच्छाओँ को फिरसे जगा ,रंग भर रही है सपनोँ के खाली कैनवास पर ।
ये जानती और पहचानती हैँ धरती की गहराई और आकाश के विस्तार को . इस लिये सधे कदमोँ से भरतीँ हैँ उडान ।
ये तितली के मन की बात सुन सकती हैँ और भँवरोँ के मधुर गान के धुन पर नाच सकतीँ हैँ
दिखा सकती हैँ अपने सधे कदमोँ का हुनर . जहान को ।
ये औरतेँ जो केवल जीती रहीँ
वर्जनाओँ के दायरे मेँ जीवन
अब निकल रही हैँ ठीक पृथ्वी की नाभी से लेकर अमृत कलश
उम्र के चालीसवेँ पायदान पर ।
सोनी पाण्डेय