मिर्जापुर की मिट्टी में जन्मीममता संवेदनाओं की उस धारा का नाम हैं जो सुनने, महसूस करने और शब्दों में जीवन को संजोने की कला जानती है।डबल एम.ए. (इतिहास, हिंदी) और बी.एड. शिक्षा प्राप्त ममता जी ने 2001 बैच में पी.सी.एस. के माध्यम से प्रशासनिक सेवा में कदम रखा और आज लेखा परीक्षा अधिकारी के रूप में अपनी जिम्मेदारियाँ निभा रही हैं।
इन सब के बावजूद ममता के व्यक्तित्व की असली पहचान उनके भीतर बसती उस लेखिका में है, जो जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों को गहराई से जीती है। पढ़ना, सुनना और सृजन करना उनके लिए केवल रुचियाँ नहीं, बल्कि आत्मा का विस्तार हैं। यात्रा उन्हें नए रंग देती है, तो ध्यान उन्हें भीतर की शांति से जोड़ता है। ममता के लिए जीवन एक सतत यात्रा है—बाहर की दुनिया को देखने और भीतर की दुनिया को समझने की।आइए आज रू-ब-रू होते हैं गाथांतर पर ममता की कविताओं से-
सुनो स्त्री!
(1)
कई बार जरा,मृत्यु और अवसाद देख,
संसार के कोलाहल से परेशान होकर,
तुमने भी विचार किया होगा
कि जीवन दु:ख ही दु:ख है,
इसका कहीं न ओर है,न छोर है,
हर तरफ़ बस मन का शोर है,
कई बार पूछा होगा तुमने स्वयं से कौन हूं मैं,क्यों जिंदा हूं...
भागना चाहा होगा,किसी जंगल में,डूबना चाहा होगा कभी न कभी निर्मल गंगा के जल में,
और शांत हो स्वयं को "अप दीपो भव" के भाव में भी महसूस किया होगा और बनना चाहा होगा बुद्ध!
मगर हे स्त्री!
तुम बुद्ध नहीं,यशोधरा बनना,
किसी सोते राहुल को यूं ही असहाय छोड़कर मत जाना,
वृद्ध माता-पिता के उत्तरदायित्व से मुंह मत मोड़ लेना...
हजारों जन-मानस के विश्वास को मत तोड़ देना,
किसी ध्यान से करूणा और शांति तुम्हें
न मिलने वाली है,
वह तो तुम्हारी आत्मा में बसा, तुम्हारी ही थाती हैं,
इसलिए हे स्त्री!
हो सके तो यशोधरा बनना,
संसार का सृजन करना,समृद्ध करना और और सैकड़ों बुद्ध गढ़ना।
(2)
सुनो स्त्री!
जब जरा की झुर्रियाँ
और मृत्यु की परछाइयाँ
मन की दीवारों पर
धीरे-धीरे उतरती हों,
जब संसार का अनंत कोलाहल
तुम्हारे भीतर
एक असह्य शोर बन जाए,
और जीवन
एक लंबी, अंतहीन पीड़ा सा लगे—
न जिसका कोई आदि दिखे,
न कोई अंतिम तट।
तब शायद
तुमने भी कभी
अपने ही हृदय से पूछा होगा—
कौन हूँ मैं?
क्यों हूँ इस पृथ्वी पर?
कभी चाहा होगा
सब कुछ छोड़कर
किसी वन की निस्तब्धता में खो जाना,
कभी सोचा होगा
निर्मल गंगा की गोद में
अपने समस्त प्रश्न
जल की तरह बहा देना।
कभी तुम्हारे भीतर भी
जगा होगा
वैराग्य का वह दीप—
जिसे ऋषियों ने कहा
“अप्प दीपो भव”।
और क्षण भर को
तुमने भी सोचा होगा—
क्यों न मैं भी
बुद्ध हो जाऊँ?
पर सुनो स्त्री!
तुम्हें बुद्ध नहीं बनना,
तुम्हें यशोधरा होना है।
क्योंकि
किसी शांत रात्रि में
सोते हुए राहुल को
असहाय छोड़कर
चले जाना
तुम्हारी करुणा की प्रकृति नहीं।
वृद्ध माता-पिता की
धीमी होती सांसों के बीच
अपना कर्तव्य भूल जाना
तुम्हारी संस्कृति नहीं।
हजारों आँखों में बसे
विश्वास के दीपक
तुम्हारी प्रतीक्षा करते हैं—
उन्हें बुझने मत देना।
स्मरण रखो—
ध्यान की किसी गुफा में
करुणा नहीं मिलती,
वह तो तुम्हारी आत्मा की
स्वाभाविक ध्वनि है।
शांति भी
किसी निर्वाण का पुरस्कार नहीं,
वह तो तुम्हारे भीतर
जन्म से ही बसी हुई
अनंत विरासत है।
इसलिए हे सखी,
यदि कभी
वैराग्य का पथ तुम्हें पुकारे,
तो पल भर ठहर कर
अपने भीतर देखना—
तुम्हारी कोख में
संसार की निरंतरता धड़कती है,
तुम्हारे स्पर्श से
सभ्यताएँ जन्म लेती हैं।
इसलिए
यदि बनना ही हो—
तो यशोधरा बनना।
जो संसार को त्यागती नहीं,
उसे रचती है,
सींचती है,
समृद्ध करती है—
और अपनी मौन तपस्या से
एक नहीं,
सैकड़ों बुद्ध गढ़ती है।
(3)
अन्तर्मन का सेतु-
न शब्द थे, न संज्ञा थी,
बस एक मूक पुकार थी,
नन्हीं सी उन आँखों में,
जीवन की ही दरकार थी
महादेवी की लेखनी ने,जो गिल्लू में प्राण भरे,
संवेदना के वे ही अंकुर,आज हमारे हृदय से झरे।
जाति-पाँति और देह-भेद से,ऊपर प्रेम की सत्ता है,
संस्कार वही जो समझ सके,
क्यों काँप रहा हर पत्ता है?
जैसे गिल्लू के पंजों ने,थामी महादेवी की उँगली थी,
वैसे ही हर जीव की पीड़ा,
मानवता की ही देहरी थी।
पशु हो या पाषाण हृदय,
स्पंदन सबमें गहरा है,
ऊपरी आवरण के पीछे,
संवेदना का पहरा है।
जब पर दु:ख देख आँख छलके,तब संस्कार जागते हैं,
स्वार्थ के सारे तुच्छ अंधेरे,
उस लौ से भागते हैं।
प्रेम न बँधता सीमाओं में,न व्याकरण उसे पढ़ पाता है,
हृदय से हृदय तक का रिश्ता,
मौन ही सदा निभाता है।
गिल्लू जैसा स्नेह मिले तो,
पत्थर भी पिघल सकता है,
सच्ची संवेदना से ही,
ये संसार बदल सकता है।
परिचय
नाम : ममता बरनवाल, अवस्थी
जन्म स्थान : मिर्जापुर,उत्तर प्रदेश। शिक्षा : एम.ए.( इतिहास, हिंदी), बीएड।
तत्पश्चात २००१ में उत्तर प्रदेश पी. सी. एस. में चयन।,वर्तमान में लेखा परीक्षा अधिकारी।
रुचियांँ :सुनना,महसूस करना,पढ़ना, और सृजन करना। पर्यटन में रुचि, घूमना और ध्यान में अपना खाली समय व्यतीत करना।